विशेष रिपोर्ट : एस. एस. कुमार ‘पंकज’
वर्ष 2026 भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ है। देश की पहली पूर्णतः ‘राष्ट्रीय डिजिटल जनगणना‘ धरातल पर उतर चुकी है। हाथ में टैबलेट और मोबाइल ऐप लिए प्रगणक देश के कोने-कोने में जातियों और उप-जातियों का मुकम्मल आंकड़ा जुटा रहे हैं। सत्ता के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक बहस गर्म है कि इस नए डेटा से राजनीति, आरक्षण और विकास का क्या खाका तैयार होगा।
500 साल पहले गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य (जैसे रामचरितमानस और कवितावली) में जिन लगभग 23 जातियों और सामाजिक वर्गीकरणों का उल्लेख मिलता है, उनका संदर्भ आज के बदलते भारत में पूरी तरह बदल चुका है। तुलसीदास के समय में जातियों का उल्लेख तत्कालीन सामंतवादी व्यवस्था, श्रम-विभाजन और सामाजिक सोपानक्रम को दर्शाने के लिए हुआ था, जहाँ पहचान जन्म और पारंपरिक पेशों से बंधी थी। लेकिन आज, लोकतांत्रिक मूल्यों, शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों ने उस रूढ़िवादिता को काफी हद तक तोड़ा है।

वर्ष 2026 की राष्ट्रीय डिजिटल जनगणना इस संदर्भ में एक युगांतकारी और नया अध्याय लिखने जा रही है। पारंपरिक और केवल कागजी अनुमानों से इतर, यह डिजिटल जनगणना देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने का एक सटीक, वास्तविक और वैज्ञानिक डेटा सामने लाएगी। यह डेटा सदियों पुरानी जातियों को केवल एक ‘पहचान’ या ‘भेदभाव’ के चश्मे से देखने के बजाय, उनकी वर्तमान आर्थिक स्थिति, साक्षरता और संसाधनों तक उनकी पहुँच का सटीक मूल्यांकन करेगा। इसके परिणामस्वरूप, नीतियां किसी मध्यकालीन सामाजिक ढांचे के आधार पर नहीं, बल्कि 21वीं सदी की व्यावहारिक जरूरतों और डिजिटल पारदर्शिता के आधार पर बनेंगी, जो तुलसीकालीन संदर्भों को पूरी तरह से आधुनिक विकास की मुख्यधारा में पुनर्परिभाषित कर देगा।
लेकिन, क्या आप जानते हैं कि आज से ठीक 500 साल पहले, मध्यकाल के अवध और ब्रज में एक कवि ने बिना किसी आधुनिक तकनीक या सरकारी बजट के, अपने दौर के समाज का एक ऐसा ही सटीक ‘साहित्यिक सेंसस’ तैयार कर दिया था?
जी हां, हम बात कर रहे हैं महाकवि गोस्वामी तुलसीदास और उनकी अमर कृतियों की। अक्सर धार्मिक और आध्यात्मिक चश्मे से देखे जाने वाले तुलसी-साहित्य में सामाजिक बुनावट का एक ऐसा प्रामाणिक डेटा छिपा है, जिसे आज के दौर में ‘खबरों की सोने की खान’ (गोल्ड माइन) कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

तुलसीदास का ‘काल्पनिक सेंसस‘: कोई भी हिस्सा अछूता नहीं
अकादमिक रिसर्च और भाषाई विश्लेषण से यह साफ होता है कि तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य श्रीरामचरितमानस, कवितावली, विनयपत्रिका और रामलला नहछू जैसी रचनाओं में पारंपरिक चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) सहित कुल 23 सामाजिक समूहों और विशिष्ट जातियों का स्पष्ट उल्लेख किया है।
यह संख्या कोई सामान्य संयोग नहीं है। यह इस बात का साहित्यिक प्रमाण है कि मध्यकालीन भारत की सामाजिक-आर्थिक रीढ़ कौन सी जातियां थीं। तुलसीदास ने राजा-महाराजाओं के वैभव के साथ-साथ जंगलों में रहने वाले आदिवासियों, नदियों के जलपुत्रों, और गांवों के गली-कूचों में पसीना बहाने वाले शिल्पकारों को अपने काव्य में मुख्यधारा का स्थान दिया।
जल, जंगल से लेकर सत्ता की धुरी तक: इन 23 समूहों की बानगी
इस विशेष सीरीज में हम उन सभी 23 सामाजिक समूहों की पड़ताल करेंगे, जिनका जिक्र तुलसीदास ने अलग-अलग संदर्भों में किया है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
- वन के राजा और सीमांत समाज: कोल, किरात, भील, सबर (शबरी) और ‘खस’ (हिमालयी क्षेत्र की जनजाति)।
- नदियों के जलपुत्र: निषाद और केवट, जो आज उत्तर भारत की राजनीति का रुख तय कर रहे हैं।
- गोपालक वर्ग : अहीर (यादव/गोप) जो मध्यकाल में पूरी तरह पारंपरिक आजीविका से जुड़े थे, लेकिन 2026 की राजनीतिक मैपिंग में सत्ता के एक बड़े स्तंभ बन चुके हैं।
- व्यावसायिक धुरी : तेली और कलवार समाज—जो मध्यकाल में पूरी तरह पारंपरिक आजीविका से जुड़े थे,आज विभिन्न अलग अलग व्यवसायों में हिस्सेदारी रखते हैं,
- लोक-शिल्पी और कामगार महिलाएं: रामलला नहछू की वो 5 कर्मठ महिलाएं—नाइन, अहिरिन, तम्बोलिन, दरजिन, मालीन और पटुआरिन, जिनकी आजीविका पर आज मशीनीकरण और कॉर्पोरेट ब्रांड्स का साया है।
- कारीगर और बुनकर वर्ग: कुम्हार (प्रजापति) और जुलाहा (बुनकर) समाज, जो आज के प्लास्टिक और पावरलूम के दौर में वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं।
- हाशिए का मनोरंजन और सांस्कृतिक समाज: नट, भाट, यवन और श्वपच (चांडाल/सफाई कर्मी समाज)।

दो विरोधाभासी संदर्भ: भक्ति की समरसता बनाम कलयुग का यथार्थ
तुलसीदास के साहित्य में इन जातियों को लेकर दो बेहद दिलचस्प और विरोधाभासी पहलू देखने को मिलते हैं, जो आज के लिए सबसे बड़ा रिसर्च पॉइंट हैं:
1. अध्यात्म में परम समरसता (बालकाण्ड, दोहा 194)
“स्वपच सबर खस जमन जड़ पामर कोल किरात। रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात॥”
अर्थात्: समाज में जिन्हें सबसे पिछड़ा या प्रतिष्ठा-विहीन माना गया, वे भी राम का नाम लेकर परम पवित्र और पूजनीय हो जाते हैं। यहाँ तुलसीदास एक प्रगतिशील समाज सुधारक के रूप में उभरते हैं।
2. उत्तरकाण्ड का कड़वा यथार्थ (दोहा 98 क के बाद)
वही तुलसीदास जब उत्तरकाण्ड में कलयुग की विसंगतियों का वर्णन करते हैं, तो तत्कालीन सामाजिक उथल-पुथल को दर्ज करते हुए लिखते हैं:
“जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा॥”
मध्यकाल का यह सामंती यथार्थ आज 2026 में पूरी तरह बदल चुका है। जिन व्यावसायिक जातियों के उभार को तब कलयुग का लक्षण माना गया था, आज लोकतंत्र और आरक्षण के संवैधानिक अधिकारों की बदौलत वही जातियां उत्तर भारत की राजनीति और अर्थशास्त्र का एजेंडा तय कर रही हैं।
तुलसी-साहित्य में वर्णित 23 जातियों का प्रामाणिक संदर्भ
| क्र. सं. | जाति / वर्ण का नाम | पारंपरिक जीविका / कार्य | संबंधित पुस्तक का नाम | किस पंक्ति / दोहा / पद में चर्चा (सटीक संदर्भ) |
| 1 | ब्राह्मण / विप्र / भूसुर | वेदाध्ययन, यज्ञ-अनुष्ठान कराना, शिक्षा देना, समाज का आध्यात्मिक मार्गदर्शन | • श्रीरामचरितमानस • दोहावली • विनयपत्रिका | • मानस में सर्वत्र (जैसे- बालकाण्ड में भृगुनाथ प्रसंग, उत्तरकाण्ड में विप्र-महिमा) • दोहावली में ब्राह्मण के कर्तव्यों का वर्णन |
| 2 | क्षत्रिय / राजपूत | राजकाज संभालना, प्रजा की रक्षा करना, युद्ध और सीमा सुरक्षा | • श्रीरामचरितमानस • कवितावली | • बालकाण्ड (राम-लक्ष्मण का क्षत्रिय रूप) • कवितावली (उत्तरकाण्ड, छंद 106 – “राजपूत कहौ जोलहा कहौ कोऊ”) |
| 3 | वैश्य / बनिक | व्यापार, वाणिज्य, कृषि प्रबंधन और अन्न-धन का लेन-देन | • श्रीरामचरितमानस • कवितावली | • उत्तरकाण्ड (कलयुग में वैश्य स्थिति) • कवितावली (छंद 84 – “किसबी, किसान-कुल, बनिक”) |
| 4 | कोल | वनोपज संग्रह (लकड़ी, फल, शहद आदि एकत्र करना) | • श्रीरामचरितमानस • विनयपत्रिका • गीतावली | • बालकाण्ड (दोहा 194), अयोध्याकाण्ड (दोहा 134, दोहा 249), उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क) • विनयपत्रिका (पद 165), गीतावली |
| 5 | किरात | वनों में तीर-कमान से आखेट (शिकार) करना | • श्रीरामचरितमानस • बरवै रामायण • विनयपत्रिका | • बालकाण्ड (दोहा 194), अयोध्याकाण्ड (दोहा 134, दोहा 98 क), अरण्यकाण्ड (अंत) • बरवै रामायण (बरवै 23), विनयपत्रिका (पद 165) |
| 6 | भील / भीलनी | पर्वतीय क्षेत्रों में आखेट व वन-उत्पादों का संग्रह | • श्रीरामचरितमानस • गीतावली | • अयोध्याकाण्ड (दोहा 134 के बाद की चौपाई) • गीतावली (अयोध्याकाण्ड के पद) |
| 7 | सबर / शबरी | कंद-मूल, फल और जंगली औषधियाँ एकत्र करना | • श्रीरामचरितमानस • विनयपत्रिका | • बालकाण्ड (दोहा 194), अरण्यकाण्ड (शबरी प्रसंग) • विनयपत्रिका (पद 160) |
| 8 | निषाद / केवट | नाव चलाना (मल्लाह), नदी पार कराना, मछली पकड़ना | • श्रीरामचरितमानस • विनयपत्रिका • रामाज्ञा प्रश्न | • अयोध्याकाण्ड (दोहा 101, दोहा 194) • विनयपत्रिका (पद 165 – “नीच निषाद समाजू”) |
| 9 | तेली | तिलहन (सरसों, तिल आदि) से तेल निकालना और बेचना | • श्रीरामचरितमानस | • उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क के बाद – “जे बरनाधम तेलि कुम्हारा”) |
| 10 | कुम्हार | मिट्टी के बर्तन, घड़े, दीये और खपरैल बनाना | • श्रीरामचरितमानस | • उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क के बाद – कलयुग वर्णन) |
| 11 | कलवार | राजसैनिको के लिए भोजन(कलेउ) की व्यवस्था करना, पारंपरिक रूप से मदिरा (शराब) बनाना और उसका व्यापार | • श्रीरामचरितमानस | • उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क के बाद – कलयुग वर्णन) |
| 12 | अहीर / अहिरिन / गोप | पशुपालन, दुग्ध उत्पादन (दूध, दही, माखन बेचना) | • श्रीरामचरितमानस • रामलला नहछू • श्रीकृष्ण गीतावली | • अरण्यकाण्ड (अंत का सोरठा) • रामलला नहछू (पद 6 – “गोरस लै आइ अहीरिनि”) • श्रीकृष्ण गीतावली (बाललीला व भ्रमरगीत) |
| 13 | नाइन (नाई) | मांगलिक उत्सवों में नाखून काटना, पैर धोना, महावर लगाना | • रामलला नहछू | • रामलला नहछू (पद 5 – “गौरी सुंदर नाइन हाथ कँकन”) |
| 14 | तम्बोलिन (तमोली) | पान की खेती करना और उत्सवों में पान के बीड़े परोसना | • रामलला नहछू | • रामलला नहछू (पद 7 – “ताँबुल कें पान तँबोलिनि”) |
| 15 | दरजिन (दर्जी) | समाज के लिए वस्त्रों और पोशाकों की सिलाई करना | • रामलला नहछू | • रामलला नहछू (पद 8 – “रेशम कै बागो दरिजिनि”) |
| 16 | मालीन (माली) | बाग-बगीचों की देखभाल, फूल चुनना और माला/सेहरा गूंथना | • रामलला नहछू | • रामलला नहछू (पद 9 – “कनक कँवल कर मालीन”) |
| 17 | पटुआरिन (पटवा) | रेशम/सूत के धागे गूंथना, सेहरे की गोट या डोरी बनाना | • रामलला नहछू | • रामलला नहछू (पद 10 के आसपास के पद) |
| 18 | जुलाहा | हथकरघे पर सूत से कपड़ा बुनने का कार्य | • कवितावली | • उत्तरकाण्ड (छंद 106 – “राजपूत कहौ jolha कहौ कोऊ”) |
| 19 | नट | कलाबाज़ी, शारीरिक करतब और गायन ग्रामीण क्षेत्र में रहकर से मनोरंजन करना | • श्रीरामचरितमानस • कवितावली | • रामचरितमानस (सांकेतिक उल्लेख) • कवितावली (छंद 84 – “चपल नट, चोर, चार”) |
| 20 | भाट | वंशावली रखना, राजाओं/उत्सवों में कीर्ति-गान करना | • कवितावली | • उत्तरकाण्ड (छंद 84 – “भिखारी, भाट, चाकर”) |
| 21 | खस | हिमालयी क्षेत्रों में पशुपालन और सीमांत सुरक्षा/लड़ाके | • श्रीरामचरितमानस | • बालकाण्ड (दोहा 194), अरण्यकाण्ड (अंत का सोरठा) |
| 22 | श्वपच (चांडाल) | श्मशान व्यवस्था, अंत्येष्टि और साफ-सफाई का कार्य | • श्रीरामचरितमानस • विनयपत्रिका | • बालकाण्ड (दोहा 194), उत्तरकाण्ड (दोहा 98 क) • विनयपत्रिका (पद 160) |
| 23 | यवन / जमन | मध्यकाल में सैनिक, प्रशासनिक या बाहरी समूहों के रूप में | • श्रीरामचरितमानस | • बालकाण्ड (दोहा 194), अरण्यकाण्ड (अंत का सोरठा) |
भौगोलिक विस्तार: ये जातियाँ आज भारत के किन क्षेत्रों में रहती हैं?
गोस्वामी तुलसीदास रचित कृतियाँ केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि वे मध्यकालीन भारतीय समाज का एक सजीव सामाजिक दस्तावेज़ भी हैं। इतिहासकार और समाजशास्त्री मानते हैं कि तुलसीदास जी ने अपने समय के समाज में रची-बसी जिन कड़ियों का उल्लेख किया था, वे सभी आज भी भारत में पूरी तरह अस्तित्व में हैं। हालाँकि, समय के चक्र, आधुनिक अर्थव्यवस्था और लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कारण इन जातियों के भौगोलिक विस्तार, सामाजिक स्थिति और आजीविका के साधनों में व्यापक बदलाव आया है।

तुलसीदास जी की रचनाओं की पृष्ठभूमि मुख्य रूप से अवध (मध्य उत्तर प्रदेश), ब्रज (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) और चित्रकूट-बुंदेलखंड क्षेत्र रही है। लेकिन आज इन जातियों का विस्तार पूरे भारत में है:
- गंगा-यमुना का मैदानी क्षेत्र (उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश): अहिर (यादव), तेली, कुम्हार, निषाद/केवट/मल्लाह, कलवार, नाई, तमोली, दर्जी, माली, पटवा, नट, जुलाहा, भाट और श्वपच (वाल्मीकि/डोम/सफ़ाई कर्मी समाज) मुख्य रूप से इन राज्यों के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में घनी आबादी में निवास करते हैं।
- मध्य भारत और दक्कन के वन क्षेत्र (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, राजस्थान, महाराष्ट्र): कोल, भील, किरात और सबर (शबरी की जाति) जैसी वनवासी और आदिवासी जनजातियाँ मुख्य रूप से विंध्याचल, सतपुड़ा, अरावली और छोटानागपुर के पठारी व जंगली अंचलों में पाई जाती हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में ‘भील’ जनजाति की बहुत बड़ी आबादी है।
- हिमालयी और सीमांत क्षेत्र: ‘खस’ जाति मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
- यवन / जमन: मध्यकाल का यह संदर्भ आज भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में पूरे देश के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में समाहित है।

समकालीन स्थिति: आज इनके क्या हालात हैं?
आधुनिक भारत में इन जातियों की स्थिति को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता। आज इनके हालात में शहरीकरण, शिक्षा, आरक्षण नीति और राजनीतिक चेतना के कारण भारी विविधता आई है। इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में समझा जा सकता है:
1. राजनीतिक और सामाजिक रूप से सशक्त वर्ग
- अहीर (यादव): आज यह समाज केवल पशुपालन या दुग्ध उत्पादन तक सीमित नहीं है। हरित क्रांति और उत्तर भारत की राजनीति (विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार) में इस समाज ने बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति हासिल की है। शिक्षा, कृषि, व्यापार, सेना और सरकारी नौकरियों में इस वर्ग की स्थिति बेहद मजबूत हुई है।
- कलवार और तेली: पारंपरिक रूप से तेल पेराई और अन्य व्यवसाय से जुड़े ये समाज आज ‘वैश्य’ वर्ग के अंतर्गत बड़े व्यापारिक और व्यावसायिक समूहों के रूप में स्थापित हो चुके हैं। शहरी क्षेत्रों में इनका झुकाव आधुनिक व्यापार, किराना, रियल एस्टेट और राजनीति की ओर हुआ है, जिससे इनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ है, वहीं ग्रामीण क्षेत्र में रहकर व्यापार करने वाले ये समूह कुछ हद तक ठीक हैं ।व्यापार में अन्य जातियों के शामिल होने से अब इन वर्गों को कड़े संघर्ष का सामना करना पर रहा है।
2. आधुनिक तकनीक और मशीनीकरण से जूझता कामगार वर्ग
- कुम्हार (प्रजापति), दर्जी, माली, नाई (सेंथवार/ठाकुर) और पटवा: इन जातियों के पारंपरिक कार्यों का आज “मशीनीकरण” और “कॉर्पोरेटाइजेशन” हो गया है।
- मिट्टी के बर्तनों की जगह प्लास्टिक और स्टील ने ले ली है, जिससे कुम्हारों को अब केवल दीवाली या त्योहारों पर बाज़ार मिलता है, लेकिन यह बाजार चाइनीज लडियों के कारण खत्म हो रहा है।
- नाई समाज अब आधुनिक ‘सैलून और पार्लर’ उद्योग में बदल चुका है; जिन्होंने तकनीक अपनाई वे आर्थिक रूप से समृद्ध हुए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक कामगार अब भी संघर्ष कर रहे हैं।
- दर्जी समाज आज रेडीमेड कपड़ों के बड़े उद्योगों और बुटीक संस्कृति से प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
- तमोली और पटवा समाज भी पारंपरिक खेती से हटकर अन्य छोटे-मोटे व्यवसायों या नौकरियों की तरफ रुख कर चुका है।

3. जल और जंगल पर निर्भर समाज (चुनौतियों का सामना करता वर्ग)
- निषाद / केवट / मल्लाह: नदियों पर पुल बन जाने, मशीनी नावों के आ जाने और जल निकायों के ठेके बड़े ठेकेदारों के पास चले जाने के कारण इस समाज की पारंपरिक आजीविका संकट में आई है। हालाँकि, हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश और बिहार में इस समाज के भीतर बहुत तीव्र ‘राजनीतिक लामबंदी’ देखी गई है, जिससे शासन-प्रशासन में इनका प्रतिनिधित्व बढ़ा है।
- कोल, भील और सबर: ये वनवासी समाज आज सरकार की ‘अधिसूचित जनजातियों’ (ST) की सूची में शामिल हैं। जंगलों के कट ऑफ होने और कड़े वन कानूनों के कारण इनका पारंपरिक आखेट और वनोपज संग्रह का काम लगभग बंद हो चुका है। आज ये मुख्य रूप से कृषि मजदूरी, खनन और निर्माण कार्यों में श्रम करते हैं। शिक्षा के प्रसार के बावजूद, दूरदराज के क्षेत्रों में रहने के कारण विकास की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए इन्हें आज भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।
4. कला, सीमांत और अन्य श्रमिक वर्ग
- नट और भाट: मनोरंजन के आधुनिक साधनों (टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट) ने नटों की पारंपरिक रस्सी की कलाबाज़ी और भाटों की गायन विधा को हाशिए पर धकेल दिया है। यह समाज अब लोक-कलाकार के रूप में या फिर दिहाड़ी मजदूरी अपनाकर अपनी जीविका चला रहा है।
- जुलाहा: हथकरघा उद्योग के धीमे होने और पावरलूम के आ जाने से इस बुनकर समाज को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा है, लेकिन बनारसी और अन्य पारंपरिक साड़ियों के वैश्विक बाज़ार के कारण इसका एक हिस्सा आज भी अपनी कला को जीवित रखे हुए है।
- श्वपच (दलित/सफ़ाई कर्मी समाज): कलयुग वर्णन में जिस समाज का उल्लेख है, वह आज कानूनी और संवैधानिक संरक्षण (SC वर्ग) के दायरे में है। बाबासाहेब अंबेडकर के आंदोलन और शिक्षा के प्रसार से इस समाज के युवाओं ने प्रशासनिक सेवाओं और राजनीति में अपनी जगह बनाई है। हालाँकि, मैला ढोने जैसी कुप्रथाओं के खात्मे के बाद भी शहरी स्वच्छता व्यवस्था में इस वर्ग की बहुलता है और इनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए लगातार प्रयास जारी हैं।

डिजिटल पारदर्शिता से पुनर्परिभाषित होता ‘न्यू इंडिया‘
गोस्वामी तुलसीदास जी के साहित्य में वर्णित ये 23 जातियाँ आज के बदलते भारत (New India) का एक जीवंत हिस्सा हैं। मध्यकाल में जो जातियाँ केवल अपने ‘जन्म आधारित’ पारंपरिक कार्यों से बंधी हुई थीं, आज लोकतान्त्रिक अधिकारों, शिक्षा और संवैधानिक आरक्षण के कारण वे अपनी पारंपरिक सीमाओं को तोड़ रही हैं।
आज का ‘तेली’ या ‘अहीर’ केवल तेल या दूध तक सीमित नहीं है, और न ही ‘केवट’ केवल नाव तक। वे डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी और देश के नीति-निर्माता बन रहे हैं। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि भारत का सामाजिक ताना-बाना स्थिर नहीं, बल्कि प्रगतिशील और गतिशील है।
आज जब 1931 के बाद पहली बार देश में इस स्तर पर जातियों और उप-जातियों का डिजिटल डेटा एकत्र किया जा रहा है, तब अतीत के इन पन्नों को पलटना अनिवार्य हो जाता है।
- क्या 500 साल पहले जिन जातियों की आजीविका ‘जल-जंगल-जमीन’ और हस्तशिल्प पर टिकी थी, आज के कॉर्पोरेट और डिजिटल युग में उन्हें उनका हक मिल पाया?
- राम को कंद-मूल खिलाने वाले भील-किरात आज की आर्थिक मैपिंग में कहां खड़े हैं?
- विवाह उत्सवों में ‘नेग’ पाने वाली कामगार महिलाओं की कला क्या मॉल और ब्यूटी पार्लर्स के शोर में खो गई है?
“महागाथा सेंसस” की इस सीरीज में हम केवल साहित्यिक दोहों का विश्लेषण नहीं करेंगे, बल्कि मुजफ्फरपुर से लेकर देश के ग्रामीण अंचलों तक की ग्राउंड रियलिटी, इन्फोग्राफिक्स और 2026 के नए जनसांख्यिकीय आंकड़ों के साथ हर जाति की विकास यात्रा की मुकम्मल पड़ताल करेंगे।
बने रहिए हमारे साथ… अगली कड़ी में हम रुख करेंगे “वनवासी, सीमांत और आदिवासी समाज (जल-जंगल की विरासत)” की ओर, और जानेंगे कि राम को वन पार कराने वाले कोल-भीलों की स्थिति आज की डिजिटल मैपिंग में क्या है।
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