महंगाई पर छिड़ा ‘ट्वीट वॉर‘: कांग्रेस पार्टी द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा किया गया इंफोग्राफिक, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान सरसों तेल की कीमतों की तुलना कर ‘विकास काल’ बनाम ‘विनाश काल’ का नैरेटिव सेट करने का प्रयास किया गया है।
सरसों के तेल की कीमतों ने बढ़ाया सियासी पारा
देश में चुनावी मौसम हो या न हो, लेकिन जनता की रसोई का बजट हमेशा से ही सबसे बड़ा सियासी हथियार रहा है। हाल ही में मुख्य विपक्षी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ हैंडल से एक ऐसा ग्राफिक पोस्ट किया है, जिसने देश के मध्यम और निम्न वर्ग की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। कांग्रेस ने सीधे तौर पर देश की थाली के सबसे अहम हिस्से—सरसों के तेल की कीमतों का सहारा लेकर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है।

इस वायरल तस्वीर में एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के चेहरे के साथ ‘विकास काल‘ (2014 से पहले) लिखकर सरसों तेल की कीमत ₹90 दिखाई गई है, तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ ‘विनाश काल‘ (2014 के बाद) लिखकर यही कीमत ₹190 दर्शाई गई है। यह ग्राफिक सोशल मीडिया पर तेजी से तैर रहा है और आम लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या वाकई बीते एक दशक में विकास के दावों के बीच आम आदमी की जेब पूरी तरह कट चुकी है?
आंकड़ों का खेल या जमीनी हकीकत? एक विश्लेषण
कांग्रेस के इस आक्रामक दांव ने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस द्वारा पेश किए गए आंकड़े महज एक राजनीतिक प्रोपेगैंडा हैं या फिर भारतीय रसोई की कड़वी सच्चाई?

अगर हम आर्थिक आंकड़ों और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के रिकॉर्ड पर नजर डालें, तो साल 2014 के आसपास सरसों के तेल की औसत कीमत ₹90 से ₹100 प्रति लीटर के बीच हुआ करती थी। वहीं, साल 2021 और 2022 के दौर में कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों की सप्लाय चेन बाधित हुई, जिसके चलते भारत में सरसों का तेल वास्तव में ₹190 से लेकर ₹250 प्रति लीटर के रिकॉर्ड स्तर तक जा पहुंचा था। हालांकि, मौजूदा समय में कीमतों में कुछ सुधार हुआ है और यह ₹140 से ₹180 के आसपास बनी हुई है, लेकिन कांग्रेस ने ₹190 के चरम आंकड़े को छूकर सरकार की आर्थिक नीतियों पर तीखा हमला बोला है।
‘विकास काल‘ बनाम ‘विनाश काल‘: नैरेटिव की जंग
कांग्रेस इस तस्वीर के जरिए जनता को यूपीए (UPA) सरकार के उन दिनों की याद दिलाना चाहती है, जब वैश्विक मंदी के बावजूद घरेलू बाजारों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें एक निश्चित दायरे में थीं। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र की मौजूदा सरकार बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने में व्यस्त है, जबकि आम नागरिक दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है।

दूसरी तरफ, सत्तापक्ष यानी भाजपा का हमेशा से यह तर्क रहा है कि 2014 के बाद से देश के बुनियादी ढांचे, डिजिटल इकॉनमी और वैश्विक साख में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। सरकार समर्थकों का कहना है कि महंगाई को केवल एक वस्तु (जैसे सरसों तेल) के पैमाने पर नहीं मापा जा सकता। सरकार द्वारा मुफ्त राशन योजना, उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर और सीधे किसानों के खाते में पैसे भेजने जैसी कल्याणकारी योजनाओं से जनता को सीधी राहत दी गई है। लेकिन विपक्ष का यह पलटवार भी मजबूत है कि जब बुनियादी खाद्य पदार्थ ही आम आदमी की पहुंच से दूर हो जाएंगे, तो बाकी विकास के दावों का क्या मोल?
आम जनता की जुबानी: क्या वाकई बदल गई जिंदगी?
इस ट्वीट के वायरल होने के बाद जब ग्राउंड जीरो पर आम नागरिकों से बात की गई, तो मिली-जुली लेकिन दर्द से भरी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
- गृहिणियों का दर्द: मुजफ्फरपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की गृहणी मंजू देवी कहती हैं, “पहले रसोई का मासिक बजट 5 से 6 हजार रुपये में सिमट जाता था, आज वह बढ़कर 11 से 12 हजार हो चुका है। तेल, दाल, गैस सिलेंडर—हर चीज के दाम बढ़े हैं। विपक्ष का यह ग्राफिक पूरी तरह झूठ नहीं है, क्योंकि हमने खुद ₹200 लीटर तक सरसों का तेल खरीदा है।”
- दिहाड़ी मजदूरों की बेबसी: वहीं, मजदूरी करने वाले रमेश कुमार मुन्ना का कहना है कि उनकी दिहाड़ी पिछले 10 सालों में दोगुनी नहीं हुई, लेकिन खाने-पीने की चीजों के दाम दोगुने से भी ज्यादा हो गए हैं। उनके लिए ‘विकास’ केवल टीवी और विज्ञापनों तक सीमित है, थाली में आज भी संघर्ष ही परोसा जा रहा है।

महंगाई का यह चक्रव्यूह और सरकार की चुनौतियां
भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% खाद्य तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में होने वाली हलचल सीधे भारतीय रसोई को प्रभावित करती है। लेकिन कांग्रेस के इस हमले ने सरकार की उस नीति पर सवाल उठा दिया है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ का दम भरती है। यदि भारत खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा था, तो कीमतें इस कदर आसमान क्यों छू गईं?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के सोशल मीडिया पोस्ट सीधे जनता के मनोविज्ञान पर असर डालते हैं। जब एक आम आदमी बाजार में बटुआ निकालता है, तो उसे सरकार के बड़े-बड़े आर्थिक आंकड़े (जैसे GDP ग्रोथ या विदेशी मुद्रा भंडार) याद नहीं रहते, बल्कि उसे सरसों तेल की बोतल पर छपी कीमत ही याद रहती है।

क्या यह मुद्दा पलटेगा सियासी बाजी? : कांग्रेस का यह ‘एक्स’ पोस्ट केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों के लिए एक सेट किया जा रहा बड़ा एजेंडा है। बेरोजगारी के बाद महंगाई ही वह अचूक तीर है, जिससे विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है।
अब देखना यह होगा कि भाजपा इस ‘विनाश काल’ वाले नैरेटिव की काट किस तरह ढूंढती है। क्या सरकार खाद्य तेलों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कोई ठोस और परमानेंट कदम उठाएगी, या फिर यह मुद्दा इसी तरह सोशल मीडिया से लेकर संसद तक देश की राजनीति को गर्माता रहेगा? फिलहाल, इस तस्वीर ने आम जनता को सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया है कि उनकी जेब के लिए कौन सा ‘काल’ बेहतर था।
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