बिहार में निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक; शिक्षा विभाग ने जारी किया कड़ा दिशा-निर्देश। अब फीस, ड्रेस या किताबों के लिए अभिभावकों पर नहीं बना सकेंगे दबाव। नियम तोड़े तो रद्द होगी निजी स्कूलों की मान्यता, लगेगा भारी आर्थिक जुर्माना।
विशेष ब्यूरो, पटना/मुजफ्फरपुर । 18 मई 2026
बिहार के लाखों अभिभावकों को चूसने वाले निजी स्कूलों के ‘लूट तंत्र’ पर सम्राट सरकार के शिक्षा विभाग ने अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा प्रहार किया है। शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. बी. राजेन्द्र द्वारा जारी एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आधिकारिक आदेश (ज्ञापांक संख्या: 08 / RTE 15-14 / 2026-661) ने राज्य के सभी प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर पूरी तरह से नकेल कस दी है।

सरकार ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि स्कूल कोई ‘मुनाफा कमाने की दुकान’ नहीं हैं, बल्कि यह एक समाज सेवा है। अगर किसी भी स्कूल ने अब नियमों का उल्लंघन किया, तो उसकी मान्यता सीधे रद्द कर दी जाएगी और भारी आर्थिक जुर्माना ठोंका जाएगा।
वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर खोलनी होगी ‘कुंडली‘
नए फरमान के मुताबिक, अब कोई भी प्राइवेट स्कूल गुप्त तरीके से या बीच सत्र में फीस नहीं बढ़ा सकेगा। सभी निजी स्कूलों को अपनी हर प्रकार की फीस का एक-एक विवरण स्कूल के नोटिस बोर्ड और अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक करना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने वाले स्कूलों को सरकार बख्शने के मूड में नहीं है।
‘नो प्रॉफिट, नो लॉस‘ पर चलेंगे स्कूल:
फीस बढ़ाने और दोबारा एडमिशन के नाम पर वसूली बंद: शिक्षा विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल ‘नो प्रॉफिट नो लॉस ‘ (न लाभ, न हानि) के सिद्धांत पर चलेंगे। सामान्यतः फीस में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी। यदि फीस बढ़ाना अनिवार्य है, तो वह ‘बिहार निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019’ के तहत तय सीमा के भीतर ही होगी। सबसे बड़ी राहत यह है कि अब री-एडमिशन (दोबारा नामांकन) के नाम पर कोई भी शुल्क नहीं लिया जा सकेगा।

फीस बकाया होने पर बच्चों को नहीं कर सकेंगे प्रताड़ित : अक्सर देखा जाता था कि फीस बाकी होने पर बच्चों को परीक्षा देने से रोक दिया जाता था या मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। सरकार ने इस पर सख्त रोक लगाते हुए कहा है कि किसी भी छात्र की फीस बकाया होने पर उसे क्लास करने, परीक्षा देने या रिजल्ट प्राप्त करने से वंचित नहीं किया जा सकता।
कॉपी-किताब और यूनिफॉर्म के ‘कमीशन खेल‘ पर ताला: स्कूल अब किसी खास दुकान, वेंडर या विशिष्ट ब्रांड से ही किताबें, कॉपियां या यूनिफॉर्म खरीदने के लिए अभिभावकों को मजबूर नहीं कर सकते। अभिभावक खुले बाजार से कहीं से भी सामान खरीदने के लिए पूरी तरह आजाद हैं।
स्कूलों को किताबों की सूची पहले ही नोटिस बोर्ड और वेबसाइट पर डालनी होगी । साथ ही, हर साल किताबों और ड्रेस का पैटर्न बदलने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। बहुत जरूरी होने पर ‘शिक्षक-अभिभावक संघ’ (PTA) की अनुमति लेनी होगी। निर्धारित सिलेबस से अलग कोई भी अतिरिक्त सामग्री खरीदने का दबाव नहीं बनाया जाएगा।

प्रकाशक का नाम और दाम बताना जरूरी; किताबों के ‘कमीशन-खेल’ पर पर कड़ा प्रहार!
निजी स्कूलों और चुनिंदा प्रकाशकों के बीच चलने वाले अरबों रुपये के ‘कमीशन-खेल’ को ध्वस्त करने के लिए शिक्षा विभाग ने अचूक चक्रव्यूह रचा है। नए नियमों के मुताबिक, स्कूलों को शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही किताबों की पूरी सूची अपने नोटिस बोर्ड और वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से अपलोड करनी होगी। इस सूची में सिर्फ किताबों के नाम नहीं, बल्कि उनके प्रकाशक का नाम, छपी हुई कीमत और उस पर मिलने वाली छूट का पूरा विवरण साफ-साफ दर्ज करना होगा, ताकि अभिभावक खुले बाजार में ठगे न जाएं। इसके साथ ही, हर साल मोटी कमाई के चक्कर में जानबूझकर किताबें बदलने के धंधे पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई है। अब स्कूल हर साल अपनी मर्जी से पाठ्यपुस्तकें नहीं बदल सकेंगे, जिससे अभिभावकों को हर साल नई और महंगी किताबें खरीदने के आर्थिक बोझ से बहुत बड़ी राहत मिलेगी।
वेबसाइट ‘बंद‘ रखने वाले संचालाक स्कूलों पर गिरेगी गाज!
बिहार के कई निजी स्कूलों ने कागजों पर दिखाने के लिए अपनी वेबसाइट तो बना रखी है, लेकिन हकीकत में वे सालों से बंद पड़ी हैं या ‘अंडर मेंटेनेंस’ का बोर्ड टांगे रखती हैं। इस चालाकी के कारण अभिभावकों को कभी पता ही नहीं चल पाता कि स्कूल किस मद में क्या और कितनी फीस वसूल रहा है। स्कूल प्रशासन जानबूझकर डिजिटल पारदर्शिता से बचता रहा है और जानकारी अपडेट नहीं करता। लेकिन अब शिक्षा विभाग के इस नए आदेश के बाद ऐसी हेराफेरी करने वाले स्कूलों की खैर नहीं है। अगर सरकार के निर्देश के बाद भी किसी स्कूल की वेबसाइट चालू नहीं पाई गई या उस पर फीस का पूरा ब्यौरा अपडेट नहीं मिला, तो इसे आदेश की खुली अवहेलना माना जाएगा। सूत्रों की मानें तो ऐसे ‘वेबसाइट बंद’ रखने वाले चालाक स्कूलों की मान्यता सबसे पहले रद्द करने और उन पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाने की तैयारी कर ली गई है।

डिजिटल कुंडली से आएगी पारदर्शिता: अब हर बुनियादी जानकारी होगी पब्लिक!
शिक्षा विभाग के इस क्रांतिकारी आदेश का सीधा और साफ मतलब यह है कि अब कोई भी निजी स्कूल अपनी मनमानी को परदे के पीछे नहीं छिपा सकेगा। स्कूलों को अपनी मान्यता का स्टेटस, फीस का पाई-पाई का विवरण, लागू किताबों की सूची और यहाँ तक कि यूनिफॉर्म (ड्रेस) का मॉडल जैसी तमाम बुनियादी जानकारियां पूरी तरह सार्वजनिक करनी होंगी। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि यह सब सिर्फ स्कूल के नोटिस बोर्ड पर चिपका देने भर से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसे हर हाल में लाइव वेबसाइट पर भी अपलोड करना होगा। इस कदम से आने वाले समय में राज्य के हर छोटे-बड़े निजी स्कूल के लिए एक एक्टिव और अपडेटेड वेबसाइट रखना कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाएगा। जब स्कूल की पूरी ‘डिजिटल कुंडली’ इंटरनेट पर हर किसी के सामने होगी, तो व्यवस्था में शत-प्रतिशत पारदर्शिता आ जाएगी और अभिभावकों को दफ्तरों के चक्कर काटे बिना, एक क्लिक पर सारी सच्चाई पता चल जाएगी।
नियम तोड़ा तो कमिश्नर के यहाँ होगी सीधी शिकायत
अगर कोई स्कूल सरकार के इस आदेश को ठेंगे पर रखता है, मनमानी फीस वसूलता है या किसी खास दुकान से सामान लेने का दबाव बनाता है, तो अभिभावक चुप न बैठें। अभिभावकों को यह अधिकार दिया गया है कि वे ऐसी किसी भी मनमानी के खिलाफ प्रमंडलीय आयुक्त (Divisional Commissioner) कार्यालय में अपनी लिखित शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जहाँ त्वरित कार्रवाई की जाएगी।

कानूनी शिकंजे में स्कूल प्रशासन (तकनीकी जानकारी):
यह ऐतिहासिक आदेश राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट 2009, बिहार राज्य के बच्चों की मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा नियमावली 2011, और बिहार निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम 2019 के कानूनी प्रावधानों के तहत जारी किया गया है। शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. बी. राजेन्द्र के हस्ताक्षर से जारी यह आदेश 12 मई 2026 से ही पूरे सूबे में प्रभावी हो चुका है। विभाग ने सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को आदेश का सख्ती से पालन कराने और औचक निरीक्षण करने का निर्देश दिया है।
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