HPCL अधिकारी का गैर-जिम्मेदाराना बयान- “सरकारी नोटिफिकेशन से कुछ नहीं होता!”… मुजफ्फरपुर की नवगठित नगर पंचायतों में चूल्हा बुझाने की साजिश!
मुजफ्फरपुर में गैस सिलेंडर पर ‘भू-राजनीतिक’ संकट का अजीब बहाना! बंद कमरे से जारी हुआ जनता की जेब काटने का फरमान
मुजफ्फरपुर। बिहार सरकार के गजट नोटिफिकेशन को ठेंगे पर रखकर ऑयल मार्केटिंग कंपनियां जनता की जेब और सब्र का कड़ा इम्तिहान ले रही हैं। ताजा मामला मुजफ्फरपुर के नवगठित नगर पंचायत मुरौल से सामने आया है, जिसे लेकर वार्ड पार्षद आनंद कंद साह ने कलेक्ट्रेट के सामने तल्ख तेवर दिखाते हुए अनशन तक कर दिया। हालांकि, जिला आपूर्ति पदाधिकारी (DSO) के आश्वासन के बाद अनशन भले स्थगित हो गया हो, लेकिन इस पूरे मामले ने पेट्रोलियम कंपनियों और स्थानीय अधिकारियों की संवेदनहीनता की पोल खोल कर रख दी है।

वसूली शहरी, सुविधा ग्रामीण: जनता के साथ भद्दा मजाक
बिहार सरकार की आधिकारिक अधिसूचना के मुताबिक, मुरौल को ग्रामीण से प्रोन्नत कर शहरी क्षेत्र (नगर पंचायत) घोषित किया जा चुका है। इस घोषणा के बाद से यहां के निवासियों से बिजली विभाग DS-2 (शहरी दर) के हिसाब से बिल वसूल रहा है, जमीन की रजिस्ट्री में भारी-भरकम सर्किल रेट (न्यूनतम मूल्य रजिस्टर) MVR वसूला जा रहा है और होल्डिंग टैक्स की मार भी शहरी स्तर की है।यह स्थिति बिहार के अन्य नवगठित नगर पंचायतों की भी है।
लेकिन जब बात रसोई गैस (LPG) सप्लाई की आती है, तो हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) इसे ‘ग्रामीण’ इलाका बताकर पल्ला झाड़ लेता है। कंपनी के नए तुगलकी फरमान के मुताबिक, शहरी उपभोक्ताओं को 25 दिन के अंतराल पर अगली रिफिल बुकिंग की सुविधा मिलेगी, जबकि ग्रामीण उपभोक्ताओं को एक सिलेंडर के बाद अगली बुकिंग के लिए पूरे 45 दिन का लंबा इंतजार करना होगा। मुरौल नगर पंचायत के लोग पूछ रहे हैं कि जब टैक्स और बिल शहरी लिया जा रहा है, तो गैस के लिए उन्हें 45 दिनों के ग्रामीण कोटे के नरक में क्यों धकेला जा रहा है?

‘भू-राजनीतिक‘ स्थिति का अनोखा रोना, बंद की शिकायत!
जब इस मनमानी के खिलाफ वार्ड पार्षद आनंद कंद साह ने आधिकारिक पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई (शिकायत संख्या: MPANG/E/2026/0025532), तो HPCL के मुजफ्फरपुर क्षेत्रीय कार्यालय ने जो जवाब दिया, उसे सुनकर किसी का भी सिर चकरा जाए। मुख्य क्षेत्रीय प्रबंधक महेंद्र सिंह यादव द्वारा जारी पत्र में इस देरी के पीछे “वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति” (Geopolitical Situation) को जिम्मेदार ठहराया गया है! स्थानीय लोगों का कहना है कि रूस-यूक्रेन या मिडिल-ईस्ट के तनाव का बहाना बनाकर मुजफ्फरपुर की जनता का चूल्हा बुझाने की यह अजीब साज़िश है। इसी रटे-रटाए तर्क के आधार पर कंपनी ने उपभोक्ता की शिकायत को जबरन ‘क्लोज’ (बंद) भी कर दिया।
ऑडियो टेप से खुलासा: “नोटिफिकेशन से कुछ नहीं होता!”
इस पूरे मामले पर जब न्यूज़ भारत टीवी के पत्रकार कुमार ‘पंकज’ ने HPCL के मुख्य क्षेत्रीय प्रबंधक महेंद्र सिंह यादव से फोन पर सीधा सवाल किया, तो अधिकारी का गैर-जिम्मेदाराना रवैया साफ उजागर हो गया।
जब पत्रकार ने पूछा कि बिहार सरकार के गजट के अनुसार मुरौल शहरी क्षेत्र है, तो उन्हें 25 दिन पर सिलेंडर क्यों नहीं मिल रहा? इस पर अधिकारी ने तल्ख लहजे में कहा, “अधिसूचना से कुछ नहीं होता है। एजेंसी जिस टाइम अलॉट होती है, वो रूरल है कि अर्बन है, इसके हिसाब से रहता है।” जब पत्रकार ने प्रतिवाद किया कि बाकी सारे सरकारी विभाग इस अधिसूचना को मान रहे हैं, तो अधिकारी ने अपनी जिम्मेदारी पेट्रोलियम मिनिस्ट्री पर डालते हुए कहा, “आप पेट्रोलियम मिनिस्ट्री से सारा कन्फर्मेशन ले सकते हैं, वहीं से गाइडलाइंस आता है। आप मेल आईडी निकालिए और मेल कर दीजिए।”

इंडेन और भारत पेट्रोलियम ने भी साधी चुप्पी, सिंडिकेट बनाकर जनता को लूटने का खेल: हैरानी की बात तो यह है कि इस दोहरी नीति और मनमानी के खेल में सिर्फ हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) ही शामिल नहीं है, बल्कि रसोई गैस बाजार की अन्य दिग्गज सरकारी कंपनियां इंडेन (IOCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) भी इसी रटे-रटाए बहाने की आड़ में अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही हैं। जब स्थानीय स्तर पर उपभोक्ताओं और जन प्रतिनिधियों ने अन्य कंपनियों से संपर्क साधा, तो वहां भी वही ढाक के तीन पात वाला रवैया देखने को मिला। ऐसा लगता है कि इन तीनों बड़ी तेल कंपनियों ने आपसी सिंडिकेट बनाकर मुजफ्फरपुर की नवगठित नगर पंचायतों के उपभोक्ताओं को प्रताड़ित करने का मन बना लिया है। कानूनन शहरी क्षेत्र घोषित होने के बावजूद इंडेन और भारत गैस के अधिकारी भी ‘ग्रामीण कोटे की एजेंसी’ का राग अलाप रहे हैं, जिससे साफ होता है कि कॉरपोरेट मुनाफे के आगे इन कंपनियों के लिए बिहार सरकार के गजट नोटिफिकेशन और जनता की सहूलियत की कोई बिसात नहीं है।

जनता का सवाल: इस दोहरी मार का जिम्मेदार कौन?
कंपनियों का तर्क है कि गैस एजेंसी ग्रामीण कोटे से खुली थी, इसलिए नियम नहीं बदलेंगे। मगर सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी नियमों और सीमाओं के बदलने के बाद तेल कंपनियां खुद को देश के कानून से ऊपर समझती हैं? यदि जल्द ही मुरौल और सकरा जैसी नवगठित नगर पंचायतों को शहरी एलपीजी रिफिल चक्र (25 दिन) का लाभ नहीं मिला, तो यह शांत दिख रहा अनशन आने वाले दिनों में पेट्रोलियम कंपनियों के खिलाफ एक बड़े जन-आंदोलन का रूप अख्तियार कर सकता है।
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