सकरा (मुजफ्फरपुर): मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड स्थित बसंतपुर झिटकाही की पावन धरती पर गुरुवार को भक्ति का ऐसा सैलाब उमड़ा कि आस्था के सारे बांध टूट गए। अशोक विहार होटल के पीछे बने विशाल खेल मैदान में चैत्र नवरात्र के महापर्व पर जब कलश स्थापना के साथ दस दिवसीय भव्य मेले और ‘श्रीराम कथा’ का शंखनाद हुआ, तो पूरा इलाका ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।
संध्या आरती के बाद जब अयोध्या धाम की सुप्रसिद्ध कथावाचिका सुश्री साधना शास्त्री व्यासपीठ पर विराजमान हुईं, तो उन्होंने कलयुग के पापों से मुक्ति का ऐसा अचूक मंत्र दिया कि पंडाल में मौजूद हजारों भक्त निशब्द रह गए। शास्त्री जी ने हुंकार भरते हुए कहा— “इंसान उतना पाप कर ही नहीं सकता, जितना उसे जड़ से मिटाने की क्षमता अकेले भगवान के नाम में है।” भजनों की मधुर तान और शास्त्री जी के तार्किक प्रवचनों ने पहले ही दिन श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो साक्षात अयोध्या की दिव्यता सकरा की इस धरती पर उतर आई हो।
अयोध्या की साधना शास्त्री ने बिखेरी राम नाम की महिमा
संध्या आरती के पश्चात अयोध्या धाम से पधारीं प्रख्यात कथावाचिका सुश्री साधना शास्त्री के द्वारा ‘श्रीराम कथा’ का श्रीगणेश हुआ। कथा के प्रारंभ में स्थानीय महिलाओं ने पारंपरिक रूप से कथावाचिका का तिलक लगाकर और पुष्प वर्षा कर अभिनंदन किया। कार्यक्रम की शुरुआत सुमधुर भजनों से हुई। ‘हरि बोल, मुकुंद बोल, गोपाल बोल, गोविंद बोल’ और ‘तू मृत्युलोक में आया, तूने राम नाम नहीं गाया’ जैसे भजनों पर पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे।
कलयुग में केवल नाम ही आधार: साधना शास्त्री
भक्तों को संबोधित करते हुए साधना शास्त्री ने कलयुग में भगवद नाम की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “कलयुग में भगवान का नाम ही सबसे बड़ा सहारा है। जो गति सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में सेवा से प्राप्त होती थी, वही परम गति कलयुग में केवल राम नाम संकीर्तन से सुलभ है।” उन्होंने तुलसीदास जी की चौपाई ‘कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा‘ का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रभु का नाम, धाम, रूप और लीला चारों एक ही तत्व हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई पापी व्यक्ति उतना पाप कर ही नहीं सकता, जितना पाप नष्ट करने की क्षमता भगवान के अकेले नाम में है।
कथा श्रवण का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व
कथा के प्रथम दिन की महत्ता बताते हुए शास्त्री जी ने कहा कि पहले दिन की कथा नींव के समान होती है। जब तक हम किसी के महत्व को जानेंगे नहीं, तब तक उससे प्रेम (प्रतीति) नहीं होगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे ‘कल आएंगे’ की सोच छोड़कर पहले दिन से ही जुड़ें।
उन्होंने भगवान के निवास स्थान की चर्चा करते हुए वाल्मीकि रामायण का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा:
“जिस प्रकार समुद्र कभी नदियों से नहीं भरता, वैसे ही जिसके कान कथा सुनने से कभी न भरें, भगवान सीता और लक्ष्मण सहित उसके हृदय में सदैव निवास करते हैं।”
जीवन में ‘वाणी‘ और ‘समझदारी‘ का संगम जरूरी
रामचरितमानस के बालकाण्ड की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि बाबा तुलसीदास ने सबसे पहले माता सरस्वती और भगवान गणेश की वंदना की है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में ‘वाणी’ (सरस्वती) और ‘विवेक’ (गणेश) दोनों का होना अनिवार्य है। केवल मीठी आवाज होना काफी नहीं है, बल्कि क्या और कैसे बोलना है, इसका ज्ञान (विवेक) ही मनुष्य को सफल बनाता है।
श्रद्धा और विश्वास: अटूट संबंध
कथावाचिका ने एक प्रेरक दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि भगवान के प्रति केवल ‘श्रद्धा’ रखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन पर ‘अटूट भरोसा’ भी होना चाहिए। उन्होंने लोहे की जंजीर और घास-फूस की रस्सी से कुएं में लटकने वाले दो व्यक्तियों की कथा सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रद्धा से अधिक भक्त के भरोसे के वश में होते हैं। उन्होंने कहा कि पार्वती जी श्रद्धा हैं और शिव जी विश्वास हैं; जैसे पति के बिना पत्नी अधूरी है, वैसे ही श्रद्धा के बिना विश्वास और विश्वास के बिना श्रद्धा का कोई मूल्य नहीं है।
गुरु वंदना से हुआ माहौल भावुक
कथा के अंतिम चरण में गुरु की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि गुरु साक्षात परमेश्वर का रूप हैं जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने-अपने गुरुओं का स्मरण करने का आह्वान किया। अंत में ‘गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना’ भजन के साथ प्रथम दिन की कथा का विश्राम हुआ, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया।
भक्ति और शांति के संकल्प के साथ प्रथम दिन का विश्राम
कथा के प्रथम दिन का समापन आरती और सामूहिक वंदना के साथ हुआ, जहाँ श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे आने वाले नौ दिनों तक संयम और श्रद्धा के साथ प्रभु की भक्ति में लीन रहेंगे। अयोध्या से पधारीं सुश्री साधना शास्त्री की ओजस्वी वाणी ने न केवल सकरा के बसंतपुर झिटकाही को भक्तिमय कर दिया, बल्कि समाज में ‘विवेक और विश्वास’ की स्थापना का संदेश भी दिया।
अशोक विहार खेल मैदान में आयोजित यह दस दिवसीय महापर्व अब आने वाले दिनों में और भी भव्य रूप लेगा, जिसमें भगवान राम के जन्म से लेकर रावण वध तक की लीलाओं का सजीव वर्णन किया जाएगा। आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि 28 मार्च, शनिवार को विजयदशमी के पावन अवसर पर भव्य शोभायात्रा और देवी विसर्जन के साथ इस विशाल अनुष्ठान का विधिवत समापन होगा। तब तक, यहाँ का वातावरण ‘जय श्रीराम’ और ‘माँ दुर्गे’ के जयकारों से गूंजता रहेगा, जो क्षेत्र के लोगों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है।
केक काटने वाली ‘मॉर्डन‘ संस्कृति बनाम कलश स्थापना की सनातन परंपरा के आत्म-चिंतन का समय
रिर्पोट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’
31 दिसंबर की आधी रात को कड़ाके की ठंड में, जब प्रकृति सुप्त अवस्था में हो और भारतीय जनमानस रजाई में दुबका हो, तब केक काटकर शोर-शराबे और आतिशबाजी के बीच ‘नया साल‘ मनाना वास्तव में हास्यास्पद और तार्किक रूप से औचित्यहीन है। यह पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने की वह अंधी दौड़ है, जहाँ हम यह भी नहीं सोचते कि जिस कैलेंडर को हम अपना रहे हैं, वह न तो ऋतु परिवर्तन से जुड़ा है, न ही खगोलीय रूप से सटीक है। विडंबना देखिए, अपनी उन हजारों साल पुरानी वैज्ञानिक परंपराओं को, जो वसंत के आगमन और नई फसलों के साथ जीवन के उत्सव का संदेश देती हैं, उन्हें दरकिनार कर हम एक प्रशासनिक तारीख पर झूमने को ‘मॉर्डन‘ मान बैठे हैं। यह हमारी मानसिक दासता का प्रतीक है, जहाँ हम अपनी गौरवशाली जड़ों को छोड़कर एक बेगाना जश्न मनाने में ही अपनी शान समझ रहे हैं।
कालचक्र की संधि और हमारी सांस्कृतिक पहचान
समय एक निरंतर बहती धारा है, लेकिन इस धारा को मापने के पैमाने संस्कृतियों के चरित्र को दर्शाते हैं। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक के मध्य में खड़े हैं, भारत एक वैचारिक संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक ओर ‘ग्लोबलाइजेशन’ की चकाचौंध है, जहाँ 31 दिसंबर की आधी रात को आतिशबाजी और नशे के शोर में डूबा समाज खुद को ‘आधुनिक’ घोषित करता है, वहीं दूसरी ओर भारत की वह प्राचीन, वैज्ञानिक और गौरवशाली कालगणना है जो आज 19 मार्च 2026 को ‘विक्रम संवत 2083′ के रूप में अपना शंखनाद करने जा रही है।
यह खबर केवल एक तारीख के बदलने की सूचना नहीं है, बल्कि यह करोड़ों सनातनियों के लिए आत्म-चिंतन का एक विस्तृत दस्तावेज़ है। क्या हम केवल नारों में सनातनी हैं, या हम उस समय चक्र को भी समझते हैं जिसे हमारे पूर्वजों ने ब्रह्मांड की धड़कन से जोड़कर बनाया था?
भारत का नया साल 19 मार्च , 14 अप्रैल या 01 जनवरी
भारत के ‘नए साल’ को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति रहती है, लेकिन इसके पीछे के वैज्ञानिक और सांस्कृतिक आधार को समझना आवश्यक है। 1 जनवरी को मनाया जाने वाला नववर्ष पूरी तरह से पश्चिमी ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ पर आधारित है, जो मात्र एक वैश्विक तारीख है।
इसके विपरीत, 19 मार्च 2026 को आने वाला ‘विक्रम संवत 2083’ सनातन संस्कृति का वास्तविक नव वर्ष है। यह सूर्य की स्थिति, चंद्रमा की कलाओं और वसंत ऋतु के आगमन के वैज्ञानिक मिलन पर आधारित है, जिसे ‘सृष्टि का जन्मदिन’ भी माना जाता है। वहीं, यदि हम भारत सरकार के आधिकारिक ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ की बात करें, तो वह ‘शक संवत’ पर आधारित है, जिसका नया साल सौर गणना के अनुसार प्रतिवर्ष 22 मार्च (लीप वर्ष में 21 मार्च) को निश्चित होता है, जबकि इस वर्ष 2026 में यह 14 अप्रैल को नियत है । अतः, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से नया साल 19 मार्च को है, जबकि प्रशासनिक और आधिकारिक दृष्टिकोण से यह 22 मार्च को आता है। 22 मार्च को ‘शक संवत 1948’ का प्रारंभ होता है, जिसे भारत सरकार ने 1957 में आधिकारिक मान्यता दी थी।
भारतीय विविधता में 1 जनवरी का उत्सव जहाँ एक वैश्विक तारीख है, वहीं मार्च में आने वाले संवत हमारे गौरवशाली इतिहास, प्रकृति और वैज्ञानिक चेतना के प्रतीक हैं।
मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ शिक्षाविद् और धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्तहिन्दी विभागाघ्यक्ष डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह ने भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिकता और ऐतिहासिकता पर गहरा प्रकाश डाला है। उन्होंने काल-गणना के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट करते हुए इसे भारतीय दर्शन का आधार बताया।
भारतीय नववर्ष पर डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह का वक्तव्य:
कलि और विक्रम संवत की प्राचीनता पर:
“जब हम सनातनी मान्यताओं की बात करते हैं, तो ‘कलि संवत’ (श्री कृष्ण संवत) को नजरअंदाज करना असंभव है। वर्तमान में हम इसके 5127वें वर्ष में हैं, जो भारतीय कालगणना की प्राचीनता का उद्घोष करता है। वहीं, विक्रम संवत की ऐतिहासिकता पर विद्वानों के मतभेद रहे हैं, लेकिन अधिकतर विद्वान इसे सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा 380 ईस्वी में शकों पर विजय के उपलक्ष्य में ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि और ईसा पूर्व 57 वर्ष की गणना से जोड़कर देखते हैं।”
शकाब्द की वैज्ञानिकता और राष्ट्रीय पहचान पर:
“तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शकाब्द को भारत का ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ घोषित किया था, क्योंकि यह पूर्णतः सौर और चंद्र गणनाओं पर आधारित वैज्ञानिक पद्धति है। सम्राट कनिष्क के समय में ही बौद्ध धर्म का संस्कृत में विस्तार हुआ था। इस वर्ष शकाब्द की गणना 14 अप्रैल से प्रभावी होगी, जो खगोलीय दृष्टि से अत्यंत सटीक है।”
वैदिक ऋषियों का ‘गुणवत्तापूर्ण जीवन‘ का संकल्प:
“प्राचीन काल में नववर्ष की शुरुआत शरद ऋतु से होती थी। वेदों में ऋषियों ने ‘पश्येम शरद: शतम’ के माध्यम से केवल लंबी आयु की नहीं, बल्कि ‘गुणवत्तापूर्ण जीवन’ की कामना की है। यह मंत्र बौद्धिक क्षमता (बुद्धेम), शारीरिक पुष्टि (पूषेम) और निरंतर प्रगति (रोहेम) के संतुलन की बात करता है। इसका संदेश है कि मनुष्य सौ वर्षों तक किसी पर बोझ बने बिना समाज में अपना योगदान देता रहे।”
चैत्र का प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक महत्व:
“कालांतर में हमने शरद के स्थान पर ‘चैत्र’ को नववर्ष के लिए चुना, क्योंकि यह जड़ता से चेतनता की ओर बढ़ने का संदेश देता है। चैत्र में प्रकृति में नए पल्लव आने लगते हैं और मनुष्य शिशिर की शीतलता त्यागकर वसंत की ऊर्जा में प्रवेश करता है। भले ही वैश्विक स्तर पर हम 1 जनवरी को नववर्ष मनाते हों, लेकिन भारत की वास्तविक पहचान इन्हीं प्राचीन संवतों और वैदिक मंत्रों में निहित है।”
शक संवत बनाम विक्रम संवत : शक संवत के अनुसार, जिसे भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर भी कहा जाता है, नया साल प्रतिवर्ष 22 मार्च को आता है। लीप वर्ष (Leap Year) होने पर यह 21 मार्च को शुरू होता है। जब कि इस वर्ष मिथिला पंचांग के अनुसार 14 अप्रैल को शक संवत प्रारम्भ होगा ।
ध्यान देने योग्य बात: अक्सर लोग विक्रम संवत और शक संवत के नए साल को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। जहाँ विक्रम संवत (धार्मिक पंचांग) के अनुसार नया साल ‘चैत्र शुक्ल प्रतिपदा’ (चंद्र तिथि) को बदलता है (जो 2026 में 19 मार्च को है), वहीं शक संवत (राष्ट्रीय कैलेंडर) की तिथि सौर गणना पर आधारित होने के कारण लगभग हर साल 22 मार्च को ही स्थिर रहती है।
“इस वर्ष शकाब्द की गणना 14 अप्रैल से प्रभावी होगी, जो खगोलीय दृष्टि से अत्यंत सटीक है।”- डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह (धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्त हिन्दी विभागाघ्यक्ष )
2026 का शंखनाद: 19 मार्च को उगेगा ‘विक्रम संवत 2083′ का सूर्य
जब दुनिया एक जनवरी को कड़ाके की ठंड और सुप्त प्रकृति के बीच नया साल मनाकर थक चुकी होती है, तब भारतीय उपमहाद्वीप में चैत्र की शुक्ल प्रतिपदा एक नई ऊर्जा लेकर आती है। 19 मार्च 2026 की सुबह जब सूर्य की पहली किरण धरती को छुएगी, वह केवल एक कैलेंडर का पन्ना नहीं बदलेगी, बल्कि वह उस ‘संवत्सर’ की शुरुआत करेगी जो मानव सभ्यता के सबसे शुद्ध और वैज्ञानिक पंचांगों में से एक है।
भारतीय परंपरा में इसे ‘नव संवत्सर’ कहा जाता है। संवत्सर का अर्थ है—वह कालखंड जिसमें सभी ऋतुएं पूर्णता के साथ निवास करती हैं। 19 मार्च का दिन केवल धार्मिक अनुष्ठान का दिन नहीं है, बल्कि यह उस गौरव की पुनर्वापसी है, जिसे मैकाले की शिक्षा पद्धति और पाश्चात्य दासता ने हमारी स्मृतियों से धुंधला करने का प्रयास किया था।
प्रकृति का श्रृंगार: जब ब्रह्मांड उत्सव मनाता है
विज्ञान कहता है कि ऊर्जा का क्षय नहीं होता, वह रूपांतरित होती है। जनवरी की पहली तारीख को उत्तर भारत और हिमालयी क्षेत्रों में प्रकृति बर्फ की चादर ओढ़े सो रही होती है। पेड़ों पर पत्ते नहीं होते, पक्षी मौन होते हैं और जनजीवन ठिठुरा हुआ होता है। ऐसे में ‘नया साल’ मनाना तर्कहीन प्रतीत होता है।
इसके विपरीत, मार्च का मध्य (चैत्र मास) वह समय है जब प्रकृति स्वयं दुल्हन की तरह सजती है:
ऋतुराज वसंत का आगमन: न अधिक ठंड, न अधिक गर्मी। वातावरण में एक मादक सुगंध होती है।
नव-पल्लव: पेड़ों पर पुरानी पत्तियों के स्थान पर कोमल लाल-हरी कोंपलें आती हैं।
आम की मंजरी: हवा में आम के बौर की खुशबू घुल जाती है, जो प्रजनन और नए जीवन का प्रतीक है।
सुनहरी फसल: खेतों में गेहूं की बालियां सोने की तरह चमकने लगती हैं। किसान अपनी मेहनत का फल कटाई के लिए तैयार देखता है।
जब प्रकृति स्वयं ‘न्यू बिगिनिंग’ का संकेत दे रही हो, तब भारतीय मनीषा का नया साल मनाना ही सबसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
चैत्र नवरात्रि और नव संवत्सर का अटूट संबंध: सृष्टि का जन्मदिन
विक्रम संवत का प्रारंभ चैत्र नवरात्रि के पहले दिन से होता है। यह संयोग अद्भुत और रहस्यों से भरा है। हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर ‘ब्रह्म पुराण’ के अनुसार, इसी प्रतिपदा तिथि को भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया था और समय की गणना शुरू की थी। इसीलिए इसे ‘सृष्टि का जन्मदिन‘ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।
समय और शक्ति का संतुलन
19 मार्च 2026 को जब हम नव संवत्सर का स्वागत करेंगे, उसी दिन ‘कलश स्थापना’ या ‘घटस्थापना’ होगी। यह संदेश देता है कि समय (काल) और शक्ति (दुर्गा) एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना शक्ति के समय का पहिया नहीं घूम सकता और बिना समय के शक्ति की अभिव्यक्ति संभव नहीं है। नौ दिनों का यह अनुष्ठान हमें शारीरिक शुद्धि (उपवास), मानसिक शुद्धि (मंत्र) और आध्यात्मिक शुद्धि (ध्यान) की ओर ले जाता है। क्या केक काटने और शोर मचाने वाली संस्कृति में ऐसा कोई भी दर्शन मौजूद है?
विक्रम संवत का गौरवशाली इतिहास: शौर्य और स्वाभिमान की गाथा
विक्रम संवत का इतिहास केवल अंकों की गणना नहीं, बल्कि भारत की तलवार की धार और उसके स्वाभिमान की कहानी है।
विदेशी दासता से मुक्ति का पर्व
आज से लगभग 2082 वर्ष पूर्व (57 ईसा पूर्व), भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था और विदेशी आक्रांता ‘शक’ भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे थे। वे क्रूर थे और भारतीय संस्कृति को नष्ट कर रहे थे। उस अंधकारमय युग में मालवा (उज्जैन) की भूमि से एक महानायक का उदय हुआ—सम्राट विक्रमादित्य।
उन्होंने बिखरी हुई भारतीय शक्तियों को एकजुट किया और शकों के विरुद्ध महायुद्ध छेड़ा। उन्होंने न केवल शकों को पराजित किया, बल्कि उन्हें भारत की सीमाओं से बहुत दूर खदेड़ दिया। इस ऐतिहासिक विजय की स्मृति में, भारत को विदेशी दासता से मुक्त कराने के उपलक्ष्य में, उन्होंने ‘विक्रम संवत’ का प्रवर्तन किया।
प्रजावत्सल राजा की उदारता
इतिहासकारों के अनुसार, विक्रमादित्य ने नया संवत शुरू करने से पहले अपनी पूरी प्रजा को ‘ऋणमुक्त’ कर दिया था। प्रजा को पूरी तरह से ऋणमुक्त करके एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पेश की। यह एक ऐसे राजा की कहानी है जिसने अपने विजय उत्सव को जनता के आर्थिक बोझ को कम करके मनाया। इसीलिए विक्रम संवत हमारे लिए स्वाभिमान, स्वतंत्रता और जनकल्याण का प्रतीक है।
एक ‘चक्रवर्ती’ सम्राट के रूप में विक्रमादित्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बिखरते हुए भारत को एक राजनीतिक और सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया। इतिहास में उन्हें ‘शकारि’ (शकों का शत्रु) कहा गया, लेकिन वास्तव में वे भारतीय संस्कृति के उस सुरक्षा कवच के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने विदेशी विचारधाराओं और आक्रमणों के सामने भारतीय मूल्यों की रक्षा की। आज भी विक्रमादित्य का नाम लेते ही एक ऐसे गौरवशाली भारत का चित्र उभरता है जहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का सुंदर समन्वय था। उनका व्यक्तित्व यह सिद्ध करता है कि एक महान शासक वही है जो शस्त्र और शास्त्र, दोनों में निपुण हो।
विज्ञान का सर्वोच्च शिखर: विक्रम संवत की खगोलीय शुद्धता
पाश्चात्य ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ जिसे हम आज उपयोग करते हैं, वह खगोलीय रूप से त्रुटिपूर्ण है। उसमें समय को संतुलित करने के लिए हर चार साल में ‘लीप ईयर’ का सहारा लेना पड़ता है। इसके बावजूद, वह कैलेंडर चंद्रमा की गति और ऋतुओं के बदलाव के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता।
लुनी-सोलर (चंद्र-सौर) पद्धति
विक्रम संवत एक ‘लुनी-सोलर‘ पंचांग है। हमारे ऋषियों ने नक्षत्रों की गति, सूर्य के उत्तरायण-दक्षिणायन और चंद्रमा की 16 कलाओं का ऐसा सटीक गणित बिठाया कि:
इसमें तिथियों का क्षय और वृद्धि खगोलीय गणना पर आधारित होती है।
ग्रहण की भविष्यवाणी हजारों साल पहले की जा सकती है और वह एक सेकंड की भी देरी नहीं करती।
यह पंचांग सीधे तौर पर कृषि और मानव शरीर के विज्ञान (Ayurveda) से जुड़ा है।
आधुनिक विज्ञान और ‘बिग बैंग‘
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय ‘सृष्टि संवत’ (जो विक्रम संवत का ही आधार है) के अनुसार सृष्टि की आयु लगभग 1.97 अरब वर्ष बताई गई है। आधुनिक विज्ञान के ‘बिग बैंग’ और पृथ्वी की आयु की नवीनतम गणनाएं भी इसी के इर्द-गिर्द घूमती हैं। हमारे पूर्वजों ने बिना दूरबीन के वह जान लिया था, जिसे नासा आज खोजने का प्रयास कर रहा है।
सांस्कृतिक एकता का सूत्र: कश्मीर से कन्याकुमारी तक
अक्सर लोग कहते हैं कि भारत में हर जगह अलग-अलग त्योहार हैं। लेकिन विक्रम संवत वह धागा है जिसने पूरे भारत को मोतियों की तरह पिरो रखा है। भले ही भाषा और उत्सव के नाम बदल जाएं, लेकिन 19 मार्च 2026 को पूरा भारत एक ही दिन अपना नया साल मना रहा होगा:
महाराष्ट्र (गुड़ी पड़वा): घर के बाहर ‘गुड़ी’ (विजय पताका) फहराई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना (उगादि): ‘युग-आदि’ यानी नए युग की शुरुआत। यहाँ नीम और गुड़ का प्रसाद (बेवु-बेला) दिया जाता है, जो जीवन के सुख-दुख के संतुलन को दर्शाता है।
कश्मीर (नवेह): कश्मीरी पंडितों के लिए यह सबसे पवित्र दिन है, जहाँ वे चावल के कटोरे में फल और फूल रखकर नववर्ष का दर्शन करते हैं।
सिंधी समाज (चेटीचंड): भगवान झूलेलाल के अवतरण दिवस और नववर्ष के रूप में भारी उत्साह।
पंजाब और उत्तर भारत: नवरात्रों के रूप में नौ दिनों तक शक्ति की साधना।
यह विविधता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है, जिसका केंद्र बिंदु विक्रम संवत ही है।
भारत के संविधान में विक्रम संवत की भूमिका: एक संवैधानिक सत्य
आज की पीढ़ी पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव में यह मान बैठी है कि विक्रम संवत केवल ‘पंडितों का पंचांग’ है। लेकिन यह एक ऐतिहासिक और कानूनी सत्य है कि भारत का संविधान, जो इस राष्ट्र की सर्वोच्च नियमावली है, वह भी विक्रम संवत को मान्यता देता है।
26 नवंबर 1949 को जब डॉ. अंबेडकर और अन्य महापुरुषों ने संविधान सभा में संविधान को अंगीकृत किया, तो उसकी मूल प्रस्तावना (Preamble) में लिखा गया:
“…In our Constituent Assembly this twenty-sixth day of November, 1949, do hereby Adopt, Enact and Give to ourselves this Constitution.”
लेकिन इसके हिंदी संस्करण में स्पष्ट उल्लेख है:
मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी ” को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।” यह दर्शाता है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने आधुनिक भारत की नींव रखते समय अपनी प्राचीन विरासत और काल गणना को सर्वोच्च सम्मान दिया था।
राष्ट्रीय पहचान: यद्यपि भारत सरकार ने 1957 में ‘शक संवत’ को राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में अपनाया, लेकिन विक्रम संवत आज भी भारतीय जनमानस के सामाजिक और धार्मिक जीवन का आधार बना हुआ है। राजपत्रों (Gazettes) और महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों में हिंदी तिथियों का उल्लेख इसी परंपरा का सम्मान है।
सांस्कृतिक संप्रभुता: संविधान की मूल प्रति पर बनी चित्रकारियां और उसमें निहित तिथियां यह प्रमाणित करती हैं कि भारत एक ‘संवैधानिक लोकतंत्र’ होने के साथ-साथ एक ‘प्राचीन सभ्यता’ भी है। विक्रम संवत का उल्लेख यह सुनिश्चित करता है कि आधुनिक भारत अपनी जड़ों से कटा हुआ नहीं है। यह दर्शाता है कि भारत के नीति-निर्धारक जानते थे कि एक देश तभी स्वतंत्र होता है जब वह अपनी कालगणना पर गर्व करता है। यदि हमारा संविधान इसे सम्मान देता है, तो हम अपनी आधुनिकता के नशे में इसे क्यों भूल रहे हैं?
शक संवत भारत का प्राचीन ऐतिहासिक कैलेंडर है, जिसकी शुरुआत कुषाण वंश के राजा कनिष्क ने 78 ईस्वी में की थी, जो उनकी राज्यारोहण तिथि मानी जाती है। यह कैलेंडर पूरी तरह से वैज्ञानिक और खगोलीय गणनाओं पर आधारित है, जिसमें सूर्य की स्थिति और नक्षत्रों का सटीक आकलन किया जाता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद, अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचान देने और एक वैज्ञानिक पंचांग को स्थापित करने के उद्देश्य से, भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 को शक संवत को आधिकारिक रूप से देश का ‘राष्ट्रीय कैलेंडर‘ घोषित किया। आज यह भारत सरकार के गजट, आकाशवाणी और दूरदर्शन के समाचारों में ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ प्रयुक्त होता है, जो हमारे गौरवशाली इतिहास और आधुनिकीकरण के बीच एक सेतु का कार्य करता है।
शक संवत और विक्रम संवत दोनों ही भारत की प्राचीन और वैज्ञानिक कालगणना प्रणालियाँ हैं, लेकिन इनके उद्भव, इतिहास और गणना के आधार में महत्वपूर्ण अंतर हैं।
मुख्य अंतर नीचे दी गई तालिका के माध्यम से समझे जा सकते हैं:
अंतर का आधार
विक्रम संवत (Vikram Samvat)
शक संवत (Shaka Samvat)
प्रवर्तक (शुरुआत)
सम्राट विक्रमादित्य (उज्जैन)
राजा कनिष्क (कुषाण वंश)
शुरुआत का वर्ष
57 ईसा पूर्व (BCE)
78 ईस्वी (CE)
ऐतिहासिक कारण
शकों (विदेशी आक्रांताओं) पर विजय और प्रजा को ऋणमुक्त करने की स्मृति में।
राजा कनिष्क के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में।
वर्तमान स्थिति
मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठानों, त्योहारों और व्यक्तिगत पंचांगों में उपयोग।
भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर (22 मार्च 1957 से आधिकारिक मान्यता)।
गणना पद्धति
मुख्य रूप से ‘लुनी-सोलर’ (चंद्र-सौर) आधारित।
सूर्य आधारित (Solar-based) पंचांग, जिसमें महीनों की निश्चित अवधि होती है।
वर्ष का अंतर
विक्रम संवत, ग्रेगोरियन कैलेंडर से 57 वर्ष आगे है।
शक संवत, ग्रेगोरियन कैलेंडर से 78 वर्ष पीछे है।
विक्रम संवत भारतीय शौर्य और विदेशी आक्रांताओं पर विजय का प्रतीक है, वहीं शक संवत भारतीय खगोलीय शुद्धता और सरकारी प्रशासनिक कालगणना का प्रतीक है।
भारत की बहुआयामी नववर्ष परंपराएँ: एक गुलदस्ता
भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर पंथ का सम्मान है। जहाँ सनातनी समाज 19 मार्च को नववर्ष मनाएगा, वहीं देश के अन्य समुदाय भी अपनी गौरवशाली परंपराओं को संजोए हुए हैं:
जैन धर्म: दीपावली के अगले दिन ‘वीर निर्वाण संवत’ के साथ नया साल शुरू होता है।
सिख धर्म: ‘नानकशाही कैलेंडर’ के अनुसार चेत महीने (मार्च) में होले-मोहल्ले के साथ नए साल का उल्लास होता है।
बौद्ध धर्म: वैशाख पूर्णिमा के समय बुद्ध संवत के अनुसार गणना होती है।
इस्लाम: हिजरी संवत के अनुसार मुहर्रम की पहली तारीख को नया साल माना जाता है।
समस्या इन परंपराओं से नहीं है। समस्या उस ‘बाजारवादी नववर्ष‘ से है, जिसमें कोई दर्शन नहीं है, केवल उपभोग और प्रदर्शन है।
युवाओं से अपील: जागने का समय
यहाँ एक कड़वा सवाल पूछना आवश्यक है। हम अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर जयकारे लगाते हैं, हम अपनी ‘रील’ और ‘प्रोफाइल’ पर सनातनी होने का गर्व करते हैं, लेकिन जब 31 दिसंबर आता है, तो हम क्लबों और होटलों की भीड़ में शामिल होकर पश्चिमी धुनों पर क्यों नाचते हैं?
यह मानसिक दासता नहीं तो क्या है?
एक जनवरी को:
न कोई नक्षत्र बदलता है।
न कोई ऋतु बदलती है।
न कोई फसल घर आती है।
न ही कोई ऐतिहासिक विजय जुड़ी है।
यह केवल ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था की देन है। जबकि 19 मार्च को प्रकृति स्वयं हमारे साथ उत्सव मनाएगी। आज के युवा को ‘कूल‘ दिखने की होड़ में अपनी जड़ों को नहीं काटना चाहिए।
युवा शक्ति का कर्तब्य
आधुनिकता का अर्थ पाश्चात्य संस्कृति की नकल करना नहीं है। आधुनिकता का अर्थ है—अपने ज्ञान को विज्ञान की कसौटी पर परखना। विक्रम संवत विज्ञान की उस कसौटी पर 100% खरा उतरता है।19 मार्च 2026 को जब ‘नव संवत्सर 2083′ का उदय हो, तो: अपने मित्रों को ‘Happy New Year’ के बजाय‘नव संवत्सर की शुभकामनाएं‘ कहें।अपने घर के मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों का वंदनवार लगाएं।घर के आंगन में रंगोली बनाएं और छतों पर केसरिया ध्वज फहराएं।नीम की पत्तियां और मिश्री का प्रसाद लें (जो स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है)।
इतिहास और भूगोल का संबंध
कहा जाता है कि “जो समाज अपना इतिहास भूल जाता है, भूगोल उसे मिटा देता है।” हमारी कालगणना हमारी पहचान है। सम्राट विक्रमादित्य का शौर्य, आर्यभट्ट और वराहमिहिर का विज्ञान, और हमारे ऋषियों का अध्यात्म—सब इस ‘विक्रम संवत’ में समाहित है।
यह कालगणना (विक्रम संवत) को अपनाना सांस्कृतिक दासता से मुक्ति और आत्म-सम्मान की पुनर्स्थापना के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह केवल एक कैलेंडर का मामला नहीं, बल्कि हमारी पहचान, गौरवशाली इतिहास और पूर्वजों के वैज्ञानिक ज्ञान से जुड़ने का माध्यम है। जब हम अपनी परंपराओं को छोड़कर पाश्चात्य कैलेंडर का अंधानुकरण करते हैं, तो धीरे-धीरे हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं। विक्रम संवत हमें सम्राट विक्रमादित्य के शौर्य की याद दिलाता है और प्रकृति के चक्र के साथ तालमेल बिठाकर जीने की वैज्ञानिक पद्धति सिखाता है। अपनी संस्कृति के संवाहक बनकर ही हम आने वाली पीढ़ियों को उनकी असली विरासत सौंप सकते हैं।
आज 19 मार्च 2026 से प्रारम्भ होने वाला नया साल केवल एक कैलेंडर का बदलाव नहीं, बल्कि हमारे गौरव की पुनर्स्थापना का अवसर है। आइए, 31 दिसंबर की अंधी दौड़ से बाहर निकलें और 19 मार्च के सनातन सूर्य का स्वागत करें।
“वसंत की खुशबू,आम की मंजरी,प्रकृति का नव-श्रृंगार है।मनाओ उत्सव उस कालगणना का,जो सृष्टि का आधार है।”
“न नक्षत्र बदले, न बदली ऋतु, न प्रकृति का कोई विधान हुआ,तुम झूम रहे उस तारीख पर, जिसका न खगोलीय ज्ञान हुआ।उठो सनातनी! चैत्र की उस पावन बेला को पहचानो,जहाँ कण-कण का श्रृंगार हुआ, और नव-संवत्सर का गान हुआ।”
“दिखावे की उस चमक-धमक में, अपनी जड़ें न काट देना,केक की मीठी परतों में, अपनी विरासत न बांट देना।कलश धरा हो देहरी पर, और मंत्रों का उद्घोष रहे,आधुनिक बनो पर भीतर, गौरवशाली सनातनी होश रहे।”
“आम की महकती मंजरियाँ, और खेतों में स्वर्ण-सी बाली है,यह 19 मार्च की भोर ‘विक्रम‘, गौरव की नई लाली है।ब्रह्मांड की धड़कन से जुड़ी, ऋषियों की यह कालगणना,सृष्टि का हर परमाणु कहता—’शुभ हो नव-संवत्सर मनाना‘!”
“गंडक और गंगा की पावन माटी से, फिर एक हुंकार उठे,बिहार के हर घर-आंगन में, संवत्सर का सत्कार उठे।छोड़ो पाश्चात्य की गुलामी, अपनी पहचान पर नाज करो,विक्रम संवत दो हजार तिरासी (2083) का, आज भव्य आगाज करो।”
मुशहरी (मुजफ्फरपुर): स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत जानने और मरीजों को मिल रही सुविधाओं का मूल्यांकन करने के उद्देश्य से आज मुशहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) का औचक निरीक्षण किया गया। यह निरीक्षण सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार एवं जिला कार्यक्रम प्रबंधक (DPM) रेहान अशरफ द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
AES वार्ड की तैयारियों पर विशेष नजर
गर्मियों के मौसम और AES (चमकी बुखार) की संवेदनशीलता को देखते हुए अधिकारियों ने विशेष रूप से AES वार्ड का गहन मुआयना किया। उन्होंने वार्ड में उपलब्ध दवाइयों, बेडों की संख्या और आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए तैनात किए गए चिकित्सा कर्मियों की उपस्थिति की जांच की। सिविल सर्जन ने निर्देश दिया कि इस बीमारी को लेकर किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का मूल्यांकन
निरीक्षण के दौरान टीम ने मुख्य रूप से इन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया:
लेबर रूम: प्रसव पूर्व और प्रसव पश्चात दी जाने वाली सुविधाओं और स्वच्छता की जांच की गई।
ओपीडी (OPD) सेवाएं: डॉक्टरों की उपस्थिति और मरीजों के पंजीकरण से लेकर इलाज तक की प्रक्रिया का जायजा लिया गया।
संसाधनों की उपलब्धता: अस्पताल में आवश्यक जीवन रक्षक दवाओं और उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।
सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार ने अस्पताल प्रबंधन को निर्देश देते हुए कहा कि मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करना विभाग की प्राथमिकता है। उन्होंने ड्यूटी से गायब रहने वाले कर्मियों पर सख्त रुख अपनाने और परिसर में सफाई व्यवस्था दुरुस्त रखने की बात कही।
मुजफ्फरपुर | 18 मार्च, 2026 जिले में घरेलू और व्यावसायिक गैस की आपूर्ति को लेकर जिला प्रशासन ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। बुधवार को जिला सूचना एवं जन-संपर्क पदाधिकारी और जिला आपूर्ति पदाधिकारी ने संयुक्त रूप से प्रेस वार्ता कर बताया कि जिले में गैस का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और उपभोक्ताओं को पैनिक होने की आवश्यकता नहीं है।
गैस स्टॉक की वर्तमान स्थिति
प्रशासन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जिले की 91 गैस एजेंसियों के पास घरेलू गैस का मजबूत बैकअप है:
कुल भरा हुआ स्टॉक: 29,693 सिलेंडर वर्तमान में उपलब्ध हैं।
ट्रांजिट में स्टॉक: 15,912 सिलेंडर रास्ते में हैं जो जल्द ही पहुंच जाएंगे।
दैनिक खपत: जिले में औसत दैनिक बिक्री 20,355 सिलेंडर है।
कंपनियां: IOCL के पास सबसे अधिक 19,471, HPCL के पास 3,885 और BPCL के पास 6,337 भरे हुए सिलेंडर स्टॉक में हैं।
बुकिंग के लिए नए नियम लागू
गैस वितरण व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए प्रशासन ने बुकिंग के अंतराल में बदलाव किया है:
शहरी क्षेत्र: उपभोक्ता पिछली डिलीवरी के 25 दिनों बाद ही नए सिलेंडर की बुकिंग कर सकेंगे।
ग्रामीण क्षेत्र: ग्रामीण इलाकों के लिए यह सीमा 45 दिन निर्धारित की गई है।
वार्षिक कोटा: एक वर्ष में अधिकतम 12 गैस सिलेंडर ही प्रदान किए जाएंगे।
होम डिलीवरी और ऑनलाइन सुविधा
अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि गैस बुकिंग के 2 से 3 दिनों के भीतर सिलेंडर की होम डिलीवरी सुनिश्चित की जाएगी। उपभोक्ताओं को गैस एजेंसियों पर भीड़ लगाने की जरूरत नहीं है। ऑनलाइन बुकिंग के लिए निम्नलिखित नंबर जारी किए गए हैं:
भारत गैस (BPCL): WhatsApp (1800224344), Missed Call (7710955555)
कालाबाजारी पर रोक और सुरक्षा व्यवस्था
विधि व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुजफ्फरपुर (पूर्वी एवं पश्चिमी) के अनुमंडल पदाधिकारियों द्वारा दंडाधिकारियों और पुलिस बल की नियुक्ति की गई है। विशेष रूप से मुशहरी प्रखंड के शेरपुर स्थित IOCL बॉटलिंग प्लांट पर तीन शिफ्टों में मजिस्ट्रेट तैनात रहेंगे ताकि आपूर्ति निर्बाध रूप से चलती रहे।
हेल्पलाइन नंबर: गैस आपूर्ति से संबंधित किसी भी शिकायत या समस्या के समाधान के लिए जिला नियंत्रण कक्ष का नंबर 0621-2212007 जारी किया गया है, जो 24×7 कार्यरत है।
अस्पतालों, स्कूलों और जीविका दीदी की रसोई जैसी आवश्यक सेवाओं को व्यावसायिक गैस की आपूर्ति में प्राथमिकता दी जा रही है। प्रशासन ने चेतावनी दी है कि गैस की जमाखोरी या कालाबाजारी करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
समस्तीपुर में बाल यौन अपराध (पोक्सो ) और किशोर न्याय अधिनियम पर एक दिवसीय कार्यशाला संपन्न
100 से अधिक पुलिस पदाधिकारियों को दिया गया विशेष प्रशिक्षण; 600 बेटियों को बाल विवाह से बचा चुकी है संस्था
समस्तीपुर | 18 मार्च, 2026 | कार्यालय संवाददाता
बच्चों के विरुद्ध बढ़ते अपराधों पर लगाम लगाने और उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बुधवार को जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के संयुक्त तत्वाधान में एक दिवसीय उन्मुखीकरण सह क्षमतावर्धन कार्यशाला का आयोजन किया गया। शहर के जननायक कर्पूरी ठाकुर सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO) और किशोर न्याय अधिनियम’ रहा।
संवेदनशीलता ही बचाव का रास्ता
कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन मुख्य अतिथि आरक्षी उपाधीक्षक (यातायात) आशीष राज, बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष रंजू कुमारी, संस्था के सचिव सुरेंद्र कुमार, कोषाध्यक्ष वीणा कुमारी एवं अन्य गणमान्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर किया।
उद्घाटन संबोधन में डीएसपी आशीष राज ने पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून में कड़े प्रावधान हैं, लेकिन सफलता तभी मिलेगी जब सरकार और समाज दोनों ‘सजग और संवेदनशील’ होंगे। उन्होंने जोर देकर कहा:
“आज का यह प्रशिक्षण हमारे पुलिस पदाधिकारियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा। यदि हम संवेदनशील हों, तभी बाल यौन शोषण, बाल विवाह, बाल श्रम और बाल दूर्व्यपार (ह्यूमैन ट्रैफकिंग) जैसी कुरीतियों से अपने बच्चों को सुरक्षित रख सकते हैं।”
कानून की बारीकियों पर चर्चा
कार्यशाला में प्रशिक्षक भगवान पाठक ने किशोर न्याय कानून और पुलिस की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। वहीं, प्रशिक्षक प्रकाश कुमार ने पोक्सो एक्ट के तहत सजा के कड़े प्रावधानों के बारे में जानकारी दी। महिला एवं बाल विकास निगम के जिला कार्यक्रम प्रबंधक रवि प्रकाश सिंह ने बताया कि निगम पोक्सो पीड़िताओं को त्वरित न्याय दिलाने और उनके पुनर्वास व बेहतर आवासन के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र का सेवा सफर
संस्था के सचिव सुरेंद्र कुमार ने अपने संबोधन में पिछले वर्षों की उपलब्धियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि संस्था ने अब तक:
150 पोक्सो पीड़िताओं को मनोसामाजिक और कानूनी सहायता प्रदान की है।
1700 बच्चों को बाल श्रम के दलदल से निकालकर शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा है।
600 ऐसी नाबालिग बेटियों की शादी रुकवाई, जिनका विवाह तय हो चुका था।
3000 से अधिक परिवारों को बाल विवाह के विरुद्ध जागरूक किया गया है।
उन्होंने इस सफलता के लिए जिला प्रशासन, श्रम संसाधन विभाग, चाइल्ड हेल्पलाइन, रेलवे सुरक्षा बल और राजकीय रेल पुलिस के सहयोग की सराहना की।
इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति
इस कार्यशाला में जिले के विभिन्न थानों से आए 100 से अधिक थानाध्यक्षों और बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारियों को प्रशिक्षित किया गया। कार्यक्रम में दूर देहात के सचिव प्रभु नारायण झा, चेतना सामाजिक संस्था के अध्यक्ष डॉ. मिथिलेश कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता प्रमोद कुमार राय, अर्जुन प्रसाद सिंह, मयंक कुमार सिन्हा, अनुष्का कुमारी, पैरवी (नई दिल्ली) की कार्यक्रम समन्वयक वीभा कुमारी, और चाइल्ड हेल्पलाइन के जिला समन्वयक शंकर मल्लिक सहित भारी संख्या में पुलिसकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।
चैत्र नवरात्र पर भव्य मेले का आयोजन, 5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के जुटने का अनुमान, 5000 लोगों के बैठने की व्यवस्था,
सकरा (मुजफ्फरपुर)। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड अंतर्गत बसंतपुर झिटकाही की पावन धरती पर गुरुवार, 19 मार्च से भक्ति और शक्ति का अनूठा संगम होने जा रहा है। श्री श्री 108 चैत्र नवरात्र दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर यहाँ भव्य मेले और दस दिवसीय ‘श्री राम कथा’ का आयोजन किया गया है। एनएच-28 के समीप, अशोक विहार होटल के पीछे स्थित खेल मैदान में आयोजित होने वाले इस अनुष्ठान की सभी तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं।
कलश स्थापना के साथ शुरू होगा शक्ति का अनुष्ठान
गुरुवार की सुबह वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भव्य कलश यात्रा और कलश स्थापना के साथ शक्ति की आराधना शुरू होगी। आयोजन समिति ने बताया कि नौ दिनों की कठिन साधना के बाद 28 मार्च, शनिवार को ‘विजयदशमी’ के पावन पर्व पर देवी विसर्जन के साथ इस महा-अनुष्ठान का समापन होगा। इस दौरान पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में सराबोर रहेगा।
अयोध्या धाम से पधार रही हैं स्वर कोकिला साधना शास्त्री
इस वर्ष के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता अयोध्या धाम की मिट्टी से जुड़ी प्रख्यात कथावाचिका सुश्री साधना शास्त्री जी का आगमन है। अपनी सुमधुर आवाज और ओजस्वी वाणी के लिए ‘स्वर कोकिला’ के रूप में विख्यात शास्त्री जी के मुखारविंद से प्रतिदिन संध्या 6:00 बजे से रात्रि 11:00 बजे तक प्रभु श्री राम की दिव्य कथा प्रवाहित होगी। आयोजन स्थल पर श्रद्धालुओं के बैठने के लिए विशाल पंडाल बनाया गया है, जिसमें एक साथ 5,000 लोगों के बैठने की उत्तम व्यवस्था है।
तैयारियों का अंतिम दौर: 5 लाख भक्तों की उम्मीद
आयोजन समिति के सक्रिय सदस्यों ने प्रेस को जानकारी दी कि आयोजन की भव्यता को देखते हुए आज देर रात तक तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया। अनुमान है कि दस दिनों के इस कार्यक्रम में मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों से 5 लाख से अधिक श्रद्धालु शामिल होंगे। सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए वालंटियर्स की विशेष टीम तैनात की गई है।
मेले में आकर्षण के केंद्र
धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ यहाँ एक भव्य मेला भी सजाया गया है। बच्चों के लिए विभिन्न प्रकार के झूले, खेल-तमाशे और लजीज व्यंजनों के स्टॉल लगाए गए हैं, जो परिवार के साथ आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र होंगे।
समिति के सदस्य जुटे सेवा में
इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में आयोजन समिति के सक्रिय सदस्य वीरेन्द्र सिंह, अरविंद सिंह, रूपेश सिंह, रवि ठाकुर, अभय, करुणा, अमित, चंद्रमनी, अरुण सिंह, टिंकू सिंह, कमलेश सिंह, मन्ना जी, उदयप्रताप सिंह, रिंकू सिंह, जगमोहन, नन्द कुमार सिंह, और अरुण साह आदि दिन-रात जुटे हुए हैं। समिति ने बताया कि सुजावलपुर चौक से 2 किमी और सबहा चौक से 1 किमी पश्चिम स्थित इस स्थल पर पहुँचने के लिए सुगम रास्ते उपलब्ध हैं।
किसी भी प्रकार की जानकारी, सहयोग या दान-पुण्य के लिए समिति के मोबाइल नंबर 9905410013 एवं 9955414174 पर संपर्क किया जा सकता है।
रंजना बनीं ‘मैन ऑफ द मैच’, 38 रनों की शानदार पारी खेलकर टीम को दिलाई जीत
मुजफ्फरपुर | 17 मार्च, 2026 महंत दर्शन दास महिला महाविद्यालय (MDDM) के प्रांगण में मंगलवार को वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता के तहत क्रिकेट मैच का भव्य आयोजन किया गया। इस मुकाबले में ‘विकेट वारियर‘ की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ‘गोल्डेन गुल्ली‘ को हराकर जीत का परचम लहराया।
प्राचार्या ने किया उद्घाटन
प्रतियोगिता का शुभारंभ महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. अलका जायसवाल ने किया। उन्होंने मैदान पर खिलाड़ियों से हाथ मिलाकर उनका परिचय लिया और उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि खेल न केवल शारीरिक विकास के लिए जरूरी है, बल्कि यह टीम भावना और अनुशासन भी सिखाता है।
मैच का लेखा-जोखा
टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए ‘गोल्डेन गुल्ली’ की टीम ने निर्धारित ओवरों में जीत के लिए 88 रनों का लक्ष्य रखा। जवाब में लक्ष्य का पीछा करने उतरी ‘विकेट वारियर’ की टीम ने सधी हुई बल्लेबाजी की और 89 रन बनाकर मुकाबला अपने नाम कर लिया।
स्टार परफॉर्मर: विकेट वारियर की रंजना ने सर्वाधिक 38 रन बनाए, जिसके लिए उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ चुना गया।
खेल भावना: मैच के बाद गोल्डेन गुल्ली की कप्तान काजल ने खेल भावना का परिचय देते हुए विजेता टीम की कप्तान रंजना को जीत की बधाई दी।
इनकी रही मुख्य भूमिका
खेल के सफल आयोजन में खेल सचिव डॉ. राम दुलार सहनी, सह खेल सचिव डॉ. मीनाक्षी कुमारी और डॉ. नूतन कुमारी की सराहनीय भूमिका रही। उन्होंने पूरी व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित किया। इस रोमांचक मुकाबले का आनंद लेने के लिए कॉलेज की सभी छात्राएं, प्राध्यापक और प्राध्यापिकाएं दर्शक दीर्घा में मौजूद रहीं और खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया।
वैशाली। जिले में बेहतर कानून-व्यवस्था और पुलिस-पब्लिक समन्वय को मजबूत करने के उद्देश्य से मंगलवार को वैशाली थाना परिसर में पुलिस अधीक्षक विक्रम सिहाग की अध्यक्षता में ‘जनता दरबार‘ का आयोजन किया गया। इस दौरान एसपी ने न केवल आम लोगों की फरियाद सुनी, बल्कि मौके पर मौजूद अधिकारियों को उनके तत्काल समाधान के कड़े निर्देश भी दिए।
इन मुख्य मुद्दों पर रही नजर
जनता दरबार में स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस दौरान मुख्य रूप से निम्नलिखित मामले सामने आए:
भूमि विवाद एवं आपसी मारपीट: जमीन से जुड़े पुराने मामलों और आपसी रंजिश की शिकायतों की भरमार रही।
सुरक्षा एवं गश्ती: क्षेत्र में रात्रि गश्ती बढ़ाने और असामाजिक तत्वों पर नकेल कसने की मांग की गई।
साइबर अपराध: बढ़ते साइबर ठगी के मामलों पर लगाम लगाने और यातायात व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर चर्चा हुई।
लापरवाही बरतने वालों को दी चेतावनी
शिकायतों को गंभीरता से सुनते हुए एसपी विक्रम सिहाग ने संबंधित पदाधिकारियों को निर्देशित किया कि सभी मामलों का निष्पादन त्वरित, निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से किया जाए। उन्होंने दो टूक कहा कि आम जनता की शिकायतों के समाधान में संवेदनशीलता और तत्परता बरती जाए। किसी भी स्तर पर पुलिसिया ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
“क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है। पुलिस अधिकारी रात्रि गश्ती बढ़ाएं और अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा करें।” — विक्रम सिहाग, एसपी वैशाली
जनता से सहयोग की अपील
एसपी ने स्थानीय लोगों से अपील करते हुए कहा कि पुलिस आपकी सुरक्षा के लिए है। यदि क्षेत्र में कोई भी संदिग्ध व्यक्ति दिखे या आपराधिक गतिविधि की सूचना मिले, तो तुरंत पुलिस को सूचित करें ताकि समय रहते कार्रवाई की जा सके।
इस अवसर पर थानाध्यक्ष वैशाली समेत कई पुलिस अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।
नई दिल्ली। हरियाणा राज्यसभा चुनाव का परिणाम केवल एक सीट की जीत-हार नहीं, बल्कि उच्च-स्तरीय राजनीतिक ड्रामे का पटाक्षेप साबित हुआ है। दिल्ली में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान सांसद दीपेंद्र हुड्डा और राजेंद्र पाल गौतम ने रणनीतिक विवरणों के साथ भाजपा के ‘ऑपरेशन लोटस’ की पोल खोल दी। दीपेंद्र हुड्डा ने इसे ‘धनतंत्र’ पर ‘गणतंत्र’ की सीधी चोट करार दिया है।
गुजरात से हरियाणा तक भाजपा की ‘स्पेशल फील्डिंग’
प्रेस वार्ता में दीपेंद्र हुड्डा ने खुलासा किया कि भाजपा इस सीट को लेकर कितनी बेचैन थी। उन्होंने बताया:
हाईकमान की दखल: भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने गुजरात के उपमुख्यमंत्री को विशेष तौर पर ऑब्जर्वर बनाकर हरियाणा भेजा था।
टारगेट क्रॉस वोटिंग: दीपेंद्र हुड्डा के अनुसार, भाजपा की योजना कांग्रेस के 8-9 विधायकों से क्रॉस वोटिंग कराने की थी।
प्लान-बी: यदि कांग्रेस के विधायक नहीं टूटते, तो कम से कम 7 विधायकों को तोड़कर इनेलो की दो वोटों के सहारे जीत हासिल करने का ‘अथक प्रयास’ किया गया।
‘रात के अंधेरे में लोकतंत्र की हत्या की कोशिश’
दीपेंद्र हुड्डा ने बेहद आक्रामक लहजे में कहा, “रात के अंधेरे में भाजपा ने सरेआम लोकतंत्र की हत्या करने की कोशिश की। भाजपा का लोकतंत्र में कोई विश्वास नहीं है, उन्हें सिर्फ और सिर्फ सत्ता चाहिए”। उन्होंने हरियाणा के कांग्रेस विधायकों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने भाजपा के ‘साम-दाम-दंड-भेद’ के खेल को फेल कर दिया और खरीद-फरोख्त के मंसूबों पर पानी फेर दिया।
अंबेडकरवादी बनाम पूंजीवादी सोच
कांग्रेस एससी विभाग के चेयरमैन राजेंद्र पाल गौतम ने भाजपा के नजरिए पर चोट करते हुए कहा कि भाजपा करमवीर बौद्ध को एक ‘कमजोर’ उम्मीदवार मान रही थी। उन्होंने तर्क दिया कि भाजपा की नजर में वही उम्मीदवार ‘मजबूत’ है जिसके पास अकूत पैसा हो। लेकिन कांग्रेस ने एक सच्चे अंबेडकरवादी और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ता को मैदान में उतारकर यह साबित किया कि पार्टी का आधार वैचारिक है, न कि आर्थिक।
हुड्डा की ‘वोट चोरी’ वाली थ्योरी हुई सच
नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जीत को ‘प्रदेश की जनता के विश्वास की जीत’ बताया। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव के वक्त से ही वे ‘वोट चोरी’ की बात कह रहे थे, जो इस चुनाव में भाजपा की हताशा को देखकर साबित हो गई है। हुड्डा ने स्पष्ट किया कि बहुमत के आधार पर एक सीट कांग्रेस की ही थी, लेकिन भाजपा ने तीसरा कैंडिडेट उतारकर अनैतिक तरीके से वोट चुराने की कोशिश की, जिसे कांग्रेस की एकजुटता ने नाकाम कर दिया।
मुख्य झलकियां:
रणनीति: भाजपा ने गुजरात के शीर्ष नेतृत्व को मैदान में झोंका था।
प्रतिरोध: कांग्रेस के 8-9 विधायकों को तोड़ने की कोशिश नाकाम रही।
चेहरा: एक आम अंबेडकरवादी कार्यकर्ता ने भाजपा के धनबल को मात दी।
उम्मीदवार: करमवीर बौद्ध (कांग्रेस) विजयी।
आरोप: भाजपा ने गुजरात के उपमुख्यमंत्री को ऑब्जर्वर बनाकर क्रॉस वोटिंग की कोशिश की।
नारा: ‘धनतंत्र’ पर ‘गणतंत्र’ की जीत।
संदेश: कांग्रेस ने सामाजिक न्याय और अंबेडकरवादी विचारधारा को दी प्राथमिकता।
राज्यसभा से विधानसभा तक का संदेश:इस जीत ने न केवल करमवीर बौद्ध को राज्यसभा पहुंचाया है, बल्कि हरियाणा कांग्रेस में एक नई ऊर्जा भर दी है। दीपेंद्र हुड्डा ने इस जीत का श्रेय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व— मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और के.सी. वेणुगोपाल को देते हुए इसे आगामी चुनावों के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट बताया है।
पटना | विशेष संवाददाता बिहार की राजनीति में सोमवार का दिन एनडीए (NDA) के लिए बड़ी जीत और महागठबंधन के लिए आत्ममंथन का संदेश लेकर आया। राज्यसभा की पांच सीटों के लिए हुए द्विवार्षिक चुनाव में एनडीए ने पांचों सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी एकजुटता का परिचय दिया है। विधानसभा चुनाव के महज चार महीने बाद हुए इस शक्ति परीक्षण में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा गठबंधन ने विपक्ष की घेराबंदी को ध्वस्त करते हुए अपना परचम लहरा दिया।
विजयी उम्मीदवारों की सूची
राज्यसभा पहुंचने वाले नवनिर्वाचित सदस्यों में सत्ता पक्ष के दिग्गज चेहरे शामिल हैं:
नीतीश कुमार (जदयू)
रामनाथ ठाकुर (जदयू)
नितिन नवीन (भाजपा)
शिवेश कुमार (भाजपा)
उपेंद्र कुशवाहा (रालोमो)
पांचवीं सीट का दिलचस्प गणित और एनडीए की सेंधमारी
चुनाव की शुरुआत में एनडीए की चार सीटों पर जीत तय मानी जा रही थी, लेकिन रोमांच तब बढ़ा जब महागठबंधन की ओर से राजद (RJD) ने अमरेंद्र धारी सिंह को पांचवें उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतार दिया। यहीं से मुकाबला ‘एनडीए बनाम महागठबंधन’ में बदल गया।
एनडीए के पास कुल 202 विधायकों का ठोस समर्थन था, वहीं महागठबंधन को पांचवीं सीट जीतने के लिए 41 मतों की आवश्यकता थी। विपक्षी खेमे को भरोसा था कि वे निर्दलीय और अन्य छोटे दलों के सहयोग से खेल बिगाड़ देंगे, लेकिन परिणाम इसके विपरीत रहे।
तेजस्वी की ‘इफ्तार‘ और ‘होटल पॉलिटिक्स‘ रह गई अधूरी
विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। उन्होंने रणनीतिक तौर पर एआईएमआईएम (AIMIM) के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान की इफ्तार पार्टी में शिरकत कर समीकरण साधने की कोशिश की। बसपा के एकमात्र विधायक सतीश यादव ने भी महागठबंधन को समर्थन देने का ऐलान कर दिया था।
15 मार्च को एकजुटता दिखाने के लिए तेजस्वी ने सभी विधायकों को पटना के एक बड़े होटल में रुकने का निर्देश दिया था। लेकिन सोमवार सुबह मतदान के समय रणनीति बिखर गई।
अपनों ने ही दिया झटका: चार विधायकों ने किया ‘खेला‘
महाबंधन की हार का सबसे बड़ा कारण उनके अपने ही विधायकों की अनुपस्थिति रही।
अनुपस्थित विधायक: मतदान के दौरान कांग्रेस के तीन और राजद के एक विधायक विधानसभा नहीं पहुंचे।
वोटिंग का असर: इन चार विधायकों के न आने से महागठबंधन का गणित पूरी तरह बिगड़ गया और एनडीए के पांचवें उम्मीदवार शिवेश कुमार ने आसानी से जीत हासिल कर ली।
दूसरी ओर, एनडीए के सभी 202 विधायकों ने अनुशासन दिखाते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग किया। शाम को मतगणना के बाद जैसे ही चुनाव अधिकारी ने पांचों उम्मीदवारों की जीत की घोषणा की, एनडीए खेमे में जश्न का माहौल बन गया।
विश्लेषण: क्या रहे इस चुनाव के मायने?
यह चुनाव केवल राज्यसभा सीटों का नहीं था, बल्कि विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में सत्ता और विपक्ष की मजबूती का लिटमस टेस्ट था। एनडीए ने दिखा दिया कि सरकार स्थिर है और उनके विधायक एकजुट हैं। वहीं, महागठबंधन के लिए अपने विधायकों को एकजुट रख पाना एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है।
बड़ी बात: चार विधायकों की अनुपस्थिति ने भविष्य के राजनीतिक समीकरणों और ‘क्रॉस वोटिंग’ की आशंकाओं को भी जन्म दे दिया है।