Sunday, June 7, 2026

साहित्यिक जगत में गूंजेगी बज्जिका की महक: लोकनायक ‘बसावन-बख्तौर’ पर हरि विलास राय का महाकाव्य शीघ्र होगा लोकार्पित

एस.एस.कुमार ‘पंकज’

समीक्षा प्रकाशन से प्रकाशित हो रही है लेखक की 17वीं कृति; बज्जिका भाषा के गौरव को पुनर्जीवित करने का प्रयास

पटना/मुजफ्फरपुर। साहित्य और संस्कृति के संगम से उपजी लोकगाथाएं जब महाकाव्य का रूप लेती हैं, तो वह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास बन जाती है। इसी कड़ी में, सुप्रसिद्ध साहित्यकार हरि विलास राय की बहुप्रतीक्षित कालजयी कृति बसावन-बख्तौर (बज्जिका महाकाव्य) शीघ्र ही पाठकों के बीच आ रही है। समीक्षा प्रकाशन (दिल्ली/मुजफ्फरपुर) द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक न केवल बज्जिका भाषा के साहित्य को समृद्ध करेगी, बल्कि समाज के उन लोकनायकों की वीरता को भी स्वर देगी, जिन्होंने सदियों से जनमानस के हृदय में ‘लोक देवता’ के रूप में स्थान बना रखा है।

हरि विलास राय की बहुप्रतीक्षित कृति ‘बसावन-बख्तौर (बज्जिका महाकाव्य) की एक झलक

लोक देवता से महाकाव्य तक का सफर

लेखक हरि विलास राय का लोकनायकों के प्रति अनुराग किसी से छिपा नहीं है। यह उनकी 17वीं कृति है। इससे पूर्व भी उन्होंने बाबा बसावन और बाबा बख्तौर के शौर्य को अपनी लेखनी के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। उनकी पूर्व प्रकाशित कृतियों में बज्जिका नाटक लोक देवता बाबा बसावन और लोक देवता बाबा बख्तौर को पाठकों ने खूब सराहा था। वहीं, हिंदी में रचित बसावन बख्तौर चरित मानस ने तो लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे।

हिन्दी कृति की अपार सफलता के बाद, बज्जिका क्षेत्र के पाठकों और मातृभाषा प्रेमियों की ओर से निरंतर यह मांग उठ रही थी कि इन लोक देवताओं की वीरगाथा को उनकी अपनी मिट्टी की बोली—’बज्जिका’ में महाकाव्य के रूप में पिरोया जाए। जनभावनाओं का सम्मान करते हुए, हरि विलास राय ने अपनी लेखनी से इस ‘बसावन बख्तौर बज्जिका महाकाव्य’ का सृजन किया है।

कवि हरि विलास राय अपने रचना संसार के साथ एवं  दायें में  बाबा बसावन एवं बाबा बख्तौर पर पूर्व में प्रकाशित पुस्‍तक

कौन थे बसावन, बखतौर और शक्तिरूपा माता गहिल ?

बज्जिका क्षेत्र के लोक-साहित्य और जनमानस में बाबा बसावन और बाबा बखतौर का नाम केवल वीरों के रूप में नहीं, बल्कि शोषितों के रक्षक ‘लोक देवता’ के रूप में अंकित है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, बाबा बसावन का अवतार वैशाली के पानापुर लंगा ग्राम में यादव कुल की माता बहुरा की कोख से तब हुआ था, जब सामंती शक्तियों द्वारा निर्बलों का शोषण चरम पर था. वे प्राचीन इतिहास के ऐसे प्रथम पुरुष माने जाते हैं जिन्होंने हलवाहों और चरवाहों को संगठित कर एक विशाल सेना तैयार की और अत्याचारी राजा दलेल सिंह की गोगरी जेल पर चढ़ाई कर न केवल अपने भाई संतोषी को छुड़ाया, बल्कि 700 कैदियों को दासता से मुक्त कराया. उनकी वीरता का लोहा मानकर अंततः सामंतों को उनके समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा. बसावन और बख्तौर  केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक ‘चरवाहा संस्कृति’ के रक्षक और संगीत प्रेमी भी थे। हाथ में बांसुरी और मन में क्रांति की ज्वाला लिए इन वीरों ने ‘भुइयां संघ’ बनाकर शोषितों, दलितों, पिछड़ों और पशुपालकों को एकजुट किया।

इसी शौर्य परंपरा की दूसरी कड़ी बाबा बखतौर हैं, जिनका जन्म सहरसा जिले के गढ़िया रसलपुर (नोला पंचायत) में हुआ था. बाबा बसावन और बखतौर, दोनों ही अदम्य साहसी, स्वाभिमानी और पशुपालक संस्कृति के अनन्य उपासक थे. इन दोनों वीरों की अटूट श्रद्धा माता गहिल में थी, जो उनकी कुलदेवी थीं. माता गहिल को ‘आदिशक्ति जगदम्बा’ का रूप माना जाता है, जिन्हें लोक में ‘सहस्र चंडी’ या ‘गहिलवार’ के रूप में पूजा जाता है. आज भी पानापुर लंगा में बाबा बसावन, बाबा बखतौर और माता गहिल की प्रतिमाएं एक साथ स्थापित हैं, जहाँ भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए दुग्धाभिषेक करते हैं. यह स्थान आज भी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और अटूट लोक-आस्था के ‘सिद्धि-पीठ’ के रूप में जीवंत है.

महाकाव्य में वर्णन है कि कैसे इन नायकों ने तत्कालीन अत्याचारी शासकों और जनपदीय सामंत दलेल सिंह के दमनकारी चक्र को चुनौती दी। यह पुस्तक उस कालखंड का सजीव चित्रण करती है जब समाज का एक बड़ा वर्ग अपनी रक्षा के लिए किसी त्राता की राह देख रहा था।

कृति की विशेषताएं: एक सांस्कृतिक दस्तावेज

डॉ. शत्रुघ्न राय ‘शशांक’ ने पुस्तक की समीक्षा में इसे संस्कृति का दस्तावेज और बसावन-बख्तौर के चरित का दर्पण” बताया है। पुस्तक की भाषा में वह ओज और माधुर्य है जो पाठक को सीधे उस युग से जोड़ देता है।

  • कला और शौर्य का संगम: नायकों को तेजस्वी रूप में दिखाया गया है, जिनके साथ बाघ और धर्मध्वजा उनकी शक्ति और शुचिता के प्रतीक हैं।
  • विस्तृत रचना संसार: हरि विलास राय की लेखनी का विस्तार ‘सती सुलोचना’ से लेकर ‘वज्जिकामृत’ और ‘अंगार के फूल’ जैसी विधाओं तक फैला हुआ है।
  • प्रेरणा का स्रोत: यह महाकाव्य कबीर के सिद्धांतों की तरह ही समाज को एक नई दिशा दिखाने का सामर्थ्य रखता है।

लेखक परिचय: कलम के धनी हरि विलास राय

वैशाली जिले के हाजीपुर सदर (ग्राम-नैनहा) के मूल निवासी हरि विलास राय (जन्म: 07.05.1946) ने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य की सेवा में समर्पित कर दिया है। पिता स्व. सीताराम राय और माता स्व. धनपति देवी के संस्कारों को आत्मसात कर उन्होंने बज्जिका और हिन्दी साहित्य को कई अनमोल रत्न दिए हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों की सूची लंबी है, जिसमें ‘राजर्षि मोरध्वज’, ‘भक्ति-सरिता’, और ‘संस्मरण के आईने में’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें शामिल हैं।

बहुआयामी रचना संसार: सत्रह कृतियों के शिल्पी

हरि विलास राय का साहित्यिक सफर केवल लोकगाथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने विविध विधाओं में अपनी लेखनी का लोहा मनवाया है। उनकी सत्रहवीं कृति के रूप में ‘बसावन-बख्तौर’ महाकाव्य के आगमन से पूर्व उनकी 16 अन्य पुस्तकें साहित्य जगत को समृद्ध कर चुकी हैं। उनके रचना संसार में सती सुलोचना (प्रबंध काव्य), वज्जिकामृत (काव्य संग्रह) और बंजारन (कहानी संग्रह) जैसी महत्वपूर्ण बज्जिका रचनाएँ शामिल हैं। वहीं हिंदी साहित्य में उन्होंने राजर्षि मोरध्वज (खंड काव्य), अंगार के फूल (काव्य संग्रह), भक्ति-सरिता जैसी कालजयी कृतियों का सृजन किया है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री स्व. दीप नारायण सिंह के व्यक्तित्व पर संस्मरण के आईने में लिखकर अपनी गद्य क्षमता का भी परिचय दिया है। उनकी कृतियों की यह विस्तृत सूची दर्शाती है कि वे समाज, संस्कृति और लोक-आस्था के एक गंभीर अध्येता और साधक हैं।

बाबा बसावन, बाबा बख्तौर एवं बाबा भूंईया के बारे में, न्‍यूज भारत टीवी के स्‍क्रीन पर विचार रखते कवि हरि विलास राय शीघ्र ही अगले खबर में –

साहित्यकारों में उत्साह

समीक्षा प्रकाशन के इस प्रयास की साहित्य जगत में चौतरफा प्रशंसा हो रही है। विद्वानों का मानना है कि क्षेत्रीय भाषाओं में ऐसे उच्च स्तरीय महाकाव्यों के आने से नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सकेगी। बसावन-बख्तौर का चरित्र आज के युवाओं के लिए भी प्रासंगिक है, जो स्वाभिमान और न्याय के लिए लड़ने की प्रेरणा देता है।

यह पुस्तक जल्द ही प्रमुख पुस्तक केंद्रों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी। बज्जिका भाषी समाज के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है जब उनके अपने नायकों की गाथा एक ‘महाकाव्य’ के रूप में प्रतिष्ठित होने जा रही है।

बाबा बसावन के जन्‍म स्‍थान वैशाली जिला के पानापुर लंगा ग्राम में बने भव्‍य मंदिर का दृश्‍य

ताजपुर: हक और हुकूक के लिए भाकपा माले का बड़ा एलान, 12 फरवरी को थमेगा चक्का

ताजपुर/समस्तीपुर | 7 फरवरी 2026 शनिवार को ताजपुर के फलमंडी में भाकपा माले प्रखंड कमिटी की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। जिला सचिव उमेश कुमार के पर्यवेक्षण और प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में कई बड़े आंदोलनात्मक और संगठनात्मक निर्णय लिए गए।

सुरेंद्र प्रसाद सिंह का आह्वान: “जनता के हक के लिए तेज होगा संघर्ष”

बैठक को संबोधित करते हुए प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि भाकपा माले ताजपुर के विकास, खुशहाली और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के लिए संकल्पित है। उन्होंने केंद्र सरकार की मजदूर व किसान विरोधी नीतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए जनता से अपील की कि वे आने वाले आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें।

आंदोलन की रूपरेखा:

  • 8 फरवरी: ताजपुर के जनता मैदान में श्रम, मजदूर और किसान संगठनों की संयुक्त बैठक होगी।
  • 9 फरवरी: अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा प्रखंड मुख्यालय पर धरना-प्रदर्शन और घेराव किया जाएगा।
  • 12 फरवरी: मजदूर विरोधी 4 श्रमकोड, मनरेगा में बदलाव और बिजली एवं बीज विधेयक 2025 के खिलाफ देशव्यापी आम हड़ताल के तहत ताजपुर के गांधी चौक से जुलूस निकालकर प्रदर्शन किया जाएगा।

संगठन विस्तार पर चर्चा:आंदोलनात्मक फैसलों के साथ-साथ पार्टी के आंतरिक ढांचे पर भी बात हुई। 2025 की बकाया लेवी वसूली, लोकयुद्ध पत्रिका की सदस्यता और नए सदस्य बनाने के काम में तेजी लाने का निर्देश दिया गया। साथ ही, छात्र संगठन आइसा, महिला संगठन एपवा, किसान महासभा और खेग्रामस को और अधिक मजबूत करने पर जोर दिया गया।

बैठक में उपस्थित सदस्य:

बैठक में संगठन की मजबूती और आगामी प्रखंड सम्मेलन पर चर्चा की गई। इसमें निम्नलिखित सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किए:  उमेश कुमार (जिला सचिव), सुरेंद्र प्रसाद सिंह (प्र प्रखंड सचिव), आसिफ होदा, ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह, प्रभात रंजन गुप्ता, मो० एजाज, संजीव राय, राजदेव प्रसाद सिंह, शंकर महतो, मुकेश कुमार गुप्ता, मो० क्यूम, मुंशीलाल राय, नौशाद तौहीदी, शाद तौहीदी, बस्साम तौहीदी, मो० मुखलिस तौहीदी और आइसा जिला अध्यक्ष सुनील कुमार।

मुजफ्फरपुर के सात युवा नैनीताल में बिखेरेंगे बिहार की चमक

अंतर-राज्य युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम: सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्र-निर्माण का लेंगे संकल्प

मुजफ्फरपुर | कार्यालय संवाददाता भारत सरकार के ‘मेरा युवा भारत’ (MY Bharat) अभियान के तहत बिहार की प्रतिभा अब उत्तराखंड की वादियों में राज्य का प्रतिनिधित्व करेगी। युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय द्वारा आयोजित अंतर-राज्य युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम में शामिल होने के लिए मुजफ्फरपुर के सात प्रतिभागियों सहित एक एस्कॉर्ट दल नैनीताल (उत्तराखंड) के लिए रवाना हो गया है।

सांस्कृतिक एकता का बनेगा मंच कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल में आयोजित होने वाले इस विशेष कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवाओं को देश की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता से रूबरू कराना है। इस यात्रा के दौरान युवा न केवल नेतृत्व कौशल  सीखेंगे, बल्कि अनुभव आधारित शिक्षा के माध्यम से सामाजिक एकता और राष्ट्र-निर्माण में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करेंगे।

इन जिलों के प्रतिभागी हुए शामिल इस कार्यक्रम में बिहार के कुल पांच जिलों का चयन किया गया है, जिसमें शामिल हैं: मुजफ्फरपुर ,पटना,बेगूसराय, समस्तीपुर और वैशाली,

कुल 35 प्रतिभागी और 2 एस्कॉर्ट इस दल का हिस्सा हैं, जो विभिन्न राज्यों के युवाओं के साथ अपने अनुभवों को साझा करेंगे।

मुजफ्फरपुर की टीम में ये हैं शामिल मुजफ्फरपुर जिले से सात होनहार युवाओं का चयन किया गया है, जिनमें विनीत कुमार सिंह, प्रिंस कुमार, संजीत कुमार, विवेक कुमार, शुभम रानी, गौतम कुमार झा और विकास कुमार शामिल हैं। टीम के साथ एस्कॉर्ट के रूप में चंदन कुमार नेतृत्व कर रहे हैं।

“यह कार्यक्रम युवाओं को अपने राज्य की सीमाओं से बाहर निकलकर देश को समझने और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित होने का सुनहरा अवसर प्रदान करता है।”

उप निदेशक (माय भारत) सह जिला युवा अधिकारी, मुजफ्फरपुर

रवानगी के अवसर पर जिला युवा अधिकारी ने सभी प्रतिभागियों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ दीं और उम्मीद जताई कि ये युवा बिहार की गौरवशाली संस्कृति को राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से रखेंगे।

शिक्षा की लौ जलाकर सेवानिवृत्त हुए प्रधानाध्यापक विशंभूनाथ राय: तेपरी में भव्य विदाई समारोह आयोजित ,

बन्‍दरा(मुजफ्फरपुर): शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, वह समाज के लिए आजीवन एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। इसी भावना के साथ मध्य विद्यालय तेपरी के प्रांगण में संकुल संसाधन केंद्र, तेपरी के तत्वावधान में सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक विशंभूनाथ राय के सम्मान में एक भव्य विदाई सह सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम न केवल एक विदाई का अवसर था, बल्कि एक कर्मठ शिक्षक के दशकों के समर्पण को नमन करने का दिन भी रहा।

विदाई सह सम्मान समारोह के अवसर पर मंचासीन शिक्षकगण

सम्मान और सत्कार का संगम

समारोह की अध्यक्षता मध्य विद्यालय तेपरी के प्रधानाध्यापक सह संकुल समन्वयक दीपक प्रसाद सिंह ने की। कार्यक्रम की शुरुआत भावपूर्ण गीतों और उपस्थित अतिथियों के स्वागत के साथ हुई। विदाई की इस बेला में श्री राय के सम्मान में संकुल के विभिन्न विद्यालयों से आए शिक्षकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

इस अवसर पर वरिष्ठ शिक्षकों और समन्वयकों—ब्रजेश कुमार (प्रभारी प्रधानाध्यापक सह संकुल समन्वयक), विजय कुमार ठाकुर (प्रधानाध्यापक सह संकुल समन्वयक) एवं नरेश राय (प्रभारी प्रधानाध्यापक सह संकुल समन्वयक) ने संयुक्त रूप से विशंभूनाथ राय को अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ और स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। विद्यालय के मुख्य सभागार को रंग-बिरंगे गुब्बारों और फूलों से किसी उत्सव की तरह सजाया गया था। मंच पर लगे आधिकारिक बैनर पर श्री राय की सेवानिवृत्ति तिथि 31 जनवरी 2026 और सम्मान समारोह की तिथि 7 फरवरी 2026 अंकित थी।

सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक विशंभूनाथ राय को भेंट प्रदान करते  समाजसेवी श्याम किशोर

अनुशासन और समर्पण की मिसाल

समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने श्री राय के कार्यकाल की सराहना करते हुए कहा कि उनका पूरा सेवाकाल निष्ठा, कठोर अनुशासन और विद्यालय के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक रहा है। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि:

  • श्री राय ने न केवल छात्रों के भविष्य को संवारा, बल्कि विद्यालय के शैक्षणिक एवं प्रशासनिक ढांचे को भी मजबूती प्रदान की।
  • उनके कार्यकाल में विद्यालय ने अनुशासन के नए मापदंड स्थापित किए, जिससे स्थानीय समुदाय में विद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ी।

मध्य विद्यालय तेपरी की प्रभारी प्रधानाध्यापिका स्मिता कुमारी सहित समस्त विद्यालय परिवार ने भी अपने प्रिय सहकर्मी को भावभीनी विदाई दी। सहकर्मियों ने उनके साथ बिताए समय को याद करते हुए उन्हें एक अभिभावक तुल्य मार्गदर्शक बताया।

विदाई समारोह के अवसर  दर्शक दीर्घा में उपस्थित शिक्षकगण एवं छात्र  

नवनियुक्त शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत

समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित समाजसेवी श्याम किशोर ने श्री राय के व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “विशंभूनाथ जी ने विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा की अलख जगाए रखी। उनका कार्यकाल आने वाली पीढ़ी के लिए एक खुली किताब की तरह है।” उन्होंने वहां मौजूद नवनियुक्त शिक्षकों से विशेष आह्वान किया कि वे श्री राय के कार्य-आदर्शों, उनकी समयबद्धता और उनके धैर्य से प्रेरणा लें ताकि वे भी शिक्षा जगत में अमिट छाप छोड़ सकें।

भावुक कर देने वाले पल

जैसे-जैसे कार्यक्रम अपने समापन की ओर बढ़ा, वातावरण काफी भावुक हो गया। अपने संबोधन में सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक विशंभूनाथ राय ने सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विद्यालय उनके लिए केवल एक कार्यस्थल नहीं बल्कि एक परिवार रहा है। उन्होंने छात्रों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की और शिक्षकों से शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने का अनुरोध किया।

इस कार्यक्रम ने यह सिद्ध कर दिया कि एक शिक्षक की असली पूंजी उसके द्वारा तैयार किए गए संस्कार और उसके प्रति साथियों का सम्मान ही है। कार्यक्रम के अंत में सामूहिक भोज का भी आयोजन किया गया, जिसमें क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों ने भी हिस्सा लिया।

कुरीतियों पर प्रहार: समस्तीपुर में ‘बाल विवाह मुक्ति रथ’ ने पकड़ी रफ़्तार, रोसड़ा और विभूतिपुर में गूंजा जागरूकता का स्वर

समस्तीपुर | 04 फरवरी, 2026

समस्तीपुर जिले को बाल विवाह के कलंक से मुक्त करने के लिए ‘चाइल्ड मैरिज फ्री इंडिया’ (CMFI) अभियान के तहत बाल विवाह मुक्ति रथ का सघन अभियान पूरे उफान पर है। जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र, समस्तीपुर और ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस देशव्यापी ‘एक्सेस टू जस्टिस’ कार्यक्रम ने ग्रामीण इलाकों में जागरूकता का नया संचार किया है।

प्रशासनिक अधिकारियों ने दिखाई हरी झंडी

बुधवार को अभियान के तहत रोसड़ा प्रखंड कार्यालय परिसर में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यहाँ प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) राकेश कुमार ने बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने कहा कि बाल विवाह जैसी कुरीति को जड़ से मिटाने के लिए प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं का यह साझा प्रयास सराहनीय है।

इसके बाद यह रथ विभिन्न पंचायतों और धार्मिक स्थलों पर संदेश प्रसारित करते हुए विभूतिपुर प्रखंड मुख्यालय पहुंचा। वहाँ बीडीओ सुनील कुमार ने रथ का स्वागत किया और इसे आगे के क्षेत्रों के लिए रवाना किया। यह रथ अब जिले के सुदूर गांवों और मोहल्लों में घूम-घूम कर लोगों को इस सामाजिक बुराई के गंभीर परिणामों के प्रति सचेत कर रहा है।

बाल विवाह: केवल अपराध नहीं, भविष्य के साथ अन्याय

इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता सरिता कुमारी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए भावुक अपील की। उन्होंने कहा, बाल विवाह केवल एक कानूनी जुर्म नहीं है, बल्कि यह मासूम बच्चों के सुनहरे भविष्य के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अन्याय है। यह लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार को छीन लेता है।” उन्होंने इस अभियान में जनभागीदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताया।

वहीँ, जिला कार्यक्रम समन्वयक काजल राज ने एक गंभीर पहलू की ओर इशारा करते हुए बताया कि बाल विवाह केवल शादी तक सीमित नहीं है। इस अपराध के पीछे नाबालिग बच्चियों की खरीद-फरोख्त, बाल मजदूरी और बाल तस्करी (ट्रैफिकिंग) जैसे काले कारोबार भी जुड़े होते हैं। उन्होंने जोर दिया कि जब समाज, सामाजिक संगठन और स्थानीय निकाय एक सुर में बोलेंगे, तभी इस बुराई का अंत होगा।

हस्ताक्षर अभियान और शपथ ग्रहण

कार्यक्रम के दौरान एक संकल्प सभा का आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित ग्रामीणों और अधिकारियों ने सामूहिक शपथ ली। लोगों ने संकल्प लिया कि वे:

  • लड़की की शादी 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले नहीं करेंगे।
  • समाज में कहीं भी बाल विवाह की सूचना मिलते ही तुरंत प्रशासन या बचपन बचाओ आंदोलन को सूचित करेंगे।

कार्यक्रम प्रबंधक डॉ. दीप्ति कुमारी ने अभियान की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए ‘त्रिकोणीय संगम’ (सरकार, प्रशासन और समाज) का साथ आना अनिवार्य है। इसके बाद बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने हस्ताक्षर अभियान का हिस्सा बनकर अपनी प्रतिबद्धता जताई।

8 मार्च तक चलेगा विशेष अभियान

जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के वित्त प्रबंधक पप्पू यादव ने जानकारी दी कि यह विशेष जागरूकता रथ 24 जनवरी 2026 से 08 मार्च 2026 (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) तक जिले के सभी प्रखंडों और मोहल्लों का भ्रमण करेगा। कार्यक्रम समन्वयक रवि कुमार मिश्रा ने बताया कि नारों और बाल विवाह निषेध अधिनियम की जानकारी के माध्यम से लोगों को कानूनी परिणामों से भी अवगत कराया जा रहा है।

कार्यक्रम में इनकी रही सक्रिय उपस्थिति: इस अभियान को सफल बनाने में मयंक कुमार सिन्हा, राजीव कुमार साह, रीता कुमारी, बलराम चौरसिया, विभा कुमारी, ललिता कुमारी, सोनाली भगत और रौशन कुमार सहित दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपना सक्रिय योगदान दिया।

गंडक नहर परियोजना: वर्तमान सर्किल रेट पर मुआवजे की मांग को लेकर किसानों ने फूंका बिगुल, 9 फरवरी को ताजपुर प्रखंड मुख्यालय का होगा घेराव

ताजपुर (समस्तीपुर) | 4 फरवरी 2026

तिरहुत-गंडक नहर परियोजना के पुनर्जीवित होने के साथ ही समस्तीपुर जिले के ताजपुर और आसपास के क्षेत्रों में मुआवजे को लेकर संघर्ष तेज हो गया है। दशकों से लंबित इस परियोजना में अपनी जमीन गंवाने वाले किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। बुधवार को अखिल भारतीय किसान महासभा और भाकपा माले की एक संयुक्त जांच टीम ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर किसानों की समस्याओं को सुना और सरकार के खिलाफ आंदोलन का एलान किया।

ताजपुर प्रखंड मुख्यालय पर जमीन के मुआवजा के लिए पहॅुची महिला

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान संकट

गंडक नहर परियोजना, जो तिरहुत मुख्य नहर से निकलकर पूसा, ताजपुर और सरायरंजन की ओर जाती है, इसकी शुरुआत वर्ष 1962-65 के आसपास हुई थी। उस समय भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन कई कारणों से यह परियोजना ‘मृतप्राय’ हो गई थी। ऑडियो क्लिप के अनुसार, उस दौर में कुछ किसानों को तो मुआवजा मिला, लेकिन एक बड़ी संख्या ऐसे किसानों की थी जिनका मुआवजा सरकारी जटिलताओं के कारण ट्रेजरी (खजाना) में ही फंसा रह गया।

अब दशकों बाद जब सरकार ने इस परियोजना पर दोबारा काम शुरू किया है, तो मुआवजे का पुराना जिन्न फिर बाहर आ गया है। जहाँ मुआवजा मिल चुका था, वहाँ काम लगभग पूरा है, लेकिन जहाँ भुगतान लंबित था, वहाँ किसान काम रोककर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

जांच टीम का दौरा और किसानों की व्यथा

बुधवार को किसान महासभा के ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह, राजदेव प्रसाद सिंह, संजीव राय और भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंहप्रभात रंजन गुप्ता ने मोतीपुर, चकहैदर, फतेहपुर और योगियामठ जैसे निर्माण स्थलों का दौरा किया।

बातचीत के दौरान यह तथ्य सामने आया कि संबंधित अधिकारी वर्तमान समय में भी किसानों को उनके पूर्वजों के नाम पर ट्रेजरी में जमा पुरानी राशि ही देना चाहते हैं। किसानों का कहना है कि आज के समय में उस मामूली राशि का कोई मूल्य नहीं है। प्रशासन और किसानों के बीच इसी बात को लेकर गहरा गतिरोध बना हुआ है।

प्रमुख मांगें और आंदोलन की रणनीति

भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि किसान किसी भी कीमत पर पुराना मुआवजा स्वीकार नहीं करेंगे। किसान संघर्ष मोर्चा और माले की संयुक्त टीम ने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:

  • चार गुना मुआवजा: अधिग्रहित जमीन और मकान का वर्तमान सर्किल रेट के आधार पर चार गुना मुआवजा दिया जाए।
  • भूमि बंदोबस्ती: जो किसान इस परियोजना के कारण पूरी तरह भूमिहीन हो रहे हैं, उन्हें सरकार द्वारा अन्यत्र भूमि बंदोबस्ती कर जमीन दी जाए।
  • काम पर रोक: जब तक उचित मुआवजे का ठोस आश्वासन और भुगतान नहीं होता, तब तक नहर निर्माण का कार्य बाधित रहेगा।

9 फरवरी को महा-घेराव का आह्वान

किसान महासभा के प्रखंड अध्यक्ष ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने घोषणा की कि इन मांगों को लेकर 9 फरवरी 2026 को ताजपुर प्रखंड मुख्यालय का ऐतिहासिक घेराव और धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। उन्होंने क्षेत्र के समस्त किसानों, गृहस्वामियों और भूस्वामियों से अपील की है कि वे अपनी हक की लड़ाई के लिए बड़ी संख्या में जुटकर इस आंदोलन को सफल बनाएं।

इस विवाद ने प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अब देखना यह होगा कि सरकार विकास और किसानों के हितों के बीच का रास्ता कैसे निकालती है।

सिलौत- आथर बिन्‍दा रेल मार्ग पुर्नजीवित किए जाने पर मुजफ्फरपुर-दरभंगा नई रेल लाइन की लागत होगी आधी

एस.एस.कुमार ‘पंकज’  

मुजफ्फरपुर/दरभंगा: उत्तर बिहार की हृदयस्थली कहे जाने वाले दो प्रमुख जिलों—मुजफ्फरपुर और दरभंगा—के बीच सीधी रेल सेवा का सपना अब साकार होने के करीब है। वर्ष 2025 में इस परियोजना का फाइनल लोकेशन सर्वे (FLS) पूरा होना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस सर्वे के साथ ही एक ऐसा ऐतिहासिक और तकनीकी तथ्य उभरकर सामने आया है जो रेल मंत्रालय के बजट को 50 से 60 प्रतिशत तक कम कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेलवे प्रशासन मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर रेलखंड पर स्थित सिलौत स्टेशन से आजादी के पूर्व चलने वाली सिलौत-आथर-बिन्दा रेल लाइन को पुनर्जीवित करता है और उसके आगे पुरानी दरभंगा रोड की खाली जमीन का उपयोग करता है, तो यह परियोजना न केवल किफायती होगी बल्कि मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच सीधी रेल सेवा की सबसे बड़ी समस्या ‘भूमि अधिग्रहण’ का स्थायी समाधान भी हो जाएगा ।


परियोजना की सफलता की कुंजी: सिलौत-आथर-बिन्दा मार्ग का पुनरुद्धार

इस पूरी परियोजना की सफलता की कुंजी सिलौत से निकलने वाली पुरानी रेल लाइन में छिपी है। ऐतिहासिक और राजस्व रिकॉर्ड (मुजफ्फरपुर गजेटियर) इसकी पुष्टि करते हैं कि रेलवे के पास यहाँ पहले से ही एक मजबूत आधार मौजूद है।

  • 14 किलोमीटर का तैयार गलियारा: सिलौत स्टेशन से बोचहां ब्लॉक के आथर-बिन्दा गांव तक लगभग 14 किलोमीटर रेल भूमि आज भी रेलवे के नाम पर चर्चा में  है।
  • शून्य अधिग्रहण लागत: मुजफ्फरपुर से सिलौत (12 किमी) तक ट्रैक चालू है। यदि सिलौत से आथर तक की 14 किमी पुरानी जमीन को जोड़ दिया जाए, तो कुल 26 किमी का मार्ग लगभग बिना किसी अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण के तैयार हो जाएगा।
  • विवाद रहित निर्माण: नई जमीन खरीदने पर जहाँ कोर्ट-कचहरी और मुआवजे के विवादों में साल बीत जाते हैं, वहीं अपनी ही जमीन पर रेलवे तत्काल कार्य शुरू कर सकता है।

पुरानी दरभंगा रोड: लागत घटाने का ब्रह्मास्त्र

आथर से आगे की राह और भी आसान हो सकती है यदि रेलवे ‘पुरानी दरभंगा रोड’ की जमीन के विकल्प पर विचार करे। यह इस परियोजना के लिए सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सुझाव है।

  • सरकारी जमीन का सदुपयोग: आथर एवं आथर से आगे बखरी होते हुए पुरानी दरभंगा रोड की जमीन कई किलोमीटर तक बेकार पड़ी है। यह जमीन वर्तमान में एक साधारण सड़क के रूप में उपयोग हो रही है या उपेक्षित है।
  • मैठी टोल प्लाजा तक कनेक्टिविटी: यह सड़क मार्ग आथर से होते हुए सीधे मैठी टोल प्लाजा के पास तक जाता है। यदि इस अलाइनमेंट पर रेल ट्रैक बिछाया जाता है, तो निजी भूमि के अधिग्रहण की आवश्यकता न्यूनतम हो जाएगी।
  • 50% तक रह जाएगी लागत: विशेषज्ञों का अनुमान है कि केवल सिलौत-आथर बिन्दा  मार्ग के उपयोग से, भूमि मुआवजे पर होने वाला खर्च इतना कम हो जाएगा कि परियोजना की कुल लागत अपनी मूल अनुमानित राशि की महज 50 से 60 प्रतिशत रह जाएगी।

यह विकल्प मुजफ्फरपुर-दरभंगा नई लाइन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच सीधी रेल लाइन का निर्माण एक “इंजीनियरिंग चुनौती” से अधिक “भूमि अधिग्रहण चुनौती” है। यह विकल्प तीन कारणों से महत्वपूर्ण है:

  1. आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability): रेलवे के पास सीमित बजट होता है। लागत आधी होने से इस प्रोजेक्ट को रेलवे बोर्ड से तत्काल मंजूरी और फंड मिलना आसान हो जाएगा।
  2. समय की बचत: बिहार में नई जमीन अधिग्रहित करने में औसतन 5 से 10 साल लग जाते हैं। सरकारी और पुरानी रेलवे जमीन मिलने से यह प्रोजेक्ट 3 साल के भीतर धरातल पर उतर सकता है।
  3. विस्थापन का अभाव: नई लाइन बिछाने के लिए घनी आबादी वाले गांवों को उजाड़ना पड़ता है। पुरानी रोड और रेल मार्ग का उपयोग करने से लोगों के घर और उपजाऊ खेत कम-से-कम प्रभावित होंगे।

आथर : मुजफ्फरपुर में औद्योगिक क्रांति की जननी थी यह जमीन

इस मार्ग का इतिहास भारत के औद्योगिक उदय से जुड़ा है। 1836 में बोचहां के विशुनपुर जगदीशपुर (आथर) में अंग्रेज उद्योगपति आर्थर और बटलर ने एक विशाल इकाई लगाई थी।

  • तिरहुत रेल का हिस्सा: 1904-1905 इस्‍वी में सिलौत-आथर मार्ग के विस्तार की चर्चा मिलती है। उस समय उत्तर पश्चिम बंगाल रेलवे ने यहाँ नील और चीनी की ढुलाई के लिए पटरियाँ बिछाई थीं।
  • भारत वैगन की नींव: आज का ‘भारत वैगन’ (मुजफ्फरपुर) असल में आथर की ही फैक्ट्री का विस्तार है जिसे 1877 में शिफ्ट किया गया था। इस मार्ग को पुनर्जीवित करना उस गौरवशाली इतिहास को सम्मान देना होगा।

प्रस्तावित स्टेशनों का ढांचा और विकास की उम्मीद

नई प्रस्तावित लाइन (लगभग 60 से 67 किमी) पर पड़ने वाले स्टेशनों का महत्व इस मार्ग के पुनरुद्धार एवं बदलाव से कई गुना बढ़ जाएगा:

स्टेशन का नामजिलामहत्व और वर्तमान स्थिति
मुजफ्फरपुर जंक्शनमुजफ्फरपुरउत्तर बिहार का सबसे बड़ा जंक्शन
सिलौतमुजफ्फरपुरजंक्शन पॉइंट जहाँ से आथर लाइन अलग होगी
आथर/बखरीमुजफ्फरपुरऐतिहासिक औद्योगिक केंद्र, पुरानी रोड का मिलन स्थल, आगे अन्‍य विकल्‍प    
विद्यारोज/घोसरम्मामुजफ्फरपुरकृषि उपज का बड़ा केंद्र
माधोपुर पंडौलसीमावर्तीमुजफ्फरपुर-दरभंगा का व्यापारिक बॉर्डर
डिलाही/पंडासरायदरभंगालहेरियासराय कोर्ट और स्वास्थ्य केंद्र से जुड़ाव

टापूबन चुके गांवों को नई संजीवनी

आथर और बखरी जैसे गांव जो वर्तमान में बूढ़ी गंडक और खराब सड़क तंत्र के कारण विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं, उनके लिए यह रेल मार्ग एक वरदान होगा। पुरानी दरभंगा रोड की जमीन का उपयोग करने से बखरी और मैठी के आसपास एक नया लॉजिस्टिक हब विकसित हो सकता है।

  • लघु उद्योगों की वापसी: पुरानी रेल जमीन के किनारे फिर से लघु उद्योगों  की स्थापना हो सकती है।
  • सस्ता माल परिवहन: व्यापारियों के लिए मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच माल भेजना 40% तक सस्ता हो जाएगा।

राजनीतिक इतिहास और वर्तमान उम्मीदें

इस रेल मार्ग के लिए संघर्ष दशकों पुराना है।

  • 2008 का वादा: तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने सिंहवाड़ा में इसकी आधारशिला रखी थी, लेकिन पर्याप्त बजट और सटीक सर्वे के अभाव में वह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।
  • 2023-25 का एक्शन मोड: वर्ष 2023 के बजट में पहली बार इसके लिए 20 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। अब FLS का पूरा होना यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार इस बार इसे धरातल पर उतारने के लिए गंभीर है।

सरकार के पास ऐतिहासिक अवसर : सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग  और पुरानी दरभंगा रोड के हिस्‍से में छिपा है कॉस्ट-कटिंगका फॉर्मूला

मुजफ्फरपुर-दरभंगा नई रेल लाइन महज एक रेल पटरी नहीं, बल्कि उत्तर बिहार के खोए हुए औद्योगिक गौरव की वापसी है। यह स्पष्ट है कि सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग को पुनर्जीवित करना न केवल ऐतिहासिक न्याय होगा, बल्कि यह इस प्रोजेक्ट को इकोनॉमिकली वायबल (आर्थिक रूप से व्यावहारिक) बनाने का एकमात्र तार्किक रास्ता है ।  आथर से बखरी एवं मैठी तक  पुरानी  दरभंगा रोड  की अनुपयोगी जमीन को इसमें शामिल करने का विकल्‍प, इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने का एक महत्‍वपूर्ण बिन्‍दु बन सकता है ।

रेल मंत्रालय सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग  की अपनी 14 किलोमीटर पुरानी जमीन को ढूंढ निकालता है, तो बजट में अरबों की बचत होगी और निर्माण कार्य में लगने वाला समय भी काफी कम हो जाएगा। आने वाले समय में  रेल मंत्रालय अपनी 14 किलोमीटर पुरानी जमीन और राज्य सरकार की अनुपयोगी सड़क की भूमि को चिन्हित कर ले, तो बजट में अरबों की बचत होगी। अब गेंद केंद्र और राज्य सरकार के पाले में है—क्या वे महंगे अधिग्रहण की ओर जाएंगे या अपनी ही पुरानी विरासत का हाथ थामकर लागत को आधा करेंगे?

बीड़ी श्रमिक परिवारों की महिलाएं सीख रहीं आत्मनिर्भरता का गुर, सिलाई प्रशिक्षण केंद्र का सचिव ने किया मुआयना

सरायरंजन, समस्तीपुर (03 फरवरी, 2026):

समस्तीपुर जिले के सरायरंजन प्रखंड अंतर्गत खालिसपुर गांव की अल्पसंख्यक बस्ती में आज एक नई उम्मीद की किरण देखी गई। यहाँ बीड़ी निर्माण कार्य में लगे श्रमिक परिवारों की महिलाओं को वैकल्पिक रोजगार से जोड़ने के लिए संचालित सिलाई प्रशिक्षण केंद्र का जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के सचिव, सुरेंद्र कुमार ने औचक निरीक्षण किया।

सिलाई प्रशिक्षण प्राप्‍त कर रही महिलायें

इस दौरान उन्होंने प्रशिक्षण ले रही महिलाओं और किशोरियों से बातचीत की और उनके द्वारा बनाए जा रहे कपड़ों की बारीकियों को समझा। इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य उन परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है जो पीढ़ियों से बीड़ी बनाने के जोखिम भरे कार्य में लगे हैं।

अखबार के जरिए सीखी जा रही है कटिंग की बारीकियां

निरीक्षण के दौरान यह दिलचस्प नजारा देखने को मिला कि सीखने वाली महिलाएं सीधे कपड़े पर कैंची चलाने के बजाय पहले समाचार पत्रों (अखबारों) का उपयोग कर रही हैं। प्रशिक्षिका ने बताया कि अखबार पर कटिंग का अभ्यास करने से कपड़े की बर्बादी नहीं होती और महिलाएं निडर होकर सही माप और आकार काटना सीख पाती हैं। चित्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि महिलाएं जमीन पर बैठकर पूरी एकाग्रता के साथ अखबारों को कपड़ों के पैटर्न के रूप में काट रही हैं।

सिलाई प्रशिक्षण प्राप्‍त कर रही महिलायें

ट्रेनिंग में सिखाई जा रही हैं तकनीकी बारीकियां

प्रशिक्षण के दौरान महिला ट्रेनर ने महिलाओं को सिलाई की गहरी तकनीकी जानकारी साझा की। प्रशिक्षण में ‘कली’ और ‘नेफा’ जोड़ने की प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया जा रहा है:

  • सटीक माप: प्रशिक्षिका ने बताया कि कमर की पट्टी काटने के बाद कली को साढ़े पांच इंच (5.5″) पर काटा जा रहा है।
  • नेफा जोड़ने का सही तरीका: ट्रेनर ने समझाया कि नेफा हमेशा उल्टी पट्टी (उल्टा हिस्सा) की तरफ से जोड़ा जाता है, ताकि उसे पलटने पर वह बिल्कुल सीधा और फिनिशिंग के साथ नजर आए। यदि इसे सीधे में जोड़ा जाए तो वह उल्टा हो जाएगा।
  • कुर्ती निर्माण की प्रक्रिया: सिलाई को अंतिम रूप देने के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पहले बाजू (आस्तीन) बनाई जाती है, फिर घेरा लगाया जाता है और अंत में गोलाई के साथ मोड़कर कुर्ती तैयार की जाती है।

वैकल्पिक रोजगार से बदलेगी तस्वीर

निरीक्षण के बाद जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के सचिव सुरेंद्र कुमार ने कहा, “बीड़ी श्रमिक परिवारों की महिलाओं के पास कौशल की कमी नहीं है, बस उन्हें सही दिशा देने की जरूरत है। सिलाई प्रशिक्षण से ये महिलाएं न केवल अपने परिवार के कपड़े खुद सिल सकेंगी, बल्कि बाजार से जुड़कर अपनी आय का एक नया और सम्मानजनक जरिया भी बना सकेंगी।”

मौके पर मौजूद प्रशिक्षुओं में भारी उत्साह देखा गया। उनका मानना है कि बीड़ी बनाने के काम में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम अधिक हैं, ऐसे में सिलाई एक सुरक्षित और बेहतर विकल्प है।

समस्तीपुर में बाल विवाह के विरुद्ध महाभियान: मोरवा और ताजपुर से ‘मुक्ति रथ’ रवाना, कुरीतियों को मिटाने की ली शपथ

समस्तीपुर | 03 फरवरी, 2026

बिहार को सामाजिक कुरीतियों से मुक्त करने की दिशा में समस्तीपुर जिला एक बार फिर मिसाल पेश कर रहा है। ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ के संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए जिले के मोरवा और ताजपुर प्रखंडों में जन-जागरूकता का शंखनाद किया गया। जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र, समस्तीपुर द्वारा ‘एक्सेस टू जस्टिस’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ के सहयोग से आयोजित इस अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक नई चेतना जगा दी है।

बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखा रवाना करते ताजपुर प्रखंड के  बीडीओ रवि भूषण

प्रखंड विकास पदाधिकारियों ने दिखाई हरी झंडी

मंगलवार को मोरवा और ताजपुर प्रखंड मुख्यालयों में उत्साह का माहौल रहा। मोरवा प्रखंड कार्यालय परिसर में प्रखंड विकास पदाधिकारी (बी‍डीओ) अरुण कुमार निराला ने बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बाल विवाह न केवल एक कानूनी अपराध है, बल्कि यह बच्चों के सुनहरे भविष्य और उनके स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ है।

वहीं, ताजपुर प्रखंड में बीडीओ रवि भूषण ने रथ को रवाना करते हुए प्रशासनिक प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम का सफल कार्यान्वयन तभी संभव है जब इसमें जनता की सक्रिय भागीदारी हो। उन्होंने ‘जन-जागरण’ को इस कुरीति पर विजय पाने का सबसे प्रभावी हथियार बताया।

मोरवा प्रखंड विकास पदाधिकारी अरुण कुमार निराला बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखाते

24 जनवरी से 8 मार्च तक चलेगा जागरूकता का रथ

जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के कार्यकर्ता पप्पू यादव ने अभियान की रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि यह रथ केवल एक वाहन नहीं, बल्कि बदलाव का दूत है। यह यात्रा 24 जनवरी से शुरू हुई है और 8 मार्च (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) तक जिले के सुदूर गांवों, मोहल्लों और धार्मिक स्थलों तक पहुँचेगी। इसका मुख्य उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक बाल विवाह के दुष्प्रभावों की जानकारी पहुँचाना है।

शपथ और हस्ताक्षर अभियान: समाज ने थामी जिम्मेदारी

कार्यक्रम के दौरान एक मार्मिक दृश्य तब देखने को मिला जब उपस्थित जनसमूह ने एक साथ स्वर मिलाकर शपथ ली। लोगों ने संकल्प लिया कि:

“हम समाज में लड़की की 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष से पहले शादी नहीं होने देंगे। यदि हमें कहीं भी बाल विवाह की सूचना मिलती है, तो हम तत्काल इसकी जानकारी प्रशासन को देंगे।”

शपथ ग्रहण के बाद डॉ. दीप्ति कुमारी ने बाल विवाह रोकथाम की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कम उम्र में विवाह से लड़कियां शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य से वंचित रह जाती हैं। इसके बाद उपस्थित नागरिकों ने हस्ताक्षर कर इस अभियान के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का आह्वान

सामाजिक कार्यकर्ता सरिता कुमारी ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे समस्तीपुर के लिए गौरव की बात बताया। उन्होंने कहा कि जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र द्वारा संचालित यह रथ गांव-गांव जाकर लोगों की सोच बदलने का कार्य कर रहा है। वक्ताओं ने सामूहिक रूप से बाल अधिकारों की रक्षा और सुरक्षित बचपन के लिए एकजुट होने पर जोर दिया।

इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति

इस अभियान को सफल बनाने में पिंकेश कुमार, कार्यक्रम प्रबंधक डॉ. दीप्ति कुमारी, मयंक कुमार सिन्हा, राजीव कुमार साह, दिनेश प्रसाद चौरसिया, वीभा कुमारी, माजदा खारुन, रवि कुमार मिश्रा, सुरेंद्र प्रसाद सिंह और विनोद कुमार गुप्ता सहित दर्जनों कार्यकर्ताओं और गणमान्य नागरिकों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नारों और संकल्पों के गूंजते स्वर के साथ रवाना हुआ यह रथ अब जिले की हर पंचायत में बाल विवाह के खिलाफ प्रतिरोध की नई मशाल जलाएगा।

पुरखों के संघर्ष और शिक्षा की मशाल: डॉ. राजेश ने कला के माध्यम से जगाई सामाजिक चेतना

मुजफ्फरपुर/समस्तीपुर। संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज की 649वीं जयंती के शुभ अवसर पर उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों में वैचारिक पुनर्जागरण की एक नई लहर देखने को मिली। इस अवसर पर प्रखर वक्ता और समाजसेवी डॉ. राजेश कुमार ने मुजफ्फरपुर के सकरा और तुर्की प्रखंड सहित समस्तीपुर जिले के नाजीरगंज और हाजीपुर के विभिन्न क्षेत्रों में सघन दौरा किया। उन्होंने न केवल गुरु रविदास जी को नमन किया, बल्कि कला, झांकी और गीतों के माध्यम से समाज को उनके गौरवशाली किंतु संघर्षपूर्ण इतिहास से रूबरू कराया।

गले में हांडी डालकर झांकी प्रस्तुत करते डॉ. राजेश कुमार

इतिहास का जीवंत चित्रण: “क्यों बांधा गया कमर में झाड़ू?”

आयोजन के दौरान डॉ. राजेश ने एक विशेष झांकी प्रस्तुत की, जो वहां मौजूद जनसमूह के लिए आकर्षण और आत्मचिंतन का केंद्र बनी रही। उन्होंने अत्यंत भावुक और तार्किक ढंग से उन कुरीतियों की व्याख्या की, जो सदियों पहले उनके पूर्वजों पर थोपी गई थीं:

  • गले में हांडी (कटिया): उन्होंने बताया कि एक समय था जब तथाकथित अछूत माने जाने वाले लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर थूकने तक की अनुमति नहीं थी, उन्हें गले में बर्तन (कटिया) लटकाना पड़ता था।
  • कमर में झाड़ू: मार्ग पर चलते समय पैरों के निशान मिटाने के लिए कमर में झाड़ू बांधनी पड़ती थी, ताकि धरती “अपवित्र” न हो।
  • पैरों में घुंघरू: डॉ. राजेश ने समझाया कि पैरों में घुंघरू इसलिए बांधे गए थे ताकि उनकी आहट सुनकर “उच्च वर्ग” के लोग अपना रास्ता बदल लें और उनकी छाया से बच सकें।

इस कला प्रदर्शन का उद्देश्य समाज को यह अहसास दिलाना था कि आज वे जिस आजादी और सम्मान की सांस ले रहे हैं, उसके पीछे उनके पूर्वजों का कितना बड़ा बलिदान और अपमान रहा है।

शिक्षा: विकास की एकमात्र कुंजी

डॉ. राजेश कुमार  ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रसिद्ध मूलमंत्र— शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो”—पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कार्यक्रम  को संबोधित करते हुए कहा कि गुलामी की बेड़ियों को काटने का एकमात्र हथियार “शिक्षा” है।

उन्होंने डॉ. अंबेडकर के शब्दों को दोहराते हुए कहा, शिक्षा उस शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा, वह दहाड़ेगा”। उन्होंने समाज के हर वर्ग, विशेषकर वंचित समाज से अपील की कि वे अपने बच्चों की शिक्षा के साथ किसी भी कीमत पर समझौता न करें।

कार्यक्रम को संबोधित करते डॉ. राजेश कुमार

नारा: “आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे”

कार्यक्रम के अंत में उन्होंने बच्चों और अभिभावकों में जोश भरते हुए प्रेरक नारे लगवाए। उन्होंने कहा, नोन-रोटी खाएंगे, फिर भी स्कूल जाएंगे” और आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे”। डॉ. राजेश का स्पष्ट संदेश था कि यदि समाज को देश और दुनिया के मुख्यधारा में शामिल होना है, तो उसे अपनी आने वाली पीढ़ी को उच्च शिक्षा से लैस करना ही होगा।

सांस्कृतिक और वैचारिक समागम

तस्वीरों में देखा जा सकता है कि मंच पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे ढोलक और तबले के साथ स्थानीय कलाकारों ने भक्ति और वैचारिक गीतों की प्रस्तुति दी। डॉ. राजेश खुद एक हाथ में लाठी और गले में प्रतीकात्मक ‘कटिया’ लेकर मंच पर खड़े होकर समाज को जागृत करते नजर आए।

यह कार्यक्रम केवल एक जयंती समारोह न रहकर, एक वैचारिक पाठशाला बन गया, जिसने लोगों को अपने अतीत पर गर्व करने और भविष्य को शिक्षा के माध्यम से उज्ज्वल बनाने की प्रेरणा दी।