घूसखोर मुखिया का ‘गेम ओवर’: दलसिंहसराय में 1,20,000 की घूस लेते निगरानी के जाल में फंसे सियाराम राय!

पटना/समस्तीपुर: बिहार में पंचायत स्तर पर जारी भ्रष्टाचार के मकड़जाल पर निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने अब तक का सबसे बड़ा प्रहार किया है। राज्य में सुशासन के दावों के बीच सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक अधिकारों को अपनी जागीर समझने वाले सफेदपोशों के खिलाफ निगरानी विभाग ने एक ही दिन में दो-दो बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक की हैं। इस महा-अभियान की सबसे बड़ी और धमाकेदार कामयाबी समस्तीपुर जिले के दलसिंहसराय में मिली, जहां भ्रष्टाचार की सभी सीमाएं लांघ चुके एक निरंकुश मुखिया को 1,20,000 रुपये की भारी-भरकम घूस समेटते हुए रंगे हाथों दबोच लिया गया। वहीं, दूसरी समानांतर कार्रवाई में गया जिले से कानून की धज्जियां उड़ाने वाले एक चौकीदार को भी रिश्वत लेते पकड़ा गया है। इन दोनों कार्रवाइयों ने पूरे सूबे के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

दलसिंहसराय में बिछा निगरानी का जाल: ऐसे हुआ मुखिया का शिकार

समस्तीपुर जिले का दलसिंहसराय इलाका 10 जून 2026 को एक अभूतपूर्व पुलिसिया कार्रवाई का गवाह बना। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की मुख्यालय टीम ने एक बेहद गोपनीय और सटीक रणनीति के तहत ग्राम पंचायत राज चकबहाउद्दीन के मुखिया सियाराम राय को 1,20,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। इस बड़ी घूसखोरी के पीछे की कहानी बेहद चौंकाने वाली है, जो यह दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर जनप्रतिनिधि किस कदर आम जनता का खून चूस रहे हैं।

कानून के शिकंजे में घूसखोर: (बाएं) गया के बेलागंज में काउंटर केस से नाम हटाने के नाम पर 9,000 रुपये ऐंठते गिरफ्तार हुआ चौकीदार मनीष कुमार और (दाएं) समस्तीपुर के दलसिंहसराय में निलंबन मुक्ति के नाम पर 1,20,000 रुपये की भारी घूस लेते रंगे हाथों दबोचा गया चकbahauddin पंचायत का मुखिया सियाराम राय निगरानी ब्यूरो की कस्टडी में।

निलंबन मुक्ति के नाम पर मांगी गई थी मोटी रकम

इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब चकबहाउद्दीन के रहने वाले परिवादी अब्दुल मन्नान (पिता: मो० अजीम) ने भ्रष्टाचार के इस खेल के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया। आरोपी मुखिया सियाराम राय के पास न केवल मुखिया का पद था, बल्कि वह पंचायत सचिव के प्रभार में भी काम कर रहा था। इसी दोहरी ताकत का नाजायज फायदा उठाते हुए उसने अब्दुल मन्नान को एक विभागीय निलंबन से मुक्त करने के एवज में 1,20,000 (एक लाख बीस हजार) रुपये की मोटी रकम बतौर रिश्वत मांगी थी। पीड़ित ने इस अन्याय के सामने झुकने के बजाय पटना स्थित निगरानी ब्यूरो के कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज करा दी।

कॉस्मेटिक दुकान में जाल बिछाकर दबोचा गया आरोपी

शिकायत दर्ज होने के बाद निगरानी ब्यूरो हरकत में आया। ब्यूरो ने 09 जून 2026 को गोपनीय तरीके से मामले का सत्यापन कराया। सत्यापन के दौरान यह बात पूरी तरह सच साबित हुई कि मुखिया द्वारा घूस की मांग की जा रही है। इसके तुरंत बाद निगरानी ब्यूरो के पुलिस उपाधीक्षक अमरेन्द्र प्रसाद विद्यार्थी के नेतृत्व में एक बेहद चुस्त धावा दल का गठन किया गया।

10 जून 2026 को जैसे ही मुखिया सियाराम राय रिश्वत की रकम लेने के लिए दलसिंहसराय थाना क्षेत्र के गुदरीपुल के पास स्थित अब्दुल मन्नान की श्रृंगार (कॉस्मेटिक) दुकान पर पहुंचा, पहले से घात लगाकर बैठे निगरानी के जवानों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। मुखिया को संभलने तक का मौका नहीं मिला और 1,20,000 रुपये के चमचमाते नोटों के साथ उसे रंगे हाथों दबोच लिया गया। इस सनसनीखेज गिरफ्तारी के बाद निगरानी टीम आरोपी को अपने साथ मुजफ्फरपुर ले गई, जहां पूछताछ के बाद उसे निगरानी के माननीय विशेष न्यायालय में पेश किया जाएगा।

पंचायत स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक पावर का जानलेवा गठजोड़

दलसिंहसराय की यह घटना सिर्फ एक मुखिया की गिरफ्तारी का मामला नहीं है, बल्कि यह बिहार की त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में गहरे धंसे भ्रष्टाचार का एक जीवंत एक्सरे है। इस मामले में सबसे गौर करने वाली बात यह है कि आरोपी सियाराम राय मुखिया होने के साथ-साथ पंचायत सचिव के प्रशासनिक प्रभार में भी था।

सत्ता का केंद्रीकरण और भ्रष्टाचार की वजह: जब किसी एक ही व्यक्ति को राजनीतिक रसूख (मुखिया) और प्रशासनिक शक्ति (पंचायत सचिव) दोनों सौंप दी जाती हैं, तो वहां जवाबदेही पूरी तरह खत्म हो जाती है। ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति खुद को कानून से ऊपर समझने लगता है। निलंबन मुक्त करने जैसी फाइलों को अटकाकर आम लोगों से लाखों रुपये की उगाही करना यह साबित करता है कि विकास के लिए आने वाला पैसा और प्रशासनिक अधिकार किस तरह आम जनता के दमन का जरिया बन चुके हैं।

निगरानी विभाग की इस त्वरित कार्रवाई ने आम जनता में यह विश्वास जगाया है कि यदि वे बिना डरे शिकायत करें, तो बड़े से बड़े रसूखदार का भी ‘गेम ओवर’ होना तय है।

दूसरा प्रहार: गया के बेलागंज में 9,000 लेते चौकीदार गिरफ्तार

निगरानी ब्यूरो का दूसरा कड़ा ऐक्शन गया जिले के बेलागंज थाना क्षेत्र में देखने को मिला। जहां पनारी पंचायत के एक भ्रष्ट चौकीदार मनीष कुमार को 9,000 (नौ हजार) रुपये की घूस लेते हुए बेलागंज स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के परिसर से रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया।

मामला: पुलिस केस से नाम हटाने की एवज में रिश्वत

आरोपी: मनीष कुमार (चौकीदार,पनारी पंचायत)

रिश्वत राशि: 9,000 रुपये

शिकायतकर्ता: रविन्द्र यादव

गिरफ्तारी स्थल: सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर, बेलागंज

काउंटर केस से बच्चों का नाम हटाने का सौदा

इस मामले के परिवादी रविन्द्र यादव (पिता: स्वर्गीय जायुन यादव, निवासी: पनारी, बेलागंज) थे। रविन्द्र यादव के परिवार और उनके पड़ोसियों के बीच किसी विवाद को लेकर बेलागंज थाने में एक काउंटर केस (कांड संख्या 689/23) दर्ज था। इस केस में रविन्द्र यादव के निर्दोष बच्चों का नाम भी घसीट लिया गया था। इसी बात का फायदा उठाते हुए चौकीदार मनीष कुमार ने केस से बच्चों का नाम हटवाने और मामले को रफा-दफा करने के नाम पर रिश्वत की मांग की थी।

निगरानी ब्यूरो ने इस शिकायत का भी बारीकी से सत्यापन कराया। आरोप सही पाए जाने पर पुलिस उपाधीक्षक समीर चन्द्र झा के नेतृत्व में एक विशेष धावा दल ने बेलागंज स्वास्थ्य केंद्र परिसर में जाल बिछाया। जैसे ही चौकीदार मनीष कुमार ने रिश्वत के 9,000 रुपये अपने हाथ में लिए, निगरानी की टीम ने उसे दबोच लिया। आरोपी चौकीदार को कागजी कार्रवाई और पूछताछ के बाद पटना स्थित निगरानी विशेष न्यायालय में पेश किया जाएगा।

ग्रामीण पुलिसिंग और रसूख का खौफ

गया की घटना इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार की जड़ें केवल ऊंचे पदों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि चौकीदार जैसे निचले स्तर के कर्मचारी भी ग्रामीणों को कानूनी पचड़ों और मुकदमों का डर दिखाकर अवैध वसूली कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में पुलिस केस (विशेषकर काउंटर केस) का खौफ इतना ज्यादा होता है कि लोग अपनी इज्जत और बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए इन छोटे कर्मचारियों की नाजायज मांगों के आगे झुकने को मजबूर हो जाते हैं। चौकीदार मनीष कुमार की गिरफ्तारी यह संदेश देती है कि कानून की आड़ में जनता को डराने वाले किसी भी मोहरे को बख्शा नहीं जाएगा।

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो का रिपोर्ट कार्ड: आंकड़ों की जुबानी भ्रष्टाचार पर चोट

वर्ष 2026 में निगरानी ब्यूरो जिस आक्रामक अंदाज में काम कर रहा है, उसके आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं। ब्यूरो ने इस साल घूसखोरों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रखी है।

वर्ष 2026 बनाम वर्ष 2025 की तुलनात्मक तालिका:

पैमाना (पैरामीटर)वर्ष 2026 (10 जून तक)वर्ष 2025 (पूरा वर्ष)
कुल दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर)71
कुल ट्रैप कांड66101
रंगे हाथों गिरफ्तार अभियुक्त66
कुल बरामद रिश्वत राशि26,71,800 रुपये37,80,300 रुपये

इस आंकड़े का विश्लेषण करें तो साफ पता चलता है कि वर्ष 2026 के शुरुआती साढ़े पांच महीनों में ही निगरानी विभाग ने 66 घूसखोरों को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया है। यह रफ्तार पिछले साल के मुकाबले काफी तेज है, जो यह दर्शाती है कि या तो समाज में भ्रष्टाचार की शिकायत करने की हिम्मत बढ़ी है या फिर निगरानी का सूचना तंत्र बेहद मजबूत हो चुका है।

निगरानी ब्यूरो की जनता से अपील: डरें नहीं, घूसखोरों को बेनकाब करें

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, बिहार, पटना ने इस बड़ी कामयाबी के बाद एक बार फिर राज्य की आम जनता से अपील की है कि यदि कोई भी लोक सेवक (सरकारी पदाधिकारी या कर्मचारी) किसी भी काम के बदले रिश्वत की मांग करता है, तो उसके सामने घुटने टेकने की जरूरत नहीं है। जनता समय रहते ब्यूरो के निम्नलिखित आधिकारिक माध्यमों पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है:

  • लैंडलाइन नंबर्स: 0612-2215030, 0612-2215032, 0612-2215033, 0612-2215036, 0612-2215037, 0612-2999752
  • हेल्पलाइन नंबर: 0612-2215344
  • मोबाइल नंबर: 7765953261
  • व्हाट्सएप नंबर: 9473494167
  • ईमेल आईडी: spvig-bih@nic.in
  • पता: निगरानी अन्वेषण ब्यूरो बिहार, पटना, 6 सर्कुलर रोड, पटना।

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