नगर पंचायत या ‘नरक पंचायत’! तीन वर्षों से सरकारी तिजोरी में सेंधमारी, अधिकारियों की जेब में जा रहा क्या जनता का पैसा
रिपोर्ट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’
नवगठित नगर पंचायत मुरौल (मुजफ्फरपुर) इन दिनों स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों के बीच तीव्र आक्रोश का केंद्र बन चुका है। ग्राम पंचायत से नगर निकाय के रूप में अपग्रेड हुए इस क्षेत्र के लोगों को उम्मीद थी कि शहरीकरण के साथ यहाँ विकास की नई गंगा बहेगी, नागरिक सुविधाएं सुदृढ़ होंगी और प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता आएगी। परंतु, हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। आज मुरौल नगर पंचायत विकास के बजाय प्रशासनिक भ्रष्टाचार, वित्तीय विलासिता और बंदरबांट का एक ऐसा मॉडल बन चुका है, जिसे स्थानीय उप मुख्य पार्षद ने खुले तौर पर ‘नरक पंचायत’ की संज्ञा दे दी है।
इस महाघोटाले की जड़ें नगर पंचायत कार्यालय को संचालित करने के नाम पर किए जा रहे वित्तीय अपराध से जुड़ी हैं। पिछले 36 महीनों (3 वर्षों) से अधिक समय से नगर पंचायत मुरौल का प्रशासनिक कार्यालय एक निजी भवन की पहली मंजिल पर चलाया जा रहा है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि इस निजी भवन के किराए के नाम पर सरकारी तिजोरी में हर महीने सीधी सेंधमारी की जा रही है। जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा, जिसे क्षेत्र की सड़कों, नालियों, लाइटिंग और स्वच्छता पर खर्च होना चाहिए था, वह हर महीने अधिकारियों और रसूखदारों की मिलीभगत से निजी जेबों में जा रहा है।
इस खेल का गणित समझाते हुए स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता वीरेंद्र रॉय बताते हैं कि इस निजी मकान का किराया कागजों पर मोटी राशि के रूप में दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि इसमें से एक बड़ा हिस्सा कमीशन के तौर पर कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) और मुख्य पार्षद के बीच गुप्त रूप से बंट जाता है। यह सीधे तौर पर राजकीय कोष के दुरुपयोग और ‘आर्थिक अपराध’ का मामला है। 3 साल से चल रहे इस किराए के खेल ने मुरौल के विकास को 30 साल पीछे धकेल दिया है। जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है, और अधिकारी एसी कमरों में बैठकर किराए की रसीदों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं।

मुरौल की प्रशासनिक जादूगरी और “पाखंड का लाइव मॉडल” देखना हो, तो बीते दिनों आयोजित वार्ड स्तरीय सहयोग शिविर की इन तस्वीरों और दस्तावेजों को देख लीजिए। सरकारी फाइलों और लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के टेबल पर जो सत्यनारायण पंचायत सरकार भवन कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) मैडम की कलम से “जर्जर और जानलेवा” घोषित हो चुका है, उसी तथाकथित ‘जर्जर’ भवन की मजबूत छत के नीचे उपर के दृृृश्य में मैडम खुद अपनी वीआईपी कुर्सी लगाए बेहद इत्मीनान से मुस्कुराते हुए बैठी हैं। गजब का हौसला है मैडम आपका! जो छत किसी भी पल गिर सकती है (कम से कम आपकी लोक शिकायत निवारण में दी गई सरकारी रिपोर्ट तो यही कहती है), उसी छत के नीचे आप खुद बैठी हैं, आपके बगल में पूरा प्रशासनिक अमला बैठा है, सामने नगर पंचायत की भोली-भाली जनता बैठी है और दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में “समाधान शिविर” का बैनर टंगा है। अब जनता यह नहीं समझ पा रही है कि मैडम वहाँ जनता की समस्याओं का ‘समाधान’ करने आई थीं या साक्षात ‘काल’ के साए में अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करने? अगर यह भवन वाकई जर्जर है, तो क्या मैडम ने अपनी और वहाँ जुटे सैकड़ों ग्रामीणों की जान दांव पर लगाकर कोई सुसाइड मिशन प्लान किया था? और अगर मैडम की जान इतनी सस्ती नहीं है, तो फिर फाइलों में इस खूबसूरत आलीशान भवन को ‘जर्जर’ लिखकर किराये पर हजारो रुपये खर्च करके कौन सा वित्तीय अलादीन का चिराग जलाया जा रहा है? साफ है मैडम, जनता सब देख रही है—जब खुद बैठना हो तो भवन ‘आलीशान’ और ‘सुरक्षित’ है, और जब जनता के हित में दफ्तर शिफ्ट करना हो तो भवन ‘जर्जर’ है; इस अद्भुत और पाखंड से भरे विरोधाभास पर तो मुजफ्फरपुर प्रशासन को आपको ‘विशेष प्रशासनिक अभिनय पुरस्कार’ देना चाहिए!

IAS अफसरों की ट्रेनिंग का केंद्र रहा भवन दो दिन में कैसे हुआ जर्जर? मुरौल के प्रशासनिक पाखंड की खुली पोल!
इस पूरे मामले का सबसे सनसनीखेज और हैरान करने वाला पहलू सादिकपुर मुरौल के वार्ड संख्या 2 में स्थित ‘सत्यनारायण पंचायत सरकार भवन’ से जुड़ा है। करोड़ों रुपये की सरकारी लागत से निर्मित यह भव्य और सुसज्जित 2 मंजिला इमारत आज प्रशासनिक पाखंड का जीता-जागता सबूत बनी हुई है। वर्तमान कार्यपालक पदाधिकारी द्वारा पूर्व में जारी पत्र संख्या 452 के माध्यम से इस शानदार भवन को महज 12 वर्षों के भीतर ही ‘जर्जर और असुरक्षित’ घोषित कर दिया गया, ताकि निजी भवन में कार्यालय चलाने के खेल को जारी रखा जा सके।
प्रशासन के इस दावे की हवा तब पूरी तरह निकल जाती है, जब इसके गौरवशाली इतिहास और हालिया प्रशासनिक गतिविधियों पर नजर डाली जाती है। जमीनदाता परिवार के सदस्य सोनू कुशवाहा बताते हैं कि यह भवन कोई साधारण निर्माण नहीं है। जब इस क्षेत्र में 7 आईएएस (IAS) अधिकारी अपनी विलेज ट्रेनिंग के लिए मुजफ्फरपुर आए थे, तब उनके रहने, सहने और खाने-पीने की पूरी व्यवस्था इसी पंचायत सरकार भवन में की गई थी। इन अधिकारियों में मुजफ्फरपुर के पूर्व जिला पदाधिकारी सुब्रत सेन भी शामिल थे, जिन्होंने यहाँ रहकर ग्रामीण परिवेश का अध्ययन किया था। यह जिला का पहला ऐसा मॉडल पंचायत भवन था, जिसकी सुदृढ़ बनावट और बेहतरीन स्पेस को देखने दूसरे जिलों से प्रशासनिक अधिकारी और मुखिया आते थे।
विरोधाभास और पाखंड की पराकाष्ठा देखिए कि जिस भवन को अधिकारी कागजों पर ‘जर्जर’ बताकर आम जनता के प्रवेश के लिए असुरक्षित कह रहे हैं, उसी भवन में अभी हाल ही में, 2 जून 2026 को सरकार के निर्देश पर आधिकारिक ‘सहयोग शिविर’ का सफल आयोजन किया गया था। इतना ही नहीं, इस शिविर से करीब दो माह पहले तक स्थानीय थाना (ओपी) को यहाँ शिफ्ट करने के लिए प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में पूरे भवन का रंग-रोगन और पुलिस वेरिफिकेशन कराया गया था। वार्ड पार्षद आनंद कन्द साह और अन्य पार्षदगण सवाल उठाते हैं कि जो भवन 2 जून 2026 को सरकारी सहयोग शिविर के लिए सुरक्षित था, जिसमें सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ जुटी, और जो भवन थाना खोलने के लिए पूरी तरह मुफीद है , वह नगर पंचायत कार्यालय के लिए ‘जर्जर’ कैसे हो गया? किस इंजीनियर ने बिना किसी वैज्ञानिक जांच के इसे असुरक्षित घोषित करने का सर्टिफिकेट दे दिया? यह विरोधाभास साफ तौर पर दर्शाता है कि जर्जर भवन नहीं, बल्कि इस व्यवस्था को चलाने वाले अधिकारियों की नीयत हो चुकी है।

सरकारी आदेश की उड़ी धज्जियाँ: संयुक्त सचिव की चिट्ठी को दबाकर निजी भवन को फायदा पहुँचाने का खेल!
मुरौल नगर पंचायत में चल रहा यह खेल सिर्फ स्थानीय स्तर की मनमानी नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राज्य सरकार के शीर्ष सचिवालय के आदेशों की खुली अवहेलना और प्रशासनिक विद्रोह है। बिहार सरकार के नगर विकास एवं आवास विभाग द्वारा नवगठित नगर निकायों में प्रशासनिक भवनों के सुचारू संचालन और अनावश्यक राजस्व व्यय को रोकने के लिए समय-समय पर कड़े और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण पत्राचार 3 अप्रैल 2025 को हुआ था। नगर विकास एवं आवास विभाग के संयुक्त सचिव मनोज कुमार द्वारा पत्र संख्या 15/अभि० (को०) प्र० भवन-10-01/2025/1284 के माध्यम से राज्य के सभी नवगठित नगर परिषदों और नगर पंचायतों के कार्यपालक पदाधिकारियों को एक अत्यंत स्पष्ट मार्गदर्शिका भेजी गई थी। इस विभागीय पत्र के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:

अनिवार्य स्थानांतरण (शिफ्टिंग): पत्र के पहले ही बिंदु में साफ तौर पर निर्देश दिया गया था कि यदि नवगठित नगर निकाय क्षेत्र के अंतर्गत पूर्व का कोई ‘पंचायत सरकार भवन’ दुरुस्त अवस्था में उपलब्ध है, तो नगर पंचायत के कार्यालय को तत्काल प्रभाव से उसी पंचायत सरकार भवन में शिफ्ट किया जाए, ताकि निजी भवनों पर होने वाले अनावश्यक किराए के खर्च को रोका जा सके।
मरम्मत और विस्तार: पत्र के दूसरे बिंदु में स्पष्ट था कि यदि पंचायत सरकार भवन में कमरों की संख्या 2 से अधिक है और उसका ढांचा ठीक है, तो मामूली मरम्मती कराकर उसी का विस्तार किया जाए और नए प्रशासनिक कार्यों को वहीं से संचालित किया जाए।
नई भूमि का चयन: नई भूमि का चयन और अंचलाधिकारी (सीओ) से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त करने की प्रक्रिया केवल और केवल उसी परिस्थिति में की जानी है, जब निकाय क्षेत्र में कोई भी सरकारी भवन या पंचायत सरकार भवन उपलब्ध न हो।
मुरौल के कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) और मुख्य पार्षद की जुगलबंदी ने संयुक्त सचिव मनोज कुमार के इस महत्वपूर्ण आदेश (पत्र संख्या 1284) को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इस चिट्ठी को दबाकर, नियमों को ताक पर रखते हुए निजी भवन के मालिक को फायदा पहुँचाने का खेल बदस्तूर जारी रखा गया। इस आदेश के खिलाफ जाकर, वर्तमान में ईओ द्वारा क्षेत्र के एक सुदूर कोने (नेमोपुर में, जो भौगोलिक रूप से नगर पंचायत का एकतरफा किनारा है) में एक दलदली और जलजमाव वाली भूमि (खेसरा नंबर 1426) पर नया प्रशासनिक भवन बनाने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। इस साजिश का एकमात्र उद्देश्य यह है कि नए भवन के निर्माण के नाम पर करोड़ों रुपये का ठेका निकाला जा सके, जिसमें से भारी-भरकम कमीशन डकारा जा सके और तब तक वर्तमान किराए के खेल को अनवरत जारी रखा जा सके।

तू डाल-डाल, मैं पात-पात: ईओ मैडम का नया ‘कागजी घोड़ा’ और अंतहीन बहानेबाजी!
मुरौल नगर पंचायत में ‘किराए के खेल’ को अनवरत जारी रखने के लिए प्रशासनिक पाखंड किस कदर “तू डाल-डाल, मैं पात-पात” की तर्ज पर आगे बढ़ रहा है, इसका नया सुबूत ईओ मैडम की ताजातरीन चिट्ठी बयां करती है। जब मामला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के पाले में पहुंचा, तो मैडम ने आनन-फानन में कुछ दिन पहले पत्रांक 732, दिनांक 17/06/2026 को एक पत्र लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी को भेज दिया । इस पत्र में ईओ मैडम अचानक ‘पंचायती राज विभाग’ के नियमों और आदेशों की खोज में लग गई हैं, ताकि यह साबित किया जा सके कि जब तक वहां से हस्तांतरण का कोई विशेष फरमान नहीं आता, तब तक वे कुछ नहीं कर सकतीं। गजब का विरोधाभास है! कभी भवन को ‘जर्जर’ बताकर पल्ला झाड़ा जाता है, कभी ‘पुलिस और सुरक्षा बल’ का बहाना बनाया जाता है, और अब तीन साल बीत जाने के बाद पंचायती राज विभाग का आदेश ढूंढा जा रहा है। लोक शिकायत में गर्दन फंसती देख अब दाएं-बाएं की जादुई कलाकारी दिखाई जा रही है।

कागजी चक्रव्यूह और बहानों की तिकड़ी: एक ही मुद्दे पर तीन पत्रों का लाइव पाखंड!
मुरौल नगर पंचायत की कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) मैडम द्वारा लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी को लिखे गए इन तीन आधिकारिक पत्रों का क्रमवार विश्लेषण व्यवस्था के उस शातिर खेल को बेनकाब करता है, जहाँ जनहित के एक सीधे सवाल को कागजी भूलभुलैया में दफन करने की हरसंभव कोशिश की गई है। इस सिलसिलेवार पाखंड की कड़ियाँ कुछ इस प्रकार खुलती हैं:
- पहला दांव—सुरक्षा और जर्जरता का ढोंग (पत्रांक 543, दिनांक 13/05/2026): इस पहले पत्र में ईओ मैडम ने शिकायत को खारिज करने के लिए अपने पुराने पत्रांक 452 (दिनांक 16.04.2026) का हवाला देते हुए लिखा कि उक्त पंचायत सरकार भवन में पुलिस बल का पड़ाव होने और जर्जरता के कारण कार्यालय का संचालन संभव नहीं है। साथ ही, पहली मंजिल पर स्थित निजी दफ्तर की लोहे की सीढ़ियों से वृद्धों और विकलांगों को होने वाली परेशानी वाले आरोप पर गोलमोल जवाब देते हुए इसे आगामी बोर्ड बैठक का विषय बताकर पल्ला झाड़ लिया।
- दूसरा दांव—खुद के बुने जाल में फंसी प्रशासनिक व्यवस्था (पत्रांक 654, दिनांक 05/06/2026): ठीक 23 दिन बाद लिखे गए इस दूसरे पत्र में मैडम ने खुद ही अपने ‘जर्जर और जानलेवा’ वाले दांव की हवा निकाल दी। इसमें वे बड़े गर्व से स्वीकार करती हैं कि विभाग के पत्रांक 1284 (दिनांक 03.04.2025) के आलोक में उसी ‘जर्जर’ सत्यनारायण पंचायत सरकार भवन के भीतर 2 जून 2026 को बकायदा एक भव्य “अस्थायी सहयोग शिविर” का सफल आयोजन किया गया था! यानी जब अपनी सुविधा के लिए वीआईपी कुर्सी लगानी हो, तब वह भवन पूरी तरह महफूज हो जाता है।
- तीसरा दांव—पंचायती राज विभाग की आड़ में नई बहानेबाजी (पत्रांक 732, दिनांक 17/06/2026): जब दोनों पत्रों के विरोधाभास से लोक शिकायत निवारण में गर्दन फंसती दिखी, तो मैडम ने “तू डाल-डाल, मैं पात-पात” की तर्ज पर यह तीसरा पत्र दाग दिया। इसमें प्रखंड पंचायत राज पदाधिकारी के पत्र (पत्रांक 119, दिनांक 17.06.2026) का नया बहाना खोजा गया है कि पंचायती राज विभाग की तरफ से ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित भवनों को नगर विकास विभाग को हस्तांतरित करने का कोई स्पष्ट आदेश ही नहीं है, और वर्तमान में वहां पंचायत एवं ग्राम कचहरी चल रही है यह पत्र में साफ साफ लिखा , अब यह तो वे ही जाने कि यहां कौन सी ग्राम कचहरी चल रही है ।
कभी जर्जरता का खौफ, कभी पुलिस बल की मजबूरी, और जब दोनों बहानों की पोल खुली तो पंचायती राज विभाग के नियमों की आड़! जो प्रशासनिक सक्रियता 3 साल पहले दिखानी चाहिए थी, वह आज लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी की टेबल पर परिवाद की कार्रवाई को किसी भी तरह बंद कराने (नस्तीबद्ध करने) की छटपटाहट में बदल चुकी है। साफ है कि इन पत्रों का मकसद समस्या का समाधान करना नहीं, बल्कि निजी भवन के मालिक को फायदा पहुँचाने वाले उस ‘गुप्त किराए’ के खेल को कानूनी दांव-पेचों के जरिए अनवरत जिंदा रखना है।
सबसे बड़ा झोल तो इस खेल के ‘सीक्रेट बजट’ में है। इस तथाकथित नगर पंचायत में गोपनीयता का आलम यह है कि खुद वार्ड पार्षदों तक को यह नहीं पता कि जनता की गाढ़ी कमाई से निजी भवन का असली किराया कितना भरा जा रहा है। वार्ड संख्या 3 के पार्षद आनंद कन्द साह ने बहुत पहले पत्रांक 20, दिनांक 15/06/2024 को लिखे अपने पत्र में अंदाज़ से ‘लगभग तीस हजार रुपया’ अंकित किया था। यानी जनता का पैसा पानी की तरह बह रहा है, लेकिन उसका सटीक हिसाब पार्षदों तक से छुपा कर रखा गया है।
मामला सिर्फ यहीं नहीं थमता; कागजी घोड़ों की दौड़ इससे भी एक कदम आगे निकल चुकी है। नगर विकास एवं आवास विभाग, बिहार के स्पष्ट निर्देश पत्रांक 1284, दिनांक 03/04/2025 की खुली अवहेलना करते हुए, जिसमें साफ कहा गया था कि दुरुस्त पंचायत सरकार भवन होने पर तत्काल शिफ्टिंग की जाए, ईओ मैडम ने जिलाधिकारी को पत्रांक 184, दिनांक 11/07/2025 को एक पत्र प्रेषित कर दिया। इस पत्र में नेमोपुर/920 मौजा के खाता संख्या 342, खेसरा संख्या 1426 और रकबा 28.78 डी० की एक सुदूर, जलजमाव वाली विवादित भूमि को प्रशासनिक भवन के लिए प्रस्तावित कर पूरा ब्योरा अंकित कर दिया गया है। अपने ही मूल विभाग (नगर विकास एवं आवास विभाग) के जनहित वाले सख्त आदेश को ठंडे बस्ते में दबाकर, सुदूर कोने में नए निर्माण का एस्टीमेट बनाने की यह हड़बड़ी साफ दर्शाती है कि अधिकारियों की नजर विकास पर नहीं, बल्कि उस भारी-भरकम बजट और कमीशन के खेल पर है जो नए टेंडर से पैदा होगा। जनता आज भी बुनियादी सुविधाओं को तरस रही है, और दफ्तर के नाम पर कागजों की यह बाजीगरी बदस्तूर जारी है।

कमीशन का ‘किराया’ या विकास का जनाजा? मुरौल नगर पंचायत के अधिकारियों पर फूटा जनप्रतिनिधियों का गुस्सा!
प्रशासन की इस हठधर्मिता, नियम-विरुद्ध कार्यों और लूट-खसोट की नीति के खिलाफ अब मुरौल नगर पंचायत के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया है। वार्ड पार्षदों से लेकर उप मुख्य पार्षद तक ने अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यह कमीशन का ‘किराया’ दरअसल मुरौल के विकास का जनाजा है।
उप मुख्य पार्षद अजय कुमार राय ने सीधे तौर पर व्यवस्था पर प्रहार करते हुए कहा कि नगर पंचायत में लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या की जा रही है। कुछ जनप्रतिनिधि और अधिकारी खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। वे वार्ड पार्षदों को सामूहिक बैठकों में बुलाने के बजाय अकेले-अकेले बुलाकर ‘डील’ करने की कोशिश करते हैं। इसी ‘अकेले-अकेले’ समझाने के चक्कर में आज पूरे जिले में मुरौल की साख मिट्टी में मिल चुकी है।
वहीं, वार्ड संख्या 3 के पार्षद आनंद कन्द साह ने इस प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। उन्होंने 15 जून 2026 को पत्र संख्या 465 के माध्यम से बिहार सरकार के नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव और मुजफ्फरपुर के जिला पदाधिकारी (डीएम) को एक अंतिम वैधानिक कानूनी नोटिस तामील कराया है। इस वैधानिक नोटिस में उन्होंने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि यदि नगर पंचायत कार्यालय को अविलंब सत्यनारायण पंचायत सरकार भवन में स्थानांतरित नहीं किया गया, तो वे पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका/रिट याचिका दायर करेंगे।
इस आक्रोश में सामाजिक कार्यकर्ता वीरेंद्र रॉय ने एक और बड़ा खुलासा करते हुए अधिकारियों के भ्रष्टाचार की फेहरिस्त जनता के सामने रख दी है। उन्होंने कहा कि ‘’ नगर पंचायत में सिर्फ किराए का ही घोटाला नहीं है, बल्कि कबाड़ और तेल का भी एक बहुत बड़ा सिंडिकेट चल रहा है। लगभग 35 लाख रुपये की सरकारी लागत से खरीदी गई पैखाना साफ करने वाली वैक्यूम मशीन और ट्रैक्टर पिछले 3 साल से जंग खा रहे हैं। आज तक वह मशीन किसी गरीब जनता के दरवाजे पर सेवा देने नहीं गई, बल्कि उस ट्रैक्टर का उपयोग अधिकारियों के निजी खेतों को जोतने के लिए किया जा रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उस खड़ी गाड़ी और निजी कार्यों में इस्तेमाल होने वाले ट्रैक्टर के नाम पर पेट्रोल पंपों से लाखों रुपये के बोगस वाउचर बनवाकर तेल का खेल खेला जा रहा है। इसी सरकारी तेल की चोरी के पैसे से अधिकारी अपनी निजी स्कॉर्पियो गाड़ियों में घूम रहे हैं। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत पिछले ६ महीनों से तेल की खरीद और लॉग-बुक की पर्चियां मांगने पर भी कार्यालय द्वारा टालमटोल किया जा रहा है, जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि परदे के पीछे बहुत कुछ काला है।‘’

गुप्त खेल पर पार्षदों की मुहर: जनता का पैसा स्वाहा, जनप्रतिनिधि खुद अंधेरे में!
प्रशासनिक तानाशाही और वित्तीय गोपनीयता का तमाशा देखिए कि जिस नगर पंचायत को चलाने की जिम्मेदारी जनता ने अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को सौंपी है, उन्हें ही व्यवस्था के इस “गुप्त खेल” से कोसों दूर रखा गया है। वार्ड संख्या चार के पार्षद बबलू कुमार उर्फ दिलीप कुमार का बयान इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि मुरौल नगर पंचायत में पारदर्शिता का जनाजा निकल चुका है। पत्रकार से बातचीत में उन्होंने यह सनसनीखेज स्वीकारोक्ति की है कि आज तक जितने भी सम्मानित पार्षद जीत कर आए हैं, उनमें से कुछ ने जब दफ्तर के इस गुप्त किराए का सच जानने का प्रयास किया, तो उन्हें साफ तौर पर टका सा जवाब दे दिया गया और जानकारी छुपा ली गई। पार्षद खुद अंदाजे से किराया 18 या 19 हजार रुपये होने का अनुमान लगा रहे हैं, जिससे यह साफ है कि कागजों पर चल रहे इस असली खेल का वित्तीय ब्योरा बोर्ड के सदस्यों तक के लिए एक अभेद्य ‘गुप्त भेद’ बना हुआ है। इतना ही नहीं, नेमोपुर में दफ्तर ले जाने की ईओ मैडम की एकतरफा प्रशासनिक जिद पर भी पार्षद के बयान ने सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है कि इस विषय पर सभी सदस्यों का मतैक्य होना और सामूहिक रूप से बैठकर निर्णय लेना जरूरी था, लेकिन यहाँ बोर्ड के सदस्यों की मानसिकता और राय को ताक पर रखकर प्रक्रिया को “अंतिम चरण” में पहुंचा दिया गया है। जब ब्लॉक परिसर के मुख्य भवन में बीडीओ साहब के चेंबर के ठीक ऊपर मीटिंग हॉल और ऑफिशियल कार्य के लिए पर्याप्त सरकारी जगह (स्पेस) उपलब्ध थी, तो फिर सामूहिक बैठकों में उस पर चर्चा करने के बजाय सुदूर कोने में करोड़ों की नई योजना चमकाने की यह जल्दबाजी किस ‘खास’ नीयत का इशारा कर रही है, यह अब किसी से छुपा नहीं है।
मुरौल नगर पंचायत का यह पूरा घटनाक्रम बिहार के नवगठित नगर निकायों में पनप रहे नौकरशाही के भ्रष्टाचार का एक क्लासिक उदाहरण है। करोड़ों रुपये की लागत से बने, 12-13 कमरों वाले, हवादार, वाटर हार्वेस्टिंग और सोलर जैसी उन्नत तकनीकों से सुसज्जित सत्यनारायण पंचायत सरकार भवन को महज इसलिए छोड़ दिया गया है क्योंकि वह सरकारी है और वहाँ रहने से अधिकारियों को कोई व्यक्तिगत वित्तीय लाभ या कमीशन नहीं मिलेगा।
भूदाता सत्यनारायण बाबू (अधिवक्ता) ने 2010 में अपनी लाखों रुपये मूल्य की 50 डिसमिल कीमती मुख्य सड़क की जमीन इस उद्देश्य से दान की थी कि यहाँ से समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का कल्याण होगा। आज उनकी आत्मा भी इस प्रशासनिक लूट को देखकर कराह रही होगी। जनप्रतिनिधियों द्वारा पूर्व में डीएम, एसडीओ और कार्यपालक पदाधिकारी को दर्जनों आवेदन दिए गए, लेकिन नतीजा शून्य रहा।
अब जब पानी सिर से ऊपर गुजर चुका है, तो वार्ड पार्षद आनंद कन्द साह द्वारा 15 जून 2026 को दिए गए वैधानिक नोटिस ने प्रशासनिक खेमे में हड़कंप मचा दिया है। इस नोटिस में स्पष्ट मांग की गई है कि:
1. कार्यालय को तुरंत सरकारी भवन में शिफ्ट किया जाए। 2. पिछले ३ वर्षों में गलत तरीके से बहाए गए किराए की पाई-पाई की राशि बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 के तहत दोषी अधिकारियों और मुख्य पार्षद के वेतन/निजी संपत्ति से वसूल की जाए। 3. दलदली भूमि पर नए भवन के प्रस्ताव को रद्द कर ब्लॉक परिसर की सुरक्षित भूमि पर पारदर्शी सर्वे कराया जाए।
यदि मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन और नगर विकास विभाग ने इस अंतिम नोटिस के बाद भी कार्यपालक पदाधिकारी की मनमानी पर लगाम नहीं लगाई, तो यह मामला पटना हाई कोर्ट की चौखट पर गूंजेगा। मुरौल की जनता अब जाग चुकी है और वह अपने हक के पैसों से अधिकारियों की विलासिता का अंत करने के लिए सड़कों से लेकर न्यायालय तक संघर्ष करने को तैयार है।
दाता परिवार द्वारा दान की गई मुख्य सड़क की कीमती 50 डिसमिल जमीन पर बना भव्य दो मंजिला मॉडल ‘सत्यनारायण पंचायत सरकार भवन’। इसी आलीशान इमारत को फाइलों में ‘जर्जर और जानलेवा’ बताकर बंद रखा गया है। पर हकीकत कुछ और है,देखें उपर के दृश्य में लाइव विडयो के अंश
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