बिना फायर एनओसी और पास नक्शे के चल रहे प्राइवेट स्कूल-कोचिंग सेंटरों पर गिरेगी गाज, प्रशासन हुआ सख्त, 3 दिनों में मांगी गई जांच रिपोर्ट!

प्राइवेट स्कूलों की चालाकी पर कसा शिकंजा, इन 16 कड़े बिंदुओं पर देना होगा जवाब! बच्चों की जान जोखिम में, सेक्शनों के फेरबदल से लेकर सुरक्षा तक में अब नहीं चलेगा फर्जीवाड़ा!

 विशेष संवाददाता, मुजफ्फरपुर।  मुजफ्फरपुर के एक निजी अस्पताल में 04/06/2026 को लगी भीषण आग में कई मरीजों की दर्दनाक मौत के बाद प्रमंडलीय प्रशासन पूरी तरह से एक्शन मोड में आ गया है। इस भयावह हादसे से सबक लेते हुए आयुक्त, तिरहुत प्रमंडल गिरिवर दयाल सिंह ने एक अत्यंत कड़ा और गोपनीय पत्र (ज्ञापांक-गो0-01/2026-296, दिनांक 09/06/2026) जारी कर शिक्षा विभाग को हिलाकर रख दिया है। आयुक्त ने साफ शब्दों में कहा है कि अस्पताल जैसी घटना की पुनरावृत्ति किसी भी सूरत में स्कूलों या कोचिंग संस्थानों में नहीं होनी चाहिए।

इस प्रमंडलीय हंटर के तुरंत बाद मुजफ्फरपुर के जिला शिक्षा पदाधिकारी कुमार अरविन्द सिन्हा ने कड़ा रुख अपनाते हुए पत्र संख्या एमजीटी/1339 (दिनांक 12/06/2026) जारी कर दिया है। उन्होंने जिले के सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में संचालित सभी निजी स्कूलों और कोचिंग सेंटरों की भौतिक जांच करने का अल्टीमेटम दिया है। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि मात्र तीन दिनों के भीतर 16 कड़े बिंदुओं पर जांच रिपोर्ट सौंपनी होगी, ऐसा न करने वाले संस्थानों पर सीधे तालाबंदी की जाएगी। इस आदेश के बाद पूरे जिले के निजी स्कूल और कोचिंग माफियाओं में हड़कंप मच गया है।

संचालकों को सहयोग करने का सख्त निर्देश, लापरवाही पर होगी सीधी कार्रवाई जिला शिक्षा पदाधिकारी ने मुजफ्फरपुर के सभी निजी विद्यालय और कोचिंग संचालकों तथा प्राचार्यों को सख्त निर्देश दिया है कि वे जांच अधिकारी को आवश्यक अभिलेख (दस्तावेज) उपलब्ध कराएं और परिसर भ्रमण एवं अवलोकन में पूरा सहयोग दें। यदि कोई संचालक इसमें बाधा डालता है या दस्तावेज छुपाता है, तो इसे गंभीर अपराध माना जाएगा।

प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे संलग्न विहित प्रपत्र में जांच कर, पत्र प्राप्ति के तीन दिनों के अंदर अपनी जांच रिपोर्ट जिला कार्यालय को उपलब्ध कराना सुनिश्चित करेंगे। इस आदेश के बाद मुजफ्फरपुर के शिक्षा जगत में खलबली मची हुई है, क्योंकि कई नामी-गिरामी संस्थान भी बिना उचित सुरक्षा मानकों और बिना पास नक्शे के धड़ल्ले से चल रहे हैं।

इन 16 कड़े बिंदुओं पर तीन दिनों में देना होगा जवाब:

प्रशासन द्वारा जारी किए गए विशेष जांच प्रपत्र में कुल 16 अत्यंत संवेदनशील बिंदुओं को शामिल किया गया है, जिस पर भौतिक सत्यापन होना अनिवार्य है:

  1. मान्यता और निबंधन: क्या संस्थान को सक्षम बोर्ड या प्राधिकार से मान्यता प्राप्त है और उसका निबंधन संख्या साक्ष्य के साथ उपलब्ध है या नहीं?
  2. भवन का स्वीकृत नक्शा: क्या भवन का निर्माण सक्षम प्राधिकार द्वारा स्वीकृत नक्शे और प्राक्कलन के अनुरूप ही किया गया है?
  3. प्रवेश एवं निकास: विद्यालय या कोचिंग में प्रवेश और निकास की समुचित व्यवस्था की स्थिति।
  4. अग्नि सुरक्षा (फायर सेफ्टी): क्या संस्थान में अग्निशामक मानक के अनुरूप व्यवस्था है और सक्षम प्राधिकार से फायर एनओसी (प्रमाण पत्र) प्राप्त है?
  5. बच्चों की कुल संख्या: संस्थान की विगत वर्ष की वर्गवार नामांकित बच्चों की कुल संख्या (सेक्शनों के फेरबदल की सघन जांच)।
  6. इलेक्ट्रिक वायरिंग: संस्थान की विद्युत वायरिंग की भौतिक स्थिति (खुले और खतरनाक तारों की जांच)।
  7. शौचालय सुरक्षा: शौचालयों की सुरक्षात्मक अद्यतन भौतिक स्थिति।
  8. शौचालय में लाइट-पानी: शौचालयों में लाइट एवं पानी की समुचित व्यवस्था।
  9. शुद्ध पेयजल: बच्चों के लिए पीने योग्य पानी अथवा आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) की उपलब्धता की स्थिति।
  10. आपातकालीन निकास (इमरजेंसी एग्जिट): आपातकालीन स्थिति में बच्चों के निकास हेतु मुख्य द्वार के अलावा अन्य वैकल्पिक द्वार की संख्या और स्थिति।
  11. बचाव की जानकारी: आपात काल की स्थिति में बच्चों के बचाव हेतु निकास द्वार की जानकारी की स्थिति।
  12. वाहन सुरक्षा और जीपीएस: संस्थान के पंजीकृत वाहनों की संख्या, फिटनेस प्रमाण पत्र, स्पीड गवर्नर, जीपीएस की सुविधा, ड्राइवरों का पुलिस वेरिफिकेशन और वाहन पर ड्राइवर का मोबाइल नंबर लिखा है या नहीं?
  13. वाहनों में फायर सेफ्टी: पंजीकृत वाहनों में अग्निशामक यंत्रों की संख्या एवं उनकी भौतिक स्थिति क्या है?
  14. प्रतिकूल स्थितियां: विद्यालय के अवलोकन में किसी प्रकार की वैसी स्थिति जो बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा या प्रतिकूल हो।
  15. इमरजेंसी नंबरों का प्रदर्शन: क्या परिसर में बड़े-बड़े अक्षरों में फायर ब्रिगेड, पुलिस स्टेशन और सिविल सर्जन के इमरजेंसी नंबर लिखे गए हैं?
  16. जाँच पदाधिकारी का मन्तव्य: जांच करने वाले अधिकारी की अंतिम ठोस टिप्पणी।

जांच टीम के आते ही गाड़ियाँ हो जाती है गायब, खेल के मैदान पर अवैध कब्जा

प्राइवेट स्कूलों की एक ऐसी चालाकी सामने आई है जो बच्चों के शारीरिक विकास और आपातकालीन सुरक्षा के साथ सीधे तौर पर खिलवाड़ करते  है। अक्सर देखा जा रहा है कि जब भी शिक्षा विभाग या जिला प्रशासन की टीम स्कूल का वेरिफिकेशन करने पहुँचती है, तो स्कूल संचालक बेहद शातिर दिमाग का परिचय देते हैं। वे अपनी बसों, वैनों और ऑटो को आनन-फानन में स्कूल कैंपस से बाहर सड़कों या सुदूर गलियों में खड़ा करवा देते हैं। यह नाटक सिर्फ इसलिए रचा जाता है ताकि जांच अधिकारियों को स्कूल कैंपस ‘बड़ा’ और ‘सुरक्षित’ दिखाई दे।

हकीकत यह है कि इन गाड़ियों को कैंपस के अंदर पार्क करने के बाद बच्चों के खेलने के लिए बने मैदान का वजूद ही खत्म हो जाता है। बच्चों का पूरा प्ले ग्राउंड कबाड़खाने और बस डिपो में तब्दील हो जाता है। यदि स्कूल अवधि के दौरान कोई भूकंप या आग जैसी आपातकालीन स्थिति पैदा हो जाए, तो कैंपस में खड़ी इन गाड़ियों के कारण बच्चों को भागने तक की जगह नहीं मिलेगी। प्रशासन इस बार इस ‘गाड़ी हटाओ खेल’ पर भी नजर रख रहा है।

कागजों पर एक क्लास, जमीन पर चार सेक्शन: संख्या छिपाने का बड़ा खेल

मुजफ्फरपुर के इन निजी संस्थानों में कमाई को दोगुना करने और सरकारी टैक्स व नियमों से बचने के लिए ‘सेक्शन’ का एक बड़ा फर्जीवाड़ा चल रहा है। संस्थान की विगत वर्ष की वर्गवार नामांकित बच्चों की कुल संख्या के मामले में यह कड़वा सच उजागर हुआ है कि स्कूल संचालक धड़ल्ले से एक ही क्लास के कई सेक्शन (जैसे- सेक्शन ए, बी, सी और डी) चलाते हैं। एक-एक सेक्शन में क्षमता से अधिक बच्चों को ठूंस-ठूंस कर बिठाया जाता है।

परंतु, जब सरकारी रिपोर्ट या जांच की बारी आती है, तो ये संचालक रिकॉर्ड बुक में सिर्फ एक ही वर्ग और सीमित बच्चों की संख्या दिखाते हैं। इस तरह बच्चों की असली संख्या को सरकारी कागजों में दबा दिया जाता है। इस भीड़भाड़ के कारण कमरों में वेंटिलेशन खत्म हो जाता है, जिससे बच्चों का दम घुटता है। कमिश्नर और जिला शिक्षा पदाधिकारी के इस साझा आदेश ने अब इस  घोटाले की जड़ पर प्रहार किया है।

सड़कों पर दौड़ता ‘बारूद’: ड्राइवरों की मनमानी और बिना सीट बेल्ट का सफर

इस पूरे मामले का सबसे डरावना और जानलेवा पहलू स्कूली वाहनों की लापरवाही है। मुजफ्फरपुर की सड़कों पर रोज हजारों बच्चों की जिंदगी को दांव पर लगाकर दौड़ने वाली इन गाड़ियों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। सबसे पहली बड़ी लापरवाही यह देखी गई है कि इन गाड़ियों के ड्राइवर कभी भी ‘सीट बेल्ट’ नहीं लगाते हैं। ट्रैफिक नियमों को ठेंगा दिखाने वाले ये ड्राइवर बच्चों को लेकर तेज रफ्तार में गाड़ियाँ दौड़ाते हैं, जिससे किसी भी अचानक ब्रेक या दुर्घटना की स्थिति में बड़ा जानी नुकसान हो सकता है।

इसके अलावा, गाड़ियों के भीतर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ी हुई हैं। संस्थान के भीतर भले ही दिखावे के लिए कुछ अग्निशामक (फायर सेफ्टी) सिलेंडर टांग दिए गए हों, लेकिन बच्चों को ढोने वाली इन बसों और वैनों के भीतर अग्निशामक की कोई व्यवस्था नहीं रहती। यदि गाड़ी के इंजन में शॉर्ट सर्किट से आग लग जाए, तो बच्चों को बचाने का कोई साधन मौजूद नहीं है।

बदलेगी सूरत या फिर ठंडे बस्ते में जाएगी फाइल?

अस्पताल हादसे के बाद जागा प्रशासन इस बार पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा है। जिला शिक्षा पदाधिकारी ने मुजफ्फरपुर के सभी निजी विद्यालय और कोचिंग संचालकों तथा प्राचार्यों को सख्त हिदायत दी है कि वे जांच अधिकारी के निरीक्षण के दौरान आवश्यक अभिलेख (दस्तावेज) उपलब्ध कराएं और परिसर भ्रमण में पूरा सहयोग दें। यदि जांच में किसी भी प्रकार की प्रतिकूल स्थिति पाई जाती है जो बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा हो, तो उस संस्थान के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

मुजफ्फरपुर के अभिभावकों का कहना है कि अब समय आ गया है कि शिक्षा के नाम पर व्यापार करने वाले और बच्चों की जान को जोखिम में डालने वाले इन रसूखदार स्कूल संचालकों की दादागिरी खत्म की जाए। देखना यह है कि तीन दिनों के भीतर प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी कितनी ईमानदारी से अपनी रिपोर्ट सौंपते हैं या फिर हमेशा की तरह कागजी कोरम पूरा कर इस गंभीर मामले को भी रफा-दफा कर दिया जाता है। मुजफ्फरपुर की जनता की नजरें अब इस जांच रिपोर्ट और उसके बाद होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं।

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