समाजसेवी राजेश कुमार का यह ‘क्रांतिकारी रूप’ देख फटी रह गईं लोगों की आँखें; मुरौल से सकरा तक चर्चा का विषय बना अनोखा प्रदर्शन।
[सकरा/ मुजफ्फरपुर]: दो तस्वीरों की कहानी बीते दिनों सोशल मीडिया और स्थानीय गलियारों में कुछ तस्वीरें तेजी से वायरल हुईं, जिन्होंने हर देखने वाले को सोचने पर मजबूर कर दिया। इन तस्वीरों में दो अलग-अलग इंसान नहीं, बल्कि एक ही व्यक्ति के दो व्यक्तित्व छिपे हैं। एक तस्वीर में राजेश कुमार अपनी साधारण वेशभूषा में एक गंभीर ग्रामीण चिकित्सक के रूप में दिखते हैं, जो लोगों का इलाज करते हैं। लेकिन बाकी तस्वीरों में उनका जो रूप सामने आया, वह ‘युगांतकारी’ है। गले में मिट्टी की हांडी (कटिया), कमर में बंधा झाड़ू और पैरों में छनछनाते घुंघरू—यह कोई तमाशा नहीं, बल्कि एक समाज के उस दंश की कहानी थी जिसे इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया था।

क्यों बदला डॉक्टर ने अपना स्वरूप?
राजेश कुमार पेशे से एक ग्रामीण चिकित्सक हैं और समाज सेवा में सक्रिय रहते हैं। रैदास जयंती और अंबेडकर जयंती के अवसर पर उन्होंने जो वेशभूषा धारण की, उसका सीधा संबंध भारत के उस काले अतीत से है जब दलित समाज को अमानवीय परिस्थितियों में रहने पर मजबूर किया गया था।
राजेश कुमार बताते हैं कि आज की युवा पीढ़ी, जो सुख-सुविधाओं में पल रही है, वह भूल गई है कि उनके पूर्वजों ने कितनी ज़िल्लत झेली है। उनके इस रूप के तीन मुख्य संदेश थे:
- गले में हांडी: ताकि थूकने पर वह ज़मीन अपवित्र न हो।
- कमर में झाड़ू: ताकि पैरों के निशान रास्ते से मिटते चले जाएं।
- पैरों में घुंघरू: ताकि उनके आने की आवाज़ सुनकर ‘ऊंची जाति’ के लोग रास्ता बदल लें।
मुरौल से सकरा तक: चेतना की पदयात्रा
चिकित्सक राजेश कुमार इस गेटअप में केवल खड़े नहीं रहे, बल्कि उन्होंने मुरौल के अंबेडकर स्थल से लेकर लौतन, सुजावलपुर चौक, और सकरा ब्लॉक कैंपस तक की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने बच्चों और युवाओं को रोक-रोकर समझाया कि आज जो ‘टाई-बेल्ट’ और ‘साफ कपड़े’ हम पहन रहे हैं, वह बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के संघर्षों और 1950 में लागू हुए संविधान की देन है।
चिकित्सक राजेश कुमार का कहना है:
“आज हम बिसलेरी का पानी पीते हैं और कारों में घूमते हैं, लेकिन एक वक्त था जब हमारे पुरखों को जानवरों के नहाने के बाद पोखरों का पानी नसीब होता था। मैं यह झांकी इसलिए निकालता हूँ ताकि आने वाली पीढ़ी यह समझ सके कि शिक्षा ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे हम फिर से उस गुलामी की ओर नहीं लौटेंगे।”

तस्वीर के मायने: क्या संदेश मिलता है?
यह तस्वीर संदेश देती है कि “स्मृति ही प्रतिरोध है” (Remembering is resisting)। राजेश कुमार का यह प्रयास बताता है कि एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति (चिकित्सक) जब अपने इतिहास को याद रखता है, तभी वह समाज को सही दिशा दे सकता है।
तस्वीर यह भी स्पष्ट करती है कि:
- शिक्षा ही हथियार है: बाबा साहेब के ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ के नारे को उन्होंने जमीन पर उतारने की कोशिश की है।
- अधिकारों के प्रति सजगता: यह झांकी याद दिलाती है कि संविधान ने हमें इंसान होने का दर्जा दिया है।
- त्याग की भावना: एक डॉक्टर होकर भी समाज को जगाने के लिए खुद को उस ‘अछूत’ के पुराने रूप में ढाल लेना, राजेश कुमार के साहस और समाज के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
“आधी रोटी खाओ, पर बच्चों को पढ़ाओ”
इस पदयात्रा का का सबसे मर्मस्पर्शी हिस्सा वह है जहाँ राजेश कुमार ‘शेरनी के दूध’ यानी शिक्षा की बात करते हैं। उनका मानना है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, लेकिन समाज को शिक्षा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। सकरा ब्लॉक कैंपस में हुई संगोष्ठी हो या मथुरापुर में बाबा साहेब की मूर्ति का अनावरण, हर जगह इस ‘डॉक्टर’ ने अपनी झांकी से यह साबित कर दिया कि असली इलाज शरीर का नहीं, बल्कि समाज की सोच का करना ज़रूरी है।





