Thursday, July 30, 2026

सावधान मास्टर साहब! सरकारी स्कूल छोड़कर प्राइवेट स्कूल,कोचिंग चमकाई तो खैर नहीं, पत्र संख्या 613 से बिहार के शिक्षक महकमे में हड़कंप!

गरीब के बच्चों से धोखा बर्दाश्त नहीं! सजन आर का अल्टीमेटम—कोचिंग-ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षकों की सीधे जाएगी नौकरी!

बिहार के इतिहास में शिक्षा सुधार का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी कदम : पर्दे के पीछे शातिर शिक्षको का खेल नहीं चलेगा, रडार पर ‘मनी ट्रेल’,पकड़ना नहीं है मुश्किल,सरकार मांग सकती है शपथ पत्र, बैंक खातों की जांच से खुलेगा राज,

पटना: बिहार के शिक्षा गलियारे से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर आ रही है। सरकारी खजाने से हर महीने मोटी सैलरी उठाने वाले और प्राइवेट कोचिंग-स्कूलों में जाकर अपनी जेबें गर्म करने वाले शिक्षकों के खिलाफ बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने अंतिम और निर्णायक जंग का ऐलान कर दिया है। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने एक ऐसा विस्फोटक और सनसनीखेज आदेश जारी किया है, जिसने पूरे राज्य के शिक्षक महकमे की नींद उड़ा दी है। माध्यमिक शिक्षा के निदेशक सजन आर ने सीधे तौर पर राज्य के सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को लिखित रूप से हंटर चलाने का अल्टीमेटम थमा दिया है। इस नए और सख्त फरमान के मुताबिक, यदि कोई भी सरकारी स्कूल का शिक्षक अपने तय विद्यालय के समय में या उसके बाद किसी भी प्राइवेट स्कूल, कोचिंग संस्थान, निजी ट्यूशन या किसी भी प्रकार के व्यावसायिक केंद्र में अपनी सेवाएं देते हुए पाया गया, तो उसकी नौकरी सीधे चली जाएगी। विभाग ने इसे शिक्षकों के लिए बनाई गई आचार संहिता का खुला उल्लंघन माना है और साफ किया है कि अब गरीब के बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

बिहार सरकार के शिक्षा विभाग (माध्यमिक शिक्षा निदेशालय) द्वारा जारी पत्र संख्या 11/नियमावली 1-1/2021 (अंश-1) 613, जिस पर निदेशक सजन आर के हस्ताक्षर हैं। दिनांक 11-6-26 को जारी इस कड़े पत्र में राज्य के सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में प्राइवेट कोचिंग, निजी ट्यूशन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों में संलिप्त सरकारी शिक्षकों को चिह्नित कर उन पर तत्काल अनुशासनात्मक और दंडात्मक ऐक्शन लेने का आदेश दिया गया है।

पत्र संख्या 613 से थर्राया महकमा: सजन आर का सीधे ऐक्शन का ऑर्डर

शिक्षा विभाग के निदेशक सजन आर द्वारा जारी किए गए पत्र संख्या 11/नियमावली 1-1/2021 (अंश-1) 613 ने राज्य की पूरी प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। दिनांक 11-6-26 को पटना से निर्गत इस पत्र में साफ शब्दों में चेतावनी दी गई है कि सरकारी शिक्षकों की यह मनमानी अब और नहीं चलेगी। पत्र में इस बात का स्पष्ट और कड़ा उल्लेख है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य के प्राथमिक विद्यालयों से लेकर उच्च माध्यमिक विद्यालयों तक में बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से रिकॉर्ड स्तर पर बेहद योग्य और प्रतिभावान शिक्षकों की पारदर्शी बहाली की गई है। सरकार का मुख्य उद्देश्य यह है कि अब राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक उपलब्ध हैं, इसलिए पढ़ाई के स्तर में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। इस नए परिप्रेक्ष्य में सरकार का पूरा फोकस गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को बेहतरीन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने पर है। निदेशक सजन आर ने दो टूक कहा है कि हर एक शिक्षक को बच्चों की पढ़ाई के प्रति शत-प्रतिशत जवाबदेह और वफादार होना ही पड़ेगा।

सरकारी ट्रेनिंग का फायदा प्राइवेट में? अब नहीं चलेगा यह दोहरा खेल

इस सनसनीखेज फैसले के पीछे के कारणों का जब हम गहरा विश्लेषण करते हैं, तो सरकार की चिंता पूरी तरह जायज नजर आती है। शिक्षकों को सरकार समय-समय पर बेहतरीन और अत्याधुनिक शैक्षणिक ट्रेनिंग भी दे रही है ताकि उनकी कार्यकुशलता और पढ़ाने का तरीका इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का हो सके। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट थी। कुछ स्वार्थी शिक्षकों ने इस बेहतरीन ट्रेनिंग और अपनी योग्यता को प्राइवेट कोचिंग सेंटरों, होम ट्यूशनों और बड़े-बड़े नामी प्राइवेट स्कूलों में मोटी फीस के बदले बेचना शुरू कर दिया था। इस दोहरे खेल के कारण सरकारी स्कूलों के मासूम बच्चों का भविष्य पूरी तरह से अंधकार में डूब रहा था। शिक्षक अपने मूल पदस्थापित सरकारी विद्यालयों में केवल अपनी हाजिरी बनाने और कागजी कोरम पूरा करने आते थे, जबकि अपनी असली ऊर्जा वे प्राइवेट ठिकानों पर खपा रहे थे। निदेशक सजन आर ने अपने पत्र में बहुत ही तल्ख शब्दों में लिखा है कि शिक्षकों द्वारा अपने विद्यालय परिसर अथवा अन्य किसी भी बाहरी स्थान पर कोचिंग या निजी ट्यूशन पढ़ाने से उनके मूल सरकारी स्कूल के बच्चों की पढ़ाई सीधे तौर पर प्रभावित होती है, जिसे सरकार अब और एक सेकंड के लिए भी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

जिला शिक्षा पदाधिकारियों को खुली छूट: संदिग्ध ठिकानों पर होगी छापेमारी

इस कड़े फैसले को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जमीन पर उतारने के लिए माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने राज्य के सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को असीमित प्रशासनिक शक्तियां सौंप दी हैं। आदेश के अनुसार, सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को अपने-अपने जिलों में विशेष उड़नदस्ता टीमों का गठन करने को कहा गया है। ये टीमें सुबह से लेकर शाम तक अलग-अलग कोचिंग हबों, प्राइवेट स्कूलों और रिहायशी इलाकों में औचक छापेमारी (सरप्राइज रेड) करेंगी। अगर इस छापेमारी के दौरान कोई भी सरकारी स्कूल का शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर चाक चलाते हुए या किसी प्राइवेट बेंच पर बच्चों को बैच बनाकर पढ़ाते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया, तो उसकी किस्मत का फैसला ऑन द स्पॉट हो जाएगा। विभाग ने साफ कर दिया है कि ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की पैरवी, राजनीतिक रसूख या ढिलाई को पूरी तरह से खारिज कर दिया जाएगा। जिला शिक्षा पदाधिकारियों को सख्त निर्देश है कि वे बिना किसी पूर्व सूचना के संदिग्ध कोचिंग संस्थानों की लिस्ट बनाकर तत्काल रेड मारें और इसकी साप्ताहिक रिपोर्ट सीधे पटना मुख्यालय को भेजें।

सांकेतिक (प्रतीकात्‍मक) तस्‍वीर

पर्दे के पीछे का खेल: पत्नी और बच्चों के नाम पर शिक्षा का व्यापार, रडार पर ‘मनी ट्रेल’

सरकारी तंत्र की आंखों में धूल झोंकने के लिए कुछ शातिर शिक्षकों ने भ्रष्टाचार का एक नया और बेहद सुरक्षित रास्ता निकाल लिया है। ये शिक्षक खुद ब्लैकबोर्ड पर चाक लेकर नहीं खड़े होते, बल्कि अपनी सरकारी नौकरी से मिली मोटी पूंजी को प्राइवेट स्कूलों और बड़े कोचिंग सेंटरों में बेनामी तौर पर निवेश कर रहे हैं। अपनी गर्दन बचाने के लिए इस धंधे के मालिकाना हक की कागजी कमान अपनी पत्नी, बच्चों या बेहद नजदीकी रिश्तेदारों के नाम पर सौंप रखी है। भले ही इन संस्थानों में बाहर के शिक्षकों से पढ़ाई कराई जा रही हो, लेकिन इन सरकारी गुरुजी का पूरा ‘मन और धन’ चौबीसों घंटे इसी व्यापार को चमकाने में लगा रहता है। स्कूल के भीतर रहने के दौरान भी इनका दिमाग अपने प्राइवेट स्कूल की बैलेंस शीट और मुनाफे को जोड़ने में व्यस्त रहता है। शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि भले ही इस गुप्त खेल का पत्र संख्या 613 में सीधा उल्लेख न हो, लेकिन आचार संहिता के व्यापक नियमों के तहत यह पूरी तरह से अवैध और सेवा शर्तों का खुला उल्लंघन है। आम जनता द्वारा ऐसी बेनामी संपत्तियों और गुप्त व्यापार की शिकायत मिलते ही ये शातिर शिक्षक सीधे विभाग के निशाने पर आ जाएंगे।

पकड़ना नहीं है मुश्किल: सरकार मांग सकती है शपथ पत्र, बैंक खातों की जांच से खुलेगा राज

इस तरह के ‘सफेदपोश’ शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसना सरकार के लिए कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि शिक्षा विभाग को इन चालाक शिक्षकों की ‘मनी ट्रेल’ यानी पैसों के लेन-देन की समय-समय पर गहन जांच करानी चाहिए। इसके अलावा, एक बेहद कारगर तरीका यह हो सकता है कि सरकार हर साल सभी सरकारी शिक्षकों से एक अनिवार्य शपथ पत्र (एफिडेविट) मांगे। इस शपथ पत्र में शिक्षकों को स्पष्ट रूप से यह घोषणा करनी होगी कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य (पत्नी, बच्चे या आश्रित) किसी भी प्राइवेट स्कूल, कोचिंग या शैक्षणिक व्यवसाय में संलिप्त नहीं है, और यदि है तो उसकी आय का स्रोत क्या है। जैसे ही इनके और इनके परिजनों के बैंक खातों की जांच का शिकंजा कसेगा, सरकारी सैलरी की आड़ में चल रहा करोड़ों का यह बेनामी साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। विभाग अब ऐसे शातिर दिमाग वाले शिक्षकों की गुप्त सूचियां तैयार करने में जुट गया है, जो तन से सरकारी विद्यालय में हाजिरी बनाते हैं, लेकिन मन और धन से प्राइवेट तिजोरियां भर रहे हैं।

आचार संहिता का सीधा उल्लंघन: जेल और बर्खास्तगी की लटकी तलवार

शिक्षा विभाग द्वारा उठाया गया यह कदम कोई सामान्य विभागीय ट्रांसफर-पोस्टिंग नहीं है, बल्कि एक बड़ा कानूनी शिकंजा है। पत्र के अंतिम हिस्से में दी गई चेतावनी इतनी गंभीर है कि ट्यूशन माफियाओं के पूरे सिंडिकेट में सन्नाटा पसर गया है। पत्र में लिखा गया है, “अतः आप सभी यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी सरकारी विद्यालय के शिक्षक अपने विद्यालय परिसर अथवा अन्य स्थानों पर अवस्थित कोचिंग/निजी ट्यूशन एवं व्यवसायिक संस्थानों में पढ़ाने का कार्य नहीं करेंगे। यदि कोई शिक्षक कोचिंग/निजी ट्यूशन एवं व्यवसायिक संस्थानों में पढ़ाने में संलिप्त पाए जाते हैं तो शिक्षकों के लिए निर्धारित आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा और तदनुरूप उनके विरुद्ध कठोर एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई की जायेगी।” इसका सीधा और स्पष्ट मतलब यह है कि दोषी पाए जाने वाले शिक्षकों की न सिर्फ सरकारी नौकरी जाएगी, बल्कि उनके खिलाफ सरकारी नियमों की अवहेलना, जालसाजी और विभागीय धोखाधड़ी का क्रिमिनल केस भी दर्ज किया जा सकता है। उनकी संचित पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सभी सरकारी लाभों को हमेशा के लिए जब्त किया जा सकता है।

क्यों जरूरी था शिक्षा विभाग का यह ‘सर्जिकल स्ट्राइक’?

यदि हम बिहार की शिक्षा व्यवस्था का सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण करें, तो यह साफ हो जाता है कि प्राइवेट कोचिंग और होम ट्यूशन का यह धंधा राज्य के भीतर एक समानांतर ब्लैक इकॉनमी बन चुका था। बिहार लोक सेवा आयोग जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा पास करके आने वाले नए और ऊर्जावान शिक्षकों को भी इस ट्यूशन रूपी बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से लगातार यह शिकायतें आ रही थीं कि सरकारी शिक्षक अपने स्कूलों में जानबूझकर पूरा सिलेबस नहीं पढ़ाते थे, ताकि बच्चे मजबूर होकर उनके निजी कोचिंग सेंटरों में मोटी रकम देकर एडमिशन लें। यह एक तरह का संगठित मानसिक और आर्थिक शोषण था, जिसने सरकारी स्कूलों को केवल मिड-डे मील की खिचड़ी बांटने का अड्डा बनाकर रख दिया था। शिक्षा विभाग के इस नए और ऐतिहासिक फरमान से उन गरीब अभिभावकों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई है, जो अपने बच्चों को महंगे प्राइवेट कोचिंग या स्कूलों में भेजने का खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ थे। अब शिक्षकों को मजबूरन स्कूल के निर्धारित 6 से 8 घंटों के दौरान अपनी पूरी ताकत और ज्ञान सरकारी स्कूल के बच्चों को ही देना होगा।

कोचिंग और प्राइवेट स्कूल माफियाओं में खलबली: अब आगे क्या?

निदेशक सजन आर के इस धमाकेदार आदेश के बाद राज्य के बड़े-बड़े कोचिंग संचालकों और प्राइवेट स्कूल प्रबंधकों के बीच गुप्त बैठकों का दौर शुरू हो गया है। पटना के मुसल्लहपुर हाट, नया टोला, बोरिंग रोड, कंकड़बाग और भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया जैसे बड़े कोचिंग हबों में सन्नाटा पसरने लगा है क्योंकि कई बड़े संस्थान इन्हीं स्टार सरकारी शिक्षकों के चेहरे पर करोड़ों का बिजनेस कर रहे थे। अब नौकरी जाने के डर से शिक्षकों ने इन कोचिंग संस्थानों  के बैनर, बोर्ड, से अपनी तस्वीरें, मोबाइल नम्‍बर,नाम,जैसी पर्सनली चीजें  हटाने की गुहार लगानी शुरू कर दी है। विशेषज्ञ इसे बिहार के इतिहास में शिक्षा सुधार का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी कदम मान रहे हैं। अब देखना यह होगा कि निदेशक सजन आर का यह पत्र धरातल पर कितना असर दिखाता है और जिला शिक्षा पदाधिकारी इस आदेश का पालन कराने में कितने ईमानदार साबित होते हैं। लेकिन एक बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि सम्राट सरकार ने इस बार भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आर-पार का मूड बना लिया है। अब सरकारी मास्टर साहब के पास केवल दो ही रास्ते बचे हैं—या तो वे पूरी ईमानदारी से केवल सरकारी स्कूल में गरीब के बच्चों का भविष्य संवारें, या फिर हमेशा के लिए इस्तीफा देकर अपना प्राइवेट धंधा संभालें। दोनों नावों पर पैर रखने वालों का डूबना अब पूरी तरह तय है।

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बिहार में दूध क्रांति का शंखनाद, पटना में खुलेगा एनडीडीबी का भव्य कार्यालय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदलेगी तस्वीर

पटना: बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और दुग्ध उत्पादकों के लिए एक ऐतिहासिक और बड़ी खबर सामने आई है। राज्य में दुग्ध सहकारिता आंदोलन को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) ने पटना में अपना कार्यालय स्थापित करने की दिशा में निर्णायक कदम उठा लिया है।

COMFED परिसर के पास होगी कार्यालय की स्थापना प्राप्त जानकारी के अनुसार, एनडीडीबी के अध्यक्ष मीनेश शाह ने बिहार सरकार के डेयरी, मत्स्य और पशु संसाधन विभाग के सचिव शिर्सत कपिल अशोक को पत्र लिखकर इस महत्वपूर्ण विकास की जानकारी दी है। एनडीडीबी ने पटना में कॉमफेड (COMFED) परिसर के निकट भूमि को चिह्नित कर लिया है। इस भूमि के आवंटन के साथ ही कार्यालय निर्माण की प्रक्रिया में तेजी आएगी। यह कदम न केवल राज्य में बुनियादी ढांचे को मजबूत करेगा, बल्कि दुग्ध उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए आय के नए द्वार भी खोलेगा।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई उड़ान इस पहल को बिहार के लिए एक गेम-चेंजर के रूप में देखा जा रहा है। एनडीडीबी के पटना में आने से राज्य के दुग्ध सहकारिता ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। यह कार्यालय सीधे तौर पर राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करेगा, जिससे किसानों को तकनीक, बाजार और बेहतर संसाधन उपलब्ध कराने में आसानी होगी। इससे बिहार के हजारों दुग्ध उत्पादकों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।

प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री का जताया आभार इस महत्वपूर्ण निर्णय और सहयोग के लिए बिहार सरकार ने केंद्र सरकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है। राज्य की ओर से इस विकास कार्य के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मत्स्य, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री ललन सिंह का विशेष आभार जताया गया है। यह समन्वय दर्शाता है कि केंद्र और राज्य सरकार बिहार के किसानों की समृद्धि के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।

अगला कदम: भूमि आवंटन एनडीडीबी ने स्पष्ट किया है कि जैसे ही बिहार सरकार द्वारा विधिवत भूमि का आवंटन पूरा किया जाएगा, कार्यालय निर्माण का कार्य युद्धस्तर पर शुरू कर दिया जाएगा। 12 जून 2026 को जारी इस पत्र ने साफ कर दिया है कि बिहार अब दूध उत्पादन के क्षेत्र में एक नए युग की ओर कदम बढ़ा चुका है।

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वैशाली में मिला इतिहास का महाखजाना! पातेपुर मठ से निकलीं 100 साल पुरानी 52 दुर्लभ पांडुलिपियां, प्रशासन कराएगा डिजिटलीकरण

हाजीपुर (वैशाली)। बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमि वैशाली से एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। ज्ञान भारतम् मिशन के तहत वैशाली जिला प्रशासन को एक ऐसी कामयाबी मिली है, जिसे इतिहास का अनमोल खजाना कहा जा रहा है। जिले के पातेपुर मठ से 100 वर्ष से भी अधिक प्राचीन 52 दुर्लभ पांडुलिपियां और ग्रंथ बरामद हुए हैं। इस ऐतिहासिक खोज के बाद से पुरातत्व और इतिहास प्रेमियों में भारी उत्साह देखा जा रहा है।

पातेपुर मठ से प्राप्त प्राचीन और दुर्लभ पांडुलिपियों का बारीकी से निरीक्षण करतीं वैशाली की जिलाधिकारी वर्षा सिंह।

यह पूरी कामयाबी वैशाली की जिलाधिकारी वर्षा सिंह के कुशल मार्गदर्शन में जिला प्रशासन की टीम को मिली है। बरामद की गई इन अमूल्य धरोहरों में धार्मिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक और पारंपरिक ज्ञान का एक अद्भुत और अकल्पनीय संग्रह सुरक्षित है। जानकारों का मानना है कि यह दुर्लभ ग्रंथ हमारी समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा और गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत प्रमाण हैं, जो अब तक दुनिया की नजरों से ओझल थे।

ऐतिहासिक धरोहरों को सौंपने के लिए पातेपुर मठ के महंत को प्रशस्ति-पत्र और शॉल देकर सम्मानित करतीं जिलाधिकारी वर्षा सिंह।

महंत को किया गया सम्मानित इस ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण योगदान के लिए जिला प्रशासन द्वारा पातेपुर मठ के महंत को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। जिलाधिकारी वर्षा सिंह ने कलेक्ट्रेट कार्यालय में महंत को प्रशस्ति-पत्र और शॉल भेंट कर उनके इस सराहनीय कदम की सराहना की। इस दौरान सुरक्षित रखी गई प्राचीन पांडुलिपियों को जिला प्रशासन को सौंप दिया गया।

शुरू होगी डिजिटलीकरण की प्रक्रिया  : जिलाधिकारी वर्षा सिंह ने बताया कि इन अनमोल और ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। जिला प्रशासन द्वारा इन सभी 52 दुर्लभ पांडुलिपियों के वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण, सूचीकरण (कैटलॉगिंग) और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया तुरंत प्रारंभ की जा रही है। डिजिटलीकरण होने से यह प्राचीन ज्ञान हमेशा के लिए अमर हो जाएगा और आने वाली पीढ़ियों के साथ-साथ शोधकर्ताओं के लिए भी आसानी से उपलब्ध रहेगा।

प्रशासन की जनता से अपील वैशाली जिला प्रशासन ने इस मौके पर आम जनता से भी एक बेहद महत्वपूर्ण अपील की है। जिलाधिकारी ने कहा कि अपनी विरासत को बचाना, आने वाली पीढ़ियों को सच्चे ज्ञान से जोड़ना है। यदि वैशाली जिले के किसी भी नागरिक या परिवार के पास ऐसी कोई प्राचीन पांडुलिपि, ग्रंथ, पुरानी लिपियों में लिखे दस्तावेज या ऐतिहासिक महत्व की वस्तु हो, तो उसकी जानकारी जिला प्रशासन को अवश्य दें, ताकि हमारी साझी संस्कृति को नष्ट होने से बचाया जा सके।

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टॉयलेट से लेकर ‘हीरे’ तक घिरी राजद: जद (यू) का तेजस्वी पर हमला, कहा—होमवर्क किए बिना ट्वीट करते हैं ‘ट्विटर बबुआ’

झालमुड़ी हम खा रहे हैं और माथा तेजस्वी का झनझना रहा है: जद (यू) कार्यालय में बरसे नीरज कुमार

पटना। बिहार की सियासत में इन दिनों बयानों के तीर नहीं, बल्कि दस्तावेजों के मिसाइल चल रहे हैं। जनता दल (यूनाइटेड) के प्रदेश कार्यालय में आयोजित एक हाई-वोल्टेज प्रेस वार्ता में एनडीए सरकार ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के खिलाफ चौतरफा मोर्चा खोल दिया। टॉयलेट निर्माण के खर्च से लेकर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के जन्मदिन पर मिले ‘हीरे के कंगन’ तक, हर एक मुद्दे पर जद (यू) के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार और प्रदेश प्रवक्ता मनीष यादव ने बिंदुवार तरीके से नेता प्रतिपक्ष को घेरा। जद (यू) ने दो टूक शब्दों में कहा कि 2025 के विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता से करारी शिकस्त पाने के बाद तेजस्वी यादव भारी हताश और परेशान हैं। इसी मानसिक व्याकुलता में वे बिना किसी होमवर्क के रोजाना सोशल मीडिया पर झूठ की दुकान चला रहे हैं और ‘ट्विटर बबुआ’ बनकर रह गए हैं।

फर्जीवाड़े पर तीखा प्रहार: जद (यू) प्रदेश कार्यालय, पटना में आयोजित संवाददाता सम्मेलन के दौरान सरकारी दस्तावेजों को सार्वजनिक कर तेजस्वी यादव के ट्वीट की पोल खोलते पार्टी के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार (बाएं) और साथ में मौजूद प्रदेश प्रवक्ता मनीष यादव (दाएं)।

टॉयलेट पॉलिटिक्स: ज्ञापांक 282 से तेजस्वी का फर्जीवाड़ाबेनकाब

प्रेस वार्ता की शुरुआत में मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने एक सरकारी पत्र (ज्ञापांक 282, दिनांक 2/6/2026) को हवा में लहराते हुए तेजस्वी यादव के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। दरअसल, तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर आरोप लगाया था कि अररिया जिला में मुख्यमंत्री की प्रगति यात्रा के दौरान मात्र 1 घंटे के कार्यक्रम के लिए 7,41,000 की भारी-भरकम लागत से एक अस्थाई वीवीआईपी टॉयलेट का निर्माण कराया गया।

इस आरोप का दस्तावेजी पोस्टमार्टम करते हुए नीरज कुमार ने कहा कि तेजस्वी यादव राजनीति के चंडूखाना में रहते हैं, इसलिए वे अंकगणित में भी फेल हो गए हैं। सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि वहां एक नहीं, बल्कि कुल चार अस्थाई शौचालय बनाए गए थे। इन चारों शौचालयों को बनाने में कुल 4,71,691 का खर्च आया था, यानी प्रति शौचालय लागत मात्र 1,17,992 थी।

नीरज कुमार ने तेजस्वी यादव के ही कार्यकाल का आईना दिखाते हुए कहा कि जब नीतीश कुमार ने उनका ‘एडहॉक अपॉइंटमेंट’ (तदर्थ नियुक्ति) सरकार में किया था, तब 3 फरवरी 2023 को उसी अररिया जिला में ‘समाधान यात्रा’ हुई थी। उस समय एनडीए सरकार नहीं बल्कि महागठबंधन की सरकार थी और तब एक शौचालय के निर्माण पर 1,56,000 की राशि खर्च हुई थी। जद (यू) ने तीखा सवाल किया कि जब आपके समय में ज्यादा खर्च हुआ तब आपका जमीर कहां सोया था? एकादशी के पावन दिन भी इतना बड़ा असत्य बोलने के लिए तेजस्वी यादव को 24 घंटे के भीतर बिहार की जनता से माफी मांगनी चाहिए।

वित्तीय ज्ञान पर तंज: इंजेक्शन से नहीं आता ज्ञान, सिद्दीकी साहब से ट्यूशन लें

जद (यू) प्रवक्ताओं ने तेजस्वी यादव द्वारा बिहार की आर्थिक स्थिति पर उठाए जा रहे सवालों पर भी उन्हें जमकर आड़े हाथों लिया। मनीष यादव ने कहा कि एनडीए सरकार ने जब राज्य के 94 लाख से अधिक बुजुर्गों, माताओं, विधवाओं और दिव्यांगों की सामाजिक सुरक्षा पेंशन को ₹400 से बढ़ाकर सीधे ₹1100 किया, तो विपक्ष के पेट में असहनीय पीड़ा होने लगी। तेजस्वी यादव जनता को गुमराह कर रहे हैं कि बिहार कंगाल हो गया है।

इस पर नीरज कुमार ने तंज कसा, “ज्ञान कोई बटाई पर मिलने वाली चीज नहीं है और न ही बाजार में इसका कोई इंजेक्शन उपलब्ध है जिसे लगवाकर कोई रातों-रात ज्ञानवान बन जाए। ज्ञान तथ्यों को पढ़ने और जमीन पर रहने से आता है, न कि हवा में ट्वीट करने से।” उन्होंने तेजस्वी यादव को सलाह दी कि वे अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी के घर जाकर फाइनेंस रूल (वित्तीय नियमों) का ट्यूशन लें, क्योंकि सिद्दीकी साहब जननायक कर्पूरी ठाकुर के साथ रहे हैं और अनुभवी हैं।

चारा घोटाले का इतिहास: बजट से 269% अधिक मालनिकालने का रिकॉर्ड

बिहार के कथित ‘दिवालियापन’ के आरोप पर पलटवार करते हुए जद (यू) ने लालू-राबड़ी शासनकाल का पूरा काला चिट्ठी खोल दिया। नीरज कुमार ने 1991 से 1996 के बीच पशुपालन विभाग में हुई अवैध निकासियों के आंकड़े पेश करते हुए बताया कि आकस्मिक निधि (कंटिंजेंसी फंड) का असली दुरुपयोग किसे कहते हैं।

  • वर्ष 1991-92: पशुपालन विभाग का कुल बजट प्रावधान 59 करोड़ 10 लाख था, लेकिन खजाने से 129 करोड़ 82 लाख निकाल लिए गए। यह बजट से 70.72 करोड़ अधिक यानी 269% की अवैध निकासी थी।
  • वर्ष 1992-93 से 1995-96: इन वर्षों में लगातार बजट आवंटन के मुकाबले 131%, 169%, 167.75% और 178% की अतिरिक्त राशि खजाने से साफ कर दी गई।

जद (यू) नेता  नीरज कुमार ने कहा कि इसी वित्तीय अराजकता और बिना आवंटन खजाना लूटने के कारण लालू प्रसाद को चारा घोटाला मामले में कैदी नंबर 3351 बनना पड़ा था और वे सजायाफ्ता हुए थे। इसके विपरीत, वर्तमान एनडीए सरकार विधानमंडल से मिले अधिकारों के तहत आकस्मिक निधि से पैसा निकालती है, जिसे अगले सत्र में बाकायदा विनियमित (रेगुलराइज) किया जाता है। बिहार का ऋण और जीएसडीपी अनुपात आज भी 33 से 40% के बीच है, जो केरल (35-40%), पश्चिम बंगाल (38-40%) और पंजाब (45% से अधिक) जैसे राज्यों की तुलना में कहीं बेहतर और सुरक्षित स्थिति में है।

आजाद बिहार का सबसे बड़ा बजट: 3,47,000 करोड़ की अर्थव्यवस्था

मनीष यादव और नीरज कुमार ने संयुक्त रूप से बताया कि वर्ष 2026-27 के लिए बिहार का कुल बजट 3,47,000 करोड़ का है, जो आजाद बिहार के इतिहास का सबसे बड़ा बजट है। राज्य की अर्थव्यवस्था कई गुना मजबूत हुई है। केंद्रीय करों में हिस्सेदारी और अनुदान के माध्यम से राज्य को अपने वित्तीय अधिकार मिल रहे हैं। एनडीए सरकार का संकल्प है कि सात निश्चय पार्ट-3 के तहत ‘सहज जीवन’ की परिकल्पना को धरातल पर उतारा जाए। आज 94 लाख लाभार्थियों के खाते में बिना किसी बिचौलिये या दलाल के, सीधे डीबीटी (DBT) के माध्यम से पेंशन की राशि ट्रांसफर हो रही है। सरकार गरीबों, महिलाओं और दिव्यांगों के साथ खड़ी है, जबकि विपक्ष केवल अपने बंगले और सुरक्षा की चिंता में दुबला हो रहा है।

राजमाता का अपमान: हीरे के कंगनपर आर्थिक अपराध इकाई की जांच की मांग

प्रेस वार्ता का सबसे धमाकेदार मोड़ तब आया जब नीरज कुमार ने राजद एमएलसी सुनील सिंह और कलाकार छोटू छलिया के बयानों को लेकर राजद परिवार पर सीधा हमला बोला। गौरतलब है कि लालू प्रसाद के जन्मदिन पर राबड़ी देवी द्वारा एक कलाकार को दिए गए उपहार को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। छोटू छलिया का कहना है कि उसे हीरे का सेट या कंगन मिला है, जबकि राजद के विधान पार्षद सुनील सिंह कह रहे हैं कि ‘हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती, जो मिला है वह पत्थर है।’

इस पर तंज कसते हुए जद (यू) के मुख्य प्रवक्ता ने कहा, “यह राजद की राजमाता राबड़ी देवी का उनकी ही पार्टी के नेता द्वारा किया गया सीधा अपमान है। कैसा सिला दिया उन्होंने राजमाता के प्यार का? एक तरफ मां कह रही हैं कि हीरा है, दूसरी तरफ उनके सिपहसालार उसे पत्थर बता रहे हैं।” नीरज कुमार ने घोषणा की कि इस विरोधाभास को देखते हुए जद (यू) बहुत जल्द आर्थिक अपराध इकाई (EOU) को एक आधिकारिक पत्र लिखने जा रही है। इस पत्र के माध्यम से जांच की मांग की जाएगी कि वह हीरा या आभूषण किस दुकान से खरीदा गया, उसका भुगतान आरटीजीएस (RTGS) से हुआ या नकद, और उस पर जीएसटी (GST) चुकाया गया या नहीं। जद (यू) ने आशंका जताई कि कहीं यह आभूषण 10 सर्कुलर रोड स्थित उस कथित ‘तहखाने’ से तो नहीं निकाला गया है, जिसकी चर्चा पहले भी होती रही है।

पत्रकार वार्ता के तीखे सवाल-जवाब: विधायक फंड और शिक्षा मंत्री का सच

प्रेस वार्ता के अंतिम चरण में पत्रकारों ने जब राज्य में विधायक फंड बंद होने की अफवाहों पर सवाल किया, तो नीरज कुमार ने तत्काल इसका खंडन किया। उन्होंने कहा कि विधायक फंड कहीं बंद नहीं हुआ है, बल्कि जिला कार्यक्रम पदाधिकारियों से लगातार योजनाओं की सहमतियां ईमेल के जरिए मिल रही हैं। उन्होंने ऑन-रिकॉर्ड चुनौती दी कि तेजस्वी यादव और राबड़ी देवी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है, उनके कर्मचारियों के खातों में नियमित वेतन जा रहा है, फिर वित्तीय संकट का रोना क्यों रोया जा रहा है?

नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की शिक्षा को लेकर सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही खबरों पर भी नीरज कुमार ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने साफ किया कि निशांत कुमार ने साइंस कॉलेज और कंकड़बाग सेंट्रल स्कूल से पढ़ाई करने के बाद बीआईटी मेसरा (BIT Mesra) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। उन्होंने कहा कि जो लोग खुद नौवीं पास हैं और चुनावी हलफनामे में अपनी उम्र और पढ़ाई छिपाते हैं, वे दूसरों पर उंगली उठा रहे हैं। तेजस्वी यादव ने शिक्षा मंत्री से निशांत कुमार का नाम इंजीनियरिंग कॉलेज में लिखाने की बात कही थी, जो उनके अज्ञान को दर्शाता है क्योंकि इंजीनियरिंग और पॉलिटेक्निक कॉलेज साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग के अधीन आते हैं, शिक्षा मंत्री के नहीं।

झूठ की राजनीति का अंत करेगी जनता

जद (यू) प्रवक्ताओं ने पूरी प्रेस वार्ता का सारांश रखते हुए कहा कि नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बिहार को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। ‘ट्विटर बबुआ’ चाहे जितने भी भ्रम फैला लें, बिहार की सजग जनता विकास के काम और आकस्मिक निधि के सही इस्तेमाल को देख रही है। झूठ और फरेब की बुनियाद पर खड़ी राजनीति का अंत आगामी चुनाव में जनता पूरी तरह कर देगी।

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ऐमरा संगठन का महा-रक्तदान शिविर संपन्न: सकरा विधायक सहित नामचीन डिस्ट्रीब्यूटरों और आयोजकों की जुगलबंदी से 50 लोगों ने किया रक्तदान!

दिवंगत भावेश सोलंकी की पावन स्मृति में सुजावलपुर- सकरा  (ढोली) के मैक्स जाँच घर में आयेजित किया गया कार्यक्रम ; विधायक आदित्य कुमार ने अपने हाथों से बांटे सम्मान पत्र।

सकरा (मुजफ्फरपुर ), 11 जून 2026: ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (ऐमरा) के बैनर तले सुजावलपुर (सकरा) स्थित पप्पू सिनेमा हॉल के निकट मैक्स जाँच घर में एक  स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। यह भव्य आयोजन स्वर्गीय भावेश सोलंकी (1980-2021) की प्रिय स्मृति में सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक आयोजित हुआ। इस शिविर में मानवता की सेवा की भावना से ओतप्रोत होकर कुल 50 जागरूक नागरिकों और मोबाइल एसोसिएशन से जुड़े व्यवसायियों ने बढ़-चढ़कर अपना रक्तदान किया और एक नया इतिहास रचा।

सुजावलपुर के मैक्स जाँच घर में आयोजित शिविर में बेड पर लेटकर स्वर्गीय भावेश सोलंकी की स्मृति में पूरे उत्साह के साथ स्वैच्छिक रक्तदान करते मोबाइल एसोसिएशन से जुड़े जागरूक पदाधिकारी एवं स्थानीय युवा।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित मोबाइल जगत के नामचीन डिस्ट्रीब्यूटरों ने रक्तदाताओं का हौसला बढ़ाया। प्रमुख अतिथियों में ओप्पो डिस्ट्रीब्यूटर विकास कुमार गुप्ता, श्याओमी डिस्ट्रीब्यूटर नितेश शर्मा, जुपिटर अभिषेक, लावा डिस्ट्रीब्यूटर शेषांक शेखर सुमन और सैमसंग डिस्ट्रीब्यूटर रमन कुमार शामिल हुए। इन सभी गणमान्य हस्तियों ने शिविर का दौरा कर रक्तदाताओं की सराहना की और समाज में इस तरह के आयोजनों को बेहद जरूरी बताया।

शिविर की गरिमा बढ़ाने और समाज को प्रेरित करने के लिए सकरा के लोकप्रिय विधायक आदित्य कुमार भी कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। विधायक ने संपूर्ण व्यवस्था का बारीकी से निरीक्षण किया और रक्तदान कर रहे जांबाजों से सीधी बातचीत की। विधायक आदित्य कुमार ने अपने हाथों से सभी सम्मानित रक्तदाताओं को रक्तदान प्रमाण पत्र वितरित किए और उनकी इस महान सेवा के लिए बधाई दी।

सफल रक्तदान के पश्चात मुख्य अतिथि सकरा विधायक आदित्य कुमार, आयोजन समिति के इरशाद आलम,  और विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति में रक्तदाता युवा को सम्मानपूर्वक ‘रक्तदान प्रमाण पत्र’ सौंपते हुए।

सकरा विधायक आदित्य कुमार का आधिकारिक संबोधन:

“ऑल इंडिया स्तर पर मोबाइल संगठन द्वारा चलाया जा रहा यह कार्यक्रम वाकई अद्भुत है। इसकी जानकारी मिलते ही मैं यहां लोगों से अपील करने और उनका उत्साह बढ़ाने आया हूं। रक्तदान से बड़ा दुनिया में कोई दूसरा दान नहीं होता। आपका दिया हुआ रक्त किसी जरूरतमंद व्यक्ति की जान बचाने में सबसे अहम भूमिका निभाता है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इस नेक कार्य में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। मैंने खुद पिछले वर्ष रक्तदान किया था और जरूरत पड़ने पर दोबारा करूंगा। मैं मुख्य आयोजक इरशाद आलम और पूरी टीम को इस उत्कृष्ट पहल के लिए साधुवाद देता हूं।”

इस  कार्यक्रम को सफल बनाने में ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्यक्ष मोहम्मद दिलशाद और जिला शांति समिति के सदस्य योगेश कुमार टिंकू भी पहुंचे, जिन्होंने सुजावलपुर ढोली के समस्त व्यापारियों को इस एकजुटता के लिए बधाई दी। आयोजन को सफल बनाने वाली मुख्य आयोजन समिति में इरशाद आलम (जोनल उपाध्यक्ष), संजय कुमार, रत्नेश कुमार, शिवनाथ कुमार, अविनाश कुमार, विकास कुमार, मजहर आलम, सुमित कुमार और संतोष कुमार ने कंधे से कंधा मिलाकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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‘बेंग के मूतने से समस्‍तीपुर के दहने की नौबत’! कहावत चरितार्थ हुई, नारकीय पानी में डूबे वीआईपी मोहल्ले!

समस्तीपुर नगर निगम का ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह फेल: पहली ही रिमझिम ने खोली विकास के दावों की पोल!

समस्तीपुर | 11 जून | समस्तीपुर नगर निगम क्षेत्र के निवासियों के लिए बृहस्पतिवार की सुबह एक गहरा झटका लेकर आई। सुबह-सुबह हुई बेहद हल्की और नाममात्र की वर्षा ने नगर निगम प्रशासन के उन तमाम बड़े-बड़े दावों को पूरी तरह से धो दिया, जिनमें जल निकासी के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने की बात कही जाती है। शहर के तथाकथित वीआईपी और आम रिहायशी इलाकों की सूरत देखकर ऐसा लग रहा था मानो किसी ने जानबूझकर सड़कों को मलबे और गंदे पानी के तालाब में तब्दील कर दिया हो।

स्थिति इतनी बदतर और हास्यास्पद हो गई कि स्थानीय नागरिकों को पुरानी लोक-कहावत बेंग के मूतने से बाढ़ आना यानी मेंढक के पेशाब करने से भी प्रलय आ जाना, लोगों को याद आ गई। यह व्यंग्यात्मक कहावत आज समस्तीपुर नगर निगम की बदहाल कार्यशैली और कागजी दावों पर शत-प्रतिशत सटीक बैठती है, जहां जरा सी रिमझिम ने पूरे शहर को दहने यानी डूबने की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।

विवेक-विहार मोहल्ले की जलमग्न संकरी सड़क, जहां बृहस्पतिवार सुबह हुई बेहद हल्की वर्षा के बाद पूरी गली नाले के गंदे पानी से भर गई। तस्वीर में स्पष्ट दिख रहा है कि जल निकासी ठप होने से रिहायशी इलाके में बाढ़ जैसी नारकीय स्थिति उत्पन्न हो गई है और स्थानीय नागरिक घरों में कैद होने को विवश हैं।

मोहल्लों की दर्दभरी दास्तान: बुनियादी सुविधाओं को तरसती जनता

अगर जमीनी स्तर पर जाकर स्थिति देखा जाए, तो विवेक-विहार मोहल्ले की हालत सबसे ज्यादा दयनीय देखी गई। यहाँ की संकरी गलियां पूरी तरह से जलमग्न हो चुकी हैं, जिससे पैदल चलना तो दूर, दोपहिया वाहनों का निकलना भी हादसों को दावत देने जैसा हो गया है। सुबह के समय स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे मासूम बच्चे, दूध विक्रेता, कामकाजी महिलाएं और इलाज के लिए अस्पताल जाने वाले बुजुर्ग इसी सड़े हुए नाले के पानी में पैर डुबोकर गुजरने को मजबूर हुए।

ठीक यही स्थिति काशीपुर और आदर्श नगर की भी रही, जिन्हें समस्तीपुर का मुख्य शैक्षणिक और आवासीय केंद्र माना जाता है। यहाँ सैकड़ों छात्र-छात्राएं कोचिंग और स्कूलों के लिए निकलते हैं, लेकिन सड़कों पर फैले इस नरक के कारण कई बच्चों की कक्षाएं छूट गईं। सरोजनी गली, बारह पत्थर और आजाद नगर में भी जल निकासी का कोई नामोनिशान नहीं मिला, जिससे यहाँ की व्यावसायिक गतिविधियां भी पूरी तरह ठप पड़ गईं। स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि नगर निगम टैक्स तो समय पर वसूलता है, लेकिन सुविधा के नाम पर केवल गंदा पानी परोसता है।

सांकेतिक (प्रतीकात्‍मक) तस्‍वीर

समस्तीपुर में जलजमाव को लेकर नगर निगम पर बरसे भाकपा माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह, डीएम से की जांच की मांग

समस्तीपुर में हुई हल्की बारिश के बाद शहर के विभिन्न मोहल्लों में उत्पन्न हुई जलजमाव की स्थिति पर भाकपा माले के जिला स्थाई समिति सदस्य सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने एक वीडियो बयान जारी कर नगर निगम प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जल निकासी, नाला सफाई और मरम्मत के नाम पर हर महीने होने वाला करोड़ों रुपये का खर्च सिर्फ सरकारी रजिस्टरों तक सीमित है, जबकि जमीनी हकीकत बिल्कुल इसके उलट है। विवेक विहार, काशीपुर और आदर्श नगर जैसे इलाकों की बदहाली का हवाला देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि नगर निगम के अधिकारी और कर्मी शिकायतों के बावजूद निरीक्षण करने नहीं आते। माले नेता ने जिलाधिकारी से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और विकास राशि की लूट करने वाले दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है।

सुरेंद्र प्रसाद सिंह, जिला स्थाई समिति सदस्य, भाकपा माले, समस्तीपुर का पूरा बयान:

“एक कहावत चरितार्थ है— बेंग मूतने से बाढ़ आना। यही कहावत चरितार्थ हो रहा है समस्तीपुर नगर निगम क्षेत्र में, जहां पर आज सुबह-सुबह हल्की वर्षा हुई और हल्की वर्षा में समस्तीपुर शहर का कई मोहल्ला में जलजमाव हो गया। करोड़ों रुपया जल निकासी के नाम पर, नाला सड़क निर्माण के नाम पर खर्च दिखाने वाली समस्तीपुर नगर निगम का एक बार फिर पोल खुल गया है।

सुरेन्द्र प्रसाद सिंह, जिला स्थाई समिति सदस्य, भाकपा माले, समस्तीपुर।

एक भी जगह पर नगर निगम का कर्मी, अधिकारी… कहीं नाला जाम है, कहीं नाला टूटा हुआ है, कहीं और समस्या है, निरीक्षण करने को नहीं जाते हैं, देखते नहीं हैं— चाहे आप जहां भी आवेदन दे दें, जहां भी शिकायत कर दें। यही कारण है कि करोड़ों-करोड़ रुपया प्रति माह समस्तीपुर में नाला पर, सड़क निर्माण पर, जल निकासी पर, नाला की सफाई पर खर्च तो दिखा दिया जाता है लेकिन सिर्फ रजिस्टर में, जमीन पर नहीं उतारा जाता है।

आज आप समस्तीपुर सड़क का चाहे विवेक विहार हो, काशीपुर हो, आदर्श नगर हो, बारह पत्थर हो, आप नजारा देख सकते हैं— एकदम हल्की वर्षा और सड़क पर जलजमाव का नजारा। हम एक बार फिर जिलाधिकारी से भाकपा माले मांग करना चाहेगी कि आप नगर निगम के द्वारा खर्च किया जा रहा नाला पर, सड़क निर्माण पर, नाला सफाई पर, नाला रिपेयर पर जो करोड़ों-करोड़ रुपया हो रहा है, उस कार्य की जांच कराई जाए और जांच करके विकास कार्य को लूटने वाले, रुपया लूटने वाले दोषियों पर कार्रवाई की जाए।”

कागजी रजिस्टर बनाम जमीनी हकीकत: करोड़ों के बजट का वित्तीय गबन

भाकपा माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह के इस बयान ने नगर निगम के भीतर चल रहे उस काले खेल को उजागर कर दिया है, जिसे अमूमन फाइलों के नीचे दबाकर रखा जाता है। समस्तीपुर नगर निगम के वित्तीय दस्तावेजों को देखें, तो हर महीने नाला निर्माण, पुरानी नालियों की मरम्मती, गाद की सफाई, सड़कों का सुदृढ़ीकरण, कूड़ा उठाव और कीटनाशक रसायनों के छिड़काव के नाम पर करोड़ों-करोड़ रुपये का आवंटन किया जाता है। लेकिन यह पूरी धनराशि केवल अफसरों और ठेकेदारों के रजिस्टरों में ही खर्च होकर सिमट जाती है।

वास्तविकता यह है कि धरातल पर न तो कोई सफाई कर्मी नियमित रूप से दिखाई देता है और न ही जल निकासी की कोई ठोस योजना लागू की जाती है। जनता अपनी शिकायतों को लेकर वार्ड पार्षदों से लेकर नगर आयुक्त तक के दफ्तरों के चक्कर काटती रहती है, परंतु उनके आवेदनों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। निरीक्षण के नाम पर बड़े अधिकारी अपनी वातानुकूलित गाड़ियों से बाहर तक नहीं निकलते, जिससे निचले स्तर के कर्मियों और कनीय अभियंताओं यानी जेई के हौसले बुलंद हैं।

ठेकेदारों और जेई का नापाक गठजोड़: तकनीकी खामियों का अंबार

इस पूरे ड्रेनेज संकट के पीछे सबसे बड़ी वजह ठेकेदारों और तकनीकी अधिकारियों का वह नापाक गठजोड़ है, जो बिना काम किए ही सरकारी खजाने को चूना लगा रहा है। शहर में जहां कहीं भी नए नालों का निर्माण कराया गया है, वहां तकनीकी मानकों की घोर अनदेखी की गई है। नालों का ढाल (स्लोप) विपरीत दिशा में बना दिया गया है, जिसके कारण पानी आगे बहने के बजाय वापस गलियों और घरों की तरफ बैक मारने लगता है।

कई मुख्य नालों को बीच में ही अधूरा छोड़ दिया गया है या उन्हें आपस में जोड़ा ही नहीं गया है। मॉनसून के आगमन से ठीक पहले की जाने वाली ‘प्री-मॉनसून सफाई’ के नाम पर भी इस वर्ष भारी घोटाला किया गया है। कागजों पर सभी छोटे-बड़े नालों से गाद निकालने का दावा किया गया, लेकिन इस पहली ही मामूली बारिश ने सिद्ध कर दिया कि नालों के भीतर वर्षों का कचरा और गाद जस की तस जमी हुई है। इस आपराधिक लापरवाही के लिए कनीय अभियंता (जेई) सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, जो बिना स्थल निरीक्षण के ही ठेकेदारों के फर्जी बिलों को हरी झंडी दे देते हैं।

महामारी की आहट: स्वास्थ्य संकट की दहलीज पर खड़ा शहर

सड़कों पर जमा यह बदबूदार पानी केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि यह समस्तीपुर में एक बड़े स्वास्थ्य आपातकाल को भी न्योता दे रहा है। सड़कों और गलियों में कई दिनों तक पानी रुके रहने से उसमें सड़न पैदा हो रही है, जिससे उठने वाली दुर्गंध ने स्थानीय लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। यह प्रदूषित माहौल मच्छरों और हानिकारक जीवाणुओं के पनपने के लिए सबसे मुफीद नर्सरी बन चुका है।

आने वाले दिनों में अगर तेज धूप निकलती है, तो इस ठहरे हुए पानी के कारण शहर में डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, टायफाइड, डायरिया और त्वचा से संबंधित संक्रामक बीमारियों का भयंकर प्रकोप फैलना निश्चित है। नगर निगम का स्वास्थ्य विभाग इस संभावित खतरे को लेकर पूरी तरह से उदासीन बना हुआ है। पूरे शहर में ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव या फॉगिंग मशीन चलाना तो दूर, साधारण चूने का छिड़काव भी नहीं देखा जा रहा है। अगर समय रहते जल निकासी नहीं की गई, तो सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की कतारें लग जाएंगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी नगर निगम प्रशासन की होगी।

जिलाधिकारी से सीधी मांग: आर-पार के मूड में जनता और माले

समस्तीपुर की इस नारकीय स्थिति और प्रशासनिक विफलता को देखते हुए भाकपा माले ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने जिलाधिकारी से बेहद कड़े शब्दों में मांग की है कि वे इस पूरे मामले को अत्यंत गंभीरता से लें। उन्होंने कहा कि जिलाधिकारी को तुरंत एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच कमेटी का गठन करना चाहिए, जो पिछले 2 वर्षों में नाला निर्माण, सफाई, मरम्मत और रिपेयरिंग के नाम पर खर्च किए गए करोड़ों-करोड़ रुपये की विस्तृत फॉरेंसिक और तकनीकी जांच करे।

इस जांच के दायरे में उन सभी दोषी ठेकेदारों, कनीय अभियंताओं (जेई) और संबंधित नगर निगम अधिकारियों को लाया जाए जिन्होंने जनता के पैसे की खुली लूट की है। उनके खिलाफ वित्तीय गबन और आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज कर उन्हें अविलंब जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए और उनकी निजी संपत्तियों को कुर्क करके इस सरकारी धन की वसूली की जानी चाहिए।

समस्तीपुर की त्रस्त जनता अब खोखले आश्वासनों और कागजी दावों से पूरी तरह थक चुकी है। नियमित रूप से भारी-भरकम टैक्स चुकाने के बावजूद यदि उन्हें नरक में रहने को मजबूर होना पड़ रहा है, तो यह लोकतंत्र का सबसे भद्दा मजाक है। भाकपा माले ने चेतावनी दी है कि यदि जिलाधिकारी ने इस लूट तंत्र पर लगाम नहीं लगाई और आगामी 1 सप्ताह के भीतर विवेक-विहार सहित सभी प्रभावित मोहल्लों से जल निकासी और नालों की वास्तविक सफाई सुनिश्चित नहीं की, तो पार्टी आम जनता को लामबंद कर नगर निगम मुख्यालय का अनिश्चितकालीन घेराव करेगी। इस उग्र जन-आंदोलन से उत्पन्न होने वाली किसी भी प्रकार की विधि-व्यवस्था की समस्या के लिए पूरी तरह से नगर निगम प्रशासन और जिला प्रशासन जिम्मेदार होगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस अंतिम चेतावनी के बाद अपनी कुंभकर्णी नींद से जागता है या समस्तीपुर को ऐसे ही भ्रष्टाचार के दलदल में डूबने के लिए छोड़ देता है।

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करोड़ों की घूस, नकली दस्तावेज और सरकारी गबन: बिहार में एसवीयू का बड़ा एक्शन, आईएएस संजीव हंस की तलाश में ताबड़तोड़ छापेमारी!

लेडी डॉन रिशुश्री का खुला राज: 3.5% कमीशन वाले इंजीनियर साहब समेत 3 अधिकारी सलाखों के पीछे

बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी फैल चुकी हैं, इसका अंदाजा विशेष निगरानी इकाई (एसवीयू) की इस ताजा और सबसे बड़ी कार्रवाई से लगाया जा सकता है। सचिवालय से लेकर तकनीकी विभागों तक फैले एक हाई-प्रोफाइल सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ है, जिसे पर्दे के पीछे से ‘लेडी डॉन’ की तरह ऑपरेट कर रही थी रिलायबल इन्फ्रा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की ओनर रिशुश्री।

रिशुश्री, जो विनोद कुमार सिन्हा की पुत्री है और पटना के मीठापुर, खगौल रोड स्थित कामता राम सखी एन्क्लेव के फ्लैट नंबर 5A से अपना पूरा साम्राज्य चला रही थी, उसने बिहार ब्यूरोक्रेसी के सबसे रसूखदार चेहरों को अपने जाल में फंसा रखा था। एसवीयू की जांच और मुख्य अभियुक्त रिशुश्री के इकबालिया बयान ने शासन के गलियारों में खलबली मचा दी है।

इस सिंडिकेट का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सच भवन निर्माण विभाग के सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता तारणी दास के रूप में सामने आया है। जांच में यह साबित हुआ है कि सरकारी फाइलों और करोड़ों रुपये के बिलों को पास करने के लिए तारणी दास सीधे 3.5% का नगद कमीशन वसूलते थे। यह कोई छोटा-मोटा लेन-देन नहीं था, बल्कि रिशुश्री और तारणी दास के बीच का यह फिक्स डील था, जिसने सरकार के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर बजट को खोखला कर दिया। इस काली कमाई के बूते तारणी दास के साथ-साथ वित्त विभाग के संयुक्त सचिव मुमुक्षु कुमार चौधरी और बुडको के कार्यपालक अभियंता उमेश कुमार सिंह आज सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं।

नोटों के पहाड़ पर सो रहे थे बिहार के ये 3 बड़े अधिकारी

जब कानून का डंडा चला और केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के साथ-साथ एसवीयू ने इन अधिकारियों के आलीशान ठिकानों के कमरों और तिजोरियों को खंगाला, तो वहां का नजारा देखकर जांच अधिकारी भी दंग रह गए। ये अधिकारी जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर सचमुच नोटों के पहाड़ पर सो रहे थे।

इन भ्रष्ट अधिकारियों के घरों से बरामद हुए अकूत कैश का ब्योरा इस प्रकार है:

अधिकारी का नाम और पदसंबंधित विभागबरामद नगद राशि (कैश)भ्रष्टाचार का तरीका / कमीशन
तारणी दास

(सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता)
भवन निर्माण विभाग8.5 करोड़ रुपयेसरकारी विपत्रों (बिलों) को पास कराने के एवज में 3.5% नगद कमीशन।
मुमुक्षु कुमार चौधरी

(तत्कालीन संयुक्त सचिव)
वित्त विभाग (पूर्व नगर आयुक्त, सीतामढ़ी/सहरसा)2.0 करोड़ रुपयेशहरी विकास परियोजनाओं के टेंडर अवैध रूप से रिशुश्री की कंपनियों को दिलाना।
उमेश कुमार सिंह

(कार्यपालक अभियंता)
बुडको (नगर विकास एवं आवास विभाग)1.0 करोड़ रुपयेड्रेनेज पंपिंग स्टेशन वर्क और अन्य निविदाओं में 1% का फिक्स नगद कमीशन।

कुल बरामदगी: केवल इन तीन अधिकारियों के ठिकानों से 11.5 करोड़ रुपये की नगद राशि बरामद की जा

चुकी है। यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि बिहार में टेंडर जारी करने से लेकर बजट आवंटन तक का खेल पूरी तरह फिक्स था और फाइलों की रफ्तार नोटों की गड्डियों से तय होती थी।

सांकेतिक (प्रतीकात्‍मक) तस्‍वीर

सचिवालय से लेकर नगर निगम तक फैला था भ्रष्टाचार का जाल

एसवीयू के अपर पुलिस महानिदेशक पंकज कुमार दाराद द्वारा जारी आधिकारिक ब्योरे के अनुसार, यह पूरा मामला केवल कुछ करोड़ रुपये की रिश्वत का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राजकीय गोपनीयता से खिलवाड़ और संगठित सरकारी डकैती का है।

इस सिंडिकेट का नेटवर्क बेहद शातिर तरीके से काम करता था:

  • मुमुक्षु कुमार चौधरी का खेल: मुमुक्षु कुमार चौधरी जब सीतामढ़ी में जिला विकास अभिकरण (डीआरडीए) के निदेशक थे, तब उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सीतामढ़ी के नगर आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार हासिल किया। इसके बाद वे सहरसा नगर निगम में भी नगर आयुक्त के पद पर तैनात रहे। इस दौरान उन्होंने रिशुश्री के साथ मिलकर नगर विकास और शहरी विकास परियोजनाओं के गुप्त टेंडर पेपर्स को पहले ही लीक कर दिया और रिशुश्री की कंपनियों के पक्ष में टेंडर फाइनल करवाए। इसके बदले उन्हें 2 करोड़ रुपये कैश दिए गए। वर्तमान में वे वित्त विभाग में संयुक्त सचिव जैसे अत्यंत संवेदनशील पद पर बैठकर इस पूरे खेल को वित्तीय संरक्षण दे रहे थे।
  • उमेश कुमार सिंह की भूमिका: बुडको (बिहार शहरी आधारभूत संरचना विकास निगम) के कार्यपालक अभियंता के पद पर तैनात रहते हुए उमेश कुमार सिंह ने पटना और आसपास के क्षेत्रों में ड्रेनेज पंपिंग स्टेशन के निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया। रिशुश्री को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर की शर्तों को बदला गया और 1% कमीशन के लालच में सरकारी खजाने को भारी चपत लगाई गई। उनके घर से बरामद 1 करोड़ रुपये इसी कमीशनखोरी का हिस्सा हैं।

शासकीय गुप्तता अधिनियम और बीएनएस की गंभीर धाराएं: कानून का शिकंजा

यह मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एसवीयू ने इन आरोपियों के खिलाफ साधारण भ्रष्टाचार की धाराओं के साथ-साथ देश की सुरक्षा और प्रशासनिक गोपनीयता को भंग करने वाली धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है।

एसवीयू थाना कांड संख्या 05/2025 दिनांक 30.04.2025 के तहत दर्ज इस मामले में निम्नलिखित कड़ी धाराएं लगाई गई हैं:

  1. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018): इसकी धारा 7A, 8, 9, 10 और 12 के तहत लोक सेवकों द्वारा अवैध परितोषिक (रिश्वत) लेने और निजी व्यक्तियों द्वारा उन्हें प्रभावित करने का अपराध।
  2. शासकीय गुप्तता अधिनियम 1923 (ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट): इसकी धारा 3(2), 6(2) और 15 के तहत सरकारी टेंडरों और गोपनीय दस्तावेजों को निजी कंपनियों को सौंपने का संगीन आरोप।
  3. भारतीय न्याय संहिता 2023 (बीएनएस): इसकी धारा 61 (आपराधिक साजिश), 318(4) (जालसाजी और धोखाधड़ी), 338 (फर्जी दस्तावेज बनाना) और 340(2) (फर्जी दस्तावेजों को असली के रूप में इस्तेमाल करना) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

जांच में यह पूरी तरह पुख्ता हो चुका है कि इन अधिकारियों ने लोक सेवक (पब्लिक सर्वेंट) होने के गौरव को ताक पर रखकर, आपराधिक षड्यंत्र के तहत सरकारी टेंडरों को हैक और फिक्स किया। इसके लिए बकायदा नकली दस्तावेज (फोर्ज्ड डॉक्यूमेंट्स) तैयार किए गए और सरकारी फाइलों में बड़े पैमाने पर हेरफेर (मैनिपुलेशन) की गई।

फरार आईएएस संजीव हंस: रसूखदार नाम पर एसवीयू का कसता फंदा

इस पूरे महाघोटाले और सिंडिकेट की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि इसका मुख्य सरगना और प्राथमिक अभियुक्त कोई और नहीं, बल्कि बिहार के बेहद रसूखदार आईएएस अधिकारी संजीव हंस हैं। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि इस पूरे नेटवर्क को संजीव हंस का सीधा संरक्षण प्राप्त था।

10.06.2026 की सुबह का घटनाक्रम: तड़के सुबह पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) के नेतृत्व में एसवीयू की 4 विशेष टीमों का गठन किया गया। इन टीमों ने एक साथ पटना स्थित आईएएस संजीव हंस के सरकारी और निजी आवास, कार्यालय तथा अन्य तीनों अधिकारियों के ठिकानों पर एक साथ धावा बोला। योजना बेहद गोपनीय थी, लेकिन छापेमारी की भनक लगते ही आईएएस संजीव हंस अपने आवास से फरार होने में सफल रहे।

एसवीयू के सूत्रों के अनुसार, संजीव हंस के ठिकानों से कई ऐसे डिजिटल दस्तावेज, व्हाट्सएप चैट और बेनामी संपत्तियों के कागजात हाथ लगे हैं, जो सीधे तौर पर इस टेंडर घोटाले में उनकी संलिप्तता को उजागर करते हैं। वर्तमान में वे अंडरग्राउंड हैं, और पुलिस की कई टीमें उनकी तलाश में बिहार से लेकर दिल्ली तक ताबड़तोड़ छापेमारी कर रही हैं। एसवीयू ने साफ कर दिया है कि संजीव हंस की गिरफ्तारी के बिना इस जांच का दायरा पूरा नहीं होगा और जल्द ही उनकी संपत्तियों को कुर्क करने की कानूनी प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है।

प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान

इस पूरे प्रकरण ने बिहार की प्रशासनिक शुचिता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जब वित्त विभाग का संयुक्त सचिव, बुडको का कार्यपालक अभियंता, और भवन निर्माण विभाग का मुख्य अभियंता एक निजी कंपनी की महिला ओनर के साथ मिलकर सरकार की नीतियों और पैसों की नीलामी करने लगें, तो विकास योजनाओं की गुणवत्ता का भगवान ही मालिक है।

रिशुश्री के जरिए जल संसाधन विभाग, भवन निर्माण विभाग, नगर विकास एवं आवास विभाग और बीएमएसआईसीएल जैसे मलाईदार विभागों में टेंडर का जो खेल खेला गया, उसने यह साबित कर दिया है कि नीचे से लेकर ऊपर तक एक सुनियोजित सिंडिकेट काम कर रहा था। फिलहाल, तारणी दास, मुमुक्षु कुमार चौधरी और उमेश कुमार सिंह जेल की सलाखों के पीछे अपने पापों का हिसाब दे रहे हैं, जबकि एसवीयू आईएएस संजीव हंस को दबोचने के लिए जाल बिछा चुकी है। जांच एजेंसी का दावा है कि आने वाले दिनों में कुछ और बड़े सफेदपोश चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।

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घूसखोर मुखिया का ‘गेम ओवर’: दलसिंहसराय में 1,20,000 की घूस लेते निगरानी के जाल में फंसे सियाराम राय!

पटना/समस्तीपुर: बिहार में पंचायत स्तर पर जारी भ्रष्टाचार के मकड़जाल पर निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने अब तक का सबसे बड़ा प्रहार किया है। राज्य में सुशासन के दावों के बीच सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक अधिकारों को अपनी जागीर समझने वाले सफेदपोशों के खिलाफ निगरानी विभाग ने एक ही दिन में दो-दो बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक की हैं। इस महा-अभियान की सबसे बड़ी और धमाकेदार कामयाबी समस्तीपुर जिले के दलसिंहसराय में मिली, जहां भ्रष्टाचार की सभी सीमाएं लांघ चुके एक निरंकुश मुखिया को 1,20,000 रुपये की भारी-भरकम घूस समेटते हुए रंगे हाथों दबोच लिया गया। वहीं, दूसरी समानांतर कार्रवाई में गया जिले से कानून की धज्जियां उड़ाने वाले एक चौकीदार को भी रिश्वत लेते पकड़ा गया है। इन दोनों कार्रवाइयों ने पूरे सूबे के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

दलसिंहसराय में बिछा निगरानी का जाल: ऐसे हुआ मुखिया का शिकार

समस्तीपुर जिले का दलसिंहसराय इलाका 10 जून 2026 को एक अभूतपूर्व पुलिसिया कार्रवाई का गवाह बना। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की मुख्यालय टीम ने एक बेहद गोपनीय और सटीक रणनीति के तहत ग्राम पंचायत राज चकबहाउद्दीन के मुखिया सियाराम राय को 1,20,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। इस बड़ी घूसखोरी के पीछे की कहानी बेहद चौंकाने वाली है, जो यह दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर जनप्रतिनिधि किस कदर आम जनता का खून चूस रहे हैं।

कानून के शिकंजे में घूसखोर: (बाएं) गया के बेलागंज में काउंटर केस से नाम हटाने के नाम पर 9,000 रुपये ऐंठते गिरफ्तार हुआ चौकीदार मनीष कुमार और (दाएं) समस्तीपुर के दलसिंहसराय में निलंबन मुक्ति के नाम पर 1,20,000 रुपये की भारी घूस लेते रंगे हाथों दबोचा गया चकbahauddin पंचायत का मुखिया सियाराम राय निगरानी ब्यूरो की कस्टडी में।

निलंबन मुक्ति के नाम पर मांगी गई थी मोटी रकम

इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब चकबहाउद्दीन के रहने वाले परिवादी अब्दुल मन्नान (पिता: मो० अजीम) ने भ्रष्टाचार के इस खेल के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया। आरोपी मुखिया सियाराम राय के पास न केवल मुखिया का पद था, बल्कि वह पंचायत सचिव के प्रभार में भी काम कर रहा था। इसी दोहरी ताकत का नाजायज फायदा उठाते हुए उसने अब्दुल मन्नान को एक विभागीय निलंबन से मुक्त करने के एवज में 1,20,000 (एक लाख बीस हजार) रुपये की मोटी रकम बतौर रिश्वत मांगी थी। पीड़ित ने इस अन्याय के सामने झुकने के बजाय पटना स्थित निगरानी ब्यूरो के कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज करा दी।

कॉस्मेटिक दुकान में जाल बिछाकर दबोचा गया आरोपी

शिकायत दर्ज होने के बाद निगरानी ब्यूरो हरकत में आया। ब्यूरो ने 09 जून 2026 को गोपनीय तरीके से मामले का सत्यापन कराया। सत्यापन के दौरान यह बात पूरी तरह सच साबित हुई कि मुखिया द्वारा घूस की मांग की जा रही है। इसके तुरंत बाद निगरानी ब्यूरो के पुलिस उपाधीक्षक अमरेन्द्र प्रसाद विद्यार्थी के नेतृत्व में एक बेहद चुस्त धावा दल का गठन किया गया।

10 जून 2026 को जैसे ही मुखिया सियाराम राय रिश्वत की रकम लेने के लिए दलसिंहसराय थाना क्षेत्र के गुदरीपुल के पास स्थित अब्दुल मन्नान की श्रृंगार (कॉस्मेटिक) दुकान पर पहुंचा, पहले से घात लगाकर बैठे निगरानी के जवानों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। मुखिया को संभलने तक का मौका नहीं मिला और 1,20,000 रुपये के चमचमाते नोटों के साथ उसे रंगे हाथों दबोच लिया गया। इस सनसनीखेज गिरफ्तारी के बाद निगरानी टीम आरोपी को अपने साथ मुजफ्फरपुर ले गई, जहां पूछताछ के बाद उसे निगरानी के माननीय विशेष न्यायालय में पेश किया जाएगा।

पंचायत स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक पावर का जानलेवा गठजोड़

दलसिंहसराय की यह घटना सिर्फ एक मुखिया की गिरफ्तारी का मामला नहीं है, बल्कि यह बिहार की त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में गहरे धंसे भ्रष्टाचार का एक जीवंत एक्सरे है। इस मामले में सबसे गौर करने वाली बात यह है कि आरोपी सियाराम राय मुखिया होने के साथ-साथ पंचायत सचिव के प्रशासनिक प्रभार में भी था।

सत्ता का केंद्रीकरण और भ्रष्टाचार की वजह: जब किसी एक ही व्यक्ति को राजनीतिक रसूख (मुखिया) और प्रशासनिक शक्ति (पंचायत सचिव) दोनों सौंप दी जाती हैं, तो वहां जवाबदेही पूरी तरह खत्म हो जाती है। ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति खुद को कानून से ऊपर समझने लगता है। निलंबन मुक्त करने जैसी फाइलों को अटकाकर आम लोगों से लाखों रुपये की उगाही करना यह साबित करता है कि विकास के लिए आने वाला पैसा और प्रशासनिक अधिकार किस तरह आम जनता के दमन का जरिया बन चुके हैं।

निगरानी विभाग की इस त्वरित कार्रवाई ने आम जनता में यह विश्वास जगाया है कि यदि वे बिना डरे शिकायत करें, तो बड़े से बड़े रसूखदार का भी ‘गेम ओवर’ होना तय है।

दूसरा प्रहार: गया के बेलागंज में 9,000 लेते चौकीदार गिरफ्तार

निगरानी ब्यूरो का दूसरा कड़ा ऐक्शन गया जिले के बेलागंज थाना क्षेत्र में देखने को मिला। जहां पनारी पंचायत के एक भ्रष्ट चौकीदार मनीष कुमार को 9,000 (नौ हजार) रुपये की घूस लेते हुए बेलागंज स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के परिसर से रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया।

मामला: पुलिस केस से नाम हटाने की एवज में रिश्वत

आरोपी: मनीष कुमार (चौकीदार,पनारी पंचायत)

रिश्वत राशि: 9,000 रुपये

शिकायतकर्ता: रविन्द्र यादव

गिरफ्तारी स्थल: सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर, बेलागंज

काउंटर केस से बच्चों का नाम हटाने का सौदा

इस मामले के परिवादी रविन्द्र यादव (पिता: स्वर्गीय जायुन यादव, निवासी: पनारी, बेलागंज) थे। रविन्द्र यादव के परिवार और उनके पड़ोसियों के बीच किसी विवाद को लेकर बेलागंज थाने में एक काउंटर केस (कांड संख्या 689/23) दर्ज था। इस केस में रविन्द्र यादव के निर्दोष बच्चों का नाम भी घसीट लिया गया था। इसी बात का फायदा उठाते हुए चौकीदार मनीष कुमार ने केस से बच्चों का नाम हटवाने और मामले को रफा-दफा करने के नाम पर रिश्वत की मांग की थी।

निगरानी ब्यूरो ने इस शिकायत का भी बारीकी से सत्यापन कराया। आरोप सही पाए जाने पर पुलिस उपाधीक्षक समीर चन्द्र झा के नेतृत्व में एक विशेष धावा दल ने बेलागंज स्वास्थ्य केंद्र परिसर में जाल बिछाया। जैसे ही चौकीदार मनीष कुमार ने रिश्वत के 9,000 रुपये अपने हाथ में लिए, निगरानी की टीम ने उसे दबोच लिया। आरोपी चौकीदार को कागजी कार्रवाई और पूछताछ के बाद पटना स्थित निगरानी विशेष न्यायालय में पेश किया जाएगा।

ग्रामीण पुलिसिंग और रसूख का खौफ

गया की घटना इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार की जड़ें केवल ऊंचे पदों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि चौकीदार जैसे निचले स्तर के कर्मचारी भी ग्रामीणों को कानूनी पचड़ों और मुकदमों का डर दिखाकर अवैध वसूली कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में पुलिस केस (विशेषकर काउंटर केस) का खौफ इतना ज्यादा होता है कि लोग अपनी इज्जत और बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए इन छोटे कर्मचारियों की नाजायज मांगों के आगे झुकने को मजबूर हो जाते हैं। चौकीदार मनीष कुमार की गिरफ्तारी यह संदेश देती है कि कानून की आड़ में जनता को डराने वाले किसी भी मोहरे को बख्शा नहीं जाएगा।

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो का रिपोर्ट कार्ड: आंकड़ों की जुबानी भ्रष्टाचार पर चोट

वर्ष 2026 में निगरानी ब्यूरो जिस आक्रामक अंदाज में काम कर रहा है, उसके आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं। ब्यूरो ने इस साल घूसखोरों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रखी है।

वर्ष 2026 बनाम वर्ष 2025 की तुलनात्मक तालिका:

पैमाना (पैरामीटर)वर्ष 2026 (10 जून तक)वर्ष 2025 (पूरा वर्ष)
कुल दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर)71
कुल ट्रैप कांड66101
रंगे हाथों गिरफ्तार अभियुक्त66
कुल बरामद रिश्वत राशि26,71,800 रुपये37,80,300 रुपये

इस आंकड़े का विश्लेषण करें तो साफ पता चलता है कि वर्ष 2026 के शुरुआती साढ़े पांच महीनों में ही निगरानी विभाग ने 66 घूसखोरों को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया है। यह रफ्तार पिछले साल के मुकाबले काफी तेज है, जो यह दर्शाती है कि या तो समाज में भ्रष्टाचार की शिकायत करने की हिम्मत बढ़ी है या फिर निगरानी का सूचना तंत्र बेहद मजबूत हो चुका है।

निगरानी ब्यूरो की जनता से अपील: डरें नहीं, घूसखोरों को बेनकाब करें

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, बिहार, पटना ने इस बड़ी कामयाबी के बाद एक बार फिर राज्य की आम जनता से अपील की है कि यदि कोई भी लोक सेवक (सरकारी पदाधिकारी या कर्मचारी) किसी भी काम के बदले रिश्वत की मांग करता है, तो उसके सामने घुटने टेकने की जरूरत नहीं है। जनता समय रहते ब्यूरो के निम्नलिखित आधिकारिक माध्यमों पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है:

  • लैंडलाइन नंबर्स: 0612-2215030, 0612-2215032, 0612-2215033, 0612-2215036, 0612-2215037, 0612-2999752
  • हेल्पलाइन नंबर: 0612-2215344
  • मोबाइल नंबर: 7765953261
  • व्हाट्सएप नंबर: 9473494167
  • ईमेल आईडी: spvig-bih@nic.in
  • पता: निगरानी अन्वेषण ब्यूरो बिहार, पटना, 6 सर्कुलर रोड, पटना।

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बिहार में नए डिग्री कॉलेजों को चालू करने की युद्धस्तर पर तैयारी, 39 प्राध्यापकों को मिली बर्शर की कमान!

मुजफ्फरपुर: बिहार के उच्च शिक्षा विभाग के कड़े रुख और नीतिगत फैसलों के बाद बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार यूनिवर्सिटी ने राज्य में नवस्थापित गवर्नमेंट डिग्री कॉलेजों के सुचारू संचालन के लिए एक बहुत बड़ा कदम उठाया है । यूनिवर्सिटी प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से विभिन्न कॉलेजों और विभागों के 39 शिक्षकों को नए डिग्री कॉलेजों में प्रतिनियुक्त कर दिया है । खास बात यह है कि इन सभी प्राध्यापकों को उनके शैक्षणिक दायित्वों के साथ-साथ संबंधित कॉलेजों के बर्शर (आय-व्यय और वित्तीय अनुशासन अधिकारी) का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया है ।

वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक मजबूती पर जोर

यूनिवर्सिटी द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, यह फैसला उच्च शिक्षा विभाग, बिहार सरकार के सचिव द्वारा जारी संकल्पों और निर्देशों के आलोक में लिया गया है । यूनिवर्सिटी के अधिकारियों और नए नियुक्त प्रभारी प्राचार्यों के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद वाइस-चांसलर ने इस प्रतिनियुक्ति को मंजूरी दी । इस कदम का मुख्य उद्देश्य नए सत्र 2026-30 से शैक्षणिक गतिविधियों को बिना किसी बाधा के शुरू करना, प्रशासनिक कामकाज को गति देना और कॉलेजों में कड़ा वित्तीय अनुशासन बनाए रखना है ।

तुरंत योगदान देने का आदेश

यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार प्रोफेसर समीर कुमार शर्मा के हस्ताक्षर से जारी इस आदेश में साफ कहा गया है कि प्रतिनियुक्त किए गए सभी शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त (रिलीव) माना जाएगा । इन सभी को बिना किसी देरी के अपने नए तैनाती वाले स्थान पर योगदान देना होगा ताकि कॉलेजों का कामकाज सुचारू रूप से आगे बढ़ सके । इसकी प्रतिलिपि बिहार सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव, उच्च शिक्षा निदेशक और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन (यूजीसी) के सचिव को भी सूचना और आवश्यक कार्रवाई के लिए भेज दी गई है ।

नवस्थापित गवर्नमेंट डिग्री कॉलेजों में तैनात बर्शर (प्राध्यापकों) की पूरी सूची:

नीचे दी गई तालिका में प्रतिनियुक्त शिक्षकों का नाम (डॉक्टर उपाधि सहित), उनका मूल विभाग/कॉलेज और उनकी नई तैनाती का स्थान दिया गया है:

क्र. सं.शिक्षक का नाम और मूल विभाग/कॉलेजप्रतिनियुक्ति का स्थान (गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज)ब्लॉकजिला
Iडॉ. मनोहर कुमार श्रीवास्तव, हिंदी विभाग, एम.एस. कॉलेज, मोतिहारीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, संग्रामपुरसंग्रामपुरपूर्वी चंपारण
IIडॉ. पवन कुमार, राजनीति विज्ञान विभाग, एम.एस. कॉलेज, मोतिहारीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, बंजरियाबंजरियापूर्वी चंपारण
IIIडॉ. रितेश पासवान, हिंदी विभाग, आर.पी.एस. कॉलेज, चकेयाज, वैशालीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, मेहसीमेहसीपूर्वी चंपारण
IVडॉ. सरोज कुमार, अर्थशास्त्र विभाग, जीवेच कॉलेज, मोतीपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, औराईऔराईमुजफ्फरपुर
Vडॉ. विनोद कुमार आजाद, हिंदी विभाग, एस.आर.पी.एस. कॉलेज, जैतपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, सुगौलीसुगौलीपूर्वी चंपारण
VIडॉ. अनीता कुमारी, यूनिवर्सिटी अर्थशास्त्र विभाग, बी.आर.ए.बी.यू. मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, तुरकौलियातुरकौलियापूर्वी चंपारण
VIIडॉ. वलीउर रहमान, अंग्रेजी विभाग, के.सी.टी.सी. कॉलेज, रक्सौलराजकीय डिग्री महाविद्यालय, तेतरियातेतरियापूर्वी चंपारण
VIIIडॉ. मो. एजाज अनवर, अर्थशास्त्र विभाग, एल.एन.टी. कॉलेज, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, नानपुरनानपुरसीतामढ़ी
IXडॉ. अर्धेन्दु, राजनीति विज्ञान विभाग, एल.एस. कॉलेज, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, गायघाटगायघाटमुजफ्फरपुर
Xडॉ. कमलेश कुमार, अर्थशास्त्र विभाग, राजकीय डिग्री महाविद्यालय, बगहाराजकीय डिग्री महाविद्यालय, रामगढ़वारामगढ़वापूर्वी चंपारण
XIडॉ. शशि कुमार पासवान, हिंदी विभाग, नीतिश्वर महाविद्यालय, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, आदापुरआदापुरपूर्वी चंपारण
XIIडॉ. प्रभाकर सिंह, इतिहास विभाग, एम.एस. कॉलेज, मोतिहारीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, छौड़ादानोछौड़ादानोपूर्वी चंपारण
XIIIकुमारी रंजना, हिंदी विभाग, एस.के.एस.डब्ल्यू. कॉलेज, मोतिहारीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, बनकटवाबनकटवापूर्वी चंपारण
XIVसंतोष विश्नोई, हिंदी विभाग, एल.एन.डी. कॉलेज, मोतिहारीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, पकड़ीदयालपकड़ीदयालपूर्वी चंपारण
XVडॉ. दशरथ राम, हिंदी विभाग, टी.पी. वर्मा कॉलेज, नरकटियागंजराजकीय डिग्री महाविद्यालय, चिरैयाचिरैयापूर्वी चंपारण
XVIडॉ. विकास मंडल, अर्थशास्त्र विभाग, टी.पी. वर्मा कॉलेज, नरकटियागंजराजकीय डिग्री महाविद्यालय, पताहीपताहीपूर्वी चंपारण
XVIIडॉ. सोनी कुमारी, राजनीति विज्ञान विभाग, आर.एल.एस.वाई. कॉलेज, बेतियाराजकीय डिग्री महाविद्यालय, योगापट्टीयोगापट्टीपश्चिम चंपारण
XVIIIडॉ. मंजूर हसन मलिक, अर्थशास्त्र विभाग, गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, मधुबन, पकड़ीदयालराजकीय डिग्री महाविद्यालय, डुमरी कटसरीडुमरी कटसरीशिवहर
XIXडॉ. आशा सिंह यादव, हिंदी विभाग, एम.डी.डी.एम. कॉलेज, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, बोचहांबोचहांमुजफ्फरपुर
XXडॉ. मो. उमर फारूक, अर्थशास्त्र विभाग, राजकीय डिग्री महाविद्यालय, शिवहरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, पिपराहीपिपराहीशिवहर
XXIडॉ. उपेंद्र प्रसाद, हिंदी विभाग, रामेश्वर महाविद्यालय, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, पुरनहियापुरनहियाशिवहर
XXIIडॉ. श्याम किशोर प्रसाद, हिंदी विभाग, आर.एन. कॉलेज, हाजीपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, बाजपट्टीबाजपट्टीसीतामढ़ी
XXIIIडॉ. अभिषेक रंजन, हिंदी विभाग, एम.एस.एम. समता कॉलेज, जंदाहाराजकीय डिग्री महाविद्यालय, बोखड़ाबोखड़ासीतामढ़ी
XXIVडॉ. सूरज कुमार, अर्थशास्त्र विभाग, आर.डी.एस. कॉलेज, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, चोरौतचोरौतसीतामढ़ी
XXVडॉ. राजीव कुमार, इतिहास विभाग, एल.एस. कॉलेज, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, मेजरगंजमेजरगंजसीतामढ़ी
XXVIडॉ. सचिदानंद मंडल, हिंदी विभाग, एम.एस.एस.जी. कॉलेज, अरेराज, मोतिहारीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, पिपराकोठीपिपराकोठीपूर्वी चंपारण
XXVIIडॉ. शारदानंद सहनी, अर्थशास्त्र विभाग, रामेश्वर महाविद्यालय, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, परसौनीपरसौनीसीतामढ़ी
XXVIIIडॉ. दिवाकर चौधरी, हिंदी विभाग, एस.आर.के.जी. कॉलेज, सीतामढ़ीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, रुन्नी सैदपुररुन्नी सैदपुरसीतामढ़ी
XXIXडॉ. प्रेम रंजन कुमार, इतिहास विभाग, रामेश्वर महाविद्यालय, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, सोनबरसासोनबरसासीतामढ़ी
XXXडॉ. शिवेंद्र कुमार मौर्य, हिंदी विभाग, एल.एस. कॉलेज, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, सुप्पीसुप्पीसीतामढ़ी
XXXIडॉ. पवन कुमार, इतिहास विभाग, आर.एन. कॉलेज, हाजीपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, पटेढ़ी बेलसरपटेढ़ी बेलसरवैशाली
XXXIIडॉ. मुकेश राम, अर्थशास्त्र विभाग, जे.एल.एन.एम. कॉलेज, घोड़ासहनराजकीय डिग्री महाविद्यालय, मझौलियामझौलियापश्चिम चंपारण
XXXIIIडॉ. अशोक कुमार निगम, इतिहास विभाग, आर.बी.बी.एम. कॉलेज, मुजफ्फरपुरराजकीय डिग्री महाविद्यालय, चनपटियाचनपटियापश्चिम चंपारण
XXXIVबलराम कुमार, हिंदी विभाग, आर.सी. कॉलेज, सकराराजकीय डिग्री महाविद्यालय, बैरियाबैरियापश्चिम चंपारण
XXXVडॉ. अजय कुमार, राजनीति विज्ञान विभाग, राजकीय डिग्री महाविद्यालय, बगहाराजकीय डिग्री महाविद्यालय, सिकटासिकटापश्चिम चंपारण
XXXVIडॉ. हारून रसूल, अर्थशास्त्र विभाग, जे.एस. कॉलेज, चंदौलीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, फेनहाराफेनहारापूर्वी चंपारण
XXXVIIडॉ. पंकज वासिनी, हिंदी विभाग, आर.एस.एस. महिला कॉलेज, सीतामढ़ीराजकीय डिग्री महाविद्यालय, ठकराहाठकराहापश्चिम चंपारण
XXXVIIIराजेश कुमार चंदेल, हिंदी विभाग, एम.जे.के. कॉलेज, बेतियाराजकीय डिग्री महाविद्यालय, पिपरासीपिपरासीपश्चिम चंपारण
XXXIXडॉ. संतोष आनंद, राजनीति विज्ञान विभाग, एस.आर.ए.पी. कॉलेज, बाराचकियाराजकीय डिग्री महाविद्यालय, भितहाभितहापश्चिम चंपारण

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बीआरए बिहार विश्वविद्यालय में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल: वीसी का बड़ा हंटर, टी के डे की छुट्टी, रजनीश गुप्ता और संगीता सिन्हा को मिली कमान!

मुजफ्फरपुर। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (बीआरए बिहार यूनिवर्सिटी), मुजफ्फरपुर में आज एक बहुत बड़ा प्रशासनिक उलटफेर देखने को मिला है । कुलपति (वाइस-चांसलर) के आदेश से विश्वविद्यालय प्रशासन ने अचानक से कई कड़े फैसले लिए हैं, जिससे पूरे कैंपस में हड़कंप मच गया है । एक तरफ जहाँ पुराने अधिकारी की छुट्टी कर दी गई है, वहीं दूसरी तरफ दो वरिष्ठ प्रोफेसरों को महत्वपूर्ण विभागों की नई जिम्मेदारी सौंपी गई है ।

प्रशासनिक आधार पर गाज, टी के डे हटाए गए

विश्वविद्यालय द्वारा जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार, कुलपति ने मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और बेहद गंभीर विचार-विमर्श के बाद बड़ा कदम उठाया है । इसके तहत डॉक्टर टी के डे को उनके पदों से तत्काल प्रभाव से मुक्त कर दिया गया है । डॉक्टर टी के डे के पास अब तक दो बेहद महत्वपूर्ण प्रभार थे—वे ‘कोऑर्डिनेटर यूएमआईएस’ (यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम) और ‘सीसीडीसी’ (कॉलेज डेवलपमेंट काउंसिल) के रूप में कार्य कर रहे थे । उन्हें प्रशासनिक आधार पर इन दोनों ही जिम्मेदारियों से पूरी तरह से हटा दिया गया है । इसके साथ ही कुलपति ने निर्देश दिया है कि टी के डे अब पूरी तरह से एल एस कॉलेज, मुजफ्फरपुर में अपनी केवल शैक्षणिक जिम्मेदारियों (पढ़ाने के कार्य) का निर्वहन करेंगे ।

प्रशासनिक फेरबदल का आधिकारिक फरमान: बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के कुलसचिव (रजिस्ट्रार) के आधिकारिक हस्ताक्षर वाला वह आदेश पत्र, जिसके जरिए कुलपति की अनुमति से विश्वविद्यालय में तीन बड़े फेरबदल किए गए हैं ।

प्रोफेसर रजनीश गुप्ता बने नए सीसीडीसी

डॉक्टर टी के डे को हटाए जाने के तुरंत बाद कुलपति ने खाली हुए पदों को भरने के लिए नए आदेश जारी किए हैं । विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग (साइकोलॉजी डिपार्टमेंट) के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रजनीश गुप्ता को नया ‘सीसीडीसी’ नियुक्त किया गया है । आदेश के मुताबिक, रजनीश गुप्ता अपने विभाग के शैक्षणिक कार्यों को संभालने के साथ-साथ अगले आदेश तक ‘सीसीडीसी’ के कर्तव्यों और कार्यों का पालन करेंगे ।

प्रोफेसर संगीता सिन्हा को कोऑर्डिनेटर यूएमआईएस का प्रभार

इसके अतिरिक्त, ‘यूएमआईएस’ के सुचारू संचालन के लिए कुलपति ने भौतिकी विभाग (फिजिक्स डिपार्टमेंट) की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर संगीता सिन्हा पर भरोसा जताया है । संगीता सिन्हा को नया ‘कोऑर्डिनेटर यूएमआईएस’ अधिकृत किया गया है । वे भी अपनी वर्तमान शैक्षणिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ इस महत्वपूर्ण तकनीकी और प्रशासनिक प्रभाग का काम तत्काल प्रभाव से संभालेंगी ।

कुलसचिव के हस्ताक्षर से आदेश जारी : ये सभी बड़े बदलाव और आदेश कुलसचिव (रजिस्ट्रार) के हस्ताक्षर से जारी किए गए हैं । इन प्रशासनिक ज्ञापनों (मेमो नंबर) की प्रतिलिपियां उच्च शिक्षा विभाग, बिहार सरकार के अपर मुख्य सचिव, सचिव, निदेशक समेत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के सचिव और सभी संबंधित अधिकारियों को सूचना तथा आवश्यक कार्रवाई के लिए भेज दी गई हैं । विश्वविद्यालय गलियारे में इस अचानक हुए बदलाव को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

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