ताजपुर/समस्तीपुर (12 जनवरी 2026): ताजपुर प्रखंड के वार्ड संख्या 11 में सोमवार को भाकपा माले का ‘शाहपुर बघौनी पंचायत शाखा सम्मेलन’ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। प्रखंड कमिटी सदस्य मो० एजाज की अध्यक्षता और जिला कमिटी सदस्य आसिफ होदा के पर्यवेक्षण में आयोजित इस सम्मेलन में संगठन की मजबूती और आगामी आंदोलनों की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई।
भाकपा माले का ‘शाहपुर बघौनी पंचायत के शाखा सम्मेलन में शामिल कार्य कर्त्तागण
नई कमिटी का गठन
सम्मेलन के दौरान सर्वसम्मति से सांगठनिक चुनाव प्रक्रिया पूरी की गई, जिसमें नौशाद तौहीदी को नया शाखा सचिव चुना गया। इस अवसर पर शाद तौहीदी, वलाम तौहीदी, मुखलिश तौहीदी, मिन्हाजुलहक, मो० राशि हुसैन, मो० आले, अकदस तौहीदी, फैयाज तौहीदी और शहवाज तौहीदी सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
आंदोलन की पार्टी है भाकपा माले: सुरेंद्र प्रसाद सिंह
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित भाकपा माले प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने नवनिर्वाचित सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि भाकपा माले हमेशा से पीड़ितों को न्याय दिलाने और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत रही है। उन्होंने जोर दिया कि ताजपुर में लूट, भ्रष्टाचार और जुल्म के खिलाफ पार्टी ने हजारों लोगों को न्याय दिलाया है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि संगठन को और मजबूत बनाकर न्याय की इस लड़ाई को तेज किया जाए।
24 जनवरी को मुख्यमंत्री के समक्ष होगा प्रदर्शन
सम्मेलन में दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए:
प्रशासनिक भ्रष्टाचार और प्रताड़ना के खिलाफ मोर्चा: थर्ड डिग्री टॉर्चर के दोषी पुलिस अधिकारियों और घूसखोर अंचल राजस्व कर्मचारी रॉबिन ज्योति पर कार्रवाई की मांग को लेकर रणनीति बनाई गई। निर्णय लिया गया कि 24 जनवरी को मुख्यमंत्री के कर्पूरीग्राम आगमन पर आंदोलन के माध्यम से इन मुद्दों को पुरजोर तरीके से उनके समक्ष उठाया जाएगा।
अपराध पर रोक की मांग: जिला कमिटी सदस्य आसिफ होदा ने मधेपुरा में हुए हिना प्रवीन बलात्कार-हत्याकांड की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने दोषियों की जल्द गिरफ्तारी और राज्य में बढ़ते अपराध एवं बलात्कार की घटनाओं पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
मुजफ्फरपुर। शहर के प्रतिष्ठित महंत दर्शन दास महिला महाविद्यालय (MDDM) के शिक्षाशास्त्र विभाग (B.Ed.) में सोमवार को स्वामी विवेकानंद की जयंती ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर वक्ताओं ने स्वामी जी के विचारों को आत्मसात कर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।
स्वामी विवेकानंद की जयंती कार्यक्रम में शामिल शिक्षक एवं छात्रा
कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ
समारोह की शुरुआत कॉलेज की प्राचार्या डॉ. अलका जयसवाल द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और स्वामी विवेकानंद के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुई। छात्राओं ने सुमधुर ‘दीप मंत्र गान’ प्रस्तुत कर वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। विभागाध्यक्ष सहित सभी शिक्षकों और छात्राओं ने स्वामी जी को पुष्पांजलि अर्पित की। छात्रा सुरुचि कुमारी ने स्वागत गीत के माध्यम से अतिथियों का अभिनंदन किया, जबकि सोनाक्षी कुमारी और मानसी रितु ने अपने कुशल मंच संचालन से कार्यक्रम में समां बांध दिया।
सकारात्मक सोच से ही होगा युवाओं का उत्थान: प्राचार्या
छात्राओं को संबोधित करते हुए प्राचार्या डॉ. अलका जयसवाल ने कहा, “युवाओं को हमेशा सकारात्मक विचारों को अपनाना चाहिए और नकारात्मकता का पूर्णतः त्याग करना चाहिए। यही स्वामी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।”
वहीं, विभागाध्यक्ष डॉ. हरि शंकर कुमार ने विवेकानंद के जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि युवाओं को खुद को ईमानदार और समर्थ बनाना चाहिए। उन्होंने समाज सेवा के माध्यम से जीवन को धन्य करने की प्रेरणा दी।
शिक्षकों ने साझा किए विचार
कार्यक्रम में विभाग के वरिष्ठ शिक्षकों ने भी अपने विचार रखे। डॉ. संजीव कुमार, डॉ. रंजीत कुमार, डॉ. रवि शेखर ठाकुर और डॉ. स्मिता गौतम सहित अन्य प्राध्यापकों ने स्वामी जी के राष्ट्र के प्रति योगदान की चर्चा की। वक्ताओं ने स्वामी जी की प्रसिद्ध उक्ति— “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”— को दोहराते हुए छात्राओं में आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति का संचार किया।
छात्राओं की जीवंत प्रस्तुतियाँ
कार्यक्रम में छात्राओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विभिन्न भाषणों, गीतों और स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंगों (दृष्टांतों) के माध्यम से छात्राओं ने कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य छात्राओं में सकारात्मक सोच और नेतृत्व क्षमता का विकास करना था।
समारोह का समापन धन्यवाद ज्ञापन और सामूहिक राष्ट्रगान के साथ गरिमापूर्ण तरीके से हुआ।
उपस्थित गणमान्य: डॉ. रवि कुमार, डॉ. सुमन्त कुमार, डॉ. पवन कुमार, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. राजमणि कुमार, डॉ. मणिकान्त कुमार, डॉ. श्रीनिवास सुधांषु, प्रो. ममता कुमारी एवं प्रो. साधना कुमारी सहित समस्त कर्मचारी व छात्राएं।
मुजफ्फरपुर, बिहार। आगामी 26 जनवरी को जब पूरा देश 77वें गणतंत्र दिवस के गौरव में डूबा होगा, जब राजपथ पर सैन्य शक्ति का प्रदर्शन होगा और आसमान तिरंगे के रंगों से सराबोर होगा, ठीक उसी समय मुजफ्फरपुर के सकरा में ‘राष्ट्रीय शर्म’ की एक और कड़वी तस्वीर बेपर्दा होने की पूरी आशंका है। यह दास्तां है अगस्त क्रांति के उस जांबाज शहीद अमीर सिंह की, जिन्होंने 1942 में अपनी छाती पर ब्रिटिश हुकूमत की गोली सिर्फ इसलिए खाई थी ताकि आने वाली पीढ़ियां एक आजाद और सम्मानजनक गणतंत्र में सांस ले सकें। लेकिन अफसोस, आज उसी गणतंत्र के नुमाइंदे— स्थानीय प्रखंड अधिकारी, थानेदार, चिकित्सा पदाधिकारी, बैंक मैनेजर, और न जाने कितने सफेदपोश नेता—अपनी कृतघ्नता से इस शहादत को हर दिन कुचल रहे हैं।
शहीद अमीर सिेह का स्टैच्यू
तमाशा गणतंत्र का: 50 मीटर की दूरी, फिर भी श्रद्धा सुमन को ‘वक्त‘ नहीं
विडंबना की पराकाष्ठा देखिए, 26 जनवरी को सकरा प्रखंड मुख्यालय और सकरा थाने में धूमधाम से झंडोत्तोलन होगा। सरकारी अधिकारी ‘अमर शहीदों के सपनों’ को पूरा करने की कसमें खाएंगे, देशभक्ति के तराने गूंजेंगे और मिठाइयां बांटी जाएंगी। लेकिन इस उत्सव के भव्य पांडाल से महज 100 से 200 मीटर के दायरे में शहीद अमीर सिंह की प्रतिमा एक मूक दर्शक की तरह सिस्टम की बेरुखी और कृतघ्नता को देख रही होगी।
हैरानी की बात यह है कि पिछले कई सालों का रिकॉर्ड गवाह है कि यहाँ के ‘साहबों’ (बीडीओ, सीओ, थानेदार) के सरकारी शेड्यूल में शहीद की प्रतिमा पर दो पुष्प अर्पित करना शामिल ही नहीं होता।
सकरा निबंधन कार्यालय: दूरी मात्र 50 मीटर।
सकरा थाना: दूरी मात्र 100 मीटर।
सकरा प्रखंड कार्यालय: दूरी मात्र 200 मीटर।
क्या इन साहबों का ‘प्रोटोकॉल‘ इतना बड़ा हो गया है कि जिस मिट्टी के शहीद ने इन्हें ये कुर्सियां और रसूख दिया, वहां जाने में इन्हें परहेज है? जिन दफ्तरों में बैठकर ये अधिकारी आज लोकतांत्रिक व्यवस्था का आनंद ले रहे हैं, उसकी नींव में अमीर सिंह जैसे वीरों का ही खून है। क्या सरकारी साहबों को लगता है कि शहीद की प्रतिमा पर जाना उनकी शान के खिलाफ है? या फिर ‘गणतंत्र’ अब सिर्फ फाइलों, भाषणों और सरकारी दफ्तरों की चारदीवारी तक सिमट कर रह गया है?
गंदगी से पटा हुआ सकरा रजिस्ट्री ऑफिस स्थित शहीद अमीर सिंह स्मारक स्थल
शहीद स्थल या कचरा स्थल? नगर पंचायत सकरा की संवेदनहीनता पर सवाल
सकरा निबंधन कार्यालय परिसर स्थित शहीद अमीर सिंह का शहादत स्थल आज बदहाली के आंसू रो रहा है। सकरा नगर पंचायत के अधिकारी और इसके नुमांइदे को यह ज्ञान नहीं है कि शहीद अमीर सिंह , सकरा के लिए प्रेरणा पुंज है, गौरव हैं । शहादत स्थल पर जहाँ श्रद्धा की सुगंध और पवित्रता होनी चाहिए, वहां साल भर गंदगी का अंबार लगा रहता है। शहीद की प्रतिमा धूल फांक रही है और आलम यह है कि यह स्थान शहीद स्मारक न होकर ‘कचरा स्थल’ में तब्दील हो चुका है।
सकरा रजिस्ट्री ऑफिस स्थित शहीद अमीर सिंह स्मारक स्थल पर गंदगी का अंबार
सवाल सकरा नगर पंचायत के अधिकारियों से है: आपका आलीशान कार्यालय यहाँ से महज 200 मीटर दूर है, फिर भी आपके सफाईकर्मियों को यहाँ झांकने तक की फुर्सत नहीं मिलती? जब एक राष्ट्रीय नायक के स्मारक का यह हाल है, तो सकरा नगर पंचायत के अन्य इलाकों में सफाई की स्थिति कितनी नारकीय होगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। क्या नगर पंचायत के अधिकारी केवल कागजों पर ‘स्वच्छ भारत’ का ढिंढोरा पीटते हैं?
विरासत की अनभिज्ञता: कांग्रेस का ‘सूना‘ आश्रम और भाजपा की ‘सियासत‘
शहादत स्थल से महज 200 मीटर की दूरी पर वह ऐतिहासिक कांग्रेस आश्रम स्थित है, जिसने आजादी की लड़ाई के दौरान क्रांतिकारियों के भीतर ज्वाला फूंकी थी। दुखद पहलू यह है कि आज की पीढ़ी के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को शायद अपनी ही विरासत और इतिहास का ज्ञान नहीं है। जिस तिरंगे के सम्मान के लिए अमीर सिंह ने सीने पर गोली खाई, उसी पार्टी के कार्यकर्ता आज अपने शहीद की सुध लेना भूल गए हैं।
राजनीति के इसी शून्य का लाभ विपक्षी दल उठाते हैं। जहाँ कांग्रेस अपनी विरासत सहेजने में विफल रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता इन अवसरों को भुनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। लेकिन सवाल राजनीति से ऊपर नैतिकता का है—क्या शहीद अमीर सिंह किसी एक दल के थे? क्या वे पूरे राष्ट्र की सामूहिक थाती नहीं हैं? आखिर क्यों राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले दल शहीद की प्रतिमा की सफाई और गरिमा के लिए आगे नहीं आते?
‘नुनफरा‘ का स्कूल और गुमनाम होती शहादत
शहीद अमीर सिंह के पैतृक गांव नुनफरा की स्थिति और भी पीड़ादायक है। ग्रामीणों ने शहीद के सम्मान में स्थानीय प्राथमिक विद्यालय का नाम ‘अमीर सिंह’ के नाम पर रख दिया था। विद्यालय की मुख्य दीवार पर नाम अंकित भी किया गया, लेकिन गांव की ओछी राजनीति और सरकारी तंत्र की ढिलाई ने उस नाम को सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं होने दिया। आज दीवार पर लिखा वह नाम भी मिट चुका है। एक तरफ सरकार विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करती है, वहीं दूसरी तरफ एक शहीद को उसके अपने ही गांव में उसकी पहचान से वंचित रखा जा रहा है।
विधायक कोमल सिंह की पहल ने जगाई उम्मीद
बंदरा प्रखंड के नुनफरा गाँव का ‘शहीद द्वार’ वर्षों तक खंडहर बना रहा। 1994 में तत्कालीन राजस्व मंत्री रमई राम ने इसका निर्माण कराया था, लेकिन बाद के जनप्रतिनिधियों ने इसे मरने के लिए छोड़ दिया। इस उपेक्षा के दौर में गायघाट की वर्त्तमान विधायक कोमल सिंह धन्यवाद की पात्र हैं, जिन्होंने शहीद की सुध ली और इस द्वार का जीर्णोद्धार कराया। यह साबित करता है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो बजट का रोना नहीं रोया जाता। लेकिन क्या केवल एक द्वार का बन जाना काफी है? शहीद के जन्मस्थल पर आज भी एक प्रतिमा लगाने की मांग वर्षों से लंबित है।
वर्षों तक खंडहर बना रहा ‘शहीद द्वार’ (बायें) एवं गायघाट की विधायक कोमलसिंह के द्वारा जीर्णोद्धार के बाद चमकता ‘शहीद द्वार'(दायें से)
जयमाला देवी का ‘मूक बलिदान‘ और गुलाम मानसिकता का प्रतीक ‘डैनवी आवास‘
अमीर सिंह की शहादत अधूरी है यदि उनकी पत्नी जयमाला देवी का जिक्र न हो। शादी के मात्र सात माह बाद विधवा हुई उस वीरांगना ने अन्न-जल त्याग दिया और शहादत की घटना के दो माह के भीतर प्राणों की आहुति दे दी। क्या आजाद भारत के किसी सरकारी दस्तावेज में इस बलिदान को जगह मिली?
एक तरफ वह अंग्रेज अफसर ई.सी. डैनवी है, जिसके आदेश पर गोलियां चलीं, उसका आवास (तिरहुत कृषि महाविद्यालय ढोली का गेस्ट हाउस) आज भी राजकीय अतिथि की तरह चमक रहा है। दूसरी तरफ हमारे देश के रक्षक का जन्मस्थान मिट्टी में मिल रहा है। यह गणतंत्र का जश्न है या हमारी आज भी कायम गुलाम मानसिकता का प्रदर्शन?
26 जनवरी को सकरा, मुरौल और बंदरा के अधिकारियों से सीधे सवाल:
आगामी गणतंत्र दिवस पर जनता की अदालत में ये प्रश्न खड़े होंगे:
क्या इस बार बीडीओ साहब, थानेदार और नगर पंचायत अधिकारी अपनी वातानुकूलित गाड़ियों से उतरकर शहीद की प्रतिमा पर फूल चढ़ाने की हिम्मत करेंगे?
क्या ढोली रेलवे स्टेशन का नाम ‘शहीद अमीर सिंह रेलवे स्टेशन‘ करने की रुकी हुई फाइल पर चढ़ी धूल साफ होगी?
क्या नुनफरा के स्कूल को सरकारी तौर पर शहीद का नाम मिलेगा, या इस बार भी केवल ‘आश्वासन‘ की मिठाई बांटी जाएगी?
सकरा, मुरौल और बंदरा प्रखंडों के सरकारी शिलापट्टों पर शहीद अमीर सिंह का नाम कब दर्ज होगा?
शहीद अमीर सिंह का लहू इस मिट्टी की गहराई में मिला है। अगर इस 26 जनवरी को भी उन्हें गंदगी और उपेक्षा के बीच छोड़ दिया गया, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि हम एक राष्ट्र के रूप में केवल पाखंड कर रहे हैं। कृतघ्न समाज और संवेदनहीन प्रशासन कभी महान लोकतंत्र का निर्माण नहीं कर सकते।
क्या इस 26 जनवरी टूटेगी उपेक्षा की यह परंपरा?
शहीद अमीर सिंह की उपेक्षा का एक बड़ा कारण सिस्टम की वह जड़ता है, जिसमें ‘शहादत’ को सरकारी ड्यूटी चार्ट का हिस्सा ही नहीं माना गया। सकरा में पोस्टिंग पर आने वाले अधिकांश अधिकारी बाहरी क्षेत्रों के होते हैं, जिन्हें स्थानीय इतिहास और यहाँ की माटी के नायकों के बलिदान की जानकारी तक नहीं दी जाती। यह प्रशासन की विफलता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी अनभिज्ञता की आड़ में शहीद अमीर सिंह को उनके ही शहादत स्थल पर बेगाना बना दिया जा रहा है।
क्या इस बार स्थानीय प्रशासन के द्वारा गणतंत्र दिवस के समारोह पर सरकारी शेड्यूल में शहीद अमीर सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण को आधिकारिक रूप से शामिल किया जाएगा? यदि इस बार भी अधिकारी महज 100 मीटर की दूरी तय नहीं कर पाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि तंत्र के लिए ‘शहादत’ की कोई कीमत नहीं है और हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक कृतघ्न समाज सौंप रहे हैं।
11 जनवरी 2026 को शहादत स्थल पर गंदगी को दिखाती जिओ टेगिंग तस्वीर
“अगर आज हम चुप रहे, तो कल कोई अमीर सिंह देश के लिए गोली खाने से पहले हजार बार सोचेगा। सकरा के इस महान शहीद की प्रतिमा आज गंदगी और उपेक्षा के बीच आंसू बहा रही है। इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि सोए हुए अधिकारियों की नींद टूट जाए!”
अगस्त क्रांति के विस्मृत नायक शहीद अमीर सिंह: सीने पर गोली खाई ताकि हम आजाद रहें, पर आजाद भारत में उनके शहादत को उचित सम्मान नहीं–
बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर प्रखंड में पुलिस की संवेदनहीनता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और संदिग्ध शराब कांड को लेकर जन-आंदोलन की नई चिंगारी सुलग गई है। शनिवार को भाकपा माले के बैनर तले सैकड़ों कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने शहर की सड़कों पर उतरकर नीतीश सरकार के ‘सुशासन’ को आईना दिखाया। ‘न्याय मार्च’ के माध्यम से कार्यकर्ताओं ने न केवल पुलिसिया दमन का विरोध किया, बल्कि भ्रष्टाचार में डूबे राजस्व विभाग और शराब माफियाओं के साथ प्रशासन की मिलीभगत पर भी कड़े प्रहार किए।
भाकपा माले के बैनर तले ‘न्याय मार्च’ में पुलिसिया जुल्म और भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश प्रकट करते कार्यकर्ता
अस्पताल चौक से गूंजी इंकलाब की आवाज
शनिवार की सुबह ताजपुर का अस्पताल चौक लाल झंडों और सरकार विरोधी नारों से पट गया। भाकपा माले के कार्यकर्ता हाथों में तख्तियां लिए हुए थे, जिन पर पुलिसिया जुल्म और भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लिखे थे। अस्पताल चौक से निकला यह ‘न्याय मार्च’ शहर के मुख्य मार्गों—बाजार क्षेत्र, थाना रोड और गांधी चौक होते हुए पुनः अस्पताल चौक पर पहुंचा, जहां यह एक विशाल आक्रोश सभा में तब्दील हो गया। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे नेताओं ने आरोप लगाया कि ताजपुर पुलिस अब रक्षक नहीं बल्कि भक्षक बन चुकी है।
मनीष पोद्दार कांड: मानवता को शर्मसार करने वाली ‘थर्ड डिग्री‘
सभा के मुख्य वक्ता और खेग्रामस के जिला सचिव जीबछ पासवान ने मनीष पोद्दार के साथ हुई पुलिसिया बर्बरता का जो ब्यौरा दिया, उसने सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर दिए। उन्होंने कहा, “भाजपा-जदयू की नीतीश सरकार में पुलिस बेलगाम हो गई है। महज संदेह के आधार पर एक छोटे दुकानदार, उसकी पत्नी और वृद्ध पिता को उठाकर हाजत में बंद कर देना कानून का माखौल उड़ाना है। हद तो तब हो गई जब मनीष पोद्दार को अमानवीय यातनाएं दी गईं। आरोप है कि पुलिस ने उसके मलद्वार में सिरिंज के माध्यम से पेट्रोल डाला और डंडा घुसेड़ा। यह किसी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है।”
पासवान ने आगे कहा कि पुलिस ने कानून को ताक पर रखकर पीड़ित को 5 दिनों तक अवैध हिरासत में रखा। जब उसकी हालत बिगड़ने लगी और वह बेहोश हो गया, तब जाकर कागजी खानापूर्ति और इलाज की नौटंकी की गई। माले नेताओं ने स्पष्ट किया कि जब तक दोषी थानाध्यक्ष को बर्खास्त नहीं किया जाता, उनका आंदोलन आगे जारी रहेगा।
राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार और ‘रॉबिन ज्योति’ का वायरल विडियो बनने लगा मुद्दा
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बोलते हुए भाकपा माले के जिला कमिटी सदस्य उपेंद्र राय ने ताजपुर अंचल कार्यालय के राजस्व कर्मचारी रॉबिन ज्योति का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार अब बंद कमरों से निकलकर खुलेआम वीडियो के रूप में जनता के सामने है। रॉबिन ज्योति द्वारा रिश्वत लेते हुए वीडियो वायरल होने के बावजूद प्रशासन की चुप्पी यह साबित करती है कि ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। उपेंद्र राय ने चेतावनी दी, “भ्रष्ट कर्मचारी को बचाने की साजिश रची जा रही है। अगर जिलाधिकारी ने तत्काल प्रभाव से आरोपी को बर्खास्त नहीं किया, तो भाकपा माले कलेक्ट्रेट का घेराव करेगी।”
जहरीली शराब कांड: बहादुरनगर में पसरा मातम और प्रशासनिक लीपापोती
बंगरा थाना क्षेत्र के बहादुरनगर में हुई पिता-पुत्र की संदिग्ध मौत पर ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह और प्रभात रंजन गुप्ता ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि यह मौतें जहरीली शराब पीने से हुई हैं, लेकिन प्रशासन इसे बीमारी या अन्य कारणों का रूप देकर शराब माफियाओं को संरक्षण दे रहा है। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार शराबबंदी का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ गांव-गांव में शराब की नदियां बह रही हैं। भाकपा माले ने इस कांड की उच्च स्तरीय जांच और मृतक के परिजनों को मुआवजा देने की मांग की है।
मुख्यमंत्री के आगमन पर विरोध की तैयारी: सुरेंद्र प्रसाद सिंह
सभा की अध्यक्षता कर रहे प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने अपने संबोधन में आंदोलन की भविष्य की रूपरेखा स्पष्ट कर दी। उन्होंने जिला प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि 24 जनवरी से पहले इन तमाम मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कर्पूरीग्राम आगमन पर उनका पुरजोर विरोध किया जाएगा।
सिंह ने कहा, “मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर की धरती पर आ रहे हैं, लेकिन उनके राज में गरीबों और पिछड़ों पर जुल्म हो रहा है। हम मुख्यमंत्री के सामने काली तख्तियां दिखाकर उनसे जवाब मांगेंगे कि आखिर ताजपुर की पुलिस और प्रशासन इतना निरंकुश क्यों है?”
क्षेत्रीय नेताओं की एकजुटता
इस आक्रोश सभा को माले नेता आसिफ होदा, राजदेव प्रसाद सिंह, शंकर महतो, संजीव राय, मो० एजाज, चांद बाबू, मो० नौशाद, मो० शाद, सुनील कुमार शर्मा, मनोज साह, दिनेश प्रसाद सिंह, महावीर सिंह, मो० शकील और रॉकी खान ने भी संबोधित किया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि ताजपुर की धरती अब दमन बर्दाश्त नहीं करेगी और इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया जाएगा।
प्रमुख मांगें जिन पर अड़ा है विपक्ष:
थानाध्यक्ष की बर्खास्तगी: मनीष पोद्दार को थर्ड डिग्री टॉर्चर करने वाले थानाध्यक्ष पर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज हो।
भ्रष्टाचार पर वार: राजस्व कर्मचारी रॉबिन ज्योति को तत्काल सेवामुक्त किया जाए।
न्यायिक जांच: बहादुरनगर जहरीली शराब कांड की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए।
मुआवजा: पुलिसिया प्रताड़ना के शिकार मनीष पोद्दार को उचित मुआवजा और सरकारी मदद दी जाए।
शाम ढलते-ढलते सभा समाप्त हुई, लेकिन ताजपुर के राजनीतिक गलियारों में इस ‘न्याय मार्च’ ने खलबली मचा दी है। अब देखना यह है कि प्रशासन माले की इन मांगों पर क्या रुख अपनाता है।
मुजफ्फरपुर। उत्तर बिहार के प्रतिष्ठित महंत दर्शन दास महिला महाविद्यालय (MDDM) के सभागार में बिहार विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (बुस्टा) की महाविद्यालय इकाई द्वारा ‘नव-वर्ष मिलन समारोह सह आम बैठक 2026’ का भव्य आयोजन किया गया। यह आयोजन केवल एक औपचारिक मिलन समारोह नहीं, बल्कि शिक्षक एकता और अधिकारों के प्रति संकल्पबद्धता का एक मंच बन गया। कार्यक्रम की मुख्य गूँज ‘संगठन में ही शक्ति है‘ के नारे के साथ पूरे परिसर में सुनाई दी।
निर्भय नेतृत्व की आवश्यकता पर बल
बैठक की अध्यक्षता करते हुए बुस्टा की महाविद्यालय अध्यक्ष डॉ. विनीता झा ने शिक्षक आंदोलन के ऐतिहासिक पन्नों को पलटते हुए वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर विमर्श किया। उन्होंने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में शिक्षकों को केवल शैक्षणिक कार्यों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए मुखर होना होगा। डॉ. झा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “नेतृत्व का पहला और अनिवार्य गुण निर्भयता है। जो व्यक्ति निर्भय नहीं है, वह नेतृत्व के योग्य नहीं हो सकता। एक शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक होता है, इसलिए हमें अपनी समस्याओं पर निर्भीकता से बात करनी होगी।”
बैठक को संबोधित करती बुस्टा की महाविद्यालय अध्यक्ष डॉ. विनीता झा
‘जिंदा हो तो जिंदा नजर आना होगा‘
कार्यक्रम का संचालन और आह्वाहन बुस्टा की महाविद्यालय सचिव डॉ. कुमारी सरोज द्वारा किया गया। उन्होंने अपने संबोधन में जोश भरते हुए आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब नई पीढ़ी के शिक्षकों को नेतृत्व की कमान संभालनी होगी। उन्होंने कहा, “सफलता और अधिकार थाली में सजाकर नहीं मिलते। अगर हम जीवित समाज का हिस्सा हैं, तो हमें अपनी जीवंतता का प्रमाण देना होगा। अपने वाजिब हक को प्राप्त करने के लिए सत्ता की हठधर्मिता से टकराना अनिवार्य है।” उनके इस वक्तव्य ने उपस्थित शिक्षक समुदाय के बीच ऊर्जा का संचार किया।
संघर्ष ही सफलता की कुंजी: डॉ. किरण झा
विश्वविद्यालय इकाई सचिव डॉ. किरण झा ने इस मौके पर शिक्षक संघ की प्रासंगिकता और उसकी ऐतिहासिक देन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज हम जिन सुविधाओं और सम्मान के साथ कार्य कर रहे हैं, वह पूर्ववर्ती शिक्षक नेताओं के कड़े संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बिना सामूहिक संघर्ष के कुछ भी प्राप्त करना असंभव है। “संगठन ही हमारी वह शक्ति है जो प्रशासन और सरकार को हमारी मांगों पर विचार करने के लिए विवश करती है।”
वरिष्ठ शिक्षाविदों की गरिमामयी उपस्थिति
बैठक के दौरान कॉलेज के विभिन्न विभागों के शिक्षकों ने अपनी समस्याओं और भविष्य की कार्ययोजनाओं पर संवाद किया। इस अवसर पर संगठन को जमीनी स्तर पर और अधिक मजबूत करने के लिए सदस्यता अभियान और नियमित बैठकों पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम में मुख्य रूप से निम्नलिखित पदाधिकारियों और वरिष्ठ शिक्षकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई:
डॉ. निशिकांति (कोषाध्यक्ष)
डॉ. शकीला अज़ीम एवं डॉ. स्वस्ति वर्मा (वरिष्ठ शिक्षिकाएं)
डॉ. प्रियम फ्रांसिस एवं डॉ. आभा कुमारी (सह सचिव)
बैठक को संबोधित करती बुस्टा की विश्वविद्यालय इकाई सचिव डॉ. किरण झा
एकजुटता का संकल्प और शुभकामनाएँ
समारोह के दूसरे चरण में नव-वर्ष 2026 का हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया गया। शिक्षकों ने एक-दूसरे को नवीन वर्ष की शुभकामनाएं दीं और सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे संगठन के झंडे तले एकजुट रहेंगे। वक्ताओं ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि एम.डी.डी.एम. कॉलेज इकाई हमेशा से शिक्षक हितों के लिए अग्रणी रही है।
बैठक के अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ सभा का समापन हुआ। इस मिलन समारोह ने यह स्पष्ट कर दिया कि आने वाले समय में बुस्टा अपनी मांगों को लेकर और अधिक आक्रामक और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
सकरा, मुजफ्फरपुर: उत्तर भारत में बढ़ती ठंड और शीतलहर के प्रकोप को देखते हुए सामाजिक सरोकारों की दिशा में एक सराहनीय पहल की गई है। सकरा बाजिद पंचायत के तुलसीमोहनपुर गांव स्थित मांझी टोला में असहाय और मजबूर परिवारों की मदद के लिए राहत सामग्री वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कड़ाके की ठंड से जूझ रहे दर्जनों परिवारों के बीच घर घर जाकर कंबल, स्वेटर और अन्य गर्म कपड़ों का वितरण किया गया।
वरिष्ठ समाजसेवियों ने बढ़ाया मदद का हाथ
सामग्री वितरण कार्यक्रम का नेतृत्व क्षेत्र के चर्चित समाजसेवी एवं पूर्व मुखिया प्रत्याशी राजेश कुमार ने किया। इस पुनीत कार्य में समस्तीपुर से आए अतिथि समाजसेवी रामचंद्र राम और उनकी धर्मपत्नी शकुंतला देवी ने भी विशेष रूप से शिरकत की। इन अतिथियों ने अपने हाथों से बुजुर्गों और बच्चों को गर्म कपड़े पहनाए, जिससे कड़ाके की ठंड में उनके चेहरों पर मुस्कान लौट आई।
महिला को चादर ओढ़ाने के लिए हाथ में चादर लिए शकुंतला देवी
मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म: राजेश कुमार
इस अवसर पर उपस्थित ग्रामीणों को संबोधित करते हुए समाजसेवी राजेश कुमार ने अत्यंत भावुक और प्रेरक विचार साझा किए। उन्होंने कहा, “मानव सेवा ही संसार का सबसे बड़ा धर्म है। दुनिया में असहाय, लाचार और बेबस लोगों की सेवा करने से जो आत्मिक शांति और सच्चा आशीर्वाद मिलता है, वह किसी अन्य कार्य से संभव नहीं है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि इंसानियत और मानवता से बड़ा कोई कर्म नहीं है। समाज के सक्षम लोगों को आगे आकर अपने आसपास के जरूरतमंदों की सुध लेनी चाहिए, ताकि कोई भी गरीब ठंड या अभाव के कारण कष्ट न भोगे।
भावी पीढ़ी को सेवा का पाठ: बेटी लक्ष्मी कुमारी ने भी निभाई भूमिका
इस कार्यक्रम की एक खास विशेषता यह रही कि राजेश कुमार ने अपनी पुत्री लक्ष्मी कुमारी को भी इस अभियान में सक्रिय रूप से शामिल किया। लक्ष्मी ने स्वयं अपने हाथों से जरूरतमंदों की मदद की।
अपनी बेटी को साथ लाने के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए राजेश कुमार ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी बचपन से ही समाज की जमीनी हकीकत और गरीबी को करीब से देखे। उसे यह अहसास हो कि समाज के प्रति हमारी क्या जिम्मेदारी है। मैं उसे इन संस्कारों से रूबरू करा रहा हूँ ताकि भविष्य में जब मैं न रहूँ, तब भी वह मानवता की इस मशाल को जलाए रखे और इसी तरह समाज सेवा के कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाती रहे।”
चादर ओढ़ने के बाद आत्मीय मुद्रा में दिव्यांग व्यक्ति , एवं चादर वितरित करते राजेश राम (दायें से)
ग्रामीणों में खुशी की लहर
भीषण ठंड के इस मौसम में अचानक मिली इस मदद से मांझी टोला के निवासी काफी गदगद नजर आए। ग्रामीणों ने कहा कि जब सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर मदद पहुंचने में देरी होती है, तब राजेश कुमार जैसे समाजसेवियों की पहल उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं होती।
कार्यक्रम के अंत में रामचंद्र राम और शकुंतला देवी ने भी समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और कहा कि सेवा का यह सिलसिला भविष्य में भी जारी रहेगा। इस मौके पर टोले के गणमान्य व्यक्ति और बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण उपस्थित रहे।
भारत की सांस्कृतिक चेतना में कथाएं केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वे समय के पदचिह्न हैं। झारखंड के देवघर जिले में स्थित बैद्यनाथ धाम (रावणेश्वर धाम) की महिमा तो जगत व्याप्त है, लेकिन मुख्य मंदिर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसी जगह है, जहां अध्यात्म और आधुनिक विज्ञान के तर्क आपस में टकराते हैं। यह स्थान है ‘हरला जोरी’, जहां मौजूद है— रावण कुंड।
1. पौराणिक पृष्ठभूमि: कैलाश से लंका का वो अधूरा सफर
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, लंकाधिपति रावण अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर उन्हें लिंग स्वरूप में लंका ले जा रहा था। महादेव ने शर्त रखी थी कि “रावण, यदि तुमने मुझे रास्ते में कहीं भी पृथ्वी पर रखा, तो मैं वहीं अचल हो जाऊंगा।”
देवता नहीं चाहते थे कि शिव जैसी महाशक्ति का वास लंका में हो। जब रावण देवघर के समीप पहुँचा, तो वरुण देव ने उसके उदर में प्रवेश किया, जिससे उसे तीव्र लघुशंका (Urination) की अनुभूति हुई। रावण दुविधा में था। तभी वहां एक ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु प्रकट हुए। रावण ने उन्हें शिवलिंग थमाया और निवृत्त होने चला गया। वह लघुशंका इतनी दीर्घ और तीव्र थी कि वहां जल का एक बड़ा स्रोत बन गया, जिसे आज रावण कुंड या रावण जोर कहा जाता है।
हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर
2. भौगोलिक साक्ष्य: हरला जोरी का त्रिकोण
स्थानीय विद्वान पूर्णानंद ओझा की कृति ‘हरिला जोरी तीर्थ महात्म्य’ इस स्थान के तीन प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित करती है:
हरला जोरी शिव मंदिर: जहां आज भी भक्त श्रद्धा से सिर झुकाते हैं।
विष्णुपद मंदिर :हरला जोरी – गया (बिहार) के बाद भारत का यह दूसरा दुर्लभ मंदिर है जहां भगवान विष्णु के पदचिह्न पूजे जाते हैं। माना जाता है कि इसी स्थान पर विष्णु ने शिवलिंग हाथ में लिया था।
रावण कुंड: वह जलधारा जो रावण की लघुशंका से उत्पन्न मानी जाती है।
3. मेडिकल जांच का तर्क: क्या यह जल ‘यूरीन’ के गुणों से युक्त है?
आज का विज्ञान हर तथ्य को प्रमाण की कसौटी पर कसता है। सवाल यह है कि क्या हज़ारों साल बाद भी उस जल में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो उसे मानव मूत्र या किसी विशिष्ट जैविक द्रव्य (Biological Fluid) के करीब ले जाते हैं?
हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर के समीप रावण के द्रारा लघुशंका का प्रतीकरत्मक द्श्य
चमत्कारी उपचार: स्थानीय लोगों का दावा है कि इस कुंड के जल से स्नान करने पर असाध्य चर्म रोग, फोड़े और फुंसियां ठीक हो जाती हैं। आयुर्वेद में ‘स्व-मूत्र चिकित्सा’ (Shivambu Therapy) का वर्णन है। क्या इस कुंड के जल में यूरिया या अमोनिया के कोई सूक्ष्म अंश आज भी विद्यमान हैं?
पैथोलॉजिस्ट का नजरिया: एक जनरल फिजिशियन और पैथोलॉजिस्ट के अनुसार, सामान्यतः मूत्र में यूरिया, क्रिएटिनिन और यूरिक एसिड होता है। यदि हज़ारों साल पहले की किसी घटना के अवशेष जांचने हों, तो उसके लिए ‘सडिमेंटेशन’ और ‘आर्कियोलॉजिकल साइंस’ का सहारा लेना होगा।
4. वैज्ञानिक चुनौतियां और ‘राइट टाइमिंग’
यदि हम आज इस कुंड के जल का सैंपल लें, तो रिपोर्ट ‘नॉर्मल वाटर’ ही आएगी। इसके दो प्रमुख कारण हैं:
प्रदूषण और मिक्सिंग: वर्तमान में रावण कुंड के पास पक्का नाला बना दिया गया है। बारिश के मौसम में आसपास का पहाड़ी पानी इसमें मिल जाता है, जिससे इसकी मौलिकता की जांच करना असंभव हो जाता है।
मई-जून का इंतज़ार: वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इस रहस्य की तह तक जाना है, तो मई या जून की भीषण गर्मी सबसे उपयुक्त समय है। तब बरसाती नाले सूख जाते हैं और केवल वही जल शेष रहता है जो जमीन के भीतर से ‘सोते’ के रूप में निकलता है। तभी लिए गए सैंपल से वास्तविक रसायनिक संरचना का पता चल सकता है।
हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर के समीप रावण के द्रारा किये गये लघुशंका स्थल का द्श्य
5. एक प्राकृतिक रहस्य: जमीन से स्वतः फूटता जल
दिलचस्प बात यह है कि हरला जोरी के पास श्यामा मंदिर परिसर में एक ऐसा हैंडपंप है, जिससे बिना चलाए ही पानी निकलता रहता है। यह इस क्षेत्र के एक विशेष ‘एक्विफर’ (भू-जल स्रोत) की ओर इशारा करता है। क्या रावण की कथा वास्तव में एक विशाल भू-वैज्ञानिक बदलाव (Geological Change) का आध्यात्मिक चित्रण है?
निष्कर्ष: आस्था और तर्क का संगम
रावण कुंड आज भी देवघर की उस लुप्त कड़ी के समान है, जिसे मुख्यधारा के पर्यटकों ने अभी पूरी तरह नहीं पहचाना है। यह स्थान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शोध का केंद्र बनने की योग्यता रखता है। जब तक विज्ञान इस पर अंतिम मुहर नहीं लगाता, तब तक यह आस्था का वह ‘अजस्र स्रोत’ बना रहेगा जो सदियों से बह रहा है और कभी सूखता नहीं।
आगामी अन्वेषण: मई की तपती गर्मी में ‘रावण कुंड‘ की लाइव इन्वेस्टिगेशन
न्यूज भारत टीवी केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करता। हम तथ्यों की गहराई तक जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसलिए, हमने निर्णय लिया है कि हम इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए मई की भीषण गर्मी में एक विशेष ‘लाइव इन्वेस्टिगेशन‘ करेंगे।
हम मई का महीना ही क्यों चुन रहे हैं?
वर्तमान में, वर्षा ऋतु और सामान्य मौसम के कारण ‘रावण कुंड’ का मूल जल आसपास की पहाड़ियों से आने वाले सतही जल (Surface Water) के साथ मिल चुका है। किसी भी वैज्ञानिक जांच के लिए ‘शुद्ध और मूल नमूना’ (Pure Sample) अनिवार्य है।
प्राकृतिक शुद्धता: मई की चिलचिलाती धूप में जब आसपास के तमाम जल स्रोत और बरसाती नाले सूख जाते हैं, तब रावण कुंड का असली स्वरूप उभरता है।
सोते का रहस्य: उस समय जो जलधारा शेष रहेगी, वह सीधे जमीन के भीतर से आने वाला वह ‘सोता’ होगा जिसका वर्णन कथाओं में है।
गंध और संरचना: स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि भीषण गर्मी में इस कुंड के पानी के रंग और गंध में विशिष्ट बदलाव आते हैं, जो सामान्य जल से भिन्न होते हैं।
हमारी जांच के मुख्य बिंदु (Investigation Roadmap):
साइंटिफिक सैंपलिंग (Scientific Sampling): हम विशेषज्ञों और पैथोलॉजिस्ट की एक टीम के साथ ‘हरला जोरी’ पहुंचेंगे। रावण कुंड के उस मूल स्थान से जल का नमूना लिया जाएगा जहां से धारा फूटती है। हम इसकी जांच लैब में कराएंगे ताकि यह पता चल सके कि क्या इसमें अमोनिया, यूरिया, या सल्फर जैसे तत्वों की मात्रा सामान्य से अधिक है।
हाइड्रोलॉजिकल मैपिंग (Hydrological Mapping): हम भू-गर्भ वैज्ञानिकों (Geologists) से यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या यह केवल एक ‘आर्टिसियन वेल’ (पाताल तोड़ कुआं) की प्रक्रिया है या इस विशिष्ट स्थान की मिट्टी और पत्थरों में कुछ ऐसा है जो इस जल को औषधीय बनाता है।
चमत्कार का साक्ष्य: कहा जाता है कि इस कुंड के पानी से चर्म रोग ठीक होते हैं। हम ऐसे लोगों से बात करेंगे जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से इस जल का लाभ उठाया है और इसकी तुलना मेडिकल साइंस के ‘एंटी-बैक्टीरियल’ सिद्धांतों से करेंगे।
ऐतिहासिक साक्ष्यों का मिलान: ‘हरिला जोरी तीर्थ महात्म्य’ के पन्नों को पलटते हुए हम मौके पर उन स्मृति चिन्हों को खोजेंगे जो रावण और भगवान विष्णु के उस संवाद की पुष्टि करते हैं, जिसका उल्लेख विद्वान पूर्णानंद ओझा ने किया है।
एक चुनौती, एक खोज
यह इन्वेस्टिगेशन केवल एक खबर नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और विज्ञान के बीच के सेतु को खोजने का एक प्रयास है। क्या रावण का वह ‘वेग’ आज भी एक जलधारा के रूप में जीवित है? क्या प्राचीन कथाओं में छिपे भौतिक साक्ष्य आज के लैब टेस्ट में खरे उतरेंगे?
मई 2026 (संभावित) में न्यूज भारत टीवी की टीम देवघर की उस तपती धरती पर मौजूद रहेगी, जहां इतिहास और विज्ञान का आमना-सामना होगा।
“सत्य वही है जो प्रमाण की कसौटी पर कसा जाए। बने रहिये हमारे साथ, क्योंकि हम लाएंगे उस रिपोर्ट का परिणाम, जिसका इंतज़ार सदियों से है।”
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मुजफ्फरपुर। शहर के कैप्टन निषाद सभागार में ‘जागृति संस्थान’ के तत्वावधान में प्रख्यात कवि, नाटककार, कहानीकार और समीक्षक डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह का 71वाँ जन्मदिवस समारोह अत्यंत गरिमामय वातावरण में “प्रेरणा पर्व” के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वानों, साहित्यकारों और शोधार्थियों ने डॉ. सिंह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तृत चर्चा की।
डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह के 71वाँ जन्मदिवस समारोह में शामिल साहित्यकार
साहित्यिक गुरु और साधक के रूप में पहचान
समारोह की अध्यक्षता करते हुए बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामप्रवेश सिंह ने कहा कि डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह केवल एक सिद्ध साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक साहित्यिक गुरु भी हैं। उन्होंने अपनी रचनाशीलता के प्रकाश से अनेक नए साहित्यकारों को गढ़ा है।
ललित नारायण मिश्र मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र साह ने उन्हें एक ‘साहित्य साधक’ बताते हुए कहा कि उनकी रचनाओं से अनेक विमर्शों की सरणि (धारा) निकलती है। वहीं, संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. निभा शर्मा ने उन्हें शब्द के सच्चे अर्थों में एक ‘साहित्यिक संत’ की संज्ञा दी।
डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह के 71वाँ जन्मदिवस समारोह पर भेंट प्रदान करते अघ्यापक डा. मनोज कुमार सिंह व अन्य (बायें से)
दो सत्रों में वैचारिक और रचनात्मक विमर्श
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन, माल्यार्पण और स्वस्ति पाठ के साथ हुआ। पूरे आयोजन को दो महत्वपूर्ण सत्रों में विभाजित किया गया था:
प्रथम सत्र: आलेख पाठ (रचनाधर्मिता पर चर्चा) इस सत्र में विद्वानों ने डॉ. सिंह की विभिन्न कृतियों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए:
डॉ. राकेश रंजन: “अक्षयवट: एक अप्रतिम नाट्य प्रयोग” पर प्रकाश डाला।
डॉ. पिंकी कुमारी: “मैं भूखा हूँ” काव्य में भूख की शाश्वतता पर चर्चा की।
डॉ. चंद्रदेव सिंह: स्त्री विमर्श के संदर्भ में “माता, पत्नी, कन्या और अन्य कविताएँ” की महत्ता बताई।
डॉ. उमेशचंद्र त्रिपाठी: डॉ. सिंह की कहानी “पहचान” का विश्लेषण करते हुए इसे वर्तमान दौर के संकट की छाया बताया।
अन्य वक्ता: डॉ. रामसंयोग राय, अमरेंद्र कुमार झा और डॉ. राजेंद्र साह ने भी उनके रचना संसार और कृषक वेदना पर प्रभावी आलेख पढ़े।
डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह के 71वाँ जन्मदिवस समारोह में शामिल साहित्यकार एवं परिजन
द्वितीय सत्र: कवि सम्मेलन “फूलों की पंखुड़ियां बोले…” दूसरे सत्र में काव्य रस की वर्षा हुई। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामेश्वर द्विवेदी की अध्यक्षता और डॉ. पंकज कर्ण के संचालन में कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं।
डॉ. पुष्पा गुप्ता ने “फूलों की पंखुड़ियां बोले, है आज जन्मदिन तेरा” पढ़कर डॉ. सिंह को बधाई दी।
डॉ. पंकज कर्ण ने ग़ज़ल “उदासी के सफ़र में धूप को ओढ़ा बिछाया है” से समां बांधा।
गीतकार डॉ. चंद्रदेव सिंह, श्रवण कुमार और विनोद कुमार ने भी अपनी गीतों व कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम को संबोधित करते एम डी डी एम कॉलेज के हिन्दी के प्राध्यापक डा. राकेश रंजन
विशिष्ट जनों के उद्गार
डॉ. अमरेन्द्र ठाकुर: डॉ. सिंह ने अपनी ईमानदारी और कठोर परिश्रम से असंभव को संभव बनाया है।
डॉ. पुष्पा गुप्ता: उनकी कृतियां बोलती हैं, उन पर और अधिक शोध कार्य की आवश्यकता है।
डॉ. रामेश्वर राय: उनके संपर्क में आने वाला पाठक स्वयं लेखक बन जाता है।
डॉ. मनोज कुमार सिंह: उनकी साहित्य-साधना ‘हिमगिरि की स्रोतस्विनी’ (नदी) की तरह है जो निरंतर हरियाली फैला रही है।
“प्रेरणा पर्व” के इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह का साहित्य समाज के हर वर्ग और विमर्श को गहराई से छूता है। कार्यक्रम में भारी संख्या में साहित्य प्रेमी और प्रबुद्ध जन उपस्थित थे।
मुजफ्फरपुर, बिहार। इतिहास की धूल में अक्सर कई ऐसे हीरे दब जाते हैं जिनकी चमक सूरज को मात देने वाली होती है। बिहार की ज्ञान-भूमि मुजफ्फरपुर के ‘रघुनाथपुर दोनमा’ गाँव (सकरा प्रखण्ड) से निकला एक ऐसा ही नाम है— डॉ. जगदीश साहु। वे केवल एक वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के एक ऐसे ‘ऋषि’ थे जिन्होंने एक हाथ में विज्ञान की मशाल थामी थी और दूसरे हाथ में समाजवाद का झंडा। यह कहानी एक ऐसे महामानव की है जिसने नेहरू के लोकसभा ऑफर को ठुकराया, ऑक्सफोर्ड में रिकॉर्ड बनाया और अंततः ‘पारस पत्थर’ के रहस्य को सुलझाते हुए दुनिया से विदा ली।
डॉ. जगदीश साहु
अभावों की भट्टी में तपा बचपन: संकल्पों का उदय
डॉ. जगदीश साहु का जन्म 1 जनवरी 1925 को एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री जुगेश्वर साहु पेशे से सोनार थे। गाँव की तंग गलियों और फटेहाली के बीच जगदीश का बचपन बीता। अक्सर गरीबी मेधा का गला घोंट देती है, लेकिन यहाँ पिता का संकल्प फौलादी था।
जब गाँव के लोग ताना देते कि “सोनार का बेटा पढ़कर क्या करेगा, इसे दुकान पर बैठाओ”, तब जुगेश्वर साहु ने ऐतिहासिक शब्द कहे थे: “मैं भूखा रह जाऊँगा, घर बेच दूँगा, पर जगदीश को पढ़ाऊँगा।”
जगदीश ने भी पिता के मान को गिरने नहीं दिया। अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए वे बचपन से ही छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे। जिला स्कूल मुजफ्फरपुर से 1943 में मैट्रिक प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर उन्होंने अपनी मेधा का पहला परिचय दिया।
संघर्षों से स्वर्ण पदक तक: पटना का वह कठिन दौर
उच्च शिक्षा के लिए वे पटना विश्वविद्यालय पहुँचे, लेकिन नियति ने यहाँ उनकी परीक्षा ली। एम.एससी. (M.Sc.) के दौरान पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए। घर का चूल्हा और पिता की दवा, दोनों की जिम्मेदारी जगदीश के कंधों पर आ गई।
उन्होंने पढ़ाई छोड़ने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। वे दिन में पटना सचिवालय में सहायक (Assistant) के रूप में नौकरी करते और रात भर लैम्प की रोशनी में पढ़ते। 1953 का वह साल मुजफ्फरपुर के लिए गौरव का क्षण था जब जगदीश साहु ने पूरे विश्वविद्यालय में स्वर्ण पदक (Gold Medal) के साथ एम.एससी. उत्तीर्ण की।
ऑक्सफोर्ड का ऐतिहासिक सफर: डेढ़ साल में रची क्रांति
डॉ. साहु की असली उड़ान तब शुरू हुई जब उन्होंने विश्वविख्यात वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन का एक शोध पत्र पढ़ा। उन्होंने अपना शोध सारांश (Synopsis) बॉवेन को भेजा। बॉवेन उनकी प्रतिभा से इतने दंग रह गए कि उन्हें तुरंत ऑक्सफोर्ड बुला लिया।
विश्वविख्यात वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन के साथ प्रयोगशाला में डॉ. जगदीश साहु
11 सितंबर 1956 को वे इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। वहाँ डॉ. साहु ने वह कर दिखाया जो आज भी एक रिकॉर्ड है। जिस पीएचडी (Ph.D.) को पूरा करने में गोरे वैज्ञानिकों को 4 साल लगते थे, डॉ. साहु ने उसे मात्र डेढ़ वर्ष में पूरा कर लिया। उनके शोध पत्र अमेरिका की ‘केमिकल सोसाइटी’ और ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ में प्रमुखता से छापे गए।
विदेशी प्रलोभन और चरित्र की शुचिता: ‘सच्चे भारतीय ‘
ऑक्सफोर्ड में प्रवास के दौरान उनके सामने एक ऐसा प्रलोभन आया जो किसी भी युवा को डगमगा सकता था। एक बड़े विदेशी वैज्ञानिक ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर अपनी बेटी से विवाह का प्रस्ताव दिया। साथ ही, इंग्लैंड में ही स्थायी प्रोफेसर की नौकरी और ऐशो-आराम का प्रलोभन भी दिया गया, जिसे इन्होंने अस्वीकार कर दिया, इस घटना के कुछ ही दिनों के बाद, इन्हें रसायन विज्ञान से जुड़े एक विशेष शोध कार्य के लिए ऑक्सफोर्ड में ही आमंत्रित किया गया, जिसमें पत्नी का स्नातक उत्तीर्ण होने की बाध्यता रखी गई, लेकिन डा. साहु पहले से शादी सुदा थे, और पत्नी स्नातक नहीं थी, जिसके कारण इन्होंने शोध को अस्वीकार कर दिया, जब ये किसी झासे में (प्रस्ताव पर सहमत) नहीं हुए और जब ये स्वदेश के लिए वापस चल दिए, तो इनको वहां रोकने का हर संभव प्रयास किया गया, बाद में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के हस्तक्षेप के बाद ये भारत वापस आ सके,
लेकिन डॉ. साहु का चरित्र हिमालय जैसा अडिग था। भारत में उनकी पत्नी इंतज़ार कर रही थीं, जो सामाजिक पैमानों पर शायद उतनी सुंदर नहीं मानी जाती थीं। परंतु डॉ. साहु के लिए वे उनकी अर्द्धांगिनी थीं। उन्होंने उस सुनहरे विदेशी प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया— ” मेरा वतन और मेरा परिवार मेरे लिए सर्वोपरि है।” यह उनके ‘समर्पित पति’ और सच्चे भारतीय होने का सबसे बड़ा प्रमाण था।
स्वदेश वापसी और राजनीति का दंश
डॉ. साहु अपनी मेधा का लाभ बिहार को देना चाहते थे, इसलिए वे 1960 में भारत लौट आए। लेकिन यहाँ उन्हें ‘भाई-भतीजावाद’ और गंदी राजनीति का सामना करना पड़ा। बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने उनके नाम की सिफारिश की, लेकिन कुछ रसूखदारों ने उनकी नियुक्ति रुकवा दी।
आहत होकर वे 1961 में लीबिया चले गए। लीबिया विश्वविद्यालय में उन्हें प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष (HOD) का पद मिला। वहाँ उन्होंने धन और यश दोनों कमाया, लेकिन अपनी मिट्टी की खुशबू उन्हें 1964 में वापस मुजफ्फरपुर खींच लाई।
हिंदी में विज्ञान लेखन: एक क्रांतिकारी पहल
डॉ. साहु का मानना था कि विज्ञान जब तक आम आदमी की भाषा में नहीं होगा, देश आगे नहीं बढ़ेगा। उन्होंने उस दौर में लगभग 20 पुस्तकें हिंदी में लिखीं। ‘मोतीलाल बनारसीदास’ जैसे प्रकाशकों ने उनकी किताबों को घर-घर पहुँचाया। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने उन्हें इस सेवा के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया।
राजनीति के चाणक्य और नेहरू का प्रस्ताव
डॉ. साहु केवल विज्ञान के कमरे में बंद नहीं रहे। वे बिहार की राजनीति के केंद्र बन गए।
नेहरू का ऑफर: देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें मुजफ्फरपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने का टिकट ऑफर किया। लेकिन डॉ. साहु ने विनम्रता से कहा— “नेहरू जी, राजनीति के लिए बहुत लोग हैं, मुझे विज्ञान और शिक्षा की सेवा करने दीजिए।”
नेताओं के मार्गदर्शक: वे जननायक कर्पूरी ठाकुर, डॉ. रामचन्द्र पूर्वे, डॉ. शीतल राम और डॉ. कुमकुम कटियार जैसे बिहार के राजनेताओं के पथ-प्रदर्शक (Mentor) रहे। इन नेताओं ने डॉ. साहु के समाजवादी विचारों से ही अपनी राजनीति को सींचा।
बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में स्थित डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय का दृश्य
सच्चे समाजवादी: ‘लोहिया कॉलेज’ का निर्माण
डॉ. साहु डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनन्य प्रशंसक थे। जब उन्होंने मुजफ्फरपुर में कॉलेज की स्थापना की, तो लोग चाहते थे कि वे इसे अपने माता-पिता का नाम दें। लेकिन इस सच्चे समाजवादी ने उसे एक स्मारक के रूप में ‘लोहिया कॉलेज’ का नाम दिया। उन्होंने अपनी लीबिया की सारी कमाई इस कॉलेज को खड़ा करने में लगा दी।
मुजफ्फरपुर शहर में स्थित डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय परिसर में स्थापित डा. जगदीश साहु एवं डा. लोहिया के स्टैचु का दृश्य
विलक्षण क्षमता: दोनों हाथों से एक साथ लेखन
डॉ. साहु की मेधा का एक और अद्भुत पक्ष था— उनकी ‘एम्बिडेक्सट्रस’ (Ambidextrous) शक्ति। वे ब्लैकबोर्ड पर एक साथ दोनों हाथों से अलग-अलग विषयों के जटिल समीकरण लिख सकते थे। यह दृश्य उनके छात्रों के लिए किसी जादू से कम नहीं होता था। यह उनके मस्तिष्क की असीमित क्षमता का परिचायक था।
अंतिम मिशन: ‘पारस पत्थर’ और अधूरा सपना
अपने जीवन के अंतिम दिनों में डॉ. साहु एक क्रांतिकारी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। बचपन में पिता से सुनी ‘पारस पत्थर’ की लोक-कथाओं को उन्होंने वैज्ञानिक आधार दिया। वे तत्वों के रूपांतरण (Transmutation of Elements) के जरिए सोना बनाने की तकनीक विकसित करने के बहुत करीब पहुँच चुके थे। उनके नोट्स बताते हैं कि वे उस रहस्य की दहलीज पर थे, जिसने सदियों से वैज्ञानिकों को ललचाया था। लेकिन 1969 के दशक में एक अचानक आए हृदय घात (Heart Attack) ने इस महान वैज्ञानिक की जीवन-लीला समाप्त कर दी। उनके साथ ही वह ‘पारस’ का रहस्य भी दफन हो गया।
एक युग का अंत
डॉ. जगदीश साहु का जीवन हमें सिखाता है कि गरीबी केवल एक स्थिति है, अंत नहीं। उन्होंने मुजफ्फरपुर की गलियों से ऑक्सफोर्ड के हॉलों तक का सफर अपनी नैतिकता, मेधा और संघर्ष के दम पर तय किया। आज जब हम लोहिया कॉलेज को देखते हैं या उनकी हिंदी विज्ञान पुस्तकों को पढ़ते हैं, तो हमें उस महान आत्मा का अहसास होता है जिसने सत्ता को ठुकराकर सत्य (विज्ञान) को चुना।
संघर्ष से सफलता का शिखर: मेधा शक्ति और लेखनी के बूते डॉ. जगदीश साहु ने वह किया जो शहर के बड़े अरबपतियों को नसीब नहीं,
सच्चे समाजवादी: डॉ. राम मनोहर लोहिया के प्रति अटूट श्रद्धा
डॉ. जगदीश साहु के जीवन का एक ऐसा पहलू है जो उन्हें अन्य विद्वानों से अलग खड़ा करता है। वे डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से गहरे प्रभावित थे। जब उन्होंने मुजफ्फरपुर में एक कॉलेज की स्थापना का बीड़ा उठाया, तो उनके सामने अपने माता-पिता के नाम पर संस्थान बनाने का विकल्प मौजूद था, जो उस समय एक सामान्य परंपरा थी।
निस्वार्थ कदम: अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता को देने के बावजूद, उन्होंने अपने व्यक्तिगत गौरव के बजाय समाजवाद के पुरोधा डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम को चुना। उन्होंने मुजफ्फरपुर में ‘लोहिया कॉलेज’ की स्थापना की।
विचारधारा की जीत: यह कदम उनके सच्चे समाजवादी होने का प्रमाण था। वे चाहते थे कि शिक्षा का केंद्र किसी व्यक्ति या परिवार की संपत्ति न बनकर एक ऐसी विचारधारा का प्रतीक बने जो समाज केवंचित और पिछड़े वर्ग के उत्थान की बात करती हो।
त्याग की प्रतिमूर्ति: डॉ. साहु ने लीबिया से कमाया हुआ धन और अपना कीमती समय इस कॉलेज को सींचने में लगा दिया। अपने पूर्वजों के नाम के बजाय एक जननायक के नाम पर शिक्षण संस्थान खोलना उनकी उदारता और महानता को दर्शाता है।
डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय परिसर में डा. जगदीश साहु के नाम पर रसायन विज्ञान विभाग का बाहरी दृश्य
डॉ. जगदीश साहु के जीवन को रेखांकित करता घटना क्रम : जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रसायन विज्ञान (Chemistry) के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया।
प्रमुख शोध पत्र (Research Papers)
डॉ. साहु के शोध मुख्य रूप से ‘फोटो केमिस्ट्री’ (Photo Chemistry) और ‘भौतिक रसायन’ (Physical Chemistry) पर केंद्रित थे। उनके कार्यों को अमेरिका और इंग्लैंड के शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों ने मान्यता दी:
The Fluorescence of Acridine and Acridone solutions: यह शोध पत्र अक्टूबर 1958 में अमेरिका की ‘केमिकल सोसाइटी’ द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस कार्य की महत्ता इतनी अधिक थी कि लंदन के ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ ने भी इसे विशेष अनुमति के साथ प्रकाशित किया।
The Absorption spectra of Hill-Reaction oxidants: कैलिफोर्निया के ‘स्टैंडर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के वैज्ञानिकों (जैसे रूडोल्फ जे. मार्कस और जेम्स एल. हैचेट) ने अपने शोध में डॉ. साहु के इस कार्य की सहायता ली थी।
The Effect of Temperature and Viscosity on Fluorescence: 1960 में ‘जर्नल इंडियन केमिकल सोसाइटी’ (Vol. 37) में प्रकाशित इस शोध में उन्होंने कार्बनिक यौगिकों पर तापमान और श्यानता के प्रभाव का अध्ययन किया था।
The Reduction of Kinetics of Nitrobenzene by Acid Stannous Chloride: यह शोध भी 1960 में ‘जर्नल इंडियन केमिकल सोसाइटी’ में प्रकाशित हुआ, जो रासायनिक अभिक्रियाओं की गतिशीलता (Kinetics) पर आधारित था।
The Effect of Temperature on Fluorescence of Solution: 1959 में ‘द जर्नल ऑफ फिजिकल केमिस्ट्री’ (अमेरिकन केमिकल सोसाइटी) में प्रकाशित इस शोध को उनके गुरु डॉ. ई.जे. बॉवेन के साथ संयुक्त रूप से लिखा गया था।
प्रकाशित पुस्तकें (Published Books)
डॉ. साहु ने उस दौर में विज्ञान को हिंदी में लिखने का साहस किया जब विज्ञान की अधिकांश उच्च स्तरीय सामग्री केवल अंग्रेजी में उपलब्ध थी:
विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें: उन्होंने माध्यमिक कक्षाओं से लेकर कॉलेज स्तर तक के छात्रों के लिए लगभग 20 पुस्तकें लिखीं।
प्रकाशन संस्थान: उनकी पुस्तकें प्रसिद्ध प्रकाशक ‘मोतीलाल बनारसीदास’ और ‘बिहार पब्लिकेशन हाउस, पटना’ द्वारा प्रकाशित की गई थीं।
ऐतिहासिक महत्व: डॉ. साहु संभवतः उस समय के पहले ऐसे प्रोफेसर थे जिन्होंने पूरे भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों के लिए इतनी बड़ी संख्या में विज्ञान की पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध कराईं। उनकी इन पुस्तकों ने हिंदी माध्यम के छात्रों के बीच विज्ञान के प्रति विश्वास पैदा किया।
Photo Chemistry in the Liquid and Solid States: इस नाम की एक पुस्तक में उनके शोध प्रबंधों (Thesis) और महत्वपूर्ण खोजों को संकलित किया गया है, जिसे ‘द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ से संबद्ध माना जाता है।
सम्मान और मान्यता
स्वर्ण पदक (Gold Medal): 1953 में एम.एससी. में प्रथम आने पर उन्हें स्वर्ण पदक मिला।
ऑक्सफोर्ड रिकॉर्ड: उन्होंने अपनी पीएचडी मात्र डेढ़ वर्ष में पूरी की, जो ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के इतिहास में एक रिकॉर्ड माना गया।
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्: हिंदी में विज्ञान की महान सेवा के लिए उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का ‘सम्मानित सदस्य’ मनोनीत किया गया था।
डॉ. साहु का मानना था कि “सर्वेगुणाः कांचनाश्रयन्ति” (सभी गुण सोने/धन के आश्रित होते हैं) वाली सोच गलत है; उनके लिए ज्ञान और उसकी अभिव्यक्ति (विशेषकर मातृभाषा में) सबसे ऊपर थी।
ऑक्सफोर्ड का संघर्ष: डेढ़ साल में रचा इतिहास
डॉ. साहु 11 सितंबर 1956 को ऑक्सफोर्ड के लिए रवाना हुए थे। वहाँ का जीवन उनके लिए आर्थिक और मानसिक रूप से एक बड़ी परीक्षा थी:
अभूतपूर्व गति: डॉ. साहु ने शोध का विषय ‘फोटो केमिस्ट्री ऑफ एरोमैटिक्स कम्पाउंड्स’ चुना था। जिस शोध कार्य को अन्य छात्र आमतौर पर 3 से 4 वर्षों में पूरा करते थे, डॉ. साहु ने उसे मात्र डेढ़ वर्ष में ही पूरा कर लिया। यह ऑक्सफोर्ड के इतिहास में एक रिकॉर्ड जैसा था।
आर्थिक अभाव और पार्ट-टाइम काम: विदेश में पढ़ाई के दौरान उनके पास पैसों की भारी कमी थी। पत्राचार और रहने का खर्च बहुत अधिक था। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए वे खाली समय में ‘पोर्ट’ (बंदरगाह) पर भारी काम करते थे और रात के समय अस्पताल में रोगियों की सेवा-सुश्रुषा (नर्सिंग हेल्प) का कार्य करते थे ताकि पढ़ाई जारी रह सके।
डॉ. बॉवेन के साथ गुरु-शिष्य संबंध: अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन उनके गुरु थे। डॉ. साहु की मेहनत से वे इतने प्रभावित हुए कि जब डॉ. साहु भारत लौटे, तो डॉ. बॉवेन स्वयं उनसे मिलने और उनकी चर्चा करने के लिए दिल्ली आए थे।
लीबिया का दौर: आत्म-सम्मान के लिए निर्वासन
भारत लौटने के बाद डॉ. साहु को अपनी ही मातृभूमि में उपेक्षा का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उन्हें लीबिया जाना पड़ा:
राजनीति का शिकार: डॉ. साहु जब ऑक्सफोर्ड से लौटे, तो बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने उन्हें ‘रीडर’ पद के लिए अनुशंसित (Recommend) किया था। लेकिन तत्कालीन राजनीति और भाई-भतीजावाद के कारण उनकी नियुक्ति नहीं होने दी गई। इस घटना ने उन्हें मानसिक रूप से काफी चोट पहुँचाई।
लीबिया में सम्मान: बिहार में उचित स्थान न मिलने पर उन्हें विदेश से बुलावा आया। 25 नवंबर 1961 को वे लीबिया विश्वविद्यालय चले गए। वहाँ उन्हें ‘विश्वविद्यालय प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष’ (Head of Department) का प्रतिष्ठित पद मिला।
सफलता और संपत्ति: लीबिया में उन्होंने लगभग तीन साल (1964 तक) बिताए। वहाँ उन्होंने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यश कमाया, बल्कि अच्छी संपत्ति (यश और धन) भी अर्जित की।
वतन की याद: लीबिया में सफलता के बावजूद उन्हें हमेशा अपना वतन याद आता था। वे मानते थे कि “अपने वतन में रहने का ठौर-ठिकाना होना चाहिए।” इसी इच्छा के कारण 1964 में वे सब कुछ छोड़कर वापस मुजफ्फरपुर लौट आए।
मुजफ्फरपुर वापसी और अंतिम पड़ाव
जब वे लीबिया से लौटे, तो बिहार विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. प्यारे लाल श्रीवास्तव के प्रयासों से उन्हें ‘भौतिक रसायन’ के रीडर पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने मुजफ्फरपुर के आमगोला क्षेत्र में जमीन खरीदी और वहाँ बस गए। इसके बाद उनकी ख्याति इतनी फैली कि उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों से उन्हें लगातार व्याख्यानों और परीक्षाओं के लिए निमंत्रण मिलने लगे।
डॉ. साहु का जीवन सिखाता है कि योग्यता को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। डॉ. जगदीश साहु केवल एक महान वैज्ञानिक ही नहीं थे, बल्कि वे एक उच्च कोटि के इंसान और समाजसेवी भी थे।
सादगी और विनम्रता
इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के बावजूद, डॉ. साहु का जीवन सादगी की मिसाल था। ऑक्सफोर्ड से लौटने और विदेशों में रहने के बाद भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया। वे मुजफ्फरपुर में ‘एक साधारण शिक्षक’ की तरह ही रहे। वे अक्सर छात्रों और आम लोगों से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे।
मातृभाषा के प्रति अटूट प्रेम
उस दौर में जब वैज्ञानिक समुदाय में केवल अंग्रेजी का बोलबाला था, डॉ. साहु ने हिंदी भाषा को विज्ञान के प्रचार-प्रसार का माध्यम चुना। उनका मानना था कि जब तक विज्ञान आम आदमी की भाषा में नहीं होगा, देश तरक्की नहीं कर सकता। इसी उद्देश्य से उन्होंने माध्यमिक से लेकर कॉलेज स्तर तक की विज्ञान की पुस्तकें हिंदी में लिखीं, जो उनकी दूरगामी सोच को दर्शाती हैं।
सामाजिक गतिविधियाँ और मार्गदर्शन
शिक्षण के प्रति समर्पण: वे मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज और बिहार विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे। वे केवल किताबी ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि छात्रों को शोध (Research) की बारीकियां और वैश्विक दृष्टिकोण सिखाते थे।
अकादमिक योगदान: वे उत्तर प्रदेश और बिहार के कई विश्वविद्यालयों में विशेषज्ञ (Expert) के रूप में बुलाए जाते थे। उन्होंने विज्ञान की कठिन गुत्थियों को सरल बनाकर समाज के हर वर्ग तक पहुँचाया।
प्रेरणा पुंज: डॉ. साहु अपने गाँव ‘रघुनाथपुर दोनमा’ और मुजफ्फरपुर के युवाओं के लिए एक जीवंत उदाहरण थे। वे अक्सर युवाओं को अभावों से लड़कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।
सम्मान के प्रति तटस्थता
उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का ‘सम्मानित सदस्य’ बनाया गया और कई अन्य सम्मान मिले, लेकिन वे प्रचार-प्रसार से दूर रहते थे। उनका असली सम्मान उनके द्वारा लिखे गए शोध पत्र और वे पुस्तकें थीं, जो आज भी विज्ञान के छात्रों का मार्गदर्शन करती हैं।
डॉ. जगदीश साहु का अकादमिक जीवन विश्व के कुछ अत्यंत प्रतिष्ठित संस्थानों और विद्वानों के सान्निध्य में बीता। उनके जीवन को गढ़ने वाले संस्थानों और गुरुओं का विवरण इस प्रकार है:
प्रमुख संस्थान जिनसे वे जुड़े रहे
लंगट सिंह (L.S.) कॉलेज, मुजफ्फरपुर: डॉ. साहु ने यहीं से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। यह कॉलेज बिहार के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक रहा है, जहाँ उन्होंने अपनी वैज्ञानिक नींव रखी।
पटना विश्वविद्यालय, बिहार: यहाँ से उन्होंने अपनी एम.एससी. (M.Sc.) की पढ़ाई की। इसी संस्थान में संघर्ष करते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया, जिसने उनके लिए अंतरराष्ट्रीय रास्ते खोले।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, इंग्लैंड: डॉ. साहु के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्थान। यहाँ के ‘केमिकल सोसाइटी’ और प्रयोगशालाओं में उन्होंने वह शोध कार्य किया जिसने उन्हें वैश्विक ख्याति दिलाई।
लीबिया विश्वविद्यालय (University of Libya): यहाँ उन्होंने ‘प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष’ के रूप में सेवा दी। इस संस्थान ने उन्हें वह अंतरराष्ट्रीय सम्मान और मंच प्रदान किया जिसकी बिहार में उस समय कमी महसूस की गई थी।
बिहार विश्वविद्यालय ( बी.आर. अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय), मुजफ्फरपुर: स्वदेश वापसी के बाद वे यहीं भौतिक रसायन के रीडर बने और जीवन के अंतिम पड़ाव तक शिक्षण कार्य से जुड़े रहे।
प्रेरणादायी गुरु और वैज्ञानिक संबंध, डॉ. साहु के जीवन पर उनके गुरुओं का गहरा प्रभाव रहा:
डॉ. ई.जे. बॉवेन (Dr. E.J. Bowen): ये ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के विश्वविख्यात वैज्ञानिक थे। डॉ. साहु ने इन्हीं के मार्गदर्शन में अपनी पीएचडी पूरी की। डॉ. बॉवेन अपने इस भारतीय शिष्य की प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने डॉ. साहु के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण शोध पत्र लिखे, जो अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के जर्नल में प्रकाशित हुए।
रूडोल्फ जे. मार्कस और जेम्स एल. हैचेट: कैलिफोर्निया के ‘स्टैंडर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के इन वैज्ञानिकों के साथ डॉ. साहु का अकादमिक जुड़ाव रहा। उन्होंने डॉ. साहु के शोध ‘हिल-रिएक्शन’ (Hill-Reaction) की मदद से अपनी वैज्ञानिक गुत्थियां सुलझाई थीं।
शोध का मुख्य केंद्र: फोटोकेमिस्ट्री (Photo-Chemistry)
डॉ. साहु का अधिकांश शोध कार्य फोटोकेमिस्ट्री पर आधारित था। यह रसायन विज्ञान की वह शाखा है जो प्रकाश और रासायनिक अभिक्रियाओं के अंतर्संबंधों का अध्ययन करती है।
उनके शोध का मुख्य विषय ‘फ्लोरोसेंस’ (Fluorescence) था, जिसका उपयोग आज आधुनिक चिकित्सा और फोरेंसिक विज्ञान में व्यापक रूप से होता है। उनके गुरु डॉ. बॉवेन और उनके द्वारा की गई खोजें आज भी इस क्षेत्र के शोधार्थियों के लिए संदर्भ का काम करती हैं।
सकरा (मुजफ्फरपुर): सकरा प्रखंड के सकरा वाजिद पंचायत अंतर्गत जहांगीरपुर-सकरा हाई स्कूल मार्ग पर स्थित ‘विजन वैली हॉल’ में भारत की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्रीबाई फुले की 195वीं जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर समाजसेवियों और शिक्षाविदों ने उनके तैल चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया।
सावित्रीबाई फुले की तैल चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करती महिला एवं कार्य क्रम को सम्बोधित करते समाजसेवी राजेश राम
शिक्षा की मशाल जलाने वाली महानायिका
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए समाजसेवी राजेशराम ने सावित्रीबाई फुले के संघर्षमयी जीवन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “सावित्रीबाई फुले ने उस दौर में शिक्षा की अलख जगाई जब महिलाओं और दलितों के लिए शिक्षा के द्वार बंद थे। उनके द्वारा 1848 में पुणे में खोला गया पहला बालिका विद्यालय देश में सामाजिक क्रांति का आधार बना।”
नारी वादी आंदोलन और निस्वार्थ सेवा
वक्ता ममताकुमारी ने उनके नारीवादी दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए कहा, “सावित्रीबाई फुले केवल एक शिक्षिका नहीं, बल्कि भारत के नारीवादी आंदोलन की जननी थीं। उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और विधवा विवाह का समर्थन कर समाज को नई दिशा दी।”
वहीं संगीताकुमारी ने उनके सेवा भाव को याद करते हुए कहा, “जब पुणे में प्लेग महामारी फैली, तो उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों की सेवा की। दलितों और वंचितों के अधिकारों की रक्षा के लिए उनका पूरा जीवन समर्पित रहा, जो आज भी हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।”
क्विज प्रतियोगिता में दिखा बच्चों का उत्साह
जयंती के अवसर पर बच्चों के बीच एक क्विज प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता के माध्यम से बच्चों को सावित्रीबाई फुले के इतिहास और सामान्य ज्ञान से रूबरू कराया गया।
सावित्रीबाई फुले की जयन्ती कार्य क्रम में शामिल छात्रगण
पुरस्कारवितरण: सफल प्रतिभागियों को पदक देकर सम्मानित किया गया।
प्रोत्साहन: सभी बच्चों के बीच कॉपी, कलम, किताब और ‘गुड इंग्लिश’ की पुस्तकें वितरित की गईं।
प्रतिभागीछात्र: प्रतियोगिता में आदर्श कुमार, आयुष कुमार, अनामिका कुमारी, सोनी कुमारी, अल्पना कुमारी, प्रिंस कुमार, सत्यम कुमार, मानस कुमार, अजीत कुमार, दिव्य कुमारी, स्वाति कुमारी, संगम कुमारी, करण कुमार, मनीष कुमार, भोला कुमार, अमित कुमार, रुना कुमारी और रजनी कुमारी सहित दर्जनों छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
उपस्थिति: कार्यक्रम को सफल बनाने में ममता कुमारी, संगीता कुमारी, लक्ष्मी कुमारी के अलावा राजू कुमार, विमलेश कुमार और दीपू कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई और अपने विचारों से जनसमूह को प्रेरित किया।