- पूर्व प्रत्याशी अर्जुन राम ने खड़े किए सवाल- कहा- ‘राम विलास, मांझी और अशोक चौधरी के संपन्न परिवारों को क्यों मिले आरक्षण?’
- ‘कई पीढ़ियों से मलाई काट रहे संपन्न परिवार, असली शोषित आज भी वंचित’, ‘अफसरों-मंत्रियों की संतानों को छोड़ना होगा हक, तभी पूरा होगा बाबा साहेब का सामाजिक न्याय’
सियासत के नए ध्रुवीकरण का आगाज
मुजफ्फरपुर / सकरा: बिहार का राजनीतिक तापमान एक बार फिर उफान पर है, लेकिन इस बार वजह कोई चुनाव नहीं बल्कि आरक्षण के बुनियादी स्वरूप को लेकर उठा गंभीर यक्ष प्रश्न है। मुजफ्फरपुर जिले के प्रतिष्ठित सकरा विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक प्रत्याशी अर्जुन राम के एक तीखे बयान (पोस्ट) ने पूरे प्रदेश के राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। अर्जुन राम ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी के आरक्षण के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने की पुरजोर पैरवी की है।

उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विधिवत पत्र भेजकर और सोशल मीडिया के जरिए खुले तौर पर मांग की है कि आरक्षण का आधार केवल जन्म या जाति न होकर जरूरत होना चाहिए। उनके इस बयान ने बिहार के दशकों पुराने उस बने-बनाये राजनीतिक समीकरण को झकझोर कर रख दिया है, जहाँ दलित राजनीति के कुछ चुनिंदा घराने ही पीढ़ियों से सत्ता और संसाधनों के केंद्र में रहे हैं।
पत्रकारिता के तीखे सवाल और बेबाक जवाब
न्यूज़ भारत टीवी के विशेष साक्षात्कार के दौरान जब पत्रकार ने अर्जुन राम से सीधे सवाल दागे और यह पूछा कि आरक्षण जैसे अत्यंत संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे को छूना आग में घी डालने जैसा है, तो अर्जुन राम ने बिना किसी झिझक के बेहद कड़े और तार्किक शब्दों में अपना पक्ष रखा।
पत्रकार के यह पूछने पर कि क्या यह बयान किसी तात्कालिक राजनीतिक उत्साह का नतीजा है या किसी गहरी रणनीति का हिस्सा, अर्जुन राम ने अत्यंत स्पष्टता से कहा कि वे पूरी सोच-समझ के साथ और समाज के सबसे पिछड़े व्यक्ति की आवाज बनकर यह बात उठा रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि लोकतंत्र में हर नागरिक को सच बोलने और नीतिगत सुधार की मांग करने का पूरा अधिकार है।

विरासत की राजनीति और प्रशासनिक अभिजात वर्ग पर सीधा हमला
अर्जुन राम ने अपने साक्षात्कार में किसी प्रकार का राजनीतिक लाग-लपेट न रखते हुए सीधे तौर पर बिहार और देश की राजनीति के उन बड़े चेहरों के नाम लिए, जो दलित राजनीति के झंडाबरदार माने जाते हैं। उन्होंने खुलकर कहा:

सियासत के नए ध्रुवीकरण का आगाज
“यह किसी के खिलाफ लड़ाई नहीं, बल्कि अपने ही गरीब भाई को उसका वाजिब अधिकार दिलाने का धर्मयुद्ध है। आप ही बताइए, राम विलास पासवान के बेटे, जीतन राम मांझी का परिवार या फिर सकरा के अशोक चौधरी के परिवार जैसे बेहद समृद्ध और शक्तिशाली लोगों को आज भी आरक्षण की बैसाखी की क्या जरूरत है? जो परिवार पिछले चार-पाँच दशकों से लगातार विधानसभा, संसद, केंद्रीय मंत्रिमंडल, और प्रशासनिक सेवाओं में काबिज हैं, उनके बच्चे देश-विदेश के महंगे संस्थानों में पढ़ रहे हैं। क्या ऐसे सक्षम परिवारों के बच्चों को अब भी जाति के नाम पर कोटा मिलना चाहिए? इन नेताओं और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बच्चों को अब सामान्य श्रेणी की सीटों पर अपनी योग्यता के बल पर चुनाव लड़ना और नौकरियां हासिल करनी चाहिए। उन्हें अपने ही गरीब दलित भाइयों के लिए यह जगह खाली करनी होगी।”

असली शोषित कौन? खाली जेब और खाली रसोई का दर्द
अर्जुन राम ने सामाजिक व्यवस्था के उस नग्न सच को उजागर किया जिसे अक्सर मुख्यधारा की राजनीति में नजरअंदाज कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि असली छुआछूत, सामाजिक अपमान और आर्थिक तंगी का दंश वह गरीब, कामगार, मोची, दिहाड़ी मजदूर और भूमिहीन किसान झेलता है, जो गांव के अंतिम छोर पर स्थित झोपड़ी में जिंदगी गुजार रहा है।
- शिक्षा और कोचिंग से महरूम गांव का बच्चा: अर्जुन राम का कहना है कि आज भी दूर-दराज के देहातों में रहने वाले दलित मजदूर का बच्चा बिना किताबों, बिना बिजली और बिना किसी कोचिंग के अपनी जिंदगी से जंग लड़ रहा है। उसे यह तक नहीं पता कि आरक्षण किस चिड़िया का नाम है।
- आरक्षण के लाभ का असमान वितरण: आरक्षण की मलाई केवल वही 5% संपन्न वर्ग काट रहा है जो पहले से ही शहरों में बस चुका है और जिसके पास अपार संसाधन हैं। 95% गरीब और शोषित आज भी वहीं खड़े हैं जहाँ वे सात दशक पहले थे।
- सामाजिक छुआछूत का कड़वा सच: जो आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर या मंत्री बन चुके हैं, समाज में उनके परिवार के साथ कोई भेदभाव नहीं होता। असली उत्पीड़न और अपमान तो उस गरीब मजदूर के हिस्से आता है जो आज भी अपने अधिकारों से पूरी तरह अनभिज्ञ है।

राजनीतिक एकाधिकार और करोड़ों की टिकट व्यवस्था पर प्रहार
अर्जुन राम ने राजनीति में दलितों के नाम पर चल रहे एकाधिकार (मोनोपॉली) पर भी करारा हमला बोला। उन्होंने कहा कि जब तक एससी/एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर लागू नहीं होगा, तब तक आम दलित कार्यकर्ता कभी भी विधायक या सांसद बनने का सपना नहीं देख सकता।
उन्होंने बेबाकी से आरोप लगाया कि आज चुनाव लड़ने के लिए टिकटों का सौदा करोड़ों रुपयों में होता है। एक गरीब दलित का बेटा, जो निस्वार्थ भाव से समाज और पार्टी की सेवा करता है, उसके पास 5 या 10 करोड़ रुपये कहाँ से आएंगे? नतीजा यह होता है कि वही पुराने पूंजीपति और प्रभावशाली नेता आरक्षण के नाम पर आरक्षित सीटों पर कब्जा जमा लेते हैं। क्रीमी लेयर लागू होने से राजनीतिक क्षेत्रों में भी आम और आर्थिक रूप से कमजोर कार्यकर्ताओं के लिए रास्ते खुलेंगे।

बाबा साहेब का सच्चा न्याय और पंडित दीनदयाल का अंत्योदय
भाजपा नेता ने अपने विचारों को वैचारिक आधार देते हुए कहा कि बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने जब आरक्षण की व्यवस्था की थी, तो उनकी मूल परिकल्पना समाज के सबसे पीड़ित और वंचित व्यक्ति को ऊपर उठाने की थी। उन्होंने कभी नहीं चाहा था कि आरक्षण किसी खास परिवार की पीढ़ियों की बपौती बन जाए।
इसी तरह, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का ‘अंत्योदय’ का विचार भी यही सिखाता है कि राज्य के संसाधनों और नीतियों का पहला हक पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति (लास्ट मैन इन द क्यू) का होना चाहिए। अर्जुन राम ने कहा:
“एक सशक्त, समर्थ और समरस भारत का निर्माण तभी संभव है जब समाज में अवसर जन्म या जाति के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की वास्तविक आवश्यकता और लाचारी के आधार पर तय होंगे। क्रीमी लेयर का विरोध करने वाले असल में गरीब दलितों के सबसे बड़े दुश्मन हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि झोपड़ी में रहने वाले मजदूर का बेटा कभी उनके बराबर आकर खड़ा हो सके।”

सकरा से उठी चिंगारी, पूरे प्रदेश में बहस की शुरुआत
सकरा विधानसभा से उठी यह मांग अब केवल मुजफ्फरपुर तक सीमित नहीं रही है। अर्जुन राम के इस कड़े रुख के बाद बिहार के राजनीतिक दलों के भीतर और बाहर एक नई बहस छिड़ गई है। जहाँ एक तरफ पारंपरिक रूप से दलित राजनीति करने वाले क्षत्रपों में इस बयान से असहजता देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ आम जनता और युवाओं के बीच इस विचार को भारी समर्थन मिलता दिख रहा है।
अर्जुन राम ने अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पुनः अपील करते हुए कहा कि देशहित और वास्तविक सामाजिक न्याय के हित में केंद्र सरकार को जल्द से जल्द ठोस कदम उठाते हुए एससी/एसटी आरक्षण के तहत भी आय और समृद्धि की एक पारदर्शी सीमा (क्रीमी लेयर) निर्धारित करनी चाहिए। उन्होंने जनता से भी आह्वान किया है कि वे जातिगत राजनीति के चश्मे को उतारकर इस व्यावहारिक और न्यायसंगत मांग के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद करें।

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