पटना के बांस घाट श्मशान पर छिड़ा भीषण सियासी संग्राम! रोहिणी आचार्य का सम्राट चौधरी सरकार पर सीधा हमला – ‘जिम्मेदारी का अंतिम संस्कार कर बाबाओं को बेची सरकारी व्यवस्था!’

89.40 करोड़ की लागत से बने अत्याधुनिक मोक्ष धाम के निजीकरण पर मचा बवाल, ‘आध्यात्मिक आउटसोर्सिंगको लेकर विपक्ष ने मुख्यमंत्री पर दागे तीखे सवाल

पटना: राजधानी पटना के ऐतिहासिक बांस घाट श्मशान घाट का कायाकल्प हो चुका है, लेकिन इसके साथ ही बिहार की राजनीति में एक नया और बेहद सनसनीखेज विवाद खड़ा हो गया है। बिहार सरकार ने स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत लगभग 89.40 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से गंगा किनारे इस अत्याधुनिक शवदाह गृह का निर्माण पूरा कराया है। करीब 4.5 एकड़ के विशाल भूभाग में फैले इस परिसर में एक साथ 18 शवों के अंतिम संस्कार की विश्वस्तरीय व्यवस्था की गई है। यहाँ इलेक्ट्रिक क्रेमेटोरियम, लकड़ी आधारित शवदाह स्थल, पारंपरिक चिताएं, वातानुकूलित प्रतीक्षालय, पेयजल और आधुनिक शौचालय जैसी तमाम हाई-टेक सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं।

पटना के ऐतिहासिक बांस घाट के अत्याधुनिक परिसर के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी संभालने के बाद कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद आध्यात्मिक संगठन के प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी।

विवाद तब शुरू हुआ जब इस नवनिर्मित हाई-टेक परिसर के संचालन और रखरखाव की पूरी जिम्मेदारी सीधे ईशा फाउंडेशन को सौंप दी गई। इस फैसले के सामने आते ही विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। राष्ट्रीय जनता दल की नेता रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक बेहद तीखा और हमलावर पोस्ट साझा करते हुए इसे ‘श्मशान घाट का निजीकरण’ करार दिया है।

रोहिणी आचार्य ने सरकार की इस नीति को ‘सरकारी जवाबदेही से मुक्ति का अंतिम संस्कार’ बताते हुए कहा कि अब अपने बिहार की राजधानी पटना के श्मशान घाट भी ‘आध्यात्मिक आउटसोर्सिंग’ के दौर में चले गए हैं। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर निशाना साधते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे सरकार को अपने और अपने विभागों से ज़्यादा भरोसा बाहरी सरकारी-कारोबारी बाबाओं पर हो गया है।

विपक्ष ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि जनता के पैसों से बनाई गई जन-सुविधाएं अब सिर्फ निजी हाथों में ट्रांसफर करने के लिए ही बची हैं। रोहिणी आचार्य ने मांग की है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को एक ‘हाफिडिफिट’ के माध्यम से जनता को साफ-साफ बताना चाहिए कि यह शासन का कैसा मॉडल है जिसमें श्मशान घाट का मैनेजमेंट भी एक ‘ब्रांडेड बाबा’ के भरोसे छोड़ दिया गया है। उन्होंने आशंका जताई कि कहीं सरकार अपनी जिम्मेदारियों का अंतिम संस्कार भी धीरे-धीरे दूसरों के हवाले तो नहीं कर रही है? उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बेहतर तो यह होता कि सम्राट सरकार आधिकारिक तौर पर सरकार का यह नया मंत्र ही घोषित कर देती: “जिम्मेदारी कम करो, हस्तांतरण ज़्यादा करो।”

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