वाराणसी/पटना | विशेष संवाददाता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने कृषि क्षेत्र में दो ऐसी बड़ी सफलताओं का प्रदर्शन किया है, जो न केवल खेती के पारंपरिक तरीकों को चुनौती दे रही हैं, बल्कि किसानों के लिए मुनाफे के नए द्वार भी खोल रही हैं। वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) ने ‘ग्राफ्टिंग’ के जरिए पोमेटो और ब्रिमेटो को सफल बनाया है, वहीं पटना के वैज्ञानिकों ने जीरो टिलेज तकनीक से आलू उगाने का सफल मॉडल पेश किया है।

ब्रिमेटोभी तैयार: एक ही पौधे पर बैंगन और टमाटर का संगम

संस्थान ने ग्राफ्टिंग तकनीक के जरिए न केवल आलू-टमाटर, बल्कि ब्रिमेटोको भी सफलतापूर्वक विकसित किया है। इसमें बैंगन के पौधे के मुख्य तने पर टमाटर की ग्राफ्टिंग की जाती है।

  • विशेषता: एक ही पौधे की शाखाओं पर ऊपर की ओर टमाटर और दूसरी शाखाओं पर बैंगन फलते हैं।
  • फायदा: यह तकनीक उन शहरी क्षेत्रों या किचन गार्डन के लिए भी वरदान है जहाँ जगह की कमी है, साथ ही व्यावसायिक स्तर पर इससे किसानों को प्रति एकड़ दोगुना उत्पादन मिलने की उम्मीद है।

पोमेटो : जमीन के नीचे आलू, ऊपर टमाटर

संस्थान में किए गए प्रदर्शन के दौरान ‘पोमेटो’ की कार्यप्रणाली को विस्तार से समझाया गया। इसमें आलू के पौधे पर टमाटर के पौधे को जोड़ा जाता है।

  • दोहरी फसल: इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि पौधा जमीन के नीचे आलू की गांठें तैयार करता है और जमीन के ऊपर टमाटर की पैदावार देता है।
  • संसाधनों की बचत: एक ही पौधे को सींचने और खाद देने से दो फसलें तैयार हो जाती हैं, जिससे पानी और पोषक तत्वों की भारी बचत होती है।
तकनीकसंगममुख्य विशेषता
ब्रिमेटोबैंगन + टमाटरबैंगन के मुख्य तने पर टमाटर की ग्राफ्टिंग। एक ही पौधे पर ऊपर टमाटर और नीचे/साइड में बैंगन।
पोमेटोआलू + टमाटरजमीन के नीचे आलू और जमीन के ऊपर टमाटर ।

किसानों की आय दोगुनी करने का नया हथियार

IIVR के वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य की खेती के लिए अत्यंत लाभकारी है। इससे किसानों को निम्नलिखित लाभ मिलेंगे:

  1. लागत में कमी: अलग-अलग फसल के लिए बार-बार जुताई और खाद की जरूरत नहीं पड़ती।
  2. श्रम की बचत: एक ही देखरेख में दो फसलें तैयार होने से मजदूरों पर होने वाला खर्च घटता है।
  3. कम जमीन, ज्यादा मुनाफा: छोटे किसानों के लिए यह तकनीक आय बढ़ाने का सबसे सटीक जरिया है।

प्रमुख विशेषताएं:

  • ब्रिमेटो : इसमें मुख्य तना बैंगन का होता है जिस पर टमाटर की टहनी लगाई जाती है। एक ही पौधे पर ऊपर टमाटर और नीचे की टहनियों में बैंगन फलते हैं।
  • पोमेटो : इसमें जमीन के नीचे आलू की गांठें बनती हैं और जमीन के ऊपर टमाटर के गुच्छे लगते हैं।
  • वैज्ञानिकों की अनूठी पहल

वाराणसी स्थित यह संस्थान ग्राफ्टिंग तकनीक का अद्भुत प्रयोग कर रहा है। यह तकनीक न केवल पैदावार बढ़ाती है, बल्कि पौधों में बीमारियों से लड़ने की क्षमता को भी विकसित करती है।

वहीं अब आलू की खेती में अब भारी-भरकम जुताई और अधिक लागत की जरूरत नहीं पड़ेगी। पटना स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र में आयोजित किसानों के प्रशिक्षण सह कार्यशाला में विशेषज्ञों ने ज़ीरो टिलेज‘ (शून्य जुताई) तकनीक को अपनाने की पुरजोर अपील की है। इस आधुनिक विधि से न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि पर्यावरण और भूमि की उर्वरता भी सुरक्षित रहेगी।


खुद खेत में उतरकर परखी तकनीक

विगत दिनों एक कार्यशाला के दौरान कृषि मंत्री रामकृपाल यादव ने स्वयं खेत में उतरकर ज़ीरो टिलेज तकनीक से हो रहे आलू उत्पादन का बारीकी से अवलोकन किया। तकनीक की सराहना करते हुए उन्होंने कहा:

“इस विधि से कम लागत में उत्पादन दोगुना हो रहा है। इससे किसानों के समय और श्रम की भारी बचत हो रही है।”

मंत्री जी ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि इस खेती में महिलाओं की भागीदारी और रुचि तेजी से बढ़ी है। ग्रामीण महिलाएं इस तकनीक के जरिए न केवल अपने परिवार का संबल बन रही हैं, बल्कि बिहार की प्रगति में भी अहम योगदान दे रही हैं।


क्यों खास है ज़ीरो टिलेजतकनीक?

अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र के प्रमुख नीरज शर्मा और अन्य विशेषज्ञों ने इस तकनीक के बहुआयामी लाभ गिनाए:

  • मिट्टी की उर्वरता: खेत की जुताई न होने से मिट्टी के भीतर मौजूद मित्र सूक्ष्मजीव सुरक्षित रहते हैं, जिससे जमीन की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति बनी रहती है।
  • प्रदूषण से मुक्ति: फसल कटने के बाद बचे अवशेषों (पराली/पुआल) को जलाने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे वायु प्रदूषण कम होता है।
  • बचत और मुनाफा: पारंपरिक विधि की तुलना में इसमें लागत में 35-40% की कमी आती है, जबकि पैदावार 14 से 28% तक बढ़ जाती है।
  • बेहतर गुणवत्ता: इस विधि से तैयार आलू कटता-फटता नहीं है और स्वाद में भी बेहतर होता है।

खेती की विधि: बिना जुताई ऐसे उगाएं आलू

केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. शिव प्रताप सिंह ने बताया कि बेहतर पैदावार के लिए समय पर बुवाई सबसे अनिवार्य है। उन्होंने बुवाई की सरल प्रक्रिया साझा की:

खेती करने का पूरा तरीका :

यह विधि पारंपरिक खेती से बिल्कुल अलग है क्योंकि इसमें ट्रैक्टर से जुताई की आवश्यकता नहीं होती।

  1. समय का चुनाव: धान की फसल कटने के तुरंत बाद, जब खेत में हल्की नमी (बतर) हो, तब इसकी शुरुआत करें।
  2. बीज की बुवाई: बिना जुताई किए समतल खेत पर ही 20-20 सेंटीमीटर की दूरी पर आलू के बीज (कंद) कतारों में रखें।
  3. खाद का प्रयोग: बीजों के ऊपर थोड़ी मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट डालें।
  4. मल्चिंग (पुआल से ढंकना): यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है। पूरे खेत को 6 से 8 इंच मोटी पुआल (पराली) की परत से ढंक दें।
  5. सिंचाई: यदि मिट्टी में नमी कम हो, तो हल्की सिंचाई करें। पुआल नमी को लंबे समय तक रोक कर रखता है।
  6. खुदाई: फसल तैयार होने पर पुआल हटाकर सीधे आलू उठा लिए जाते हैं। मिट्टी सख्त न होने के कारण आलू साफ और बड़े आकार के निकलते हैं।

इन तकनीकों के आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ

विशेषज्ञों के अनुसार, ये दोनों विधियाँ आने वाले समय में गेम-चेंजर साबित होंगी:

  • लागत में भारी कमी: जीरो टिलेज से जुताई और निराई-गुड़ाई का खर्च पूरी तरह खत्म हो जाता है।
  • आय में वृद्धि: एक ही जमीन और एक ही खाद-पानी में दो फसलें (पोमेटो/ब्रिमेटो) मिलने से किसानों का मुनाफा दोगुना हो जाता है।
  • मिट्टी और पर्यावरण: पराली जलाने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे वायु प्रदूषण रुकता है और मिट्टी के मित्र कीड़े (जैसे केंचुआ) सुरक्षित रहते हैं।
  • शहरी खेती: ग्राफ्टेड पौधे उन लोगों के लिए बेहतरीन हैं जिनके पास छत या बालकनी में कम जगह है।

वाराणसी और पटना के वैज्ञानिकों का अब लक्ष्य इन तकनीकों को प्रयोगशाला से निकालकर व्यापक स्तर पर गांवों तक पहुँचाना है, ताकि आम किसान भी इस आधुनिक विज्ञान का लाभ उठा सकें।

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