जब सीजेआई ने युवाओं को कहा ‘कॉकरोच’, तो देश की नई पीढ़ी ने बना डाली ‘भाजपा के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी’!
नीट धांधली और पेपर लीक पर घेरा: 22 लाख छात्रों के भविष्य को संघ के हवाले करने का बड़ा आरोप
विशेष कवरेज समस्तीपुर ब्यूरो 22 मई 2026
बिहार की राजनीतिक चेतना और वामपंथी संघर्ष की भूमि समस्तीपुर आज एक बार फिर ऐतिहासिक और युगांतरकारी राजनीतिक गर्जना का गवाह बनी। मौका था देश के जाने-माने लोकप्रिय कम्युनिस्ट नेता, शोषितों-वंचितों के मसीहा और पूर्व विधायक दिवंगत कॉ. रामदेव वर्मा के चौथे स्मृति दिवस का। इस पावन स्मृति के अवसर पर भाकपा (माले) द्वारा समस्तीपुर के ऐतिहासिक कर्पूरी सभागार में “बुलडोजर राज के खिलाफ लोकतंत्र की आवाज” विषय पर एक राज्यस्तरीय विशाल सेमिनार का आयोजन किया गया।

सभागार की स्थिति यह थी कि कार्यक्रम शुरू होने के घंटों पहले ही पूरा परिसर खचाखच भर चुका था। कड़कड़ाती धूप और उमस के बावजूद हजारों की संख्या में पार्टी कार्यकर्ता, नौजवान, छात्र, प्रखर तेवरों वाली महिलाएं और समाज के प्रबुद्ध लोकतंत्रपसंद नागरिक आयोजन स्थल पर डटे रहे। लाल झंडों, नारों और क्रांतिकारी गीतों के बीच पूरा माहौल सत्ता विरोधी लहर में डूबा नजर आया। मंच पर जैसे ही मुख्य वक्ता के रूप में भाकपा (माले) के राष्ट्रीय महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य ने कमान संभाली, पूरा सभागार तालियों और गगनभेदी नारों से गूंज उठा। दीपंकर भट्टाचार्य ने अपने चिरपरिचित धारदार, तार्किक और कड़कदार अंदाज में केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की गठबंधन की भाजपा सरकार की चूलें हिला दीं।
बुलडोजर अब मशीन नहीं, भाजपा के फासीवादी दमन की राजनीतिक पहचान: दीपंकर
सेमिनार के मुख्य विषय पर बोलते हुए कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि आज देश के भीतर संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बना दिया गया है और न्याय की जगह ‘बुलडोजर तंत्र’ ने ले ली है। उन्होंने बेहद आक्रामक लहजे में कहा:

“आज देश में बुलडोजर केवल मलबे हटाने या सड़क बनाने वाली एक लोहे की मशीन नहीं रह गया है, बल्कि यह भाजपा शासन की क्रूर राजनीतिक पहचान और निरंकुश दमन का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है। अपराधियों और माफियाओं पर कार्रवाई के नाम पर शुरू हुआ यह खेल अब लोकतंत्र को कुचलने का सबसे बड़ा हथियार बन गया है।”
माले महासचिव ने इतिहास और वर्तमान की तुलना करते हुए कहा कि एक दौर था जब जनविरोधी सरकारों को हम – ‘लाठी-गोली और दमन की सरकार’ – कहते थे, लेकिन भाजपा ने भारतीय राजनीति को एक नया और घिनौना शब्द दिया है— “बुलडोजर राज”। उत्तर प्रदेश से शुरू हुए इस सिलसिले के तहत वहां के मुख्यमंत्री को – ‘बुलडोजर बाबा’ – का तमगा दिया गया और आज स्थिति यह है कि देश के जिस भी सूबे में भाजपा की सरकारें हैं, वहां बुलडोजर को न्याय व्यवस्था से ऊपर स्थापित कर दिया गया है।

बंगाल चुनाव परिणामों के बाद ‘झालमुड़ी‘ और गरीबों की रोजी-रोटी पर क्रूर प्रहार
बिहार के राजनीतिक परिदृश्य के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति का विश्लेषण करते हुए दीपंकर भट्टाचार्य ने हाल के बंगाल चुनाव परिणामों और उसके बाद की परिस्थितियों पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बिहार के बाद बंगाल के चुनावी नतीजों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाया है, लेकिन सत्ता में बैठे लोग अब वहां भी खतरनाक ‘बुलडोजर संस्कृति’ को जबरन लागू करने पर आमादा हैं।
उन्होंने बंगाल के मौजूदा हालातों को रेखांकित करते हुए कहा:
“चुनाव से पहले बंगाल की राजनीतिक फिजाओं में ‘झालमुड़ी’ खाने और खिलाने की बड़ी दोस्ताना चर्चाएं हो रही थीं। नेता जमीन पर उतरकर आम जनता से जुड़ने का नाटक कर रहे थे। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुए, रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक जगहों के पास दशकों से दुकान चलाकर अपना और अपने बच्चों का पेट पालने वाले छोटे-छोटे झालमुड़ी और चाय दुकानदारों को बेरहमी से उजाड़ने की खबरें सुर्खियां बन रही हैं।”

माले महासचिव ने इसके पीछे के गहरे कॉरपोरेट गठजोड़ का पर्दाफाश करते हुए कहा कि यह बुलडोजर किसी अवैध निर्माण पर नहीं चल रहा, बल्कि यह छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और गरीब मेहनतकशों की स्वावलंबन और रोजी-रोटी पर सीधा हमला है। सरकार इन गरीबों को हटाकर बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों, मॉल और टाउनशिप परियोजनाओं के लिए रास्ता साफ कर रही है।
उन्होंने आगे कहा कि बंगाल में बकरीद के मौके पर बीफ़ के छोटे और गरीब व्यापारियों पर पाबंदी लगाना, लाइसेंस और नियंत्रण के नाम पर उन्हें प्रताड़ित करना इसी क्रूर नीति का हिस्सा है। मकसद साफ है— गरीब और छोटे दुकानदारों को आर्थिक रूप से पूरी तरह बर्बाद कर दिया जाए ताकि पूरी अर्थव्यवस्था पर देश के चुनिंदा पूंजीपतियों का कब्जा हो सके। यह नीति पूरी तरह से अंबानी-अडानी केंद्रित और जनविरोधी है।

अदालतों का काम सत्ता ने छीना, बिना न्यायिक प्रक्रिया के विरोधियों को बनाया जा रहा निशाना
न्याय व्यवस्था की बदहाली पर कड़ा प्रहार करते हुए कॉ. दीपंकर ने कहा कि हमारे देश का संविधान यह तय करता है कि कोई व्यक्ति दोषी है या निर्दोष, इसका फैसला केवल और केवल देश की अदालतें और हमारी स्थापित न्याय व्यवस्था ही कर सकती है। लेकिन आज भाजपा सरकार ने खुद को ही जज, जूरी और जल्लाद घोषित कर दिया है।
उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा:
“शुरुआत में ढिंढोरा पीटा गया कि बुलडोजर माफियाओं पर चलेगा। लेकिन आज सच क्या है? आज बिना किसी अदालती सुनवाई के, बिना किसी जांच के, सत्ता अपने राजनीतिक विरोधियों और अपनी हक की आवाज उठाने वाले नागरिकों को निशाना बनाने के लिए बुलडोजर और एनकाउंटर की गैर-संवैधानिक राजनीति चला रही है।”
उन्होंने कहा कि आज इस देश में किसी को भी ‘बांग्लादेशी’, किसी को ‘अतिक्रमणकारी’ तो किसी को ‘देशविरोधी’ का ठप्पा लगाकर समाज के सबसे कमजोर तबकों—जैसे गरीबों, आदिवासियों, मुसलमानों, किसानों और लोकतंत्र के पक्ष में खड़े होने वाले एक्टिविस्टों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने बिहार सरकार पर भी दोहरा चरित्र अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि बिहार में चुनाव के पहले मंचों से घोषणाएं होती हैं कि गरीबों को दस-दस हजार रुपये दिए जाएंगे, उन्हें बसाया जाएगा, लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं और सरकारें बन जाती हैं, उन्हीं गरीबों के आशियानों पर बिना किसी पुनर्वास के बुलडोजर चला दिया जाता है।

नीट परीक्षा में ऐतिहासिक धांधली: 22 लाख छात्रों का भविष्य ‘संघ‘ के हवाले
देश के सबसे बड़े संकट यानी शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर आते ही कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य के तेवर बेहद तल्ख हो गए। उन्होंने हाल ही में संपन्न हुई नीट (NEET) परीक्षा में सामने आई देशव्यापी धांधली और पेपर लीक मामले का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी बड़ी संस्थाओं के जरिए देश के 22 लाख से अधिक प्रतिभावान छात्रों के भविष्य के साथ भयंकर खिलवाड़ किया गया है।
उन्होंने इस शिक्षा घोटाले के पीछे की गहरी साजिश को उजागर करते हुए कहा:
“पिछले दस वर्षों के भाजपा शासन को उठाकर देख लीजिए, ऐसा कोई साल या ऐसी कोई बड़ी परीक्षा नहीं गुजरी जिसका पेपर लीक न हुआ हो। एनटीए जैसी अति-महत्वपूर्ण संस्थाओं पर आज किसी भी प्रकार का कोई लोकतांत्रिक नियंत्रण या संसदीय जवाबदेही नहीं रह गई है। पूरी परीक्षा प्रणाली और देश के बड़े शिक्षण संस्थानों को सोची-समझी रणनीति के तहत संघ परिवार (आरएसएस) के वैचारिक और सांगठनिक प्रभाव में चलाया जा रहा है। योग्यता को दरकिनार कर केवल अपनी विचारधारा के लोगों को फायदा पहुंचाया जा रहा है।”
बिहार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था और युवाओं पर हो रहे अत्याचार का जिक्र करते हुए उन्होंने बिहार में TRE-4 (शिक्षक नियुक्ति) अभ्यर्थियों के शांतिपूर्ण आंदोलन पर हुए बर्बर लाठीचार्ज की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने कहा कि पटना की सड़कों पर न्याय मांग रही युवा लड़कियों और छात्राओं तक को पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। इस पर शर्मिंदगी जताने के बजाय बिहार के शिक्षा मंत्री अत्यंत असंवेदनशील बयान दे रहे हैं कि ‘छात्राओं को सड़क पर आने की जरूरत ही क्या थी?’ कॉ. दीपंकर ने कहा कि यह बयान सत्ता के अहंकार की पराकाष्ठा है। आज देश और राज्य का नौजवान जब रोजगार मांगता है, तो उसे लाठियां मिलती हैं, उसकी आवाज को हर संभव तरीके से दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
‘कॉकरोच‘ शब्द बना युवाओं के प्रतिरोध का नया बारूद; सोशल मीडिया की डिजिटल आग अब सड़कों पर उतरेगी
अपने संबोधन के सबसे चौंकाने वाले हिस्से में कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य ने देश के भीतर उभर रहे एक नए सामाजिक और डिजिटल आंदोलन का खुलासा किया। उन्होंने देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) द्वारा हाल ही में सोशल मीडिया एक्टिविस्टों और सूचना के अधिकार (RTI) कार्यकर्ताओं के खिलाफ की गई विवादित टिप्पणी का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि जब देश के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति ने व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले सोशल मीडिया एक्टिविस्टों को “कॉकरोच” और “परजीवी” जैसी अपमानजनक संज्ञा दी, तो उन्हें लगा था कि युवा डर जाएंगे। लेकिन देश की नई और जागरूक पीढ़ी ने उसी अपमानजनक शब्द को सत्ता के खिलाफ अपने महा-प्रतिरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया।
उन्होंने गर्व से कहा:

“आज देश के युवाओं ने सोशल मीडिया पर ‘भाजपा के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी‘ नाम से एक अभूतपूर्व और विशाल डिजिटल मोर्चा खोल दिया है। यह इस बात का सीधा संकेत है कि देश का नौजवान अब भाजपा की भय और दमन की राजनीति से डरने वाला नहीं है, बल्कि वह खुलकर सत्ता के सामने सीना तानकर खड़ा हो रहा है। जो नौजवान कभी गुमराह होकर ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाते थे, आज वही नौजवान भयानक बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई और अपनी भविष्य की असुरक्षा के खिलाफ सरकार के सामने सबसे बड़ी और मजबूत दीवार बनकर खड़े हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि युवाओं को कॉलेज-यूनिवर्सिटी से डिग्रियां तो बांटी जा रही हैं, लेकिन उनके हाथों से स्थायी रोजगार को हमेशा के लिए छीन लिया गया है। देश में बेरोजगारी और महंगाई अपने जीवन के सबसे चरम स्तर पर पहुंच चुकी है। इसके बावजूद, मुख्यधारा की गोदी मीडिया और सरकार की चर्चाओं से शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों के संकट और गरीबों के बुनियादी सवाल पूरी तरह से गायब हैं।
उन्होंने याद दिलाया कि साल 2014 से पहले जो भाजपा नेता 40 रुपये लीटर पेट्रोल देने के बड़े-बड़े वादे करते थे, आज उनके राज में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं, भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार औंधे मुंह गिर रहा है और रसोई गैस का सिलेंडर आम और गरीब जनता की पहुंच से बिल्कुल बाहर हो चुका है। जब कोई मजदूर अपनी सही मजदूरी मांगता है, या कोई नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग करता है, तो उसे सीधे जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है।
माले महासचिव ने अपने कार्यकर्ताओं और देश के युवाओं का आह्वान करते हुए कहा:
“यह जो ‘कॉकरोच आंदोलन’ आप देख रहे हैं, यह दरअसल देश के करोड़ों शोषित और बेरोजगार नौजवानों के भीतर सुलग रहे भारी आक्रोश का डिजिटल विस्फोट है। अभी यह प्रतिरोध आपको सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स पर दिख रहा है, लेकिन मैं चेतावनी देता हूँ कि आने वाले समय में सरकार की गलत नीतियों के कारण यह गुस्सा देश की हर एक सड़क पर एक बड़े जन-आंदोलन और महाविस्फोट के रूप में दिखाई देगा। हमारी पार्टी के कार्यकर्ताओं की यह जिम्मेदारी है कि वे सोशल मीडिया की इस डिजिटल आवाज को जमीन के वास्तविक जन-आंदोलनों से जोड़ें, गांवों और कस्बों तक ले जाएं और सीधे शिक्षा मंत्री व केंद्र सरकार की छाती पर मूंग दलते हुए उनसे अपने हक का जवाब मांगें।”

कारपोरेट परस्ती, बलात्कारियों को संरक्षण और दमनकारी नीतियों के खिलाफ एकजुटता का आह्वान
भाजपा सरकार की अन्य नीतियों पर बोलते हुए कॉ. दीपंकर ने तीखा आरोप लगाया कि यह सरकार एक तरफ अपराधियों पर बुलडोजर चलाने का ढोंग करती है, तो दूसरी तरफ रसूखदार बलात्कारियों को खुला राजनीतिक संरक्षण देती है। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि नीट की पीड़ित छात्रा को आज तक सही मायने में न्याय नहीं मिल सका है।
उन्होंने नए लेबर कोड (श्रम कानूनों में बदलाव) की आलोचना करते हुए कहा कि इसके जरिए मजदूरों को बंधुआ मजदूर बनाने की तैयारी है। पूरे देश में अंबानी-अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए टाउनशिप और एक्सप्रेस-वे परियोजनाओं के नाम पर बिना किसी उचित मुआवजे के गरीबों और किसानों की कीमती जमीनों के जबरन अधिग्रहण की कोशिशें तेज हो गई हैं। कॉ. दीपंकर ने मांग की कि मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण रोजगार गारंटी योजना को खत्म करने की साजिशें बंद हों और देश के उच्च शिक्षण संस्थानों व कैंपसों में दलित, पिछड़े और आदिवासी छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए स्वर्गीय रोहित वेमुला की तर्ज पर ‘रोहित एक्ट’ कानून तत्काल प्रभाव से बनाया जाए।
कम्युनिस्ट योद्धा का. रामदेव वर्मा की विरासत पर बोले वामपंथी दिग्गज
सेमिनार में कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य ने बिहार के वरिष्ठतम वामपंथी नेता दिवंगत कॉ. रामदेव वर्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि कॉ. रामदेव वर्मा की पूरी राजनीतिक और सामाजिक जिंदगी देश के मेहनतकश अवाम के लिए एक खुली किताब की तरह है। वे बीच के केवल पांच वर्षों के कालखंड को छोड़ दें, तो साल 1980 से लेकर 2010 तक लगातार समस्तीपुर की जनता के प्यार और विश्वास की बदौलत बिहार विधानसभा के सदस्य रहे।
उन्होंने कहा कि देश और राज्य की राजनीति में चाहे कितने भी बड़े-बड़े आयाराम-गयाराम वाले बदलाव हुए हों, लेकिन रामदेव वर्मा ने कभी भी गरीबों, दलितों, वंचितों और मेहनतकश जनता का साथ नहीं छोड़ा। वे हमेशा सदन से लेकर सड़क तक दबे-कुचले लोगों की बुलंद आवाज बने रहे। आज जब देश फासीवाद के सबसे काले दौर से गुजर रहा है, तब कॉ. रामदेव वर्मा के संघर्षों की वही महान विरासत हमें इस क्रूर बुलडोजर राज के खिलाफ लोकतंत्र की रक्षा की इस लड़ाई में सही दिशा और ऊर्जा दे रही है।

मंच पर मौजूद अन्य प्रमुख वक्ताओं के तीखे संबोधन:
एमएलसी शशि यादव: बिहार में ‘यूपी मॉडल‘ कभी सफल नहीं होने देगी जागरूक जनता
बिहार विधान परिषद की सदस्य कॉ. शशि यादव ने अपने संबोधन में कॉ. रामदेव वर्मा को नमन करते हुए कहा:
“कॉ. रामदेव वर्मा आजीवन एक सच्चे और समर्पित कम्युनिस्ट सिपाही बने रहे। आज हम सब उनके स्मृति दिवस पर यह सामूहिक संकल्प लेते हैं कि उनके बताए क्रांतिकारी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए जनता के संघर्षों की इस विरासत को और ज्यादा मजबूत करेंगे। भाजपा और संघ परिवार मिलकर बिहार की धरती पर भी उत्तर प्रदेश जैसा क्रूर और असंवैधानिक ‘बुलडोजर राज’ थोपना चाहती है, लेकिन बिहार की यह जागरूक और क्रांतिकारी जनता उनके इन मंसूबों को कभी भी सफल नहीं होने देगी।”
उन्होंने केंद्र सरकार से महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण को बिना किसी परिसीमन या जनगणना के पेंच के अविलंब और इसी वक्त लागू करने की पुरजोर मांग की। साथ ही, उन्होंने परिसीमन के नाम पर सीटों के साथ छेड़छाड़ और देश भर में महिलाओं व छात्राओं पर बढ़ रही हिंसक घटनाओं की भी तीखी आलोचना की।

पूर्व विधायक मंजू प्रकाश: ‘सुन्दराइया नगर‘ को फिर से बसाने के लिए होगी आर-पार की लड़ाई
बिहार की वरिष्ठ वामपंथी नेत्री, पूर्व विधायक और माले की केंद्रीय कमिटी सदस्य कॉ. मंजू प्रकाश ने सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि देश की नई पीढ़ी और नौजवानों को यदि राजनीति सीखनी है, तो उन्हें कॉ. रामदेव वर्मा के जमीनी संघर्षों, उनकी ईमानदारी और उनकी सादगी से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।
उन्होंने स्थानीय प्रशासन और सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा:
“समस्तीपुर जिले का ‘सुन्दराइया नगर’, जिसे हमारी पार्टी और वामपंथी आंदोलन ने सालों तक संघर्ष करके समाज के सबसे गरीब, बेघर और भूमिहीन लोगों को बसाने के लिए तैयार किया था, उसे इस क्रूर सरकार ने अपने बुलडोजर से पूरी तरह उजाड़ कर रख दिया। गरीब महिलाएं और बच्चे आज खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। मैं आज इस मंच से यह साफ घोषणा करती हूँ कि भाकपा (माले) इस दमन के आगे झुकेगी नहीं और सुन्दराइया नगर की उस गरीब बस्ती को दोबारा उसी स्थान पर सम्मान के साथ बसाने के लिए सरकार के खिलाफ आर-पार की सामूहिक लड़ाई लड़ेगी।”

मिथिलांचल प्रभारी धीरेंद्र झा: सांप्रदायिकता और मॉब लिंचिंग के खिलाफ जारी रहेगा संघर्ष
भाकपा (माले) के वरिष्ठ नेता और मिथिलांचल प्रभारी कॉ. धीरेंद्र झा ने अपने कड़कदार भाषण में कहा कि मिथिलांचल की यह धरती हमेशा से सामंतवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ प्रतिरोध की धरती रही है। उन्होंने कहा:
“जयमंगला गढ़ के ऐतिहासिक संघर्षों से लेकर उजियारपुर और मुसरीघरारी तक, हमारी पार्टी के जांबाज कार्यकर्ताओं ने समाज में फैले अन्याय, हत्या, लूट और दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा प्रायोजित मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) के खिलाफ लगातार अपने खून की आहुति देकर जनता की रक्षा की है। कॉ. रामदेव वर्मा की असली विरासत केवल बातों में नहीं, बल्कि जनता के इसी जुझारू प्रतिरोध और सांप्रदायिकता विरोधी अडिग संघर्ष की विरासत है।”
उन्होंने देश के सभी समाजवादियों, वामपंथियों और लोकतंत्रपसंद ताकतों से अपील की कि वे आज के इस फासीवादी दौर में आपसी मतभेदों को भुलाकर एक व्यापक और मजबूत ऐतिहासिक एकता का निर्माण करें ताकि इस जनविरोधी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंका जा सके।

शिलान्यास, माल्यार्पण और श्रद्धांजलि की प्रमुख कड़ियां
इस राज्यस्तरीय सेमिनार की औपचारिक शुरुआत से ठीक पहले, सुबह समस्तीपुर जिले के पतेलिया गांव में स्थित कॉ. रामदेव वर्मा की भव्य आदमकद प्रतिमा पर एक गरिमामय श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। यहाँ माले महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य, कॉ. मंजू प्रकाश, कॉ. धीरेंद्र झा, विधान परिषद सदस्य कॉ. शशि यादव, कॉ. संतोष सहर, कुमार परवेज सहित राज्य और जिले के दर्जनों वरिष्ठ वामपंथी नेताओं ने सामूहिक रूप से माल्यार्पण कर उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
इसी ऐतिहासिक अवसर पर विधान परिषद सदस्य कॉ. शशि यादव के आधिकारिक ‘विधान परिषद सदस्य विकास मद’ (MLC Fund) से स्वीकृत राशि से बनने वाले भव्य “का. रामदेव वर्मा स्मृति द्वार” का पूरे वैदिक और क्रांतिकारी रीति-रिवाजों के साथ शिलान्यास भी किया गया। नेताओं ने कहा कि यह द्वार आने वाली पीढ़ियों को कॉ. रामदेव वर्मा के संघर्षों की याद दिलाता रहेगा। इसके उपरांत, समस्तीपुर शहर आगमन पर नेताओं के काफिले ने देश की आजादी के महानायक शहीद-ए-आजम भगत सिंह, भारतीय संविधान के निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व जननायक कर्पूरी ठाकुर की स्थापित प्रतिमाओं पर भी पूरी श्रद्धा के साथ माल्यार्पण किया और उनके सपनों का भारत बनाने का संकल्प लिया।

सभागार में मौजूद रहे कई प्रमुख चेहरे
इस भव्य और विशाल कार्यक्रम का बेहद कुशल और अनुशासित संचालन भाकपा (माले) के समस्तीपुर जिला सचिव प्रो. उमेश कुमार ने किया। इस दौरान मंच और दीर्घा में बिहार वामपंथी आंदोलन के कई प्रबुद्ध और जाने-माने चेहरे उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से: प्रो. सुरेंद्र सुमन, वंदना सिंह, डॉ. प्रभात कुमार, रंजीत राम, फूल बाबू सिंह, ललन कुमार, जीबछ पासवान, सुरेंद्र प्रसाद सिंह,अजय कुमार,अमित कुमार, दिनेश कुमार, महावीर पोद्दार, जयंत कुमार, सुनील कुमार, रौशन कुमार, लोकेश राज, दीपक यदुवंशी सहित समस्तीपुर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों से आए हजारों की संख्या में पार्टी पदाधिकारी, किसान, मजदूर और युवा साथी उपस्थित थे। कार्यक्रम के अंत में क्रांतिकारी गीतों और गगनभेदी नारों के साथ इस सफल महा-सेमीनार का समापन हुआ।
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