- न सुरक्षा, न सुविधाएं, ऊपर से होमगार्ड का कब्जा! खेल का मैदान छीना, शौचालय गंदे, प्यास को तरसते बच्चे: सकरा प्रखंड कॉलोनी स्कूल की बदहाली की पूरी कहानी , कौन जवाब देगा?
- अधिकारियों के दफ्तर में चकाचौंध, बगल के स्कूल में घोर अंधेरा: बाउंड्री विहीन कैंपस और जर्जर भवन दे रहे हादसों को दावत,
[विशेष रिपोर्ट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’]
सकरा (मुजफ्फरपुर) बिहार में शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने और इसे सर्वसुलभ बनाने के लिए सरकार द्वारा अरबों रुपये का बजट आवंटित किया जाता है। नित नई योजनाओं की घोषणाएं होती हैं, वादे किए जाते हैं और कागजों पर विकास की गंगा बहाई जाती है। लेकिन जब धरातल की कड़वी सच्चाई से सामना होता है, तो ये सारे दावे खोखले और हवा-हवाई साबित होते हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड में शिक्षा तंत्र की एक ऐसी ही हृदयविदारक और चिंताजनक तस्वीर देखने को मिल रही है, जहाँ प्रशासनिक उदासीनता, अधिकारियों की बेरुखी और व्यवस्था की अकर्मण्यता ने सैकड़ों बच्चों के भविष्य को अंधकार और खतरे में डाल दिया है।
सकरा प्रखंड मुख्यालय से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित सकरा नगर पंचायत के वार्ड संख्या 6 में ‘राजकीय उच्च मध्य विद्यालय, प्रखंड कॉलोनी, सकरा‘ अवस्थित है। भौगोलिक रूप से देखा जाए तो यह विद्यालय किसी सुदूर ग्रामीण इलाके में नहीं, बल्कि प्रखंड प्रशासन के ठीक नाक के नीचे है। यह विद्यालय सकरा के प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) के आवास के ठीक बगल में है और सकरा प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ) के कार्यालय से इसकी दूरी महज 100 मीटर के करीब है। इसके बावजूद, यह विद्यालय आज भौतिक रूप से अत्यंत दयनीय दुर्दशा का शिकार है। ऐसा लगता है मानो यह विद्यालय किसी प्रशासनिक नक्शे में शामिल ही नहीं है या फिर अधिकारी जानबूझकर इस ओर से अपनी आंखें मूंदे बैठे हैं।

समस्याओं का अंबार, लेकिन सभी की जड़ एक – चाहारदीवारी का न होना
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, प्रखंड कॉलोनी, सकरा में समस्याओं की एक लंबी फेहरिस्त है। लेकिन अगर सूक्ष्मता से विश्लेषण किया जाए, तो विद्यालय की शत-प्रतिशत समस्याओं की जड़ एक ही है – विद्यालय की चाहारदीवारी (बाउंड्री वॉल) का न होना।
चाहारदीवारी न होने के कारण विद्यालय की समस्याएं कम होने के बजाय हर रोज बढ़ती ही जा रही हैं। सरकार या प्रशासन की ओर से विद्यालय के विकास या सुविधाओं के लिए जो भी छोटे-मोटे कार्य कराए जाते हैं, वे सब चाहारदीवारी के अभाव में बेकार साबित होते हैं। उन्हें असामाजिक तत्वों द्वारा तुरंत विनष्ट कर दिया जाता है।

इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण कुछ माह पूर्व देखने को मिला। विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों को शुद्ध एवं स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति उपलब्ध कराने के उद्देश्य से परिसर में समरसेबल लगाया गया और बेसीन का निर्माण कराया गया। लेकिन चाहारदीवारी न होने के कारण सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था। नतीजा यह हुआ कि मात्र 2 माह के भीतर ही असामाजिक और अराजक तत्वों ने रात के अंधेरे में या सुनसान मौके का फायदा उठाकर बेसीन में लगी टाइल्स को बुरी तरह तोड़ दिया और पानी के नलों को नोचकर उखाड़ ले गए। आज स्थिति यह है कि नल गायब हैं और बच्चों को पीने के पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। असामाजिक तत्वों की इस करतूत की सजा उन निर्दोष बच्चों को भुगतनी पड़ रही है जो यहाँ पढ़ने आते हैं।

शौचालय की सफाई, अनुसेवियों की कमी और शिक्षकों की लाचारी
खुली चाहारदीवारी का खामियाजा केवल बच्चों को ही नहीं, बल्कि विद्यालय के शिक्षकों और प्राचार्य को भी उठाना पड़ रहा है। बाउंड्री न होने के कारण रात में या स्कूल की छुट्टी के बाद बाहर के अवांछित लोग विद्यालय के शौचालय में अवैध रूप से प्रवेश कर जाते हैं और उसे गंदा कर देते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल सफाई व्यवस्था को लेकर उठता है। इस विद्यालय में सफाई के लिए अनुसेवी (आदेशपाल) पदस्थापित नहीं है। जब अनुसेवी ही नहीं है, तो विद्यालय में नियमित साफ-सफाई का काम पूरी तरह से ठप रहता है। एजेन्सी के माध्यम से जो सफाई कर्मी हैं, वे केवल खानापूर्ति कर रहे हैं, विद्या के इस मंदिर में साफ सफाई की स्थिति बदतर है।
- वर्ग कक्ष की सफाई: कक्षा की कमरों की सफाई का काम मासूम बच्चों को खुद अपने हाथों से करना पड़ता है।
- शौचालय की सफाई: बाहर के लोगों द्वारा गंदे किए गए शौचालय की सफाई कराने की पूरी जिम्मेदारी विद्यालय के प्राचार्य के मत्थे आ जाती है। अब प्राचार्य महोदय विद्यालय की शैक्षणिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था को संभालें, या शौचालय साफ कराने का प्रबंध करें?
हैरानी की बात यह है कि प्रखंड मुख्यालय के तमाम आला अधिकारी यहाँ से महज 4 कदम की दूरी पर बैठते हैं, लेकिन किसी भी अधिकारी को आकर झांकने तक की फुर्सत नहीं मिलती कि यहाँ बच्चे और शिक्षक किन परिस्थितियों में दिन गुजार रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, विद्यालय में जो शिक्षक पदस्थापित हैं, वे इस बदहाल व्यवस्था के बीच अपनी नौकरी बचाने और कागजी खानापूर्ति में ही उलझे रहने को मजबूर हैं।

जानवरों का डर, मध्याह्न भोजन और सड़क हादसों का खतरा
चाहारदीवारी न होने के दुष्परिणाम यहीं खत्म नहीं होते। परिसर खुला होने के कारण हमेशा आवारा मवेशियों (कुत्ते, गाय, सांड) और असामाजिक तत्वों के किचेन शेड में प्रवेश कर जाने का भय बना रहता है। किचेन शेड में मध्याह्न भोजन का सामान रखा होता है और खाना पकाया जाता है। ऐसे में किसी भी दिन कोई जानवर या अराजक तत्व खाने में कोई जहरीली चीज मिला दे या नुकसान पहुंचा दे, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
इसके अलावा, मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) के समय जब बच्चों की छुट्टी होती है, तो चाहारदीवारी न होने के कारण बच्चे बिना किसी रोक-टोक के विद्यालय परिसर से बाहर निकल जाते हैं। बच्चे विद्यालय कैंपस से लगभग 1-1 किलोमीटर दूर मुख्य बाजार की ओर चले जाते हैं। सकरा का बाजार और मुख्य सड़कें हमेशा व्यस्त रहती हैं, जहाँ तेज रफ्तार गाड़ियां दौड़ती रहती हैं। बाउंड्री के अभाव में बच्चों का इस तरह खुलेआम बाहर निकल जाना किसी बड़ी अनहोनी या गंभीर सड़क दुर्घटना को दावत देने जैसा है।
बच्चों से छीन लिया गया खेल का मैदान: अधिकारियों की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा
किसी भी विद्यालय में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए खेलकूद का मैदान बेहद महत्वपूर्ण होता है। लेकिन इस विद्यालय के बच्चों का दुर्भाग्य देखिए कि उनसे उनका खेल का मैदान भी प्रशासनिक नीतियों की बलि चढ़ाकर छीन लिया गया।

- बीडीओ आवास के सामने का मैदान छीना: पूर्व में इस विद्यालय के बच्चे सकरा प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) के आवास के सामने स्थित मैदान में खेला करते थे। उस मैदान में बच्चों के मनोरंजन और शारीरिक विकास के लिए लोहे के झूले, रेलिंग और विभिन्न प्रकार के खेल उपकरण लगे हुए थे। लेकिन प्रशासन ने बच्चों से वह मैदान छीन लिया। वहां पानी का नल कूप (ट्यूबवेल) निर्माण करा दिया गया और उस पूरे मैदान की घेराबंदी करके चाहारदीवारी का निर्माण करा दिया गया।
- नर्सरी का रास्ता भी किया गया बंद: जब खेल का मैदान छीन लिया गया, तो मासूम बच्चे मध्याह्न भोजन के अवकाश के समय सामने स्थित ब्लौक कैम्पस की नर्सरी की ओर रुख करने लगे। कुछ वर्ष पूर्व तक बच्चे दोपहर के समय विद्यालय के सामने वाली नर्सरी में खेलकूद कर अपना समय बिता लेते थे। आम और लीची के मौसम में बच्चे नर्सरी में जाकर फल-फूल तोड़कर खा लिया करते थे। लेकिन जब यह बात प्रखंड के बड़े पदाधिकारियों तक पहुंची, तो उन्होंने आनन-फानन में नर्सरी की तो मजबूत चाहारदीवारी करवा दी ताकि बच्चे अंदर न जा सकें!
विरोधाभास देखिए: अधिकारियों ने अपने आवास की चाहारदीवारी करा दी, सरकारी नर्सरी की चाहारदीवारी करा दी,नल कूप के कैम्पस की चाहारदीवारी करा दी, लेकिन जिस विद्यालय में सैकड़ों बच्चों का भविष्य संवर रहा है, उसकी चाहारदीवारी कराना किसी भी अधिकारी ने आज तक मुनासिब नहीं समझा!

ऊपरी तल्ले पर होमगार्ड जवानों का कब्जा: वर्ग कक्षों की भारी कमी, एक ही कमरे में 2-2 कक्षाओं के बच्चे बैठने को मजबूर
विद्यालय में जगह की किल्लत और प्रशासनिक मनमानी की पराकाष्ठा यहीं खत्म नहीं होती। सकरा नगर पंचायत के वार्ड संख्या 6 स्थित राजकीय उच्च मध्य विद्यालय (प्रखंड कॉलोनी, सकरा) के ऊपरी तल्ले पर पिछले लंबे समय से होमगार्ड के जवानों का बसेरा बना दिया गया है। होमगार्ड के जवान विद्यालय भवन के ऊपरी तल्ले पर अवैध रूप से कब्जा जमाए हुए हैं, जिससे विद्यालय प्रशासन और छोटे-छोटे बच्चों के सामने वर्ग कक्षों (क्लासरूम) का भारी संकट पैदा हो गया है।
जवानों द्वारा कमरों पर जबरन कब्जा जमाए रखने के कारण विद्यालय में पठन-पाठन के लिए जरूरी कमरे कम पड़ गए हैं। इसका सीधा और घातक असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। वर्ग कक्षों की अत्यंत कमी के कारण मजबूरी में पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी कक्षा (क्लास 1, 2, 3 और 4) के बच्चों को एक ही कमरे में एक साथ बिठाकर पढ़ाया जा रहा है। अब जरा सोचिए कि जिस कमरे में दो अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठे हों, वहां शिक्षक एक समय में किसे और क्या पढ़ा पाते होंगे? यह स्थिति न केवल शिक्षा के अधिकार कानून (RTE) की धज्जियां उड़ाती है, बल्कि मासूम बच्चों के बौद्धिक विकास और शैक्षणिक गुणवत्ता के साथ एक बहुत बड़ा खिलवाड़ है। अधिकारियों की इस अनदेखी के कारण बच्चों का भविष्य पूरी तरह से राम भरोसे चल रहा है।

विद्यालय परिसर में असुरक्षा का माहौल, साइकिल चोरी के भय से घट रही छात्रों की सहूलियत
चारदीवारी (बाउंड्री वॉल) का अभाव विद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था और छात्रों की उपस्थिति पर सीधा और प्रतिकूल असर डाल रहा है। स्कूल परिसर पूरी तरह खुला होने के कारण हमेशा असामाजिक तत्वों की आवाजाही और चोरी का भय बना रहता है। सबसे ज्यादा समस्या छात्राओं और दूर-दराज से आने वाले छात्रों को होती है, जो सुरक्षा के लिहाज से साइकिल से स्कूल आने से कतराते हैं, क्योंकि परिसर में खड़ी साइकिलों के चोरी या गायब होने का जोखिम हमेशा बना रहता है। सुरक्षित घेराबंदी न होने से विद्यालय का शैक्षणिक माहौल पूरी तरह असुरक्षित और अस्त-व्यस्त हो गया है, जिससे न केवल विद्यार्थियों की सुरक्षा दांव पर है बल्कि अभिभावक भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने में असहज महसूस कर रहे हैं।
गौरवशाली अतीत से वर्तमान की गुमनामी तक का सफर
राजकीय उच्च मध्य विद्यालय, प्रखंड कॉलोनी, सकरा का इतिहास और इसके स्थापना का उद्देश्य बेहद खास था। इस विद्यालय को स्थापित करने का मुख्य उद्देश्य सकरा प्रखंड कार्यालय, अंचल कार्यालय और सकरा थाना में कार्यरत सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना था।
स्थापना के शुरुआती दौर में यहाँ रहने वाले तमाम कर्मियों और अधिकारियों के बच्चे इसी विद्यालय में पढ़ा करते थे। उनके साथ-साथ आसपास के सामान्य वर्ग के बच्चे भी यहाँ शिक्षा ग्रहण करते थे। उस समय इस विद्यालय का एक अलग रुतबा था।

लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, आबादी बढ़ती गई और आसपास के बच्चों की संख्या में भारी इजाफा होता गया। वहीं दूसरी ओर, यहाँ कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी समय के साथ स्थानांतरित या पलायन कर गए। उनके जाने के बाद, अधिकारियों का इस विद्यालय से जुड़ाव खत्म हो गया और वे इसके प्रति पूरी तरह से उदासीन हो गए। परिणाम यह हुआ कि जो विद्यालय अधिकारियों की देखरेख में प्रखंड का सबसे बेहतरीन विद्यालय होना चाहिए था, वह अधिकारियों के अपने आवास छोड़ जाते ही उपेक्षा का शिकार होकर मूलभूत आवश्यकताओं के लिए तरसने लगा। अगर पिछले 1 दशक में आए किसी भी बीईओ या बीडीओ ने 4 कदम चलकर इस विद्यालय का नियमित निरीक्षण किया होता, तो आज यह सकरा प्रखंड का एक मॉडल और आदर्श विद्यालय होता। लेकिन अफसोस कि बीते 10 वर्षों में यहाँ जो भी प्रशासनिक अधिकारी आए, वे इस मामले में पूरी तरह संवेदनहीन और उदासीन ही साबित हुए।
थक-हारकर जनप्रतिनिधि पहुंचे ‘सहयोग पोर्टल‘ के द्वार
विद्यालय की इस बदहाली, जर्जर भवन के खतरे और बाउंड्री वॉल की मांग को लेकर सकरा नगर पंचायत के वार्ड संख्या 6 के पार्षद पति रामबालक शर्मा ने लंबी लड़ाई लड़ी है। रामबालक शर्मा ने बताया कि उन्होंने सकरा के प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ) के समक्ष दर्जनों बार मौखिक और लिखित रूप से इस समस्या को लाया। अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटे, लेकिन अधिकारियों ने हर बार इसे अनसुना कर दिया और कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के इस रवैये से पूरी तरह से निराश और थक-हारकर रामबालक शर्मा ने आखिरकार बिहार सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘सहयोग पोर्टल‘ के शिविर कार्यक्रम में इस गंभीर समस्या को ऑनलाइन निबंधित कराया है।
इसके साथ ही उन्होंने कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ), नगर पंचायत सकरा को भी एक विस्तृत लिखित आवेदन सौंपा है, जिसमें निम्नलिखित 3 मुख्य मांगें रखी गई हैं:
- जर्जर व परित्यक्त भवन को हटाना: विद्यालय परिसर के बीचों-बीच स्थित अत्यंत खतरनाक, जीर्ण-शीर्ण और परित्यक्त पुरानी बिल्डिंग को अविलंब ध्वस्त कर वहां से मलबा हटाया जाए ताकि दुर्घटना का खतरा टले और जगह बने।
- चाहारदीवारी का निर्माण: विद्यालय परिसर की सुरक्षा, असामाजिक तत्वों के प्रवेश को रोकने और पेयजल सुविधाओं को बचाने के लिए पूरे कैंपस की पक्की चाहारदीवारी (बाउंड्री वॉल) का निर्माण अविलंब कराया जाए।
- मिट्टी भराई एवं पेवर ब्लॉक कार्य: सड़क से नीचे स्थित विद्यालय के मैदान को समतल करने के लिए मिट्टी भराई कराई जाए और उस पर पेवर ब्लॉक (Paver Block) बिछाने का कार्य कराया जाए ताकि बच्चों को जलजमाव, कीचड़ और जलजनित बीमारियों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सके।
जर्जर भवन, जलजमाव और बाउंड्री का अभाव: स्कूल की समस्याओं पर बोले एचएम
राजकीय उच्च मध्य विद्यालय, प्रखंड कॉलोनी, सकरा के प्राचार्य (HM) के कथनानुसार, विद्यालय में बुनियादी सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण की नितांत आवश्यकता है। विद्यालय के पास अपनी कोई विशाल भूमि या खेल का मैदान उपलब्ध नहीं है; अनुमानतः महज पाँच कट्ठा जमीन परिसर में है, जिस पर केवल भवन निर्मित है तथा चारों ओर सड़क और ब्लॉक की सरकारी जमीन मौजूद है। जमीन संबंधी पिछला रिकॉर्ड पूर्व प्रभारी द्वारा नहीं सौंपे जाने के कारण अंचल अधिकारी (CO) से संपर्क की बात कही गई है। वर्तमान में लगभग 398 से 400 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं, जिनके पठन-पाठन के लिए परिसर में 13 वर्ग कक्ष उपलब्ध हैं। विद्यालय की प्रमुख समस्याओं में चारदीवारी (बाउंड्री वॉल) का न होना, जल-जमाव से बचाव हेतु मिट्टी भराई की जरूरत और जर्जर भवन को हटाना शामिल है—जिसमें जर्जर मकान को ध्वस्त करने की प्रशासनिक प्रक्रिया (प्रोसीडिंग) जारी है। साफ-सफाई हेतु पदेन आदेशपाल न होकर आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, भवन की ऊपरी मंजिल पर बीडीओ के मौखिक निर्देश पर प्रशासनिक व्यवस्था के तहत सुरक्षा बलों को अस्थायी रूप से ठहराया गया है, जिनके लिए अन्यत्र व्यवस्था होते ही स्थान खाली कर दिया जाएगा।
कब जागेगा सुस्त प्रशासनिक अमला?
सकरा प्रखंड का यह विद्यालय आज इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब शासन और प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं, तो उसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। बीडीओ आवास से 200 मीटर और बीईओ कार्यालय से 100 मीटर दूर स्थित इस विद्यालय की दुर्दशा अधिकारियों की कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
अब देखना यह होगा कि सहयोग पोर्टल पर मामला दर्ज होने के बाद जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की नींद खुलती है या फिर इस विद्यालय के बच्चे यूं ही जर्जर भवन के साये में, बिना बाउंड्री की असुरक्षा के बीच और जलजमाव वाले मैदान में अपना भविष्य तलाशने को मजबूर रहेंगे। सकरा की जनता और विद्यालय के नौनिहाल अब आने वाले समय का इंतजार कर रहे हैं कि कब इस विद्यालय की तसवीर बदलेगी।
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