MDDM कॉलेज की छात्राओं ने कैमरों में कैद किया परिंदों का संसार, डिजिटल तकनीक से खुलेंगे जैव विविधता के बड़े राज!

मुजफ्फरपुर : एमडीडीएम कॉलेज के स्नातकोत्तर प्राणीशास्त्र विभाग में उस समय भारी कौतूहल और रोमांच का माहौल बन गया, जब कॉलेज की छात्राओं ने पारंपरिक किताबों को छोड़कर आधुनिक डिजिटल गैजेट्स और कैमरों के जरिए कॉलेज परिसर में ही उड़ते परिंदों के गुप्त संसार को खंगालना शुरू कर दिया। मौका था महाविद्यालय के सेमिनार हॉल में आयोजित एक दिवसीय हाई-टेक शैक्षणिक कार्यशाला का, जिसका विषय “Introduction to Birds and Birdwatching & Digital Monitoring Tools” (बर्डवाचिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग टूल्स का परिचय) था।

दीप जलते ही गूंजीं तालियां, प्राचार्या ने भरा जोश

कार्यक्रम का गगनभेदी आगाज़ पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। प्राणीशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता ने अपने औपचारिक स्वागत भाषण से उपस्थित लोगों में ऊर्जा फूंक दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पारिस्थितिक तंत्र को समझने के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान काफी नहीं है, अब पारंपरिक बर्डवाचिंग को आधुनिक डिजिटल तकनीकों से जोड़कर पर्यावरण संरक्षण का नया इतिहास लिखना होगा।

“हम हैं पर्यावरण की नई रक्षक!” बर्डवाचिंग कार्यशाला के व्यावहारिक सत्र के बाद देश की अनमोल जैव विविधता को बचाने का संकल्प लेकर एमडीडीएम कॉलेज की ऊर्जावान छात्राएं अपने प्रोफेसरों और विशेषज्ञों की टीम के साथ विक्ट्री पोज़ में ग्रुप फोटो खिंचवाती हुईं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही एमडीडीएम कॉलेज की प्राचार्या प्रो. डॉ. अलका जायसवाल ने अपने संबोधन में शोध और वैज्ञानिक अवलोकन को परिभाषित करते  हुए कहा, अकादमिक अनुसंधान और संरक्षण कार्यों के नए आयाम खुल चुके हैं। हमारी बेटियां अब वैज्ञानिक अवलोकन और पर्यावरणीय जागरूकता के क्षेत्र में तकनीकी क्रांति लाकर नए शोधपरक आयाम स्थापित करेंगी।”

एक्सपर्ट ने सिखाए बर्डवाचिंग के सीक्रेट्स

कार्यशाला के मुख्य आकर्षण और संसाधन व्यक्ति, ‘नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ के राहुल कुमार और उनकी जांबाज टीम रहे। उन्होंने तकनीकी सत्र के दौरान कुछ ऐसे हैरतअंगेज डिजिटल मॉनिटरिंग टूल्स और ऐप्स का प्रदर्शन किया, जिससे पक्षियों की पहचान, उनकी आवाजों का प्रलेखन और पारिस्थितिकीय आँकड़ों का संकलन चुटकियों में संभव हो जाता है। उन्होंने अपने खतरनाक और रोमांचक क्षेत्रीय अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कैसे देश का आम नागरिक भी इस डिजिटल क्रांति का हिस्सा बनकर जैव विविधता को बचा सकता है।

“डिजिटल क्रांति का आगाज!” एमडीडीएम कॉलेज की प्राचार्या प्रो. डॉ. अलका जायसवाल, विभागाध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता, मुख्य वक्ता राहुल कुमार और अन्य सम्मानित प्रोफेसर कॉलेज के सेमिनार हॉल में पक्षियों की पहचान से जुड़ी हाई-टेक गाइडबुक और डिजिटल टूल्स का विमोचन करते हुए।

परिसर में मचा रोमांच: जब लाइव फील्ड में उतरीं छात्राएँ

थ्योरी सत्र के बाद असली रोमांच तब शुरू हुआ जब कॉलेज परिसर को ही ‘लाइव फील्ड’ में बदल दिया गया। स्नातक और स्नातकोत्तर की सैकड़ों छात्राएं विशेषज्ञों की उंगली थामकर स्थानीय और दुर्लभ पक्षी प्रजातियों का शिकार (कैमरे और टूल्स से) करने मैदान में उतरीं। छात्राओं ने न केवल पक्षियों को लाइव ट्रैक किया, बल्कि उनके डेटा को डिजिटल ऐप्स पर अपलोड करने का व्यावहारिक अभ्यास भी किया।

इस महा-अभियान में कॉलेज के विभिन्न विभागों के शिक्षकों—डॉ. पल्लवी कुमारी, डॉ. रचना कुमारी, डॉ. सूरबाला, डॉ. आशा सिंह यादव, डॉ. नूतन, डॉ. प्रियम फ्रांसिस, डॉ. सरिता, डॉ. दीपमाला, डॉ. स्वेता सिंह, डॉ. सुनीता, डॉ. सुजाता और डॉ. बिमला ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। अंत में डॉ. पल्लवी कुमारी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यशाला का समापन हुआ।

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