बिहार के सियासी इतिहास का वो ‘मसीहा’, जिसने मात्र 110 दिनों में बदल दी थी प्रदेश की तकदीर!

प्रथम प्रधानमंत्री बैरिस्टर मुहम्मद युनूस की जयंती पर गणमान्य लोगों ने दी श्रद्धाजंलि; उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने अर्पित किए पुष्प

पटना/मुजफ्फरपुर। बिहार के गौरवशाली इतिहास के शिल्पकार और प्रदेश के प्रथम ‘प्रधानमंत्री’ (प्रीमियर) बैरिस्टर मुहम्मद युनूस की जयंती राजकीय समारोह के रूप में पूरी गरिमा के साथ मनाई गई। पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल परिसर में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और महापुरुष की विरासत को नमन किया। इस अवसर पर बिहार के उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने युनूस के तैल चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

राजकीय समारोह के दौरान बैरिस्टर मुहम्मद युनूस के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी।

विकास और सद्भाव का अद्भुत संगम : मानवाधिकार संस्थान के महासचिव मोहम्मद इश्तेयाक ने मीडिया को  संदेश जारी कर , बैरिस्टर युनूस के अद्वितीय योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब भाषाई और सांप्रदायिक मतभेद चर्चा में रहते हैं, युनूस साहब ने 1937 में ही अपनी दूरदर्शिता से इसका समाधान कर दिया था। उन्होंने हिंदी, उर्दू, बंगला और कैथी जैसी भाषाओं को प्रशासनिक और अदालती कार्यों में उचित स्थान देकर समाज को जोड़ने का काम किया था। उनके द्वारा निकाला गया ‘मेल-मिलाप’ रिसाला (पत्रिका) आज भी सामाजिक एकता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

मात्र 110 दिनों में खींची विकास की लंबी लकीर : मोहम्मद इश्तेयाक ने जारी संदेश में जोर देते हुए कहा कि बैरिस्टर युनूस की सरकार का कार्यकाल मात्र 110 दिनों का था, लेकिन उन्होंने वह कर दिखाया जो अक्सर पांच साल की सरकारें भी नहीं कर पातीं। औरंगाबाद में सांप्रदायिक तनाव को शांत करना हो, सीवान को विनाशकारी बाढ़ से बचाना हो, या किसानों के कर्ज को कम कर महाजनों पर लगाम कसना—युनूस साहब का विजन स्पष्ट था। उन्होंने डुमराव में सीमेंट और कागज की फैक्ट्री खोलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाकर बिहार के औद्योगीकरण का सपना देखा था।

जयंती समारोह में उपस्थित प्रबुद्ध नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्होंने महापुरुष के विचारों को साझा किया।

इतिहास के पन्नों से: बिहार के पहले ‘प्रीमियर’ बैरिस्टर मुहम्मद युनूस की दास्तां

आधुनिक लोकतंत्र में जिसे हम ‘मुख्यमंत्री’ कहते हैं, 1935 के ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट’ के तहत उस पद को ‘प्रधानमंत्री’ (प्रिमियर) कहा जाता था। बैरिस्टर मुहम्मद युनूस इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत बिहार के पहले प्रधानमंत्री बने।

 संवैधानिक संकट के संकटमोचक 1937 के चुनावों में जब कांग्रेस ने कुछ तकनीकी कारणों से सरकार बनाने से इनकार कर दिया, तब लोकतंत्र की गरिमा बचाते हुए दूसरी सबसे बड़ी पार्टी ‘मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी’ के नेता बैरिस्टर युनूस ने 1 अप्रैल 1937 को शपथ ली। उन्होंने अपनी कैबिनेट को ‘समावेशी’ बनाया, जिसमें कुमार राजीव प्रसाद सिंह और बाबू गिरी सहाय जैसे नेताओं को शामिल कर एकता का संदेश दिया।

 एक प्रख्यात बैरिस्टर और पत्रकार लंदन से कानून की पढ़ाई करने वाले युनूस साहब पटना हाई कोर्ट के नामी बैरिस्टर थे। उनकी लेखनी और पत्रकारिता में भी गहरी रुचि थी। उन्होंने ‘द पटना टाइम्स’ अखबार शुरू किया, जो उस समय जन-चेतना का प्रमुख केंद्र बना।

 निस्वार्थ सेवा की मिसाल जब कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच विवाद सुलझ गया, तो उन्होंने बिना किसी मोह के 19 जुलाई 1937 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनका जीवन बताता है कि पद से बड़ा ‘कर्तव्य’ होता है।

बैरिस्टर मुहम्मद युनूस आज भी बिहार के उन बिरले राजनेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने राजनीति को जनसेवा और सौहार्द का माध्यम बनाया। उनकी विरासत आज के समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


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