यूपीआई पर डाका बर्दाश्त नहीं! 2 अक्टूबर को क्यूआर कोड पर काला कपड़ा बांधकर डिजिटल क्रांति के खिलाफ गरजेंगे मोबाइल व्यापारी

एमडीआर शुल्क के प्रस्ताव से देश भर के कारोबारियों में कोहराम, ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन के आह्वान पर मुजफ्फरपुर से उठेगी विरोध की आंधी

मुजफ्फरपुर / ढ़ोली: देशभर में डिजिटल लेन-देन की रीढ़ बन चुकी यूपीआई व्यवस्था अब एक बड़े भूचाल की मुहाने पर खड़ी है। सरकार और वित्तीय नियामक तंत्र द्वारा यूपीआई के पात्र व्यापारियों के लेन-देन पर प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लागू करने की सुगबुगाहट ने खुदरा कारोबारियों की नींद उड़ा दी है। इस अन्यायपूर्ण आर्थिक बोझ और जबरन लादे जा रहे शुल्कों के खिलाफ ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन यानी एआईएमआरए बिहार इकाई ने बिगुल फूंक दिया है। विरोध की इसी कड़ी में आगामी 2 अक्टूबर 2026 को देशव्यापी ‘नो-यूपीआई-डे’ मनाने का निर्णय लिया गया है, जिसके तहत बिहार समेत मुजफ्फरपुर और इसके ग्रामीण अंचलों में भी व्यापारी अपनी दुकानों पर लगे यूपीआई क्यूआर कोड पर काला कपड़ा लगाकर अनोखा और कड़ा विरोध दर्ज कराएंगे।

सांकेतिक (प्रतीकात्‍मक) तस्‍वीर

डिजिटल क्रांति के नाम पर व्यापारियों की जेब पर डाका

एक समय देश में कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए जिस यूपीआई को पूरी तरह से मुफ्त और सुगम माध्यम के रूप में जनता के बीच लोकप्रिय बनाया गया था, अब उसी पर शुल्क लगाने की तैयारी ने व्यापारियों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। जानकारों और व्यापारिक संगठनों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव अमलीजामा पहनता है, तो यह केवल एक शुल्क नहीं बल्कि डिजिटल इंडिया के उस सपने पर करारा तमाचा होगा, जिसमें छोटे दुकानदारों और आम जनता को सहूलियत देने का दावा किया जाता था।

इरशाद आलम, जोनल उपाध्यक्ष ,एमरा

सरकार और संबंधित तंत्र की ओर से 2,000 रुपये से अधिक के पात्र लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर प्रस्तावित किया गया है। इतना ही नहीं, यदि लेन-देन 75,000 रुपये या उससे अधिक का होता है, तो इसके लिए अधिकतम 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन शुल्क तय किया गया है। मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक कारोबार की प्रकृति ऐसी है जहां अधिकांश खरीदारी और बिक्री 2,000 रुपये से काफी ऊपर की होती है। ऐसे में यह अतिरिक्त एमडीआर शुल्क सीधे तौर पर छोटे और मझोले खुदरा व्यापारियों की रीढ़ तोड़ने का काम करेगा और उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा हड़प जाएगा – इरशाद आलम, जोनल उपाध्यक्ष ,एमरा ।

ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन बिहार के जोनल उपाध्यक्ष इरशाद आलम ने इस मसले पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया है। ढ़ोली, मुजफ्फरपुर से खबर की पुष्टि करते हुए इरशाद आलम ने बताया कि सरकार और संबंधित तंत्र की ओर से 2,000 रुपये से अधिक के पात्र लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर प्रस्तावित किया गया है। इतना ही नहीं, यदि लेन-देन 75,000 रुपये या उससे अधिक का होता है, तो इसके लिए अधिकतम 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन शुल्क तय किया गया है। मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक कारोबार की प्रकृति ऐसी है जहां अधिकांश खरीदारी और बिक्री 2,000 रुपये से काफी ऊपर की होती है। ऐसे में यह अतिरिक्त एमडीआर शुल्क सीधे तौर पर छोटे और मझोले खुदरा व्यापारियों की रीढ़ तोड़ने का काम करेगा और उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा हड़प जाएगा।

क्या है एमडीआर और क्यों सुलग रही है व्यापारियों की आग?

मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह शुल्क है जो बैंक या पेमेंट एग्रीगेटर व्यापारी से मर्चेंट ट्रांजैक्शन के एवज में वसूलते हैं। जब ग्राहक अपने बैंक खाते से सीधे मर्चेंट के क्यूआर कोड पर भुगतान करता है, तो अब तक यह सेवा उपभोक्ताओं और व्यापारियों दोनों के लिए पूरी तरह से शून्य शुल्क यानी जीरो एमडीआर पर संचालित हो रही थी। इसी नीति ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान बाजार बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई।

लेकिन जैसे ही इस मुफ्त व्यवस्था को खत्म कर इस पर 0.4 प्रतिशत का भारी-भरकम टैक्स या शुल्क थोपने की बात सामने आई, वैसे ही देश का खुदरा व्यापारी समुदाय बिदक उठा। मोबाइल रिटेलर्स का कहना है कि आज के दौर में स्मार्टफोन और महंगे गैजेट्स की बिक्री अमूमन 2,000 रुपये से शुरू होकर लाखों तक जाती है। यदि प्रत्येक बड़े लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत की कटौती बैंक या कंपनियां करने लगेंगी, तो व्यापारी का पहले से ही मार्जिन पर चल रहा मुनाफा पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। आज खुदरा बाजार में प्रतिस्पर्धा इतनी अधिक है कि व्यापारी हर ग्राहक को अपने पास बनाए रखने के लिए न्यूनतम मार्जिन पर काम कर रहा है। ऐसे में एमडीआर का यह अतिरिक्त वित्तीय बोझ दुकानों के शटर गिराने की कगार पर ला खड़ा कर सकता है।

2 अक्टूबर को काले कपड़े से रंगे जाएंगे डिजिटल कोड

गांधी जयंती के पवित्र दिन यानी 2 अक्टूबर 2026 को देश भर के मोबाइल रिटेलर्स ने कालेधन या भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, बल्कि डिजिटल लूट के खिलाफ अनूठा प्रतिरोध दर्ज कराने का मन बना लिया है। एआईएमआरए(एमरा) के आह्वान पर मुजफ्फरपुर और बिहार के तमाम जिलों में व्यापारी अपनी दुकानों, शोरूमों और काउंटर पर सजे क्यूआर कोड स्टैंड पर काला कपड़ा लपेट देंगे। यह काला कपड़ा इस बात का प्रतीक होगा कि व्यापारी इस एकतरफा थोपे गए वित्तीय बोझ को कतई स्वीकार नहीं करेंगे।

यह सांकेतिक विरोध सरकार और वित्तीय सेवा प्रदाताओं को एक साफ संदेश देने के लिए काफी है कि यदि उनकी नीतियों में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन और अधिक आक्रामक रूप ले सकता है। व्यापारियों का यह स्पष्ट कहना है कि डिजिटल इंडिया की सफलता का पूरा श्रेय छोटे दुकानदारों और खुदरा विक्रेताओं को जाता है, जिन्होंने घर-घर और गली-मोहल्ले में जाकर ग्राहकों को क्यूआर कोड से पेमेंट करना सिखाया। आज जब बाजार पूरी तरह से डिजिटल हो चुका है और लोग कैश लेकर चलना भूल चुके हैं, ऐसे समय में अचानक एमडीआर का भूत खड़ा करना सरासर विश्वासघात है।

अर्थव्यवस्था और खुदरा बाजार पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव

इस पूरे प्रकरण का गहराई से विश्लेषण किया जाए तो इसके परिणाम बेहद चिंताजनक नजर आते हैं। जब छोटे खुदरा व्यापारी डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने पर भारी शुल्क चुकाने के लिए बाध्य होंगे, तो वे या तो ग्राहकों से अतिरिक्त शुल्क वसूलने की कोशिश करेंगे या फिर धीरे-धीरे डिजिटल पेमेंट से मुंह मोड़कर फिर से कैश ट्रांजैक्शन की तरफ लौटने लगेंगे। दोनों ही स्थितियां देश की आधुनिक वित्तीय अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होंगी। एक तरफ जहां कैशलेस इकॉनमी का सरकारी सपना धूमिल होगा, वहीं दूसरी तरफ महंगाई का एक नया दौर शुरू हो जाएगा क्योंकि व्यापारी इस अतिरिक्त लागत को अंततः उपभोक्ता की ही जेब से निकालेंगे।

मुजफ्फरपुर के स्थानीय बाजारों में भी इस प्रस्ताव को लेकर भारी रोष व्याप्त है। छोटे से लेकर बड़े मोबाइल विक्रेता इस बात से खफा हैं कि नीति निर्माताओं ने कोई भी निर्णय लेने से पहले जमीन स्तर के व्यापारियों की समस्याओं को समझने की जहमत नहीं उठाई। मोबाइल कारोबार में स्टॉक की कीमत बहुत अधिक होती है, और जब एक डीलर अपने डिस्ट्रीब्यूटर को या ग्राहक अपने डीलर को बड़ी रकम यूपीआई के जरिए ट्रांसफर करता है, तो उस पर लगने वाला 0.4 प्रतिशत शुल्क किसी भी छोटे व्यापारी के महीने के बजट को हिला कर रख सकता है।

प्रशासन और नीति निर्माताओं को चेतावनी

एआईएमआरए बिहार के जोनल नेतृत्व ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि इस प्रस्ताव को तत्काल वापस नहीं लिया गया, तो 2 अक्टूबर के इस सांकेतिक विरोध के बाद प्रदेश स्तर पर पुन: बैठक के उपरान्‍त आगामी रणनीतियों पर विचार किया जाएगा। व्यापारी अब चुप बैठने वाले नहीं हैं। अपनी रोजी-रोटी और व्यापारिक अस्तित्व की इस लड़ाई को वे सड़क से लेकर संसद तक ले जाने के लिए तैयार हैं।

अब सबकी निगाहें आगामी 2 अक्टूबर 2026 पर टिकी हैं, जब मुजफ्फरपुर सहित पूरे बिहार और देश भर के मोबाइल रिटेलर्स अपनी दुकानों पर क्यूआर कोड को काले कपड़े से ढंककर सरकार की एमडीआर नीति के खिलाफ अपनी पहली और कड़कदार सांकेतिक हुंकार भरेंगे। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि देश के नीति निर्माता व्यापारियों के इस रोष और आक्रोश के आगे झुकते हैं या फिर डिजिटल लेन-देन के रास्ते में यह काला कानून खुदरा व्यापार की कब्र खोदने का काम करता है।

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