लालू की राह पर चले ‘सुशासन बाबू’, पुत्र-मोह में तोड़ा 20 साल का ‘नैतिकता’ का ढोंग!
एस. एस.कुमार ‘पंकज’ । बिहार की सियासत में आज वह ‘ऐतिहासिक’ विरोधाभास देखने को मिला, जिसकी कल्पना कभी सुशासन के पैरोकारों ने नहीं की थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्होंने दशकों तक लालू परिवार को ‘परिवारवाद’ के नाम पर घेरा, आज उन्होंने खुद अपने पुत्र निशांत कुमार को कैबिनेट मंत्री की शपथ दिलाकर बिहार की सत्ता का ‘वारिस’ घोषित कर दिया है। इसे लोकतंत्र कहें या राजतंत्र का नया संस्करण, लेकिन पटना की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक सिर्फ एक ही सवाल गूँज रहा है— “क्या बिहार अब चंद राजनीतिक परिवारों की जागीर बन गया है?”

विपक्ष का ‘विस्फोटक‘ हमला: “कुर्सी कुमार का असली चेहरा आया सामने”
निशांत कुमार की इस ‘शॉर्टकट’ एंट्री ने विपक्ष को सत्ता पक्ष की धज्जियां उड़ाने का सुनहरा मौका दे दिया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने अपने आधिकारिक बयान में तीखा तंज कसते हुए कहा:
“परिवारवाद पर आजीवन लेक्चर देने वाले कुर्सी कुमार के ‘सामाजिक जीवन में संघर्ष का लंबा इतिहास रखने वाले सुयोग्य सुपुत्र‘ को मंत्री पद की शुभकामनाएँ!
“कामचोर और नाकारी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के लिए पूरे पटना शहर को बंद कर दिया गया है। जो 5 साल देश के सबसे गरीब राज्य की जनता को चूसकर अपना घर भरेंगे, वो सभी नाकारे भ्रष्ट ‘महाराज‘ शपथ ले रहे हैं और बेचारी ‘प्रजा‘, जिसे बताया जाता है कि यह लोकतंत्र है, वह सड़कों पर धीरे-धीरे रेंग रही है। महाराज के अहंकार को झेल रही जनता अब 5 साल की सुनिश्चित अनदेखी के लिए खुद को तैयार कर रही है।”
रोहिणी आचार्या का वार: “चाचा ने तोड़ा नैतिकता का रिकॉर्ड”
लालू यादव की पुत्री रोहिणी आचार्या ने ट्विटर (X) पर मोर्चा खोलते हुए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों को घेरा। उन्होंने लिखा:
“मणिपुर और बंगाल को जलता छोड़ ‘नीरो‘ पटना आए और रोड-शो का तमाशा खड़ा कर बिहार को निराश कर चले गए। प्रधानमंत्री जी बेवजह रोड-शो के जलसे में शामिल हुए और फोटो-शूट करवाकर चले गए। पूरा बिहार हैरान है कि जो शपथ ग्रहण राजभवन में होना चाहिए था, उसके लिए गाँधी मैदान में सरकारी पैसा क्यों बर्बाद किया गया? बिहार की बेटी होने के नाते मुझे उम्मीद थी कि पीएम पटना गर्ल्स हॉस्टल में हुई दरिंदगी पर कुछ बोलेंगे, लेकिन वे खामोश रहे। बिना चुनाव लड़े चोर दरवाजे से मंत्रिमंडल में एंट्री पाने वाले भाई निशांत को बधाई और उन्हें एंट्री दिलाने वाले असलियत में अनैतिकता के शिखर पुरुष ‘रंगबदलू चाचा‘ को भी ढेरों बधाई। 2005 से पहले ई सब भी नहीं होता था चाचा जी!”
प्रशांत किशोर की चेतावनी: “चेहरा देखकर वोट देने का अंजाम”
जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने इस नियुक्ति को बिहार के युवाओं के भविष्य पर सीधी चोट बताया। उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए कहा:
“बिहार के हर परिवार को सोचना चाहिए—नेता का लड़का नेता बनेगा और बिहार के सामान्य परिवार के पढ़े-लिखे बच्चे मजदूरी करेंगे। नेता चाहे समाजवादी हों, भाजपाई हों या कांग्रेसी, सबने अपने बच्चों के लिए राजसिंहासन तैयार कर रखा है। नेता और नेता का बच्चा कभी बेरोजगार नहीं होगा, आपके बच्चों को मजदूरी करने जाना पड़ेगा। नीतीश कुमार जो जीवन भर दावा करते रहे कि हमने परिवार के लिए कुछ नहीं किया, आज उनका लड़का सीधे राजनीति में आ रहा है। आप अपने बच्चों की चिंता कीजिए, वरना वे पढ़-लिखकर भी बेरोजगार ही रहेंगे।”
मंत्री निशांत कुमार की सफाई: “यह जनता का आदेश है”
शपथ ग्रहण के बाद भारी सुरक्षा घेरे के बीच नए नवेले मंत्री निशांत कुमार ने मीडिया के कैमरों के सामने अपनी सफाई पेश की। उन्होंने कहा:
“सब जनता का प्रेम और विश्वास है। उन्होंने ही मुझे राजनीति में लाया है, मेरे कार्यकर्ताओं ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया है। तो जो भी विश्वास जनता और कार्यकर्ताओं ने मुझ पर जताया है, उस उत्तरदायित्व को मैं पूरी सच्चाई और ईमानदारी से निभाने की कोशिश करूँगा।”
‘जनता के आदेश’ : विरोधाभास या हकीकत “निशांत कुमार का यह दावा कि उन्हें ‘जनता के आदेश’ ने राजनीति में लाया है, अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास पैदा करता है। हकीकत यह है कि चुनाव और जनादेश नीतीश कुमार के चेहरे पर मिला था, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठते ही उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी और बिना किसी चुनावी प्रक्रिया के अपने पुत्र को सीधे कैबिनेट में ‘लैंड’ करा दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस व्यक्ति ने आज तक पंचायत का चुनाव भी नहीं लड़ा, उसके पास जनता का आदेश कैसे पहुँच गया? क्या ‘जनता का आदेश’ अब सिर्फ महलों के बंद कमरों में तय होता है? राजनीतिक जानकार इसे ‘लोकतंत्र का मखौल’ बता रहे हैं, क्योंकि जनादेश का असली अर्थ जनता द्वारा चुना जाना होता है, न कि पिता द्वारा पुत्र को सत्ता की विरासत सौंपना। नीतीश कुमार का यह कदम साबित करता है कि बिहार में अब ‘जनादेश’ का मतलब केवल एक परिवार की सत्ता को सुरक्षित करना रह गया है।”
राजनीतिक विश्लेषण: नीति बदली या नीयत?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता की मलाई ने उपेन्द्र कुशवाहा और नीतीश कुमार जैसे नेताओं की नैतिकता पर पट्टी बांध दी है। जो नीतीश कुमार कभी लालू परिवार के ‘राजकुमारों’ पर तंज कसते नहीं थकते थे, आज वे खुद उसी घेरे में खड़े हैं। यह घटनाक्रम केवल एक मंत्री की नियुक्ति नहीं, बल्कि बिहार के उस युवा के गाल पर तमाचा है जो सालों-साल परीक्षाओं की तैयारी में सड़कों पर रेंगता है, जबकि ‘साहब’ का बेटा बिना एक भी चुनाव लड़े सीधे ‘राजगद्दी’ पर बैठ जाता है।
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