महाखुलासा:जब पूरे बिहार में महज 5 और मुजफ्फरपुर में सिर्फ 1 ‘ओरिजिनल’ DPS, तो जिले में कहाँ से आ गए 17? शिक्षा के नाम पर ‘ब्रांड’ की बड़ी डकैती!

रिर्पोट :- एस. एस. कुमार ‘पंकज’

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में शिक्षा के नाम पर ‘ब्रांड’ की एक ऐसी संगठित डकैती चल रही है, जिसने न सिर्फ हजारों अभिभावकों को धोखे में रखा, बल्कि मासूम बच्चों के भविष्य को भी दांव पर लगा दिया है। एक तरफ दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS) सोसाइटी, नई दिल्ली का स्पष्ट आधिकारिक आंकड़ा है, तो दूसरी तरफ मुजफ्फरपुर के शहरी और ग्रामीण इलाकों में कुकुरमुत्ते की तरह उगे फर्जी स्कूलों की बाढ़ है।

आइए इस पूरे ‘लूट तंत्र’ की परत-दर-परत विवेचना करते हैं कि आखिर यह पूरा खेल क्या है, जांच की नौबत क्यों आई और इस पर देश की सर्वोच्च अदालतों का क्या फैसला है।


जब बिहार में कुल 5 और मुजफ्फरपुर में 1 दिल्ली पब्लिक स्कूल, तो 17 कहाँ से आए?

दिल्ली पब्लिक स्कूल सोसाइटी (नई दिल्ली) की आधिकारिक वेबसाइट dpsfamily.org और मुजफ्फरपुर DPS के प्राचार्य डा. के. बिनू कुमार के बयानों के अनुसार, पूरे बिहार राज्य में केवल 5 (पाँच) ही वास्तविक  DPS संचालित हैं:

  1. DPS पटना
  2. DPS पटना EAST
  3. DPS गया
  4. DPS मुजफ्फरपुर (तुर्की)
  5. DPS आरा (भोजपुर)

तकनीकी और कानूनी रूप से पूरे मुजफ्फरपुर जिले (शहरी और ग्रामीण मिलाकर) में केवल 1 (एक) ही अधिकृत और प्रमाणित DPS है, जो तुर्की में स्थित है।

तो फिर मुजफ्फरपुर में ये 17 DPS कहाँ से आ गए? यह सबसे बड़ा सुलगता हुआ सवाल है। असल में, जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग द्वारा जारी की गई संदिग्ध सूची में कुल 16 स्कूल शामिल हैं, और तुर्की वाले एकमात्र असली DPS को मिलाकर जिले में कुल 17 स्कूल ‘DPS’ नाम का बोर्ड टांगकर चल रहे हैं। जब मूल सोसाइटी ने जिले में सिर्फ एक ही स्कूल को अपनी फ्रेंचाइजी या संबद्धता दी है, तो बाकी के 16 संस्थान सीधे तौर पर ब्रांड की चोरी” और अवैध दुकानें” हैं।

ये स्थानीय स्तर पर अलग कमिटी, ट्रस्ट या निजी स्वार्थ के लिए खोले गए स्वतंत्र स्कूल हैं, जिनका नई दिल्ली की मूल DPS सोसाइटी से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। ये फर्जी स्कूल नहीं तो और क्या हैं? ये सिर्फ मिलते-जुलते नाम और प्रतिष्ठित ‘लोगो’ (Logo) का सहारा लेकर अभिभावकों में भ्रम पैदा करते हैं ताकि उनसे मोटी फीस वसूली जा सके।


आखिर क्यों आई जांच की नौबत? क्या है पूरा मामला?

इस महाफ़र्ज़ीवाड़े की जांच की नौबत अचानक नहीं आई, बल्कि इसके पीछे ‘ग्राउंड जीरो’ पर चल रही बेहद कड़वी और चौंकाने वाली हकीकत है।

  1. मासूमों की सुरक्षा से खिलवाड़: ग्राउंड जीरो से आई तस्वीरों में देखा गया कि इन संदिग्ध स्कूलों द्वारा एक साथ दर्जनों बच्चों को स्कूल बसों में भेड़-बकरियों की तरह लादकर ले जाया जा रहा था। कुछ बच्चों को पैदल ही एक ‘अस्पताल’ जैसी जगह से निकलते देखा गया, जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए। आखिर इन स्कूलों के पास अस्पताल जैसी व्यवस्था के नाम पर क्या छुपाया जा रहा है?
  2. बच्चों ने खुद खोली पोल: स्कूल के मासूम बच्चों ने ही कैमरे और अधिकारियों के सामने प्रबंधन के ऐसे खेल को जगजाहिर किया, जिससे जिला प्रशासन अब तक पूरी तरह अनजान था। बंद कमरों के पीछे चल रहे इस मैनेजमेंट के खेल की वजह से प्रशासन को कड़ा कदम उठाना पड़ा।
  3. अभिभावकों के साथ धोखाधड़ी: ‘DPS’ एक बहुत बड़ा और विश्वसनीय ब्रांड नाम है। अभिभावक सोचते हैं कि उनका बच्चा देश के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल नेटवर्क में पढ़ रहा है, लेकिन हकीकत में वे अपनी गाढ़ी कमाई इन फर्जी ‘ब्रांडेड दुकानों’ के संचालकों की जेब भरने में लुटा रहे होते हैं। इसी लूट तंत्र को बेनकाब करने के लिए जांच शुरू की गई है।

जांच के आदेश किसने दिए और क्या है प्रशासनिक कार्रवाई?

मुजफ्फरपुर में इस ‘लूट तंत्र’ की जड़ों को उखाड़ने के लिए जिला प्रशासन पूरी तरह एक्शन मोड में है:

  • डीएम का हंटर: जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन के पत्र संख्या 1622 (दिनांक 08.05.2026) के बाद शिक्षा विभाग ने युद्ध स्तर पर कार्रवाई शुरू की है।
  • 3 दिन का कड़ा अल्टीमेटम: जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) कुमार अरविंद सिन्हा ने नोटिस जारी कर साफ कह दिया है कि यदि ये संदिग्ध स्कूल 3 दिनों के भीतर अपनी प्रामाणिकता, मान्यता (CBSE Affiliation) और बिहार सरकार द्वारा जारी NOC के पुख्ता साक्ष्य पेश नहीं करते हैं, तो उन पर तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
  • तस्वीरों से मिलान: जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) सुजीत कुमार दास ने पत्र संख्या 1047 के माध्यम से जिले के विभिन्न प्रखंडों में चल रहे 16 संदिग्ध स्कूलों की सूची जारी की है। उन्होंने सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि 2 दिनों के अंदर इन स्कूलों के मुख्य गेट की रंगीन फोटो और उनके कागजात मुख्यालय को सौंपे जाएं ताकि उनकी सत्यता जांची जा सके।

इस विवाद पर अदालतों का ऐतिहासिक फैसला: कानूनी रूप से पूरी तरह अवैध हैं ये स्कूल

‘DPS’ नाम, मार्क और उसके विशिष्ट लोगो (Logo) के अनधिकृत उपयोग को लेकर माननीय न्यायालयों द्वारा समय-समय पर कड़े और ऐतिहासिक फैसले दिए गए हैं, जो यह साबित करते हैं कि मूल सोसाइटी के अलावा किसी भी अन्य संस्था द्वारा इस नाम का इस्तेमाल करना सीधे तौर पर ‘क्रिमिनल फ्रॉड’ है।

1. दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला (वर्ष 2008)

  • मामला: दिल्ली पब्लिक स्कूल सोसाइटी बनाम डीपीएस ट्रस्ट व अन्य (CS(OS) No. 1518/2008)
  • न्यायालय का आदेश: माननीय न्यायाधीश एच.आर. मल्होत्रा की अदालत ने 28 अगस्त 2008 को इस पर अंतरिम रोक (Stay Order) लगाई थी।
  • अदालत की सख्त टिप्पणी: कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादियों ने साल 2003 में ट्रस्ट बनाया, लेकिन अपने विज्ञापनों में ’54 वर्षों की उत्कृष्टता’ का झूठा दावा कर रहे थे। जब कोर्ट ने दोनों पक्षों के लोगो (Logo) की तुलना की, तो माना कि यह प्रथम दृष्टया एक धोखाधड़ी (Fraudulent act)” है। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रतिवादियों ने शिक्षाविदों, अभिभावकों और बच्चों को भ्रमित करने की गलत मंशा से इस मार्क पर अतिक्रमण किया है।

2. भारत का सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) का ऐतिहासिक फैसला (वर्ष 2018)

  • मामला: दिल्ली पब्लिक स्कूल सोसाइटी बनाम डीपीएस वर्ल्ड फाउंडेशन व अन्य (SLP (Civil) Diary No. 17216/2018)
  • न्यायालय का आदेश: 24 जुलाई 2018 को माननीय मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति आर. भानुमती और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने इस मामले पर अंतिम मुहर लगा दी।
  • अदालत का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि ‘DPS’, ‘Delhi Public School’ शब्द और उसका लोगो ट्रेड मार्क्स एक्ट, 1999 के तहत क्लास 42 में मूल पेटिशनर (DPS Society, New Delhi) के पक्ष में कानूनी रूप से पंजीकृत (Registered) है। सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 39, रूल 1 और 2 के तहत मांगी गई अंतरिम रोक को पूरी तरह मंजूर करते हुए प्रतिवादियों को इस नाम और लोगो के उपयोग से पूरी तरह प्रतिबंधित (Restrain) कर दिया।

प्रशासन की रडार पर मौजूद 16 संदिग्ध स्कूलों की पूरी सूची:

बिहार शिक्षा परियोजना द्वारा जारी सूची के अनुसार इन 16 ‘दुकानों’ पर बहुत जल्द स्थायी रूप से ताला लटकना तय माना जा रहा है:

  1. दिल्ली इंटरनेशनल स्कूल – मुशहरी
  2. दिल्ली पब्लिक स्कूल (A-विंग) – औराई
  3. दिल्ली पब्लिक स्कूल (H-विंग) – बरुराज (मोतीपुर)
  4. दिल्ली पब्लिक स्कूल इंटरनेशनल, गरहां – बोचहाँ
  5. दिल्ली पब्लिक स्कूल इंटरनेशनल, जाफरपुर – पारू
  6. दिल्ली पब्लिक स्कूल इंटरनेशनल, कांटी – कांटी
  7. दिल्ली पब्लिक स्कूल, झपहाँ – मुशहरी
  8. दिल्ली पब्लिक स्कूल, लखनपुर, कटरा – कटरा
  9. दिल्ली पब्लिक स्कूल, मिठनपुरा – मुशहरी
  10. दिल्ली पब्लिक स्कूल, मुजफ्फरपुर – कुढ़नी
  11. दिल्ली पब्लिक स्कूल, सरैया – सरैया
  12. दिल्ली पब्लिक स्कूल, यजुआर – कटरा
  13. दिल्ली पब्लिक स्कूल, शर्फुद्दीनपुर – बोचहाँ
  14. डी.पी.एस. किड्स, भगवानपुर – मुशहरी
  15. सीनियर सेकेंडरी डी.पी.एस. ढोली (एन.एच.-28) – सकरा
  16. डी.पी.एस. जूनियर इंटर स्कूल, बेरिया – कांटी

प्रशासनिक हंटर का खौफ: नाक के नीचे से रातों-रात गायब हुए ‘DPS’ के बोर्ड, प्रशासन बेखबर और अंधी चकाचौंध में सोए अभिभावक!

इसी बीच मुरौल प्रखंड से इस वक्त की सबसे बड़ी और शर्मनाक तस्वीर सामने आ रही है। जिला प्रशासन के कड़े तेवरों और ‘चार सौ बीसी’ (जालसाजी) के खुलासे के बाद, खुद को ‘दिल्ली पब्लिक स्कूल’ बताने वाले इस तथाकथित विद्यालय के प्रबंधकों में कानूनी कार्रवाई का ऐसा खौफ पसरा है कि उन्होंने रातों-रात स्कूल के मुख्य द्वार और पूसा-मुजफ्फरपुर मुख्य सड़क से ‘DPS’ नाम वाले अपने चमचमाते बोर्ड हटा लिए। माफियाओं को डर था कि कहीं प्रशासन की टीम आकर उनके इस अवैध किले को सील न कर दे, इसलिए रात के अंधेरे में ही बोर्ड नोच लिए गए।

लेकिन सबसे हैरान और विचलित कर देने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल से स्थानीय प्रशासन पूरी तरह बेखबर रहा और उससे भी बड़ा अफसोस उन अभिभावकों पर है जिनकी आंखों पर इन फर्जी ‘ब्रांडेड दुकानों’ के नाम की पट्टी बंधी हुई थी। उन्हें सुबह स्कूल के गेट और सड़क से बोर्ड का अचानक गायब होना भी समझ में नहीं आया! सुबह होते ही उन्होंने बिना सोचे-समझे, बिना किसी सच्चाई को जाने, अपने मासूम बच्चों को वापस उसी जालसाज के यहाँ पढ़ने के लिए भेज दिया।

अपनी पहचान छुपाने के लिए मुरौल प्रखंड के पिलखी में रातों-रात गायब हुए ‘DPS’ के बोर्ड (फाइल फोटो)

समझ में नहीं आता कि ये अभिभावक अपने बच्चों का कैसा भविष्य बना रहे हैं? जब स्कूल प्रबंधन खुद को कानूनी रूप से सही साबित करने के बजाय अपनी पहचान छुपाने के लिए रात के अंधेरे में गिद्ध की तरह बोर्ड उखाड़ रहा हो, तो क्या ऐसे डरपोक और धोखेबाज माफियाओं के साए में बच्चों का भविष्य कभी सुरक्षित रह सकता है? यह आंखें मूंदकर अपने ही बच्चों को दलदल में धकेलने जैसा है। मुरौल की यह घटना साबित करती है कि नौनिहालों के भविष्य के साथ हो रहे इस घिनौने खिलवाड़ में जितनी गलती इन शिक्षा माफियाओं की है, उतनी ही हिस्सेदार अभिभावकों की यह घोर लापरवाही भी है।

इंटरनेशनलबोर्ड के पीछे एस्बेस्टस की भट्टी, जहाँ सुलग रहा है नौनिहालों का बचपन!

मुशहरी, बोचहाँ, पारू, कांटी और सकरा के ग्रामीण अंचलों से ‘ग्राउंड जीरो’ की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे शिक्षा व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा हैं। इन इलाकों में बड़े-बड़े होर्डिंग्स और चमचमाते बोर्ड टांगकर खुद को ‘इंटरनेशनल’ स्तर का घोषित करने वाले ये तथाकथित विद्यालय अपने नाम के आगे-पीछे ‘दिल्ली पब्लिक स्कूल’ (DPS) का ठप्पा बड़े रसूख और शान से लगाए बैठे हैं। खुद को प्रखंड, जिला या राज्य ही नहीं, बल्कि देश और विदेशों के स्कूलों को टक्कर देने वाला बताने वाले इन शिक्षा माफियाओं का सच अंदर से बेहद घिनौना और खोखला है। सुविधा, शिक्षा और संस्कार के नाम पर यहाँ ‘शून्य’ का सन्नाटा पसरा है।

इस महाफर्जीवाड़े की सबसे डरावनी और दिल दहला देने वाली बानगी सकरा प्रखंड के बरियारपुर में देखने को मिली, जहाँ एक तथाकथित ‘इंटरनेशनल स्कूल’ लोहे और एस्बेस्टस के कमरों में धड़ल्ले से चलाया जा रहा है। मई-जून की इस जानलेवा और झुलसा देने वाली गर्मी में, जहाँ तपते एस्बेस्टस के नीचे बैठना तो दूर, कोई जानवर भी खड़ा होना पसंद न करे, वहाँ सूबे के अबोध और मासूम बच्चे सुबह से दोपहर तक पसीने से लथपथ होकर तपने और घुटने के लिए मजबूर हैं। यह स्कूल नहीं, बल्कि मासूमों को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का एक ‘यातना गृह’ बन चुका है। लेकिन इस कड़वे सच के लिए जितने दोषी ये निर्दयी शिक्षा माफिया हैं, उतने ही जिम्मेदार वे अभिभावक भी हैं, जो सिर्फ ‘DPS’ और ‘इंटरनेशनल’ जैसे बड़े-बड़े विदेशी नामों के चकाचौंध में अंधा होकर बिना किसी जांच-पड़ताल, बिना किसी ‘सर्टिफिकेशन’ (प्रमाणीकरण) या मान्यता के कागजात देखे, अपने जिगर के टुकड़ों को इन कसाइयों के हाथों में सौंप आते हैं। क्या एक तथाकथित बड़े नाम की झूठी शान के लिए मासूम बच्चों के जीवन को इस तरह भट्टी में झोंक देना सही है? आखिर प्रशासन की नाक के नीचे ‘इंटरनेशनल’ का बोर्ड टांगकर चल रहे इस अमानवीय खेल पर जिला शिक्षा विभाग अब तक कुंभकर्णी नींद क्यों सो रहा था?

यह खबर अभी खत्म नहीं हुई है!यह तो सिर्फ टेलर है –  हम जल्द ही सकरा थाना क्षेत्र यानी सकरा एवं मुरौल प्रखंड के तथाकथित दिल्ली पब्लिक स्कूल के उस ‘चार सौ बीसी’ (420) और जालसाजी का ऐसा सनसनीखेज चिट्ठा खोलने जा रहे हैं, जिसके पुख्ता सबूत और तस्वीरें देखकर जिला प्रशासन से लेकर आम जनता तक दांतों तले उंगलियां दबा लेगी। इन सफेदपोश शिक्षा के सौदागरों का असली चेहरा बहुत जल्द बेनकाब होने वाला है। बने रहें हमारे साथ, क्योंकि इसकी तीसरी रिपोर्ट आपके होश उड़ा देगी!

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