Thursday, July 30, 2026

500 साल पहले तुलसी के साहित्य में रचे गए 23 जातियों के संदर्भ क्या आज भी वही हैं: 2026 की राष्ट्रीय डिजिटल जनगणना से खुलेगा नया अध्याय!

विशेष रिपोर्ट : एस. एस. कुमार पंकज

वर्ष 2026 भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ है। देश की पहली पूर्णतः राष्ट्रीय डिजिटल जनगणना धरातल पर उतर चुकी है। हाथ में टैबलेट और मोबाइल ऐप लिए प्रगणक देश के कोने-कोने में जातियों और उप-जातियों का मुकम्मल आंकड़ा जुटा रहे हैं। सत्ता के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक बहस गर्म है कि इस नए डेटा से राजनीति, आरक्षण और विकास का क्या खाका तैयार होगा।

500 साल पहले गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य (जैसे रामचरितमानस और कवितावली) में जिन लगभग 23 जातियों और सामाजिक वर्गीकरणों का उल्लेख मिलता है, उनका संदर्भ आज के बदलते भारत में पूरी तरह बदल चुका है। तुलसीदास के समय में जातियों का उल्लेख तत्कालीन सामंतवादी व्यवस्था, श्रम-विभाजन और सामाजिक सोपानक्रम को दर्शाने के लिए हुआ था, जहाँ पहचान जन्म और पारंपरिक पेशों से बंधी थी। लेकिन आज, लोकतांत्रिक मूल्यों, शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों ने उस रूढ़िवादिता को काफी हद तक तोड़ा है।

वर्ष 2026 की राष्ट्रीय डिजिटल जनगणना इस संदर्भ में एक युगांतकारी और नया अध्याय लिखने जा रही है। पारंपरिक और केवल कागजी अनुमानों से इतर, यह डिजिटल जनगणना देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने का एक सटीक, वास्तविक और वैज्ञानिक डेटा सामने लाएगी। यह डेटा सदियों पुरानी जातियों को केवल एक ‘पहचान’ या ‘भेदभाव’ के चश्मे से देखने के बजाय, उनकी वर्तमान आर्थिक स्थिति, साक्षरता और संसाधनों तक उनकी पहुँच का सटीक मूल्यांकन करेगा। इसके परिणामस्वरूप, नीतियां किसी मध्यकालीन सामाजिक ढांचे के आधार पर नहीं, बल्कि 21वीं सदी की व्यावहारिक जरूरतों और डिजिटल पारदर्शिता के आधार पर बनेंगी, जो तुलसीकालीन संदर्भों को पूरी तरह से आधुनिक विकास की मुख्यधारा में पुनर्परिभाषित कर देगा।

लेकिन, क्या आप जानते हैं कि आज से ठीक 500 साल पहले, मध्यकाल के अवध और ब्रज में एक कवि ने बिना किसी आधुनिक तकनीक या सरकारी बजट के, अपने दौर के समाज का एक ऐसा ही सटीक ‘साहित्यिक सेंसस’ तैयार कर दिया था?

जी हां, हम बात कर रहे हैं महाकवि गोस्वामी तुलसीदास और उनकी अमर कृतियों की। अक्सर धार्मिक और आध्यात्मिक चश्मे से देखे जाने वाले तुलसी-साहित्य में सामाजिक बुनावट का एक ऐसा प्रामाणिक डेटा छिपा है, जिसे आज के दौर में ‘खबरों की सोने की खान’ (गोल्ड माइन) कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

तुलसीदास का काल्पनिक सेंसस‘: कोई भी हिस्सा अछूता नहीं

अकादमिक रिसर्च और भाषाई विश्लेषण से यह साफ होता है कि तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य श्रीरामचरितमानस, कवितावली, विनयपत्रिका और रामलला नहछू जैसी रचनाओं में पारंपरिक चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) सहित कुल 23 सामाजिक समूहों और विशिष्ट जातियों का स्पष्ट उल्लेख किया है।

यह संख्या कोई सामान्य संयोग नहीं है। यह इस बात का साहित्यिक प्रमाण है कि मध्यकालीन भारत की सामाजिक-आर्थिक रीढ़ कौन सी जातियां थीं। तुलसीदास ने राजा-महाराजाओं के वैभव के साथ-साथ जंगलों में रहने वाले आदिवासियों, नदियों के जलपुत्रों, और गांवों के गली-कूचों में पसीना बहाने वाले शिल्पकारों को अपने काव्य में मुख्यधारा का स्थान दिया।

जल, जंगल से लेकर सत्ता की धुरी तक: इन 23 समूहों की बानगी

इस विशेष सीरीज में हम उन सभी 23 सामाजिक समूहों की पड़ताल करेंगे, जिनका जिक्र तुलसीदास ने अलग-अलग संदर्भों में किया है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • वन के राजा और सीमांत समाज: कोल, किरात, भील, सबर (शबरी) और ‘खस’ (हिमालयी क्षेत्र की जनजाति)।
  • नदियों के जलपुत्र: निषाद और केवट, जो आज उत्तर भारत की राजनीति का रुख तय कर रहे हैं।
  • गोपालक वर्ग : अहीर (यादव/गोप) जो मध्यकाल में पूरी तरह पारंपरिक आजीविका से जुड़े थे, लेकिन 2026 की राजनीतिक मैपिंग में सत्ता के एक बड़े स्तंभ बन चुके हैं।
  • व्यावसायिक धुरी : तेली और कलवार समाज—जो मध्यकाल में पूरी तरह पारंपरिक आजीविका से जुड़े थे,आज विभिन्‍न अलग अलग व्‍यवसायों में हिस्‍सेदारी रखते हैं,  
  • लोक-शिल्पी और कामगार महिलाएं: रामलला नहछू की वो 5 कर्मठ महिलाएं—नाइन, अहिरिन, तम्बोलिन, दरजिन, मालीन और पटुआरिन, जिनकी आजीविका पर आज मशीनीकरण और कॉर्पोरेट ब्रांड्स का साया है।
  • कारीगर और बुनकर वर्ग: कुम्हार (प्रजापति) और जुलाहा (बुनकर) समाज, जो आज के प्लास्टिक और पावरलूम के दौर में वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं।
  • हाशिए का मनोरंजन और सांस्कृतिक समाज: नट, भाट, यवन और श्वपच (चांडाल/सफाई कर्मी समाज)।

दो विरोधाभासी संदर्भ: भक्ति की समरसता बनाम कलयुग का यथार्थ

तुलसीदास के साहित्य में इन जातियों को लेकर दो बेहद दिलचस्प और विरोधाभासी पहलू देखने को मिलते हैं, जो आज के लिए सबसे बड़ा रिसर्च पॉइंट हैं:

1. अध्यात्म में परम समरसता (बालकाण्ड, दोहा 194)

स्वपच सबर खस जमन जड़ पामर कोल किरात। रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात॥”

अर्थात्: समाज में जिन्हें सबसे पिछड़ा या प्रतिष्ठा-विहीन माना गया, वे भी राम का नाम लेकर परम पवित्र और पूजनीय हो जाते हैं। यहाँ तुलसीदास एक प्रगतिशील समाज सुधारक के रूप में उभरते हैं।

2. उत्तरकाण्ड का कड़वा यथार्थ (दोहा 98 क के बाद)

वही तुलसीदास जब उत्तरकाण्ड में कलयुग की विसंगतियों का वर्णन करते हैं, तो तत्कालीन सामाजिक उथल-पुथल को दर्ज करते हुए लिखते हैं:

जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा॥”

मध्यकाल का यह सामंती यथार्थ आज 2026 में पूरी तरह बदल चुका है। जिन व्यावसायिक जातियों के उभार को तब कलयुग का लक्षण माना गया था, आज लोकतंत्र और आरक्षण के संवैधानिक अधिकारों की बदौलत वही जातियां उत्तर भारत की राजनीति और अर्थशास्त्र का एजेंडा तय कर रही हैं।

तुलसी-साहित्य में वर्णित 23 जातियों का प्रामाणिक संदर्भ

क्र. सं.जाति / वर्ण का नामपारंपरिक जीविका / कार्यसंबंधित पुस्तक का नामकिस पंक्ति / दोहा / पद में चर्चा (सटीक संदर्भ)
1ब्राह्मण / विप्र / भूसुरवेदाध्ययन, यज्ञ-अनुष्ठान कराना, शिक्षा देना, समाज का आध्यात्मिक मार्गदर्शन• श्रीरामचरितमानस

• दोहावली

• विनयपत्रिका
• मानस में सर्वत्र (जैसे- बालकाण्ड में भृगुनाथ प्रसंग, उत्तरकाण्ड में विप्र-महिमा)

• दोहावली में ब्राह्मण के कर्तव्यों का वर्णन
2क्षत्रिय / राजपूतराजकाज संभालना, प्रजा की रक्षा करना, युद्ध और सीमा सुरक्षा• श्रीरामचरितमानस

• कवितावली
• बालकाण्ड (राम-लक्ष्मण का क्षत्रिय रूप)

• कवितावली (उत्तरकाण्ड, छंद 106 – राजपूत कहौ जोलहा कहौ कोऊ”)
3वैश्य / बनिकव्यापार, वाणिज्य, कृषि प्रबंधन और अन्न-धन का लेन-देन• श्रीरामचरितमानस

• कवितावली
• उत्तरकाण्ड (कलयुग में वैश्य स्थिति)

• कवितावली (छंद 84 – किसबी, किसान-कुल, बनिक”)
4कोलवनोपज संग्रह (लकड़ी, फल, शहद आदि एकत्र करना)• श्रीरामचरितमानस

• विनयपत्रिका

• गीतावली
• बालकाण्ड (दोहा 194), अयोध्याकाण्ड (दोहा 134, दोहा 249), उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क)

• विनयपत्रिका (पद 165), गीतावली
5किरातवनों में तीर-कमान से आखेट (शिकार) करना• श्रीरामचरितमानस

• बरवै रामायण

• विनयपत्रिका
• बालकाण्ड (दोहा 194), अयोध्याकाण्ड (दोहा 134, दोहा 98 क), अरण्यकाण्ड (अंत)

• बरवै रामायण (बरवै 23), विनयपत्रिका (पद 165)
6भील / भीलनीपर्वतीय क्षेत्रों में आखेट व वन-उत्पादों का संग्रह• श्रीरामचरितमानस

• गीतावली
• अयोध्याकाण्ड (दोहा 134 के बाद की चौपाई)

• गीतावली (अयोध्याकाण्ड के पद)
7सबर / शबरीकंद-मूल, फल और जंगली औषधियाँ एकत्र करना• श्रीरामचरितमानस

• विनयपत्रिका
• बालकाण्ड (दोहा 194), अरण्यकाण्ड (शबरी प्रसंग)

• विनयपत्रिका (पद 160)
8निषाद / केवटनाव चलाना (मल्लाह), नदी पार कराना, मछली पकड़ना• श्रीरामचरितमानस

• विनयपत्रिका

• रामाज्ञा प्रश्न
• अयोध्याकाण्ड (दोहा 101, दोहा 194)

• विनयपत्रिका (पद 165 – नीच निषाद समाजू”)
9तेलीतिलहन (सरसों, तिल आदि) से तेल निकालना और बेचना• श्रीरामचरितमानस• उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क के बाद – जे बरनाधम तेलि कुम्हारा”)
10कुम्हारमिट्टी के बर्तन, घड़े, दीये और खपरैल बनाना• श्रीरामचरितमानस• उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क के बाद – कलयुग वर्णन)
11कलवारराजसैनिको के लिए भोजन(कलेउ) की व्‍यवस्‍था करना,  पारंपरिक रूप से मदिरा (शराब) बनाना और उसका व्यापार• श्रीरामचरितमानस• उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क के बाद – कलयुग वर्णन)
12अहीर / अहिरिन / गोपपशुपालन, दुग्ध उत्पादन (दूध, दही, माखन बेचना)• श्रीरामचरितमानस

• रामलला नहछू

• श्रीकृष्ण गीतावली
• अरण्यकाण्ड (अंत का सोरठा)

• रामलला नहछू (पद 6 – गोरस लै आइ अहीरिनि”)

• श्रीकृष्ण गीतावली (बाललीला व भ्रमरगीत)
13नाइन (नाई)मांगलिक उत्सवों में नाखून काटना, पैर धोना, महावर लगाना• रामलला नहछू• रामलला नहछू (पद 5 – गौरी सुंदर नाइन हाथ कँकन”)
14तम्बोलिन (तमोली)पान की खेती करना और उत्सवों में पान के बीड़े परोसना• रामलला नहछू• रामलला नहछू (पद 7 – ताँबुल कें पान तँबोलिनि”)
15दरजिन (दर्जी)समाज के लिए वस्त्रों और पोशाकों की सिलाई करना• रामलला नहछू• रामलला नहछू (पद 8 – रेशम कै बागो दरिजिनि”)
16मालीन (माली)बाग-बगीचों की देखभाल, फूल चुनना और माला/सेहरा गूंथना• रामलला नहछू• रामलला नहछू (पद 9 – कनक कँवल कर मालीन”)
17पटुआरिन (पटवा)रेशम/सूत के धागे गूंथना, सेहरे की गोट या डोरी बनाना• रामलला नहछू• रामलला नहछू (पद 10 के आसपास के पद)
18जुलाहाहथकरघे पर सूत से कपड़ा बुनने का कार्य• कवितावली• उत्तरकाण्ड (छंद 106 – राजपूत कहौ jolha कहौ कोऊ”)
19नटकलाबाज़ी, शारीरिक करतब और गायन ग्रामीण क्षेत्र में रहकर से मनोरंजन करना• श्रीरामचरितमानस

• कवितावली
• रामचरितमानस (सांकेतिक उल्लेख)

• कवितावली (छंद 84 – चपल नट, चोर, चार”)
20भाटवंशावली रखना, राजाओं/उत्सवों में कीर्ति-गान करना• कवितावली• उत्तरकाण्ड (छंद 84 – भिखारी, भाट, चाकर”)
21खसहिमालयी क्षेत्रों में पशुपालन और सीमांत सुरक्षा/लड़ाके• श्रीरामचरितमानस• बालकाण्ड (दोहा 194), अरण्यकाण्ड (अंत का सोरठा)
22श्वपच (चांडाल)श्मशान व्यवस्था, अंत्येष्टि और साफ-सफाई का कार्य• श्रीरामचरितमानस

• विनयपत्रिका
• बालकाण्ड (दोहा 194), उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क)

• विनयपत्रिका (पद 160)
23यवन / जमनमध्यकाल में सैनिक, प्रशासनिक या बाहरी समूहों के रूप में• श्रीरामचरितमानस• बालकाण्ड (दोहा 194), अरण्यकाण्ड (अंत का सोरठा)

भौगोलिक विस्तार: ये जातियाँ आज भारत के किन क्षेत्रों में रहती हैं?

गोस्वामी तुलसीदास रचित कृतियाँ केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि वे मध्यकालीन भारतीय समाज का एक सजीव सामाजिक दस्तावेज़ भी हैं। इतिहासकार और समाजशास्त्री मानते हैं कि तुलसीदास जी ने अपने समय के समाज में रची-बसी जिन कड़ियों का उल्लेख किया था, वे सभी आज भी भारत में पूरी तरह अस्तित्व में हैं। हालाँकि, समय के चक्र, आधुनिक अर्थव्यवस्था और लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कारण इन जातियों के भौगोलिक विस्तार, सामाजिक स्थिति और आजीविका के साधनों में व्यापक बदलाव आया है।

तुलसीदास जी की रचनाओं की पृष्ठभूमि मुख्य रूप से अवध (मध्य उत्तर प्रदेश), ब्रज (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) और चित्रकूट-बुंदेलखंड क्षेत्र रही है। लेकिन आज इन जातियों का विस्तार पूरे भारत में है:

  • गंगा-यमुना का मैदानी क्षेत्र (उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश): अहिर (यादव), तेली, कुम्हार, निषाद/केवट/मल्लाह, कलवार, नाई, तमोली, दर्जी, माली, पटवा, नट, जुलाहा, भाट और श्वपच (वाल्मीकि/डोम/सफ़ाई कर्मी समाज) मुख्य रूप से इन राज्यों के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में घनी आबादी में निवास करते हैं।
  • मध्य भारत और दक्कन के वन क्षेत्र (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, राजस्थान, महाराष्ट्र): कोल, भील, किरात और सबर (शबरी की जाति) जैसी वनवासी और आदिवासी जनजातियाँ मुख्य रूप से विंध्याचल, सतपुड़ा, अरावली और छोटानागपुर के पठारी व जंगली अंचलों में पाई जाती हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में ‘भील’ जनजाति की बहुत बड़ी आबादी है।
  • हिमालयी और सीमांत क्षेत्र: ‘खस’ जाति मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • यवन / जमन: मध्यकाल का यह संदर्भ आज भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में पूरे देश के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में समाहित है।

समकालीन स्थिति: आज इनके क्या हालात हैं?

आधुनिक भारत में इन जातियों की स्थिति को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता। आज इनके हालात में शहरीकरण, शिक्षा, आरक्षण नीति और राजनीतिक चेतना के कारण भारी विविधता आई है। इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में समझा जा सकता है:

1. राजनीतिक और सामाजिक रूप से सशक्त वर्ग

  • अहीर (यादव): आज यह समाज केवल पशुपालन या दुग्ध उत्पादन तक सीमित नहीं है। हरित क्रांति और उत्तर भारत की राजनीति (विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार) में इस समाज ने बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति हासिल की है। शिक्षा, कृषि, व्यापार, सेना और सरकारी नौकरियों में इस वर्ग की स्थिति बेहद मजबूत हुई है।
  • कलवार और तेली: पारंपरिक रूप से तेल पेराई और अन्य व्यवसाय से जुड़े ये समाज आज ‘वैश्य’ वर्ग के अंतर्गत बड़े व्यापारिक और व्यावसायिक समूहों के रूप में स्थापित हो चुके हैं। शहरी क्षेत्रों में इनका झुकाव आधुनिक व्यापार, किराना, रियल एस्टेट और राजनीति की ओर हुआ है, जिससे इनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ है, वहीं ग्रामीण क्षेत्र में रहकर व्‍यापार करने  वाले ये समूह कुछ हद तक  ठीक हैं ।व्‍यापार में अन्‍य जातियों के शामिल होने से अब इन वर्गों को कड़े संघर्ष का सामना करना पर रहा है।  

2. आधुनिक तकनीक और मशीनीकरण से जूझता कामगार वर्ग

  • कुम्हार (प्रजापति), दर्जी, माली, नाई (सेंथवार/ठाकुर) और पटवा: इन जातियों के पारंपरिक कार्यों का आज “मशीनीकरण” और “कॉर्पोरेटाइजेशन” हो गया है।
    • मिट्टी के बर्तनों की जगह प्लास्टिक और स्टील ने ले ली है, जिससे कुम्हारों को अब केवल दीवाली या त्योहारों पर बाज़ार मिलता है, लेकिन यह बाजार चाइनीज लडियों के कारण खत्‍म हो रहा है।     
    • नाई समाज अब आधुनिक ‘सैलून और पार्लर’ उद्योग में बदल चुका है; जिन्होंने तकनीक अपनाई वे आर्थिक रूप से समृद्ध हुए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक कामगार अब भी संघर्ष कर रहे हैं।
    • दर्जी समाज आज रेडीमेड कपड़ों के बड़े उद्योगों और बुटीक संस्कृति से प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
    • तमोली और पटवा समाज भी पारंपरिक खेती से हटकर अन्य छोटे-मोटे व्यवसायों या नौकरियों की तरफ रुख कर चुका है।

3. जल और जंगल पर निर्भर समाज (चुनौतियों का सामना करता वर्ग)

  • निषाद / केवट / मल्लाह: नदियों पर पुल बन जाने, मशीनी नावों के आ जाने और जल निकायों के ठेके बड़े ठेकेदारों के पास चले जाने के कारण इस समाज की पारंपरिक आजीविका संकट में आई है। हालाँकि, हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश और बिहार में इस समाज के भीतर बहुत तीव्र ‘राजनीतिक लामबंदी’ देखी गई है, जिससे शासन-प्रशासन में इनका प्रतिनिधित्व बढ़ा है।
  • कोल, भील और सबर: ये वनवासी समाज आज सरकार की ‘अधिसूचित जनजातियों’ (ST) की सूची में शामिल हैं। जंगलों के कट ऑफ  होने और कड़े वन कानूनों के कारण इनका पारंपरिक आखेट और वनोपज संग्रह का काम लगभग बंद हो चुका है। आज ये मुख्य रूप से कृषि मजदूरी, खनन और निर्माण कार्यों में श्रम करते हैं। शिक्षा के प्रसार के बावजूद, दूरदराज के क्षेत्रों में रहने के कारण विकास की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए इन्हें आज भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।

4. कला, सीमांत और अन्य श्रमिक वर्ग

  • नट और भाट: मनोरंजन के आधुनिक साधनों (टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट) ने नटों की पारंपरिक रस्सी की कलाबाज़ी और भाटों की गायन विधा को हाशिए पर धकेल दिया है। यह समाज अब लोक-कलाकार के रूप में या फिर दिहाड़ी मजदूरी अपनाकर अपनी जीविका चला रहा है।
  • जुलाहा: हथकरघा उद्योग के धीमे होने और पावरलूम के आ जाने से इस बुनकर समाज को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा है, लेकिन बनारसी और अन्य पारंपरिक साड़ियों के वैश्विक बाज़ार के कारण इसका एक हिस्सा आज भी अपनी कला को जीवित रखे हुए है।
  • श्वपच (दलित/सफ़ाई कर्मी समाज): कलयुग वर्णन में जिस समाज का उल्लेख है, वह आज कानूनी और संवैधानिक संरक्षण (SC वर्ग) के दायरे में है। बाबासाहेब अंबेडकर के आंदोलन और शिक्षा के प्रसार से इस समाज के युवाओं ने प्रशासनिक सेवाओं और राजनीति में अपनी जगह बनाई है। हालाँकि, मैला ढोने जैसी कुप्रथाओं के खात्मे के बाद भी शहरी स्वच्छता व्यवस्था में इस वर्ग की बहुलता है और इनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए लगातार प्रयास जारी हैं।

डिजिटल पारदर्शिता से पुनर्परिभाषित होता न्यू इंडिया

गोस्वामी तुलसीदास जी के साहित्य में वर्णित ये 23 जातियाँ आज के बदलते भारत (New India) का एक जीवंत हिस्सा हैं। मध्यकाल में जो जातियाँ केवल अपने ‘जन्म आधारित’ पारंपरिक कार्यों से बंधी हुई थीं, आज लोकतान्त्रिक अधिकारों, शिक्षा और संवैधानिक आरक्षण के कारण वे अपनी पारंपरिक सीमाओं को तोड़ रही हैं।

आज का ‘तेली’ या ‘अहीर’ केवल तेल या दूध तक सीमित नहीं है, और न ही ‘केवट’ केवल नाव तक। वे डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी और देश के नीति-निर्माता बन रहे हैं। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि भारत का सामाजिक ताना-बाना स्थिर नहीं, बल्कि प्रगतिशील और गतिशील है।

आज जब 1931 के बाद पहली बार देश में इस स्तर पर जातियों और उप-जातियों का डिजिटल डेटा एकत्र किया जा रहा है, तब अतीत के इन पन्नों को पलटना अनिवार्य हो जाता है।

  • क्या 500 साल पहले जिन जातियों की आजीविका ‘जल-जंगल-जमीन’ और हस्तशिल्प पर टिकी थी, आज के कॉर्पोरेट और डिजिटल युग में उन्हें उनका हक मिल पाया?
  • राम को कंद-मूल खिलाने वाले भील-किरात आज की आर्थिक मैपिंग में कहां खड़े हैं?
  • विवाह उत्सवों में ‘नेग’ पाने वाली कामगार महिलाओं की कला क्या मॉल और ब्यूटी पार्लर्स के शोर में खो गई है?

महागाथा सेंसस” की इस सीरीज में हम केवल साहित्यिक दोहों का विश्लेषण नहीं करेंगे, बल्कि मुजफ्फरपुर से लेकर देश के ग्रामीण अंचलों तक की ग्राउंड रियलिटी, इन्फोग्राफिक्स और 2026 के नए जनसांख्यिकीय आंकड़ों के साथ हर जाति की विकास यात्रा की मुकम्मल पड़ताल करेंगे।

बने रहिए हमारे साथ… अगली कड़ी में हम रुख करेंगे वनवासी, सीमांत और आदिवासी समाज (जल-जंगल की विरासत)” की ओर, और जानेंगे कि राम को वन पार कराने वाले कोल-भीलों की स्थिति आज की डिजिटल मैपिंग में क्या है।

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ट्रेन यात्रा के दौरान आधार कार्ड साथ रखना हुआ आसान, अब मोबाइल ऐप का डिजिटल स्वरूप भी पूरी तरह मान्य

यूआईडीएआई ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर दी जानकारी, एक ही मोबाइल फोन में परिवार के कुल पांच  सदस्यों का आधार रख सकेंगे यात्री

मुजफ्फरपुर : ट्रेन से यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने एक महत्वपूर्ण और राहत भरी जानकारी साझा की है। प्राधिकरण ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर एक वीडियो जारी कर बताया है कि अब यात्रा के दौरान यदि आपका फिजिकल (कागज या प्लास्टिक का) आधार कार्ड घर पर छूट जाता है, तो परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। यात्री अपने मोबाइल फोन में आधार ऐप के माध्यम से अपना डिजिटल आधार कार्ड दिखा सकते हैं, जो पूरी तरह से वैध है।

प्राधिकरण के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल एटदरेट यूआईडीएआई द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, अब यात्रियों को पहचान पत्र के रूप में आधार की फोटोकॉपी साथ लेकर चलने की जरूरत नहीं है। विभाग ने नागरिकों से पेपरलेस (बिना कागज के) व्यवस्था को अपनाने की अपील की है ताकि पर्यावरण और समय दोनों की बचत हो सके।

सांकेतिक (प्रतीकात्‍मक) तस्‍वीर

टीटीई को दिखा सकते हैं ऐप का आधार

इस नई व्यवस्था के तहत यदि आप ट्रेन में सफर कर रहे हैं और रेल चेकिंग स्टाफ (टीटीई) आपसे पहचान पत्र की मांग करता है, तो आप अपने मोबाइल फोन में डाउनलोड किए गए आधार ऐप को खोलकर अपनी डिजिटल पहचान दिखा सकते हैं। यूआईडीएआई ने स्पष्ट किया है कि मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने वाला यह डिजिटल आधार पूरी तरह से वैध है और इसे असली आधार कार्ड की तरह ही स्वीकार किया जाएगा।

एक ही फोन में पांच सदस्यों का विवरण

इस व्यवस्था की एक और बड़ी विशेषता यह है कि यात्रियों को अपने परिवार के अलग-अलग सदस्यों के लिए अलग-अलग दस्तावेज या मोबाइल फोन रखने की आवश्यकता नहीं होगी। इस ऐप की मदद से कोई भी व्यक्ति एक ही मोबाइल फोन के भीतर अपने और अपने परिवार के कुल 05 (पांच) सदस्यों का आधार कार्ड सुरक्षित रख सकता है। यात्रा के दौरान आवश्यकता पड़ने पर इसे दिखाकर सुगमता से सफर पूरा किया जा सकता है।

इस ऐप को डाउनलोड करने के लिए विभाग ने पहचान डॉट यूआईडीएआई डॉट जीओवी डॉट इन स्लैश ऐप स्लैश डाउनलोड प्रश्नचिह्न एसआरसी बराबर एक्स नामक आधिकारिक लिंक भी जारी किया है। सरकार के इस कदम से रेलवे स्टेशनों पर पहचान पत्र भूल जाने के कारण होने वाली असुविधाओं और जुर्मानों से यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी।

यूआईडीएआई द्वारा एक्स अकाउंट पर जारी किए गए वीडियो का एक दृश्य, जिसमें ट्रेन यात्रा के दौरान फिजिकल कार्ड के स्थान पर डिजिटल आधार ऐप के इस्तेमाल की प्रक्रिया को समझाया गया है।

मुख्य बिंदु (हाइलाइट्स):

  • यात्रा के दौरान पहचान पत्र भूलने पर परेशान होने की जरूरत नहीं, मोबाइल ऐप से होगा काम।
  • एक ही मोबाइल फोन के अंदर परिवार के कुल V सदस्यों का आधार डेटा रखा जा सकेगा।
  • ट्रेन यात्रा के दौरान रेल स्टाफ को ऐप का आधार दिखाना पूरी तरह से कानूनी रूप से मान्य।
  • विभाग ने नागरिकों से फोटोकॉपी का उपयोग बंद कर पेपरलेस व्यवस्था अपनाने का आग्रह किया।
  • ऐप को डाउनलोड करने के लिए आधिकारिक लिंक पहचान डॉट यूआईडीएआई डॉट जीओवी डॉट इन स्लैश ऐप स्लैश डाउनलोड का उपयोग करें।

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खेतों में डिजिटल क्रांति! खाद के लिए नहीं लगानी होगी लंबी कतारें, वैशाली में लागू हुई देश की सबसे अनूठी क्यूआर कोड व्यवस्था!

बिहार सरकार के कृषि विभाग का पाइलट प्रोजेक्‍ट : एफएसएएस पोर्टल से घर बैठे बुक होगी खाद, कालाबाजारी पर लगेगा पूर्ण विराम

वैशाली, 15 जून: बिहार के कृषि क्षेत्र में आज एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत हो गई है। वैशाली जिले में 15 जून 2026 से क्यूआर कोड आधारित ऑनलाइन उर्वरक बुकिंग एवं वितरण प्रणाली को पूरी तरह से लागू कर दिया गया है। कृषि विभाग, बिहार सरकार की इस अभिनव और अति-आधुनिक पहल से अब किसानों को खाद की किल्लत और दुकानों पर लगने वाली लंबी-लंबी कतारों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। इस नई पारदर्शी व्यवस्था के तहत किसान अब अपने घर पर आराम से बैठकर ही एफएसएएस (फर्टिलाइजर सेल्स एप्लीकेशन System) के माध्यम से अपनी जरूरत के अनुसार उर्वरक की ऑनलाइन बुकिंग कर सकेंगे और एक साधारण क्यूआर कोड दिखाकर अपने नजदीकी रिटेलर से बेहद सुगमता से खाद प्राप्त कर सकेंगे।

कृषि विभाग, बिहार सरकार द्वारा जारी किसानों के लिए 4-चरण वाली आसान ऑनलाइन उर्वरक बुकिंग मार्गदर्शिका। इसमें आधार सत्यापन, फसल चयन, रिटेलर मैपिंग और क्यूआर कोड/टोकन जनरेशन के साथ T+2 समय-सारणी के नियमों को विस्तार से समझाया गया है।

इस अत्यधिक महत्वाकांक्षी पायलट परियोजना के लिए पूरे बिहार में केवल दो जिलों का चयन किया गया है, जिसमें वैशाली और शेखपुरा शामिल हैं। वैशाली जिले में इस महा-अभियान की कमान खुद जिलाधिकारी वर्षा सिंह ने संभाली है। वर्षा सिंह के कुशल नेतृत्व में पूरे जिले के ग्रामीण इलाकों में किसानों को इस डिजिटल और आधुनिक व्यवस्था के प्रति जागरूक करने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, इस प्रणाली के लागू होने से खाद के वितरण में शत-प्रतिशत पारदर्शिता आएगी, समय पर उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित होगी और सबसे बड़ी बात यह है कि बिचौलियों तथा कालाबाजारी करने वालों का पूरी तरह से सफाया हो जाएगा। अब किसानों को उनकी फसल और भूमि की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार ही उर्वरक का आवंटन किया जाएगा।

उर्वरक डीलरों और रिटेलरों के लिए तैयार किया गया नया पीओएस (पॉइंट ऑफ सेल) मशीन प्रक्रिया चार्ट, जिसके माध्यम से क्यूआर कोड को स्कैन कर और बायोमेट्रिक सत्यापन पूरा कर किसानों को पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल रसीद के साथ खाद का वितरण सुनिश्चित किया जाएगा।

बुकिंग की आसान 4-चरण प्रक्रिया:

कृषि विभाग द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस नई व्यवस्था को बेहद सरल और किसान-अनुकूल बनाया गया है। इसमें 4 आसान चरणों की प्रक्रिया निर्धारित की गई है:

  1. आधार से सत्यापन: पहले चरण में किसान को अपने आधार कार्ड के माध्यम से ओटीपी या ई-केवाईसी द्वारा सत्यापन करना होगा।
  2. फसल और खाद का चयन: दूसरे चरण में किसान को अपनी फसल (जैसे धान, गेहूं, मक्का या गन्ना) का चयन करना होगा और फिर भूमि के अनुसार उचित खाद जैसे यूरिया (46 प्रतिशत नाइट्रोजन) या डीएपी (18-46-0 एनपीके) की मात्रा चुननी होगी।
  3. रिटेलर का चयन: तीसरे चरण में किसान को अपने क्षेत्र के उन रिटेलरों या कृषि सेवा केंद्रों की सूची दिखाई देगी जहां स्टॉक उपलब्ध है, जिसमें से वे अपनी पसंद के रिटेलर का चयन कर सकते हैं।
  4. क्यूआर कोड और खाद प्राप्ति: चौथे और अंतिम चरण में सिस्टम द्वारा एक विशिष्ट क्यूआर कोड और टोकन नंबर जनरेट किया जाएगा, जिसे दिखाकर किसान रिटेलर के पास जाकर अपनी खाद प्राप्त कर सकते हैं।
वैशाली जिला मुख्यालय में डिजिटल उर्वरक वितरण प्रणाली की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक करतीं जिलाधिकारी वर्षा सिंह। वर्षा सिंह के नेतृत्व में 15 जून 2026 से जिले में पायलट प्रोजेक्ट के तहत क्यूआर कोड आधारित ऑनलाइन खाद बुकिंग व्यवस्था को पूरी तरह अनिवार्य और प्रभावी बना दिया गया है।

नया पीओएस सिस्टम और खरीद समय-सारणी (T+2 नियम):

रिटेलरों के लिए भी अब नया पीओएस (पॉइंट ऑफ सेल) मशीन प्रोसेस लागू किया गया है। रिटेलर मशीन में लॉगिन, क्यूआर कोड स्कैन, आधार सत्यापन (बायोमेट्रिक या ओटीपी), स्टॉक ट्रैकिंग, उत्पाद चयन और बिक्री की पुष्टि के बाद सीधे रसीद प्रिंट होगी तथा आधार-लिंक मोबाइल नंबर पर एसएमएस रसीद भेजी जाएगी।

इस व्यवस्था में T+2 दिनों की समय-सीमा तय की गई है। बुकिंग के दिन (T0) खाद खरीदने की अनुमति नहीं होगी। बुकिंग के अगले दिन (T1) और उसके अगले दिन (T2) ही खाद खरीदी जा सकती है। यदि किसान ने बुकिंग के 2 दिनों के भीतर खाद नहीं उठाई, तो बुकिंग स्वतः रद्द हो जाएगी।

यह सुविधा व्यक्तिगत किसान, परिवार के प्रतिनिधि या किसी भी जरूरतमंद किसान के लिए पारदर्शी रूप से उपलब्ध है। कृषि विभाग का मुख्य उद्देश्य है: खाद हर किसान के लिए है – गति, सरलता, पारदर्शिता और निष्पक्षता।” स्मार्ट और डिजिटल खेती की दिशा में यह बिहार सरकार का अब तक का सबसे बड़ा और साहसिक कदम माना जा रहा है।

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गयाजी में गरजे सम्राट चौधरी: ‘या तो अपराधियों का पिंडदान होगा या फिर जेल के भीतर होंगे’, ₹170 करोड़ की MSME सौगात से युवाओं को लगेंगे पंख!

गयाजी: बिहार में कानून व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा संदेश दिया है। गयाजी की पावन धरती से अपराधियों को ललकारते हुए उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बिहार को हर हाल में अपराधमुक्त बनाया जाएगा। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “या तो अपराधियों का पिंडदान गयाजी में होगा या फिर वे जेल के भीतर होंगे।” अपराधियों के खिलाफ इस महा-संकल्प के बीच गयाजी के खिजरसराय में विकास का एक नया अध्याय भी लिखा गया, जहां अत्याधुनिक एमएसएमई (MSME) प्रौद्योगिकी केंद्र का भव्य भूमि पूजन और शिलान्यास संपन्न हुआ।

गयाजी में एमएसएमई प्रौद्योगिकी केंद्र के शिलान्यास समारोह के दौरान मंच पर उपस्थित मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार, कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा, मंत्री श्रेयसी सिंह व अन्य नेतागण।

₹170 करोड़ की महा-परियोजना, 20 एकड़ में फैलेगा खुशहाली का साम्राज्य

बिहार सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई 20 एकड़ भूमि पर लगभग 170 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से इस अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी केंद्र (टीसी) को विकसित किया जा रहा है। यह केंद्र केवल एक कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि बिहार के युवाओं के सपनों, आकांक्षाओं और आत्मनिर्भरता की एक मजबूत नींव है।

इस अवसर पर गया-इस्लामपुर-खिजरसराय पथ से लेकर इस प्रौद्योगिकी केंद्र तक जाने वाली सड़क के चौड़ीकरण और सुदृढ़ीकरण कार्य का भी जोरदार शुभारंभ किया गया, जिससे इलाके में कनेक्टिविटी और बेहतर होगी।

हर साल 7,000 युवाओं को ट्रेनिंग, 1,000 फैक्ट्रियों को मिलेगी मॉडर्न टेक सपोर्ट

यह केंद्र गयाजी सहित पूरे बिहार में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात करेगा। आधुनिक मशीनों और विश्वस्तरीय तकनीकों से सुसज्जित इस केंद्र के जरिए प्रतिवर्ष 7,000 से अधिक युवाओं को उच्च स्तरीय तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके अलावा, 1,000 से अधिक एमएसएमई इकाइयों को आधुनिक तकनीकी सहायता और सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे बिहार के लोकल प्रोडक्ट्स को ग्लोबल पहचान मिल सके।

खिजरसराय में आयोजित भूमि पूजन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और डबल इंजन सरकार की विकास नीतियों को सुनने पहुंचे हजारों स्थानीय नागरिकों और महिलाओं की भारी भीड़।

6 लाख से 46 लाख तक पहुंची एमएसएमई इकाइयां, डबल इंजन का कमाल

कार्यक्रम में आंकड़ों को साझा करते हुए बताया गया कि पिछले कुछ वर्षों में बिहार के भीतर एमएसएमई क्षेत्र में अभूतपूर्व और ऐतिहासिक प्रगति हुई है। राज्य में एमएसएमई इकाइयों की संख्या लगभग 6 लाख से बढ़कर अब 46 लाख से अधिक हो चुकी है। इसके चलते करोड़ों लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। यह केंद्र युवाओं के हाथों में कौशल और मन में आत्मविश्वास भरकर आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को पूरा करेगा।

दिग्गजों का महाजुटान: मंच पर दिखी विकास की एकजुटता

इस ऐतिहासिक भूमि पूजन कार्यक्रम में केंद्र और राज्य सरकार के कई दिग्गज चेहरे एक साथ नजर आए। समारोह में केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री जीतनराम मांझी, बिहार विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार, कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा, मंत्री श्रेयसी सिंह, और मंत्री संतोष मांझी सहित भारी संख्या में जनप्रतिनिधिगण, वरिष्ठ पदाधिकारीगण और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी नेताओं ने एक सुर में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन की सरकार बिहार में विकास, रोजगार और कौशल संवर्धन के नए आयाम स्थापित कर रही है।

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समस्तीपुर में बंद उद्योग एवं दूधपूरा हवाई अड्डे के लिए सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारी, समाहरणालय के सामने गूंजे विरोध के सुर

समस्तीपुर, 15 जून 2026

समस्तीपुर की धरती सोमवार को सरकार के खिलाफ विरोध की हुंकार से गूंज उठी। जिला विकास संघर्ष मोर्चा के बैनर तले जुटे प्रदर्शनकारियों ने न केवल सड़कों पर कब्जा किया, बल्कि जिले की बदहाल औद्योगिक स्थिति को लेकर प्रशासन की नींद उड़ा दी। दूधपूरा हवाई अड्डे के जीर्णोद्धार से लेकर बंद पड़ी चीनी मिल और पेपर मिल को चालू करने की मांग को लेकर समाहरणालय के सामने प्रदर्शनकारियों ने जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया।

बंद उद्योगों को चालू करने और दूधपूरा हवाई अड्डे के जीर्णोद्धार की मांग को लेकर  नारेबाजी करते हुए प्रदर्शनकारी।

जुलूस से समाहरणालय तक मचा हड़कंप आंदोलनकारी सरकार बस स्टैंड से सुबह ही इकट्ठा हो गए थे। वहां से एक विशाल जुलूस निकाला गया, जो शहर के विभिन्न प्रमुख मार्गों से होकर गुजरा। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। करीब 1 घंटे तक समाहरणालय परिसर के बाहर प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर डटे रहकर प्रशासन पर दबाव बनाया। जिले के विकास की ठप पड़ी रफ्तार को लेकर आम लोगों में काफी आक्रोश दिखा।

प्रमुख मांगें: उद्योगों का पुनरुद्धार या आंदोलन का विस्तार  

सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि समस्तीपुर के प्रमुख उद्योगों के बंद होने से हजारों परिवारों का चूल्हा जलना बंद हो गया है। मोर्चा ने अपनी 5 सूत्री मांगों को लेकर प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है।

  1. दूधपूरा हवाई अड्डा का जीर्णोद्धार कर उसे अविलंब चालू किया जाए।
  2. समस्तीपुर चीनी मिल को पुनः संचालित किया जाए।
  3. ठाकुर पेपर मिल को दोबारा चालू कर रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं।
  4. मुक्तापुर स्थित रामेश्वर जूट मिल का विकास-विस्तार
  5. एवं उसके नियमित संचालन की गारंटी दी जाए।
समस्तीपुर समाहरणालय के समक्ष अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते जिला विकास संघर्ष मोर्चा के कार्यकर्ता एवं नेता।

समाहरणालय द्वार पर आयोजित सभा की अध्यक्षता शंकर प्रसाद साह ने की। सभा के बाद एक प्रतिनिधिमंडल ने अपर समाहर्ता को ज्ञापन सौंपते हुए चेतावनी दी कि यदि इन मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और अधिक उग्र और व्यापक बनाया जाएगा।

इस आंदोलन में विभिन्न दलों के नेताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई:

  • सुरेंद्र प्रसाद सिंह (भाकपा माले) ने कहा कि बंद पड़े दूधपूरा हवाई अड्डे का जीर्णोद्धार करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
  • राकेश ठाकुर ने बिहार के प्रसिद्ध ठाकुर पेपर मिल को पुनः चालू करने की मांग उठाई।
  • शत्रुघ्न पंजी ने कहा कि 23 एकड़ में फैला समस्तीपुर चीनी मिल अगर चालू हो जाए, तो जिले की अर्थव्यवस्था बदल जाएगी।

आंदोलन में इनकी रही भागीदारी प्रदर्शन में शामिल प्रमुख लोगों में दीनबंधु प्रसाद, जीतेंद्र कुमार, रामलाल राम, अर्जुन राय, विश्वनाथ गुप्ता, सोनेलाल राय, सत्यनारायण सिंह (माकपा), सुधीर कुमार देव (भाकपा), परमानंद मिश्र (कांग्रेस), विश्वनाथ सिंह हजारी, सुशील कुमार, एख्लाकुर रहमान सिद्दीकी, राकेश ठाकुर (राजद), शाहीद हुसैन, अकबर अली, राम विनोद पासवान, शंभू राय, सूरत राम, संतोष कुमार निराला (ट्रेड यूनियन नेता), अशोक कुमार राय, सुरेंद्र राम, मनोज कुमार, विश्वनाथ कुमार पासवान, अविनाश कुमार, मिथिलेश कुमार राय, मो० सोनू, रंजीत कुमार सिंह, अनील कुमार राय, राजकुमार महतो, राजेंद्र राम, राजेश कुमार समेत बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आम नागरिक उपस्थित थे।

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बड़ी खबर: नए डिग्री कॉलेजों में तबादला चाहने वाले प्रिंसिपलों और बर्सरों को लगा तगड़ा झटका, राजभवन ने कड़ाई से लगाई रोक!

बिहार के 211 नए डिग्री कॉलेजों में नहीं होगा कोई ट्रांसफर, एडिशनल चीफ सेक्रेटरी दीपक कुमार सिंह का सख्त आदेश

पटना: बिहार के नव-निर्मित डिग्री कॉलेजों में मलाईदार पोस्टिंग या पसंदीदा जगहों पर तबादले की उम्मीद लगाए बैठे प्रिंसिपलों और बर्सरों को राजभवन ने बड़ा झटका दिया है । राजभवन सचिवालय से जारी एक बेहद सख्त आदेश के अनुसार, नए स्थापित किए गए 211 डिग्री कॉलेजों में हाल ही में तैनात किए गए प्रिंसिपलों और बर्सरों के तबादले या स्थान परिवर्तन के किसी भी आवेदन (रिप्रेजेंटेशन) पर किसी भी स्तर पर विचार नहीं किया जाएगा । यह रोक अगले आदेश तक पूरी तरह से प्रभावी रहेगी ।

राजभवन बिहार की ओर से एडिशनल चीफ सेक्रेटरी दीपक कुमार सिंह के हस्ताक्षरसे  वाइस-चांसलरों को जारी किया गया आधिकारिक पत्र (लेटर नंबर 78/एसीएस), जिसमें तबादलों पर पूर्ण रोक लगाने का आदेश दिया गया है ।

1 जुलाई से शुरू हो रहा है सत्र, लापरवाही बर्दाश्त नहीं

राज्यपाल के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी दीपक कुमार सिंह ने बिहार के सभी विश्वविद्यालयों के वाइस-चांसलरों को पत्र लिखकर इस फैसले से अवगत कराया है । पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन 211 नए डिग्री कॉलेजों का शैक्षणिक सत्र 01 जुलाई 2026 से शुरू होने जा रहा है । इस तय समय-सीमा के भीतर सत्र को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए पूर्ण प्रतिबद्धता और संस्थागत देखभाल की अत्यंत आवश्यकता है ।

तबादले की अर्जी लगाने पर जताई गहरी नाराजगी

दीपक कुमार सिंह ने तबादले के लिए पैरवी और अर्जी लगाने वाले अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है । उन्होंने पत्र में कहा कि यह वास्तव में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जैसे ही इन कॉलेजों में पोस्टिंग की गई, वैसे ही अधिकारियों द्वारा तबादले या स्थान बदलने के लिए आवेदन मिलने शुरू हो गए । राजभवन ने इसे अनुशासन और समय-सीमा के उल्लंघन के रूप में देखा है ।

सभी वाइस-चांसलरों को सख्त निर्देश

राजभवन ने सभी विश्वविद्यालयों के वाइस-चांसलरों को यह निर्देश दिया है कि वे अपने अंतर्गत आने वाले कॉलेजों के इन नवनियुक्त प्रिंसिपलों और बर्सरों को यह कड़ा संदेश तुरंत कम्युनिकेट कर दें ताकि किसी भी प्रकार का भ्रम न रहे ।

इस आदेश की प्रतिलिपियां (कॉपी) आवश्यक जानकारी और आगे की कार्रवाई के लिए हायर एजुकेशन डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी, हायर एजुकेशन डिपार्टमेंट के डायरेक्टर और चांसलर के ओएसडी को भी भेज दी गई हैं । इस फैसले से यह साफ हो गया है कि शिक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की ढिलाई या पैरवी को राजभवन अब कतई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

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बिहार में कृषि क्रांति का बिगुल: मुख्यमंत्री ने रवाना किया ‘कृषि ज्ञान रथ’, अब किसानों के खेत तक पहुंचेगी आधुनिक तकनीक

पटना | बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था को एक नई उड़ान देने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। 14 जून 2026 को 01 अणे मार्ग, पटना से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ‘शारदीय (खरीफ) महाभियान-2026’ का भव्य शुभारंभ किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने एलईडी युक्त ‘किसान जागरूकता वाहनों’ को हरी झंडी दिखाकर प्रखंडों और जिलों के लिए रवाना किया। यह पहल राज्य में कृषि विकास की एक नई इबारत लिखने के लिए तैयार है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, और कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा संयुक्त रूप से ‘कृषि ज्ञान वाहन’ को हरी झंडी दिखाकर रवाना करते हुए।

किसानों के द्वार तक पहुंचेगा ज्ञान कृषि विभाग द्वारा संचालित यह महाभियान महज एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि किसानों के सशक्तिकरण का एक महायज्ञ है। इन हाई-टेक एलईडी वाहनों के जरिए किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों के चयन, फसल प्रबंधन और सरकारी योजनाओं की सटीक जानकारी उनके गांव और खेतों तक पहुंचाई जाएगी।

मंच पर दिग्गजों की रही मौजूदगी इस कार्यक्रम में विकास और प्रगति का संकल्प दोहराया गया। मुख्य समारोह में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी और उप मुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कृषि विभाग की बागडोर संभाल रहे कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने इस दौरान पूरे कार्यक्रम की अध्यक्षता की और इस महाभियान की रूपरेखा को स्पष्ट किया।

01 अणे मार्ग पर कतारबद्ध तरीके से खड़े एलईडी युक्त किसान जागरूकता वाहन, जो राज्य के सुदूर प्रखंडों और जिलों में कृषि तकनीक का संदेश फैलाने के लिए तैयार हैं।

क्या बोले कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा? कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने स्पष्ट लहजे में कहा कि इस महाभियान का एकमात्र उद्देश्य किसानों तक सरकारी योजनाओं और वैज्ञानिक खेती की जानकारी को सीधे पहुंचाना है। उन्होंने जोर देकर कहा, “हमारा लक्ष्य है कि कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी हो, खेती की लागत में कमी आए और किसानों की आय में गुणात्मक वृद्धि हो। हम तकनीक को सीधे खेत से जोड़ रहे हैं।”

महाभियान-2026 के मुख्य आकर्षण: यह महाभियान खेती के हर पहलू को कवर करेगा। इसकी प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • डीबीटी (DBT) सुविधा: लाभुक किसानों के बीच अनुदान का सीधा वितरण।
  • आधुनिक तकनीक: जीरो टिलेज से धान की सीधी बुआई और कृषि में ड्रोन तकनीक का सफल प्रयोग।
  • फसल विविधीकरण: मक्का, बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की उन्नत खेती को बढ़ावा।
  • जागरूकता प्रसार: किसान मेला, किसान पाठशाला, प्रशिक्षण, परिभ्रमण, प्रक्षेत्र दिवस और कृषि गोष्ठियों का आयोजन।
  • स्थायी खेती: संतुलित उर्वरकों के प्रयोग, जैविक खेती और प्राकृतिक खेती को प्राथमिकता।
  • मिट्टी और कल्याण: मिट्टी जांच कार्यकम और कृषि जनकल्याण चौपाल के माध्यम से किसानों को सशक्त बनाना।

यह अभियान निश्चित रूप से राज्य के लाखों किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा और बिहार को कृषि के क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाएगा।

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बिना फायर एनओसी और पास नक्शे के चल रहे प्राइवेट स्कूल-कोचिंग सेंटरों पर गिरेगी गाज, प्रशासन हुआ सख्त, 3 दिनों में मांगी गई जांच रिपोर्ट!

प्राइवेट स्कूलों की चालाकी पर कसा शिकंजा, इन 16 कड़े बिंदुओं पर देना होगा जवाब! बच्चों की जान जोखिम में, सेक्शनों के फेरबदल से लेकर सुरक्षा तक में अब नहीं चलेगा फर्जीवाड़ा!

 विशेष संवाददाता, मुजफ्फरपुर।  मुजफ्फरपुर के एक निजी अस्पताल में 04/06/2026 को लगी भीषण आग में कई मरीजों की दर्दनाक मौत के बाद प्रमंडलीय प्रशासन पूरी तरह से एक्शन मोड में आ गया है। इस भयावह हादसे से सबक लेते हुए आयुक्त, तिरहुत प्रमंडल गिरिवर दयाल सिंह ने एक अत्यंत कड़ा और गोपनीय पत्र (ज्ञापांक-गो0-01/2026-296, दिनांक 09/06/2026) जारी कर शिक्षा विभाग को हिलाकर रख दिया है। आयुक्त ने साफ शब्दों में कहा है कि अस्पताल जैसी घटना की पुनरावृत्ति किसी भी सूरत में स्कूलों या कोचिंग संस्थानों में नहीं होनी चाहिए।

इस प्रमंडलीय हंटर के तुरंत बाद मुजफ्फरपुर के जिला शिक्षा पदाधिकारी कुमार अरविन्द सिन्हा ने कड़ा रुख अपनाते हुए पत्र संख्या एमजीटी/1339 (दिनांक 12/06/2026) जारी कर दिया है। उन्होंने जिले के सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में संचालित सभी निजी स्कूलों और कोचिंग सेंटरों की भौतिक जांच करने का अल्टीमेटम दिया है। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि मात्र तीन दिनों के भीतर 16 कड़े बिंदुओं पर जांच रिपोर्ट सौंपनी होगी, ऐसा न करने वाले संस्थानों पर सीधे तालाबंदी की जाएगी। इस आदेश के बाद पूरे जिले के निजी स्कूल और कोचिंग माफियाओं में हड़कंप मच गया है।

संचालकों को सहयोग करने का सख्त निर्देश, लापरवाही पर होगी सीधी कार्रवाई जिला शिक्षा पदाधिकारी ने मुजफ्फरपुर के सभी निजी विद्यालय और कोचिंग संचालकों तथा प्राचार्यों को सख्त निर्देश दिया है कि वे जांच अधिकारी को आवश्यक अभिलेख (दस्तावेज) उपलब्ध कराएं और परिसर भ्रमण एवं अवलोकन में पूरा सहयोग दें। यदि कोई संचालक इसमें बाधा डालता है या दस्तावेज छुपाता है, तो इसे गंभीर अपराध माना जाएगा।

प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे संलग्न विहित प्रपत्र में जांच कर, पत्र प्राप्ति के तीन दिनों के अंदर अपनी जांच रिपोर्ट जिला कार्यालय को उपलब्ध कराना सुनिश्चित करेंगे। इस आदेश के बाद मुजफ्फरपुर के शिक्षा जगत में खलबली मची हुई है, क्योंकि कई नामी-गिरामी संस्थान भी बिना उचित सुरक्षा मानकों और बिना पास नक्शे के धड़ल्ले से चल रहे हैं।

इन 16 कड़े बिंदुओं पर तीन दिनों में देना होगा जवाब:

प्रशासन द्वारा जारी किए गए विशेष जांच प्रपत्र में कुल 16 अत्यंत संवेदनशील बिंदुओं को शामिल किया गया है, जिस पर भौतिक सत्यापन होना अनिवार्य है:

  1. मान्यता और निबंधन: क्या संस्थान को सक्षम बोर्ड या प्राधिकार से मान्यता प्राप्त है और उसका निबंधन संख्या साक्ष्य के साथ उपलब्ध है या नहीं?
  2. भवन का स्वीकृत नक्शा: क्या भवन का निर्माण सक्षम प्राधिकार द्वारा स्वीकृत नक्शे और प्राक्कलन के अनुरूप ही किया गया है?
  3. प्रवेश एवं निकास: विद्यालय या कोचिंग में प्रवेश और निकास की समुचित व्यवस्था की स्थिति।
  4. अग्नि सुरक्षा (फायर सेफ्टी): क्या संस्थान में अग्निशामक मानक के अनुरूप व्यवस्था है और सक्षम प्राधिकार से फायर एनओसी (प्रमाण पत्र) प्राप्त है?
  5. बच्चों की कुल संख्या: संस्थान की विगत वर्ष की वर्गवार नामांकित बच्चों की कुल संख्या (सेक्शनों के फेरबदल की सघन जांच)।
  6. इलेक्ट्रिक वायरिंग: संस्थान की विद्युत वायरिंग की भौतिक स्थिति (खुले और खतरनाक तारों की जांच)।
  7. शौचालय सुरक्षा: शौचालयों की सुरक्षात्मक अद्यतन भौतिक स्थिति।
  8. शौचालय में लाइट-पानी: शौचालयों में लाइट एवं पानी की समुचित व्यवस्था।
  9. शुद्ध पेयजल: बच्चों के लिए पीने योग्य पानी अथवा आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) की उपलब्धता की स्थिति।
  10. आपातकालीन निकास (इमरजेंसी एग्जिट): आपातकालीन स्थिति में बच्चों के निकास हेतु मुख्य द्वार के अलावा अन्य वैकल्पिक द्वार की संख्या और स्थिति।
  11. बचाव की जानकारी: आपात काल की स्थिति में बच्चों के बचाव हेतु निकास द्वार की जानकारी की स्थिति।
  12. वाहन सुरक्षा और जीपीएस: संस्थान के पंजीकृत वाहनों की संख्या, फिटनेस प्रमाण पत्र, स्पीड गवर्नर, जीपीएस की सुविधा, ड्राइवरों का पुलिस वेरिफिकेशन और वाहन पर ड्राइवर का मोबाइल नंबर लिखा है या नहीं?
  13. वाहनों में फायर सेफ्टी: पंजीकृत वाहनों में अग्निशामक यंत्रों की संख्या एवं उनकी भौतिक स्थिति क्या है?
  14. प्रतिकूल स्थितियां: विद्यालय के अवलोकन में किसी प्रकार की वैसी स्थिति जो बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा या प्रतिकूल हो।
  15. इमरजेंसी नंबरों का प्रदर्शन: क्या परिसर में बड़े-बड़े अक्षरों में फायर ब्रिगेड, पुलिस स्टेशन और सिविल सर्जन के इमरजेंसी नंबर लिखे गए हैं?
  16. जाँच पदाधिकारी का मन्तव्य: जांच करने वाले अधिकारी की अंतिम ठोस टिप्पणी।

जांच टीम के आते ही गाड़ियाँ हो जाती है गायब, खेल के मैदान पर अवैध कब्जा

प्राइवेट स्कूलों की एक ऐसी चालाकी सामने आई है जो बच्चों के शारीरिक विकास और आपातकालीन सुरक्षा के साथ सीधे तौर पर खिलवाड़ करते  है। अक्सर देखा जा रहा है कि जब भी शिक्षा विभाग या जिला प्रशासन की टीम स्कूल का वेरिफिकेशन करने पहुँचती है, तो स्कूल संचालक बेहद शातिर दिमाग का परिचय देते हैं। वे अपनी बसों, वैनों और ऑटो को आनन-फानन में स्कूल कैंपस से बाहर सड़कों या सुदूर गलियों में खड़ा करवा देते हैं। यह नाटक सिर्फ इसलिए रचा जाता है ताकि जांच अधिकारियों को स्कूल कैंपस ‘बड़ा’ और ‘सुरक्षित’ दिखाई दे।

हकीकत यह है कि इन गाड़ियों को कैंपस के अंदर पार्क करने के बाद बच्चों के खेलने के लिए बने मैदान का वजूद ही खत्म हो जाता है। बच्चों का पूरा प्ले ग्राउंड कबाड़खाने और बस डिपो में तब्दील हो जाता है। यदि स्कूल अवधि के दौरान कोई भूकंप या आग जैसी आपातकालीन स्थिति पैदा हो जाए, तो कैंपस में खड़ी इन गाड़ियों के कारण बच्चों को भागने तक की जगह नहीं मिलेगी। प्रशासन इस बार इस ‘गाड़ी हटाओ खेल’ पर भी नजर रख रहा है।

कागजों पर एक क्लास, जमीन पर चार सेक्शन: संख्या छिपाने का बड़ा खेल

मुजफ्फरपुर के इन निजी संस्थानों में कमाई को दोगुना करने और सरकारी टैक्स व नियमों से बचने के लिए ‘सेक्शन’ का एक बड़ा फर्जीवाड़ा चल रहा है। संस्थान की विगत वर्ष की वर्गवार नामांकित बच्चों की कुल संख्या के मामले में यह कड़वा सच उजागर हुआ है कि स्कूल संचालक धड़ल्ले से एक ही क्लास के कई सेक्शन (जैसे- सेक्शन ए, बी, सी और डी) चलाते हैं। एक-एक सेक्शन में क्षमता से अधिक बच्चों को ठूंस-ठूंस कर बिठाया जाता है।

परंतु, जब सरकारी रिपोर्ट या जांच की बारी आती है, तो ये संचालक रिकॉर्ड बुक में सिर्फ एक ही वर्ग और सीमित बच्चों की संख्या दिखाते हैं। इस तरह बच्चों की असली संख्या को सरकारी कागजों में दबा दिया जाता है। इस भीड़भाड़ के कारण कमरों में वेंटिलेशन खत्म हो जाता है, जिससे बच्चों का दम घुटता है। कमिश्नर और जिला शिक्षा पदाधिकारी के इस साझा आदेश ने अब इस  घोटाले की जड़ पर प्रहार किया है।

सड़कों पर दौड़ता ‘बारूद’: ड्राइवरों की मनमानी और बिना सीट बेल्ट का सफर

इस पूरे मामले का सबसे डरावना और जानलेवा पहलू स्कूली वाहनों की लापरवाही है। मुजफ्फरपुर की सड़कों पर रोज हजारों बच्चों की जिंदगी को दांव पर लगाकर दौड़ने वाली इन गाड़ियों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। सबसे पहली बड़ी लापरवाही यह देखी गई है कि इन गाड़ियों के ड्राइवर कभी भी ‘सीट बेल्ट’ नहीं लगाते हैं। ट्रैफिक नियमों को ठेंगा दिखाने वाले ये ड्राइवर बच्चों को लेकर तेज रफ्तार में गाड़ियाँ दौड़ाते हैं, जिससे किसी भी अचानक ब्रेक या दुर्घटना की स्थिति में बड़ा जानी नुकसान हो सकता है।

इसके अलावा, गाड़ियों के भीतर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ी हुई हैं। संस्थान के भीतर भले ही दिखावे के लिए कुछ अग्निशामक (फायर सेफ्टी) सिलेंडर टांग दिए गए हों, लेकिन बच्चों को ढोने वाली इन बसों और वैनों के भीतर अग्निशामक की कोई व्यवस्था नहीं रहती। यदि गाड़ी के इंजन में शॉर्ट सर्किट से आग लग जाए, तो बच्चों को बचाने का कोई साधन मौजूद नहीं है।

बदलेगी सूरत या फिर ठंडे बस्ते में जाएगी फाइल?

अस्पताल हादसे के बाद जागा प्रशासन इस बार पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा है। जिला शिक्षा पदाधिकारी ने मुजफ्फरपुर के सभी निजी विद्यालय और कोचिंग संचालकों तथा प्राचार्यों को सख्त हिदायत दी है कि वे जांच अधिकारी के निरीक्षण के दौरान आवश्यक अभिलेख (दस्तावेज) उपलब्ध कराएं और परिसर भ्रमण में पूरा सहयोग दें। यदि जांच में किसी भी प्रकार की प्रतिकूल स्थिति पाई जाती है जो बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा हो, तो उस संस्थान के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

मुजफ्फरपुर के अभिभावकों का कहना है कि अब समय आ गया है कि शिक्षा के नाम पर व्यापार करने वाले और बच्चों की जान को जोखिम में डालने वाले इन रसूखदार स्कूल संचालकों की दादागिरी खत्म की जाए। देखना यह है कि तीन दिनों के भीतर प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी कितनी ईमानदारी से अपनी रिपोर्ट सौंपते हैं या फिर हमेशा की तरह कागजी कोरम पूरा कर इस गंभीर मामले को भी रफा-दफा कर दिया जाता है। मुजफ्फरपुर की जनता की नजरें अब इस जांच रिपोर्ट और उसके बाद होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं।

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ग्लोबल संकट के बीच भारत की सरजमीं पर ब्लॉकबस्टर बैठक: आधी आबादी के पेट और किसान की जेब को लेकर ब्रिक्स देशों का अब तक का सबसे बड़ा एलान!

आधी दुनिया, एक फैसला: इंदौर डिक्लेरेशन से बदलेगा वैश्विक कृषि का भूगोल, बीज विरासत और छोटे किसानों को मिला ग्लोबलसुरक्षा कवच!

विशेष रिपोर्ट (एस. एस. कुमार ‘पंकज’) : वैश्विक अशांति, भू-राजनीतिक तनाव, ईरान-इराक क्षेत्र में बढ़ते सैन्य संकट और अल नीनो के खतरनाक साये के बीच भारत की पावन सरजमीं ने एक बार फिर दुनिया को नई राह दिखाई है। भारत के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में ब्रिक्स (BRICS) समूह के कृषि मंत्रियों की 16वीं बैठक किसी ब्लॉकबस्टर घटनाक्रम से कम नहीं रही। इस महा-मंथन के समापन पर जो ‘इंदौर डिक्लेरेशन’ (संयुक्त घोषणा पत्र) सर्वसम्मति से पारित हुआ है, उसने न केवल वैश्विक कृषि का भूगोल बदल दिया है, बल्कि दुनिया की आधी आबादी के पेट (खाद्य सुरक्षा) और अन्नदाता की जेब (आजीविका) को सुरक्षित करने के लिए अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक ढांचा तैयार कर दिया है।

इंदौर में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों की 16वीं ऐतिहासिक बैठक के सफल समापन के बाद एक बेहद गरिमामयी और आक्रामक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान। मंच पर उनके साथ केंद्रीय राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर, भागीरथ चौधरी, कृषि सचिव अतीश चंद्रा और आईसीआर के महानिदेशक एवं सचिव डेयर एम एल जाट सहित अन्य वरिष्ठ नीति-निर्माता और शीर्ष अधिकारी ‘इंदौर डिक्लेरेशन’ के जरिए दुनिया की खाद्य सुरक्षा और अन्नदाता की तकदीर बदलने का शंखनाद करते हुए।

यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब पूरी दुनिया खाद्यान्न संकट, उर्वरकों की आसमान छूती कीमतों और जलवायु परिवर्तन की मार से कराह रही है। इस वैश्विक हाहाकार के बीच, ब्रिक्स देशों—जो दुनिया की 50% आबादी, 42% कृषि भू-भाग, 68% कृषि जोत और 42% वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन का प्रतिनिधित्व करते हैं—ने भारत के नेतृत्व में एकजुट होकर एक ऐसा चक्रव्यूह रचा है, जो सीधे तौर पर छोटे किसानों और पारंपरिक कृषि व्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एकाधिकार से बचाएगा।

केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बेहद आक्रामक और विस्तृत प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस महा-सफलता का ऐलान किया। मंच पर उनके साथ कृषि और किसान कल्याण विभाग के दोनों सहयोगी मंत्री रामनाथ ठाकुर, भागीरथ चौधरी, कृषि सचिव अतीश चंद्रा, आईसीआर के महानिदेशक एवं सचिव डेयर एम एल जाट सहित वरिष्ठ नीति निर्माता प्रमोद और अजीत मौजूद थे। शिवराज सिंह चौहान ने साफ शब्दों में कहा कि जब चारों तरफ अनिश्चितता का माहौल है, तब भारत की अध्यक्षता में हुए इस इंदौर डिक्लेरेशन के परिणाम पूरी दुनिया को एक नई उम्मीद और अटूट विश्वास का संदेश देंगे।

इंदौर डिक्लेरेशन का महा-स्तंभ: केंद्र में सिर्फ और सिर्फ किसान

इस जॉइंट डिक्लेरेशन की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) यह है कि इसके केंद्र में किसी कॉर्पोरेट एजेंडे को जगह नहीं दी गई है, बल्कि इसका केंद्र बिंदु शुद्ध रूप से ‘किसान’ है। सदस्य देशों ने यह माना है कि जब तक खेत को संभालने वाले हाथ आर्थिक रूप से सुदृढ़ नहीं होंगे, तब तक वैश्विक खाद्य सुरक्षा की बात करना बेमानी है।

इस बैठक में सदस्य देशों और सहयोगी देशों के लगभग 60 विदेशी प्रतिनिधियों सहित 100 शीर्ष रणनीतिकारों ने भाग लिया। इस महा-बैठक में मुख्य रूप से चार प्राथमिकताओं पर रणनीतिक मुहर लगाई गई:

इंदौर में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों की 16वीं ऐतिहासिक बैठक का विहंगम दृश्‍य
  1. वैश्विक खाद्य सुरक्षा और पोषण युक्त आहार सुनिश्चित करना।
  2. कृषि व्यापार में पारदर्शिता और आपसी सहयोग को आक्रामक बढ़ावा देना।
  3. जलवायु परिवर्तन के खतरों के बीच रीजेनरेटिव फार्मिंग‘ (पुनर्योजी खेती) को मुख्यधारा में लाना।
  4. कृषि तंत्र में आधुनिक नवाचार, एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और युवाओं की भागीदारी को संस्थागत रूप देना।

डिजिटल और प्राकृतिक खेती का ग्लोबल हब बना भारत: आईआईटी दिल्ली और मोदीपुरम को कमान

भारत के प्राचीन पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकी कौशल का लोहा अब पूरी दुनिया ने मान लिया है। ‘इंदौर डिक्लेरेशन’ के तहत दो ऐसे विशाल और अभूतपूर्व नेटवर्कों की स्थापना का खाका तैयार किया गया है, जो आने वाले समय में वैश्विक कृषि की दिशा तय करेंगे:

1. ब्रिक्स नेटवर्क ऑफ सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस ऑन एग्रोइकोलॉजी एंड रीजेनरेटिव एग्रीकल्‍चर

रसायनों और फर्टिलाइजर के अंधाधुंध इस्तेमाल से दुनिया भर की भूमि बंजर हो रही है। इस बंजर धरती को पुनर्जीवित करने के लिए यह नेटवर्क प्राकृतिक, जैविक और जलवायु सहिष्णु कृषि को बढ़ावा देगा। भारत के लिए यह अत्यंत गौरव का विषय है कि इस पूरे नेटवर्क के तहत ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन नेचुरल फार्मिंग’ के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जिम्मेदारी भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मिंग सिस्टम रिसर्च), मोदीपुरम को सौंपी गई है। यह संस्थान अब संयुक्त अनुसंधान, क्षमता निर्माण और एक देश से दूसरे देश में प्राकृतिक खेती की सर्वोत्तम प्रथाओं को ट्रांसफर करने का वैश्विक हेडक्वार्टर बनेगा।

इंदौर में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों के साथ वार्त्‍ता करते भारत के  केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान व अन्‍य देश के डेलीगेट पर्सन

2. ब्रिक्स नेटवर्क ऑन डिजिटल एग्रीकल्‍चर

कृषि को चौथी औद्योगिक क्रांति से जोड़ने के लिए इस नेटवर्क का गठन किया गया है। यह नेटवर्क एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी (जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी), डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा आधारित कृषि समाधानों के क्षेत्र में क्रांतिकारी काम करेगा। इस महा-नेटवर्क के समन्वय (कोऑर्डिनेशन) की पूरी जवाबदारी आईआईटी दिल्ली को मिली है। यह संस्थान आधुनिक अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और एग्रीकल्चर इनोवेशन के बीच एक ऐसा सशक्त सेतु स्थापित करेगा, जो वैश्विक स्तर पर होने वाले बड़े अनुसंधानों को सीधे छोटे किसानों के मोबाइल और खेतों तक पहुंचाएगा।

देशी बीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा रोकने के लिए ग्लोबल फोरमका गठन

इस सम्मेलन का सबसे संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला पारंपरिक बीज विरासत और जैव-विविधता की सुरक्षा से जुड़ा है। भारत जैसे देशों में हजारों सालों से खेती की जा रही है और हमारे पास पारंपरिक बीजों का एक असीमित खजाना है, जो आज बहुराष्ट्रीय बीजों के बाजारवाद के कारण विलुप्त होने की कगार पर है।

इसे रोकने के लिए ब्रिक्स देशों ने ‘Global Forum on Farmers’ Rights in Seed Systems’ (सीड सिस्टम्स में किसानों के अधिकारों पर वैश्विक मंच) की स्थापना पर सर्वसम्मति से मुहर लगा दी है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बेहद गंभीरता से कहा कि नई किस्मों के बीजों की जरूरत तो है, लेकिन हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत और जैव-विविधता के प्रतीक देसी बीजों को हर हाल में बचाना होगा। ऐसा न हो कि भविष्य में हमारे पास ‘शरबती’ गेहूं जैसी महान किस्में बचे ही ना। यह फोरम देसी बीजों की विविधता बनाए रखने, किसानों के पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखने और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ फसलों को प्रतिरोधी बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।

इसके साथ ही, ‘BRICS Agrin’ (एग्रो इनपुट जेनेटिक रिसोर्सेज एंड Information Network) की स्थापना की गई है। यह नेटवर्क सदस्य देशों के बीच कृषि आदानों, बीजों और आनुवंशिक संसाधनों के क्षेत्र में सूचनाओं का आदान-प्रदान, क्षमता निर्माण और तकनीकी साझेदारी को सुदृढ़ करेगा।

ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों के साथ मांडू का भ्रमण करते केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान

लैब से लैंड का फॉर्मूला: ब्राजील से इंदौर तक का सफर

अनुसंधान अक्सर प्रयोगशालाओं (लैब) में बंद रह जाते हैं और उन्हें खेतों (लैंड) तक पहुंचने में सालों लग जाते हैं। इस दूरी को मिटाने के लिए ब्राजील में बने ‘ब्रिक्स एग्रीकल्चरल रिसर्च प्लेटफॉर्म’ को और अधिक सुदृढ़ करते हुए उसे एक सशक्त ‘Knowledge to Action Hub’ के रूप में विकसित करने पर सहमति बनी है। इसके तहत कोई भी नई कृषि तकनीक या नवाचार किसी एक देश या कुछ अमीर कॉर्पोरेट्स के पास सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसका तेजी से प्रसार कर व्यावहारिक समाधान सीधे किसानों को दिए जाएंगे।

कटाई से लेकर बाजार तक जाने के बीच होने वाले ‘फूड लॉस’ (खाद्य हानि) और खाद्यान्न की बर्बादी को रोकने के लिए भी कड़े कदम उठाए गए हैं। खाद्यान्न की बर्बादी न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाती है, बल्कि इसके सड़ने से भारी मात्रा में कार्बन गैसों का उत्सर्जन होता है जो पर्यावरण को तबाह कर रहा है। ब्रिक्स देश अब इस बर्बादी को शून्य पर लाने के लिए संयुक्त तकनीकी मिशन चलाएंगे।

आर्थिक युद्ध के बीच ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंजऔर पारदर्शी व्यापार की नींव

वैश्विक व्यापार में जारी खींचतान और प्रतिबंधों की राजनीति के बीच ब्रिक्स समूह ने एक निष्पक्ष, समतामूलक, समावेशी और पारदर्शी बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। व्यापार को सरल बनाने, कस्टम की अड़चनों को दूर करने और एक-दूसरे के बाजारों तक आसान पहुंच बनाने के लिए सदस्य देशों के बीच द्विपक्षीय (वन-टू-वन) बैठकें हुईं।

इसी क्रम में, भारत द्वारा आयोजित विशेष संवाद ने ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज (अनाज विनिमय) की पहल पर विचार-विमर्श को एक नई और निर्णायक गति दी है। यह एक्सचेंज आने वाले समय में डॉलर के प्रभुत्व और पश्चिमी देशों के बाजार नियंत्रण को सीधी चुनौती देने की क्षमता रखता है। इसके अलावा, दक्षिण-दक्षिण सहयोग, तकनीकी साझेदारी, कौशल विकास और कृषि क्षेत्र में अनुभवों के आदान-प्रदान को इस डिक्लेरेशन में स्पष्ट रूप से परिलक्षित किया गया है।

पशुधन प्रबंधन, मत्स्य पालन और अल नीनो का रक्षा कवच

जलवायु परिवर्तन के कारण जब प्रशांत महासागर में ‘अल नीनो’ का खतरा मंडरा रहा है और एशिया-पैसिफिक देशों की फसलें सूखने की कगार पर हैं, तब इंदौर बैठक में इससे निपटने के लिए एक संयुक्त आपदा प्रबंधन प्रणाली और सूचना तंत्र विकसित करने पर सहमति बनी है।

इसके साथ ही, पशुधन प्रबंधन के क्षेत्र में नए टीकों का विकास, संक्रामक बीमारियों से मुकाबले की तैयारी और पशुओं के लिए उन्नत चारे (फीड) की व्यवस्था पर तकनीकी सहयोग बढ़ाया जाएगा। एडवांस्ड फिशरीज और एक्वा कल्चर डेवलपमेंट (मत्स्य पालन और झींगा पालन) के क्षेत्र में भी आधुनिक तकनीकों को साझा करने की प्रतिबद्धता जताई गई है।

खाद की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भारत सरकार का महा-ऐलान

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब एक पत्रकार ने यूक्रेन-रूस संकट और ईरान-इराक क्षेत्र के तनाव के कारण सल्फ्यूरिक एसिड, पेस्टिसाइड और फर्टिलाइजर की डेढ़ से दो गुना बढ़ती कीमतों और किसानों की बढ़ती लागत पर सवाल उठाया, तो कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बेहद कड़ा और लोक-कल्याणकारी रुख अपनाया।

उन्होंने देश के करोड़ों किसानों को आश्वस्त करते हुए बड़ा एलान किया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें चाहे जो भी हों, भारत सरकार अपनी जेब से अतिरिक्त भार उठाएगी, लेकिन किसानों को महंगी खाद नहीं बिकने देगी। भारत में यूरिया की बोरी 266 रुपये में और डीएपी (DAP) की बोरी 1350 रुपये में ही मिलती रहेगी। इस संकट की स्थिति में अपने किसानों के साथ मजबूती से खड़ा रहना सरकार का धर्म है और इसके लिए हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार भारत सरकार पूरी तरह खुद वहन कर रही है। देश में खरीफ की फसल के लिए पर्याप्त मात्रा में फर्टिलाइजर स्टॉक मौजूद है और रबी के लिए भी पुख्ता व्यवस्था की जा रही है।

कम रकबे में बंपर पैदावार और 3000 से ज्यादा एग्री स्टार्टअप्स का कमाल

बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण लगातार कम हो रहे कृषि के रकबे और कॉलोनियां कटने से सिकुड़ते खेतों पर चिंता जताते हुए कृषि मंत्री ने कहा कि अब कम रकबे पर ज्यादा और पोषण युक्त उत्पादन कैसे हो, इसके लिए ‘इंटीग्रेटेड फार्मिंग’ और आधुनिक वर्टिकल व डिजिटल कृषि नवाचारों पर काम किया जा रहा है।

खेती को युवाओं के लिए आकर्षक और मुनाफे का सौदा बनाने के लिए भारत सरकार ‘रफ्तार’ जैसी अनेक प्रोत्साहन योजनाएं चला रही है। इसी का परिणाम है कि आज भारत में 3000 से ज्यादा कृषि स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं, जिन्हें देश के युवा वैज्ञानिक और उद्यमी चला रहे हैं। छोटे किसानों तक ड्रोन, रोबोटिक्स और महंगी कंबाइन मशीनें पहुंचाने के लिए देश भर में 64,000 कस्टम हायरिंग सेंटर्स और सहकारी समितियां सफलतापूर्वक काम कर रही हैं, जिससे छोटा किसान भी बहुत कम किराए पर आधुनिकतम तकनीक का लाभ उठाकर अपनी लागत कम कर रहा है।

इंदौर के मेघदूत गार्डन में स्थापित हुई ब्रिक्स वाटिका

ग्लोबल पार्क और यूरो-रशियन पार्क की ऐतिहासिक कड़ियों में एक और नया अध्याय जोड़ते हुए, इंदौर के प्रसिद्ध मेघदूत गार्डन में सुबह 09:00 बजे सभी सदस्य देशों के कृषि मंत्रियों और विदेशी डेलीगेट्स ने मिलकर व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक आह्वान “एक पेड़ मां के नाम” की पावन भावना को आगे बढ़ाते हुए यहां एक भव्य ब्रिक्स वाटिका की स्थापना की गई, जो इस ऐतिहासिक बैठक की स्मृतियों को हमेशा जीवंत रखेगी।

शिवराज सिंह चौहान ने मालवा की समृद्ध और आत्मीय परंपरा के अनुरूप मेहमानों का सत्कार करने के लिए इंदौर की जनता, मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश सरकार की पूरी टीम को हृदय से धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि इंदौर की ‘छप्पन दुकान’ का स्वाद, ‘राजवाड़ा’ की भव्यता और ‘मांडू’ का ऐतिहासिक भ्रमण विदेशी मेहमानों के दिलों में हमेशा के लिए अंकित हो गया है। यह पूरा आयोजन भारत सरकार के विदेश विभाग, पशुपालन-मछली पालन विभाग, कॉमर्स, फूड प्रोसेसिंग और नीति आयोग के होल ऑफ गवर्नमेंट अप्रोच (संपूर्ण सरकार का दृष्टिकोण) की अभूतपूर्व सफलता का प्रतीक है, जिसने एक साथ इतने बड़े और सर्वसम्मत फैसले दुनिया के सामने रखकर इतिहास रच दिया है।

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ताजपुर में गरीबों के निवाले पर सरकारी डाका! 3867 राशनकार्ड रद्द होने से भड़का आक्रोश, मोतीपुर में सड़क पर उतरे आम लोग,

बुलडोजर राज और महंगाई के खिलाफ खेग्रामस-माले का बिगुल, मांगें पूरी नहीं हुईं तो थमेगा चक्का

ताजपुर। ताजपुर प्रखंड में सरकारी तंत्र द्वारा गरीबों को भूखे मारने की एक बड़ी साजिश सामने आई है। यहाँ एक झटके में गरीब, मजदूर और अत्यंत पिछड़े वर्ग के लोगों के 3867 राशनकार्ड अचानक रद्द कर दिए गए हैं। सरकार के इस तुगलकी फरमान के खिलाफ शनिवार को मोतीपुर में खेग्रामस (अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर सभा) और भाकपा माले के नेतृत्व में विरोध मार्च निकाला गया। मार्च में शामिल ग्रामीणों और कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

महंगाई और बेरोजगारी के बीच खाद्यान्न संकट : आक्रोश मार्च को संबोधित करते हुए माले प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि एक तरफ देश में महंगाई और बेरोजगारी चरम पर है, वहीं दूसरी तरफ सरकार गरीबों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं में कटौती कर उनके पेट पर लात मार रही है। राशनकार्ड रद्द होने से हजारों परिवारों के सामने अचानक दाने-दाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। उन्होंने मांग की कि सभी रद्द राशनकार्डों को बिना किसी देरी के तुरंत बहाल किया जाए।

ताजपुर प्रखंड के मोतीपुर में रद्द किए गए 3867 राशनकार्डों को बहाल करने, बुलडोजर राज पर रोक लगाने और वास-आवास के अधिकार को लेकर बैनर थामकर विरोध प्रदर्शन करते खेग्रामस एवं भाकपा माले के नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह व अन्य ग्रामीण कार्यकर्ता।

बुलडोजर राज और वासभूमि पर आर-पार की जंग इस दौरान वक्ताओं ने मनरेगा को प्रभावी ढंग से दोबारा चालू कर सभी जरूरतमंद ग्रामीण परिवारों को नियमित रोजगार देने की मांग उठाई। साथ ही, भूमिहीन गरीबों को वासभूमि व पक्का मकान देने और सूबे में चल रहे ‘बुलडोजर राज’ पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई। नेताओं ने साफ कहा कि गरीबों और वंचितों के अधिकारों पर हो रहे इस प्रशासनिक हमले को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

प्रखंड कमिटी सदस्य ललन दास ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर प्रशासन ने जल्द ही इन रद्द राशनकार्डों को बहाल नहीं किया और गरीबों की मांगें नहीं मानीं, तो आने वाले दिनों में चक्का जाम कर एक व्यापक आंदोलन खड़ा किया जाएगा। इस विरोध मार्च में मुख्य रूप से सुशील सहनी, विभा देवी, देबकी सहनी, चंदन सहनी, राजकुमारी देवी, अनुठिया देवी समेत भारी संख्या में स्थानीय महिलाएं, पुरुष और खेग्रामस के जुझारू कार्यकर्ता शामिल रहे।

ताजपुर में गुंडाराज का तांडव! व्यवसायियों पर गोलियां, 22 जून को थाना का घेरााव

ताजपुर। एक तरफ जहां आम जनता सरकारी नीतियों से त्रस्त है, वहीं दूसरी तरफ अपराधियों के तांडव से ताजपुर दहल उठा है। लगातार बढ़ रही हत्या, लूट और गोलीबारी की वारदातों के कारण लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। बिहार राज्य व्यवसाई संघ और भाकपा माले ने बढ़ते अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने में पुलिस की घोर विफलता के विरोध में 22 जून 2026 को ताजपुर थाना का पूर्ण घेराव करने का एलान किया है।

ताजपुर के राजधानी चौक स्थित चौधरी किराना स्टोर के मालिक नरेश चौधरी पर दुकान बंद करते समय अपराधियों ने की फायरिंग। बचने के प्रयास में उनके बांया हाथ में लगी गोली। घायल के इलाज की तस्‍वीर

किराना दुकानदार को मारी गोली, मरे जा रहे बेगुनाह  : बीती रात अपराधियों ने राजधानी चौक स्थित एक किराना दुकान में घुसकर दुकानदार नरेश चौधरी को गोली मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया। घायल व्यवसाई से मिलकर उनका हालचाल जानने के बाद माले प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह, प्रखंड कमिटी सदस्य सह व्यवसाई मो० एजाज और बिहार राज्य व्यवसाई संघ के राज्य कमिटी सदस्य सह व्यवसाई प्रभात रंजन गुप्ता ने पुलिस प्रशासन को निकम्मा करार दिया।

नेताओं ने याद दिलाया कि इससे पहले 15 मई को गांधी चौक के पास मोटरसाइकिल मिस्त्री संजीव सहनी की दिनदहाड़े बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इन बेतहाशा आपराधिक घटनाओं ने व्यापारियों और आम नागरिकों के बीच भारी भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है।

आर-पार की लड़ाई का एलान नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि अपराधियों की जल्द गिरफ्तारी नहीं हुई और बढ़ते अपराध पर प्रभावी रोक नहीं लगी, तो 22 जून 2026 को जनता मैदान से एक विशाल आक्रोश जुलूस निकाला जाएगा, जो ताजपुर थाना का घेराव कर पुलिसिया निष्क्रियता के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन करेगा।

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