Saturday, March 7, 2026
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उत्तर बिहार का ‘मिनी पुरी’ – डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम की महिमा और भगवान जगन्नाथ की जीवंत उपस्थिति

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मुजफ्फरपुर, बिहार। भक्ति की शक्ति जब मौन में विलीन होती है, तो वह ‘सिद्धि’ बन जाती है। उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक ऐसा ही आध्यात्मिक केंद्र है, जो दिखावे की चकाचौंध से कोसों दूर, अपनी दिव्यता और शांति के लिए जाना जाता है। हम बात कर रहे हैं त्राहि अच्युत आश्रम, डिहुली की। यह न केवल एक मंदिर है, बल्कि हजारों भक्तों की आस्था का वह केंद्र है जहाँ पहुँचते ही मन की सारी व्याकुलता शांत हो जाती है। एनएच-28 (NH-28) के करीब स्थित यह आश्रम आज उत्तर बिहार के ‘जगन्नाथ पुरी’ के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है।


प्रथम दर्शन: जब शिखर ध्वज से मिला हृदय को सुकून

राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर मुजफ्फरपुर से बरौनी की ओर बढ़ते हुए, सकरा प्रखंड के पिपरी चौक के पास जैसे ही आप पहुँचते हैं, आपकी नजरें आसमान को छूते एक विशाल मंदिर के शिखर पर जाकर ठहर जाती हैं। लगभग एक किलोमीटर दूर से ही मंदिर के सर्वोच्च शिखर पर लहराता हुआ  ध्वज भक्तों को अपनी ओर आमंत्रित करता प्रतीत होता है।

अक्सर यात्रियों के कदम यहाँ अनायास ही ठिठक जाते हैं। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। एनएच की गाड़ियों का शोर पीछे छूट जाता है और एक असीम शांति का अनुभव होता है। यहाँ आने वाले भक्तों का कहना है कि यहाँ की मिट्टी में कुछ ऐसी ऊर्जा है कि जो एक बार आता है, वह बार-बार खिंचा चला आता है। लोग आते हैं, ध्यान लगाते हैं, अपनी ‘अर्जी’ महाप्रभु के चरणों में सौंपते हैं और जीवन पथ पर नई शक्ति के साथ वापस लौटते हैं।


स्थापत्य कला: उत्तर बिहार की भूमि पर दक्षिण का सौंदर्य

डिहुली स्थित भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्थापत्य कला की दृष्टि से भी अद्भुत है। इस मंदिर का निर्माण ओडिशा (भुवनेश्वर) के प्रशिक्षित कारीगरों द्वारा किया गया है। मंदिर की बनावट में दक्षिण भारतीय और ओड़िया शैली का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी इतनी बारीकी से उकेरी गई है कि हर आकृति जीवंत जान पड़ती है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में दक्षिण शैली का यह विशाल मंदिर एक ‘अतिरेक आनंद’ की अनुभूति कराता है। मंदिर के प्रवेश द्वार (सिंह द्वार) पर भगवान के रक्षक जयऔर विजय की प्रतिमाएं स्थापित हैं, साथ ही भैरव जी की उपस्थिति मंदिर की सुरक्षा और धार्मिक मर्यादा को सुनिश्चित करती है।


गर्भगृह की दिव्यता: नीम की लकड़ी से निर्मित विग्रह

त्राहि अच्युत आश्रम के सबसे पावन हिस्से, यानी गर्भगृह में जाने पर वह दृश्य सामने आता है जो आमतौर पर केवल ओडिशा के पुरी में देखने को मिलता है। यहाँ भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और लाड़ली बहन सुभद्रा के विग्रह स्थापित हैं।

  • विशिष्ट निर्माण: ये मूर्तियाँ सामान्य पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि विशेष नीम की लकड़ी से बनी हैं। इन मूर्तियों को पुरी के पास बालाकोट में उसी पद्धति से बनाया गया है, जिस पद्धति से पुरी के मुख्य मंदिर की मूर्तियाँ बनती हैं।
  • क्रम: सिंहासन पर बाईं ओर बलभद्र जी, मध्य में देवी सुभद्रा और दाहिनी ओर भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) सुदर्शन चक्र के साथ विराजमान हैं।
  • शयन व्यवस्था: मंदिर में सेवा का विधान अत्यंत सूक्ष्म है। भगवान के लिए एक शयन कक्ष बनाया गया है, जहाँ रात्रि विश्राम हेतु तीन अलग-अलग रंगों के बिछावन बिछाए जाते हैं। माता सुभद्रा के लिए लाल, बलभद्र जी के लिए हरा और महाप्रभु जगन्नाथ के लिए पीला बिछावन सुरक्षित है।

प्रचार नहीं, कर्म‘: आश्रम की अछूती परंपराएं

आज के व्यावसायिक युग में, जहाँ छोटे-छोटे मंदिरों का भी सोशल मीडिया पर जोर-शोर से प्रचार किया जाता है, त्राहि अच्युत आश्रम ने खुद को इस चमक-धमक से दूर रखा है।

आश्रम के सेवादारों और संचालकों की नीति स्पष्ट है—कर्म ही पूजा है।” जब न्यूज़ भारत टीवी की टीम पहली बार यहाँ पहुँची, तो सेवादारों ने शुरू में बात करने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि वे प्रचार के लिए नहीं, बल्कि जनकल्याण के लिए यहाँ हैं। आश्रम के वर्तमान संचालक महात्मा कपिल जी ने बिना कैमरा और बिना रिकॉर्डिंग के घंटों संवाद किया। उनके विचारों में सादगी और दर्शन की गहराई थी। अंततः, आश्रम के पुराने ट्रस्टी लालबाबू  के सहयोग और महात्मा जी की सहृदयता से पहली बार मंदिर के गर्भगृह का दृश्य कैमरे में कैद करने की अनुमति मिली। यह आश्रम की उस नीति का हिस्सा है जहाँ वे भक्त की श्रद्धा को विज्ञापन से ऊपर रखते हैं।


 रेत पर ध्यान और दालमाका महाप्रसाद

इस मंदिर की कुछ अनूठी विशेषताएं इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं:

  • वटगोस्वामी और रेत साधना: मंदिर के सामने ही यज्ञ मंडप और वटगोस्वामी (पीपल/बरगद का पवित्र स्थान) स्थित है। यहाँ आने वाले भक्त फर्श या कुर्सियों के बजाय रेत (बालू) पर बैठकर ध्यान लगाते हैं। ऐसी मान्यता है कि वटगोस्वामी की परिक्रमा करने से भक्त के मन की बात सीधे इष्ट देव तक पहुँच जाती है।
  • दालमा प्रसाद: यहाँ आने वाले भक्तों को एक विशेष प्रकार का पकवान ‘प्रसाद’ के रूप में दिया जाता है, जिसे दालमा कहा जाता है। यह दाल और सब्जियों के मिश्रण से बनी मीठी खिचड़ी जैसा होता है, जिसका स्वाद और सुगंध भक्तों को तृप्त कर देती है।
  • सूत्र बंधन: आश्रम का ‘गादी गृह’ वह स्थान है जहाँ भक्तों को मंत्र दीक्षा और रक्षा सूत्र प्रदान किया जाता है। महापुरुष के निर्देशों के अनुसार, यहाँ ‘सूत्र बंधन’ की प्रक्रिया होती है, जिसे भक्त अपनी सुरक्षा और आध्यात्मिक प्रगति का कवच मानते हैं।

दीवारों पर अंकित कृष्ण लीला

मंदिर के प्रथम खंड, जिसे प्रार्थना कक्ष भी कहा जाता है, में प्रवेश करते ही भक्त द्वापर युग की यात्रा पर निकल जाता है। दीवारों पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर उनके मथुरा जाने तक की घटनाओं का सजीव चित्रण किया गया है।

  • वासुदेव द्वारा यमुना पार कर बाल कृष्ण को नंदगांव पहुँचाना।
  • पूतना, बकासुर और शकटासुर वध।
  • कालिया नाग का दमन और गोपियों संग रास।
  • इंद्र का अभिमान चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाना। इन चित्रों के ऊपर नवग्रह, नवदुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी इतनी कुशलता से सजी हैं कि पूरा परिसर एक ‘दिव्य कला दीर्घा’ सा प्रतीत होता है।

चार दशकों का यश: स्थापना से अब तक

इस भव्य आश्रम की यात्रा बहुत पुरानी नहीं है, लेकिन इसकी प्रगति चमत्कारिक है।

  • 31 अक्टूबर 1992: इस दिन सबसे पहले ‘गादी गृह’ की नींव रखी गई और स्थापना की गई।
  • देखते ही देखते, अगले चार दशकों में इस स्थान ने उत्तर बिहार के सबसे प्रमुख धार्मिक केंद्रों में अपनी जगह बना ली।
  • आज यहाँ साल भर में पांच बड़े उत्सव मनाए जाते हैं:
    1. जन्माष्टमी: श्री कृष्ण का जन्मोत्सव।
    2. राधाष्टमी: राधारानी का प्राकट्य दिवस।
    3. अष्ट प्रहरी जन्मोत्सव: वैशाख कृष्ण पक्ष में होने वाला अखंड कीर्तन।
    4. स्थापना दिवस: हर साल 31 दिसंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
    5. वार्षिक यज्ञ: फाल्गुन शुक्ल पक्ष में आयोजित होने वाला विशाल यज्ञ, जिसमें दूर-दूर से साधु-संत और श्रद्धालु जुटते हैं।

आस्था का यह आधुनिक केंद्र

मुजफ्फरपुर का डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम इस बात का प्रमाण है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो, तो बिना किसी शोर-शराबे के भी ईश्वर की महिमा जन-जन तक पहुँच जाती है। यह मंदिर न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि लोगों को मानसिक शांति और जीवन की नई दिशा भी प्रदान कर रहा है।

यदि आप कभी एनएच-28 से गुजरें, तो सकरा के इस दिव्य धाम में रुकना न भूलें। यहाँ के ‘दालमा’ प्रसाद का स्वाद और वटगोस्वामी की छाँव में मिलने वाली शांति आपके जीवन की भागदौड़ के बीच एक संजीवनी का काम करेगी।


त्राहि अच्युत आश्रम: सेवा प्रकल्प और व्यवस्थाएं

सेवा प्रकल्प (Service Initiatives)

आश्रम का मूल मंत्र “नर सेवा ही नारायण सेवा” है। यहाँ कई ऐसे कार्य किए जाते हैं जो समाज के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाते हैं:

  • अन्नपूर्णा सेवा (नि:शुल्क भोजन): आश्रम में आने वाले भक्तों और साधुओं के लिए भोजन की विशेष व्यवस्था रहती है। जैसा कि पहले बताया गया है, यहाँ का ‘दालमा’ और महाप्रसाद विशेष रूप से तैयार किया जाता है। उत्सवों के समय यहाँ विशाल भंडारे का आयोजन होता है, जहाँ हजारों लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
  • आध्यात्मिक परामर्श एवं मंत्र दीक्षा: गादी गृह के माध्यम से महापुरुषों द्वारा मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया जाता है। यहाँ जाति-पाति के भेदभाव के बिना सभी को ‘सूत्र बंधन’ और मंत्र प्राप्ति का अधिकार है।
  • गौ सेवा: आश्रम परिसर में भारतीय नस्ल की गायों के लिए एक गौशाला का संचालन किया जाता है। इन गायों की सेवा को भक्ति का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है और इनके दूध का उपयोग भगवान के भोग और आश्रम की रसोई में किया जाता है।
  • शिक्षा और संस्कार: समय-समय पर यहाँ बच्चों के लिए संस्कार शिविर आयोजित किए जाते हैं, जहाँ उन्हें भारतीय संस्कृति, योग और नैतिकता की शिक्षा दी जाती है।

ठहरने की व्यवस्था (Accommodation)

चूँकि यह आश्रम एनएच-28 के किनारे स्थित है, यहाँ बड़ी संख्या में दूर-दराज के भक्त आते हैं। उनके रुकने के लिए आश्रम में व्यवस्थित इंतजाम हैं:

  • अतिथि गृह (Dharamshala): आश्रम परिसर के भीतर ही भक्तों के ठहरने के लिए कमरे बने हुए हैं। ये कमरे आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस होने के बजाय सादगीपूर्ण और स्वच्छ हैं, ताकि भक्त पूरी तरह से आध्यात्मिक वातावरण में रह सकें।
  • साधु-संत निवास: बाहर से आने वाले महात्माओं और साधुओं के लिए अलग से कुटिया और निवास स्थान की व्यवस्था है। यहाँ के वातावरण को पूरी तरह से शांत रखा जाता है ताकि साधना में कोई बाधा न आए।
  • विश्राम क्षेत्र: उन यात्रियों के लिए जो केवल कुछ घंटों के लिए रुकना चाहते हैं, बड़े हॉल और छायादार विश्राम स्थल बनाए गए हैं, जहाँ वे मंदिर की शांति का लाभ उठा सकते हैं।

नियम और अनुशासन

आश्रम में रुकने या दर्शन करने वाले भक्तों के लिए कुछ कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  • नशा निषेध: आश्रम परिसर के भीतर किसी भी प्रकार का नशा (बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू आदि) पूर्णतः वर्जित है।
  • शाकाहार: पूरे परिसर में केवल सात्विक और शाकाहारी भोजन की ही अनुमति है।
  • शांति और मौन: मंदिर के गर्भगृह और ध्यान केंद्र (वटगोस्वामी क्षेत्र) में बातचीत करना मना है, ताकि अन्य भक्तों की एकाग्रता भंग न हो।

कैसे पहुँचें?

  • सड़क मार्ग: मुजफ्फरपुर से बरौनी जाने वाले मार्ग (NH-28) पर सकरा प्रखंड के पिपरी चौक से करीब 1 किमी अंदर डिहुली गांव में यह आश्रम स्थित है। ऑटो या निजी वाहन से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
  • रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन मुजफ्फरपुर जंक्शन है, जहाँ से आश्रम की दूरी लगभग 20-25 किलोमीटर है।

मुजफ्फरपुर के डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम में आयोजित होने वाले उत्सवों में वार्षिक महायज्ञ सबसे प्रमुख है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था का एक ऐसा सैलाब है जिसमें पूरा उत्तर बिहार उमड़ पड़ता है।

यहाँ होने वाले विशेष उत्सवों और उनकी पूरी प्रक्रिया का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:


त्राहि अच्युत आश्रम के विशेष उत्सव: एक विस्तृत विवरण

वार्षिक महायज्ञ (फाल्गुन शुक्ल पक्ष)

यह आश्रम का सबसे भव्य और महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। यह प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आयोजित किया जाता है (जो अक्सर फरवरी या मार्च के महीने में पड़ता है)।

  • प्रक्रिया और अनुष्ठान:
    • ध्वजारोहण: यज्ञ की शुरुआत भव्य ध्वजारोहण के साथ होती है, जहाँ जगन्नाथ स्वामी के विशेष झंडे को मंत्रोच्चार के बीच शिखर पर स्थापित किया जाता है।
    • कलश यात्रा: इस अवसर पर हजारों की संख्या में महिला श्रद्धालु और कुंवारी कन्याएं पीत वस्त्र धारण कर पास की पवित्र नदियों या सरोवरों से जल भरकर कलश यात्रा निकालती हैं। यह दृश्य अत्यंत मनोरम होता है।
    • अखंड संकीर्तन: यज्ञ के दौरान ‘हरे कृष्ण-हरे राम’ और ‘त्राहि अच्युत’ मंत्रों का अखंड जाप चलता है। इसे ‘अष्ट प्रहरी’ या उससे भी अधिक समय के लिए निरंतर जारी रखा जाता है।
    • आहुति और पूर्णाहुति: विद्वान पंडितों और आश्रम के महात्माओं की देखरेख में अग्नि कुंड में आहुतियां दी जाती हैं। समापन के दिन ‘पूर्णाहुति’ होती है, जिसमें शामिल होने के लिए भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है।
    • सांस्कृतिक कार्यक्रम: यज्ञ के दौरान शाम को प्रवचन, भजन संध्या और झांकियों का आयोजन किया जाता है, जो भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

स्थापना दिवस (31 दिसंबर)

आश्रम के लिए 31 दिसंबर का दिन ऐतिहासिक है, क्योंकि इसी दिन 1992 में ‘गादी गृह’ की स्थापना हुई थी।

  • विशेषता: जहाँ पूरी दुनिया नए साल के जश्न में डूबी होती है, यहाँ भक्त आध्यात्मिक उत्सव मनाते हैं।
  • प्रक्रिया: इस दिन सुबह विशेष अभिषेक और पूजन होता है। इसके बाद आश्रम के संस्थापक और गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इस दिन विशेष ‘महाभंडारा’ आयोजित होता है, जिसमें हजारों लोगों को प्रसाद खिलाया जाता है।

वैशाख कृष्ण पक्ष : अष्ट प्रहरी जन्मोत्सव

यह उत्सव वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है।

  • प्रक्रिया: इसमें 24 घंटे का अखंड कीर्तन होता है। भक्त टोलियों में बँटकर मृदंग और झाल के साथ झूमते हुए कीर्तन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस निरंतर ध्वनि से आश्रम का वातावरण पूरी तरह शुद्ध और ऊर्जावान हो जाता है।

जन्माष्टमी एवं राधाष्टमी (भाद्रपद मास)

चूँकि यह भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) का मंदिर है, इसलिए जन्माष्टमी यहाँ का प्राण है।

  • प्रक्रिया:
    • अर्धरात्रि पूजन: रात्रि 12 बजे भगवान कृष्ण का दुग्धाभिषेक और विशेष श्रृंगार किया जाता है।
    • नंदोत्सव: अगले दिन ‘नंद के आनंद भयो’ के जयकारों के साथ खिलौने और मिठाइयाँ बांटी जाती हैं।
    • राधाष्टमी: इसके ठीक 15 दिन बाद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी मनाई जाती है, जिसमें माता राधा के विग्रह का विशेष पूजन होता है।

सूत्र बंधन और गुरु पूर्णिमा

आश्रम में गुरु-शिष्य परंपरा का बहुत महत्व है।

  • गुरु पूर्णिमा: इस दिन भक्त अपने आध्यात्मिक गुरु (महापुरुष) का दर्शन करने और आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं।
  • प्रक्रिया: यहाँ भक्तों को सूत्र बंधन की दीक्षा दी जाती है। यह एक रक्षा सूत्र होता है जिसे मंत्रों द्वारा सिद्ध किया जाता है। माना जाता है कि यह सूत्र भक्तों की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है और उन्हें सद्मार्ग पर रखता है।

उत्सव के दौरान भक्तों के लिए विशेष निर्देश

यदि आप इन उत्सवों में शामिल होना चाहते हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:

  1. पंजीकरण: बड़े यज्ञों में शामिल होने और ठहरने के लिए अक्सर पहले से सूचना देनी होती है।
  2. वस्त्र धारण: उत्सवों के दौरान पीला या सफेद वस्त्र धारण करना आश्रम की परंपरा के अनुकूल माना जाता है।
  3. सेवा भाव: यहाँ उत्सवों में ‘श्रमदान’ का बड़ा महत्व है। लोग खुद से झाड़ू लगाना, भोजन परोसना और जूते-चप्पलों की देखभाल करना (जोड़ा सेवा) अपनी खुशी से करते हैं।

मुजफ्फरपुर के डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम में फाल्गुन मास का वार्षिक यज्ञ एक ऐसा अवसर होता है जब पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो जाता है।


फाल्गुन वार्षिक यज्ञ 2026: संभावित तिथियाँ

आश्रम का मुख्य वार्षिक यज्ञ फाल्गुन शुक्ल पक्ष में आयोजित होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में फाल्गुन मास की महत्वपूर्ण तिथियाँ इस प्रकार रह सकती हैं:

  • संभावित समय: फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च के पहले सप्ताह के बीच।
  • मुख्य तिथियाँ: फाल्गुन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा (होली) से पहले तक मुख्य आयोजन होते हैं।
  • विशेष दिन: आमतौर पर फाल्गुन एकादशी से पूर्णिमा के बीच यज्ञ की पूर्णाहुति और विशाल भंडारा होता है।
    • नोट: सही तिथि के लिए फरवरी माह के प्रारंभ में आश्रम के सूचना पटल या स्थानीय सेवादारों से संपर्क करना उचित रहता है, क्योंकि तिथियाँ चंद्रमा की गणना और स्थानीय पंचांग पर आधारित होती हैं।

आश्रम पहुँचने के लिए परिवहन के साधन

डिहुली (सकरा) स्थित त्राहि अच्युत आश्रम NH-28 पर स्थित होने के कारण यातायात के दृष्टिकोण से बहुत ही सुलभ स्थान पर है।

1. सड़क मार्ग (सबसे सुविधाजनक)

यह आश्रम मुजफ्फरपुर-बरौनी नेशनल हाईवे (NH-28) के बिल्कुल करीब है।

  • निजी वाहन/टैक्सी: यदि आप मुजफ्फरपुर शहर से आ रहे हैं, तो मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर मार्ग पर करीब 22-25 किलोमीटर की दूरी तय कर पिपरी चौक पहुँचें। वहाँ से गाँव की ओर जाने वाली सड़क से 1 किमी अंदर आश्रम है।
  • बस सेवा: मुजफ्फरपुर बस स्टैंड (इमलीचट्टी) से समस्तीपुर, बरौनी या बेगूसराय की ओर जाने वाली किसी भी बस में बैठें और पिपरी चौक पर उतरें। यहाँ से मंदिर के लिए ई-रिक्शा और ऑटो हमेशा उपलब्ध रहते हैं।

2. रेल मार्ग

  • निकटतम बड़ा स्टेशन: मुजफ्फरपुर जंक्शन (MFP)। यहाँ से देश के सभी प्रमुख शहरों (दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, पटना) के लिए ट्रेनें उपलब्ध हैं। स्टेशन से बाहर निकलकर आप सीधे टैक्सी या बस ले सकते हैं।
  • स्थानीय स्टेशन: ढोली रेलवे स्टेशन (DOL)। यह आश्रम के काफी करीब है (लगभग 8-10 किमी)। यहाँ कुछ पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें रुकती हैं। ढोली से ऑटो लेकर आप सीधे डिहुली आश्रम पहुँच सकते हैं।

3. हवाई मार्ग

  • निकटतम हवाई अड्डा: जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, पटना (PAT)
  • पटना हवाई अड्डे से आश्रम की दूरी लगभग 90-100 किलोमीटर है। हवाई अड्डे से आप सीधे टैक्सी किराए पर ले सकते हैं, जो हाजीपुर होते हुए मुजफ्फरपुर के रास्ते आपको करीब 2.5 से 3 घंटे में आश्रम पहुँचा देगी।

श्रद्धालुओं के लिए सुझाव

  1. भीड़ का प्रबंधन: वार्षिक यज्ञ के दौरान यहाँ लाखों की भीड़ उमड़ती है। यदि आप शांति से दर्शन करना चाहते हैं, तो यज्ञ शुरू होने के एक-दो दिन पहले पहुँचें।
  2. ठहरने की अग्रिम सूचना: यदि आप आश्रम के अतिथि गृह में रुकना चाहते हैं, तो बड़े कार्यक्रमों के दौरान कमरे पहले से भर जाते हैं। इसके लिए आश्रम के पुराने ट्रस्टी या सेवादारों से पहले संपर्क करना बेहतर होता है।
  3. मौसम: फरवरी-मार्च में बिहार का मौसम सुहावना रहता है, लेकिन शाम के समय हल्की ठंड हो सकती है, इसलिए थोड़े ऊनी कपड़े साथ रखें।

                                                   

अगस्त क्रांति के विस्मृत नायक शहीद अमीर सिंह: सीने पर गोली खाई ताकि हम आजाद रहें, पर आजाद भारत में उनके शहादत को उचित सम्मान नहीं

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मुजफ्फरपुर, बिहार ना हो अभी, मगर आखिर तो कदर होगी मेरी, खुलेगा हाले-गुलाम आप पर, गुलाम के बाद।” प्रख्यात शायर हसरत मोहानी का यह शेर आज मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड स्थित ‘नुनफरा’ गांव की गलियों में सिसक रहा है। यह सिसकी किसी आम इंसान की नहीं, बल्कि अगस्त क्रांति के उस महान सेनानी की स्मृतियों की है, जिसने 1942 में अपनी युवा अवस्था की दहलीज पर खड़े होकर भारत माता के पैरों की बेड़ियां काटने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। हम बात कर रहे हैं अमर शहीद अमीर सिंह की, जिनकी शहादत के 83 वर्षों बाद भी आजाद भारत की व्यवस्था उनके जन्मस्थान और शहादत स्थल को उचित सम्मान देने में नाकाम रही है।

अगस्‍त क्रान्ति के शहीद, अमीर सिंह का तैल चित्र
अमर शहीद अमीर सिंह का तस्‍वीर

एक शहादत, जिसने इतिहास लिख दिया पर सम्मान नहीं पाया

11 अगस्त 1942 को जब समूचा देश महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के नारे से आंदोलित था, तब मुजफ्फरपुर का पूर्वी इलाका (सकरा-ढोली क्षेत्र) सशस्त्र क्रांति की ज्वाला में जल रहा था। 11 सितंबर 1942 का वह ऐतिहासिक दिन था। सकरा प्रखंड कांग्रेस आश्रम में स्वतंत्रता सेनानियों की एक गुप्त सभा हुई। जोश इतना था कि आंदोलनकारियों ने सबसे पहले ढोली रेलवे स्टेशन पर तिरंगा फहराया और संचार व्यवस्था ठप करने के लिए रेल की पटरियां उखाड़ दीं।

तत्कालीन थानेदार दीपनारायण सिंह की चेतावनियों को ठेंगा दिखाते हुए इन वीरों की टोली ‘सकरा थाना’ पर तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़ी। इसी टोली में शामिल थे 30 वर्षीय जांबाज अमीर सिंह। जब अंग्रेज पुलिस की गोलियां हवा में गूंज रही थीं, तब अमीर सिंह ने जान की परवाह किए बिना ‘सब निबंधन कार्यालय’ की छत पर तिरंगा फहराने का फैसला किया। जैसे ही वे ऊपर बढ़े, अंग्रेज सिपाहियों की एक गोली उनके सीने को चीरती हुई निकल गई। भारत मां का यह लाडला वहीं शहीद हो गया।

वह बलिदान जो इतिहास के पन्नों में भी धुंधला गया

अमीर सिंह के बलिदान की कहानी केवल उनके प्राण त्यागने तक सीमित नहीं है। उनके पीछे उनके परिवार ने जो झेला, वह रूह कंपा देने वाला है। उनकी पत्नी जयमाला देवी, जिनकी शादी को मात्र दो महीने हुए थे, पति की शहादत की खबर सुनकर सुध-बुध खो बैठीं। एक सुहागिन जिसने अभी अपने हाथों की मेहंदी का रंग भी नहीं उतरने दिया था, उसने अन्न-जल त्याग दिया और ठीक सात महीने बाद अपने पति के पास परलोक सिधार गईं। यह एक ऐसी प्रेम कथा और राष्ट्रभक्ति का संगम है, जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

विडंबना: गुलामी के प्रतीक चमक रहे हैं, शहीदों के घर खंडहर

आज जब हम ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मना चुके हैं, तब मुजफ्फरपुर की धरती पर एक कड़वा सच मुंह चिढ़ा रहा है। जिस अंग्रेज प्रशासक ई.सी. डैनवी के आदेश पर अमीर सिंह पर गोलियां चली थीं, उसका आवास (जो अब ढोली कृषि महाविद्यालय का गेस्ट हाउस है) आज भी शान से चमक रहा है। प्रशासन उसे संवारने के लिए हर साल बजट खर्च करता है।

लेकिन, इसके विपरीत शहीद अमीर सिंह का पैतृक घर खंडहर में तब्दील हो चुका है। परिवार के लोग जैसे-तैसे उनकी यादों को सहेजे हुए हैं। क्या एक आजाद मुल्क में गुलामी के प्रतीकों का संरक्षण शहीदों की विरासत से ऊपर है?

जनप्रतिनिधियों की बेरुखी और जर्जर शहीद द्वार

1994 में शहादत के 52 वर्षों बाद तत्कालीन राजस्व मंत्री रमई राम ने बंदरा प्रखंड मुख्यालय से 4 किमी दूर नुनफरा गांव के मोड़ पर एक ‘शहीद द्वार’ बनवाया था। आज उस द्वार की हालत यह है कि उसका प्लास्टर झड़ चुका है, ईंटें बाहर निकल आई हैं और वह किसी भी क्षण गिर सकता है। विडंबना देखिए कि उस क्षेत्र से कई विधायक और सांसद चुनकर आए, लेकिन किसी भी ‘माननीय’ को इतनी फुर्सत नहीं मिली कि अपनी निधि से कुछ हजार रुपये खर्च कर इस द्वार का रंग-रोगन ही करा दें।

नुनफरा गांव के मोड़ पर जर्जर ‘शहीद द्वार’

नुनफरा के ग्रामीणों ने अपने स्तर पर गांव के स्कूल का नाम ‘शहीद अमीर सिंह’ के नाम पर रख दिया था। नेताओं ने खूब वाह-वाही लूटी, लेकिन सरकारी कागजों में आज भी वह नाम दर्ज नहीं हो सका। गांव की आपसी वैमनस्यता और प्रशासनिक सुस्ती ने स्कूल की दीवारों पर लिखा शहीद का नाम तक मिटा दिया है।

शिलापट्टों से नाम गायब: क्या यह षड्यंत्र है?

सकरा, मुरौल और बंदरा प्रखंडों के मुख्यालयों में स्वतंत्रता सेनानियों के नामों के शिलापट्ट लगे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि पूर्वी मुजफ्फरपुर के एकमात्र अगस्त क्रांति के शहीद होने के बावजूद, अमीर सिंह का नाम इन शिलापट्टों से नदारद है। जिन्होंने हजारीबाग जेल की हवा खाई, जिन्होंने सीने पर गोली झेली, उन्हें सरकारी सूचियों में स्थान न मिलना किसी ‘सौतेले व्यवहार’ से कम नहीं है।

76 साल बाद मिली प्रतिमा, पर वो भी उपेक्षित

अमर शहीद अमीर सिंह स्मारक समिति के लंबे संघर्ष के बाद, 2019 में शहादत स्थल (सकरा निबंधन कार्यालय परिसर) पर उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई। लेकिन सम्मान की यह लड़ाई भी आधी-अधूरी ही रही। प्रतिमा स्थल से मात्र 50 मीटर की दूरी पर निबंधन कार्यालय है और 100 मीटर पर थाना व प्रखंड कार्यालय। बावजूद इसके, शहीद दिवस पर किसी भी अधिकारी के पास दो फूल चढ़ाने का समय नहीं होता। स्थानीय कांग्रेस आश्रम के पास ही यह सब घटित होता है, लेकिन नई पीढ़ी के नेताओं को शायद अपनी विरासत का ज्ञान ही नहीं है।

केंद्र सरकार का वह अधूरा वादा

वर्ष 1993 में भारत छोड़ो आंदोलन की स्वर्ण जयंती पर तत्कालीन रेल मंत्री सी.के. जाफर शरीफ ने परिजनों को पत्र लिखकर ढोली रेलवे स्टेशन पर शहीद अमीर सिंह का जीवनवृत्त और चित्र लगाने का प्रस्ताव दिया था। परिजनों ने ढोली स्टेशन का नाम शहीद के नाम पर रखने की मांग की थी। तीन दशक बीत जाने के बाद भी वह फाइल रेल मंत्रालय के किसी कोने में धूल फांक रही है।

सोचिए  हमारी अगली पीढ़ी क्या सीखेगी?

यदि हम अपने शहीदों के प्रति इतने निष्ठुर रहेंगे, तो भविष्य की पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति का जज्बा कैसे पैदा होगा? अमीर सिंह ने अपने परिवार का भविष्य, अपनी पत्नी का सुहाग और अपना जीवन जिस देश के लिए कुर्बान किया, क्या वह देश उन्हें एक अदद साफ-सुथरा ‘शहीद द्वार’ और सरकारी अभिलेखों में सम्मानजनक स्थान भी नहीं दे सकता?

यह समय है कि प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाज अपनी नींद से जागे। शहीद अमीर सिंह के जन्मस्थल का जीर्णोद्धार, ढोली स्टेशन का नामकरण और राजकीय सम्मान के साथ उनकी स्मृति को सहेजना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अन्यथा, आने वाला इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।

लोहरगामा: विकास की नींव तले दबती एक प्राचीन सभ्यता की चीख

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मुजफ्फरपुर (बिहार) बिहार की धरती अपनी कोख में न जाने कितने साम्राज्यों और सभ्यताओं का इतिहास समेटे हुए है। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड के अंतर्गत आने वाला लोहरगामा (लहरगामा) एक ऐसा ही पुरातात्विक स्थल है, जो आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। यहाँ वर्तमान में निर्माणाधीन ‘राम जानकी स्टेडियम’ की खुदाई ने उन अवशेषों को धरातल पर ला खड़ा किया है, जो सदियों से जमीन के नीचे दफन थे। लेकिन विडंबना यह है कि इन बेशकीमती साक्ष्यों को सहेजने के बजाय, उन्हें कंक्रीट के नीचे हमेशा के लिए दफन किया जा रहा है।

लहरगामा  डीह  पर   स्‍टेडियम के लिए बनाया जा रहा चाहारदीवार

स्टेडियम निर्माण और मिट्टी से निकलता इतिहास

लोहरगामा पंचायत के राम जानकी मठ के समीप जब जेसीबी ने स्टेडियम के लिए खुदाई शुरू की, तो वह केवल मिट्टी नहीं बल्कि इतिहास उगलने लगी। खुदाई के दौरान भारी मात्रा में प्राचीन ईंटें, लोढ़ी, सिलौटी, चक्की (जांता) और विभिन्न प्रकार के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) बाहर आए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहाँ कई स्थानों पर मानव कंकालों के अवशेष भी मिले हैं। ये अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहाँ कभी एक सुव्यवस्थित बस्ती या सभ्यता निवास करती थी।

लेकिन इस पुरातात्विक महत्व को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। ग्रामीणों के अनुसार, स्टेडियम के पूर्वी छोर पर खुदाई के दौरान प्राचीन दीवार की संरचना मिली थी, जिसे मजदूरों ने बिना किसी जांच के पुनः नींव के अंदर दबा दिया।

सरकारी दस्तावेजों में पहचान और वर्तमान दुर्दशा

लोहरगामा केवल लोकश्रुतियों में नहीं, बल्कि सरकारी अभिलेखों में भी दर्ज है। के.पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पटना द्वारा प्रकाशित कैटलॉग ऑफ आर्केलाजिकल साइट्स इन बिहार (भाग-2, पृष्ठ 10-11) में सकरा प्रखंड की सूची में इसे नौवें स्थान पर रखा गया है।

  • ऐतिहासिक माप: अभिलेखों के अनुसार इस डीह (टीले) का रकबा 45 हजार वर्ग मीटर और ऊंचाई ढाई मीटर बताई गई है।
  • अतीत बनाम वर्तमान: बुजुर्गों की मानें तो 35 वर्ष पहले इस मुख्य डीह की ऊंचाई 15 फीट से अधिक थी, जो आज अवैध अतिक्रमण और निर्माण के कारण मात्र 3 फीट रह गई है। यहाँ एक प्राचीन कुआँ था जिसे मिट्टी से भर दिया गया है, और उत्तर दिशा में स्थित एक विशाल तालाब अब अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें ले रहा है।

स्थापत्य कला और पुरातात्विक साक्ष्य

लोहरगामा से प्राप्त ईंटों का आकार इसकी प्राचीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यहाँ से प्राप्त ईंटों की लंबाई 35 सेमी, चौड़ाई 14 सेमी और मोटाई 06 सेमी है। दिलचस्प बात यह है कि इसी आकार की ईंटें क्षेत्र के अन्य प्राचीन स्थलों जैसे भसौन के राम जानकी मठ और मतलुपुर के शिव मंदिर के जीर्णोद्धार के समय भी मिली थीं।

यहाँ मिले अवशेषों में दैनिक जीवन की वस्तुएं जैसे कौड़ी और चक्की भी शामिल हैं। जागरूकता की कमी का आलम यह है कि एक स्थानीय किसान यहाँ से प्राप्त प्राचीन चक्की (जांता) का उपयोग खेत में खूंटा ठोकने के लिए कर रहा है। यह हमारी विरासत के प्रति घोर उदासीनता का प्रतीक है।

लहरगामा  डीह से प्राप्‍त ईंटों  को  दिखाता ग्रामीण

बौद्ध धर्म से जुड़ाव की संभावना

विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों का मानना है कि ‘लहरगामा’ शब्द में लगा गामा प्रत्यय इस स्थल के बौद्ध धर्म से जुड़े होने का संकेत देता है। प्राचीन काल में बौद्ध विहारों या केंद्रों के नाम के पीछे अक्सर ऐसे शब्द जुड़ते थे। यदि यहाँ वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई और शोध किया जाए, तो संभव है कि यह स्थल वैशाली या अन्य समकालीन बौद्ध केंद्रों की कड़ी के रूप में सामने आए।

विकास के नाम पर इतिहास का कत्ल

लोहरगामा के मुख्य डीह पर बिना किसी पुरातात्विक अनापत्ति (NOC) के एक के बाद एक सरकारी निर्माण कराए जा रहे हैं।

  • यहाँ पहले ही विद्यालय, पंचायत सरकार भवन और नलकूप बना दिए गए हैं।
  • अब स्टेडियम का निर्माण शेष बची कड़ियों को भी नष्ट कर रहा है।
  • पास ही बहने वाली कदाने नदी और यह टीला एक आदर्श प्राचीन सभ्यता की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हैं, जिसे अनदेखा किया जा रहा है।

इसके संरक्षण की आवश्‍यकता महत्‍वपूर्ण

लोहरगामा की मिट्टी से निकले अवशेष चीख-चीखकर पूछ रहे हैं कि क्या विकास का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना है? यहाँ मिले कंकाल किसके हैं? क्या यह किसी प्राचीन राजमहल का हिस्सा था या किसी भव्य मंदिर का? इन सवालों के जवाब केवल गहन पुरातात्विक जांच (Excavation) से ही मिल सकते हैं।

लोहरगामा पुरातात्विक स्थल के साथ की जा रही छेड़छाड़ केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि अपनी विरासत को बर्बाद करने का एक अपराध है। स्थानीय प्रशासन और बिहार सरकार के पुरातत्व विभाग को अविलंब इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। स्टेडियम निर्माण को रोककर पहले इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया जाना अनिवार्य है।

“इतिहास केवल किताबों में नहीं होता, वह हमारी मिट्टी में भी धड़कता है। यदि आज हमने लोहरगामा को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें अपनी जड़ें मिटाने के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।”

लोहरगामा के संदर्भ में जिक्र किया, गामा प्रत्यय वाले गांवों का इतिहास बहुत गहरा है। भाषाई और ऐतिहासिक दृष्टि से ‘गामा’ शब्द संस्कृत के ग्राम का अपभ्रंश है, जो प्राकृत और पाली के प्रभाव से ‘गामा’ बना।

बिहार (विशेषकर मुजफ्फरपुर, दरभंगा और मिथिलांचल) और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इस प्रत्यय वाले कई प्रसिद्ध गांव आज भी हैं।

बिहार के प्रमुख गामाप्रत्यय वाले गांव

बिहार में ‘गामा’ अंत वाले गांव अक्सर प्राचीन बसावट या बौद्ध काल से जुड़े माने जाते हैं:

  • लोहरगामा / लहरगामा: (मुजफ्फरपुर, सकरा) – यह एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है।
  • सिंघिया-गामा: (समस्तीपुर/दरभंगा क्षेत्र) – यह इस क्षेत्र का काफी प्रसिद्ध गांव है।
  • नैनगामा: (सहरसा/मधेपुरा क्षेत्र) – यह क्षेत्र भी अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है।
  • भरगामा: (अररिया जिला) – यह एक पूरा प्रखंड (Block) भी है।
  • कुशगामा: (दरभंगा जिला) – मिथिला क्षेत्र में स्थित।
  • बहेड़ा-गामा: (दरभंगा/मधुबनी क्षेत्र)।
  • पंडुगामा: (मुजफ्फरपुर और वैशाली के सीमावर्ती क्षेत्रों में)।

गामाशब्द का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व

इतिहासकारों और भाषाविदों के अनुसार, ‘गामा’ प्रत्यय वाले गांवों के पीछे कुछ विशेष तर्क दिए जाते हैं:

  • बौद्ध कालीन जुड़ाव: पाली भाषा (जो बौद्ध धर्म की मुख्य भाषा थी) में ‘ग्राम’ को ‘गाम’ या ‘गामा’ कहा जाता था। भगवान बुद्ध के भ्रमण के दौरान कई स्थानों के नाम इसी तरह प्रचलित हुए। उदाहरण के लिए, पाली ग्रंथों में कोटिगामा (जो आज वैशाली के पास है) का उल्लेख मिलता है।
  • प्राकृत प्रभाव: संस्कृत के शब्दों के सरलीकरण के दौरान ‘ग्राम’ शब्द ‘गाम’ और फिर स्थानीय बोली में ‘गामा’ हो गया।
  • मठ और विहार: अक्सर जिन गांवों के नाम के अंत में ‘गामा’ लगा होता है, वहां प्राचीन काल में कोई बड़ा मठ, विहार या शिक्षण केंद्र होने के साक्ष्य मिलते हैं (जैसा कि आपके लोहरगामा में मिल रहे हैं)।

सिर्फ बिहार ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों और पड़ोस में भी इसके मिलते-जुलते रूप मिलते हैं:

  • हरियाणा/पंजाब एवं जम्‍मू काश्‍मीर  : यहाँ ‘गाम’ या ‘गाँव’ का प्रयोग अधिक होता है।
  • श्रीलंका: यहाँ भी कई स्थानों के नाम के पीछे गामा लगता है (जैसे: महारगामा), जो शुद्ध रूप से बौद्ध संस्कृति और पाली भाषा के प्रभाव को दर्शाता है।

 

समस्तीपुर का ‘गुप्त खजाना’: 135 ऐतिहासिक स्थलों में दबा है सदियों का गौरवशाली इतिहास!

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विशेष रिपोर्ट: न्यूज़ भारत टीवी

बिहार की भूमि को यदि ‘इतिहास की जननी’ कहा जाए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब हम बिहार के पुरातात्विक मानचित्र पर दृष्टि डालते हैं, तो नालंदा के खंडहर, वैशाली का लोकतंत्र, राजगीर की पहाड़ियाँ और गया के आध्यात्मिक अवशेष स्वतः ही मस्तिष्क में उभर आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी बिहार के हृदय स्थल में बसा समस्तीपुर जिला आज एक ऐसी पुरातात्विक क्रांति की दहलीज पर खड़ा है, जो बिहार के प्राचीन इतिहास के कई पन्नों को फिर से लिखने की क्षमता रखता है?

हालिया शोधों और काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान की रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। समस्तीपुर जिले में 135 से अधिक पुरातात्विक स्थलों को चिन्हित किया गया है। ये स्थल केवल मिट्टी के ढेर नहीं हैं, बल्कि नवपाषाण काल से लेकर गुप्त काल तक के छह सांस्कृतिक चरणों के मूक गवाह हैं।

पुरातात्विक उपेक्षा और छिपे हुए खजाने

पूरे बिहार में पुरातात्विक स्थलों की संख्या 2,500 से अधिक है, और यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। विडंबना यह है कि इनमें से केवल 5 प्रतिशत जानकारी ही आम जनता तक पहुँच पाई है, वह भी आधी-अधूरी। शेष 95 प्रतिशत विरासत आज भी सरकारी फाइलों में कैद है। समस्तीपुर के ये 135 स्थल भी एक ऐसे कुशल शोधकर्ता और उत्खनन की राह देख रहे हैं, जो इन्हें काल के गर्त से निकालकर इनकी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित कर सके।

न्यूज़ भारत टीवी ने इस अनकही कड़ी को एक सूत्र में पिरोने का बीड़ा उठाया है। हम केवल उन 135 स्थलों की बात नहीं कर रहे, बल्कि उन दर्जनों अन्य क्षेत्रों को भी प्रकाश में ला रहे हैं जो पर्यटन और शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, किंतु आधिकारिक सूचियों से अब तक गायब हैं।

नाम के पीछे का इतिहास: सोमवस्ती से समस्तीपुर तक

समस्तीपुर का नामकरण अपने आप में एक ऐतिहासिक पहेली है। इसके पीछे कई रोचक किंवदंतियाँ और ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं:

  • सोमवस्ती और आर्य परंपरा: प्राचीन काल में इस क्षेत्र को ‘सोम बस्ती’ या ‘सोमवती’ कहा जाता था। सोम, जो आर्यों के प्रमुख देवता थे, के नाम पर इसका नाम ‘सोमवस्तीपुर’ पड़ा, जो कालांतर में ‘समवस्तीपुर’ और अंततः ‘समस्तीपुर’ बन गया।
  • शम्सुद्दीन इलियास का प्रभाव: एक अन्य मत के अनुसार, बंगाल के सुल्तान हाजी शम्सुद्दीन इलियास ने इस शहर को बसाया था, जिससे इसका नाम ‘शम्सुद्दीनपुर’ पड़ा और बाद में यह समस्तीपुर के रूप में विख्यात हुआ।
  • मिथिला का प्रवेश द्वार: समस्तीपुर को मिथिला का प्रवेश द्वार माना जाता है। लोकश्रुति है कि यहाँ आकर मिथिला की ‘समस्त अस्थियां’ (सीमाएं या अवशेष) समाप्त हो जाती थीं, इसलिए इसे समस्तीपुर कहा गया।
  • सिल्लिंग और सिक्के: दलसिंहसराय के पगड़ा पंचायत में उत्खनन के दौरान कुषाणकालीन सिक्के और ब्राह्मी लिपि में ‘समस’ अंकित सिल्लियां मिली हैं, जो इसके नामकरण पर ऐतिहासिक प्रकाश डालती हैं।

सांस्कृतिक विरासत के छह चरण

समस्तीपुर की मिट्टी में सभ्यता के विकास के छह प्रमुख चरण दबे हुए हैं। यहाँ नवपाषाण काल के पत्थरों के औजारों से लेकर गुप्त काल की भव्य मूर्तिकला तक के अवशेष मिलते हैं। इस क्षेत्र ने ओइनवार, खण्डेवाल और द्रोणवार जैसे प्रतापी राजवंशों का शासन देखा है।

पांड का उत्खनन: एक नई दिशा

दलसिंहसराय का ‘पांड’ आज पुरातत्वविदों के लिए आकर्षण का केंद्र है। चेचर और चिरांद के बाद, पांड ही वह स्थल है जिसने बिहार के प्राचीन इतिहास को नई गहराई दी है। यहाँ के उत्खनन ने साबित कर दिया है कि समस्तीपुर प्राचीन व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों का मुख्य केंद्र था।

प्रमुख पुरातात्विक स्थल और उनकी महत्ता

समस्तीपुर के विभिन्न प्रखंडों में बिखरी विरासत की एक संक्षिप्त झलक नीचे दी गई है:

स्थल का नामसंबंधित काल/महत्ताविशेषता
पांड (दलसिंहसराय)ताम्रपाषाण से मध्यकालबिहार का महत्वपूर्ण उत्खनन स्थल
गरीया डीहकुषाण कालप्राचीन सिक्कों और मिट्टी के बर्तनों के अवशेष
विशनपुर मेढ़ी व बेला मेघगुप्त कालस्थापत्य कला और धार्मिक अवशेष
नेमी डीह (हसनपुर)ताम्रपाषाण कालपांड के समान प्राचीन और विस्तृत
गनपुर डीह (सरायरंजन)कुषाण कालव्यापारिक केंद्र होने के साक्ष्य
सूरजपुर (मोरवा)कुषाण कालसांस्कृतिक विकास का कालखंड
मोरवा गढ़गुप्त कालसामरिक और प्रशासनिक महत्व
करियन डीह (शिवाजीनगर)प्राचीन कालमहान दार्शनिक उदयनाचार्य की कर्मभूमि

सामाजिक और धार्मिक सद्भाव की स्थली

समस्तीपुर केवल ईंटों और पत्थरों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह लोक आस्था का भी संगम है:

  • बाबा अमरसिंह स्थान (षिउरा): निषाद समाज की अटूट आस्था का केंद्र।
  • विद्यापति धाम: महान मैथिली कवि विद्यापति की निर्वाण स्थली, जो शिव भक्तों के लिए काशी के समान है।
  • खुदनेश्वर स्थान (मोरवा): हिंदू-मुस्लिम एकता का अनूठा प्रतीक, जहाँ एक ही परिसर में मंदिर और मजार स्थित हैं।
  • संत दरिया आश्रम (पटोरी): दरियापंथियों का सबसे बड़ा केंद्र, जो मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की याद दिलाता है।
  • रोसड़ा कबीर मठ और निरंजन स्थान: यहाँ की विविध धार्मिक परंपराओं को दर्शाते हैं।

आधुनिक इतिहास और विद्वता की धाक

अंग्रेजों के आगमन से पहले ही दिल्ली, जौनपुर और बंगाल के शासकों की नजर समस्तीपुर की उर्वर भूमि पर थी, जिसे ‘सोना उगलने वाली मिट्टी’ कहा जाता था। 1874 में बिहार में पहली बार रेल का इंजन इसी जिले की धरती पर दौड़ा था, जो इसके आर्थिक महत्व को दर्शाता है।

साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में भी यहाँ के विद्वानों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धाक रही है। शिवाजीनगर प्रखंड के करियन डीह से ‘श्रुति संदेश’ नामक पत्रिका का संपादन हुआ, जिसे भारत की संभवतः प्रथम हस्तलिखित पत्रिका माना जाता है। यह तथ्य प्रमाणित करता है कि यहाँ की धरती सदियों से बौद्धिक चेतना का केंद्र रही है।

आज समस्तीपुर की यह समृद्ध विरासत संकट में है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण कई पुरातात्विक टीलों (डीह) पर बस्तियाँ बस गई हैं। अतिक्रमण और जागरूकता के अभाव में प्राचीन अवशेष नष्ट हो रहे हैं। ‘काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान’ की सूची में शामिल 135 स्थल आज भी केवल फाइलों तक सीमित हैं।

            समस्तीपुर जिले के कण-कण में इतिहास रचा-बसा है। यदि इन 135 स्थलों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और पर्यटन विकास किया जाए, तो समस्तीपुर न केवल बिहार बल्कि वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नालंदा और वैशाली के समकक्ष खड़ा हो सकता है। न्यूज़ भारत टीवी का यह प्रयास समाज और सरकार को जगाने की एक कोशिश है ताकि हम अपनी जड़ों को पहचान सकें और उन्हें सहेज सकें।

इन स्थलों को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि हम सभी की है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह बता पाएंगे कि जिस मिट्टी पर वे चल रहे हैं, उसके नीचे सम्राटों का वैभव और ऋषियों का ज्ञान दबा पड़ा है?

महा-रिर्पोट: मिथिला की वह विस्मृत राजधानी, जहाँ ‘खेलन कवि’ विद्यापति का बचपन खिला और कलम जवान हुई

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विशेष खोजी आलेख: एस.एस. कुमार ‘पंकज’ (sskr.pankaj@gmail.com) की प्रस्तुति: न्यूज़ भारत टीवी


इतिहास के मलबे में दबी एक गौरवगाथा

इतिहास की यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह अक्सर उन पन्नों को खो देता है, जहाँ किसी संस्कृति की नींव रखी गई होती है। बिहार के समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड का वैनी गांव आज अपनी इसी गुमनामी पर सिसक रहा है। यह केवल एक साधारण गांव नहीं, बल्कि मध्यकालीन मिथिला की वह धड़कन थी, जिसकी गूँज कभी दिल्ली की सल्तनत से लेकर बंगाल के पंचगौर तक सुनाई देती थी। यह वह पवित्र भूमि है, जिसकी मिट्टी में महाकवि विद्यापति का बचपन बीता, जहाँ उन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं को शब्द दिए और जहाँ ओइनवार राजवंश के प्रतापी राजाओं का राज्याभिषेक हुआ।

आज न्यूज़ भारत टीवी की इस विशेष और विस्तृत रिपोर्ट में हम वैनी (प्राचीन ओइनी) के गौरवशाली अतीत, इसके साहित्यिक महत्व, स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका और वर्तमान में प्रशासनिक उपेक्षा की पड़ताल करेंगे।


इतिहास के दर्पण में ओइनी की पहचान

ओइनी गांव की ऐतिहासिकता निर्विवाद है। प्रसिद्ध भाषाविद डॉ. ग्रियर्सन ने स्वतंत्रता पूर्व ही अपने शोध पत्रों में इस स्थल को रेखांकित किया था। दरभंगा गजेटियर के अनुसार, 1325 से 1525 ईस्वी के बीच मिथिला पर ओइनवार राजवंश का शासन रहा।

जब कर्नाट वंश के अंतिम शासक हरिसिंह देव गयासुद्दीन तुगलक के आक्रमण के कारण नेपाल की पहाड़ियों में चले गए, तब मिथिला में अराजकता फैल गई थी। उस संक्रमण काल में प्रशासनिक और सांस्कृतिक स्थिरता लाने का श्रेय इसी ओइनवार राजवंश को जाता है, जिसकी पहली राजधानी ओइनी (वैनी) ही थी। समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर भी इसे ऐतिहासिक स्थल के रूप में स्वीकार किया गया है।


ओइनवार शासक और ओइनी का वैभव

कामेश्वर ठाकुर के बाद भोगेश्वर ठाकुर और गणेश्वर ठाकुर ने ओइनी से ही शासन किया। इतिहास के अनुसार, इस वंश में कुल 17 राजा हुए। गणेश्वर ठाकुर के शासनकाल में ओइनी अपनी समृद्धि के शिखर पर था।

हालांकि, सत्ता के संघर्ष में गणेश्वर ठाकुर की छल से हत्या कर दी गई, जिसके बाद उनके पुत्रों—कीर्ति सिंह और वीर सिंह—को निर्वासित जीवन जीना पड़ा। उन्होंने ओइनी से कुछ दूर ‘विरसिणपुर’ (वर्तमान कल्याणपुर के पास) में शरण ली। बाद में जौनपुर के सुल्तान की मदद से कीर्ति सिंह ने पुनः अपना राज्य प्राप्त किया। करीब 75 वर्षों तक ओइनी मिथिला की राजधानी बनी रही, जब तक कि देवसिंह देव ने राजधानी को लहेरियासराय के निकट ‘देकुली’ नहीं बदल दिया।


ओइनी से चकले वैनीका सफरनामकरण और भूगोल का रहस्य

समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड का वैनी गांव आज एक उपेक्षित पुरातात्विक स्थल बनकर रह गया है। लेकिन यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पता चलता है कि यह स्थल कभी तत्कालीन मिथिला राज्य की राजधानी रहा है।

बौद्ध काल से मुगल काल तक का सफर

इतिहासकार बताते हैं कि बौद्ध काल में इस क्षेत्र को अयणी गांव के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र अपनी उर्वरता और नदियों के समीप होने के कारण हमेशा से सामरिक महत्व का रहा। समय के साथ बदलते-बदलते बारहवीं शताब्दी तक यह नाम ‘अयणी’ से अपभ्रंश होकर ओइनी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इसी ‘ओइनी’ शब्द से इस क्षेत्र पर शासन करने वाले ब्राह्मण राजवंश का नाम ओइनवार राजवंश पड़ा।

अंग्रेजी उच्चारण दोषऔर वैनी का जन्म

मुगल काल के पतन के बाद जब भारत में अंग्रेजों का शासन आया, तो उनके भाषाई उच्चारण दोष ने इस गांव की पहचान को नया मोड़ दे दिया। अंग्रेज अधिकारियों के लिए ‘ओइनी’ बोलना कठिन था, सो अंग्रेज अधिकारी इसे वइनी बोलने लगे, और वहीं से उन्होंने दस्तावेजों में इसे वइनी (Waini) लिखना शुरू किया। आज राजस्व दस्तावेजों में इसका नाम विस्तारित होकर चकले वैनी हो चुका है।


स्वतंत्रता की ज्वालाखुदीराम बोस और पूसा रेलवे स्टेशन

वैनी का इतिहास केवल मध्यकालीन राजाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महान और भावुक कर देने वाली घटना भी इसी मिट्टी से जुड़ी है।

पूसा रेलवे स्टेशन : मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर रेलखंड पर स्थित खुदीराम बोस पूसा रेलवे स्टेशन वास्तव में इसी वैनी गांव की जमीन पर अवस्थित है। प्रारंभ में इस स्टेशन का नाम वैनी पूसा ही था। 18 साल की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे को चूमने वाले महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस की गिरफ्तारी इसी पूसा (वैनी) रेलवे स्टेशन के पास से हुई थी।

11 अगस्त 1908 को जब वे किंग्सफोर्ड पर बम फेंकने के बाद भाग रहे थे, तब वे पैदल ही कई मील का सफर तय कर वैनी पहुंचे थे। थके-हारे और भूखे खुदीराम ने यहाँ पानी मांगा और यहीं पुलिस के हत्थे चढ़ गए। आज स्टेशन का नाम बदलकर खुदीराम बोस पूसा कर दिया गया है, जो इस गांव के लिए गौरव की बात है, लेकिन इसके कारण वैनी की प्राचीन ‘राजधानी’ वाली पहचान कहीं पीछे छूट गई है।

आज यह गांव शहरीकरण और राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के प्रभाव में अपनी मौलिक पहचान खो रहा है। नई पीढ़ी इसे केवल ‘पूसा रोड’ के नाम से जानती है, और ‘वैनी’ शब्द जनमानस की स्मृति से ओझल होता जा रहा है।


वैनी के शिवसिंह डीह के पास खेत से मिला नरसिंह भगवान की खंडित काले प्रस्‍तर की मूर्ति को दिखाते स्‍थानिय ग्रामीण

साहित्य का तीर्थहिंदी और मैथिली के लिए काशीसे कम नहीं

हिंदी और मैथिली साहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों और छात्रों के लिए वैनी गांव का महत्व किसी काशी या ‘प्रयाग’ से कमतर नहीं है। यह वह स्थल है जहाँ साहित्य की धारा ने अपना रुख मोड़ा था।

विद्यापति की कर्मभूमि और गुरु परंपरा

विद्यापति ने ओइनवार राजवंश के जिन राजाओं के आश्रय में रहकर अपनी रचनाओं को लिखा, उनकी चर्चा के बिना हिंदी साहित्य का इतिहास अधूरा है। कीर्ति सिंह देव, शिव सिंह देव और भव सिंह देव जैसे राजाओं का उल्लेख विद्यापति के साहित्य में गौरव के साथ मिलता है। विद्वानों का मत है कि विद्यापति कीर्तिलता और कीर्तिपताका जैसी कालजयी रचनाएं इसी ओइनी की मिट्टी पर बैठकर लिखी गईं।

विद्यापति ने यहाँ पंडित हरिमिश्र के सानिध्य में विद्या अध्ययन किया था। पंडित हरिमिश्र का भतीजा पक्षधर मिश्र विद्यापति के सहपाठी थे। साहित्य के छात्रों के लिए यह स्थल एक ‘जीवंत पुस्तकालय’ की तरह है, जहाँ विद्यापति के ‘खेलन कवि’ से ‘महाकवि’ बनने का सफर दफन है।


ओइनवार राजवंशमिथिला के नए युग का सूत्रपात

वैनी के इतिहास को समझने के लिए हमें ओइनवार राजवंश के उदय को समझना होगा। यह मिथिला के इतिहास का वह अध्याय है जिसने ‘कर्नाट वंश’ के पतन के बाद इस क्षेत्र की बागडोर संभाली।

कौन थे ओइन ठाकुर?

इतिहास के पन्ने बताते हैं कि कर्नाट वंश के अंतिम शासक राजा हरिसिंह देव के अत्यंत विश्वासपात्र और राजपुरोहित कामेश्वर झा (ठाकुर) ओइनी गांव के ही मूल निवासी थे। उनके पूर्वजों के बारे में उल्लेख मिलता है कि जगतपुर निवासी हिंगू ठाकुर के पुत्र और जयपति ठाकुर के पौत्र नाथ ठाकुर को तत्कालीन शासकों द्वारा सरैसा परगना का ‘ओइनी’ गांव छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) या धार्मिक अनुदान के रूप में मिला था। ओइनी गांव का स्वामी होने के कारण नाथ ठाकुर के वंशज ओइनवार कहलाए।

1353 ईस्वी: एक ऐतिहासिक मोड़

समय था चौदहवीं शताब्दी का। दिल्ली की सल्तनत पर गयासुद्दीन तुगलक के बाद फिरोजशाह तुगलक का प्रभाव बढ़ रहा था। 1323-24 के आसपास जब तुगलक सेना ने मिथिला के सिमरांवगढ़ (नेपाल की तराई) पर धावा बोला, तो राजा हरिसिंह देव ने प्रतिरोध के बजाय अपने परिवार और खजाने के साथ हिमालय की कंदराओं में शरण लेना बेहतर समझा। जाने से पहले उन्होंने शासन का गुरुतर दायित्व अपने विद्वान पुरोहित कामेश्वर ठाकुर को सौंपा।

आगे चलकर 1353 ईस्वी में सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने आधिकारिक तौर पर कामेश्वर ठाकुर को मिथिला का ‘करद राजा’ (Tributary King) नियुक्त किया। कामेश्वर ठाकुर ने ओइनी को अपनी प्रथम राजधानी बनाया और यहीं से ओइनवार राजवंश का 174 वर्षों का शासनकाल शुरू हुआ।


ओइनवार शासक और ओइनी का स्वर्णकाल

ओइनी गांव केवल एक निवास स्थान नहीं था, बल्कि यह शक्ति का केंद्र था। कामेश्वर ठाकुर द्वारा स्थापित इस राजवंश में कुल 17 राजा हुए, जिन्होंने मिथिला की कला, संस्कृति और न्याय व्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।

गणेश्वर ठाकुर का शासन और त्रासदी

कामेश्वर ठाकुर के बाद भोगेश्वर ठाकुर और उनके उपरांत गणेश्वर ठाकुर ने ओइनी से शासन किया। गणेश्वर ठाकुर के समय में ओइनी एक समृद्ध नगरी के रूप में विकसित हुई। लेकिन 1371 ईस्वी के आसपास, ‘अस्लान’ (अलसान)  नामक एक विश्वासघाती और साम्राज्यलोभी तुर्क हमलावर ने गणेश्वर ठाकुर की छल से हत्या कर दी। इस घटना ने ओइनी को रक्तपात से भर दिया। गणेश्वर के छोटे पुत्रों (कीर्ति सिंह और वीर सिंह) को अपनी जान बचाने के लिए ओइनी छोड़कर निर्वासित जीवन जीना पड़ा।

कीर्ति सिंह और ओइनी की पुनर्वापसी

विद्यापति की पुस्तक ‘कीर्तिलता’ में इस निर्वासन और संघर्ष का मार्मिक वर्णन है। गणेश्वर ठाकुर के पुत्रों ने जौनपुर के सुल्तान इब्राहिम शाह शर्की से मदद मांगी। एक भीषण युद्ध के बाद उन्होंने अपने पिता के हत्यारे अस्लान को पराजित किया। इस युद्ध में वीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन कीर्ति सिंह ने 1402 ईस्वी में पुनः मिथिला का सिंहासन प्राप्त किया और ओइनी को फिर से राजधानी के गौरव से मंडित किया।

राजधानी का स्थानांतरण: इस वंश के शासक देवसिंह ने पहली बार ओइनी से हटाकर ‘देकुली’ (लहेरियासराय के पास) को राजधानी बनाया। हालांकि, सांस्कृतिक केंद्र के रूप में ओइनी का महत्व बना रहा।


विद्यापति की कर्मस्थलीसाक्ष्यों और तर्कों की कसौटी पर

मिथिलांचल का बच्चा-बच्चा विद्यापति की पदावली गाते हुए बड़ा होता है। लेकिन विद्यापति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कालखंड कहाँ बीता? इस पर शोधार्थियों के बीच गहन चर्चा है। वैनी के विद्वानों और ऐतिहासिक स्रोतों का दावा है कि विद्यापति का किशोरावस्था और उनकी लेखनी का उत्कर्ष इसी ओइनी की मिट्टी में हुआ।

गणपति ठाकुर का ओइनी निवास

विद्यापति के पिता गणपति ठाकुर, राजा गणेश्वर ठाकुर के मुख्य सभासद और राज पंडित थे। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो राजा की राजधानी ओइनी थी। विद्यापति का पैतृक घर मधुबनी जिले के ‘बिस्फी’ गांव में था। ओइनी से बिस्फी की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। 14वीं शताब्दी में, जब रास्ते दुर्गम थे और बीच में गंडक, बागमती तथा कमला जैसी नदियाँ उफान पर रहती थीं, यह किसी भी तरह संभव नहीं था कि गणपति ठाकुर प्रतिदिन बिस्फी से ओइनी दरबार आ सकें। अतः यह स्पष्ट है कि गणपति ठाकुर अपने परिवार के साथ ओइनी के राजदरबार के समीप ही निवास करते थे।

खेलन कविऔर शिवसिंह की मित्रता

विद्यापति राजा शिवसिंह के बाल सखा थे। शिवसिंह, देवसिंह के पुत्र थे। विद्यापति ने अपने साहित्य में स्वयं को खेलन कवि कहा है। इसका अर्थ है वह कवि जो राजा के साथ खेलते-कूदते बड़ा हुआ। यदि राजा का बचपन ओइनी की राजधानी में बीता, तो निश्चित रूप से विद्यापति का बचपन भी इसी मिट्टी में बीता। पंडित हरि मिश्र के गुरुकुल की चर्चा आती है, जहाँ विद्यापति और शिवसिंह ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी। वैनी गांव के आसपास ऐसे प्राचीन गुरुकुलों के अवशेषों पर अनुसंधान की भारी आवश्यकता है।

कीर्तिलता की रचना स्थली

विद्यापति ने ‘कीर्तिलता’ की रचना 1402 से 1410 के बीच की थी। उस समय कीर्ति सिंह ओइनी से शासन कर रहे थे। ग्रंथ की भाषा और उसमें वर्णित ओइनी के वैभव तथा विध्वंस का चित्रण इस बात का प्रमाण है कि विद्यापति ने इसकी रचना ओइनी के राजदरबार में बैठकर ही की थी।


पुरातात्विक संपदामिट्टी में दबे साम्राज्य के अवशेष

वैनी गांव के उत्तर में दो विशाल टीले हैं, जिन्हें स्थानीय लोग शिवसिंह डीह के नाम से पुकारते हैं। ये टीले आज भी अपने भीतर इतिहास के कई रहस्य दबाए हुए हैं।

खुदाई में मिले अवशेष

ग्रामीणों के अनुसार, इन टीलों के पास अक्सर प्राचीन वस्तुएं मिलती रहती हैं:

  1. सिक्के और मुद्राएं: यहाँ से स्वर्ण और ताम्र सिक्के प्राप्त हुए हैं।
  2. काले पत्थर की मूर्तियां: खेती के दौरान नरसिंह भगवान की खंडित प्रतिमाएं मिली हैं।
  3. मृदभांड: गुप्तकालीन और मध्यकालीन मिट्टी के बर्तन।
  4. नर कंकाल: 25 जून 2011 को यहाँ खुदाई के दौरान एक नर कंकाल मिला था, जो बैठने की मुद्रा में था। इससे पहले भी ऐसे अवशेष मिले हैं, जिन्हें प्रशासन ने रहस्य की चादर में लपेट दिया।

वैनी मठ और प्राचीन कुएं

गांव में स्थित वैनी मठ और उसके पास का पुराना कुआँ अपनी बनावट में अनूठा है। मठ की नींव में प्रयुक्त होने वाली ईंटें (खजुरिया ईंट) अत्यंत प्राचीन हैं। मठ के वर्तमान मठाधीश डॉ. नरसिंह दास के अनुसार, यह स्थल कभी तीन बड़े मठों का केंद्र था, जो अब विध्वंस के कारण लुप्त हो रहे हैं।


वैनी के शिवसिंह डीह के पास खेत से मिलाे चक्‍की को दिखाते स्‍थानिय ग्रामीण

विदेशी आक्रमण और ओइनी का विध्वंस

ओइनी का पतन दो बार हुए विदेशी आक्रमणों के कारण हुआ।

  1. पहला विध्वंस अस्लान (अलसान) के सैनिकों ने किया, जिसने राजा गणेश्वर ठाकुर की हत्या के बाद ओइनी में भयंकर रक्तपात मचाया।
  2. दूसरा विध्वंस तब हुआ जब जौनपुर के शासक इब्राहिम शाह ने आक्रमण किया। उसने राजा शिवसिंह की पैतृक राजधानी ओइनी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। यही कारण है कि आज यहाँ भव्य महलों के स्थान पर केवल मिट्टी के टीले बचे हैं।

वर्तमान त्रासदीप्रशासनिक उपेक्षा और अतिक्रमण

यह इस न्यूज़ रिपोर्ट का सबसे कड़वा सच है। जिस स्थल को ‘राष्ट्रीय विरासत’ घोषित होना चाहिए था, वह आज पंचायत सरकार भवन के नाम पर ढहाया जा रहा है।

इतिहास पर कंक्रीट का प्रहार

शिवसिंह डीह के पश्चिमी हिस्से पर पंचायत भवन की नींव डालकर इसके इतिहास को मटियामेट करने का प्रयास किया गया है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि भवन निर्माण के लिए की गई खुदाई के दौरान कई बहुमूल्य पुरावशेष गायब कर दिए गए।

वैनी के शिवसिंह डीह के पीछे वाले डीह  पर पंचायत भवन के निर्माण के लिए खोदे जाने का दृश्‍य  

विद्यापति कर्मभूमि उत्थान मंच का संघर्ष

स्थानीय ग्रामीण और विद्वान रमेश झा गुलाब के नेतृत्व में ‘विद्यापति कर्मभूमि उत्थान मंच’ के माध्यम से वर्षों से इस स्थल के संरक्षण की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने विद्यापति की निर्वाण भूमि (विद्यापति नगर) को तो पर्यटन मानचित्र पर स्थान दिया, लेकिन उनकी कर्मभूमि वैनी को लावारिस छोड़ दिया।

मंच के अध्यक्ष रमेश झा गुलाब कहते हैं, जिले भर में विद्यापति से संबंधित एक विद्यापति नगरही प्रसिद्ध है, जहाँ उन्होंने प्राण त्यागे थे। लेकिन जहाँ विद्यापति ने अपना बहुमूल्य समय बिताया, उस ओइनी का सरकारी स्तर पर कोई नाम लेने वाला नहीं है। अब तो इस ऐतिहासिक धरती पर पंचायत भवन बनाकर इसे हमेशा के लिए मिटाने की कोशिश हो रही है।”


एक अपील : क्या हम अपनी जड़ों को बचा पाएंगे?

वैनी (ओइनी) केवल एक गांव नहीं, बल्कि मिथिला की अस्मिता का प्रतीक है। यह वह स्थान है जहाँ से मिथिला के महानतम कवि की प्रेरणा का स्रोत फूटता था। जहाँ की मिट्टी में गोनू झा, गंगेश उपाध्याय और दामोदर मिश्र जैसे विद्वानों के पैरों की छाप है।

प्रशासनिक उपेक्षा का आलम यह है कि इतने महत्वपूर्ण स्थल को जिला स्तरीय पर्यटन सूची में भी शामिल नहीं किया गया है। यदि आज हम इस ‘विस्मृत राजधानी’ को नहीं बचाते हैं, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें इस सांस्कृतिक अपराध के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।

न्यूज़ भारत टीवी इस विस्तृत रिपोर्ट के माध्यम से बिहार सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और संस्कृति मंत्रालय से अपील करता है कि:

  • वैनी के शिवसिंह डीह का वैज्ञानिक उत्खनन कराया जाए।
  • पंचायत भवन जैसे अवैध निर्माणों को रोककर इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए।
  • यहाँ एक ‘विद्यापति शोध केंद्र’ और संग्रहालय की स्थापना की जाए।
  • वैनी को राजकीय सम्मान के साथ ‘विद्यापति की कर्मभूमि’ और ‘स्वतंत्रता संग्राम स्मारक’ के रूप में विकसित किया जाए।
  • हिंदी और मैथिली के छात्रों के लिए यहाँ शोध केंद्र की स्थापना हो।

मिथिला का गौरव तभी सुरक्षित रहेगा जब हम अपनी जड़ों का सम्मान करना सीखेंगे। वैनी की मिट्टी आज भी पुकार रही है—क्या कोई है जो उसके दफन इतिहास को आवाज दे सके?


ब्यूरो रिपोर्ट: न्यूज़ भारत टीवी (समस्तीपुर) विशेष सहयोग: स्थानीय ग्रामीण एवं प्रबुद्ध नागरिक

ताने सहकर भी नहीं थमे कदम: चूल्हे-चौके से निकलकर ‘विजेता’ ने तय किया नेशनल फुटबॉल तक का सफर

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मुजफ्फरपुर। अक्सर कहा जाता है कि प्रतिभा सुविधाओं की मोहताज नहीं होती, लेकिन मुजफ्फरपुर के पिपरी गांव की विजेता ने इस जुमले को हकीकत में जीकर दिखाया है। एक ऐसा गांव जहां शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है, वहां एक लड़की भोर के अंधेरे में फुटबॉल लेकर निकलती है ताकि वह अपने उन सपनों को सच कर सके, जो उसने खुली आंखों से देखे हैं।

तानाकशी और मैदानकी जंग

विजेता का सफर कभी आसान नहीं था। ग्रामीण परिवेश में जहां लड़कियों के लिए पढ़ाई ही बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, वहां फुटबॉल जैसे ‘शारीरिक और आक्रामक’ खेल को चुनना किसी बगावत से कम नहीं था। जब विजेता शॉर्ट्स पहनकर मैदान में उतरती थीं, तो राह चलते लोगों की टिप्पणियां और ताने उनके कानों तक पहुँचते थे। लेकिन विजेता का ‘फोकस’ गोल पोस्ट पर था।

आज वही लोग, जो कभी उपहास उड़ाते थे, विजेता के घर के बाहर पदक देखने के लिए अब घर आते हैं। कामयाबी ने न सिर्फ आलोचकों के मुंह बंद किए हैं, बल्कि विजेता को पूरे जिले का गौरव बना दिया है।

मेडल एवं प्रमाणपत्र को दिखाती नेशनल अवार्ड से सम्‍मानित विजेता
प्रमाण पत्र एवं पदक के साथ विजेता की तस्‍वीर

एक सूटकेसजो छोटा पड़ गया

विजेता की काबिलियत का सबसे बड़ा गवाह उनके घर में रखा वह बड़ा सा नीला सूटकेस है। आमतौर पर सूटकेस कपड़ों के लिए होते हैं, लेकिन विजेता का सूटकेस प्रमाणपत्रों, मेडल और ट्रॉफियों से लबालब भरा है।

  • राज्य खेल सम्मान (2022): असम के गुवाहाटी में आयोजित नेशनल जूनियर महिला फुटबॉल में शानदार प्रदर्शन के लिए 29 अगस्त को उन्हें यह प्रतिष्ठित अवार्ड मिला।
  • बिहार खेल सम्मान (2021): खेल में उनके निरंतर उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य सरकार ने उन्हें सम्मानित किया।
  • सफरनामा: कटक (ओडिशा) से लेकर मध्य प्रदेश, हरियाणा, मणिपुर और आंध्र प्रदेश के मैदानों तक विजेता के जूतों के निशान छपे हैं।

पढ़ाई बनाम खेल: जब जुनून ने चुनी राह

विजेता वर्तमान में मुजफ्फरपुर के एमडीडीएम कॉलेज में इंटर (विज्ञान) की छात्रा हैं। उनके जीवन में एक वक्त ऐसा आया जब उनके सामने दो रास्ते थे—एक तरफ इंटर की बोर्ड परीक्षा और दूसरी तरफ ‘खेलो इंडिया’ के लिए मध्य प्रदेश जाने का अवसर। एक सामान्य छात्र परीक्षा चुनता, लेकिन विजेता ने खेल को चुना। 1 फरवरी से शुरू होने वाली परीक्षा छोड़कर वह मैदान में उतर गईं। यह फैसला उनके उस अटूट विश्वास को दर्शाता है कि उनकी असली पहचान मैदान से ही बनेगी।

पिपरी के स्‍कूल  के मैदान में भाई सुधीर के साथ अभ्‍यास करते हुए विजेता की तस्‍वीर

चूल्हा, चक्की और फुटबॉल का तालमेल

विजेता की असलियत किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है। एक तरफ वह राष्ट्रीय स्तर पर डिफेंडर्स को छकाती हैं, तो दूसरी तरफ घर लौटकर अपनी माँ उषा देवी के साथ लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं। उनके ‘रीडिंग रूम’ के नाम पर एक साधारण सा तख्त है जहां कुछ किताबें रखी हैं, लेकिन इसी तख्त पर बैठकर उन्होंने 10वीं में 65% अंक हासिल कर अपनी मेधा का परिचय दिया।

परिवार: जीत की असली बैकबोन

पिता कमलेश राय, जो खुद एक शिक्षक हैं, ने अपनी बेटी को वह पंख दिए जो अक्सर ग्रामीण समाज में काट दिए जाते हैं। घर का माहौल किसी स्पोर्ट्स एकेडमी जैसा है:

  • भाई सुधीर: जो विजेता के लिए कोच की भूमिका निभाता है और तकनीक पर काम करता है।
  • बहन रागिनी: जो अभ्यास के दौरान साये की तरह साथ रहती है, कभी पानी लेकर तो कभी हौसला बढ़ाकर।
  • प्रशिक्षण: घर के बाहर उन्हें तरुण प्रकाश और जिला कोच असगर हुसैन की पारखी नजरों ने तराशा है।

लक्ष्य: अब नीली जर्सीका इंतजार

मुजफ्फरपुर की इस बेटी का मिशन अब बिल्कुल साफ है। वह अब केवल राज्यों के लिए नहीं, बल्कि देश के लिए खेलना चाहती हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करना और दुनिया को दिखाना है कि बिहार के सुदूर गांवों में कितनी ‘विजेता’ छिपी हुई हैं।


विजेता की कहानी उन हजारों लड़कियों के लिए मशाल है जो अभावों के कारण अपने सपनों को दम तोड़ते देख रही हैं। वह बताती हैं कि भले ही पैर मिट्टी में सने हों और पेट में भूख हो, लेकिन अगर नजरें ‘लक्ष्य’ पर जमी हैं, तो आसमान छूना नामुमकिन नहीं है।

मुजफ्फरपुर के सकरा में ‘सेव क्रांति’: कश्मीरी फिजाओं को मात दे रही है बिहार की धरती, जेठ की दुपहरी में लहलहाए फल

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खास रिपोर्ट: सकरा (मुजफ्फरपुर)

बिहार के खेतों में धान और गेहूं की लहलहाती फसलें देखना आम बात है, लेकिन अगर हम कहें कि मुजफ्फरपुर की तपती गर्मी में अब कश्मीरी सेव के गुच्छे लटक रहे हैं, तो शायद आपको यकीन न हो। लेकिन सकरा प्रखंड के हसनपुर बंगाही गांव में यह हकीकत बनकर उभर रहा है। यहां के एक प्रयोगधर्मी युवा किसान हर्ष रंजन उर्फ सोनू जी ने अपनी मेहनत से बिहार की मिट्टी पर ‘सेव का सपना’ साकार कर दिया है। इन्‍हों  ने अपनी मेहनत और नवाचार से वह कर दिखाया है जो कभी नामुमकिन लगता था। बिहार की उपजाऊ मिट्टी में अब सेव की फसल न केवल लहलहा रही है, बल्कि उसमें फूल और फल भी आने लगे हैं।

47 डिग्री का टॉर्चर और सेव की बहार

आमतौर पर माना जाता है कि सेव केवल ठंडे प्रदेशों की फसल है। लेकिन सोनू जी के बागान में हरमन 99′ प्रजाति के 125 पौधों ने इस धारणा को बदल दिया है। जहां पारा 46-47 डिग्री तक पहुंच जाता है, वहां जेठ की तपती दुपहरी और बरसात के थपेड़ों के बीच सेव के ये पौधे न केवल जीवित हैं, बल्कि अब फूलों और फलों से लद चुके हैं। यह बिहार के कृषि इतिहास में एक मील का पत्थर है।

सकरा प्रखंड के हसनपुर बंगाही गांव के एक युवा किसान, हर्ष रंजन उर्फ सोनू अपने सेव के खेत में

मल्टी-लेयर फार्मिंग: एक खेत, चार फसलें और बंपर कमाई

सोनू जी ने केवल खेती नहीं की, बल्कि खेती की कला को विज्ञान से जोड़ा है। उन्होंने आधे एकड़ की जमीन का ऐसा ‘मैनेजमेंट’ किया है कि जानकार भी हैरान हैं:

  1. मुख्य फसल: सेव की बागवानी।
  2. पूरक फसल: सेव की कतारों के साथ पपीते के पेड़।
  3. बीच का सदुपयोग: पपीते और सेव के बीच खाली जगह में मिर्च की खेती।
  4. मिट्टी की उर्वरता: बचे हुए हिस्सों में मसूर की दाल की बुआई।

फायदा क्या है? सोनू जी बताते हैं कि सेव की फसल अप्रैल-मई में तैयार होती है। तब तक पपीता और मिर्च किसान को निरंतर आमदनी देते रहते हैं। साथ ही, पपीते और सेव दोनों को पानी की समान मात्रा चाहिए होती है, जिससे सिंचाई का खर्च और मेहनत आधी हो जाती है।

बिना यूरिया-DAP: पूरी तरह केमिकल फ्रीबागवानी

आज के दौर में जहां फसलों में जहरीले कीटनाशकों की भरमार है, वहीं सोनू जी ने पूर्णतः जैविक (Organic) तरीका अपनाया है।

  • कीटों के लिए हनी ट्रैप‘: पौधों को कीड़ों से बचाने के लिए उन्होंने बाजार से जहर खरीदने के बजाय ‘कीट ट्रैप मशीन’ का इस्तेमाल किया। यह एक लैंपनुमा डब्बा है जिसमें मादा कीड़ा की सुगंध होती है, जिसके आकर्षण में आकर सारे नर कीड़े डब्बे में फंस जाते हैं।
  • स्मार्ट सिंचाई: गर्मी में तापमान को नियंत्रित रखने के लिए पूरे खेत में पाइपलाइन का जाल बिछाया गया है, जिससे जरूरत के अनुसार नमी बरकरार रखी जाती है।

बिहार के किसानों के लिए उम्मीद की किरण

सोनू जी ने 20 फरवरी 2022 को इस सफर की शुरुआत की थी। शुरुआती चुनौतियों में कुछ पौधे सूखे भी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आज उनका बागान सुकून देने वाला नजारा पेश कर रहा है। सेव का पेड़ अमरूद के पेड़ जैसा दिखता है और तीन साल में पूरी तरह फलदार हो जाता है।

मुजफ्फरपुर का यह प्रयोग अब पूरे बिहार के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है। सकरा की यह कामयाबी चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो बिहार की मिट्टी सोना भी उगल सकती है और कश्मीर के स्वाद को अपने आंगन में उतार सकती है। अब बिहार के किसान भी सेव बेचकर लाखों रुपये कमाने का सपना देख सकते हैं।

विशेष रिपोर्ट: मुजफ्फरपुर में जीवंत हो रहे  हैं  ‘ पशुपतिनाथ’, खुदाई में मिलीं 3500 साल पुरानी परतें, खोल रही हैं इतिहास के राज

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मुजफ्फरपुर (बिहार): बिहार की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक धरती पर एक और नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड अंतर्गत मतलुपुर में स्थित प्राचीन बाबा खगेश्वरनाथ महादेव मंदिर अब नए कलेवर में नजर आएगा। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता बल्कि अपनी अद्भुत पुरातात्विक विरासत के लिए भी चर्चा में है। नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू हो चुका है, जिसके पूर्ण होते ही यह उत्तर बिहार का एक प्रमुख पर्यटन और आस्था का केंद्र बन जाएगा।

खुदाई में मिला इतिहास का टाइम कैप्सूल

मंदिर के बाहरी स्वरूप को भव्य बनाने के लिए जब मुख्य गर्भ गृह के चारों ओर खुदाई शुरू हुई, तो वहां से इतिहास की ऐसी परतें निकलीं जिन्होंने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है। करीब 12 फीट की गहराई तक की गई खुदाई में मंदिर निर्माण के तीन अलग-अलग कालखंड (लेयर्स) स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं:

खगेश्‍वरनाथ-महादेव-मंदिर-का-एक-दृश्‍य
  1. ऊपरी परत (करीब 200-300 साल पुरानी): सतह से 4 फीट की गहराई तक जो ईंटें और दीवारें मिली हैं, वे आधुनिक काल से ठीक पहले के निर्माण को दर्शाती हैं।
  2. मध्य परत (करीब 800 साल पुरानी): 8 फीट की गहराई पर मिली संरचनाएं मध्यकालीन भारत की वास्तुकला की याद दिलाती हैं।
  3. प्राचीनतम आधार (3000-3500 साल पुराना): सबसे निचली परत और शिवलिंग का आधार तल पुरातत्वविदों के अनुसार 3500 साल तक पुराना हो सकता है। शिवलिंग जिस ‘कसौटी पत्थर’ के आधार पर टिका है, वह इसकी प्राचीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

यहाँ से पूर्व में भी पाल कालीन काली पत्थर की मूर्तियाँ प्राप्त हुई थीं, जिन्हें मंदिर प्रशासन ने ससम्मान परिसर में ही स्थापित किया है।

पशुपतिनाथ की प्रतिकृति: भक्तों का अनूठा संकल्प

इस मंदिर का कायाकल्प किसी सरकारी अनुदान से नहीं, बल्कि आम जनमानस के सहयोग से हो रहा है। मंदिर के चारों ओर पशुपतिनाथ मंदिर (काठमांडू) की तर्ज पर नक्काशीदार दीवारों और भव्य गुंबद का निर्माण शुरू हो गया है। मंदिर परिसर में पशुपतिनाथ मंदिर की एक विशाल प्रतिकृति (तस्वीर) लगाई गई है, जिसे गाइड मानकर कारीगर दिन-रात काम कर रहे हैं।

खगेश्‍वरनाथ-महादेव-मंदिर-में-निर्माण-कार्य-का-दृश्‍य.

विशिष्ट पहचान: लाल शिवलिंग और माता पार्वती का लिंगस्वरूप

खगेश्वरनाथ मंदिर की तुलना अक्सर काशी विश्वनाथ और रामेश्वरम से की जाती है। इसका कारण यहाँ स्थापित दुर्लभ लाल पत्थर का शिवलिंग है। पूरे भारत में ऐसे शिवलिंग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं।

इसके साथ ही, यहाँ एक ऐसी विशेषता है जो दुनिया में कहीं और नहीं देखी गई— माता पार्वती का लिंगस्वरूप। यद्यपि यह पुरातात्विक मूर्ति खंडित अवस्था में है, लेकिन इसकी महत्ता को देखते हुए इसे सुरक्षित रखा गया है और उसी विधान से पूजा की जाती है। इस खंडित मूर्ति की ऐतिहासिकता को देखते हुए 1950 में पास में ही माता पार्वती की भगवान शिव को नमन करती हुई एक अन्य सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई थी।

रामायण काल से जुड़ा नाता और खगेश्वरनाम की महिमा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही भूमि है जहाँ भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी का निवास था। रामायण युद्ध के दौरान जब मेघनाद ने नागपाश से राम-लक्ष्मण को बांध दिया था, तब गरुड़ जी ने ही उन्हें मुक्त कराया था। उस समय गरुड़ जी के मन में श्री राम के ईश्वर होने पर संशय उत्पन्न हुआ था।

कहा जाता है कि गरुड़ जी (पक्षियों के राजा यानी ‘खग’) की जिज्ञासा और शंका का समाधान भगवान शिव ने इसी स्थान पर संवाद के माध्यम से किया था। इसी कारण इस स्थान का नाम खगेश्वरनाथ पड़ा। आज भी यहाँ गरुड़ जी की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा स्थापित है, जो खुदाई के दौरान ही प्राप्त हुई थी।

काशी जैसी परंपरा : मंदिर और श्मशान का संगम

इस मंदिर की एक और दुर्लभ बात इसका श्मशान से सटा होना है। मंदिर के उत्तर-पूर्व दिशा में पूरनी पोखर श्मशान स्थित है। सनातन परंपरा में काशी के अलावा बहुत कम ऐसे स्थान हैं जहाँ मंदिर और श्मशान एक साथ हों। यह संरचना भगवान शिव के ‘महाकाल’ स्वरूप और जीवन-मृत्यु के शाश्वत सत्य को प्रदर्शित करती है।

मतलुपुर का यह मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता का गवाह है। जैसे-जैसे निर्माण कार्य आगे बढ़ रहा है, लोग न केवल इसके भव्य स्वरूप को देखने के लिए उत्सुक हैं, बल्कि यहाँ की मिट्टी से निकल रहे इतिहास को जानने के लिए भी लालायित हैं। आने वाले समय में बाबा खगेश्वरनाथ महादेव मंदिर अपनी प्राचीनता और भव्यता के संगम से पूरे देश को गौरवान्वित करेगा।