ब्रह्म स्थान पर लगती है इनकी क्लास,क्या आईएएस बनेंगे? मुरौल में ‘बंक मार’ छात्र,
मुरौल, मुजफ्फरपुर। क्या आपने कभी सोचा है कि जिस बच्चे को आप माथे पर तिलक लगाकर या दुआएं देकर स्कूल भेजते हैं, वह रास्ते के मोड़ से ही अपने भविष्य की दिशा बदल लेता है? मुरौल प्रखंड कार्यालय से महज पांच सौ मीटर उत्तर, ब्रह्म स्थान के चबूतरे पर जो तस्वीर दिखी, वह केवल पांच बच्चों के क्लास बंक करने की खबर नहीं है, बल्कि हमारे दम तोड़ते सामाजिक उत्तरदायित्व का ‘पोस्टमार्टम’ है।

सुबह घर से , नौ बजे मंदिर का चबूतरा, बारह बजे घर की राह
रिपोर्टर की नजर जब ब्रह्म स्थान पर पड़ी, तो वहां पांच छात्र स्कूल ड्रेस में ठहाके लगाते मिले। कोई हाथ में सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल थामे मजे ले रहा था, तो कोई गप्पों में मशगूल था। ये बच्चे सुबह घर से तो स्कूल के लिए निकले थे, लेकिन उनकी राहें क्लासरूम के बजाय इस चबूतरे की ओर मुड़ गईं। ताज्जुब की बात यह है कि राह चलते राहगीर भी इन्हें देखकर अनदेखा कर देते हैं। क्या हमारा समाज इतना संवेदनहीन हो गया है कि अपने ही बच्चों को बर्बाद होते देख मूकदर्शक बना रहेगा?
चबूतरे पर सॉफ्ट ड्रिंक पीते बच्चों से मुरौल का नाम रोशन होगा?
सवाल सीधा है और बेहद कड़वा। हाथ में सॉफ्ट ड्रिंक की बोतलें थामे ये बच्चे जब ठहाके लगाकर समय काटते हैं, तब वे केवल स्कूल का समय नहीं, बल्कि अपने मां-बाप के पसीने की कमाई और उम्मीदों का गला घोंट रहे होते हैं। क्या इन चबूतरे वाल क्लास से देश को अगला आईएएस या आईपीएस मिलेगा? यह सवाल या इस तरह का बंक मार छात्रों का दृश्य अमूमन हर स्कूल के आस पास दिख जा रहा है, जिस पर अभिभावकों को विचार करना होगा,

समाज, अभिभावक और व्यवस्था का गिरता स्तर
स्कूली बच्चों का ‘कोल्ड ड्रिंक‘ ब्रेक! क्या यही है भविष्य? नौ बजे जब इन बच्चों को स्कूल के क्लास रुम में होना चाहिए, तब ये बच्चे चबूतरे पर ‘पार्टी’ कर रहे होते हैं। बारह बजे तक चलने वाला यह ‘कोल्ड ड्रिंक ब्रेक’ उस मानसिक खोखलेपन को दर्शाता है, जहाँ बच्चों को पढ़ाई से ज्यादा आनंद अनुशासन तोड़ने में आ रहा है। यह मौज-मस्ती आने वाले समय में एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेगी, जिसके पास डिग्रियां तो शायद हों, पर योग्यता शून्य होगी।
नीचे की तस्वीर में देखें बच्चे कैसे खतरनाक ढ़ंग से दिवाल फांद रहे हैं,
मुरौल में शिक्षा का हाल बेहाल! यूनिफॉर्म में सजे बच्चों का इस तरह सड़कों पर आवारागर्दी करना मुरौल की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक निगरानी पर सबसे बड़ा तंज है। यह तस्वीर चीख-चीख कर कह रही है कि शिक्षा का ढांचा केवल इमारतों तक सिमट गया है, संस्कारों और अनुशासन की जड़ें सूख चुकी हैं।
बाउंड्री पार, भविष्य बर्बाद! नया ‘एडवेंचर स्पोर्ट’ : मध्य विद्यालय मुरौल के छात्रों के लिए स्कूल की बाउंड्री अब सुरक्षा नहीं, बल्कि एक चुनौती है जिसे वे हर रोज पार करते हैं। जब अनुशासन की सीमा (बाउंड्री) टूटती है, तो भविष्य की मर्यादा भी तार-तार होने लगती है।
खतरनाक लापरवाही: खेत में भागते बच्चे, जिम्मेदार कौन? जैसे ही इन बच्चों ने कैमरा देखा, वे अपनी पहचान छिपाने के लिए मकई के खेत की ओर भाग खड़े हुए। यह भागना उनके ‘अपराध बोध’ को दर्शाता है। लेकिन क्या केवल बच्चे जिम्मेदार हैं? वह समाज कहाँ है जो पहले मोहल्ले के हर बच्चे को अपना समझकर टोकता था? आज हम इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि भविष्य को बर्बाद होते देख भी आंखें मूंद लेते हैं।

अभिभावकों के लिए ‘वेक-अप कॉल‘
सावधान! अगर आप भी केवल बच्चे को स्कूल भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझते हैं, तो आप अपने बच्चे के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं। आपकी थोड़ी सी लापरवाही और निगरानी की कमी बच्चे को अंधेरी गलियों में धकेल सकती है। समय रहते हकीकत मालूम करें, वरना पछतावे के अलावा कुछ हाथ नहीं आएगा।

प्रधानाध्यापक का पक्ष: “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता”
मध्य विद्यालय मुरौल के प्रधानाध्यापक शशि भूषण कुमार ने स्पष्ट किया कि विद्यालय के अंदर की जिम्मेदारी शिक्षकों की है, लेकिन बाहर की बागडोर समाज और अभिभावकों के हाथ में है। उन्होंने कहा—
“हम प्रतिमाह बैठक करते हैं, लेकिन अभिभावकों की कम उपस्थिति चिंताजनक है। बाउंड्री की ऊँचाई कम होना भी एक समस्या है, लेकिन जब तक गार्जियन और जनप्रतिनिधि साथ नहीं आएंगे, अनुशासन संभव नहीं है।”
एचएम साहब ने बताया कि हर महीने के आखिरी शनिवार को अभिभावकों के साथ मीटिंग होती है, लेकिन अभिभावकों की उपस्थिति आधी भी नहीं रहती है ।

मुरौल के ये वही बच्चे हैं जिनसे कल को डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस बनने की उम्मीद की जाती है। लेकिन अगर बचपन ‘ब्रह्म स्थान’ पर सॉफ्ट ड्रिंक पीकर और क्लास बंक करके बीतेगा, तो भविष्य अंधकारमय ही होगा। अभिभावकों की यह मजबूरी है या लापरवाही कि वे यह भी नहीं देखते कि बच्चा स्कूल के गेट के अंदर गया या नहीं?यह खबर केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यदि आज समाज ने इन बच्चों को सही रास्ता नहीं दिखाया, तो कल यही ‘बंक मार’ संस्कृति हमारे समाज की पहचान बन जाएगी।





