Saturday, March 7, 2026
No menu items!

सियासी वादों की भेंट चढ़ी समस्तीपुर चीनी मिल, हक की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतरे लोग

0

1917 में अंग्रेजों ने रखी थी नींव, 1995 से बंद पड़ी है मिल; जिला विकास मंच ने नागरिक मार्च निकाल सरकार को घेरा

समस्तीपुर | 22 फरवरी, 2026 बिहार के औद्योगिक मानचित्र पर कभी अपनी चमक बिखेरने वाली समस्तीपुर चीनी मिल को पुनर्जीवित करने की मांग अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। रविवार को जिला विकास मंच के बैनर तले शहर की सड़कों पर,  कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने सरकारी बस स्टैंड से चीनी मिल चौक तक ‘नागरिक मार्च’ निकालकर शासन-प्रशासन की चुप्पी पर कड़ा प्रहार किया।

हुंकार: “हमारी जमीन, हमारे संसाधन, फिर मिल क्यों बंद?”

मार्च के दौरान “बंद चीनी मिल को चालू करो” और “समस्तीपुर का हक वापस दो” जैसे नारों से पूरा शहर गूंज उठा। सभा की अध्यक्षता करते हुए मंच के संयोजक शत्रुघ्न राय पंजी ने कहा कि यह केवल एक मिल नहीं, बल्कि समस्तीपुर की अस्मिता और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही मिल के पहिये नहीं घूमे, तो यह आंदोलन और उग्र होगा।

हजारों चूल्हों की बुझ गई आग

सभा को संबोधित करते हुए सेवानिवृत्त शिक्षक और मंच के वरिष्ठ सदस्य शंकर साह ने मिल के गौरवशाली इतिहास और वर्तमान की बदहाली का खाका खींचा। उन्होंने कहा:

“1917 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित यह मिल 5,000 से अधिक परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया थी। आज भी यहाँ चीनी मिल के पास पर्याप्त जमीन है, बिजली और रेल का सुलभ नेटवर्क है और मेहनती श्रमिक उपलब्ध हैं। सरकार की इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह विशाल संपत्ति खंडहर में तब्दील हो रही है।”

राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की गोलबंदी

आंदोलन को धार देते हुए राजद नेता राकेश ठाकुर और भाकपा माले के सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने साझा अपील की। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि बुद्धिजीवी, छात्र, किसान, मजदूर और व्यवसायी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक पहुँचाएं। वक्ताओं ने सवाल उठाया कि जब बुनियादी ढांचा तैयार है, तो नई इकाइयों के नाम पर करोड़ों खर्च करने वाली सरकार इस चालू योग्य मिल की अनदेखी क्यों कर रही है?

31 सालों का लंबा इंतजार :विदित हो कि समस्तीपुर चीनी मिल 1995 में बंद कर दी गई थी। तीन दशक बीत जाने के बावजूद, राजनीतिक वादों के अलावा धरातल पर कुछ नहीं बदला। मिल चौक पर हुई सभा में उपस्थित वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि अब वे कोरे आश्वासनों से मानने वाले नहीं हैं।


एक नजर में समस्तीपुर चीनी मिलका दर्द:

  • स्थापना: 1917 (अंग्रेजी शासनकाल)।
  • अस्तित्व का संकट: 1995 से मिल के पहिये थमे।
  • ताकत: पर्याप्त भूमि, चौतरफा आवागमन, रेल साइडिंग और बिजली की उपलब्धता।
  • प्रभाव: 5000 परिवारों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार छीन गया।

सभा में प्रमुख उपस्थिति: सभा में मुख्य रूप से शंकर साह, सुरेंद्र प्रसाद सिंह, राकेश ठाकुर, उपेंद्र राय, राम विनोद पासवान, पिंकू पासवान, संतोष कुमार निराला, विश्वनाथ सिंह हजारी, शाहीद हुसैन, सुशील कुमार राय, रवि आनंद, जितेंद्र कुमार, जगलाल राय, शंभू राय और मनोज राय सहित सैकड़ों कार्यकर्ता मौजूद रहे।

सकरा में ‘यमराज’ के नुमाइंदे : बोर्ड पर MBBS डॉक्टर, केबिन में यूट्यूब देखकर ऑपरेशन करते ‘मुन्नाभाई ,’किराए’ के ऐसे डॉक्टर जो सकरा में कभी दिखते नहीं ,

0

नर्सिंग होम के फर्जीवाड़े और झोलाछाप डॉक्टरों की भीड़, कैसे जाने किसी डॉक्टर या अस्पताल की असलियत ।

[विशेष रिपोर्ट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’ ]

सकरा, मुजफ्फरपुर, बिहार के मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत सकरा प्रखंड इन दिनों ‘स्वास्थ्य सेवा’ के नाम पर मौत की मंडी बन चुका है। यहाँ की गलियों में कुकुरमुत्ते की तरह उगे अवैध नर्सिंग होम आम आदमी की लाचारी और गरीबी का फायदा उठाकर अपना साम्राज्य खड़ा कर चुके हैं। कहने को तो ये जीवन बचाने के केंद्र हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यहाँ ‘यमराज’ के नुमाइंदे सफेद कोट पहनकर लोगों की जिंदगी से खूनी जुआ खेल रहे हैं।

बोर्ड पर ‘ एम.बी.बी.एस ‘और  केबिन में ‘मुन्नाभाई ‘

सकरा के मुख्य सड़कों से लेकर भीतरी इलाकों तक नजर दौड़ाएं, तो आपको हर दो कदम पर एक आलीशान बोर्ड दिखेगा। इन बोर्डों पर शहर के सबसे बड़े एम.बी.बी.एस (MBBS), एम.एस (MS) और एम.डी (MD) डॉक्टरों के नाम लिखे होते हैं। उनके बैठने का समय भी तय होता है। लेकिन यह महज एक छलावा है। जांच में यह कड़वी सच्चाई सामने आई है कि बोर्ड पर लिखे ये बड़े नाम सिर्फ ‘किराए’ के होते हैं।

अस्पताल के केबिन के अंदर जब मरीज पहुंचता है, तो उसका सामना उन ‘मुन्नाभाइयों’ से होता है जिनके पास डॉक्टरी की कोई वैध डिग्री नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि ये कथित डॉक्टर जटिल से जटिल ऑपरेशन करने के लिए यूट्यूब (YouTube) वीडियो का सहारा ले रहे हैं। पेट का ऑपरेशन हो या सिजेरियन डिलीवरी, ये फर्जी डॉक्टर मोबाइल स्क्रीन पर वीडियो चलाकर कैंची और चाकू चलाते हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि चिकित्‍सा जगत का विभत्‍स रूप है । हद तो तब हो जाती है जब पुर्जा पर दवा लिखते हैं और इसके लिए गुगल का सहारा लेने लगते हैं ।


असली डॉक्टर खाली हाथ, ‘नकली’ मालामाल: डिग्री की गरिमा पर भारी पड़ता दलालों का ‘रैकेट’

सकरा नगर पंचायत और इसके इर्द-गिर्द के इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा इतना बदसूरत हो चुका है कि यहाँ योग्यता नहीं, बल्कि ‘दलाली’ तय करती है कि मरीज कहाँ जाएगा। जो चिकित्सक तीन से पांच साल तक हाड़-तोड़ मेहनत कर MBBS, MS और MD जैसी कठिन डिग्रियां हासिल करते हैं, वे आज मरीजों का इंतज़ार करने को मजबूर हैं। वहीं दूसरी ओर, सिर्फ बाहरी ताम-झाम और दिखावे वाले फर्जी नर्सिंग होम का पूरा एक सिंडिकेट है, जो दलालों के दम पर असली चिकित्सकों का हक मार रहा है। एक योग्य डॉक्टर अपनी पूरी ऊर्जा और समय मरीज को सही इलाज देने और अपनी योग्यता सिद्ध करने में खपा देता है, जबकि झोलाछाप डॉक्टरों का रैकेट ‘मरीज सेटिंग’ में अपनी सारी ताकत लगाता है। विडंबना देखिए कि योग्य चिकित्सकों के बड़े-बड़े संगठन भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठे हैं। जब तक विशेषज्ञ डॉक्टर और उनके संगठन इस फर्जीवाड़े के खिलाफ मुखर नहीं होंगे, तब तक योग्यता और अनुभव की हार होती रहेगी और चकाचौंध वाले ‘फर्जी नर्सिंग होम’ मासूम जिंदगियों को निगलते रहेंगे।


डिग्री ‘बेनामी’ यूनिवर्सिटी की, पर पुर्जे पर शान से सजता है ‘MBBS’

सकरा के इन अवैध नर्सिंग होम में फर्जीवाड़े की पराकाष्ठा तो देखिए, यहाँ इलाज कर रहे कथित डॉक्टरों के पास डिग्रियां ऐसी ‘बेनामी’ यूनिवर्सिटियों की हैं जिनका न तो कोई वजूद है और न ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) से कोई मान्यता। ग्रामीण इलाकों के भोले-भाले मरीजों को ठगने के लिए ये झोलाछाप अपने लेटरपैड और पुर्जों पर बड़े ही रसूख के साथ ‘MBBS’ लिखते हैं। पुर्जे पर छपे इन चार अक्षरों के पीछे का सच यह है कि इन्हें शरीर के अंगों की सही बनावट तक का ज्ञान नहीं है, लेकिन शान ऐसी कि मानो एम्स (AIIMS) से पढ़कर आए हों। बिना किसी वैध पंजीकरण के एमबीबीएस लिखना न केवल एक कानूनी अपराध है, बल्कि उन मरीजों के साथ विश्वासघात भी है जो इन अक्षरों को देखकर अपनी जिंदगी इन ‘नीम-हकीमों’ के हवाले कर देते हैं।


ग्रामीण चिकित्सक भी बने ‘स्वयंभू’ डॉक्टर: सादे झोले से स्टेथोस्कोप तक का सफर

कभी गांवों में प्राथमिक उपचार और मरहम-पट्टी तक सीमित रहने वाले ‘ग्रामीण चिकित्सक’ (आरएमपी) अब सकरा में खुद को विशेषज्ञ डॉक्टर घोषित कर चुके हैं। अनुभव के नाम पर इनके पास सिर्फ कुछ वर्षों की दवाइयों की जानकारी है, लेकिन रसूख ऐसा कि ये भी अब धड़ल्ले से अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगा रहे हैं और पुर्जों पर बेझिझक MBBS अंकित कर रहे हैं। ग्रामीण चिकित्सा के नाम पर ट्रेनिंग लेने वाले ये लोग अब जटिल बीमारियों का न केवल परामर्श दे रहे हैं, बल्कि बिना किसी हिचकिचाहट के एंटीबायोटिक दवाओं का ओवरडोज और जानलेवा इंजेक्शन तक ठोक रहे हैं। प्रशासन की ढील का ही नतीजा है कि एक साधारण ग्रामीण चिकित्सक आज खुद को सर्जन समझकर मरीजों के जीवन के साथ ‘एक्सपेरिमेंट’ कर रहा है।


नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाने के कानूनी मानक एवं नियम

भारत और विशेषकर बिहार में ‘डॉक्टर’ शब्द का इस्तेमाल करने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान हैं, जिनका उल्लंघन करना एक दंडनीय अपराध है। भारत में National Medical Commission (NMC) और Supreme Court के दिशा-निर्देशों के अनुसार, केवल वही व्यक्ति अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ (Dr.) लिख सकते हैं जिन्होंने मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से MBBS, BDS (डेंटल), या आयुष (BAMS-आयुर्वेद, BHMS-होम्योपैथी, BUMS-यूनानी) की डिग्री प्राप्त की हो और जिनका पंजीकरण संबंधित स्टेट मेडिकल काउंसिल या नेशनल रजिस्टर में हो।

अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाने का कानूनी अधिकार किसे नहीं

बिहार में ‘बिहार क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के तहत यह स्पष्ट है कि यदि किसी व्यक्ति के पास उपरोक्‍त इन वैध डिग्रियों में से कोई एक नहीं है, तो वह चिकित्सा कार्य नहीं कर सकता और न ही डॉक्टर की पदवी का उपयोग कर सकता है। विशेष रूप से, फार्मासिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, ऑप्टोमेट्रिस्ट या पैरामेडिकल स्टाफ (जैसे लैब टेक्नीशियन) को अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाने का कानूनी अधिकार नहीं है, वे केवल अपनी विशिष्ट पदवी (जैसे PT या Pharma) का उपयोग कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, पीएचडी (Ph.D) धारक अपने शैक्षणिक क्षेत्र में ‘डॉक्टर’ लगा सकते हैं, लेकिन वे किसी भी स्थिति में मरीजों का इलाज या दवाओं का पर्चा (Prescription) नहीं लिख सकते। यदि कोई झोलाछाप या बिना वैध डिग्री वाला व्यक्ति डॉक्टर शब्द का प्रयोग करता है, तो वह ‘धोखाधड़ी’ और ‘मेडिकल इम्पर्सनेशन’ (छद्म भेष) के तहत जेल जाने का पात्र है


दलालों का जाल और जनता की अज्ञानता: मौत की राह दिखाते ‘अपने’ ही रक्षक

सकरा की इस खौफनाक हकीकत का सबसे दुखद पहलू मरीजों की अज्ञानता और उन पर हावी ‘दलाल संस्कृति’ है। ग्रामीण इलाकों में आज भी जब कोई बीमार पड़ता है, तो वह अस्पताल जाने के बजाय सबसे पहले अपने पास के उसी ग्रामीण चिकित्सक की शरण में जाता है, जिसे वह अपना मसीहा समझता है। ये झोलाछाप डॉक्टर अपनी कमाई के लालच में मरीज के घर पर ही ‘एक्सपेरिमेंटल’ इलाज शुरू कर देते हैं। जब गलत दवाइयों और नीम-हकीमी से बात बिगड़ने लगती है और मरीज मौत के मुहाने पर खड़ा होता है, तब ये कथित डॉक्टर उसे डराकर और इससे भी बेहतर ईलाज के नाम पर सीधे अपने कमीशन वाले नर्सिंग होम में ‘मूव’ कर देते हैं।


सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ और बेहतर

विडंबना देखिए कि आज सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ और बेहतर हुई है, जहाँ मुफ्त दवाइयों से लेकर विशेषज्ञ डॉक्टरों की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन, इन दलालों और झोलाछापों ने सरकारी तंत्र के खिलाफ ऐसा भ्रम फैला रखा है कि गरीब जनता अपनी गाढ़ी कमाई और जान, इन अवैध ‘कत्लगाहों’ में लुटाने को मजबूर है। लोगों को यह समझना होगा कि घर पर इलाज करने वाला हर व्यक्ति डॉक्टर नहीं होता, और समय रहते सरकारी अस्पताल न पहुंचना अपनी मौत के वारंट पर खुद दस्तखत करने जैसा है।


सरकारी डॉक्टरों की ‘मौन’ सहमति

सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि कुछ नर्सिंग होम के बोर्ड पर सरकारी डॉक्टरों के नाम बाकायदा अंकित हैं। नियम कहते हैं कि सरकारी सेवा में रहते हुए प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए कड़े मानक हैं, लेकिन यहाँ तो सरकारी डॉक्टर इन अवैध केंद्रों के ‘ब्रांड एंबेसडर’ बने हुए हैं। क्या स्वास्थ्य विभाग को यह नहीं दिखता कि उनके कर्मचारी इन अवैध दुकानों को संरक्षण दे रहे हैं? यह साठगांठ इतनी गहरी है कि समय-समय पर होने वाली ‘छापेमारी’ की सूचना इन केंद्रों तक पहले ही पहुंच जाती है।


इलाज करते करते  खोला  नर्स और पैरामेडिकल के जाली सर्टिफिकेट देने वाला संस्‍थान

हैरानी की बात यह है कि इन फर्जी डॉक्टरों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि ये अब केवल गलत इलाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दो-चार कमरों की दुकानों से ‘नर्सिंग और पैरामेडिकल कॉलेज’ चलाने का दावा कर रहे हैं। सुजावलपुर से स्टेशन रोड जाने वाली  मुख्य सड़क पर खुलेआम ऐसे दो संस्थान और सबहा रोड में ब्लॉक गेट से महज दो सौ मीटर दक्षिण स्थित ये केंद्र, बाहरी संस्थानों से ‘अफिलिएशन’ का झांसा देकर भोले-भाले युवकों का भविष्य बर्बाद कर रहा  हैं। हद तो तब हो गई जब सकरा में एक मॉल के सामने दवा बेचते-बेचते एक कथित डॉक्टर,  झारखंड के एक नर्सिंग कॉलेज के नाम पर फर्जी डिग्री बेचकर लाखों का वारा-न्यारा कर दिया।

सकरा में खुलेआम बिक रहे हैं नर्स और पैरामेडिकल के जाली सर्टिफिकेट

सूत्रों की माने तो, झारखंड का यह तथाकथित कॉलेज, और दवा दुकान से संचालित होने वाले ये कॉलेज एक सुव्यवस्थित ‘रैकेट’ की तरह काम कर रहा है, जिसका मिलते जुलते नाम वाला वेबसाइट  है, जो समय समय पर खुलता है । इस खेल का असली मास्टरमाइंड पटना में अपना सेंटर जमाए बैठा है,हर जगह अपना आदमी सेटिंग करके रखे हुए है, जहाँ से वो लोगों में विश्‍वास जमाने कि लिए, सिर्फ नाम का परीक्षा संचालित कर शातिराना ढंग से डिग्रियां बांट रहा  हैं। फर्जी परीक्षा संचालित कर डिग्री देने का ट्रिक लोगों में विश्‍वास बढ़ाने में कामयाब है, डिग्री लेने वालों को भी लगता है कि हमने परीक्षा देकर डिग्री लिया है,किताब खोलकर लिखने और बैक सेशन की डिग्री की व्‍यवस्‍था विशेष खर्च  पर स्‍पेशल केटोगरी में की जाती है, बैक सेशन की डिग्री डील फाइनल होते ही परीक्षा की खनापूर्ति करके तीन चार महीने में  मुहैया करा दी जाती है, शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर चल रही यह ‘सर्टिफिकेट की मंडी’ न केवल युवाओं को गुमराह कर रही है, बल्कि भविष्य में ऐसे अयोग्य लोगों को तैयार कर रही है जो फिर से समाज की जान के दुश्मन बनेंगे। प्रशासन की चुप्पी यह सवाल खड़ा करती है कि मुख्य सड़क पर सजे इन ‘डिग्री के शोरूम’ पर आखिर कार्रवाई कब होगी?


दुकान की तरह सजे नर्सिंग होम के बोर्ड, ‘किराए’ के फर्जी डॉक्टर नर्सिंग होम की बने हैं शान

यहां के  गली-मोहल्लों में कुकुरमुत्ते की तरह उगे इन अवैध नर्सिंग होम की कार्यप्रणाली बेहद शातिराना है। इनके बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में MBBS, MS, MD जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों के बोर्ड लगे होते हैं। बोर्ड पर उनके बैठने का समय भी  लिखा है, लेकिन हकीकत यह है कि वे डॉक्टर वहां कभी आते ही नहीं।

  • किराए के नाम: कई बड़े सरकारी और निजी डॉक्टरों के नाम यहां  ‘किराए’ पर इस्तेमाल हो रहे हैं। बदले में नर्सिंग होम  के द्वारा इन डॉक्टरों को नाम इस्‍तेमाल करने के एवज में नियत राशि प्रत्‍येक महीना उपलब्‍ध करा दिया जाता है, मरीज की स्थिति चिंताजनक होने पर अलग से स्‍पेशल फीस देकर  ‘किराए’ के ऐसे डॉक्‍टर से सेवा लिया जाता है ।
  • यूट्यूब से ‘सर्जरी’: बिना किसी मेडिकल प्रशिक्षण के, झोलाछाप डॉक्टर इंटरनेट पर वीडियो देखकर या फिर ‘किराए’  के डाक्‍टरों  के गाइड लाइन में जटिल ऑपरेशन कर रहे हैं।
  • बेनामी डिग्रियां: इन केंद्रों पर बैठे लोगों के पास ऐसी यूनिवर्सिटीज की डिग्रियां हैं जिनका अस्तित्व ही नहीं है,  या फिर इनके डिग्री को  ‘National Medical Commission’ (NMC) या ‘Bihar Council of Medical Registration’ (BCMR) मान्‍यता ही नहीं देता है।

सड़कों पर विज्ञापन और गलियों में दलाल: कमीशन के खेल में ‘नीलाम’ होती जिंदगी

इन फर्जी डॉक्टरों और अवैध नर्सिंग होम के बीच अब मरीजों को ‘लूटने’ की होड़ (कंपटीशन) मची है। आलम यह है कि पेड़ों, बिजली के खंभों और दीवारों पर इनके ‘सस्ते इलाज’ के रेट लिस्ट चिपके दिख जाते हैं, जो किसी अस्पताल के कम और किसी सेल के विज्ञापन ज्यादा लगते हैं। इस काले धंधे को चलाने के लिए बाकायदा दलालों का एक अंडरग्राउंड सिंडिकेट काम कर रहा है। थ्री-व्हीलर और फोर-व्हीलर चालक इनके ‘गुप्त एजेंट’ हैं, जो स्टेशन या बस स्टैंड से उतरते ही भोले-भाले मरीजों को फुसलाकर इन ‘मौत के अड्डों’ तक पहुँचाते हैं। हद तो तब है जब गाँवों में अवैध दवा बेचने वाले और कुछ ग्रामीण चिकित्सक भी चंद रुपयों के कमीशन के लालच में मरीजों का सौदा कर रहे हैं। मरीज की बीमारी से ज्यादा इन दलालों की नजर उनकी जेब पर होती है। सेटिंग ऐसी कि एम्बुलेंस से लेकर ऑटो तक, हर चक्का सीधे उन्हीं नर्सिंग होम के गेट पर जाकर रुकता है जहाँ कमीशन का रेट पहले से तय होता है।


सकरा किडनी कांड — एक जख्म जो अभी भरा नहीं

मुजफ्फरपुर के सकरा का नाम सुनते ही रूह कांप जाती है। 2022 में बाजी राउत की रहने वाली सुनीता देवी गर्भाशय के इलाज के लिए ‘शुभकांत क्लीनिक’ गई थीं। वहां के कथित डॉक्टर पवन कुमार ने ऑपरेशन के बहाने सुनीता की दोनों किडनियां निकाल लीं। दो साल तक न्याय की गुहार और डायलिसिस के दर्दनाक सफर के बाद 21 अक्टूबर 2024 को सुनीता की मौत हो गई।

आज भी स्थिति जस की तस है। प्रशासन ने कुछ दिन शोर मचाया, क्लिनिक सील किए, लेकिन मामला ठंडा पड़ते ही वही खेल फिर शुरू हो गया। आज भी सकरा और आसपास के इलाकों में मानक विहीन नर्सिंग होम बिना ‘फायर एनओसी’, बिना ‘प्रदूषण बोर्ड सर्टिफिकेट’ और बिना पर्याप्त बेड के धड़ल्ले से चल रहे हैं। क्या प्रशासन एक और ‘सुनीता’ की मौत का इंतजार कर रहा है?


शोषण का व्यवस्थित चक्रव्यूह

इन अस्पतालों का निशाना बनते हैं गांवों के सीधे-साधे और अनपढ़ गरीब लोग। यहाँ का अर्थशास्त्र पूरी तरह से ‘नकद’ पर आधारित है।

  • अवैध उगाही: छोटी सी बीमारी के लिए भी हजारों रुपये की फीस वसूली जाती है।
  • बिना रसीद का धंधा: इलाज के नाम पर मोटी रकम तो ली जाती है, लेकिन मरीज के परिजनों को फीस की रसीद नहीं दी जाती।
  • साक्ष्य मिटाना: रसीद न देने के पीछे का मुख्य उद्देश्य यह है कि यदि ऑपरेशन के दौरान मरीज की मौत हो जाए, तो पीड़ित पक्ष के पास कोर्ट में पेश करने के लिए कोई कानूनी सबूत न रहे।

नर्सिंग होम के फर्जीवाड़े और झोलाछाप डॉक्टरों के आतंक के बीच, एक जागरूक नागरिक के तौर पर यह जानना बेहद जरूरी है कि किसी डॉक्टर या अस्पताल की असलियत कैसे जांची जाए। बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं की पारदर्शिता के लिए सरकार ने कई ऑनलाइन पोर्टल बना रखे हैं। आप किसी भी संस्थान या डॉक्टर की वैधता की जांच कैसे कर सकते हैं और शिकायत कहाँ दर्ज कर सकते हैं,


नर्सिंग होम/अस्पताल का निबंधन (Registration) कैसे जांचें?

बिहार में किसी भी अस्पताल या क्लिनिक को Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act के तहत निबंधित होना अनिवार्य है।

  • पोर्टल: State Health Society, Bihar या बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग की आधिकारिक वेबसाइट।
  • जांच का तरीका: प्रत्येक निबंधित नर्सिंग होम को अपने रिसेप्शन पर ‘Clinical Establishment Act Certificate’ और ‘Pollution Control Board’ का अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) टांगना अनिवार्य है।
  • ऑनलाइन: आप बिहार सरकार के ‘Clinical Establishment Registry’ पोर्टल पर जाकर जिलेवार निबंधित अस्पतालों की सूची देख सकते हैं। यदि अस्पताल का नाम सूची में नहीं है, तो वह अवैध है।

कैसे पहचानें कि आपका डॉक्टर ‘असली’ है या ‘मुन्नाभाई’? डॉक्टरों की डिग्री की जांच कैसे करें?

यदि कोई डॉक्टर MBBS, MD या MS होने का दावा करता है, तो उसे ‘National Medical Commission’ (NMC) या ‘Bihar Council of Medical Registration’ (BCMR) के साथ रजिस्टर्ड होना चाहिए।

  • ऑनलाइन पोर्टल: NMC Search Doctor
  • प्रक्रिया: 1. वेबसाइट पर ‘Indian Medical Register’ सेक्शन में जाएं। 2. डॉक्टर का नाम या उनका ‘Registration Number’ डालें। 3. यदि डॉक्टर असली है, तो उसकी फोटो, डिग्री और यूनिवर्सिटी का नाम सामने आ जाएगा। 4. चेतावनी: यदि डॉक्टर अपना रजिस्ट्रेशन नंबर बताने से कतराए या पुर्जे पर रजिस्ट्रेशन नंबर न लिखा हो, तो समझ लें कि मामला संदिग्ध है।

दवा दुकान (Pharmacy) का निबंधन कैसे जांचें?

दवा दुकान चलाने के लिए ‘Drug License’ (DL) होना अनिवार्य है, जिसे एक रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट ही चला सकता है।

  • जांच का तरीका: दुकान के बोर्ड पर या काउंटर के पीछे Drug License Number अनिवार्य रूप से लिखा होना चाहिए।
  • ऑनलाइन जांच: आप बिहार सरकार के ‘Drug Control Administration’ की वेबसाइट पर जाकर लाइसेंस नंबर डालकर दुकानदार की वैधता देख सकते हैं।
  • महत्वपूर्ण: बिना पक्की रसीद (GST Bill) के दवा न खरीदें। फर्जी दुकानदार रसीद देने से कतराते हैं।

पैथोलॉजी लैब और डायग्नोस्टिक सेंटरों की वैधता को लेकर भी सकरा समेत कई इलाकों में भारी भ्रम की स्थिति है।

जांच केंद्रों की योग्यता और वैधानिकता: क्या लैब संचालकडॉक्टर बन सकते हैं?

नर्सिंग होम के साथ-साथ गली-कूचों में खुले पैथोलॉजी और डायग्नोस्टिक सेंटरों (रक्त, पेशाब, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे) की स्थिति भी चिंताजनक है। नियमानुसार, एक पैथोलॉजी लैब चलाने के लिए संचालक के पास DMLT या BMLT की डिग्री होनी चाहिए, लेकिन रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने का अधिकार केवल एक रजिस्टर्ड पैथोलॉजिस्ट (MD Pathology) के पास ही होता है। इसी तरह, अल्ट्रासाउंड केंद्र के लिए रेडियोलॉजिस्ट का होना अनिवार्य है। इन केंद्रों के निबंधन की जांच आप जिला स्वास्थ्य समिति या क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के पोर्टल से कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच केंद्र चलाने वाला कोई भी व्यक्ति (चाहे वह कितना भी अनुभवी क्यों न हो) मरीज को दवाइयां नहीं लिख सकता और न ही अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगा सकता है। यदि कोई लैब संचालक मरीज का इलाज कर रहा है या दवा लिख रहा है, तो वह सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन कर रहा है। जनता को यह समझना होगा कि लैब का काम केवल रिपोर्ट देना है, न कि इलाज करना। रिपोर्ट पर हमेशा देखें कि किसी योग्य डॉक्टर के डिजिटल या असली हस्ताक्षर हैं या नहीं, क्योंकि बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट केवल कागज का एक टुकड़ा है।


शिकायत कहाँ करें?

यदि आपको पता चले कि कोई डॉक्टर फर्जी है या अस्पताल अवैध तरीके से चल रहा है, तो आप नीचे दिए गए स्थानों पर लिखित या ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं:

  1. सिविल सर्जन कार्यालय : जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (Civil Surgeon) को लिखित शिकायत दें। सकरा के मामले में मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन को पत्र लिखें।
  2. बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम (PGRO): आप प्रखंड या जिला स्तर पर लोक शिकायत पदाधिकारी के पास अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। इसकी ऑनलाइन वेबसाइट है: lokshikayat.bihar.gov.in
  3. मुख्यमंत्री जनता दरबार/Portal: बिहार सरकार के ‘Samadhan’ पोर्टल के माध्यम से सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को शिकायत भेजें।
  4. राज्य स्वास्थ्य समिति (State Health Society): आप इनके हेल्पलाइन नंबर 104 (Health Helpline) पर फोन करके भी जानकारी दे सकते हैं।
  5. पुलिस प्रशासन: यदि किसी फर्जी डॉक्टर के कारण जान-माल का नुकसान हुआ है, तो तुरंत संबंधित थाने में धोखाधड़ी और हत्या का प्रयास के धारा के तहत FIR दर्ज कराएं।

जनता की सावधानी और जानकारी ही बचाव का सबसे बड़ा तरीका – 

  • डॉक्टर के पुर्जे पर Registration Number जरूर देखें।
  • किसी भी सर्जरी से पहले अस्पताल का निबंधन प्रमाण पत्र मांगने का हक मरीज को है।
  • ग्रामीण चिकित्सकों (RMP) से सिर्फ प्राथमिक उपचार लें, जटिल बीमारी के लिए हमेशा जिला अस्पताल या मान्यता प्राप्त अस्पताल जाएं।
  • पक्की रसीद: इलाज या दवा का पैसा देने के बाद रसीद जरूर लें। यह आपके पास सबसे बड़ा कानूनी सबूत है।

याद रखें: ग्रामीण चिकित्सक (झोलाछाप) केवल प्राथमिक उपचार के लिए हैं। पेट चीरने वाला ऑपरेशन या सिजेरियन डिलीवरी के लिए हमेशा सरकारी अस्पताल या निबंधित स्पेशियलिटी अस्पताल ही जाएं। आपकी थोड़ी सी अज्ञानता जानलेवा साबित हो सकती है।

निजी अस्पतालों में भी लागू हो अनिवार्य ‘डॉक्टर ड्यूटी रोस्टर’ प्रणाली

जनता की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता लाने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार निजी नर्सिंग होम के लिए कड़े नियम निर्धारित करे। जिस प्रकार सरकारी अस्पतालों में वार्ड और ओपीडी के बाहर एक स्पष्ट ‘रोस्टर चार्ट’ लगा होता है, जिसमें ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक का नाम, उनकी विशेषज्ञता और समय अंकित होता है, ठीक उसी तर्ज पर सभी निजी नर्सिंग होम और क्लीनिकों के मुख्य द्वार पर ‘अनिवार्य चिकित्सक रोस्टर चार्ट’ प्रदर्शित करना कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस चार्ट में केवल उन्हीं डॉक्टरों के नाम हों जो उस समय वास्तव में वहां मौजूद रहकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इससे न केवल बड़े डॉक्टरों के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी और ‘यूट्यूब डॉक्टरों’ के फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी, बल्कि प्रशासन के लिए भी आकस्मिक जांच के दौरान यह पता लगाना आसान होगा कि बोर्ड पर अंकित डॉक्टर वास्तव में मरीज का इलाज कर रहा है या उसकी आड़ में कोई अयोग्य व्यक्ति जान से खिलवाड़ कर रहा है। सरकार को चाहिए कि बिना इस पारदर्शी रोस्टर के संचालित होने वाले नर्सिंग होम पर तत्काल तालाबंदी और भारी जुर्माने का प्रावधान करे।

प्रशासन की ‘खामोशी’ पर चुभते हैं ये सवाल

सकरा की जनता प्रशासन से इन सवालों के जवाब मांगता है:

कमीशन का खेल: क्या स्वास्थ्य विभाग के निचले अधिकारियों और इन अवैध नर्सिंग होम संचालकों के बीच कोई ‘महीना’ (रिश्वत) तय है? यदि नहीं, तो बिना रजिस्ट्रेशन के ये अस्पताल सालों से कैसे चल रहे हैं?

कागजी छापेमारी: जब भी छापेमारी होती है, तो क्लिनिक संचालक पहले ही फरार क्यों हो जाते हैं? विभाग के अंदर वह ‘विभीषण’ कौन है जो इन यमराज के नुमाइंदों को सूचना लीक करता है?

सरकारी डॉक्टरों का दोहरा चरित्र: जो सरकारी डॉक्टर इन प्राइवेट बोर्डों पर अपना नाम चमका रहे हैं, क्या उनके लाइसेंस रद्द करने की हिम्मत जिला प्रशासन जुटा पाएगा?

किडनी कांड से क्या सीखा?: उस कांड के बाद कितने क्लिनिकों का ‘डेथ ऑडिट’ हुआ? क्या प्रशासन सिर्फ किसी नई लाश के गिरने का इंतज़ार कर रहा है ताकि फिर से दो दिन की कागजी खानापूर्ति की जा सके?


यह रिपोर्ट महज कागज के काले अक्षर नहीं हैं, बल्कि सकरा की उस सिसकती स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना है जो चंद रुपयों के लिए किसी की कोख उजाड़ रही है तो किसी का सुहाग छीन रही है। अब फैसला प्रशासन को करना है—वे जनता के रक्षक बनेंगे या इन ‘मुन्नाभाइयों’ के संरक्षक?

बाल विवाह मुक्त बिहार के लिए सामाजिक आंदोलन और जन जागरण की जरूरत: अप्सरा मिश्रा

0

राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष ने जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के बाल विवाह मुक्ति अभियानकी सराहना की

समस्तीपुर | 20 फरवरी, 2026 जिला परिसदन, समस्तीपुर में बिहार राज्य महिला आयोग द्वारा आयोजित संवाद से सरोकार तक कार्यक्रम में सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण पर गंभीर चर्चा हुई। इस अवसर पर जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के प्रतिनिधियों ने आयोग की अध्यक्ष श्रीमती अप्सरा मिश्रा, सदस्य श्रीमती श्यामा सिंह और डीपीओ (ICDS) श्रीमती सुनीता को पुष्प गुच्छ और सर्वोदय डायरी भेंट कर सम्मानित किया।

साझा प्रयासों से मिटेगी सामाजिक कुरीतियां

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती अप्सरा मिश्रा ने कहा कि बाल विवाह, बाल श्रम और बाल दुर्व्यापार जैसी कुरीतियां समाज में अपनी जड़ें गहरी जमा चुकी हैं। उन्होंने कहा, “यह गांधी, विनोबा और जयप्रकाश की कर्मभूमि है। जब समाज, सरकार और सामाजिक संगठन एक मंच पर आकर कार्य करेंगे, तभी हम इन कुरीतियों को जड़ से समाप्त कर पाएंगे।”

उन्होंने विश्वास जताया कि संविधान के रास्ते पर चलकर, सामाजिक आंदोलन और व्यापक जन जागरण के माध्यम से अगले चार-पांच वर्षों में बाल विवाह मुक्त बिहार का सपना साकार होगा।

जमीनी स्तर पर कार्यों की समीक्षा

संस्था के वरिष्ठ साथी रविन्द्र पासवान और कार्यक्रम प्रबंधक डॉ. दीप्ति कुमारी ने आयोग को बाल विवाह मुक्ति रथ और बाल विवाह मुक्त मेला की सफलता के बारे में विस्तार से बताया। संस्था की गतिविधियों को जानने के बाद अध्यक्ष अप्सरा मिश्रा एवं प्रोफेसर रंधीर कुमार मिश्रा ने कहा कि जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र वर्षों से महिलाओं के गरिमामय जीवन और बच्चों के संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर उत्कृष्ट कार्य कर रहा है।

संस्था के कार्यों में शामिल होने की इच्छा

आयोग की सदस्य श्रीमती श्यामा सिंह ने संस्था के सेवा कार्यों की प्रशंसा करते हुए भविष्य की गतिविधियों में शामिल होने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने कहा, “संस्था के कार्यों को गहराई से समझने का मौका मिला है और यदि अध्यक्ष महोदया की अनुमति हो, तो मैं भी इन अभियानों का हिस्सा बनना चाहूँगी।” वहीं, डीपीओ (ICDS) श्रीमती सुनीता ने कहा कि प्रशासन संस्था के प्रयासों से भली-भांति अवगत है और उनके सामाजिक योगदान की सराहना करता है।

प्रमुख सदस्यों की रही उपस्थिति

इस संवाद कार्यक्रम में जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र की ओर से: लेखा अधिकारी: पप्पू यादव, परियोजना समन्वयक: रवि कुमार मिश्रा, डॉक्यूमेंटेशन ऑफिसर: मयंक कुमार सिंहा, स्टेम सेंटर शिक्षक: हर्षमोहन कुमार सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे, जिन्होंने सामाजिक बदलाव के संकल्प को दोहराया।

अहमदपुर में वार्ड स्तरीय बाल संरक्षण समिति का गठन, बाल विवाह मुक्त समाज का संकल्प

0

सरायरंजन (समस्तीपुर)। प्रखंड के ग्राम पंचायत राज गंगसारा अंतर्गत अहमदपुर गाँव (वार्ड नंबर 5) में गुरुवार को बच्चों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र, अख्तियारपुर के सहयोग से आयोजित इस बैठक में सर्वसम्मति से ‘वार्ड स्तरीय बाल कल्याण और संरक्षण समिति’ का गठन किया गया।

प्रशासनिक मार्गदर्शन और उद्देश्य

यह पहल प्रखंड पंचायती राज विभाग, समेकित बाल विकास परियोजना (ICDS) और जिला बाल संरक्षण इकाई, समस्तीपुर के मार्गदर्शन में शुरू की गई है। संस्था द्वारा क्षेत्र के आठ गाँवों के विभिन्न वार्डों में इस तरह की समितियों का गठन किया जा रहा है, ताकि स्थानीय स्तर पर बच्चों के मुद्दों का समाधान हो सके।

सुरक्षा और शिक्षा पर जोर

बैठक की अध्यक्षता वार्ड सदस्या  राधा देवी ने की, जबकि संचालन सीनियर रिसर्च कंसल्टेंट दिनेश प्रसाद चौरसिया ने किया। चर्चा के दौरान वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और समाज की है।

  • शिक्षा: 3-6 वर्ष के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी और 6-18 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य स्कूली शिक्षा पर जोर दिया गया।
  • बाल विवाह: विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि लड़कियों की 18 वर्ष और लड़कों की 21 वर्ष से कम उम्र में शादी करना कानूनी अपराध है।

समिति का स्वरूप

नवनियुक्त समिति में समाज के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया गया है:

  • अध्यक्ष: राधा देवी (वार्ड सदस्य)
  • उपाध्यक्ष: भगवान यादव (पंच सदस्य)
  • सचिव: सुनीता देवी (सेविका)
  • सदस्य: संजय कुमार महतो (शिक्षक), जयंती कुमारी (आशा), स्वाति कुमारी (बाल संसद), संगम कुमारी (किशोरी समूह), रूबी कुमारी (जीविका), लक्ष्मी पासवान (चौकीदार) समेत 14 सदस्य।
पदनामप्रतिनिधित्व
अध्यक्षराधा देवीवार्ड सदस्य
उपाध्यक्षभगवान यादवपंच सदस्य
सचिवसुनीता देवीआंगनवाड़ी सेविका
सदस्यसंजय कुमार महतोशिक्षक (प्रा. वि. अहमदपुर)
सदस्यजयंती कुमारीआशा कार्यकर्ता
सदस्यस्वाति कुमारीबाल संसद
सदस्यसंगम कुमारीकिशोरी समूह
सदस्यरूबी कुमारीजीविका
सदस्यलक्ष्मी पासवानचौकीदार

नियमित निगरानी की अपील

संस्था की कोषाध्यक्ष वीणा कुमारी और कंसल्टेंट ललिता कुमारी ने कहा कि बच्चों की खुशहाली के लिए परिवार का संवेदनशील होना जरूरी है। कार्यक्रम के अंत में शिक्षक संजय कुमार महतो ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी सदस्यों से महीने में कम से कम एक बार बैठक कर गांव के बच्चों की समस्याओं पर चर्चा करने का आग्रह किया।

संसाधनों की चिंता छोड़ें, शिक्षा पर दें ध्यान: संत जोसेफ स्कूल में नामांकन परीक्षा संपन्न, छात्रों को मिलेगी ‘फ्री बस’ की सौगात

0

सकरा (मुजफ्फरपुर): शिक्षा के प्रति समर्पण और छात्रों की सुविधा को सर्वोपरि रखते हुए संत जोसेफ प्रेप पब्लिक स्कूल, सरमस्‍तपुर (सकरा) ने नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए कदम बढ़ा दिए हैं। शुक्रवार, 20 फरवरी 2026 को विद्यालय में नामांकन हेतु प्रवेश परीक्षा का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। इस विशेष जांच परीक्षा के लिए सबहा सुजावलपुर शाखा को केंद्र बनाया गया था, जहाँ सुबह से ही परीक्षार्थियों और अभिभावकों की भारी चहल-पहल देखी गई।

मेधावियों का जमावड़ा: 250 से अधिक बच्चों ने दी परीक्षा

विद्यालय के प्राचार्य दीपक मिश्र ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि इस सत्र में नामांकन के लिए क्षेत्र के बच्चों में अभूतपूर्व उत्साह देखा गया। परीक्षा के लिए 250 से अधिक छात्र-छात्राओं ने अपना पंजीकरण कराया था। परीक्षा अपने निर्धारित समय सुबह 10:30 बजे शुरू हुई और पूरी तरह से कदाचार मुक्त व शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई। प्रश्न पत्र को इस तरह तैयार किया गया था कि वह बच्चों की तार्किक क्षमता और रचनात्मकता का सही आकलन कर सके।

प्रबंधन का बड़ा फैसला: निःशुल्क बस सेवा की घोषणा

परीक्षा के दौरान विद्यालय प्रबंधन ने छात्रों के हित में एक क्रांतिकारी घोषणा की। प्रबंधन के अनुसार, सबहा सुजावलपुर शाखा के वे छात्र जो वर्तमान में अपने निजी संसाधनों (साइकिल या अन्य वाहनों) से विद्यालय आते हैं, यदि वे उच्च शिक्षा या बेहतर समन्वय के लिए सरमस्‍तपुर (सकरा) शाखा में पढ़ाई करना चाहते हैं, तो उन्हें विद्यालय प्रशासन की ओर से निःशुल्क बस सेवा (Free Bus Facility) प्रदान की जाएगी। इस पहल का उद्देश्य छात्रों के यातायात के बोझ को कम करना और उन्हें सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित कराना है।

परिणाम और स्पॉट नामांकनकी प्रक्रिया

प्राचार्य दीपक मिश्रा ने बताया कि प्रवेश परीक्षा का परिणाम 22 फरवरी 2026 को घोषित किया जाएगा। परिणाम जारी होने के साथ ही सफल अभ्यर्थियों का साक्षात्कार और नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाएगी। जो छात्र किसी कारणवश आज की परीक्षा में शामिल होने से चूक गए हैं, उन्हें निराश होने की आवश्यकता नहीं है; वे स्पॉट नामांकन‘ (On-the-spot Admission) प्रक्रिया के माध्यम से इस अवसर का लाभ उठा सकेंगे।

अभिभावकों ने की सराहना

केंद्र पर मौजूद अभिभावकों ने विद्यालय के अनुशासित माहौल और प्रबंधन द्वारा दी गई मुफ्त बस सेवा की सराहना की। अभिभावकों का कहना है कि आर्थिक संसाधनों की चिंता किए बिना अब उनके बच्चे बेहतर परिसर में शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। प्राचार्य ने स्पष्ट किया कि स्कूल का विजन केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों को हर प्रकार की सुविधा देकर उनके भविष्य को संवारना है।

चिमनियों से धुआं निकलने तक जारी रहेगा संघर्ष: समस्तीपुर चीनी मिल को लेकर 22 को ‘नागरिक मार्च’

0

समस्तीपुर | 19 फरवरी, 2026

शहर की लाइफलाइन को पुनर्जीवित करने की जगी आस, जिला विकास मंच ने जारी किया पोस्टर

समस्तीपुर की ऐतिहासिक पहचान और हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का आधार रही समस्तीपुर चीनी मिल को पुनः चालू करने की मांग ने अब एक निर्णायक मोड़ ले लिया है। जिला विकास मंच, समस्तीपुर ने इस आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने के लिए कमर कस ली है। मंच द्वारा जारी ताजा पोस्टर के अनुसार, आगामी 22 फरवरी, 2026 को शहर में एक विशाल नागरिक मार्च निकाला जाएगा।

22 फरवरी को सरकारी बस स्टैंड पर जुटेगा जनसैलाब

जिला विकास मंच ने आह्वान किया है कि चीनी मिल की बहाली के लिए सभी नागरिक रविवार (22 फरवरी) को दोपहर 3:00 बजे स्थानीय सरकारी बस स्टैंड पर एकत्रित हों। यहाँ से शुरू होने वाला यह मार्च प्रशासन और सरकार तक क्षेत्र की जनता की दबी हुई आवाज को पहुँचाने का काम करेगा।

कल माधुरी चौक पर गूंजा था इंकलाब

विदित हो कि मंगलवार (18 फरवरी) को रेल विकास-विस्तार मंच और जिला विकास मंच के बैनर तले कार्यकर्ताओं ने माधुरी चौक पर जोरदार प्रदर्शन किया था।

  • हुंकार: मंच के संयोजक शत्रुघ्न राय पंजी की अध्यक्षता में आयोजित सभा में वक्ताओं ने मिल को चालू करने की मांग को लेकर हुंकार भरी।
  • दर्द: सेवानिवृत्त शिक्षक शंकर साह ने कहा कि 1917 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित यह मिल 1995 में बंद होने के बाद से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई है।
  • समर्थन: राजद नेता राकेश ठाकुर और माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने भी इस लड़ाई में किसानों, मजदूरों और नौजवानों को एकजुट होने की अपील की है।

क्यों जरूरी है मिल का चालू होना?

1917 में स्थापित यह मिल न केवल चीनी उत्पादन का केंद्र थी, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को रोजगार देती थी। मिल के पास आज भी पर्याप्त भूमि और रेल-सड़क मार्ग की बेहतर कनेक्टिविटी मौजूद है। 1995 से बंद पड़ी इस मिल को चालू करना अब केवल एक मांग नहीं, बल्कि समस्तीपुर के मान-सम्मान की लड़ाई बन गई है।

मुजफ्फरपुर: सरकारी स्कूलों में ‘डिजिटल हाजिरी’ पर कड़ा रुख, लापरवाह एचएम को 72 घंटे का अल्टीमेटम

0

मुजफ्फरपुर | 18 फरवरी, 2026 बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल बनाने की मुहिम में लापरवाही बरतने वाले स्कूलों पर जिला शिक्षा विभाग ने शिकंजा कस दिया है। जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (प्राथमिक शिक्षा एवं सर्व शिक्षा अभियान), सुजीत कुमार दास ने एक आधिकारिक आदेश जारी कर सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों (BEO) को कड़े निर्देश दिए हैं कि छात्रों की उपस्थिति अब अनिवार्य रूप से ‘ई-शिक्षाकोष’ पोर्टल पर दर्ज की जाए।

समीक्षा में खुली पोल: आदेश के बाद भी नहीं बदला ढर्रा

विभागीय पत्र (पत्रांक-404) के अनुसार, इससे पूर्व 5 फरवरी 2026 को ज्ञापांक-292 के माध्यम से जिले के सभी सरकारी विद्यालयों को स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि वे विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए टैब (Tab) का उपयोग कर ई-शिक्षाकोष पर छात्र-छात्राओं की उपस्थिति दर्ज करें। हालांकि, हाल ही में जब विभाग ने इसकी समीक्षा की, तो पाया गया कि अधिकांश विद्यालयों में इस डिजिटल प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है और पोर्टल पर उपस्थिति शून्य या नगण्य है।

72 घंटे के भीतर सुधारने होंगे हालात

जिला कार्यक्रम पदाधिकारी ने इस स्थिति पर नाराजगी व्यक्त करते हुए सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को निर्देशित किया है कि पत्र प्राप्ति के तीन दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से सभी छात्रों की हाजिरी टैब के माध्यम से सुनिश्चित कराई जाए। विभाग ने साफ कर दिया है कि टैब उपलब्ध होने के बावजूद डिजिटल पोर्टल का उपयोग न करना विभागीय दिशा-निर्देशों की अवहेलना है।

इन अधिकारियों और कर्मियों को दी गई जिम्मेदारी

व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए इस आदेश की प्रतिलिपि निम्नलिखित स्तरों पर भेजी गई है:

  • प्रखंड संसाधन केंद्र (BRC): सभी लेखा सहायक और डेटा एंट्री ऑपरेटरों को निगरानी के लिए सूचित किया गया है।
  • विद्यालय स्तर: जिले के सभी प्राथमिक, मध्य और माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों (HM) और प्रभारी प्रधानाध्यापकों को आवश्यक कार्यवाही हेतु निर्देशित किया गया है।
  • वरिष्ठ अधिकारी: जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) को भी इस कार्यवाही की सूचना साझा की गई है।

शिक्षा विभाग के इस सख्त रुख से स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में मुजफ्फरपुर के सरकारी स्कूलों में उपस्थिति की निगरानी पूरी तरह डिजिटल होगी। यदि अगले तीन दिनों में पोर्टल पर सुधार नहीं दिखता है, तो संबंधित विद्यालयों के प्रधानों पर विभागीय गाज गिरनी तय मानी जा रही है।

बिहार में दिखा रमजान का चाँद: कल 19 फरवरी को होगा पहला रोजा, मिल्ली काउंसिल ने की घोषणा

0

पटना (बिहार): इबादत और बरकतों का पवित्र महीना ‘रमजान’ कल से शुरू होने जा रहा है। ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, बिहार ने बुधवार को आधिकारिक तौर पर ऐलान किया है कि देश के विभिन्न हिस्सों में रमजान-उल-मुबारक 1447 हिजरी का चाँद नजर आ गया है। इसके साथ ही कल, 19 फरवरी 2026 (गुरुवार) को रमजान की पहली तारीख होगी और पहला रोजा रखा जाएगा।

चाँद की तस्दीक और आधिकारिक घोषणा ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के प्रदेश अध्यक्ष और रुइयत-ए-हिलाल कमेटी के संयोजक हजरत मौलाना डॉ. मोहम्मद आलम कासमी ने बताया कि बुधवार शाम को पटना के फुलवारी शरीफ स्थित राज्य कार्यालय और राज्य की विभिन्न शाखाओं में चाँद देखने का विशेष इंतजाम किया गया था। यद्यपि पटना और आसपास के आसमान में बादलों या अन्य कारणों से चाँद स्पष्ट रूप से नहीं दिखा, लेकिन देश के अन्य राज्यों और शहरों से चाँद दिखने की पुख्ता और विश्वसनीय गवाही (खबर) प्राप्त हुई है।

सांप्रदायिक सौहार्द की अपील मिल्ली काउंसिल के सचिव फैजान रजी कासमी द्वारा जारी इस विज्ञप्ति के बाद मुस्लिम समुदाय में खुशी की लहर है। मस्जिदों में आज रात से ही विशेष नमाज ‘तरावीह’ शुरू हो जाएगी। काउंसिल ने इस पाक महीने के अवसर पर मुल्क में अमन-चैन और भाईचारे की दुआ करने की अपील की है।

मुख्य बिंदु:

  • चाँद दिखने की तारीख: 18 फरवरी 2026 (बुधवार)
  • पहला रोजा: 19 फरवरी 2026 (गुरुवार)
  • घोषणाकर्ता: ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, बिहार

बेटियों के बेहतर स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य के लिए जागरूकता शिविर का आयोजन

0

बाल विवाह के खिलाफ एकजुट हुआ समाज; ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओके तहत हांसा में लगा स्वास्थ्य शिविर

समस्तीपुर | 18 फरवरी, 2026 राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जिले के विकास खंडों में बेटियों के सशक्तिकरण की गूँज सुनाई दी। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना के अंतर्गत महिला एवं बाल विकास निगम, समस्तीपुर द्वारा उच्च माध्यमिक विद्यालय, हांसा एवं राजकीय बुनियादी विद्यालय, हांसा में संयुक्त रूप से स्वास्थ्य जांच शिविर और जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया।

बाल विवाह कुप्रथा पर प्रहार

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र की कार्यक्रम समन्वयक दीप्ति कुमारी ने छात्राओं को बाल विवाह के गंभीर दुष्परिणामों के प्रति सचेत किया। उन्होंने कहा, “बाल विवाह न केवल कानूनी अपराध है, बल्कि यह एक बालिका के शारीरिक और मानसिक विकास को पूरी तरह बाधित कर देता है।” उन्होंने इसके सामाजिक प्रभाव और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

स्वास्थ्य और स्वच्छता पर जोर

लेखापाल पप्पू यादव ने किशोरियों के लिए स्वास्थ्य एवं स्वच्छता (Health & Hygiene) के महत्व को साझा किया। उन्होंने मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन, संतुलित आहार और नियमित स्वास्थ्य जांच को जीवन का हिस्सा बनाने की सलाह दी।

विशेषज्ञों द्वारा स्वास्थ्य जांच

स्वास्थ्य विभाग की ओर से डॉ. प्रशांत कुमार एवं डॉ. संजुक्ता आनंद के नेतृत्व में मेडिकल टीम ने छात्राओं की स्वास्थ्य जांच की। इसमें एएनएम वीणा कुमारी, सीएचओ नेहा कुमारी और फार्मासिस्ट ब्रजेश कुमार ने छात्राओं को आवश्यक चिकित्सीय परामर्श और दवाएं उपलब्ध कराईं।

प्रशासनिक और स्वयंसेवी संस्थाओं की उपस्थिति

महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से गौरव कुमार (DMC), रवि प्रकाश सिंह (DPM), डॉली कुमारी (जेंडर स्पेशलिस्ट) सहित कुणाल, राजेश और दीपशिखा कुमारी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वहीं ‘प्रयास’ संस्था से नीतू जोशेफ, सोनेलाल ठाकुर और प्रभात कुमार ने भी अपने अनुभवों और विभागीय योजनाओं को साझा किया।

विद्यालय प्रशासन का सहयोग

कार्यक्रम को सफल बनाने में उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य संजय कुमार एवं राजकीय बुनियादी विद्यालय के प्रधानाचार्य अजय कुमार की अहम भूमिका रही। शिक्षक किरण कुमारी एवं गुंजेश कुमार ‘गुंजन’ ने छात्राओं को प्रेरित किया। छात्राओं ने भी उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हुए शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े अपनी शंकाओं का समाधान किया।

सिस्टम की जर्जर हालत: परीक्षा केंद्र के गेट पर ही जान जोखिम में डाल रहे छात्र, निकास द्वार के सामने खुला नाला बना मुसीबत

0

समस्तीपुर, शहर के घोषलेन स्थित परीक्षा केंद्र पर प्रशासन और नगर निगम की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। केंद्र के मुख्य निकास द्वार के ठीक सामने नाले पर रखा स्लैब पूरी तरह जर्जर होकर टूट चुका है। परीक्षा खत्म होते ही जब सैकड़ों छात्र एक साथ बाहर निकलते हैं, तो यहाँ जान जोखिम में डालने वाली स्थिति पैदा हो जाती है।

780 परीक्षार्थी, एक टूटा स्लैब और गहरा नाला

प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस केंद्र पर प्रतिदिन लगभग 780 परीक्षार्थी परीक्षा देने पहुँच रहे हैं। परीक्षा समाप्त होने के बाद जब छात्र-छात्राओं की भीड़ बाहर निकलती है, तो उन्हें इसी टूटे हुए स्लैब के संकरे हिस्से से होकर गुजरना पड़ता है। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि छात्र संतुलन बनाकर इस गड्ढे को पार कर रहे हैं। जरा सी चूक या पीछे से आने वाले धक्का-मुक्की के कारण कोई भी बड़ा हादसा हो सकता है।

भगदड़ और बड़े हादसे की आशंका

निकास द्वार पर जगह कम होने के कारण अक्सर छात्रों के बीच आपाधापी मच जाती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि:

अगर भीड़ के दबाव में किसी का पैर फिसला, तो वह सीधे गहरे नाले में जा गिरेगा। भगदड़ की स्थिति में यहाँ बड़ी जनहानि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।”

मुख्य समस्याएं जो प्रशासन को नहीं दिख रहीं:

  • संकरा रास्ता: निकास द्वार के ठीक सामने नाला होने से रास्ता बेहद संकरा हो गया है।
  • जर्जर स्लैब: स्लैब का आधा हिस्सा टूटकर नाले में गिर चुका है, जिससे केवल एक पतली पट्टी बची है।
  • सुरक्षा का अभाव: इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की मौजूदगी के बावजूद वहां सुरक्षा के लिए कोई बैरिकेडिंग या वैकल्पिक रास्ता नहीं बनाया गया है।

हमारी मांग: अभिभावकों और छात्रों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि परीक्षा की गंभीरता को देखते हुए इस स्लैब की तत्काल मरम्मत कराई जाए या वहां लोहे की प्लेट डालकर रास्ता सुरक्षित किया जाए ताकि भविष्य में किसी अनहोनी को टाला जा सके।