समस्तीपुर नगर निगम का ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह फेल: पहली ही रिमझिम ने खोली विकास के दावों की पोल!
समस्तीपुर | 11 जून | समस्तीपुर नगर निगम क्षेत्र के निवासियों के लिए बृहस्पतिवार की सुबह एक गहरा झटका लेकर आई। सुबह-सुबह हुई बेहद हल्की और नाममात्र की वर्षा ने नगर निगम प्रशासन के उन तमाम बड़े-बड़े दावों को पूरी तरह से धो दिया, जिनमें जल निकासी के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने की बात कही जाती है। शहर के तथाकथित वीआईपी और आम रिहायशी इलाकों की सूरत देखकर ऐसा लग रहा था मानो किसी ने जानबूझकर सड़कों को मलबे और गंदे पानी के तालाब में तब्दील कर दिया हो।
स्थिति इतनी बदतर और हास्यास्पद हो गई कि स्थानीय नागरिकों को पुरानी लोक-कहावत ‘बेंग के मूतने से बाढ़ आना‘ यानी मेंढक के पेशाब करने से भी प्रलय आ जाना, लोगों को याद आ गई। यह व्यंग्यात्मक कहावत आज समस्तीपुर नगर निगम की बदहाल कार्यशैली और कागजी दावों पर शत-प्रतिशत सटीक बैठती है, जहां जरा सी रिमझिम ने पूरे शहर को दहने यानी डूबने की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।

मोहल्लों की दर्दभरी दास्तान: बुनियादी सुविधाओं को तरसती जनता
अगर जमीनी स्तर पर जाकर स्थिति देखा जाए, तो विवेक-विहार मोहल्ले की हालत सबसे ज्यादा दयनीय देखी गई। यहाँ की संकरी गलियां पूरी तरह से जलमग्न हो चुकी हैं, जिससे पैदल चलना तो दूर, दोपहिया वाहनों का निकलना भी हादसों को दावत देने जैसा हो गया है। सुबह के समय स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे मासूम बच्चे, दूध विक्रेता, कामकाजी महिलाएं और इलाज के लिए अस्पताल जाने वाले बुजुर्ग इसी सड़े हुए नाले के पानी में पैर डुबोकर गुजरने को मजबूर हुए।
ठीक यही स्थिति काशीपुर और आदर्श नगर की भी रही, जिन्हें समस्तीपुर का मुख्य शैक्षणिक और आवासीय केंद्र माना जाता है। यहाँ सैकड़ों छात्र-छात्राएं कोचिंग और स्कूलों के लिए निकलते हैं, लेकिन सड़कों पर फैले इस नरक के कारण कई बच्चों की कक्षाएं छूट गईं। सरोजनी गली, बारह पत्थर और आजाद नगर में भी जल निकासी का कोई नामोनिशान नहीं मिला, जिससे यहाँ की व्यावसायिक गतिविधियां भी पूरी तरह ठप पड़ गईं। स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि नगर निगम टैक्स तो समय पर वसूलता है, लेकिन सुविधा के नाम पर केवल गंदा पानी परोसता है।

समस्तीपुर में जलजमाव को लेकर नगर निगम पर बरसे भाकपा माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह, डीएम से की जांच की मांग
समस्तीपुर में हुई हल्की बारिश के बाद शहर के विभिन्न मोहल्लों में उत्पन्न हुई जलजमाव की स्थिति पर भाकपा माले के जिला स्थाई समिति सदस्य सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने एक वीडियो बयान जारी कर नगर निगम प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जल निकासी, नाला सफाई और मरम्मत के नाम पर हर महीने होने वाला करोड़ों रुपये का खर्च सिर्फ सरकारी रजिस्टरों तक सीमित है, जबकि जमीनी हकीकत बिल्कुल इसके उलट है। विवेक विहार, काशीपुर और आदर्श नगर जैसे इलाकों की बदहाली का हवाला देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि नगर निगम के अधिकारी और कर्मी शिकायतों के बावजूद निरीक्षण करने नहीं आते। माले नेता ने जिलाधिकारी से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और विकास राशि की लूट करने वाले दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है।
सुरेंद्र प्रसाद सिंह, जिला स्थाई समिति सदस्य, भाकपा माले, समस्तीपुर का पूरा बयान:
“एक कहावत चरितार्थ है— बेंग मूतने से बाढ़ आना। यही कहावत चरितार्थ हो रहा है समस्तीपुर नगर निगम क्षेत्र में, जहां पर आज सुबह-सुबह हल्की वर्षा हुई और हल्की वर्षा में समस्तीपुर शहर का कई मोहल्ला में जलजमाव हो गया। करोड़ों रुपया जल निकासी के नाम पर, नाला सड़क निर्माण के नाम पर खर्च दिखाने वाली समस्तीपुर नगर निगम का एक बार फिर पोल खुल गया है।


एक भी जगह पर नगर निगम का कर्मी, अधिकारी… कहीं नाला जाम है, कहीं नाला टूटा हुआ है, कहीं और समस्या है, निरीक्षण करने को नहीं जाते हैं, देखते नहीं हैं— चाहे आप जहां भी आवेदन दे दें, जहां भी शिकायत कर दें। यही कारण है कि करोड़ों-करोड़ रुपया प्रति माह समस्तीपुर में नाला पर, सड़क निर्माण पर, जल निकासी पर, नाला की सफाई पर खर्च तो दिखा दिया जाता है लेकिन सिर्फ रजिस्टर में, जमीन पर नहीं उतारा जाता है।
आज आप समस्तीपुर सड़क का चाहे विवेक विहार हो, काशीपुर हो, आदर्श नगर हो, बारह पत्थर हो, आप नजारा देख सकते हैं— एकदम हल्की वर्षा और सड़क पर जलजमाव का नजारा। हम एक बार फिर जिलाधिकारी से भाकपा माले मांग करना चाहेगी कि आप नगर निगम के द्वारा खर्च किया जा रहा नाला पर, सड़क निर्माण पर, नाला सफाई पर, नाला रिपेयर पर जो करोड़ों-करोड़ रुपया हो रहा है, उस कार्य की जांच कराई जाए और जांच करके विकास कार्य को लूटने वाले, रुपया लूटने वाले दोषियों पर कार्रवाई की जाए।”
कागजी रजिस्टर बनाम जमीनी हकीकत: करोड़ों के बजट का वित्तीय गबन
भाकपा माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह के इस बयान ने नगर निगम के भीतर चल रहे उस काले खेल को उजागर कर दिया है, जिसे अमूमन फाइलों के नीचे दबाकर रखा जाता है। समस्तीपुर नगर निगम के वित्तीय दस्तावेजों को देखें, तो हर महीने नाला निर्माण, पुरानी नालियों की मरम्मती, गाद की सफाई, सड़कों का सुदृढ़ीकरण, कूड़ा उठाव और कीटनाशक रसायनों के छिड़काव के नाम पर करोड़ों-करोड़ रुपये का आवंटन किया जाता है। लेकिन यह पूरी धनराशि केवल अफसरों और ठेकेदारों के रजिस्टरों में ही खर्च होकर सिमट जाती है।

वास्तविकता यह है कि धरातल पर न तो कोई सफाई कर्मी नियमित रूप से दिखाई देता है और न ही जल निकासी की कोई ठोस योजना लागू की जाती है। जनता अपनी शिकायतों को लेकर वार्ड पार्षदों से लेकर नगर आयुक्त तक के दफ्तरों के चक्कर काटती रहती है, परंतु उनके आवेदनों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। निरीक्षण के नाम पर बड़े अधिकारी अपनी वातानुकूलित गाड़ियों से बाहर तक नहीं निकलते, जिससे निचले स्तर के कर्मियों और कनीय अभियंताओं यानी जेई के हौसले बुलंद हैं।
ठेकेदारों और जेई का नापाक गठजोड़: तकनीकी खामियों का अंबार
इस पूरे ड्रेनेज संकट के पीछे सबसे बड़ी वजह ठेकेदारों और तकनीकी अधिकारियों का वह नापाक गठजोड़ है, जो बिना काम किए ही सरकारी खजाने को चूना लगा रहा है। शहर में जहां कहीं भी नए नालों का निर्माण कराया गया है, वहां तकनीकी मानकों की घोर अनदेखी की गई है। नालों का ढाल (स्लोप) विपरीत दिशा में बना दिया गया है, जिसके कारण पानी आगे बहने के बजाय वापस गलियों और घरों की तरफ बैक मारने लगता है।

कई मुख्य नालों को बीच में ही अधूरा छोड़ दिया गया है या उन्हें आपस में जोड़ा ही नहीं गया है। मॉनसून के आगमन से ठीक पहले की जाने वाली ‘प्री-मॉनसून सफाई’ के नाम पर भी इस वर्ष भारी घोटाला किया गया है। कागजों पर सभी छोटे-बड़े नालों से गाद निकालने का दावा किया गया, लेकिन इस पहली ही मामूली बारिश ने सिद्ध कर दिया कि नालों के भीतर वर्षों का कचरा और गाद जस की तस जमी हुई है। इस आपराधिक लापरवाही के लिए कनीय अभियंता (जेई) सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, जो बिना स्थल निरीक्षण के ही ठेकेदारों के फर्जी बिलों को हरी झंडी दे देते हैं।
महामारी की आहट: स्वास्थ्य संकट की दहलीज पर खड़ा शहर
सड़कों पर जमा यह बदबूदार पानी केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि यह समस्तीपुर में एक बड़े स्वास्थ्य आपातकाल को भी न्योता दे रहा है। सड़कों और गलियों में कई दिनों तक पानी रुके रहने से उसमें सड़न पैदा हो रही है, जिससे उठने वाली दुर्गंध ने स्थानीय लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। यह प्रदूषित माहौल मच्छरों और हानिकारक जीवाणुओं के पनपने के लिए सबसे मुफीद नर्सरी बन चुका है।
आने वाले दिनों में अगर तेज धूप निकलती है, तो इस ठहरे हुए पानी के कारण शहर में डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, टायफाइड, डायरिया और त्वचा से संबंधित संक्रामक बीमारियों का भयंकर प्रकोप फैलना निश्चित है। नगर निगम का स्वास्थ्य विभाग इस संभावित खतरे को लेकर पूरी तरह से उदासीन बना हुआ है। पूरे शहर में ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव या फॉगिंग मशीन चलाना तो दूर, साधारण चूने का छिड़काव भी नहीं देखा जा रहा है। अगर समय रहते जल निकासी नहीं की गई, तो सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की कतारें लग जाएंगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी नगर निगम प्रशासन की होगी।

जिलाधिकारी से सीधी मांग: आर-पार के मूड में जनता और माले
समस्तीपुर की इस नारकीय स्थिति और प्रशासनिक विफलता को देखते हुए भाकपा माले ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने जिलाधिकारी से बेहद कड़े शब्दों में मांग की है कि वे इस पूरे मामले को अत्यंत गंभीरता से लें। उन्होंने कहा कि जिलाधिकारी को तुरंत एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच कमेटी का गठन करना चाहिए, जो पिछले 2 वर्षों में नाला निर्माण, सफाई, मरम्मत और रिपेयरिंग के नाम पर खर्च किए गए करोड़ों-करोड़ रुपये की विस्तृत फॉरेंसिक और तकनीकी जांच करे।
इस जांच के दायरे में उन सभी दोषी ठेकेदारों, कनीय अभियंताओं (जेई) और संबंधित नगर निगम अधिकारियों को लाया जाए जिन्होंने जनता के पैसे की खुली लूट की है। उनके खिलाफ वित्तीय गबन और आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज कर उन्हें अविलंब जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए और उनकी निजी संपत्तियों को कुर्क करके इस सरकारी धन की वसूली की जानी चाहिए।

समस्तीपुर की त्रस्त जनता अब खोखले आश्वासनों और कागजी दावों से पूरी तरह थक चुकी है। नियमित रूप से भारी-भरकम टैक्स चुकाने के बावजूद यदि उन्हें नरक में रहने को मजबूर होना पड़ रहा है, तो यह लोकतंत्र का सबसे भद्दा मजाक है। भाकपा माले ने चेतावनी दी है कि यदि जिलाधिकारी ने इस लूट तंत्र पर लगाम नहीं लगाई और आगामी 1 सप्ताह के भीतर विवेक-विहार सहित सभी प्रभावित मोहल्लों से जल निकासी और नालों की वास्तविक सफाई सुनिश्चित नहीं की, तो पार्टी आम जनता को लामबंद कर नगर निगम मुख्यालय का अनिश्चितकालीन घेराव करेगी। इस उग्र जन-आंदोलन से उत्पन्न होने वाली किसी भी प्रकार की विधि-व्यवस्था की समस्या के लिए पूरी तरह से नगर निगम प्रशासन और जिला प्रशासन जिम्मेदार होगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस अंतिम चेतावनी के बाद अपनी कुंभकर्णी नींद से जागता है या समस्तीपुर को ऐसे ही भ्रष्टाचार के दलदल में डूबने के लिए छोड़ देता है।
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