मुजफ्फरपुर। बदलते दौर में जहाँ युवा पीढ़ी डिजिटल स्क्रीन और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में खोती जा रही है, वहीं मुजफ्फरपुर के प्रतिष्ठित महंत दर्शन दास महिला महाविद्यालय (MDDM College) के इतिहास विभाग ने एक अनूठी और सराहनीय पहल की है। अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के पावन अवसर पर सोमवार को महाविद्यालय की छात्राओं के लिए एक विशेष शैक्षणिक परिभ्रमण का आयोजन किया गया। इतिहास विभाग की अध्यक्ष डॉ. प्रांजलि के कुशल नेतृत्व में छात्राओं का यह जत्था मुजफ्फरपुर के ऐतिहासिक रामचंद्र शाही संग्रहालय पहुँचा।
इस परिभ्रमण का मुख्य उद्देश्य किताबी ज्ञान की सीमाओं को लांघकर छात्राओं को भारतीय पुरातत्व, प्राचीन संस्कृति और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से प्रत्यक्ष रूप से रूबरू कराना था। संग्रहालय की चहारदीवारी के भीतर कदम रखते ही छात्राओं के लिए मानो समय का पहिया सदियों पीछे घूम गया और इतिहास के पन्ने खुद-ब-खुद जीवंत हो उठे।

अतीत का झरोखा: संग्रहालय में बिखरी विरासत का लाइव
रामचंद्र शाही संग्रहालय पहुंचने पर छात्राओं का उत्साह देखते ही बनता था। गुलाबी और सफेद कॉलेज परिधान में सजी छात्राओं ने जैसे ही संग्रहालय के मुख्य दीर्घा (गैलरी) में प्रवेश किया, उनकी आँखें कौतूहल और गर्व से चमक उठीं।
डॉ. प्रांजलि के साथ-साथ संग्रहालय के विशेषज्ञों और गाइडों ने छात्राओं को एक-एक प्रदर्शित पुरावशेष के बारे में विस्तार से समझाया। लकड़ी और कांच के बड़े-बड़े शोकेस (प्रदर्शन मंजूषा) में सहेज कर रखी गई प्राचीन मूर्तियाँ, मिट्टी के बर्तन (मृदभांड), टेराकोटा की कलाकृतियां और प्राचीन औजारों को देखकर छात्राओं ने भारतीय इतिहास के क्रमिक विकास को समझा।
- पुरातत्व की व्यावहारिक समझ: इतिहास की कक्षा में ‘टेराकोटा’ या ‘पाषाण काल के औजार’ पढ़ना एक बात है, लेकिन उन्हें अपनी आँखों के सामने देखना बिल्कुल अलग अनुभव होता है। छात्राओं ने देखा कि कैसे हमारे पूर्वजों ने बिना किसी आधुनिक तकनीक के सिर्फ अपने हाथों के हुनर से मिट्टी और पत्थरों को जीवंत आकृतियों में ढाल दिया था।
- डिजिटल युग में इतिहास का दस्तावेजीकरण: परिभ्रमण के दौरान एक बेहद खूबसूरत नजारा देखने को मिला। आज की आधुनिक छात्राएं अपनी इस ऐतिहासिक यात्रा को केवल यादों में नहीं, बल्कि अपने स्मार्टफोन में भी सहेज रही थीं। कई छात्राएं शोकेस के पास झुककर कलाकृतियों की तस्वीरें ले रही थीं, तो कुछ महत्वपूर्ण जानकारियों को अपनी डायरी में नोट कर रही थीं।

विरासत को संजोने के प्रयासों पर गंभीर मंथन
इस शैक्षणिक परिभ्रमण का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू “धरोहर जागरूकता कार्यक्रम” रहा। छात्राओं ने इस बात पर गहन मंथन किया कि आखिर हमारी ऐतिहासिक धरोहरों को बचाना क्यों जरूरी है।
डॉ. प्रांजलि ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा:
“संग्रहालय केवल पुरानी और बेजान वस्तुओं को रखने की जगह नहीं हैं। ये हमारी सभ्यता का डीएनए (DNA) हैं। कोई भी समाज या राष्ट्र तब तक आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक वह अपने अतीत को नहीं समझता। आज अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर हमारा यहाँ आना तभी सार्थक होगा, जब हम इन विरासतों के संरक्षण का संकल्प लें।”

छात्राओं ने भी माना कि बिहार की धरती (विशेषकर वैशाली और मुजफ्फरपुर का क्षेत्र) पुरातत्व के दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्ध है। वज्जी संघ की इस ऐतिहासिक भूमि पर दफन इतिहास को संजोने में रामचंद्र शाही संग्रहालय जैसे संस्थान जो भूमिका निभा रहे हैं, वह वंदनीय है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फील्ड ट्रिप या शैक्षणिक परिभ्रमण छात्राओं के बौद्धिक विकास के लिए ‘संजीवनी’ का काम करते हैं। इतिहास जैसे विषय को अक्सर लोग ‘रटने वाला विषय’ मान लेते हैं, लेकिन जब छात्राएं खुद प्राचीन काल की मूर्तियों की बनावट, उनके गाउन, मुकुट और कलाशैलियों का विश्लेषण करती हैं, तो उनकी तार्किक क्षमता का विकास होता है।
इस परिभ्रमण ने छात्राओं में न केवल परीक्षा के दृष्टिकोण से ज्ञान का वर्धन किया, बल्कि उनमें अपनी संस्कृति के प्रति एक गहरी संवेदनशीलता और गौरव का भाव भी पैदा किया। कार्यक्रम के अंत में सभी छात्राओं और प्राध्यापकों ने संग्रहालय के मुख्य द्वार पर स्थापित भगवान बुद्ध की सुनहरी प्रतिमा के सामने एक सामूहिक तस्वीर भी खिंचवाई, जो इस यादगार दिन के समापन का प्रतीक बनी।
अन्य खबरों के लिए नीचे ’न्यूज भारत टीवी ’के लिंक पर क्लिक करें,
|| https://newsbharattv.in ||


