लेडी डॉन रिशुश्री का खुला राज: 3.5% कमीशन वाले इंजीनियर साहब समेत 3 अधिकारी सलाखों के पीछे
बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी फैल चुकी हैं, इसका अंदाजा विशेष निगरानी इकाई (एसवीयू) की इस ताजा और सबसे बड़ी कार्रवाई से लगाया जा सकता है। सचिवालय से लेकर तकनीकी विभागों तक फैले एक हाई-प्रोफाइल सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ है, जिसे पर्दे के पीछे से ‘लेडी डॉन’ की तरह ऑपरेट कर रही थी रिलायबल इन्फ्रा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की ओनर रिशुश्री।
रिशुश्री, जो विनोद कुमार सिन्हा की पुत्री है और पटना के मीठापुर, खगौल रोड स्थित कामता राम सखी एन्क्लेव के फ्लैट नंबर 5A से अपना पूरा साम्राज्य चला रही थी, उसने बिहार ब्यूरोक्रेसी के सबसे रसूखदार चेहरों को अपने जाल में फंसा रखा था। एसवीयू की जांच और मुख्य अभियुक्त रिशुश्री के इकबालिया बयान ने शासन के गलियारों में खलबली मचा दी है।

इस सिंडिकेट का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सच भवन निर्माण विभाग के सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता तारणी दास के रूप में सामने आया है। जांच में यह साबित हुआ है कि सरकारी फाइलों और करोड़ों रुपये के बिलों को पास करने के लिए तारणी दास सीधे 3.5% का नगद कमीशन वसूलते थे। यह कोई छोटा-मोटा लेन-देन नहीं था, बल्कि रिशुश्री और तारणी दास के बीच का यह फिक्स डील था, जिसने सरकार के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर बजट को खोखला कर दिया। इस काली कमाई के बूते तारणी दास के साथ-साथ वित्त विभाग के संयुक्त सचिव मुमुक्षु कुमार चौधरी और बुडको के कार्यपालक अभियंता उमेश कुमार सिंह आज सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं।
नोटों के पहाड़ पर सो रहे थे बिहार के ये 3 बड़े अधिकारी
जब कानून का डंडा चला और केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के साथ-साथ एसवीयू ने इन अधिकारियों के आलीशान ठिकानों के कमरों और तिजोरियों को खंगाला, तो वहां का नजारा देखकर जांच अधिकारी भी दंग रह गए। ये अधिकारी जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर सचमुच नोटों के पहाड़ पर सो रहे थे।
इन भ्रष्ट अधिकारियों के घरों से बरामद हुए अकूत कैश का ब्योरा इस प्रकार है:
| अधिकारी का नाम और पद | संबंधित विभाग | बरामद नगद राशि (कैश) | भ्रष्टाचार का तरीका / कमीशन |
| तारणी दास (सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता) | भवन निर्माण विभाग | 8.5 करोड़ रुपये | सरकारी विपत्रों (बिलों) को पास कराने के एवज में 3.5% नगद कमीशन। |
| मुमुक्षु कुमार चौधरी (तत्कालीन संयुक्त सचिव) | वित्त विभाग (पूर्व नगर आयुक्त, सीतामढ़ी/सहरसा) | 2.0 करोड़ रुपये | शहरी विकास परियोजनाओं के टेंडर अवैध रूप से रिशुश्री की कंपनियों को दिलाना। |
| उमेश कुमार सिंह (कार्यपालक अभियंता) | बुडको (नगर विकास एवं आवास विभाग) | 1.0 करोड़ रुपये | ड्रेनेज पंपिंग स्टेशन वर्क और अन्य निविदाओं में 1% का फिक्स नगद कमीशन। |
कुल बरामदगी: केवल इन तीन अधिकारियों के ठिकानों से 11.5 करोड़ रुपये की नगद राशि बरामद की जा
चुकी है। यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि बिहार में टेंडर जारी करने से लेकर बजट आवंटन तक का खेल पूरी तरह फिक्स था और फाइलों की रफ्तार नोटों की गड्डियों से तय होती थी।

सचिवालय से लेकर नगर निगम तक फैला था भ्रष्टाचार का जाल
एसवीयू के अपर पुलिस महानिदेशक पंकज कुमार दाराद द्वारा जारी आधिकारिक ब्योरे के अनुसार, यह पूरा मामला केवल कुछ करोड़ रुपये की रिश्वत का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राजकीय गोपनीयता से खिलवाड़ और संगठित सरकारी डकैती का है।
इस सिंडिकेट का नेटवर्क बेहद शातिर तरीके से काम करता था:
- मुमुक्षु कुमार चौधरी का खेल: मुमुक्षु कुमार चौधरी जब सीतामढ़ी में जिला विकास अभिकरण (डीआरडीए) के निदेशक थे, तब उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सीतामढ़ी के नगर आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार हासिल किया। इसके बाद वे सहरसा नगर निगम में भी नगर आयुक्त के पद पर तैनात रहे। इस दौरान उन्होंने रिशुश्री के साथ मिलकर नगर विकास और शहरी विकास परियोजनाओं के गुप्त टेंडर पेपर्स को पहले ही लीक कर दिया और रिशुश्री की कंपनियों के पक्ष में टेंडर फाइनल करवाए। इसके बदले उन्हें 2 करोड़ रुपये कैश दिए गए। वर्तमान में वे वित्त विभाग में संयुक्त सचिव जैसे अत्यंत संवेदनशील पद पर बैठकर इस पूरे खेल को वित्तीय संरक्षण दे रहे थे।
- उमेश कुमार सिंह की भूमिका: बुडको (बिहार शहरी आधारभूत संरचना विकास निगम) के कार्यपालक अभियंता के पद पर तैनात रहते हुए उमेश कुमार सिंह ने पटना और आसपास के क्षेत्रों में ड्रेनेज पंपिंग स्टेशन के निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया। रिशुश्री को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर की शर्तों को बदला गया और 1% कमीशन के लालच में सरकारी खजाने को भारी चपत लगाई गई। उनके घर से बरामद 1 करोड़ रुपये इसी कमीशनखोरी का हिस्सा हैं।

शासकीय गुप्तता अधिनियम और बीएनएस की गंभीर धाराएं: कानून का शिकंजा
यह मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एसवीयू ने इन आरोपियों के खिलाफ साधारण भ्रष्टाचार की धाराओं के साथ-साथ देश की सुरक्षा और प्रशासनिक गोपनीयता को भंग करने वाली धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है।
एसवीयू थाना कांड संख्या 05/2025 दिनांक 30.04.2025 के तहत दर्ज इस मामले में निम्नलिखित कड़ी धाराएं लगाई गई हैं:
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018): इसकी धारा 7A, 8, 9, 10 और 12 के तहत लोक सेवकों द्वारा अवैध परितोषिक (रिश्वत) लेने और निजी व्यक्तियों द्वारा उन्हें प्रभावित करने का अपराध।
- शासकीय गुप्तता अधिनियम 1923 (ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट): इसकी धारा 3(2), 6(2) और 15 के तहत सरकारी टेंडरों और गोपनीय दस्तावेजों को निजी कंपनियों को सौंपने का संगीन आरोप।
- भारतीय न्याय संहिता 2023 (बीएनएस): इसकी धारा 61 (आपराधिक साजिश), 318(4) (जालसाजी और धोखाधड़ी), 338 (फर्जी दस्तावेज बनाना) और 340(2) (फर्जी दस्तावेजों को असली के रूप में इस्तेमाल करना) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
जांच में यह पूरी तरह पुख्ता हो चुका है कि इन अधिकारियों ने लोक सेवक (पब्लिक सर्वेंट) होने के गौरव को ताक पर रखकर, आपराधिक षड्यंत्र के तहत सरकारी टेंडरों को हैक और फिक्स किया। इसके लिए बकायदा नकली दस्तावेज (फोर्ज्ड डॉक्यूमेंट्स) तैयार किए गए और सरकारी फाइलों में बड़े पैमाने पर हेरफेर (मैनिपुलेशन) की गई।

फरार आईएएस संजीव हंस: रसूखदार नाम पर एसवीयू का कसता फंदा
इस पूरे महाघोटाले और सिंडिकेट की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि इसका मुख्य सरगना और प्राथमिक अभियुक्त कोई और नहीं, बल्कि बिहार के बेहद रसूखदार आईएएस अधिकारी संजीव हंस हैं। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि इस पूरे नेटवर्क को संजीव हंस का सीधा संरक्षण प्राप्त था।
10.06.2026 की सुबह का घटनाक्रम: तड़के सुबह पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) के नेतृत्व में एसवीयू की 4 विशेष टीमों का गठन किया गया। इन टीमों ने एक साथ पटना स्थित आईएएस संजीव हंस के सरकारी और निजी आवास, कार्यालय तथा अन्य तीनों अधिकारियों के ठिकानों पर एक साथ धावा बोला। योजना बेहद गोपनीय थी, लेकिन छापेमारी की भनक लगते ही आईएएस संजीव हंस अपने आवास से फरार होने में सफल रहे।
एसवीयू के सूत्रों के अनुसार, संजीव हंस के ठिकानों से कई ऐसे डिजिटल दस्तावेज, व्हाट्सएप चैट और बेनामी संपत्तियों के कागजात हाथ लगे हैं, जो सीधे तौर पर इस टेंडर घोटाले में उनकी संलिप्तता को उजागर करते हैं। वर्तमान में वे अंडरग्राउंड हैं, और पुलिस की कई टीमें उनकी तलाश में बिहार से लेकर दिल्ली तक ताबड़तोड़ छापेमारी कर रही हैं। एसवीयू ने साफ कर दिया है कि संजीव हंस की गिरफ्तारी के बिना इस जांच का दायरा पूरा नहीं होगा और जल्द ही उनकी संपत्तियों को कुर्क करने की कानूनी प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान
इस पूरे प्रकरण ने बिहार की प्रशासनिक शुचिता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जब वित्त विभाग का संयुक्त सचिव, बुडको का कार्यपालक अभियंता, और भवन निर्माण विभाग का मुख्य अभियंता एक निजी कंपनी की महिला ओनर के साथ मिलकर सरकार की नीतियों और पैसों की नीलामी करने लगें, तो विकास योजनाओं की गुणवत्ता का भगवान ही मालिक है।
रिशुश्री के जरिए जल संसाधन विभाग, भवन निर्माण विभाग, नगर विकास एवं आवास विभाग और बीएमएसआईसीएल जैसे मलाईदार विभागों में टेंडर का जो खेल खेला गया, उसने यह साबित कर दिया है कि नीचे से लेकर ऊपर तक एक सुनियोजित सिंडिकेट काम कर रहा था। फिलहाल, तारणी दास, मुमुक्षु कुमार चौधरी और उमेश कुमार सिंह जेल की सलाखों के पीछे अपने पापों का हिसाब दे रहे हैं, जबकि एसवीयू आईएएस संजीव हंस को दबोचने के लिए जाल बिछा चुकी है। जांच एजेंसी का दावा है कि आने वाले दिनों में कुछ और बड़े सफेदपोश चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।
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