सशक्त समिति के गठन से थमा कमीशन का खेल! रात में सफाई शुरू होने पर मुख्य पार्षद, उप-मुख्य पार्षद और पार्षदों में तकरार, 4 साल तक मलाई छनने के बाद रात की पाली में सफाई का जानिए पूरा सच
यह वाक्या बिहार के उन तमाम नवगठित नगर पंचायतों के लिए एक नजीर और आईना है
विशेष रिपोर्ट – एस. एस. कुमार ‘पंकज’ |
मुजफ्फरपुर (बिहार)। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का नवगठित मुरौल नगर पंचायत इन दिनों पूरे क्षेत्र में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वजह है रात के सन्नाटे में जगमगाती स्ट्रीट लाइटों के नीचे और वीरान पड़ी सड़कों पर गूंजती झाड़ू की आवाज। अमूमन रात के 9:15 बजे के बाद जब दुकानें बंद हो जाती हैं और आम लोग अपने घरों में दुबक जाते हैं, तब नगर पंचायत मुरौल के ढोली बाजार, जहांगीरपुर चौक और सादिकपुर की सड़कों पर सफाई कर्मी मुस्तैदी से सफाई करते नजर आ रहे हैं।
यह दृश्य किसी बड़े महानगर या नगर निगम का नहीं, बल्कि हाल ही में गठित एक छोटे से नगर पंचायत का है। जहां कुछ महीने पहले तक दिन के उजाले में भी कचरे का अंबार लगा रहता था और आम लोग गंदगी तथा बदबू से कराहते थे, वहां अचानक रात की पाली (नाइट स्वीपिंग) में सफाई होना किसी अजूबे से कम नहीं है। लेकिन इस ‘चमत्कार’ के पीछे की कहानी उतनी सरल नहीं है जितनी यह तस्वीरों में दिखाई देती है।

इस रात की सफाई के पीछे प्रशासनिक फेरबदल, कमीशन का बंद होना, जनप्रतिनिधियों का आपसी टकराव और सबसे बढ़कर एक साल बाद होने वाले नगर निकाय चुनावों का डर छिपा हुआ है। न्यूज भारत टीवी ने जब इस पूरी व्यवस्था की पड़ताल की और इससे जुड़े तमाम ओहदेदारों से बातचीत की, तो नगर पंचायत के भीतर जारी भ्रष्टाचार, बंदरबांट और सियासत की परतें एक-एक कर उधड़ती चली गईं।
तस्वीर का सच और जमीनी हकीकत
स्थानीय स्तर पर सोशल मीडिया और आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप्स में जब रात 9:15 बजे के आसपास ली गई तस्वीरें वायरल हुईं, तो आम जनता के साथ-साथ पड़ोसी नगर पंचायतों के लोग भी हैरान रह गए। तस्वीरों में देखा जा सकता है कि सफाई कर्मी हाथ में झाड़ू लिए मुजफ्फरपुर-पुसा-समस्तीपुर मार्ग और ढोली बाजार की मुख्य सड़कों की सफाई कर रहे हैं।
इस व्यवस्था के संबंध में जब सफाई एजेंसी के सुपरवाइजर उदय से बात की गई, तो उन्होंने बताया कि मुख्य बाजारों में रात के समय सफाई कराई जा रही है ताकि दिन में दुकानदारों और राहगीरों को किसी तरह की असुविधा न हो और सुबह बाजार पूरी तरह साफ-सुथरा मिले। लेकिन जब पत्रकार कुमार पंकज ने नगर पंचायत के शीर्ष जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछे, तो रात में हो रही इस सफाई का असली राजनीतिक और वित्तीय गणित सामने आ गया।

जनप्रतिनिधियों का आमने-सामने का पक्ष
1. मुख्य पार्षद राम नरेश प्रसाद मेहता का पक्ष: “बजट बढ़ा है, पर मैं काम से संतुष्ट नहीं”
नगर पंचायत अध्यक्ष (मुख्य पार्षद) राम नरेश प्रसाद मेहता से जब रात की सफाई को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने इसे पूरी तरह नियम और अनुबंध के तहत बताया। हालांकि, बातचीत के दौरान उनके बयानों में भारी असंतोष और झल्लाहट साफ झलकी।
- अनुबंध और बजट का गणित: मुख्य पार्षद ने बताया कि सफाई एजेंसी के वर्क एग्रीमेंट में शुरू से ही प्रमुख चौक-चौराहों पर नाइट स्वीपिंग (रात्रि सफाई) का नियम था। जब नगर पंचायत का गठन हुआ था, तब सफाई का मासिक टेंडर महज 4 लाख रुपये का था। बाद में यह बढ़कर 8 से 9 लाख रुपये हुआ और 15 जून से लागू नए 2 साल के एग्रीमेंट में यह बजट बढ़कर 15 से 16 लाख रुपये महीना हो चुका है।
- काम पर असंतोष: मुख्य पार्षद का कहना था, “जब एजेंसी को 4 लाख के बदले 15-16 लाख रुपये प्रति माह दिए जा रहे हैं, तो स्वाभाविक है कि काम का दायरा बढ़ेगा। लेकिन जो सफाई दिख रही है और जिसकी वाहवाही हो रही है, उससे मैं पूरी तरह असंतुष्ट हूं। यह कुल काम का महज 35 से 40 प्रतिशत ही है। सिर्फ दो-चार जगह झाड़ू मार देने और फोटो खिंचवा लेने से सफाई नहीं हो जाती।”
- पार्षदों पर पलटवार: जब उनसे पूछा गया कि पार्षद उन पर उंगली उठा रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि वह किसी भी पार्षद या प्रतिनिधि के साथ सफाई के मुद्दे पर ‘लाइव डिबेट’ करने को तैयार हैं।

2. उप-मुख्य पार्षद अजय कुमार यादव का पक्ष: “कमीशन का खेल बंद, सशक्त समिति हुई टाइट”
उप-मुख्य पार्षद अजय कुमार यादव का रुख मुख्य पार्षद के बिल्कुल विपरीत रहा। उन्होंने इस पूरी तब्दीली का श्रेय प्रशासनिक व्यवस्था में हुए सुधार और मुख्य पार्षद के एकाधिकार के खत्म होने को दिया।
- हाईजैक खत्म, सशक्त समिति का गठन: अजय कुमार यादव का कहना है कि पहले बिहार सरकार के पुराने नियमानुसार सशक्त स्थायी समिति के तीन सदस्यों को मुख्य पार्षद अपनी पसंद से मनोनीत करते थे, जिससे पूरे तंत्र को ‘हाईजैक’ कर लिया गया था। लेकिन सरकार के नए आदेश के बाद अब पार्षदों ने वोटिंग के जरिए अपनी सशक्त स्थायी समिति चुनी है।
- कमीशन बंद होने से सुधार: उप-मुख्य पार्षद ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा, “पहले अध्यक्ष को सफाई एजेंसी से ढाई लाख रुपये महीना मिलता था। अब नई सशक्त समिति ने कमीशन का यह खेल पूरी तरह बंद करा दिया है। जब अध्यक्ष का कमीशन बंद हो गया, तो एजेंसी पर काम करने का दबाव बना है।”
- सफाई कर्मियों के खाते में सीधा भुगतान: उन्होंने कहा कि पहले एनजीओ/एजेंसी सफाई कर्मियों का 5,000 रुपये खा जाती थी और मजदूरों को शोषण का शिकार होना पड़ता था। अब सशक्त समिति ने फैसला लिया है कि मजदूरों का भुगतान सीधे उनके बैंक खातों में किया जाए ताकि काम करने वाले खुश रहें।

3. वार्ड 3 के पार्षद आनंद कंद साह का दावा: “यह महज कागजी और चुनावी चमत्कार है”
वार्ड संख्या 3 के पार्षद आनंद कंद साह ने रात की सफाई को पूरी तरह से जनता की आंखों में धूल झोंकने वाला कदम बताया। उन्होंने नगर पंचायत के भ्रष्टाचार पर तल्ख टिप्पणी करते हुए अपनी बात रखी।
- कागजी दावे और बंदरबांट: पार्षद आनंद कंद साह ने कहा, “तुम्हारे गांव का मौसम गुलाबी है, ये वादे झूठे हैं, ये दावे किताबी हैं। जो चमत्कार दिख रहा है, वह सिर्फ कागजों और तस्वीरों में है।” उन्होंने आरोप लगाया कि फरवरी 2024 में 9 लाख का टेंडर था जो अब 14 लाख से अधिक हो गया है। इस दौरान टेंडर दिलाने के नाम पर अधिकारियों और कार्यपालक पदाधिकारियों को 15-15 लाख रुपये तक की मोटी रकम दी गई।
- हिस्सा न मिलने का विवाद: पार्षद ने कहा कि जब तक मुख्य पार्षद को उनका तय हिस्सा और कमीशन मिल रहा था, तब तक उन्हें एजेंसी में कोई ऐब नजर नहीं आता था। जैसे ही पैसे का तालमेल बिगड़ा और कमीशन रुका, वैसे ही मुख्य पार्षद को काम में कमियां दिखने लगीं।

4. वार्ड 4 के पार्षद दिलीप कुमार (बबलू कुमार) की दलील: “मजदूरों का शोषण रुका, सुधार जारी है”
सशक्त स्थायी समिति के नवनिर्वाचित सदस्य और वार्ड 4 के पार्षद बबलू कुमार उर्फ दिलीप कुमार ने स्वीकार किया कि बीते 4 वर्षों में व्यवस्था बेहद खराब थी, लेकिन अब उसमें सुधार की कोशिश की जा रही है।
- मनोनयन से निर्वाचन का सफर: उन्होंने बताया कि पहले मुख्य पार्षद अपने चहेते मनोनीत सदस्यों के दम पर मनमाने फैसले लेते थे। वार्ड पार्षदों की बिना सहमति के हाई मास्ट लाइटें और कैमरे लगा दिए गए। अब चुनाव जीतकर आई समिति पारदर्शिता ला रही है।
- मजदूरी में बढ़ोतरी और आईडी कार्ड: दिलीप कुमार ने कहा कि पहले सफाई कर्मियों को महज 300 रुपये देकर उनका शोषण किया जाता था। अब नई समिति उन्हें 436 रुपये प्रतिदिन मजदूरी दिलाने के लिए प्रयासरत है। इसके अलावा, सफाई कर्मियों को भयमुक्त माहौल देने और उन्हें पहचान पत्र (आईडी कार्ड) जारी कराने के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया जाएगा।

4 साल की मलाई बनाम 1 साल की सेवा
मुरौल नगर पंचायत का यह पूरा मामला बिहार के नवगठित स्थानीय निकायों की जमीनी कार्यशैली का एक जीवंत दस्तावेज है। इस पूरे घटनाक्रम का यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए तो तीन प्रमुख बिंदु उभरकर सामने आते हैं:
बजट चार गुना बढ़ा, पर व्यवस्था अब क्यों जागी?
नगर पंचायत बनने के बाद सफाई का बजट जो शुरुआत में 3.5 से 4 लाख रुपये प्रति माह था, वह आज बढ़कर 14 से 16 लाख रुपये प्रति माह (यानी लगभग 1.80 करोड़ रुपये सालाना) पहुंच चुका है। सवाल यह उठता है कि जब जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा था, तो 4 वर्षों तक रात की सफाई तो दूर, दिन की सफाई भी सही तरीके से क्यों नहीं हो रही थी? क्या इतने वर्षों तक जनता के टैक्स के पैसे पर सिर्फ मलाई छानी जा रही थी?
कमीशनखोरी का मकड़जाल
उप-मुख्य पार्षद और पार्षदों के खुले बयानों से यह साफ है कि निकाय के भीतर निचले स्तर पर करप्शन का तगड़ा जाल फैला हुआ था। टेंडर आवंटित करने से लेकर एजेंसी के बिल पास करने तक लाखों रुपये के कमीशन का खेल चल रहा था। जब तक यह ‘कमीशन तंत्र’ सुचारू रूप से चल रहा था, तब तक किसी को न तो जनता की गंदगी दिखी और न ही एग्रीमेंट की शर्तें याद आईं। जैसे ही सशक्त समिति के पुनर्गठन से शक्ति का संतुलन बदला और कमीशन का प्रवाह रुका, वैसे ही अचानक नियमों की किताबें खुल गईं और रातों-रात झाड़ू चलने लगी।

चुनाव का डर और जनता का हिसाब
नगर पंचायत के गठन को 4 साल बीत चुके हैं और अब महज 1 साल का कार्यकाल शेष बचा है। 12 महीने बाद चुनाव की तारीखें सामने होंगी और जनप्रतिनिधियों को उसी जनता के पास वोट मांगने जाना पड़ेगा, जिसे पिछले चार सालों तक बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसाया गया। जनप्रतिनिधियों में इस बात का डर साफ दिख रहा है कि जनता भोली जरूर है, लेकिन 4 साल की उपेक्षा का हिसाब चुनाव में मांग सकती है। यही कारण है कि अंतिम 1 साल में जनता को लुभाने और ‘चमत्कार’ दिखाने की होड़ मची है।
बड़े सवाल : मुजफ्फरपुर के मुरौल नगर पंचायत से आई यह तस्वीर सिर्फ ढोली बाजार या सादिकपुर की नहीं है, बल्कि यह बिहार के उन तमाम नवगठित नगर पंचायतों के लिए एक नजीर और आईना है, जहां के निवासी आज भी विकास और नागरिक सुविधाओं के नाम पर ठगे जा रहे हैं।
यदि मुरौल में सशक्त समिति के कड़े रुख और जनप्रतिनिधियों की आपसी तकरार के कारण ही सही, लेकिन रात 9 बजे सफाई शुरू हो सकती है, तो बिहार के बाकी नगर पंचायतों में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्या दूसरे नगर निकायों में अफसर, अध्यक्ष और एजेंसियां मिलकर जनता के पैसे पर डाका डाल रहे हैं और डकार भी नहीं ले रहे हैं?
मुरौल की जनता के लिए यह राह थोड़ी राहत भरी जरूर है कि सड़कों पर रात में झाड़ू लग रही है और मजदूरों को हक मिलने की उम्मीद जगी है। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी कायम है कि क्या यह बदलाव स्थायी है या फिर चुनावी साल बीतते ही और नया टेंडर होते ही यह झाड़ू फिर से थम जाएगी? अब देखना दिलचस्प होगा कि मुख्य पार्षद द्वारा चाही जा रही ‘लाइव डिबेट’ से भ्रष्टाचार के और कितने जिन्न बाहर निकलते हैं।
पुर की नहीं है, बल्कि यह बिहार के उन तमाम नवगठित नगर पंचायतों के लिए एक नजीर और आईना है, जहां के निवासी आज भी विकास और नागरिक सुविधाओं के नाम पर ठगे जा रहे हैं।
यदि मुरौल में सशक्त समिति के कड़े रुख और जनप्रतिनिधियों की आपसी तकरार के कारण ही सही, लेकिन रात 9 बजे सफाई शुरू हो सकती है, तो बिहार के बाकी नगर पंचायतों में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्या दूसरे नगर निकायों में अफसर, अध्यक्ष और एजेंसियां मिलकर जनता के पैसे पर डाका डाल रहे हैं और डकार भी नहीं ले रहे हैं?
मुरौल की जनता के लिए यह राह थोड़ी राहत भरी जरूर है कि सड़कों पर रात में झाड़ू लग रही है और मजदूरों को हक मिलने की उम्मीद जगी है। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी कायम है कि क्या यह बदलाव स्थायी है या फिर चुनावी साल बीतते ही और नया टेंडर होते ही यह झाड़ू फिर से थम जाएगी? अब देखना दिलचस्प होगा कि मुख्य पार्षद द्वारा चाही जा रही ‘लाइव डिबेट’ से भ्रष्टाचार के और कितने जिन्न बाहर निकलते हैं।
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