मुजफ्फरपुर (बंदरा): सादगी की प्रतिमूर्ति और देश के प्रतिष्ठित ‘पद्मश्री’ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध कृषि विज्ञानी डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी अब स्मृतियों में शेष रह गए हैं। बुधवार को मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड स्थित उनके पैतृक गांव मतलूपुर में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। बाबा खगेश्वरनाथ पोखर के तट पर उनके ज्येष्ठ पुत्र रमन त्रिवेदी ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान पूरा वातावरण “डॉ. साहब अमर रहें” के नारों से गूंज उठा।

गार्ड ऑफ ऑनर के साथ दी गई अंतिम विदाई राजकीय सम्मान के साथ हुए इस अंतिम संस्कार में दिवंगत आत्मा को पुलिस बल द्वारा ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया गया। इस भावुक क्षण में प्रखंड विकास पदाधिकारी बंदरा, अंचलाधिकारी बंदरा, हत्था थाना प्रभारी समेत बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद और ग्रामीण मौजूद रहे। नम आंखों से सभी ने उस महान विभूति को विदाई दी, जिसने कृषि जगत को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं।
वैज्ञानिक नहीं, ‘खेती के ऋषि‘ थे डॉ. त्रिवेदी डॉ. राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पूर्व कुलपति रहे डॉ. त्रिवेदी केवल फाइलों और प्रयोगशालाओं तक सीमित रहने वाले वैज्ञानिक नहीं थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन जमीन पर उतरकर किसानों की समस्याओं को हल करने में बिताया। जब मुजफ्फरपुर की पहचान ‘शाही लीची’ के पुराने बाग दम तोड़ रहे थे, तब उनकी ‘कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक ने बूढ़े पेड़ों को नई जवानी दी। वहीं, उत्तर बिहार के जलजमाव वाले क्षेत्रों के लिए उनकी ‘बाबा परियोजना’ (बिहार एक्वाकल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर) ने आपदा को अवसर में बदलते हुए मछली, मखाना और सिंघाड़े की खेती का सफल मॉडल पेश किया।

कुलपति से प्रगतिशील किसान तक का अनूठा सफर डॉ. त्रिवेदी का जीवन प्रेरणा की एक जीवंत कहानी है। पिता के निधन के बाद खेती की कमान संभालने से लेकर कृषि विज्ञान में पीएचडी और फिर कुलपति के पद तक पहुँचने के बाद भी उनकी जड़ें मिट्टी से जुड़ी रहीं। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने आराम करने के बजाय गांव लौटकर 85 एकड़ में खेती का आधुनिक मॉडल खड़ा किया, जो आज भी देशभर के किसानों के लिए एक तीर्थ के समान है।
उनके जाने से न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के कृषि जगत में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसे भरना असंभव है।
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