Monday, June 8, 2026

महाघोटाला या महालापरवाही? मुरौल नगर पंचायत की वेबसाइट पर बारसोई का कब्जा, जनता के टैक्स और अस्मिता से सरेआम खिलवाड़!

रिर्पोट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’

मुजफ्फरपुर (मुरौल): सरकारी फाइलों में डिजिटल इंडिया के सपने सजाए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर ‘डिजिटल धांधली’ का ऐसा खेल चल रहा है जिसे देखकर आप दंग रह जाएंगे। मामला नगर पंचायत मुरौल का है, जहाँ की आधिकारिक वेबसाइट e-murol.com पर मुरौल की नहीं, बल्कि कटिहार जिले के बारसोई नगर पंचायत की तस्वीर चमक रही है। यह महज एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि मुरौल की जनता की अस्मिता और उनके खून-पसीने की कमाई (टैक्स) के साथ किया गया एक भद्दा मजाक है।

तस्‍वीर में नगर पंचायत मुरौल के बदले  कटिहार जिले के ‘बारसोई नगर पंचायत’ की चमकती तस्वीर, नीचे लाल इनसेट में ‘बारसोई नगर पंचायत’ की जूम इन  तस्‍वीर

लाखों की बंदरबांट, फिर भी वेबसाइट उधारकी?

हैरानी की बात यह है कि इस वेबसाइट के नाम पर कंपनी को लाखों रुपये का भुगतान किया जा चुका है। बावजूद इसके, साइट पर मुरौल की कोई पहचान नहीं दिखती। यहाँ तक कि भौगोलिक जानकारी में गलतियां भरी पड़ी हैं। वार्ड संख्या 3 के पार्षद आनंद कंद साह ने सीधे तौर पर प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि, नगर पंचायत की नींव ही कमजोर है, यहाँ प्रशासक और प्रशासन दोनों पूरी तरह विफल हैं। लाखों रुपये डकारने के बाद भी वेबसाइट पर होल्डिंग टैक्स या ग्रीवांस रिड्रेसल का कोई विकल्प काम नहीं करता।”

क्या कटिहार प्रेम में डूबा है मुरौल का प्रशासन?

मुरौल के पूर्व मुख्य पार्षद प्रत्याशी वीरेंद्र राय ने एक सनसनीखेज आरोप लगाते हुए इस लापरवाही के तार सीधे कार्यपालक पदाधिकारी (EO) के ससुराल से जोड़ दिए हैं। उन्होंने कहा, पैसा मुरौल की जनता का लग रहा है और प्रचार कटिहार के बारसोई का हो रहा है। ईओ साहिबा का ससुराल कटिहार में है, इसीलिए स्ट्रीट लाइट से लेकर सीसीटीवी और वेबसाइट तक का सारा काम कटिहार की एजेंसियां ही देख रही हैं।” ### सफेद झूठबोल रहीं कार्यपालक पदाधिकारी! जब इस संबंध में नगर कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी से सवाल किया गया, तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से कह दिया कि उन्होंने बारसोई की तस्वीर नहीं देखी। उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया, जबकि वेबसाइट का स्क्रीनशॉट चिल्ला-चिल्लाकर लापरवाही की गवाही दे रहा है। सवाल यह है कि एक पढ़ी-लिखी अधिकारी को अपनी ही संस्था की वेबसाइट का हाल क्यों नहीं पता? क्या यह ‘अनजान’ बने रहने का नाटक भ्रष्टाचार को ढंकने की एक कोशिश है?

न्‍यूज भारत टी.वी. के कैमरे पर, तिमूल के पूर्व चेयरमैन एवं  नगर पंचायत मुरौल के पूर्व मुख्य पार्षद प्रत्याशी वीरेंद्र राय

मौन साधे माननीयऔर जनता की बेबसी

नगर पंचायत अध्यक्ष नरेश मेहता इस पूरे विवाद पर अंत-अंत तक बयान देने से बचते रहे। उनकी यह चुप्पी दर्शाती है कि वे भी इस लापरवाही में बराबर के हिस्सेदार हैं। पार्षद बबलू कुमार उर्फ दिलीप कुमार कहते हैं, बोर्ड की बैठकों में क्या फैसले होते हैं, यह सार्वजनिक नहीं किया जाता। पारदर्शिता का घोर अभाव है और जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है।”

एक नजर: संस्थान के लिए क्या है वेबसाइट का महत्व?

आज के डिजिटल युग में किसी भी सरकारी संस्थान की वेबसाइट उसका ‘डिजिटल चेहरा’ होती है। यह न केवल सूचना का केंद्र है, बल्कि जनता और सरकार के बीच संवाद का एकमात्र पारदर्शी सेतु है। जब वेबसाइट ही गलत तथ्यों और दूसरी जगह की तस्वीरों से भरी हो, तो जनता का भरोसा प्रशासन से उठना लाजमी है। एक आधिकारिक वेबसाइट के जरिए ही लोग घर बैठे टैक्स जमा करते हैं और अपनी समस्याएं दर्ज कराते हैं, लेकिन मुरौल में यह ‘सेतु’ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है।

न्‍यूज भारत टी.वी. के कैमरे पर, हकीकत बयां करते नगर पंचायत मुरौल के वार्ड संख्या चार के पार्षद बबलू कुमार उर्फ दिलीप कुमार ,एवं  सामने लैपटॉप पर ‘बारसोई नगर पंचायत’ की तस्‍वीर दिखाते हुए,   

पार्षद बबलू कुमार का तीखा प्रहार: यह भ्रष्टाचार का जीता-जागता नमूना है

इस पूरे मामले में वार्ड संख्या चार के पार्षद बबलू कुमार उर्फ दिलीप कुमार ने प्रशासन की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने इस लापरवाही को सीधे तौर पर भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए कहा:

मज़ाक तो सर्वदा से हो रहा है जब से नगर पंचायत बना है। और वेबसाइट जो बना है, उस पर लाखों रुपया का बंदरबांट किया गया है। वेबसाइट कंपनी को पैसा भुगतान कर दिया गया है, लेकिन वेबसाइट पर आज भी बारसोई नगर पंचायत का तस्वीर लगा हुआ है। जब हम लोग आवाज़ उठाते हैं, तो कहा जाता है कि सुधार हो जाएगा, लेकिन सुधार आज तक नहीं हुआ। यह सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार का नमूना है। जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है और धरातल पर कोई काम नहीं हो रहा है।”

बबलू कुमार यहीं नहीं रुके, उन्होंने वेबसाइट पर दिए गए संपर्क विवरणों की पोल खोलते हुए प्रशासनिक गैर-जिम्मेदारी को उजागर किया। उन्होंने बताया कि सरकारी वेबसाइट पर किसी आधिकारिक कार्यालय नंबर के बजाय एक एमटीएस (MTS) कर्मी का निजी नंबर दिया गया है। पार्षद ने सवाल उठाया:

किसी भी सरकारी वेबसाइट पर कार्यालय का आधिकारिक नंबर या टोल-फ्री नंबर होना चाहिए ताकि जनता अपनी समस्याओं को दर्ज करा सके। एक निजी कर्मी का नंबर देना यह दर्शाता है कि प्रशासन कितना गैर-जिम्मेदार है। यह केवल खानापूर्ति की जा रही है ताकि दिखाया जा सके कि वेबसाइट चल रही है। पारदर्शिता का यहाँ पूरी तरह अभाव है।”

तस्‍वीर में नगर पंचायत मुरौल के साइट पर प्रदर्शित मोबाइल नम्‍बर एवं ईमेल  

आखिर क्यों गंभीर है यह लापरवाही?

किसी भी सरकारी संस्थान के लिए वेबसाइट उसका डिजिटल हस्ताक्षर होती है। इसे ‘अस्मिता से खिलवाड़’ क्यों कहा जा रहा है, इसे इन बिन्दुओं से समझा जा सकता है:

  1. पहचान की चोरी: मुरौल की जनता का पैसा जिस पोर्टल के रखरखाव के लिए जा रहा है, वह पोर्टल किसी दूसरे जिले की नगर पंचायत का पहचान दिखा रहा है। यह स्थानीय गौरव का अपमान है।
  2. राजस्व की हानि: वेबसाइट का मुख्य उद्देश्य होल्डिंग टैक्स, ट्रेड लाइसेंस और अन्य नागरिक सुविधाओं को ऑनलाइन करना होता है। जब वेबसाइट ही भ्रमित करने वाली हो, तो राजस्व संग्रह (Collection) प्रभावित होता है।
  3. सुरक्षा और डेटा: एक सरकारी वेबसाइट पर निजी कर्मियों के नंबर होना डेटा सुरक्षा और आधिकारिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन है।
  4. प्रशासनिक दूरदर्शिता का अभाव: यदि अधिकारी अपनी वेबसाइट तक को मॉनिटर नहीं कर पा रहे, तो वे क्षेत्र के भौतिक विकास की निगरानी कैसे करेंगे?

कार्यपालक पदाधिकारी का अनजानरवैया: सवालों के घेरे में बयान

जब इस गंभीर विसंगति को लेकर नगर कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी से जवाब मांगा गया, तो उनका जवाब किसी को भी हैरान कर सकता है। उन्होंने कहा:

नहीं, बारसोई का तो नहीं आता है। मैं तो जब भी ओपन करती हूँ तो मुरौल नगर पंचायत का ही आता है। इसके रिगार्डिंग मैं बात करती हूँ एजेंसी से। अगर ऐसा है तो उसको देखती हूँ।”

हैरानी की बात यह है कि जिस वेबसाइट को दुनिया देख रही है, जिस पर बारसोई का चित्र स्पष्ट रूप से अंकित है, उसे विभाग की मुख्य अधिकारी ने कभी ‘देखा’ ही नहीं। जब उनसे कटिहार की एजेंसी को काम देने और स्थानीय पार्षदों के असंतोष पर सवाल किया गया, तो उन्होंने संक्षिप्त में कहा:

कटिहार की एजेंसी नहीं है। यह बिल्कुल गलत है। सारे काम नियमानुसार और पारदर्शिता के साथ ही होते हैं।”


नगर पंचायत मुरौल की कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी न्‍यूज भारत टी.वी. के कैमरे पर पक्ष रखते हुए बायें से एवं अपने मातहत कर्मचारी से टैब पर साइट खुलवा कर जानकारी लेती , साथ ही के फोन पर नगर पंचायत मुरौल की वेबसाइट मेन्‍टेनेन्‍स करने वाली एजेन्‍सी से बात करती हुई

बयान बनाम हकीकत: ईओ का काल्पनिकडिजिटल लोक

प्रशासनिक लापरवाही का सबसे हास्यास्पद और शर्मनाक पहलू तब सामने आया जब नगर कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी ने कैमरे पर रिकॉर्डेड बयान में एक ऐसी वेबसाइट का जिक्र किया, जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं है। उन्होंने आधिकारिक तौर पर ‘murol.in-nagarpalika’ नामक साइट का हवाला दिया, जबकि इंटरनेट की दुनिया में इस नाम का कोई पोर्टल मौजूद नहीं है। हकीकत यह है कि मुरौल के नाम पर दो वेबसाइटें ऑनलाइन दिख रही हैं—एक https://muraul.e-nagarpalika.com और दूसरी e-murol.com। विडंबना देखिए कि जिस e-murol.com पर ‘बारसोई नगर पंचायत’ की तस्वीरें और गलत तथ्य भरे पड़े हैं, उसे ईओ साहिबा ने ‘मुरौल की अपनी साइट’ मानने से ही इनकार कर दिया। एक जिम्मेदार पद पर बैठी अधिकारी द्वारा ऐसी ‘काल्पनिक’ वेबसाइट का नाम लेना और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध साक्ष्यों को नकारना यह साफ करता है कि नगर पंचायत मुरौल का आईटी तंत्र और प्रशासनिक नेतृत्व न केवल दिशाहीन है, बल्कि जनता को गुमराह करने में भी माहिर है। जब अधिकारी को अपनी संस्था के सही वेब एड्रेस तक का ज्ञान न हो, तो उस वेबसाइट के नाम पर होने वाले लाखों के भुगतान पर सवाल उठना लाजिमी है।


तकनीकी दिवालियापन: स्मार्ट गवर्नेंस के नाम पर डिजिटल अंधेरा

नगर पंचायत मुरौल का यह पूरा प्रकरण केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उस तकनीकी दिवालियापन का प्रमाण है जो सरकारी तंत्र में दीमक की तरह लगा हुआ है। एक तरफ बिहार सरकार और केंद्र सरकार ‘स्मार्ट सिटी’ से लेकर ‘स्मार्ट पंचायत’ तक के नारे बुलंद कर रही हैं, डिजिटल भुगतान और पारदर्शी शासन के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन मुरौल की हकीकत इन दावों के गाल पर एक तमाचा है।

हैरानी की बात यह है कि नगर पंचायत के सबसे जिम्मेदार पद पर बैठी कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी को खुद यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी जनता किस पोर्टल का उपयोग करे। कैमरे पर उन्होंने जिस ‘murol.in-nagarpalika’ का नाम लिया, वह अस्तित्वहीन है। यह स्थिति उस जनता के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है, जो अपना होल्डिंग टैक्स या अन्य सरकारी शुल्क ईमानदारी से जमा करना चाहती है। जब विभाग के मुखिया को ही ‘सही डिजिटल पते’ का ज्ञान न हो, तो आम नागरिक ठगी और भ्रम का शिकार क्यों न हो?

यह तकनीकी दिवालियापन ही है कि लाखों रुपये वेबसाइट मेंटेनेंस के नाम पर डकारे जा रहे हैं, लेकिन पोर्टल पर पहचान किसी और शहर (बारसोई) की है। यह दर्शाता है कि प्रशासन के लिए ‘डिजिटल’ होने का मतलब केवल एक वेबसाइट बनवाना और भुगतान करना है, उसकी गुणवत्ता और सत्यता से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। एक पढ़े-लिखे अमले के होते हुए ऐसी अंधेरगर्दी यह साबित करती है कि मुरौल नगर पंचायत में ‘स्मार्टनेस’ केवल फाइलों तक सीमित है, जबकि हकीकत में यहाँ डिजिटल अंधेरा छाया हुआ है।


न्‍यूज भारत टी.वी. के कैमरे पर, हकीकत बयां करते नगर पंचायत मुरौल के वार्ड संख्या तीन के पार्षद आनंद कंद साह

पार्षद आनंद कंद साह और वीरेंद्र राय के गंभीर आरोप

वार्ड संख्या तीन के पार्षद आनंद कंद साह ने तो यहाँ तक कह दिया कि नगर पंचायत का नींव ही कमजोर है। उन्होंने आरोप लगाया कि यहाँ “काला अक्षर भैंस बराबर” वाली स्थिति है। उनके अनुसार, प्रशासक और प्रशासन दोनों पूर्ण रूप से विफल हैं और उन्हें इस बात की फुर्सत नहीं है कि वे देखें कि सरकारी पोर्टल पर क्या चल रहा है।

वहीं, पूर्व प्रत्याशी वीरेंद्र राय ने सीधे तौर पर ‘कटिहार कनेक्शन’ पर ऊँगली उठाई। उन्होंने दावा किया कि मुरौल नगर पंचायत का पैसा कटिहार के लोगों और एजेंसियों को फायदा पहुँचाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है, क्योंकि कार्यपालक पदाधिकारी का ससुराल कटिहार में है। उन्होंने चुनौती दी कि ईओ साहिबा कैमरे के सामने आकर टेंडर और भुगतान का ब्योरा जनता को दें।


नगर पंचायत अध्यक्ष की चुप्पी: मौन सहमति या लाचारी?

नगर पंचायत के अध्यक्ष नरेश मेहता इस पूरे विवाद के केंद्र में होने के बावजूद मौन साधे हुए हैं। एक निर्वाचित प्रतिनिधि के नाते यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे जनता के टैक्स के पैसे का हिसाब लें। लेकिन उनका बयान देने से बचना यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं इस ‘महालापरवाही’ में वे भी बराबर के हिस्सेदार हैं।


अस्मिता का सौदा: किसी और की पहचान कब तक ढोएगा मुरौल?

किसी भी क्षेत्र की अस्मिता उसके इतिहास, भूगोल और उसकी अपनी पहचान से जुड़ी होती है। लेकिन नगर पंचायत मुरौल के सरकारी पोर्टल की सूरत देखकर ऐसा लगता है कि प्रशासन की नजर में मुरौल की अपनी कोई विशिष्ट पहचान है ही नहीं। अपनी वेबसाइट पर किसी दूसरे नगर पंचायत (बारसोई) की तस्वीर को बेशर्मी से ढोना, केवल एक ‘अपलोड’ की गलती नहीं है, बल्कि यह मुरौल के प्रत्येक नागरिक के स्वाभिमान पर सीधी चोट है।

नगर पंचायत मुरौल के कार्यालय का एक दृश्‍य

क्या मुरौल इतना विपन्न है कि उसके पास अपनी एक तस्वीर तक नहीं? क्या यहाँ की हरियाली, यहाँ की सड़कें या यहाँ के गौरवशाली संस्थान (जैसे ढोली एग्रीकल्चर कॉलेज) इतने कमतर हैं कि उन्हें वेबसाइट पर जगह देने के बजाय कटिहार के बारसोई का सहारा लेना पड़ा? यह स्थिति दर्शाती है कि वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारियों के लिए मुरौल केवल एक ‘रेवेन्यू कोड’ या ‘फाइल का नाम’ मात्र है। उनके लिए इस मिट्टी की गरिमा का कोई मूल्य नहीं है।

जब मुरौल का आम नागरिक टैक्स भरता है, तो वह बदले में केवल सुविधा नहीं, बल्कि सम्मान और अपनी पहचान की सुरक्षा भी चाहता है। लेकिन जब उसे अपनी ही सरकारी वेबसाइट पर किसी दूसरे शहर का चेहरा देखना पड़ता है, तो यह ‘अस्मिता के सौदे’ जैसा प्रतीत होता है। प्रशासन का यह रवैया साफ़ संदेश देता है कि उनके लिए मुरौल की विशिष्टता और यहाँ के लोगों की भावनाएं कोई मायने नहीं रखतीं। यह मानसिक गुलामी और प्रशासनिक आलस का वह चरम है, जहाँ लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी हम अपनी पहचान तक गिरवी रख देते हैं।


यह खबर केवल एक वेबसाइट की तस्वीर बदलने की नहीं है, बल्कि उस कार्यप्रणाली को बदलने की है जहाँ जनता के पैसे को अपनी जागीर समझकर लुटाया जाता है। अगर एक पढ़ा-लिखा प्रशासनिक अमला अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर दूसरे शहर की तस्वीर नहीं पहचान पा रहा, तो यह उनकी योग्यता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

पढ़े-लिखे अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की फौज होने के बावजूद अगर ऐसी भारी चूक हो रही है, तो यह ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है। क्या जिला प्रशासन इस ‘वेबसाइट घोटाले’ और कटिहार कनेक्शन की जांच कराएगा? या मुरौल की जनता इसी तरह अपनी पहचान के लिए तरसती रहेगी?

पार्षद बबलू कुमार की बातों ने स्पष्ट कर दिया है कि नगर पंचायत मुरौल में पारदर्शिता केवल कागजों तक सीमित है। अब देखना यह है कि इस रिपोर्ट के बाद जिला प्रशासन जागता है या मुरौल की जनता बारसोई के साये में ही ‘डिजिटल विकास’ का आनंद लेती रहेगी।


स्‍वीर में नगर पंचायत मुरौल के वेबसाइट के स्‍क्रीन शॉट का एक  विहंगम दृश्‍य

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की जयंती पर बी.आर.बी. कॉलेज में संगोष्ठी: ‘घुमक्कड़ी शास्त्र’ और साहित्यिक योगदान पर चर्चा

समस्तीपुर | 9 अप्रैल, 2026

स्थानीय बलिराम भगत (बी.आर.बी.) महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा बृहस्पतिवार को महापंडित राहुल सांकृत्यायन की जयंती अत्यंत उत्साह और गरिमा के साथ मनाई गई। इस अवसर पर ‘महापंडित राहुल सांकृत्यायन: जीवन, दर्शन और साहित्य’ विषय पर एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

ज्ञानानुसंधान के प्रतीक थे महापंडित: प्राचार्य

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य प्रो० जगदीश प्रसाद वैश्यंत्री ने राहुल सांकृत्यायन के व्यक्तित्व को विलक्षण बताते हुए कहा कि वे ज्ञान और अनुसंधान के साक्षात् प्रतीक थे। प्राचार्य ने उनके जीवन-दर्शन पर जोर देते हुए कहा, “महापंडित राहुल सांकृत्यायन का संपूर्ण जीवन-दर्शन हमें निरंतर गतिशीलता और जिज्ञासा का संदेश देता है। उनका ‘घुमक्कड़ी शास्त्र’ मात्र पर्यटन नहीं था, बल्कि ज्ञान की खोज और मानवीय संस्कृति को समझने का एक अद्वितीय माध्यम था। उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है और युवा पीढ़ी को ज्ञानार्जन के लिए प्रेरित करता है।”

बहुआयामी व्यक्तित्व पर चर्चा

संगोष्ठी के दौरान अन्य वक्ताओं ने भी महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिंदी साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान को रेखांकित किया। यह बताया गया कि उनके ‘घुमक्कड़ी शास्त्र’ और अनुवाद कार्यों के माध्यम से न केवल हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ, बल्कि पाठकों को विभिन्न देशों, समाजों और भौगोलिक परिस्थितियों को जानने-समझने का एक नया दृष्टिकोण प्राप्त हुआ। उन्हें हिंदी साहित्य के विकास में एक मील का पत्थर माना गया।

प्रस्तुति और उपस्थिति

कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना और अतिथियों के स्वागत से हुई। संगोष्ठी में स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के छात्र-छात्राओं ने राहुल सांकृत्यायन के साहित्य और दर्शन पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इन छात्रों में अभिषेक, विशाल, मृत्युञ्जय, रितु, नेहा, ज्योति, उन्नति, पूजा, प्रियंका, काजल, मुस्कान, सोनम, सरस्वती, सोनी, रूपा, सपना, सीता और संगीता शामिल थीं।

शिक्षकों और कर्मचारियों का योगदान

कार्यक्रम के सफल आयोजन में महाविद्यालय के शिक्षकों और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। संगोष्ठी में प्रो० विकास कुमार, प्रो० शकील अहमद, डॉ० स्वीटी, डॉ० सीरीन, डॉ० शबनम, डॉ० विंध्याचल साह, एच० एन० शुक्ला, डॉ० बागीरथ, उलाष्टी, ज्योति प्रसाद, डॉ० नरेश और डॉ० ममता सहित अन्य शिक्षक उपस्थित थे। उन्होंने महापंडित राहुल सांकृत्यायन के योगदान पर अपने विचार साझा किए।

धन्यवाद ज्ञापन

संगोष्ठी के अंत में हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. संजय प्रसाद ने सभी अतिथियों, शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं का धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में सभी के सहयोग की सराहना की।

मुजफ्फरपुर: पूर्व जिला महासचिव हरिचंद प्रसाद सिंह का निधन, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

मुजफ्फरपुर। जिला कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व जिला महासचिव स्व. हरिचंद प्रसाद सिंह के निधन से राजनीतिक गलियारे में शोक की लहर दौड़ गई है। वे महमदपुर बदल पंचायत के ग्राम महमदपुर मोहन के निवासी थे। उनके निधन की सूचना मिलते ही जिला एवं प्रखंड कांग्रेस कमेटी के नेताओं व कार्यकर्ताओं का जमावड़ा उनके आवास पर लग गया।

पार्थिव शरीर पर अर्पित की पुष्पांजलि

गुरुवार को जिला कांग्रेस कमेटी एवं प्रखंड कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारियों ने स्व. सिंह के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। उपस्थित नेताओं ने उनके पार्टी के प्रति समर्पण और सामाजिक कार्यों को याद करते हुए इसे कांग्रेस परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया। सभी ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की और शोकाकुल परिजनों को ढांढस बंधाया।

शोक संवेदना व्यक्त करने वाले प्रमुख नेता

श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में मुख्य रूप से निम्नलिखित गणमान्य उपस्थित थे: अलख निरंजन शर्मा (मुरौल प्रखंड अध्यक्ष),मोहन पासवान (अध्यक्ष, जिला अनुसूचित जाति विभाग),रीमा भारती (सरपंच, पिलखी),सुरेश चंचल (पूर्व विधायक),इसके अलावा शोक सभा में शिवजी राय, प्रेम मिश्रा, सीमा सरोज, अजीत सिंह, सत्रोहन सिंह, मनीष कुमार सहित दर्जनों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और दिवंगत नेता के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया।

निजी स्कूलों की ‘कमीशनखोरी’ पर नागरिक समाज का हल्लाबोल, 15 को कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन

समस्तीपुर | 9 अप्रैल, 2026 नए शैक्षणिक सत्र के शुरू होते ही समस्तीपुर के निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों की जेब पर डाले जा रहे अतिरिक्त बोझ और मनमानी के खिलाफ नागरिक समाज ने निर्णायक लड़ाई का ऐलान कर दिया है। किताबों, ड्रेस और अन्य शिक्षण सामग्रियों में भारी कमीशनखोरी का आरोप लगाते हुए संगठन ने आगामी 15 अप्रैल को जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है।

बीते पांच अप्रैल को समस्‍तीपुर में नागरिक समाज  के द्वारा किए गये प्रदर्शन की फाइल फोटो

NCERT को दरकिनार कर कमीशन का खेल

नागरिक समाज के सह-संयोजक सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने जिलाधिकारी, अनुमंडलाधिकारी और जिला शिक्षा पदाधिकारी को पत्र भेजकर इस पूरे सिंडिकेट का पर्दाफाश करने की मांग की है। आवेदन में कहा गया है कि स्कूल संचालक जानबूझकर सस्ती NCERT किताबों के बजाय निजी पब्लिशर्स की महंगी किताबें चला रहे हैं। इन किताबों, ड्रेस, टाई, बेल्ट और डायरी पर प्रिंट रेट वास्तविक लागत से कई गुना अधिक अंकित कराया जाता है, जिसका सीधा मुनाफा स्कूल संचालकों को कमीशन के रूप में मिलता है।

अभिभावकों पर बनाया जा रहा है दबाव

आरोप है कि स्कूलों ने सेटिंग के तहत कुछ विशेष अस्थाई दुकानें तय कर रखी हैं, जहाँ से सामग्री खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाया जाता है। सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने इसे नई शिक्षा नीति की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह शिक्षा का व्यवसायीकरण है।

अव्यवस्थाओं के बीच ‘अवैध’ वसूली

नागरिक समाज ने स्कूलों की आंतरिक अव्यवस्थाओं पर भी प्रहार किया है:

  • नियमों की धज्जियां: शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत 25% गरीब बच्चों के नामांकन की अनदेखी की जा रही है।
  • सुविधाओं का टोटा: कई स्कूलों में लैब, लाइब्रेरी, शुद्ध पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं।
  • अकुशल स्टाफ: कम वेतन के लालच में अप्रशिक्षित शिक्षकों से शिक्षण कार्य कराया जा रहा है।
  • फीस का बोझ: री-एडमिशन, डेवलपमेंट चार्ज और सालाना शुल्क के नाम पर मनमानी वसूली जारी है।

आंदोलन की रूपरेखा

नागरिक समाज ने चेतावनी दी है कि यदि इन छात्र-विरोधी गतिविधियों पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो प्रदर्शन को और उग्र किया जाएगा।

  • कार्यक्रम: विशाल जुलूस एवं प्रदर्शन
  • तिथि: 15 अप्रैल 2026 (बुधवार)
  • समय: शाम 5:00 बजे
  • स्थान: स्टेडियम गोलंबर से समाहरणालय (कलेक्ट्रेट) तक

“अभिभावकों का शोषण अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रशासन को जवाब देना होगा कि नियमों को ताक पर रखकर स्कूलों को लूट की छूट कैसे मिली हुई है।” — सुरेंद्र प्रसाद सिंह, सह-संयोजक, नागरिक समाज


भाकपा माले जिला सम्मेलन हेतु ताजपुर से 21 डेलीगेट चयनित, कार्यकर्ताओं में उत्साह

ताजपुर/समस्तीपुर | 9 अप्रैल 2026

कल्याणपुर के वीरसिंगपुर स्थित चंदा विवाह भवन में आगामी 18-19 अप्रैल को आयोजित होने वाले भाकपा माले जिला सम्मेलन की तैयारियां तेज हो गई हैं। सम्मेलन में भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु ताजपुर नगर एवं प्रखंड में पिछले एक सप्ताह से चल रही चुनाव प्रक्रिया बृहस्पतिवार को 21 डेलीगेटों के चयन के साथ संपन्न हो गई।

सर्वसम्मति से हुआ चयन

प्रखंड निर्वाची पदाधिकारी सह प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने सर्वसम्मति से चुने गए डेलीगेटों के नामों की घोषणा की। उन्होंने बताया कि ये डेलीगेट जिला सम्मेलन में ताजपुर का प्रतिनिधित्व करेंगे और संगठन की मजबूती के साथ-साथ स्थानीय जनसमस्याओं को पुरजोर तरीके से उठाएंगे।

प्रमुख डेलीगेटों की सूची:

  • किसान नेता: ब्रहमदेव प्रसाद सिंह, राजदेव प्रसाद सिंह, मनोज कुमार सिंह, संजीव राय, ललन दास, मुंशीलाल राय।
  • मजदूर व युवा नेता: प्रभात रंजन गुप्ता, शंकर महतो, जीतेंद्र सहनी (छात्र नेता), मो. एजाज, मो. शाद एवं मो. क्यूम।
  • फुटपाथी दुकानदार: मो. अबुबकर, मनोज साह, मो. गुलाब एवं मुकेश कुमार गुप्ता।
  • महिला एवं संघ प्रतिनिधि: रंजू कुमारी (आशा/रसोइया संघ), रेखा कुमारी, सविता सिंह, सुलेखा कुमारी (ऐपवा) एवं नीलम देवी।

जनसंघर्षों को मिलेगी नई धार

सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि जिला सम्मेलन में संगठन विस्तार, सदस्यता अभियान, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और किसान-मजदूरों के ज्वलंत मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की जाएगी। उन्होंने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि सम्मेलन की सफलता के लिए गांव-गांव जाकर संपर्क अभियान चलाएं और जनसंघर्षों को तेज करें।


रोसड़ा में गांधी प्रतिमा खंडित किए जाने पर माले का आक्रोश

दोषियों की गिरफ्तारी और मूर्ति पुनर्स्थापना की मांग

इसी बीच, भाकपा माले की जिला स्थाई समिति के सदस्य सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने रोसड़ा में असामाजिक तत्वों द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा तोड़े जाने की घटना पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है।

“नफरत फैलाने वाले लोग रोसड़ा के गांधी चौक का नामोनिशान मिटाना चाहते हैं, लेकिन शांतिप्रिय नागरिक उनके मंसूबों को कभी कामयाब नहीं होने देंगे।”

सुरेंद्र प्रसाद सिंह, जिला स्थाई समिति सदस्य

माले ने प्रशासन से निम्नलिखित मांगें की हैं:

  1. घटना की उच्चस्तरीय जांच कर क्षेत्र में तनाव भड़काने वाले दोषियों पर FIR दर्ज हो।
  2. आरोपियों की अविलंब गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए।
  3. क्षतिग्रस्त प्रतिमा की मरम्मत कर उसे ससम्मान पुनः स्थापित किया जाए।

प्राइवेट स्कूलों की लूट से बचाएगा ‘बिहार निजी विद्यालय शुल्क विनियमन अधिनियम’; अभिभावक ऐसे करें शिकायत

RTE का मजबूत साथी बना 2019 का यह कानून, प्रमंडलीय आयुक्त की समिति को मिली सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां; पारदर्शिता अब अनिवार्य।

मुजफ्फरपुर/पटना:  निजी स्कूलों द्वारा हर साल होने वाली बेतहाशा फीस वृद्धि और चुनिंदा दुकानों से ही किताबें व ड्रेस खरीदने के बढ़ते दबाव के बीच, बिहार सरकार का ‘निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019’ अभिभावकों के लिए एक बड़ी राहत बनकर उभरा है। शिक्षा के अधिकार (RTE) को जमीन पर उतारने और स्कूलों में व्यापारिक एकाधिकार को खत्म करने के उद्देश्य से लागू यह कानून, अब निजी शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही तय कर रहा है।

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

इस अधिनियम के तहत न केवल फीस वृद्धि की सीमा 7 प्रतिशत निर्धारित की गई है, बल्कि अभिभावकों को बाजार से अपनी पसंद की दुकान से सामग्री खरीदने की आजादी भी दी गई है। प्रमंडलीय आयुक्त की अध्यक्षता वाली ‘शुल्क विनियमन समिति’ को दी गई सिविल कोर्ट जैसी शक्तियों ने इस कानून को और भी मारक बना दिया है, जिससे अब नियमों की अनदेखी करने वाले स्कूलों पर भारी जुर्माने के साथ-साथ मान्यता रद्द होने का खतरा भी मंडरा रहा है।

फीस वृद्धि पर लगाम: अब मनमानी नहीं चलेगी

अधिनियम के तहत, कोई भी निजी स्कूल पूर्व शैक्षणिक वर्ष की तुलना में खुद से अधिकतम 7 प्रतिशत तक ही शुल्क में वृद्धि कर सकता है। यदि स्कूल को इससे अधिक फीस बढ़ानी है, तो उसे संबंधित ‘शुल्क विनियमन समिति’ के समक्ष उचित तथ्यों और कारणों के साथ प्रस्ताव रखना होगा। बिना तर्कसंगत औचित्य के 7 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि को समिति द्वारा खारिज किया जा सकता है।

किताब और ड्रेस की बाध्यता खत्म

यह अधिनियम स्पष्ट करता है कि किसी भी अभिभावक को स्कूल द्वारा निर्धारित दुकान, स्थान या संस्था से ही ड्रेस, किताबें या अन्य शिक्षण सामग्री खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। स्कूलों को अनिवार्य रूप से अपनी वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर कक्षाओं के अनुसार पुस्तकों और ड्रेस की सूची जारी करनी होगी। अभिभावक अपनी सुविधानुसार बाजार से कहीं भी यह सामग्री खरीद सकते हैं। इस नियम का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।

शिकायत निवारण के लिए शुल्क विनियमन समिति

अधिनियम के तहत हर प्रमंडल में एक ‘शुल्क विनियमन समिति’ का गठन किया गया है। यदि किसी अभिभावक को लगता है कि स्कूल द्वारा अनुचित फीस वसूली जा रही है या इस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है, तो वे प्रमंडलीय आयुक्त के कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

  • शिकायत की प्रक्रिया: शिकायत मिलने पर समिति के पास सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां होंगी, जिसमें मामले की जांच, शपथ पत्र पर साक्ष्य लेना और दस्तावेजों की मांग करना शामिल है।
  • समयबद्ध निर्णय: यदि फीस वृद्धि से संबंधित मामला है, तो शिकायत प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर समिति को निर्णय लेना अनिवार्य है।

नियमों की अनदेखी पर भारी जुर्माना

अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले निजी स्कूलों पर कड़े जुर्माने का प्रावधान है:

  • प्रथम अपराध: अधिकतम 1,00,000 रुपये तक का जुर्माना।
  • आगामी प्रत्येक अपराध: अधिकतम 2,00,000 रुपये तक का जुर्माना।
  • बार-बार नियमों का उल्लंघन करने पर स्कूल की मान्यता या अनुमोदन रद्द करने की अनुशंसा भी की जा सकती है।

पारदर्शिता है अनिवार्य

प्रत्येक निजी स्कूल को हर वर्ष अपने द्वारा निर्धारित प्रवेश शुल्क, पुनर्नामांकन शुल्क, विकास शुल्क और अन्य मदों की जानकारी स्कूल के नोटिस बोर्ड और अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करनी होगी, ताकि आम लोग पूरी जानकारी के साथ निर्णय ले सकें।

अभिभावकों के लिए सलाह: अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें। यदि आपका स्कूल इन नियमों का पालन नहीं कर रहा है, तो आप सबूतों के साथ अपने संबंधित प्रमंडल की ‘शुल्क विनियमन समिति’ में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। कानून का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के व्यवसायीकरण को नियंत्रित कर इसे सुलभ बनाना है।

अधिनियम की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

इस अधिनियम से जुड़ी तकनीकी बारीकियों, नियमों और आधिकारिक गजट की प्रति प्राप्त करने के लिए अभिभावक एवं स्कूल प्रबंधन बिहार सरकार के शिक्षा विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं। आप state.bihar.gov.in/educationbihar पर जाकर ‘Acts and Rules’ सेक्शन में इस कानून का पूरा विवरण देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त, इस अधिनियम की मूल प्रति बिहार गजट की आधिकारिक साइट egazette.bih.nic.in पर भी उपलब्ध है, जहाँ 25 फरवरी 2019 के असाधारण अंक (अंक संख्या: पटना 281) के माध्यम से इसे विस्तार से समझा जा सकता है। जागरूक नागरिक इन पोर्टल के माध्यम से सीधे सरकारी आदेशों की प्रति प्राप्त कर स्कूलों में अपनी बात मजबूती से रख सकते हैं।

अधिनियम की कॉपी यहाँ देखें: 👉 https://state.bihar.gov.in/educationbihar

बिहार निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019′ की आधिकारिक PDF प्रति आप नीचे दिए गए आधिकारिक सरकारी लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं:

अधिनियम  का इतिहास, एवं क्‍या कहते है इसके उपबन्‍ध ,

1. अधिनियम का संक्षिप्त इतिहास और उद्देश्य

यह अधिनियम बिहार सरकार द्वारा 25 फरवरी 2019 को गजट में प्रकाशित किया गया था।

  • पृष्ठभूमि: निजी स्कूलों द्वारा हर साल की जाने वाली बेतहाशा फीस वृद्धि और शिक्षण सामग्री (किताबें, ड्रेस) के नाम पर होने वाली ‘अघोषित कमीशनखोरी’ को रोकने के लिए जनहित में इस कानून की आवश्यकता महसूस की गई।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य राज्य के निजी स्कूलों में शुल्क संग्रहण (Fee Collection) को विनियमित करना और शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायिक शोषण को रोकना है।

बिहार सरकार का ‘निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019’ का पहला पृष्‍ठ  

2. अधिनियम के प्रमुख उपबंध (Provisions) और विस्तार

A. शुल्क का निर्धारण और सीमा (धारा 4)

अधिनियम स्कूलों को शुल्क बढ़ाने की शक्ति तो देता है, लेकिन उसे एक दायरे में बांधता है:

  • 7% की सीमा: कोई भी स्कूल पिछले साल की तुलना में अधिकतम 7% तक ही फीस बढ़ा सकता है।
  • औचित्य दर्शाना: यदि स्कूल 7% से अधिक वृद्धि करना चाहता है, तो उसे ‘शुल्क विनियमन समिति’ के पास कम से कम 6 महीने पहले प्रस्ताव भेजना होगा और यह साबित करना होगा कि इतनी वृद्धि क्यों जरूरी है।
  • सार्वजनिक सूचना: स्कूल को सभी प्रकार के शुल्कों (जैसे- ट्यूशन फीस, विकास शुल्क, परिवहन शुल्क आदि) का विवरण अपने नोटिस बोर्ड और वेबसाइट पर डालना अनिवार्य है।
बिहार सरकार का ‘निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019’ का दूसरा पृष्‍ठ  

B. ‘शुल्क विनियमन समितिका गठन (धारा 3)

हर प्रमंडल (Division) स्तर पर एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई गई है, जिसकी संरचना इस प्रकार है:

  1. अध्यक्ष: प्रमंडलीय आयुक्त (Divisional Commissioner)।
  2. सदस्य-सचिव: क्षेत्रीय शिक्षा उप निदेशक (RDD)।
  3. सदस्य: जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO)।
  4. अन्य सदस्य: प्रमंडलीय आयुक्त द्वारा नामित दो निजी स्कूलों के प्रतिनिधि और दो अभिभावक प्रतिनिधि।

C. व्यापारिक एकाधिकार पर रोक (धारा 4.6)

यह उपबंध अभिभावकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। स्कूल प्रबंधन:

  • किसी भी अभिभावक को निर्धारित दुकान या स्थान से किताबें, जूते या ड्रेस खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
  • स्कूलों को अपनी वेबसाइट पर इन सामग्रियों की सूची सार्वजनिक करनी होगी ताकि अभिभावक खुले बाजार से खरीदारी कर सकें।
बिहार सरकार का ‘निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019’ का तीसरा पृष्‍ठ  

3. नियमन और शक्तियाँ (Regulation & Powers)

अधिनियम समिति को सिविल न्यायालय (Civil Court) की शक्तियाँ प्रदान करता है, जिसके तहत वह:

  • किसी भी व्यक्ति को सम्मन (Summon) भेजकर बुला सकती है।
  • स्कूल के दस्तावेजों और लेखा-जोखा (Accounts) की जांच कर सकती है।
  • शपथ पत्र (Affidavit) पर साक्ष्य ले सकती है।
  • आवश्यकता पड़ने पर स्थल निरीक्षण (Physical Verification) कर सकती है।

4. शास्तियाँ (Penalties) और दंड का प्रावधान

यदि कोई विद्यालय नियमों का उल्लंघन करता है, तो धारा 7 के तहत निम्नलिखित दंड दिए जाएंगे:

  1. आर्थिक दंड: पहली बार में 1 लाख रुपये और दूसरी बार में 2 लाख रुपये तक का जुर्माना।
  2. मान्यता रद्द करना: यदि स्कूल बार-बार नियमों को तोड़ता है या जुर्माना नहीं भरता, तो प्रमंडलीय आयुक्त सरकार से उस स्कूल की मान्यता (Recognition) रद्द करने की सिफारिश कर सकते हैं।
  3. धन की वसूली: जुर्माने की राशि सरकारी खाते में जमा की जाएगी।

बिहार सरकार का ‘निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019’ का चौथा पृष्‍ठ  

5. अपील की प्रक्रिया

यदि कोई स्कूल या अभिभावक प्रमंडलीय समिति के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो वे राज्य अपीलीय प्राधिकार (State Appellate Authority) के समक्ष अपील दायर कर सकते हैं।

इस अधिनियम की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह अल्पसंख्यक स्कूलों (Minority Institutions) पर भी लागू होता है, बशर्ते वे सरकारी सहायता प्राप्त न हों। हालांकि, यह उन स्कूलों पर लागू नहीं होता जो केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा सीधे संचालित या अनुरक्षित हैं (जैसे- केंद्रीय विद्यालय)।

 यह अधिनियम ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’ (RTE) के पूरक के रूप में कार्य करता है। यदि किसी स्कूल ने पिछले साल की तुलना में बिना समिति की अनुमति के 10-15% फीस बढ़ाई है, तो वह सीधे तौर पर इस कानून का उल्लंघन है और दंड का भागी है।

RTE 2009 और बिहार शुल्क विनियमन अधिनियम: एक-दूसरे के पूरक और सुरक्षा कवच

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2005 और 2009 ने भारत में शिक्षा को ‘मौलिक अधिकार’ बनाया, जिसका प्राथमिक लक्ष्य 6 से 14 वर्ष के बच्चों को ‘नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा’ प्रदान करना था। जहाँ RTE अधिनियम का मुख्य केंद्र पहुंच‘ (Access) और नामांकन‘ (Enrollment) रहा, वहीं ‘बिहार निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019’ इस अधिकार को व्यावहारिक धरातल पर वहनीय‘ (Affordable) बनाने की दिशा में एक अनिवार्य पूरक (Complementary) के रूप में कार्य करता है। इन दोनों कानूनों का मेल निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली में एक संतुलित नियामक ढांचा खड़ा करता है।

1. शोषण मुक्त शिक्षा की संकल्पना: RTE अधिनियम की धारा 13 किसी भी प्रकार के ‘कैपिटेशन शुल्क’ (Capitation Fee) लेने पर रोक लगाती है। बिहार का 2019 का अधिनियम इसी उद्देश्य को विस्तार देते हुए ट्यूशन फीस और अन्य वार्षिक शुल्कों के निर्धारण को पारदर्शी बनाता है। यदि RTE कहता है कि शिक्षा बच्चों का हक है, तो बिहार का यह शुल्क विनियमन अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि यह ‘हक’ निजी स्कूलों की व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं के कारण आम अभिभावकों की पहुंच से बाहर न हो जाए। यह अधिनियम वार्षिक 7% की वृद्धि सीमा निर्धारित कर उस वित्तीय बोझ को नियंत्रित करता है, जो अक्सर बच्चों को स्कूल छोड़ने (Dropout) पर मजबूर कर देता है।

2. अनिवार्य संसाधनों की सुलभता: RTE अधिनियम के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए मानक तय किए गए हैं। अक्सर निजी स्कूल इन मानकों की आड़ में ‘अतिरिक्त गतिविधियों’ या ‘विशिष्ट शिक्षण सामग्री’ के नाम पर मोटी रकम वसूलते हैं। बिहार का अधिनियम यहाँ एक सुरक्षा दीवार की तरह खड़ा होता है। यह स्पष्ट करता है कि किताबें, ड्रेस और अन्य सहायक सामग्री किसी खास दुकान से खरीदने की बाध्यता नहीं होगी। यह सीधे तौर पर RTE की उस भावना को बल देता है जहाँ शिक्षा प्राप्त करने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का कृत्रिम अवरोध (Artificial Barrier) नहीं होना चाहिए। जब अभिभावक खुले बाजार से सामग्री खरीदने के लिए स्वतंत्र होते हैं, तो शिक्षा पर होने वाला कुल खर्च कम होता है, जो अंततः RTE के व्यापक लक्ष्यों में सहायक है।

3. जवाबदेही और न्यायिक ढांचा: RTE के तहत स्कूलों की मॉनिटरिंग के लिए बाल अधिकार संरक्षण आयोग जैसे तंत्र हैं। बिहार शुल्क विनियमन अधिनियम ने ‘प्रमंडलीय शुल्क विनियमन समिति’ बनाकर इस जवाबदेही को स्थानीय और आर्थिक स्तर पर भी मजबूत किया है। यह समिति सिविल कोर्ट की शक्तियों से लैस है, जो स्कूलों को अपने खातों (Audit) को सार्वजनिक करने और ऑडिट कराने के लिए बाध्य करती है। यह पारदर्शिता स्कूलों को ‘लाभ कमाने वाली संस्था’ के बजाय ‘परोपकारी शैक्षणिक ट्रस्ट’ के रूप में कार्य करने को मजबूर करती है, जैसा कि भारतीय संविधान और RTE की मूल भावना में निहित है।

4. अल्पसंख्यक और निजी संस्थानों पर समान प्रभाव: RTE के कुछ प्रावधानों को लेकर अल्पसंख्यक संस्थानों को जो छूट प्राप्त है, बिहार का शुल्क विनियमन अधिनियम उन पर भी (यदि वे गैर-सहायता प्राप्त हैं) शुल्क के मामले में लागू होता है। इससे शिक्षा के अधिकार का एक समान आर्थिक ढांचा तैयार होता है।

 यदि RTE 2009 शिक्षा की नींव है, तो बिहार निजी विद्यालय शुल्क विनियमन अधिनियम 2019 उस पर बनी वह छत है जो अभिभावकों को अनियंत्रित आर्थिक बोझ से बचाती है। ये दोनों कानून मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि शिक्षा मात्र एक सेवा न रहकर एक सुरक्षित अधिकार बनी रहे। बिना आर्थिक विनियमन के, शिक्षा का अधिकार केवल कागजी रह जाता, जिसे बिहार के इस अधिनियम ने धरातल पर मजबूती प्रदान की है।

लुटेरे स्कूलों पर आयुक्त का ‘हंटर’: अब पाई-पाई का देना होगा हिसाब, मनमानी फीस वसूली तो खैर नहीं!

विशेष रिपोर्ट: मुजफ्फरपुर ब्यूरो

मुजफ्फरपुर। तिरहुत प्रमंडल के निजी स्कूलों में शिक्षा के नाम पर चल रहे ‘मुनाफाखोरी के धंधे’ और अभिभावकों की जेब पर पड़ने वाले डाके को रोकने के लिए प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह ने निर्णायक युद्ध का ऐलान कर दिया है। आयुक्त ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक पत्र जारी करते हुए प्रमंडल के सभी जिलाधिकारियों (DM) और जिला शिक्षा पदाधिकारियों (DEO) को स्पष्ट निर्देश दिया है कि अब स्कूलों की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रशासन के इस ‘एक्शन मोड’ में आने से शिक्षा माफियाओं में हड़कंप मच गया है।

तस्‍वीर में तिरहुत प्रमंडल प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह

15 अप्रैल की डेडलाइन‘: हर स्कूल की कुंडली खंगालेगा प्रशासन

आयुक्त ने इस लड़ाई को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसके लिए समय-सीमा (Deadline) भी तय कर दी है। उन्होंने सभी DEO को आदेश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में स्कूलों का औचक निरीक्षण करें और 15 अप्रैल तक विस्तृत प्रतिवेदन (Report) क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक के माध्यम से आयुक्त कार्यालय को सौंपें। इस रिपोर्ट में स्कूलों की फीस संरचना, पिछले साल हुई वृद्धि का प्रतिशत और प्राप्त शिकायतों पर की गई कार्रवाई का पूरा ब्यौरा होगा।

अधिनियम 2019 का ब्रह्मास्त्र‘: 7% से ज्यादा बढ़ाना कानूनन जुर्म

आयुक्त ने चेतावनी दी है कि बिहार निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019′ का पालन करना हर निजी स्कूल के लिए अनिवार्य है। अधिनियम के मुख्य प्रावधान अब स्कूलों के लिए गले की फांस बनेंगे:

  • 7% की लक्ष्मण रेखा: कोई भी विद्यालय एक शैक्षणिक सत्र में 7 प्रतिशत से अधिक फीस नहीं बढ़ा सकता। यदि इससे अधिक वृद्धि करनी है, तो सत्र शुरू होने से 3 माह पूर्व आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति से अनुमति लेनी होगी।
  • वेबसाइट पर पारदर्शिता: स्कूलों को अपनी आधिकारिक वेबसाइट और सूचना पट्ट (Notice Board) पर एडमिशन फीस, मासिक शुल्क, विकास शुल्क और अन्य सभी शुल्कों का विस्तृत विवरण (Breakdown) देना होगा।
  • गुप्त शुल्कों पर पाबंदी: ‘हिडन चार्जेस’ के नाम पर अभिभावकों को लूटने वाले स्कूलों पर सीधे ‘क्रिमिनल केस’ जैसी कार्रवाई की जा सकती है।

किताब-यूनिफॉर्म के कमीशन के खेलपर बड़ा प्रहार

अक्सर देखा जाता है कि स्कूल किसी खास दुकान से ही किताब, कॉपी और ड्रेस खरीदने का दबाव बनाते हैं, जहाँ भारी कमीशनखोरी होती है। आयुक्त ने इस पर पूर्ण विराम लगा दिया है:

  • अभिभावकों को आजादी: अब अभिभावक अपनी पसंद की किसी भी दुकान से शैक्षिक सामग्री खरीदने के लिए स्वतंत्र हैं।
  • बाध्य किया तो खैर नहीं: यदि किसी स्कूल ने किसी विशेष वेंडर का दबाव बनाया, तो उसकी शिकायत मिलने पर तुरंत कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।

विशेष कॉलम: सशक्त शिकायत निवारण तंत्र‘ (Grievance Redressal Mechanism)

अभिभावकों की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे अपनी शिकायत लेकर कहाँ जाएं। आयुक्त ने अब एक त्रि-स्तरीय मजबूत व्यवस्था को जमीन पर उतार दिया है:

1. जिला स्तरीय शिकायत निवारण सेल‘: प्रत्येक जिले में एक विशेष ‘सेल’ का गठन किया गया है। अभिभावक अपनी लिखित शिकायत सीधे जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) के कार्यालय में दे सकते हैं। आयुक्त ने इन सेल को ‘एक्टिव’ रहने और प्राप्त शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई का आदेश दिया है।

2. क्षेत्रीय शुल्क विनियमन समिति (Regional Committee): यह प्रमंडल स्तर की सबसे पावरफुल बॉडी है, जिसकी अध्यक्षता स्वयं प्रमंडलीय आयुक्त करते हैं। इसके पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां हैं।

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर में बढती फीस और किताब का दाम से परेशान अभिभावक और विद्यालय के काउन्‍टर से किताब खरीदने को बाध्‍य  
  • जांच का अधिकार: यह समिति किसी भी स्कूल के बैंक खातों, ऑडिट रिपोर्ट और बैलेंस शीट की जांच कर सकती है।
  • सुनवाई का अवसर: निर्णय लेने से पहले यह समिति स्कूल प्रबंधन और पीड़ित अभिभावक, दोनों का पक्ष सुनती है।

3. दंडात्मक कार्रवाई और वसूली (Penalties): यदि शिकायत सही पाई गई, तो यह तंत्र निम्नलिखित सजा दे सकता है:

  • फीस रिफंड: स्कूल को आदेश दिया जाएगा कि वह वसूली गई अतिरिक्त राशि तुरंत अभिभावकों को वापस (Refund) करे या अगले महीनों की फीस में एडजस्ट (Adjust) करे।
  • मान्यता रद्द करना: बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द करने के लिए संबंधित बोर्ड (CBSE/ICSE/Bihar Board) को अनुशंसा भेजी जाएगी।
  • भारी आर्थिक जुर्माना: पहली बार दोषी पाए जाने पर लाखों का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

शिक्षा सेवा है, व्यापार नहीं”: आयुक्त की दो टूक

प्रमंडलीय कार्यालय से जारी पत्र में साफ कहा गया है कि बिहार में निजी विद्यालय गैर-लाभकारी संस्थाओं‘ (Non-profit entities) के रूप में संचालित होते हैं। स्कूल से होने वाली आय का उपयोग मालिक की व्यक्तिगत विलासिता के लिए नहीं किया जा सकता। इस राशि को केवल स्कूल के विकास, शिक्षकों के प्रशिक्षण और छात्रों की सुविधाओं पर ही खर्च करना होगा।

अभिभावकों में जगी उम्मीद की किरण

आयुक्त के इस कड़े रुख से मुजफ्फरपुर सहित पूरे तिरहुत प्रमंडल के लाखों अभिभावकों में खुशी की लहर है। ‘अभिभावक संघ’ का कहना है कि यह पहली बार है जब प्रशासन ने इतनी बारीकी और सख्ती के साथ स्कूलों की ‘लूट-तंत्र’ पर प्रहार किया है। यदि 15 अप्रैल तक सही मायने में निरीक्षण हो जाता है, तो मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ काफी कम हो जाएगा।

प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह ने अपनी कलम से शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ जो ‘हंटर’ चलाया है, उसने भ्रष्ट स्कूल प्रबंधनों की चूलें हिला दी हैं। अब समय है कि जिला स्तर के अधिकारी भ्रष्टाचार मुक्त होकर इस आदेश को लागू करें ताकि शिक्षा की पवित्रता बनी रहे और अभिभावक राहत की सांस ले सकें।


बड़ी बातें:

  • 15 अप्रैल तक सभी DEO को देनी है रिपोर्ट।
  • मनमाने ढंग से बढ़ी फीस होगी वापस।
  • किसी भी दुकान से सामान खरीदने को स्वतंत्र होंगे अभिभावक।
  • वेबसाइट पर फीस सार्वजनिक न करने वाले स्कूलों पर होगी एफआईआर (FIR)

बलिदान दिवस के रूप में मनाई गई अमर शहीद मंगल पांडे की पुण्यतिथि, वक्ताओं ने दी विनम्र श्रद्धांजलि

सकरा (मुजफ्फरपुर): स्वाधीनता संग्राम की प्रथम चिंगारी सुलगाने वाले अमर शहीद मंगल पांडे की पुण्यतिथि आज सकरा हाई स्कूल के समीप स्थित शहीद यादगार समिति के बैनर तले सोहन लाल आजाद के आवास पर ‘बलिदान दिवस’ के रूप में संकल्पबद्ध होकर मनाई गई। कार्यक्रम में स्थानीय प्रबुद्ध जनों, शिक्षकों और युवाओं ने शहीद के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस अवसर पर वक्ताओं ने 1857 की क्रांति के नायक मंगल पांडे के त्याग और बलिदान को याद करते हुए उनके बताए रास्ते पर चलने का आह्वान किया।

स्वतंत्रता संग्राम के नायक को नमन

कार्यक्रम के संयोजक सोहन लाल आजाद ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि 8 अप्रैल, 1857 का वह दिन भारतीय इतिहास में एक अमिट अध्याय है, जब बैरकपुर (पश्चिम बंगाल) में मंगल पांडे ने मातृभूमि की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। उन्होंने कहा कि उनके बलिदान ने ही पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता की अलख जगाई थी।

वक्ताओं के विचार: राष्ट्र के प्रति समर्पण का आह्वान

विशिष्ट वक्ता राजेश कुमार का संबोधन: “अमर शहीद मंगल पांडे का बलिदान केवल एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना थी। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अदम्य साहस दिखाते हुए अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध जो बिगुल फूंका, वह आज भी करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के समय में देश को उन मूल्यों की अत्यंत आवश्यकता है जिनके लिए मंगल पांडे ने अपना सर्वस्व त्याग दिया। उनकी वीरता हमें सिखाती है कि अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाना ही सच्चा धर्म है। हम सबको मिलकर राष्ट्र की सेवा में अपना योगदान देने का संकल्प लेना चाहिए।”

पूर्व शिक्षक मदन बैठा ने संबोधित करते हुय कहा कि  “एक शिक्षक के तौर पर मेरा मानना है कि आज की युवा पीढ़ी को मंगल पांडे जैसे महापुरुषों की जीवनी से शिक्षा लेनी चाहिए। उन्होंने अपना जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया और फाँसी के फंदे को सहर्ष स्वीकार किया। मदन बैठा ने कहा कि शिक्षा का सही अर्थ केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि देश के गौरवशाली इतिहास को जानना और उसे आत्मसात करना है। हमें अपने बच्चों को यह बताना चाहिए कि आज हम जो खुली हवा में सांस ले रहे हैं, वह मंगल पांडे जैसे अनेकों शहीदों के लहू की देन है। उनका जीवन राष्ट्रभक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण है।”

समारोह में इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति

इस कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। कार्यक्रम में धर्मवीर कुमार, धर्मेंद्र कुमार, आयुषी भारती, सोनम कुमारी, भावना भारती, और लक्ष्मण कुमार सहित अन्य स्थानीय गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में ‘भारत माता की जय’ और ‘अमर शहीद मंगल पांडे अमर रहें’ के नारों के साथ वातावरण को देशभक्ति के रंग में रंग दिया।

अक्षय तृतीया पर बाल विवाह के विरुद्ध  हुंकार, स्कूली बच्चों ने लिया कुरीति मिटाने का संकल्प

08 अप्रैल, 2026 |समस्तीपुर |  :अक्षय तृतीया के अवसर पर होने वाले बाल विवाह की रोकथाम के लिए बुधवार को जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के नेतृत्व में एक व्यापक जन जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। बिशनपुर बांदे स्थित उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम को महिला एवं बाल विकास निगम तथा जिला प्रशासन, समस्तीपुर के साझा सहयोग से सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।

सखी वार्ताके माध्यम से अधिकारों की जानकारी

कार्यक्रम के दौरान महिला एवं बाल विकास निगम के डी.एम.सी. गौरव कुमार, जी.एस. राजेश कुमार एवं डॉली कुमारी ने छात्र-छात्राओं के बीच सखी वार्ता” का आयोजन किया। इस विशेष सत्र में बालिकाओं को उनके कानूनी अधिकारों, व्यक्तिगत सुरक्षा और सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की विस्तार से जानकारी दी गई। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि अक्षय तृतीया जैसे अबूझ सावे पर अक्सर बाल विवाह के मामले बढ़ जाते हैं, जिसे रोकने के लिए समाज का सतर्क होना अनिवार्य है।

विशेषज्ञों ने दी कानूनी जानकारी

जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र की टीम ने बच्चों को उनके संवैधानिक अधिकारों से रूबरू कराया।

  • दीप्ती कुमारी (जिला कार्यक्रम समन्वयक) और विभा कुमारी (सामुदायिक सामाजिक कार्यकर्ता) ने बाल विवाह के शारीरिक व मानसिक दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला।
  • रवि कुमार मिश्रा (प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर) एवं पप्पु यादव (अकाउंट ऑफिसर) ने पॉक्‍सो  एक्‍ट , बाल श्रम और बाल अधिकार जैसे गंभीर विषयों पर छात्रों को जागरूक किया ताकि वे किसी भी शोषण के खिलाफ आवाज उठा सकें।

“शिक्षा ही वह अस्त्र है जिससे बाल विवाह जैसी कुरीतियों को जड़ से मिटाया जा सकता है।” — पंकज कुमार, प्रधानाध्यापक

समाज में बदलाव की मुहिम

विद्यालय के शिक्षक सत्या प्रकाश ने भी बच्चों को शिक्षा के महत्व के प्रति प्रेरित किया। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने एक सुर में बाल विवाह मुक्त समाज बनाने का संकल्प लिया। जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के इस प्रयास को स्थानीय ग्रामीणों और जिला प्रशासन ने समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है।

बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत: अब समय पर सेवा नहीं मिली तो अधिकारियों पर लगेगा भारी जुर्माना

पटना। बिहार सरकार ने राज्य की बिजली व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में अब बिजली सेवाओं में देरी होने पर संबंधित अधिकारियों पर जुर्माने का प्रावधान लागू कर दिया गया है। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य उपभोक्ताओं को समय पर सुविधाएं मुहैया कराना और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली को और अधिक चुस्त-दुरुस्त बनाना है।

तय समय में कनेक्शन देना अब अनिवार्य

नए नियमों के तहत अब बिजली कनेक्शन के लिए समय-सीमा निर्धारित कर दी गई है। यदि इस अवधि के भीतर कनेक्शन नहीं दिया जाता है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। समय-सीमा का विवरण इस प्रकार है:

  • महानगर/मुख्य शहर: 3 दिन के भीतर।
  • अन्य शहरी क्षेत्र: 7 दिन के भीतर।
  • ग्रामीण क्षेत्र: अधिकतम 15 दिन के भीतर।

देरी होने पर ₹1000 तक का प्रतिदिन जुर्माना

उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करते हुए सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर सेवा प्रदान नहीं की जाती है, तो दोषी अधिकारियों पर ₹1000 तक का रोजाना जुर्माना लगाया जा सकता है। यह कदम न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएगा बल्कि विभाग में ‘काम टालने’ की प्रवृत्ति को भी खत्म करेगा।

जवाबदेही से बढ़ेगी पारदर्शिता

इस पहल से बिहार का बिजली क्षेत्र अब ‘जवाबदेही के साथ सुधार’ की ओर अग्रसर है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से:

  1. उपभोक्ताओं को अनावश्यक दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
  2. सेवाओं में तेजी आएगी और काम समय पर पूरा होगा।
  3. व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी, जिससे आम जनता का भरोसा विभाग पर मजबूत होगा।