रिपोर्ट : एस. एस. कुमार ‘पंकज’

मुजफ्फरपुर (सकरा): सकरा थाना क्षेत्र के जहांगीपुर चौक से गंडक प्रोजेक्ट ऑफिस तक की मुख्य सड़क (पूसा मुजफ्फपुर मार्ग ) इन दिनों एक ऐसी ‘अवैध मंडी’ में तब्दील हो गई है, जिसे देखकर कोई भी कह दे कि यहां कानून का राज नहीं, माफियाओं का बोलबाला है। सुबह के पांच बजते ही यहां ट्रकों का रेला लग जाता है। साठ से सत्तर ट्रकें सड़क किनारे कतारबद्ध होकर खड़ी हो जाती हैं। लेकिन यह कोई आम ट्रकों की कतार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘बालू का काला बाजार’ है। सुबह 7 बजे तक यहां लाखों का कारोबार बिना किसी रसीद, बिना किसी बही-खाते और बिना किसी सरकारी टैक्स चुकाए निपटा दिया जाता है।

सकरा के जहांगीपुर चौक (पूसा मुजफ्फपुर मार्ग )  पर सुबह-सुबह अवैध बालू मंडी का नजारा। कतार में खड़ी ये ट्रकें बिना किसी चालान या टैक्स के सरकारी राजस्व को चूना लगा रही हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं।

सुबह के दो घंटे, लाखों का कारोबार

यहां का नियम बिल्कुल अनोखा है। सुबह 5 बजते ही 60 से 70 ट्रकों का काफिला सड़क पर आकर खड़ा हो जाता है। ग्राहक आते हैं, अपनी जरूरत बताते हैं और चंद मिनटों में सौदा पट जाता है। सुबह 7 बजते-बजते यह पूरा ‘बालू मेला’ समाप्त हो जाता है। खास बात यह है कि सारा धंधा ‘जुबानी’ चलता है—न कोई रसीद, न कोई एडवांस। पैसा तब लिया जाता है जब बालू ग्राहक के दरवाजे पर गिर जाता है।

हुंडाडील का खेल और ओवरलोडिंग

ट्रक ड्राइवरों की मानें तो वे ‘हुंडा’ (लंप सम) रेट पर बालू बेचते हैं। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए वे ओवरलोड गाड़ियों का लालच देते हैं, जिससे ग्राहकों को बाजार भाव से प्रति सीएफटी (CFT) 1000 से 1500 रुपये तक की बचत होती है। यहाँ कोइलवर के बालू के साथ-साथ स्थानीय गंडक नदी के सफेद बालू की भी भारी डिमांड है।

संरक्षण में फली-फूली माफियागिरी

यह अवैध धंधा सकरा, मुरौल, बंदरा और पूसा क्षेत्र के लोगों के लिए सस्ती बालू पाने का जरिया बन चुका है, लेकिन इसके पीछे पनप रहा बालू माफियाओं का नेटवर्क कानून के लिए एक बड़ी चुनौती है। हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ दिन के उजाले में हो रहा है, लेकिन खनिज एवं खनन विभाग, परिवहन विभाग और आयकर विभाग के अधिकारी या तो इस ‘सुपरफास्ट’ धंधे से अनजान हैं या फिर मिलीभगत के कारण मूकदर्शक बने हुए हैं।

चूंकि यह पूरा खेल मात्र दो घंटे (सुबह 5 से 7) में सिमट जाता है, इसलिए माफियाओं को पकड़ना विभाग के लिए भी एक बहाना बन गया है। अब सवाल यह है कि कब तक प्रशासन इस ‘सड़कछाप’ माफियागिरी के आगे नतमस्तक रहेगा और कब तक सरकारी राजस्व को यूं ही चूना लगता रहेगा?

प्रशासन की नाक के नीचे पनपता माफिया राज

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह पूरा अवैध ‘बालू मेला’ मुरौल प्रखंड मुख्यालय से महज 500 मीटर की दूरी पर जहांगीपुर चौक पर सजता है। यानी, स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे, दिन के उजाले में यह खुला खेल चल रहा है। जिस प्रखंड मुख्यालय से पूरे क्षेत्र के प्रशासन और कानून-व्यवस्था का संचालन होना चाहिए, उसी की दहलीज के ठीक बाहर माफियाओं का यह समानांतर साम्राज्य यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर किसकी शह पर यह गोरखधंधा फल-फूल रहा है? जब चंद कदमों की दूरी पर बैठे अधिकारियों को यह अवैध गतिविधि नहीं दिख रही है, तो इसे केवल प्रशासनिक लापरवाही कहें या फिर मिलीभगत का मौन समर्थन? यह स्थिति न केवल कानून का मखौल उड़ा रही है, बल्कि आम लोगों के बीच प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी गहरा सवाल खड़ा कर रही है।

कानून की धज्जियां: कैसे फल-फूल रहा है यह अवैध कारोबार?

यह पूरा सिंडिकेट कानूनी प्रक्रियाओं को पूरी तरह दरकिनार कर चलता है। कानूनन, बालू के परिवहन के लिए ऑनलाइन ई-चालान और संबंधित खदान का वैध दस्तावेज होना अनिवार्य है। लेकिन यहां ‘हुंडा’ (लंप सम) का खेल चलता है।

  1. ई-चालान की चोरी: सरकार को मिलने वाला रॉयल्टी टैक्स सीधे तौर पर हड़प लिया जाता है, क्योंकि यहां कोई चालान ही नहीं काटा जाता।
  2. ओवरलोडिंग का जहर: ये ट्रकें अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा बालू ढोती हैं, जो न केवल सड़क को बर्बाद कर रही हैं, बल्कि हादसों को भी खुला निमंत्रण दे रही हैं।
  3. अघोषित व्यापार: बिना किसी व्यापारिक पंजीयन के, ये माफिया सरकारी राजस्व को हर रोज चूना लगा रहे हैं। माल सीधा ग्राहक के दरवाजे पर गिरता है, जिससे सरकारी तंत्र को भनक तक नहीं लगती।

यदि अधिकारी एक्शनमें आएं, तो क्या होगा?

यदि प्रशासन की नींद टूटे और संबंधित विभाग सख्ती बरतें, तो इस सिंडिकेट की कमर तोड़ना कोई बड़ी बात नहीं है। यदि जिला प्रशासन का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ होता है, तो निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैं:

  • भारी जुर्माना और जब्ती: नियमों का उल्लंघन करने पर ट्रकों को तत्काल जब्त किया जा सकता है, जिससे माफियाओं को भारी वित्तीय नुकसान होगा।
  • अवैध संपत्ति की जांच: इस तरह के अवैध धंधों से अर्जित की गई बेनामी संपत्ति की पहचान कर उसे कुर्क (जब्त) किया जा सकता है।
  • चेन का टूटना: एक बार यदि सप्लायर और ट्रक मालिक के बीच का यह नेटवर्क टूट गया और एफआईआर दर्ज हुई, तो दोबारा इस सड़क पर बालू का मेला लगाने की हिम्मत कोई नहीं करेगा।

अधिकारियों की भूमिका और उन पर उठते सवाल

1. जिला खनिज एवं खनन अधिकारी (Mining Department): खनन विभाग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि बिना चालान के बालू का परिवहन न हो। इस अवैध मंडी का अस्तित्व ही यह साबित करता है कि विभाग की गश्त या तो शून्य है, या मिलीभगत है। यदि खनन अधिकारी औचक छापेमारी करें, तो ट्रकों के दस्तावेजों की जांच से यह स्पष्ट हो जाएगा कि ये गाड़ियां किस खदान से निकली हैं और बिना ई-चालान के कैसे चल रही हैं। मौके पर मौजूद गाड़ियों की जब्ती और संचालकों पर खनन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करना पहला कदम होना चाहिए।

2. जिला परिवहन अधिकारी (Transport Department): सड़क सुरक्षा और परिवहन नियमों का पालन सुनिश्चित करना परिवहन विभाग का काम है। रोजाना 60-70 ओवरलोड ट्रकों का सड़क पर चलना परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल उठाता है। यदि विभाग एक्शन मोड में आए, तो इन सभी गाड़ियों का फिटनेस, परमिट और ओवरलोडिंग के लिए भारी जुर्माना काटा जा सकता है। बार-बार पकड़े जाने पर इन ट्रकों का लाइसेंस और परमिट स्थायी रूप से रद्द करने की कार्रवाई इस पूरे धंधे को सड़क से गायब कर सकती है।

3. आयकर अधिकारी (Income Tax Department): यह धंधा पूरी तरह ‘कैश’ पर आधारित है, जहां हर रोज लाखों रुपयों का लेन-देन हो रहा है। यह स्पष्ट रूप से ‘ब्लैक मनी’ का मामला है। आयकर विभाग यदि इस ‘अवैध मंडी’ को रडार पर ले, तो इन माफियाओं के खातों की जांच की जा सकती है। जब बालू के इस धंधे में भारी मुनाफा है और इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है, तो यह ‘टैक्स चोरी’ का बड़ा मामला बनता है। रेड और सर्वे के जरिए इस काले धन के स्रोत का पता लगाकर इन पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई संभव है।


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