जानिए कैसे कागज़ों पर बुना गया 10 लाख से ज़्यादा का ‘घपला जाल‘—2023 में 60% तो 2025 में भी वसूला गया दोगुना कमीशन!
[विशेष रिपोर्ट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’]
मुजफ्फरपुर । क्या आपने कभी सुना है कि सरकार का नियम कहे कि किसी काम का कमीशन (सेवा शुल्क) ज़्यादा से ज़्यादा 7 प्रतिशत होना चाहिए, और अफ़सर-ठेकेदार मिलकर 60 प्रतिशत का कमीशन पास कर दें?
जी हाँ, यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं, बल्कि मुजफ्फरपुर ज़िले के नगर पंचायत मुरौल की नंगी सच्चाई है! बिहार सरकार के नगर विकास विभाग और जेएम (GeM) पोर्टल के आधिकारिक काग़ज़ात की जब पड़ताल की गई, तो अफ़सरों, बाबुओं और ठेकेदारों के उस बड़े खेल की पोल खुल गई जिसने सरकारी खजाने को 10 लाख रुपये से भी ज़्यादा की चपत लगा दी।

आइए आम और सीधी भाषा में समझते हैं कि मुरौल में आउटसोर्सिंग बहाली के नाम पर यह ‘महा-घोटाला’ आख़िर कैसे रचा गया!
सबसे पहले समझिए: बिहार सरकार का नियम क्या कहता है?
बिहार सरकार के वित्त विभाग ने आउटसोर्सिंग (ठेके पर मैनपावर रखने) के लिए मार्च 2023 में ही बहुत सख्त नियम बनाए थे:
- कमीशन की सीमा: कोई भी ठेकेदार कंपनी 3.85 प्रतिशत से कम और 7 प्रतिशत से ज़्यादा कमीशन (सर्विस चार्ज) नहीं माँग सकती।
- सीधे रिजेक्ट करने का नियम: अगर कोई कंपनी 7 प्रतिशत से 1 पैसा भी ज़्यादा माँगती है, तो अफ़सरों का फ़र्ज़ है कि उस कंपनी की अर्ज़ी को तुरंत कचरे के डिब्बे में फेंक दें (निरस्त कर दें)।
लेकिन नगर पंचायत मुरौल में इस नियम को ढाल बनाने के बजाय पैर तले कुचल दिया गया!
क्या है नियम देखें नीचे पत्रांक M-4/06/2023 -2988


घपले का पैंतरा #1 (दिसंबर 2023): ’60 प्रतिशत कमीशन का महा-झोल‘
- खेल की शुरुआत: 12 दिसंबर 2023 को नगर पंचायत मुरौल ने 11 महीने के लिए 9 कर्मचारियों (डेटा एंट्री ऑपरेटर, टैक्स कलेक्टर, सैनिटरी इंस्पेक्टर आदि) का ठेका एशियास्किल्स (AsiaSkills) नाम की एक ओडिशा की कंपनी को दिया।
- कमीशन का डाका: नियम के हिसाब से कंपनी को ज़्यादा से ज़्यादा 7 प्रतिशत कमीशन मिलना चाहिए था। लेकिन अफ़सरों ने आँखें मूंदकर 60 प्रतिशत का अकल्पनीय कमीशन स्वीकृत कर दिया! यानी नियम से साढ़े आठ गुना ज़्यादा!
- बाबुओं का कब्जा: काग़ज़ात बताते हैं कि इस पूरे अनुबंध में मुख्य खरीदार और पेमेंट करने वाला अफ़सर खुद हेड क्लर्क (प्रधान लिपिक) बना बैठा था। कानूनन किसी क्लर्क को लाखों के ठेके पास करने का कोई हक़ नहीं होता, लेकिन अफ़सरों ने पूरी कमान एक लिपिक के हाथ में सौंप रखी थी।
- खजाने की लूट: 11 महीने का यह ठेका 23,24,622.19 रुपये का था। अगर नियम से काम होता, तो खर्च सिर्फ़ 15.54 लाख रुपये आता। यानी सीधे-सीधे लगभग 7,70,000 रुपये (सात लाख सत्तर हजार) ठेकेदार की जेब में मुफ़्त के ठूँस दिए गए!

घपले का पैंतरा #2 (मार्च 2025): ‘सुधार का नाटक और दोगुना डाका‘
जब 2023 के घोटाले पर सवाल उठने लगे, तो मार्च 2025 में 24 महीने (2 साल) का नया ठेका निकाला गया। इसमें अफ़सरों ने बायोमेट्रिक हाजिरी का नियम लगाकर ऐसा दिखाया कि सब कुछ ‘दूध का धुला’ हो गया है। लेकिन जब गहराई से जाँच की गई, तो भीतर वही पुराना खेल चल रहा था!
- दोगुना कमीशन पास किया: 25 मार्च 2025 को फिनाक्सी (Finaccy) नाम की दरभंगा की एजेंसी के साथ 2 साल के लिए 41,06,057.26 रुपये का नया ठेका हुआ।
- नियमों की फिर धज्जियाँ: काग़ज़ों पर दावा किया गया कि व्यवस्था सुधर गई है, लेकिन इसमें भी कमीशन 14.16 प्रतिशत स्वीकृत कर लिया गया। जो कि सरकार की 7 प्रतिशत वाली अधिकतम सीमा से सीधा दोगुना है!
- खजाने को फिर चपत: इस नए ठेके में भी नियम के विपरीत जाकर ठेकेदार को लगभग 2,45,000 रुपये (दो लाख पैंतालीस हजार) का अतिरिक्त अनुचित फायदा पहुँचाया जा रहा है।
कुल मिलाकर कितना घपला? (10.15 लाख का सीधा हिसाब)
अगर आप दोनों ठेकों का हिसाब जोड़ें:
- 2023 का घोटाला: 7,70,000 रुपये
- 2025 का घोटाला: 2,45,000 रुपये
- कुल हेराफेरी: ₹10,15,000 (दस लाख पंद्रह हजार रुपये से अधिक)
मुरौल की जनता के टैक्स की कमाई के ₹10 लाख से ज़्यादा रुपये बिना किसी डर के ठेकेदारों और अफ़सरों की जुगलबंदी की भेंट चढ़ गए!


तुलनात्मक चार्ट: एक नज़र में देखिए पूरा ‘खेल‘
| बात / पैंतरा | 2023 का ठेका (11 माह) | 2025 का ठेका (24 माह) | असली सच्चाई क्या है? |
| सरकारी नियम | ज़्यादा से ज़्यादा 7% कमीशन | ज़्यादा से ज़्यादा 7% कमीशन | दोनों बार नियम को दरकिनार किया गया। |
| दिया गया कमीशन | 60.00% (8.5 गुना ज़्यादा) | 14.16% (2 गुना ज़्यादा) | दोनों ठेके पूरी तरह गैर-कानूनी हैं। |
| कुल बिल | 23,24,622.19 रुपये | 41,06,057.26 रुपये | खजाने से बेहिसाब पैसा निकाला गया। |
| अवैध फायदा (घपला) | ~ 7,70,000 रुपये | ~ 2,45,000 रुपये | कुल ₹10.15 लाख की सीधी चपत। |
| किसके दस्तखत/कमान | हेड क्लर्क (प्रधान लिपिक) | विशाल कुमार को जेएम (GeM) पोर्टल पर मुख्य खरीदार (प्राइमरी बायर) | क्लर्क से लेकर अधिकारी तक सब घेरे में। |
प्रशासनिक नियमों का फिर उड़ा मज़ाक: बायर बने विशाल कुमार की सच्चाई
2025 के नए अनुबंध में जहाँ एक तरफ सुधार का ढोल पीटा गया, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक मर्यादाओं की फिर धज्जियाँ उड़ाई गईं। जिस विशाल कुमार को जेएम (GeM) पोर्टल पर मुख्य खरीदार (प्राइमरी बायर) बनाकर वित्तीय कमान सौंपी गई है, वे कोई गजटेड अफ़सर या अधिकृत कार्यपालक पदाधिकारी नहीं, बल्कि कार्यालय के ही एक कर्मचारी हैं। सरकारी नियमों और वित्तीय शक्तियों के प्रत्यायोजन (डेलीगेशन ऑफ फाइनेंशियल पावर्स रूल्स) के अनुसार, किसी गैर-राजपत्रित कर्मचारी को बायर बनाकर लाखों रुपये के अनुबंधों को ओके करने का अधिकार देना खुद में एक बड़ा administrative violation (प्रशासनिक अपराध) है। 2023 में जहाँ प्रधान लिपिक को बायर बनाकर खेल हुआ, वहीं 2025 में कार्यालय कर्मी विशाल कुमार के नाम का इस्तेमाल कर 7 प्रतिशत की जगह 14.16 प्रतिशत का नियम-विरुद्ध कमीशन स्वीकृत कर लिया गया। इस पूरे खेल में कार्यालय कर्मी विशाल कुमार तो कानूनी शिकंजे में फँसेंगे ही, साथ ही पर्दे के पीछे से अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने वाले उच्चाधिकारियों पर भी गाज गिरना तय है।
किसकी-किसकी फंसेगी गर्दन? (कानूनी शिकंजा)
- तत्कालीन हेड क्लर्क और एक्जीक्यूटिव ऑफिसर (2023): एक क्लर्क को लाखों के पेमेंट का पावर देना और 60% का घोटाला पास करना भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट) के तहत सीधी जेल की राह दिखाता है।
- कार्यालय कर्मी विशाल कुमार एवं बैकडेट अफ़सर (2025 मामला): 2025 के अनुबंध में कार्यपालक पदाधिकारी की जगह कार्यालय कर्मी विशाल कुमार को प्राइमरी बायर बनाया गया और 7 प्रतिशत की वैध सीमा को लाँघकर 14.16 प्रतिशत कमीशन का ठेका साइन कराया गया। एक निचले स्तर के कर्मचारी को वित्तीय बायर बनाना और नियम-विरुद्ध दर पास करना सीधे तौर पर धोखाधड़ी और पद के दुरुपयोग का मामला बनाता है, जिसमें साइन करने वाले कर्मचारी और सहमति देने वाले अफ़सर दोनों की विधिक गर्दन फँस चुकी है।
- चेयरमैन (मुख्य पार्षद) व वाइस चेयरमैन (उपमुख्य पार्षद): नगर पंचायत की सशक्त स्थायी समिति के प्रमुख होने के नाते बोर्ड बैठक में इन अवैध प्रस्तावों पर चुप रहना और पास होने देना गंभीर आपराधिक लापरवाही है। धारा 25(5) के तहत इनकी कुर्सी जाना तय माना जा रहा है।

नगर पंचायत अध्यक्ष (मुख्य पार्षद) राम नरेश प्रसाद मेहता का पक्ष:
“हमें तकनीकी और वित्तीय जानकारी नहीं होती, सारा काम कार्यपालक पदाधिकारी का है”
आउटसोर्सिंग बहाली में 60 प्रतिशत और 14.16 प्रतिशत सेवा शुल्क दिए जाने के मामले पर नगर पंचायत मुरौल के अध्यक्ष राम नरेश प्रसाद मेहता ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की है। उन्होंने कहा, “हमें इन सब बातों और टैक्स/कमीशन की कोई जानकारी नहीं रहती है। हम लोग तो पॉलिटिक्स में हैं। हमें इतनी तकनीकी जानकारी नहीं दी जाती। टेंडर प्रक्रिया और सिलेक्शन कमेटी में जनप्रतिनिधियों की कोई भूमिका नहीं होती, सारा काम सरकार के प्रतिनिधि यानी कार्यपालक पदाधिकारी देखते हैं। इस पूरे मामले में जो भी विस्तृत जानकारी चाहिए, वह कार्यपालक पदाधिकारी ही दे सकते हैं।”
उप-मुख्य पार्षद (उपाध्यक्ष) अजय कुमार यादव का पक्ष:
“मुझे कोई जानकारी नहीं, सशक्त स्थायी समिति के कोरम का दुरुपयोग कर मुख्य पार्षद ने कराया खेल”
आउटसोर्सिंग बहाली में 60 प्रतिशत और 14.16 प्रतिशत सेवा शुल्क दिए जाने के सवाल पर नगर पंचायत मुरौल के उप-मुख्य पार्षद (उप-अध्यक्ष) अजय कुमार यादव ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उन्हें इस टेंडर और प्रक्रिया की कोई जानकारी ही नहीं दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य पार्षद ने अपने मनोनीत तीन सदस्यों का दस्तखत कराकर कोरम पूरा किया और मनमाने तरीके से प्रस्ताव पास करा लिए।
अजय यादव ने कहा, “पहली बैठक के बाद मुझे सशक्त स्थायी समिति के बैठकों की सूचना तक नहीं दी जाती थी और घर-घर जाकर दस्तखत कराए जाते थे। नियम के विपरीत 60% सेवा शुल्क देना पूरी तरह गलत है। बोर्ड की बैठक में तय हुआ था कि स्थानीय लोगों को रखा जाएगा, लेकिन नियमों को दरकिनार कर दिया गया। अब नए सशक्त समिति के गठन के बाद हम इन गलत फैसलों और एजेंसियों के खिलाफ कदम उठाएंगे।”

वर्तमान कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) का रुख और आगे की कानूनी राह:
अधिकारी ने नहीं उठाया फोन, जानिए क्या होना चाहिए अगला प्रशासनिक कदम?
नगर पंचायत मुरौल में हुए इस बड़े घपले पर वर्तमान कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) का मंतव्य जानने के लिए न्यूज़ भारत टीवी के पत्रकार कुमार पंकज ने (मोबाइल नम्बर;-7562033888 के द्वारा) उनसे चार बार फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। नतीजतन, इस घोटाले पर उनका कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आ सका।
हालांकि, यह पूरा मामला मीडिया और आधिकारिक दस्तावेजों के जरिए सार्वजनिक होने के बाद वर्तमान ईओ का पहला प्रशासनिक दायित्व बनता है कि वे पूर्व में हुए दोनों नियम-विरुद्ध अनुबंधों (2023 के 60% और 2025 के 14.16% कमीशन) की फाइलों की तत्काल समीक्षा कर पूरी वित्तीय अनियमितता की एक अंतरिम रिपोर्ट तैयार करें। 2025 के अनुबंध में गैर-राजपत्रित कार्यालय कर्मी विशाल कुमार को अनधिकृत रूप से ‘प्राइमरी बायर’ बनाए जाने और वित्त विभाग की 7% की अधिकतम सीमा का उल्लंघन होने के ठोस आधार पर वे इस अवैध अनुबंध को निरस्त (Cancel) करने की सिफारिश नगर विकास एवं आवास विभाग (UDHD) को भेज सकते हैं। इसके साथ ही, सरकारी खजाने को पहुँचे लगभग 10.15 लाख रुपये के वित्तीय नुकसान की वसूली के लिए संबंधित एजेंसियों (एशियास्किल्स व फिनाक्सी) को कारण बताओ नोटिस जारी करने, मामले की विजिलेंस जाँच के लिए विभाग को पत्र लिखने, तथा इसमें संलिप्त पूर्व अधिकारियों व कर्मियों पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने हेतु सशक्त स्थायी समिति एवं बोर्ड के समक्ष प्रस्ताव प्रस्तुत करना उनका प्राथमिक विधिक कर्तव्य है।
जनता का सवाल: क्या विजिलेंस जाँच होगी?
जब सरकार का साफ़ आदेश था कि 7% से ज़्यादा कमीशन मांगने वाली कंपनी को रिजेक्ट कर दो, तो फिर 60% और 14.16% वाले टेंडर को जेएम पोर्टल पर ओके किसने और क्यों किया?क्या बिहार का नगर विकास विभाग और विजिलेंस टीम मुरौल नगर पंचायत में हुए इस 10 लाख रुपये से ज़्यादा के घपले पर कार्रवाई करेगी, या फिर अफ़सर-ठेकेदार मिलकर यूँ ही जनता की गाढ़ी कमाई लूटते रहेंगे?
क्या निष्पक्ष ऑडिट और जांच की आवश्यकता है?
इस पूरे ‘महा-घोटाले’ की तह तक पहुँचने और संलिप्त चेहरों को बेनकाब करने के लिए केवल विभागीय पत्राचार या लीपापोती काफी नहीं है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है:
- फॉरेंसिक और थर्ड-पार्टी वित्तीय ऑडिट: नगर पंचायत मुरौल के पिछले 3 वर्षों के सभी आउटसोर्सिंग बिलों, GeM टेंडर फाइलों और भुगतान वाउचरों का एक स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट कराया जाए। इससे यह स्पष्ट होगा कि कागज़ों पर दिखाए गए कर्मचारियों की वास्तविक संख्या कितनी थी और वास्तव में कितना भुगतान किया गया।
- GeM पोर्टल वेंडर्स और बैंक खातों की जांच: संबंधित आउटसोर्सिंग एजेंसी के बैंक खातों और लेन-देन का ऑडिट यह उजागर करेगा कि 60% और 14.16% के रूप में वसूला गया अतिरिक्त कमीशन किन-किन अधिकारियों या बिचौलियों के खातों में किस रूप में पहुँचा।
- विजिलेंस (निगरानी अन्वेषण ब्यूरो) जांच: मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और नगर विकास विभाग को तुरंत इस प्रकरण को विजिलेंस जांच के सुपुर्द करना चाहिए, ताकि पद का दुरुपयोग करने वाले लोक सेवकों और एजेंसी के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई और FIR दर्ज हो सके।
यदि समय रहते इस मामले का निष्पक्ष ऑडिट और जांच नहीं कराई गई, तो यह न केवल स्थानीय निकायों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगा, बल्कि GeM जैसे पारदर्शी पारदर्शी ई-गवर्नेंस सिस्टम के मूल उद्देश्यों पर भी गहरा सवालिया निशान खड़ा करेगा।
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