सकरा श्मशान अतिक्रमण का शिकार: बच्चों की समाधि मिटाकर प्लॉटिंग, बहाया जा रहा गंदा नाला,प्रशासन जल्‍द कराये मापी !  

पूर्व मुखिया सतीश पासवान ने नगर पंचायत अध्यक्ष और संबंधित अधिकारियों से इसे  मुक्ति धामके रूप में विकसित किए जाने की मांग की !

विशेष रिपोर्ट : एस. एस.  कुमार ‘पंकज’

सकरा (मुजफ्फरपुर)  : सकरा प्रखंड मुख्यालय से महज 100 मीटर दक्षिण स्थित श्मशान घाट इन दिनों न सिर्फ भूमाफिया की गिद्ध दृष्टि का शिकार है, बल्कि अब वहां कुछ ऐसा घटित हुआ है जिसने सनसनी फैला दी है। श्मशान की जमीन की अवैध खरीद-बिक्री, बेतरतीब अतिक्रमण और वहां बहाए जा रहे गंदे नाले के कड़वे सच को उजागर करने पहुंचे पत्रकार के कैमरे में एक ऐसी मानव छायाकृति कैद हुई है, जिसे देखकर लोगों में कौतुहल हैं और चर्चा  तरह तरह की हैं। लेकिन न्यूज़ भारत टीवी इस तस्‍वीर को न कोई तूल देती है, और न हीअंधविश्वास को बढ़ावा देने की मंशा रखती है।

शुक्रवार की शाम 4 बजे कैमरे में कैद हुआ यह मंजर

पूरा मामला बीते शुक्रवार का है, जब न्यूज भारत टीवी के पत्रकार कुमार ‘पंकज’ श्मशान की कीमती जमीन को दलालों द्वारा हेराफेरी कर बेचने, अतिक्रमण करने और श्मशान के बीचों-बीच से गंदा नाला चीर कर बहाने के गंभीर मामले की ग्राउंड रिपोर्टिंग (कवरेज) करने गए थे। संध्या के 4 बज रहे थे और पूरा श्मशान परिसर पूरी तरह सुनसान और खाली था और एक चिता जल रही थी । पत्रकार द्वारा वहां की दुर्दशा को दिखाने के लिए कुल 10 तस्वीरें ली गईं। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस समय तस्वीरें खींची जा रही थीं, उस समय वहां  कोई  भी मौजूद नहीं था। लेकिन आज जब पत्रकार कुमार पंकज ने श्मशान की बदइंतजामी और दलालों के कारनामों पर खबर लिखने की शुरुआत की और सबूत के तौर पर तस्वीरों को खंगालना शुरू किया, तो उनके होश उड़ गए। तस्वीरों में से 1 तस्वीर में एक साफ-साफ न दिखने वाली, लेकिन स्पष्ट मानव जैसी बैठी हुई  छायाकृति दिखाई दे रही है, जिसे स्थानीय लोग, अब इसका तरह तरह का मतलब निकाल रहे हैं।

रहस्यमयी आकृति: पत्रकार के कैमरे में कैद हुई एक अस्पष्ट छाया, जिसे लेकर स्थानीय लोग तरह-तरह की चर्चा कर रहे हैं. हालाँकि एक्सपर्ट्स इसे तकनीकी खामी मानते हैं.

क्‍या कहते हैं फोटो कैमरा के एक्‍सपर्ट : कैमरे में कैद हुई इस धुंधली आकृति को किसी अंधविश्वास, अलौकिक शक्ति या रहस्य से जोड़कर देखना पूरी तरह भ्रामक होगा। वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण से, तेज धूप या शाम के ढलते समय (विशेषकर संध्या 4 बजे) खुले आसमान के नीचे तस्वीरें खींचते समय अक्सर लेंस फ्लेयर , प्रकाश के अपवर्तन  या रोशनी और परछाई के खेल  के कारण ऐसी आकृतियां उभर आती हैं। कैमरे के लेंस पर पड़ने वाली सीधी रोशनी या कैमरे के हिलने  की वजह से भी कई बार तस्वीरों में इंसानी साये जैसी तकनीकी खामियां दर्ज हो जाती हैं। अतः इसे किसी रहस्यमयी घटना के बजाय पूरी तरह से एक सामान्य तकनीकी त्रुटि या कैमरे की खामी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

मुख्य समाचार :

 सकरा में मासूमों के श्मशान पर गिद्ध दृष्टि, ढूह मिटाकर कर दी प्लॉटिंग

सकरा प्रखंड मुख्यालय के आसपास की जमीन की कीमत आसमान छू रही है। यहां लाखों रुपए प्रति कट्टा की दर से जमीन बिकने की बात लगातार सामने आती रहती है। इसी लालच में कई सफेदपोश और दलाल अब श्मशान की जमीन को अपनी पूर्वजों की संपत्ति बताकर हड़पने का दावा कर रहे हैं। श्मशान की चहारदीवारी न होने का पूरा फायदा उठाया जा रहा है, जिससे इसकी सटीक लंबाई-चौड़ाई का पता ही नहीं चल पाता है। मानक के विपरीत जाकर श्मशान के आसपास बेतरतीब ढंग से भारी मिट्टी कटाई भी की गई है।

सकरा के इस श्‍मशान  में दो प्रकार के श्मशान की व्यवस्था रही है। छोटे बच्चों के लिए प्रखंड कार्यालय के दक्षिण पूर्व में महदेईया पोखर के पास सटा हुआ श्मशान है। यहाँ बच्चों के शवों को सीधे मिट्टी में दफनाया जाता था। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि 8 से 10 वर्ष पहले तक लोग अपने बच्चों के चिता स्थल के ढूह (मिट्टी का टीला) को देखकर पहचान जाते थे कि यहाँ उनके बच्चे की समाधि है। लेकिन दलालों की नजर पड़ते ही बच्चों के श्मशान की मिट्टी को समतल कर दिया गया ताकि कब्रों का नामोनिशान मिटाया जा सके। कुछ नेता किस्म के लोग अपने पावर और पहुंच के कारण बच्चे वाले इस श्मशान पर गिद्ध दृष्टि गड़ाए हुए हैं और वहां बकायदा रास्ता निकालकर और प्लॉटिंग कर जमीन बेचने की पूरी जुगत लगाई जा रही है।यदि समय रहते प्रशासन कारवाई नहीं करती है, तो कुछ माह  में ही यहां, मकान बनते देर नहीं होगी,

श्मशान की पवित्र भूमि पर खुलेआम अतिक्रमण कर नेनुआ (बाएँ), केला और अमरूद (दाएँ) उगाने की शर्मनाक तस्वीरें सामने आई हैं.

चिता स्थल उजाड़कर उगाई जा रही है सब्जी, बह रहा गंदा नाला, बना दिया सोख्‍ता

बच्चों के श्मशान से ठीक पश्चिम , सयाने और वयस्क लोगों के लिए श्मशान स्थित है, जहाँ चिता दहन किया जाता है। स्थिति यहां भी गंभीर है । अब जब भी यहाँ कोई दाह संस्कार करने आता है, तो  अतिक्रमणकारी के साथ  झड़प होने की स्थिति उत्‍पन्‍न हो जाती हैं। हद तो तब हो गई जब श्मशान से सटे एक विद्यालय संचालक द्वारा श्मशान की भूमि पर खुलेआम अतिक्रमण का मामला सामने आया। पूरब एवं उत्‍तर कोण पर विद्यालय संचालक ने श्मशान की पवित्र भूमि को चीरकर बीचों-बीच एक गंदा नाला बहा दिया है, जिससे हर तरफ बदबू और गंदगी पसरी है। इतना ही नहीं, चिता स्थल को उजाड़कर वहाँ केला, अमरूद और सब्जियों की खेती की जा रही है। वर्तमान में बांस का ढाट लगाकर नेनुआ की खेती करने की शर्मनाक तस्वीर भी सामने आई है। श्मशान की भूमि पर एक पक्का सोखता बनाए जाने को लेकर पूर्व में भी  विवाद हुआ था, लेकिन इस टैंक को विद्यालय संचालक ने अब तक नहीं  हटाया है, जो आने वाले समय में यहाँ किसी बड़े संघर्ष का कारण बन सकता है। प्रखंड प्रशासन द्वारा मापी कराए जाने पर यह अतिक्रमण पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा।

हमारा दायित्व केवल स्कूल की बाउंड्री के भीतर तक सीमित है, बाहर की गतिविधियों से कोई सरोकार नहीं” स्कूल संचालक सपनजीत देव

श्मशान की भूमि के एक हिस्से पर कथित उपभोग, खेती और नाला निर्माण के मामले पर स्कूल संचालक सपनजीत देव ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि उनके विद्यालय की बाउंड्री वॉल पूरी तरह तय है और प्रबंधन का सरोकार केवल अपनी चहारदीवारी के अंदर की व्यवस्था से है। बाउंड्री के बाहर आगे-पीछे क्या गतिविधियां चल रही हैं, इससे स्कूल का कोई लेना-देना नहीं है।

सार्वजनिक भूमि पर उगी फसलों पर प्रतिक्रिया: परिसर के पिछले हिस्से में हो रही केला, अमरूद और अन्य सब्जियों की खेती के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, यह पूरी तरह से एक सार्वजनिक स्थल (श्मशान) है। यदि वहां कोई पेड़-पौधे या फसलें उगी भी हैं, तो वे किसी की निजी संपत्ति नहीं हो सकतीं। श्मशान जैसी जगहों पर उगे फल-सब्जियों पर किसी एक व्यक्ति का एकाधिकार नहीं होता, बल्कि वह सार्वजनिक संपत्ति है जिसे कोई भी उपयोग में ला सकता है।”

पवित्रता पर प्रहार: दो अलग-अलग कोणों से दिखता एक लम्बा, कच्चा नाला: श्मशान की भूमि को चीरकर बीचों-बीच बहाया गया गंदा नाला, जिससे दुर्गंध और गंदगी फैल रही है.

पुराने नाले और कब्ज़े के दावों पर पक्ष: श्मशान के बीच से गुजरने वाले लंबे नाले और अन्य निर्माणों के सवाल पर सपनजीत देव ने कहा कि वह स्वयं यहां साल 2018 में आए थे। यह नाला कोई नया निर्माण नहीं है, बल्कि कम से कम 20 साल पुराना है जो उनके यहां आने के काफी पहले से मौजूद है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि यदि किसी सार्वजनिक स्थल या व्यवस्था में कहीं कोई त्रुटि या दिक्कत है, तो उसे आपसी समझ से ठीक कर लिया जाना चाहिए।

हांलाकि कुछ माह पूर्व फरवरी 2026  में पत्रकार कुमार पंकज के द्वारा उक्‍त स्‍थल पर खबर लिखने के उद्देश्‍य से विडियो कैप्‍चर किया गया था, उसमें उक्‍त नाला कहीं नहीं दिख रहा है, नाला हाल का खुदा है, और इसकी मिट्टी ताजी है  

उन्होंने अंत में दोहराया कि यह एक सामाजिक विषय है जिसका निदान भी सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर होना चाहिए, क्योंकि स्कूल प्रबंधन सिर्फ अपने निर्धारित दायरे के भीतर ही जिम्मेदार है।

विवादित निर्माण: बाएँ ज़मीन में दबा कंक्रीट का हिस्सा (सर्कल में), दाएँ: एक पत्थर को उठाते लोग.श्मशान भूमि पर बनाया गया पक्का सोखता (बाएँ), जिस पर पूर्व में भी विवाद हुआ था. इसे ‘कपड़ा साफ़ करने का पत्थर’ (दाएँ) भी कहा जा रहा है.

श्मशान भूमि पर अतिक्रमण के आरोपों को केके सर ने नकारा, कहा- “वहाँ सब कुछ लावारिस, नापी के बाद ही साफ होगी स्थिति”

कृष्ण कुमार (केके सर का पक्ष): श्मशान की जमीन पर अतिक्रमण, टैंक निर्माण और पेड़-पौधे लगाने के आरोपों पर श्‍मशान  के सटे हॉस्‍टल संचालक  कृष्ण कुमार (के के सर) ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उनका कहना है कि लगाए जा रहे सभी आरोप निराधार हैं और श्मशान में मौजूद चीजें किसी व्यक्ति विशेष की नहीं हैं। उनके बयान के मुख्य अंश इस प्रकार हैं:

अतिक्रमण की बानगी(फाइल फोटो) : एक तरफ खेत में खड़ी गोभी की फसल और दूसरी तरफ भीड़भाड़.आरोप है कि चिता स्थल को उजाड़कर वहाँ सब्जियों की खेती (बाएँ) की जा रही है. ग्रामीणों ने इस पर आपत्ति जताई (दाएँ).
  • सब कुछ लावारिस है, मेरा कोई अधिकार नहीं: श्मशान भूमि पर केला, अमरूद या अन्य चीजें होने के सवाल पर केके सर ने कहा, वहाँ सब कुछ लावारिस है। अमरूद का पेड़ किसी ने रोपा नहीं है, बल्कि बच्चों द्वारा खाकर बीज फेंकने से वह खुद उग आया है।” उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उस जमीन या वहां मौजूद चीजों पर उनका कोई व्यक्तिगत अधिकार नहीं है।
  • टैंक नहीं, कपड़ा साफ करने का पत्थर है: श्मशान में किसी टैंक या टंकी के होने की बात को खारिज करते हुए केके सर ने बताया कि वह कोई टैंक नहीं है। वह केवल एक सोझा पत्थर है, जिसका उपयोग लोग कपड़ा आदि साफ करने के लिए करते हैं। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि कोई भी उसे उठाकर देख सकता है, उसमें कोई टंकी नहीं बनी है।
  • अतिक्रमण के आरोपों पर दी खुली छूट: अतिक्रमण के सवाल पर उन्होंने कहा, मैंने वहाँ कोई अतिक्रमण नहीं किया है। प्रशासन या जनता वहां आ कर उसकी नापी करवा सकती है और उसे उझार (हटा) सकती है, मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है।”
  • जमीन की स्थिति और नापी पर जोर: केके सर के अनुसार, वह श्मशान भूमि अभी भी पूरी तरह सरकारी नहीं हुई है और वह निजी संपत्ति की तरह है। उन्होंने कहा कि जब तक प्रशासनिक स्तर पर इसकी सही नापी नहीं होती, तब तक यह कहना मुश्किल है कि कौन सी जगह किसकी है। नापी के बाद ही पता चलेगा कि जमीन आनंद मार्ग संस्था की है, पब्लिक की है या किसी अन्य की।
  • सकारात्मक पत्रकारिता की अपील: उन्होंने पत्रकार से बातचीत में कहा कि श्मशान जैसी परती जगहों पर प्रकृति द्वारा पेड़-पौधे उगने को सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए ताकि समाज और बच्चों को इसका लाभ मिल सके।
श्मशान की बदहाली: एक उजाड़, सूखी ज़मीन का दृश्य जहाँ कचरा बिखरा है (सर्कल में शौचालय का नाला )एवं गन्‍दगी के आगोश में स्‍मारक, सकरा प्रखंड मुख्यालय के पास स्थित मुख्य श्मशान घाट, जहाँ सुविधाओं का घोर अभाव है और हर तरफ गंदगी पसरी है.

 कृष्ण कुमार (केके सर) ने स्पष्ट किया है कि श्मशान के मामले में उनका कोई व्यक्तिगत हित या लोभ नहीं है। मामला श्मशान की प्रॉपर्टी और निजी दावों के बीच का है, जिसे उचित मापी के द्वारा ही सुलझाया जा सकता है।

महदेईया पोखर की जमीन भी दलालों ने 14 टुकड़ों में बेची, सिर्फ हवा या सच , जांच है जरूरी,

श्मशान से सटे पूरब महदेईया पोखर को भी भूमाफिया निगल चुके हैं। नाम न छापने की शर्त पर सबहा गांव के एक जमीन के धंधे से जुड़े व्यक्ति ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। उसने बताया कि भूमाफिया ने इस पोखर की जमीन में जबरन रास्ता निकालकर इसे 14 टुकड़ों में बांटकर प्लॉटिंग कर दी है और इसे बेच डाला है।

भूमाफिया के निशाने पर पोखर: श्मशान से सटे महदेईया पोखर (कृषि फॉर्म का हिस्सा), जिसे लेकर ग्रामीणों ने गंभीर सवाल उठाए हैं.

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, पहले इस पोखर की देखरेख सकरा कृषि फॉर्म के द्वारा  की जाती थी। लेकिन बीते वर्ष के दौरान सकरा फॉर्म ने अपनी चहारदीवारी (बाउंड्री वाल) के निर्माण के समय इसे बाउंड्री से बाहर छोड़ दिया। बाउंड्री से बाहर होते ही दलालों की नजर इस पर लग गई। पिछले  10 वर्षों के दौरान सकरा फॉर्म के द्वारा पोखर पर से अपना  दावा छोड़ने और उसे माफियाओं के हवाले करने  की भूमिका अत्यंत संदेहास्पद मानी जा रही है। ग्रामीणों ने मांग की है कि यदि प्रखंड प्रशासन और उच्च अधिकारी इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय तफ्तीश और मापी करवाएं, तो करोड़ों रुपए के इस महाघोटाले और श्मशान-पोखर की लूट का पर्दाफाश हो जाएगा।

श्मशान जाने का मार्ग अवरुद्ध!: छठ पूजा के समय छठ व्रती को पोखर पर जाने में अब हो रही है कठिनाई,

भूमाफिया की गिद्ध दृष्टि सिर्फ चिता स्थलों तक ही सीमित है लेकिन यहां रास्‍ता अवरूद्ध होने का कारण प्रशासन के द्वारा नये निर्माण में रास्‍ते  की अनदेखी हैं, गौरतलब है कि सकरा कृषि फॉर्म की चहारदीवारी (बाउंड्री वाल)बनने से पूर्व महदेईया पोखर के बगल से एवं  इस श्मशान के बिल्कुल बीचों-बीच से होकर एक मुख्य रास्ता गुजरता था, जो आज प्रशासनिक उपेक्षा के कारण सिमटकर महज एक संकरी पगडंडी के रूप में तब्दील हो गया है। यह पगडंडी कोई आम रास्ता नहीं, बल्कि दो प्रमुख गांवों— सबहा एवं सकरा फरीदपुर गांव की ऐतिहासिक सीमा रेखा (बाउंड्री लाइन) भी है। अब इस रास्ते को दोनों ओर से सोची-समझी साजिश के तहत बंद कर दिया गया है। श्मशान में पूर्व दिशा से प्रवेश करने वाले मुख्य रास्ते पर सकरा कृषि फॉर्म ने अपनी चहारदीवारी (बाउंड्री वाल) खड़ी करवाकर रास्ता पूरी तरह से अवरुद्ध (ब्लॉक) कर दिया है। वहीं दूसरी ओर, पश्चिम दिशा में ठीक बीच रास्ते पर किसान भवन का निर्माण करा दिया गया है, जिससे श्मशान का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है। वर्तमान में लोग किसी तरह किसान भवन के बगल से श्मशान में प्रवेश करते हैं। सकरा कृषि फॉर्म के द्वारा रास्‍ते पर  ही चहारदीवारी बना दिए जाने के कारण , हाल के वर्षों में छठ पूजा के समय पोखर के पूरब एवं उत्‍तर की दिशा से आने वाले छठ व्रती को अर्घ्‍य देने के लिए पोखर पर जाने में भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है,

कृषि फॉर्म की बाउंड्री: सकरा कृषि फॉर्म द्वारा बनाई गई बाउंड्री वाल, जिसने श्मशान के ऐतिहासिक रास्ते को अवरुद्ध (ब्लॉक) कर दिया है.

इस गंभीर और संवेदनशील मामले में अब जिला और प्रखंड प्रशासन को अविलंब दखल देना चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह दोनों ओर से श्मशान के इस ऐतिहासिक रास्ते को सरकारी कागजातों के अनुसार पूरी तरह से नियत (चिह्नित) करे, और अतिक्रमणकारियों को खदेड़े ।  दाह संस्कार के लिए आने वाले लोगों की सहूलियत के लिए यहाँ कम से कम एक पक्के सोलिंग युक्त (ईंट सोलिंग) रास्ते का निर्माण जल्द से जल्द करवाए ताकि मृत आत्माओं के अंतिम सफर में अवरोध पैदा न हो।

 4 वर्षों में एक हैंडपंप तक नहीं दे सकी सकरा नगर पंचायत, श्मशान घाट पर सुविधाओं का घोर अभाव

बताते चलें कि यह बदहाल श्मशान घाट सकरा प्रखंड मुख्यालय से महज 100 मीटर दक्षिण में स्थित है। विडंबना देखिए कि जिस प्रखंड मुख्यालय के बंद कमरों में पूरे इलाके के श्मशानों और कब्रिस्तानों की चहारदीवारी (बाउंड्री वाल) निर्माण की  योजनाएं बनती हैं, उसी प्रशासन की नाक के नीचे इस मुख्य श्मशान की हालत आज भी बद से बदतर बनी हुई है। पूर्व में ग्रामीण व्यवस्था के तहत स्थानीय स्तर पर इस श्मशान की देखरेख की जिम्मेदारी पंचायत के जिम्मे थी, लेकिन यहां  वर्तमान नगर पंचायत प्रशासन  और पूर्व मुखियाओं ने कभी इस पवित्र स्थल की सुध लेना मुनासिब नहीं समझा। हद तो तब हो गई जब प्रशासनिक बदलाव के बाद अब यह पूरा इलाका नगर पंचायत के गठन के साथ ही सकरा नगर पंचायत के अंतर्गत आ गया। अब इसके विकास, देखरेख और संपूर्ण प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी सीधे तौर पर नगर पंचायत प्रशासन की है। लेकिन नगर पंचायत सकरा बीते 4 वर्षों के लंबे कार्यकाल में इस अति महत्वपूर्ण श्मशान घाट में दाह संस्कार के लिए आने वाले लोगों के लिए पेयजल हेतु एक अदद हैंडपंप (चापाकल) और धूप-बारिश से बचने के लिए एक अदद शेड (छायादार शेड) तक की व्यवस्था नहीं कर सकी है। जीवित इंसानों के हक को मारने वाली व्यवस्था अब मृत आत्माओं और शोकाकुल परिजनों के बुनियादी अधिकारों पर भी डाका डाल रही है, जो कि अत्यंत शर्मनाक और निंदनीय है।

भूमाफिया के निशाने पर: सकरा प्रखंड मुख्यालय के पास स्थित मुख्य श्मशान घाट का विहंगम दृश्‍य

सकरा नगर पंचायत में एक शव वाहन तक नसीब नहीं; गंडक घाट जाने वाले गरीबों का उड़ाया जा रहा मखौल!

 नगर पंचायत प्रशासन ने कूड़ा उठाने और साफ-सफाई के लिए लाखों रुपए की लागत से बड़े-बड़े टीपर और ठेला गाड़ियों की फौज तो खड़ी कर ली, लेकिन हद दर्जे की संवेदनहीनता देखिए कि इस नगर पंचायत के पास आज तक गरीबों की सहूलियत के लिए एक अदद शव वाहन (एम्बुलेंस/डेड बॉडी वैन) तक की व्यवस्था करने की फुर्सत नहीं मिली। बताते चलें कि इस इलाके के बहुत सारे लोग अपने परिजनों के शवदाह के लिए समीप के पवित्र गंडक घाट पर जाते हैं। ऐसे में जिन संपन्न लोगों के पास अपनी गाड़ियों की व्यवस्था होती है, वे तो आसानी से चले जाते हैं; लेकिन असली मुसीबत उन बेबस और लाचार गरीबों पर टूटती है जिनके पास कोई साधन नहीं होता। संसाधन विहीन गरीब परिवार के लोग अपनों की लाश को ठेले, ऑटो या अन्य निजी साधनों पर लादकर, भारी किराया फूंककर बेहद अपमानजनक स्थिति में गंडक घाट ले जाने को मजबूर हैं,  लेकिन  नगर पंचायत के अधिकारियों को क्या एक अदद शव वाहन की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई? यह पूरी व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है । नगर पंचायत सकरा के अध्‍यक्ष एवं उपाध्‍यक्ष को संज्ञान लेना चाहिए कि  जिस जनता ने इन्हें मलाईदार कुर्सी पर बैठाया, आज उसी जनता के शवों को अंतिम यात्रा के लिए सम्मानजनक वाहन तक नसीब नहीं हो रहा है।

कब जागेगा सोया हुआ तंत्र?

सकरा प्रखंड मुख्यालय की नाक के नीचे चल रहा यह पूरा खेल महज़ जमीन की अवैध खरीद-बिक्री या अतिक्रमण का मामला नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की संवेदनहीनता और नैतिक पतन की पराकाष्ठा है। जो समाज अपने नौनिहालों की समाधियों को सुरक्षित न रख सके और जो तंत्र मृत आत्माओं के अंतिम सफर को सम्मान न दे सके, उसकी तरक्की और दावों पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा होना लाज़मी है।

कैमरे में कैद हुई वह रहस्यमयी परछाई कोई अंधविश्वास हो या न हो, लेकिन वह इस श्मशान की दुर्दशा पर रोती और इंसाफ मांगती मानवीय संवेदनाओं की चीख ज़रूर है।

क्या सकरा के पूर्व मुखिया और वर्तमान नगर पंचायत अध्यक्ष, उपाध्‍यक्ष महोदय अपनी इस ऐतिहासिक विफलता की ज़िम्मेदारी लेंगे? क्या जिला प्रशासन सकरा कृषि फॉर्म की ऐतिहासिक महदेईया पोखर के 14 टुकड़ों में हुए सौदे और श्मशान की भूमि पर बहते गंदे नाले की उच्च स्तरीय जांच करवाएगा?

सवाल कई हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गरीबों के शवों को गंडक घाट ले जाने के लिए एक अदद शव वाहन और छठ व्रतियों के लिए रास्ता नसीब होगा? न्यूज़ भारत टीवी इस  पर अपनी पैनी नज़र बनाए हुए है। अब देखना यह है कि इस ग्राउंड रिपोर्ट के बाद भी प्रशासन गहरी नींद में सोया रहता है या फिर इन रसूखदार भूमाफियाओं के खिलाफ कोई सख्त और दंडात्मक कार्रवाई कर मृत आत्माओं और जीवित इंसानों को उनका हक वापस दिलाता है।

जनता की आवाज़: सकरा के पूर्व मुखिया सतीश पासवान, जिन्होंने श्मशान के विकास और रास्ते को बहाल करने की ज़ोरदार माँग की है.

पूर्व मुखिया सतीश पासवान का वक्तव्य: पूर्व मुखिया सतीश पासवान ने बताया कि 2011 से उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने मनरेगा के तहत सड़क किनारे पेड़ लगवाकर और मिट्टीकरण का कार्य शुरू कर इस मार्ग को विकसित करने का प्रयास किया था।

“यह श्मशान सकरा बाजार और आसपास के 5 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले सभी समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। रास्ता बंद होने के कारण लोगों को शव ले जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है।” – सतीश पासवान

प्रशासन से मांग: सतीश पासवान ने नगर पंचायत अध्यक्ष और संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि:

  1. सरकारी नक्शे के अनुसार 16 फीट चौड़ी सड़क का अविलंब निर्माण कराया जाए।
  2. कृषि बीज गुणन केंद्र के निदेशक से बात कर बाधित मार्ग को खुलवाया जाए।
  3. श्मशान घाट को एक आधुनिक मुक्ति धाम के रूप में विकसित किया जाए जहाँ पानी और बैठने की समुचित व्यवस्था हो।

ब्यूरो रिपोर्ट, न्यूज़ भारत टीवी।

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