मुजफ्फरपुर | मुजफ्फरपुर समेत उत्तर बिहार के आसमान पर आज जो मंजर दिखा, उसने विज्ञान और परंपरा दोनों को झकझोर कर रख दिया है। वैशाख का महीना, जिसमें आसमान से आग बरसती है और लू के थपेड़े चलते हैं, वहां आज सुबह की शुरुआत घने कुहासे और धुंध के साथ हुई। सकरा कृषि फॉर्म से आई तस्वीरें गवाह हैं कि प्रकृति ने अपना रास्ता बदल लिया है। लेकिन यह ‘ठंडी सुबह’ सुकून देने वाली नहीं, बल्कि आने वाले भीषण अकाल और ‘आग’ की आहट है।

कहावतों में छिपा है भविष्य का सच
ग्रामीण इलाकों के बुजुर्गों ने जैसे ही यह कोहरा देखा, उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। लोक-कवि घाघ और भड्डरी, जिनकी गणनाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार माना जाता है, उनके अनुसार यह संकेत बेहद शुभ नहीं हैं।
1. आग की निशानी है यह धुंध: बुजुर्ग कहते हैं—
“माघ का कोहरा सावन में पानी, वैशाख का कोहरा आग की निशानी।”
इसका सीधा अर्थ है कि यदि माघ (जनवरी-फरवरी) में कोहरा पड़े तो सावन में झमाझम बारिश होती है, लेकिन यदि यही कोहरा वैशाख (अप्रैल-मई) में दिख जाए, तो यह ‘आग’ यानी भीषण सूखे और लू का प्रतीक है। यह संकेत है कि आने वाले समय में जल स्रोत सूख जाएंगे और फसलें जलकर राख हो जाएंगी।
2. मानसून की कमर टूटने का संकेत: घाघ की एक और प्रसिद्ध कहावत इस स्थिति पर सटीक बैठती है:
“सावन मास चले पुरवैया, बेचि डारु धेनु अरु गैया। वैशाख मास जो जाड़ा पड़े, तौ सावन में कोहरा लगे॥”
वैज्ञानिक और पारंपरिक दोनों ही दृष्टिकोण मानते हैं कि वैशाख में ‘तपन’ का होना अनिवार्य है। यदि इस समय ठंडक या कोहरा बढ़ता है, तो वायुमंडल में वह ‘लो प्रेशर एरिया’ (निम्न दबाव) नहीं बन पाता, जो हिंद महासागर से मानसूनी बादलों को खींचकर लाता है। यानी, आज का कोहरा कल की प्यासी धरती का गवाह है।

किसान और पलायन का डर
सकरा के स्थानीय किसानों का कहना है कि अगर मौसम का यही मिजाज रहा, तो खेती की लागत निकालना भी मुश्किल होगा। कहावत है:
“चौत सुक्ला अष्टमी, जो गरजै आधी रात। तुम जाओगे पिया मालवा, हम जाबैं गुजरात॥”
अर्थात, यदि इस संधि काल में मौसम असामान्य व्यवहार करे, तो किसान को अपनी जमीन छोड़कर मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ता है। वैशाख का यह कोहरा संकेत दे रहा है कि इस वर्ष ‘अन्नदाता’ के माथे पर चिंता के बल पड़ने वाले हैं।

विज्ञान और परंपरा का मेल
मौसम वैज्ञानिक भी दबी जुबान में घाघ की इन बातों का समर्थन कर रहे हैं। वर्तमान में इसे ‘एल नीनो‘ (El Niño) के प्रभाव से जोड़कर देखा जा रहा है। जब प्री-मानसून के दौरान तापमान बढ़ना चाहिए, तब कोहरा छाने का मतलब है कि समुद्री हवाओं का रुख बदल रहा है। नमी जो मानसून के लिए संचित होनी चाहिए थी, वह असमय ही जमीन पर गिर रही है।
प्रकृति के नियमों के विरुद्ध वैशाख में कोहरे का दिखना एक गंभीर चेतावनी है। शासन और प्रशासन को अभी से जल संचयन और संभावित सूखे से निपटने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।





