गरीब के बच्चों से धोखा बर्दाश्त नहीं! सजन आर का अल्टीमेटम—कोचिंग-ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षकों की सीधे जाएगी नौकरी!
बिहार के इतिहास में शिक्षा सुधार का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी कदम : पर्दे के पीछे शातिर शिक्षको का खेल नहीं चलेगा, रडार पर ‘मनी ट्रेल’,पकड़ना नहीं है मुश्किल,सरकार मांग सकती है शपथ पत्र, बैंक खातों की जांच से खुलेगा राज,
पटना: बिहार के शिक्षा गलियारे से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर आ रही है। सरकारी खजाने से हर महीने मोटी सैलरी उठाने वाले और प्राइवेट कोचिंग-स्कूलों में जाकर अपनी जेबें गर्म करने वाले शिक्षकों के खिलाफ बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने अंतिम और निर्णायक जंग का ऐलान कर दिया है। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने एक ऐसा विस्फोटक और सनसनीखेज आदेश जारी किया है, जिसने पूरे राज्य के शिक्षक महकमे की नींद उड़ा दी है। माध्यमिक शिक्षा के निदेशक सजन आर ने सीधे तौर पर राज्य के सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को लिखित रूप से हंटर चलाने का अल्टीमेटम थमा दिया है। इस नए और सख्त फरमान के मुताबिक, यदि कोई भी सरकारी स्कूल का शिक्षक अपने तय विद्यालय के समय में या उसके बाद किसी भी प्राइवेट स्कूल, कोचिंग संस्थान, निजी ट्यूशन या किसी भी प्रकार के व्यावसायिक केंद्र में अपनी सेवाएं देते हुए पाया गया, तो उसकी नौकरी सीधे चली जाएगी। विभाग ने इसे शिक्षकों के लिए बनाई गई आचार संहिता का खुला उल्लंघन माना है और साफ किया है कि अब गरीब के बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

पत्र संख्या 613 से थर्राया महकमा: सजन आर का सीधे ऐक्शन का ऑर्डर
शिक्षा विभाग के निदेशक सजन आर द्वारा जारी किए गए पत्र संख्या 11/नियमावली 1-1/2021 (अंश-1) 613 ने राज्य की पूरी प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। दिनांक 11-6-26 को पटना से निर्गत इस पत्र में साफ शब्दों में चेतावनी दी गई है कि सरकारी शिक्षकों की यह मनमानी अब और नहीं चलेगी। पत्र में इस बात का स्पष्ट और कड़ा उल्लेख है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य के प्राथमिक विद्यालयों से लेकर उच्च माध्यमिक विद्यालयों तक में बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से रिकॉर्ड स्तर पर बेहद योग्य और प्रतिभावान शिक्षकों की पारदर्शी बहाली की गई है। सरकार का मुख्य उद्देश्य यह है कि अब राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक उपलब्ध हैं, इसलिए पढ़ाई के स्तर में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। इस नए परिप्रेक्ष्य में सरकार का पूरा फोकस गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को बेहतरीन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने पर है। निदेशक सजन आर ने दो टूक कहा है कि हर एक शिक्षक को बच्चों की पढ़ाई के प्रति शत-प्रतिशत जवाबदेह और वफादार होना ही पड़ेगा।
सरकारी ट्रेनिंग का फायदा प्राइवेट में? अब नहीं चलेगा यह दोहरा खेल
इस सनसनीखेज फैसले के पीछे के कारणों का जब हम गहरा विश्लेषण करते हैं, तो सरकार की चिंता पूरी तरह जायज नजर आती है। शिक्षकों को सरकार समय-समय पर बेहतरीन और अत्याधुनिक शैक्षणिक ट्रेनिंग भी दे रही है ताकि उनकी कार्यकुशलता और पढ़ाने का तरीका इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का हो सके। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट थी। कुछ स्वार्थी शिक्षकों ने इस बेहतरीन ट्रेनिंग और अपनी योग्यता को प्राइवेट कोचिंग सेंटरों, होम ट्यूशनों और बड़े-बड़े नामी प्राइवेट स्कूलों में मोटी फीस के बदले बेचना शुरू कर दिया था। इस दोहरे खेल के कारण सरकारी स्कूलों के मासूम बच्चों का भविष्य पूरी तरह से अंधकार में डूब रहा था। शिक्षक अपने मूल पदस्थापित सरकारी विद्यालयों में केवल अपनी हाजिरी बनाने और कागजी कोरम पूरा करने आते थे, जबकि अपनी असली ऊर्जा वे प्राइवेट ठिकानों पर खपा रहे थे। निदेशक सजन आर ने अपने पत्र में बहुत ही तल्ख शब्दों में लिखा है कि शिक्षकों द्वारा अपने विद्यालय परिसर अथवा अन्य किसी भी बाहरी स्थान पर कोचिंग या निजी ट्यूशन पढ़ाने से उनके मूल सरकारी स्कूल के बच्चों की पढ़ाई सीधे तौर पर प्रभावित होती है, जिसे सरकार अब और एक सेकंड के लिए भी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

जिला शिक्षा पदाधिकारियों को खुली छूट: संदिग्ध ठिकानों पर होगी छापेमारी
इस कड़े फैसले को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जमीन पर उतारने के लिए माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने राज्य के सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को असीमित प्रशासनिक शक्तियां सौंप दी हैं। आदेश के अनुसार, सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को अपने-अपने जिलों में विशेष उड़नदस्ता टीमों का गठन करने को कहा गया है। ये टीमें सुबह से लेकर शाम तक अलग-अलग कोचिंग हबों, प्राइवेट स्कूलों और रिहायशी इलाकों में औचक छापेमारी (सरप्राइज रेड) करेंगी। अगर इस छापेमारी के दौरान कोई भी सरकारी स्कूल का शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर चाक चलाते हुए या किसी प्राइवेट बेंच पर बच्चों को बैच बनाकर पढ़ाते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया, तो उसकी किस्मत का फैसला ऑन द स्पॉट हो जाएगा। विभाग ने साफ कर दिया है कि ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की पैरवी, राजनीतिक रसूख या ढिलाई को पूरी तरह से खारिज कर दिया जाएगा। जिला शिक्षा पदाधिकारियों को सख्त निर्देश है कि वे बिना किसी पूर्व सूचना के संदिग्ध कोचिंग संस्थानों की लिस्ट बनाकर तत्काल रेड मारें और इसकी साप्ताहिक रिपोर्ट सीधे पटना मुख्यालय को भेजें।

पर्दे के पीछे का खेल: पत्नी और बच्चों के नाम पर शिक्षा का व्यापार, रडार पर ‘मनी ट्रेल’
सरकारी तंत्र की आंखों में धूल झोंकने के लिए कुछ शातिर शिक्षकों ने भ्रष्टाचार का एक नया और बेहद सुरक्षित रास्ता निकाल लिया है। ये शिक्षक खुद ब्लैकबोर्ड पर चाक लेकर नहीं खड़े होते, बल्कि अपनी सरकारी नौकरी से मिली मोटी पूंजी को प्राइवेट स्कूलों और बड़े कोचिंग सेंटरों में बेनामी तौर पर निवेश कर रहे हैं। अपनी गर्दन बचाने के लिए इस धंधे के मालिकाना हक की कागजी कमान अपनी पत्नी, बच्चों या बेहद नजदीकी रिश्तेदारों के नाम पर सौंप रखी है। भले ही इन संस्थानों में बाहर के शिक्षकों से पढ़ाई कराई जा रही हो, लेकिन इन सरकारी गुरुजी का पूरा ‘मन और धन’ चौबीसों घंटे इसी व्यापार को चमकाने में लगा रहता है। स्कूल के भीतर रहने के दौरान भी इनका दिमाग अपने प्राइवेट स्कूल की बैलेंस शीट और मुनाफे को जोड़ने में व्यस्त रहता है। शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि भले ही इस गुप्त खेल का पत्र संख्या 613 में सीधा उल्लेख न हो, लेकिन आचार संहिता के व्यापक नियमों के तहत यह पूरी तरह से अवैध और सेवा शर्तों का खुला उल्लंघन है। आम जनता द्वारा ऐसी बेनामी संपत्तियों और गुप्त व्यापार की शिकायत मिलते ही ये शातिर शिक्षक सीधे विभाग के निशाने पर आ जाएंगे।
पकड़ना नहीं है मुश्किल: सरकार मांग सकती है शपथ पत्र, बैंक खातों की जांच से खुलेगा राज
इस तरह के ‘सफेदपोश’ शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसना सरकार के लिए कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि शिक्षा विभाग को इन चालाक शिक्षकों की ‘मनी ट्रेल’ यानी पैसों के लेन-देन की समय-समय पर गहन जांच करानी चाहिए। इसके अलावा, एक बेहद कारगर तरीका यह हो सकता है कि सरकार हर साल सभी सरकारी शिक्षकों से एक अनिवार्य शपथ पत्र (एफिडेविट) मांगे। इस शपथ पत्र में शिक्षकों को स्पष्ट रूप से यह घोषणा करनी होगी कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य (पत्नी, बच्चे या आश्रित) किसी भी प्राइवेट स्कूल, कोचिंग या शैक्षणिक व्यवसाय में संलिप्त नहीं है, और यदि है तो उसकी आय का स्रोत क्या है। जैसे ही इनके और इनके परिजनों के बैंक खातों की जांच का शिकंजा कसेगा, सरकारी सैलरी की आड़ में चल रहा करोड़ों का यह बेनामी साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। विभाग अब ऐसे शातिर दिमाग वाले शिक्षकों की गुप्त सूचियां तैयार करने में जुट गया है, जो तन से सरकारी विद्यालय में हाजिरी बनाते हैं, लेकिन मन और धन से प्राइवेट तिजोरियां भर रहे हैं।

आचार संहिता का सीधा उल्लंघन: जेल और बर्खास्तगी की लटकी तलवार
शिक्षा विभाग द्वारा उठाया गया यह कदम कोई सामान्य विभागीय ट्रांसफर-पोस्टिंग नहीं है, बल्कि एक बड़ा कानूनी शिकंजा है। पत्र के अंतिम हिस्से में दी गई चेतावनी इतनी गंभीर है कि ट्यूशन माफियाओं के पूरे सिंडिकेट में सन्नाटा पसर गया है। पत्र में लिखा गया है, “अतः आप सभी यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी सरकारी विद्यालय के शिक्षक अपने विद्यालय परिसर अथवा अन्य स्थानों पर अवस्थित कोचिंग/निजी ट्यूशन एवं व्यवसायिक संस्थानों में पढ़ाने का कार्य नहीं करेंगे। यदि कोई शिक्षक कोचिंग/निजी ट्यूशन एवं व्यवसायिक संस्थानों में पढ़ाने में संलिप्त पाए जाते हैं तो शिक्षकों के लिए निर्धारित आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा और तदनुरूप उनके विरुद्ध कठोर एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई की जायेगी।” इसका सीधा और स्पष्ट मतलब यह है कि दोषी पाए जाने वाले शिक्षकों की न सिर्फ सरकारी नौकरी जाएगी, बल्कि उनके खिलाफ सरकारी नियमों की अवहेलना, जालसाजी और विभागीय धोखाधड़ी का क्रिमिनल केस भी दर्ज किया जा सकता है। उनकी संचित पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सभी सरकारी लाभों को हमेशा के लिए जब्त किया जा सकता है।
क्यों जरूरी था शिक्षा विभाग का यह ‘सर्जिकल स्ट्राइक’?
यदि हम बिहार की शिक्षा व्यवस्था का सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण करें, तो यह साफ हो जाता है कि प्राइवेट कोचिंग और होम ट्यूशन का यह धंधा राज्य के भीतर एक समानांतर ब्लैक इकॉनमी बन चुका था। बिहार लोक सेवा आयोग जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा पास करके आने वाले नए और ऊर्जावान शिक्षकों को भी इस ट्यूशन रूपी बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से लगातार यह शिकायतें आ रही थीं कि सरकारी शिक्षक अपने स्कूलों में जानबूझकर पूरा सिलेबस नहीं पढ़ाते थे, ताकि बच्चे मजबूर होकर उनके निजी कोचिंग सेंटरों में मोटी रकम देकर एडमिशन लें। यह एक तरह का संगठित मानसिक और आर्थिक शोषण था, जिसने सरकारी स्कूलों को केवल मिड-डे मील की खिचड़ी बांटने का अड्डा बनाकर रख दिया था। शिक्षा विभाग के इस नए और ऐतिहासिक फरमान से उन गरीब अभिभावकों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई है, जो अपने बच्चों को महंगे प्राइवेट कोचिंग या स्कूलों में भेजने का खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ थे। अब शिक्षकों को मजबूरन स्कूल के निर्धारित 6 से 8 घंटों के दौरान अपनी पूरी ताकत और ज्ञान सरकारी स्कूल के बच्चों को ही देना होगा।

कोचिंग और प्राइवेट स्कूल माफियाओं में खलबली: अब आगे क्या?
निदेशक सजन आर के इस धमाकेदार आदेश के बाद राज्य के बड़े-बड़े कोचिंग संचालकों और प्राइवेट स्कूल प्रबंधकों के बीच गुप्त बैठकों का दौर शुरू हो गया है। पटना के मुसल्लहपुर हाट, नया टोला, बोरिंग रोड, कंकड़बाग और भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया जैसे बड़े कोचिंग हबों में सन्नाटा पसरने लगा है क्योंकि कई बड़े संस्थान इन्हीं स्टार सरकारी शिक्षकों के चेहरे पर करोड़ों का बिजनेस कर रहे थे। अब नौकरी जाने के डर से शिक्षकों ने इन कोचिंग संस्थानों के बैनर, बोर्ड, से अपनी तस्वीरें, मोबाइल नम्बर,नाम,जैसी पर्सनली चीजें हटाने की गुहार लगानी शुरू कर दी है। विशेषज्ञ इसे बिहार के इतिहास में शिक्षा सुधार का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी कदम मान रहे हैं। अब देखना यह होगा कि निदेशक सजन आर का यह पत्र धरातल पर कितना असर दिखाता है और जिला शिक्षा पदाधिकारी इस आदेश का पालन कराने में कितने ईमानदार साबित होते हैं। लेकिन एक बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि सम्राट सरकार ने इस बार भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आर-पार का मूड बना लिया है। अब सरकारी मास्टर साहब के पास केवल दो ही रास्ते बचे हैं—या तो वे पूरी ईमानदारी से केवल सरकारी स्कूल में गरीब के बच्चों का भविष्य संवारें, या फिर हमेशा के लिए इस्तीफा देकर अपना प्राइवेट धंधा संभालें। दोनों नावों पर पैर रखने वालों का डूबना अब पूरी तरह तय है।

अन्य खबरों के लिए नीचे ’न्यूज भारत टीवी ’के लिंक पर क्लिक करें,
|| https://newsbharattv.in ||

