मुजफ्फरपुर/पटना: बिहार की माटी के सच्चे सपूत, किसानों के मसीहा और ‘लीची के जादूगर’ कहे जाने वाले पद्मश्री डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी अब हमारे बीच नहीं रहे। मंगलवार सुबह करीब 5:30 बजे पटना के मेदांता अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। 90 के दशक में राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डॉ. त्रिवेदी पिछले कुछ दिनों से सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर फैलते ही मुजफ्फरपुर के मतलूपुर गांव से लेकर देश के कृषि गलियारों तक शोक की लहर दौड़ गई है।

खेतों में ढूँढा समाधान, किसानों को दी नई जिंदगी डॉ. त्रिवेदी केवल फाइलों वाले वैज्ञानिक नहीं थे, वे जमीन पर उतरकर काम करने वाले ‘ऋषि’ थे। जब मुजफ्फरपुर की पहचान ‘शाही लीची’ के पुराने बाग दम तोड़ रहे थे, तब उन्होंने ‘कैनोपी मैनेजमेंट’ (पुनर्जीवन तकनीक) के जरिए बूढ़े पेड़ों को नई जवानी दी। उनकी इस तकनीक ने हज़ारों किसानों के उजड़ते बागों को फिर से फलों से लद दिया।
‘बाबा परियोजना‘ से जलजमाव को बनाया वरदान उन्होंने उत्तर बिहार के जलजमाव वाले इलाकों के लिए ‘बाबा परियोजना’ (बिहार एक्वाकल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर) की शुरुआत की। जहाँ पानी जमा होने से खेती बर्बाद होती थी, वहां उन्होंने मछली पालन, मखाना और सिंघाड़े की खेती का ऐसा मॉडल पेश किया कि किसानों की आय कई गुना बढ़ गई।
सादगी की प्रतिमूर्ति: कुलपति से प्रगतिशील किसान तक का सफर डॉ. त्रिवेदी का जीवन संघर्षों की मिसाल रहा। पिता के निधन के बाद पढ़ाई बीच में छोड़कर खेती की कमान संभालने वाले इस शख्स ने बाद में कृषि विज्ञान में पीएचडी की और कुलपति के सर्वोच्च पद तक पहुंचे। रिटायरमेंट के बाद वे आराम करने के बजाय वापस अपने गांव मतलूपुर लौटे और 85 एकड़ में खेती का ऐसा आधुनिक मॉडल खड़ा किया जिसे देखने देशभर से लोग आते थे।
भावुक विदाई: उनके करीबी श्याम किशोर सिंह ने भरे गले से कहा, “आज समाज ने एक ऋषितुल्य व्यक्तित्व खो दिया है। शासन-प्रशासन से लेकर राजनीति तक उनकी साख थी, लेकिन उनका दिल हमेशा गांव की पगडंडियों में ही बसता था। यह रिक्त स्थान कभी नहीं भरेगा।”
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