Monday, April 13, 2026

खेती-किसानी: उत्तर बिहार के किसान हो जाएं सावधान! 21-22 मार्च को बारिश और ओलावृष्टि की चेतावनी, अपनी फसलों को बचाने के लिए अपनाएं ये उपाय

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पूसा, समस्तीपुर: डॉ० राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा द्वारा उत्तर बिहार के किसानों के लिए विशेष मौसम आधारित कृषि बुलेटिन जारी किया गया है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, 21-25 मार्च की अवधि के दौरान आसमान में हल्के बादल छाए रह सकते हैं और 21-22 मार्च के आसपास हल्की वर्षा, आकाशीय बिजली और कुछ क्षेत्रों में ओलावृष्टि की प्रबल संभावना है। इस दौरान अधिकतम तापमान 34 से 36 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने का अनुमान है।

🌾 फसलों की सिंचाई और कटाई पर विशेष सलाह

  • सिंचाई प्रबंधन: 21-22 मार्च के आसपास बारिश की संभावना को देखते हुए खड़ी फसलों की सिंचाई फिलहाल रोक दें।
  • गरमा सब्जियां: भिंडी, नेनुआ, करेला, लौकी (कद्दू) और खीरा की फसलों में 22 मार्च तक सिंचाई स्थगित रखें। यदि वर्षा न हो, तभी आगे सिंचाई का निर्णय लें।
  • रबी मक्का और गेहूं: रबी मक्का और देर से बोए गए गेहूं में दाना बनने से लेकर दूध भरने की अवस्था तक नमी बनाए रखना जरूरी है। हालांकि, सिंचाई तभी करें जब हवा शांत हो।
  • सावधानीपूर्वक कटाई: तैयार हो चुकी फसलों की कटाई मौसम की स्थिति को ध्यान में रखकर सावधानी से करें।

🥔 ओल (जिमीकंद) और गरमा मूंग-उड़द की बुआई

  • ओल की वैज्ञानिक खेती: ओल की रोपाई के लिए ‘गजेन्द्र’ किस्म का चयन करें। रोपाई हेतु कम से कम 0.5 किलोग्राम वजन वाले कंद का उपयोग करें और कंदों को 75×75 सेमी की दूरी पर लगाएं। प्रति हेक्टेयर 80 क्विंटल बीज दर रखें।
  • मूंग और उड़द: गरमा मूंग और उड़द की बुआई को प्राथमिकता दें। बुआई से पहले प्रति हेक्टेयर 20 किग्रा नत्रजन, 45 किग्रा स्फूर, 20 किग्रा पोटाश और 20 किग्रा गंधक का प्रयोग करें।
  • बीज उपचार: बुआई से दो दिन पहले बीजों को कार्बेन्डाजिम (2.5 ग्राम प्रति किग्रा) से उपचारित करें और बुआई के ठीक पहले राइजोबियम कल्चर का प्रयोग करें। बुआई 30×10 सेमी की दूरी पर करें।

🐛 कीटों का हमला और बचाव के तरीके

  • थ्रिप्स कीट: बढ़ते तापमान में थ्रिप्स पत्तियों का रस चूसकर उन्हें सफेद दागयुक्त बना देते हैं। इसके नियंत्रण हेतु प्रोफेनोफॉस या इमिडाक्लोप्रिड का 10-15 दिन के अंतराल पर दवाओं को बदल-बदल कर छिड़काव करें।
  • लाल भृंग कीट: नेनुआ, करेला, लौकी और खीरा जैसी बेल वाली सब्जियों में यह कीट जड़ों और पत्तियों को नुकसान पहुंचाता है। बचाव के लिए सुबह गोबर की राख में थोड़ा केरोसिन मिलाकर छिड़कें। अधिक प्रकोप होने पर क्लोरपाइरीफॉस धूल मिट्टी में मिलाएं और पत्तियों पर डाइक्लोवॉस का छिड़काव करें।
  • बैंगन की सुरक्षा: फल और तना छेदक कीट दिखने पर प्रभावित हिस्सों को तोड़कर नष्ट करें और साफ मौसम में स्पिनोसैड या क्विनालफॉस का छिड़काव करें।

🥭 आम के बागान और पशुपालन

  • आम की देखभाल: आम के पेड़ों में अभी मंजर आ रहे हैं। मंजर से लेकर मटर के दाने जितने फल बनने तक किसी भी रासायनिक दवा का प्रयोग न करें। खराब या विकृत मंजरों को तोड़कर बगीचे से बाहर जला दें या मिट्टी में दबा दें।
  • पशु स्वास्थ्य: दूध देने वाले पशुओं को गर्मी से बचाने के लिए दिन में छायादार और सुरक्षित स्थान पर रखें तथा उन्हें पर्याप्त स्वच्छ पानी पिलाएं।

उत्तर बिहार में मौसम का मिजाज बदला: 21-22 मार्च को बारिश, वज्रपात और ओलावृष्टि की चेतावनी

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समस्तीपुर (पूसा): डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के जलवायु परिवर्तन पर उच्च अध्ययन केन्द्र ने उत्तर बिहार के जिलों के लिए आगामी पांच दिनों का विशेष मौसम पूर्वानुमान और कृषि परामर्श जारी किया है । ग्रामीण कृषि मौसम सेवा द्वारा जारी इस बुलेटिन के अनुसार, आने वाले 48 घंटों में क्षेत्र के मौसम में बड़े बदलाव की संभावना है ।

गर्मी के साथ आएगी आंधी-बारिश

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, 21 और 22 मार्च को उत्तर बिहार के आसमान में हल्के बादल छाए रह सकते हैं, जिसके प्रभाव से हल्की वर्षा होने का अनुमान है । इस दौरान प्रकृति का रौद्र रूप भी देखने को मिल सकता है, क्योंकि कई स्थानों पर आकाशीय बिजली (वज्रपात) चमकने, तेज हवाएं चलने और कुछ क्षेत्रों में ओलावृष्टि होने की भी आशंका जताई गई है । शेष दिनों में मौसम मुख्यतः शुष्क रहेगा ।

तापमान में उछाल और पछिया हवा का जोर

आगामी दिनों में गर्मी का असर बढ़ेगा। अधिकतम तापमान 34 से 36 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 20 से 22 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने की उम्मीद है । इसके साथ ही 9 से 12 किमी प्रति घंटा की औसत रफ्तार से मुख्य रूप से पछिया हवा चलने की संभावना है । सुबह के समय आर्द्रता 55-65% और दोपहर में 30-35% तक रह सकती है ।

किसानों के लिए जरूरी सलाह: क्या करें और क्या न करें

विश्वविद्यालय के नोडल पदाधिकारी डॉ. ए. सत्तार ने मौसम के उतार-चढ़ाव को देखते हुए किसानों को सतर्क रहने को कहा है:

  • सिंचाई पर रोक: संभावित वर्षा को देखते हुए भिंडी, नेनुआ, करेला, लौकी और खीरा जैसी गरमा सब्जियों में 21-22 मार्च तक सिंचाई न करें । बारिश न होने की स्थिति में ही पानी दें ।
  • गेहूं और मक्का: रबी मक्का और देर से बोए गए गेहूं में दाना बनने और दूध भरने की अवस्था है, इसलिए पर्याप्त नमी रखें, लेकिन सिंचाई तभी करें जब हवा शांत हो ।
  • कीट नियंत्रण: बढ़ते तापमान में थ्रिप्स कीट का प्रकोप बढ़ सकता है, जो पत्तियों को सफेद और टेढ़ा कर देते हैं । इसके बचाव हेतु प्रोफेनोफॉस (1 मि.ली./लीटर) या इमिडाक्लोप्रिड (1 मि.ली./4 लीटर पानी) का छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल पर बदल-बदल कर करें ।
  • आम के बाग: मंजर से लेकर मटर के दाने के बराबर फल बनने तक किसी भी रासायनिक दवा का प्रयोग न करें । विकृत मंजरों को तोड़कर नष्ट कर दें ।
  • नई बुआई: किसान गरमा मूंग और उड़द की बुआई को प्राथमिकता दें । बुआई से पहले बीज को कार्बेन्डाजिम और राइजोबियम कल्चर से उपचारित अवश्य करें ।

पशुओं का रखें खास ख्याल

बढ़ती गर्मी और लू जैसी स्थितियों से बचाने के लिए दुधारू पशुओं को दिन के समय छायादार और सुरक्षित स्थानों पर रखने की सलाह दी गई है । साथ ही उन्हें पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ और ताजा पानी पिलाएं ताकि वे लू की चपेट में न आएं ।

‘उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार’: 22 से गूंजेगी बिहार दिवस की धूम, पटना में सजेगी सुरों की महफिल

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पटना | मुख्य संवाददाता बिहार एक बार फिर अपने गौरवशाली इतिहास और विकास के संकल्प को दोहराने के लिए तैयार है। आगामी 22 से 24 मार्च तक ‘बिहार दिवस 2026’ का आयोजन पूरे हर्षोल्लास के साथ किया जा रहा है। इस वर्ष समारोह की थीम उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार रखी गई है। पटना का गांधी मैदान, श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल और रवींद्र भवन इस भव्य उत्सव के मुख्य केंद्र होंगे, जहाँ बॉलीवुड के दिग्गज गायकों से लेकर शास्त्रीय संगीत के उस्ताद अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे।

पटना के जिलाधिकारी एवं वरीय पुलिस अधीक्षक की संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग

सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आकर्षण: शान, सोना और पपोन बिखेरेंगे जलवा

तीन दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में देश के सुप्रसिद्ध कलाकार शिरकत कर रहे हैं:

  • 22 मार्च: मुख्य मंच (गांधी मैदान) पर बॉलीवुड की बेबाक गायिका सोना महापात्रा अपनी आवाज का जादू बिखेरेंगी। इसी दिन एसकेएम हॉल में मल्लिक ब्रदर्स और पंडित जगत नारायण पाठक द्वारा ध्रुपद गायन की प्रस्तुति होगी। रवींद्र भवन में भिखारी ठाकुर की कालजयी रचना गबरघिचोर का मंचन होगा।
  • 23 मार्च: पार्श्व गायक शान गांधी मैदान के मुख्य मंच पर अपनी सुरीली आवाज से पटनाइट्स को झूमने पर मजबूर करेंगे। वहीं, रवींद्र भवन में सुरेंद्र शर्मा एवं टीम द्वारा ‘हास्य कवि सम्मेलन’ का आयोजन किया जाएगा।
  • 24 मार्च: समापन संध्या पर मशहूर गायक पपोन गांधी मैदान में सुरों की महफिल सजाएंगे।

शिक्षा, पर्यटन और व्यंजन का संगम

गांधी मैदान में प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक सांस्कृतिक पवेलियन में स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुति और नुक्कड़ नाटक होंगे। शिक्षा पवेलियन में स्कूली बच्चों द्वारा शैक्षणिक प्रदर्शन, पुस्तक मेला और व्यंजन मेला मुख्य आकर्षण होंगे। पर्यटन विभाग बिहार की समृद्ध विरासत का प्रदर्शन करेगा, जबकि विभिन्न विभागों के स्टालों के जरिए राज्य की प्रगति की झलक दिखेगी।


सुरक्षा के कड़े इंतजाम: चप्पे-चप्पे पर रहेगी नजर

जिला प्रशासन ने समारोह की सफलता और सुरक्षा के लिए कमर कस ली है। जिलाधिकारी और वरीय पुलिस अधीक्षक ने संयुक्त ब्रीफिंग कर शांति व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।

  • तैनाती: गांधी मैदान और आसपास के क्षेत्रों में 56 स्थानों पर 94 दंडाधिकारियों और पुलिस पदाधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की गई है।
  • प्रवेश व्यवस्था: * वाहन के साथ: गेट नंबर 5, 7 और 10 से प्रवेश।
    • पैदल आगंतुक: गेट नंबर 1, 2, 3, 4 और 13 को छोड़कर सभी खुले द्वारों से प्रवेश कर सकते हैं।
    • मीडिया: प्रेस प्रतिनिधियों का प्रवेश गेट नंबर 12 से सुनिश्चित किया गया है।
  • हेल्पलाइन: किसी भी सहायता या सूचना के लिए जिला नियंत्रण कक्ष (0612-2219810/ 2219234) या डायल-112 पर 24 घंटे संपर्क किया जा सकता है।

शिक्षा विभाग एवं सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने सभी प्रदेशवासियों से इस उत्सव को सौहार्द और गौरव के साथ मिलकर मनाने की अपील की है।

सरकारी निविदाओं में धांधली रोकने को EOU की विशेष टीम गठित, ‘जन्नत भैया’ समेत कई बड़े जालसाज गिरफ्तार

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पटना | मुख्य संवाददाता आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने राज्य में सरकारी योजनाओं की निविदा (टेंडर) प्रक्रिया में होने वाली अनियमितताओं और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए कमर कस ली है। पुलिस मुख्यालय स्थित सरदार पटेल भवन में आयोजित प्रेस वार्ता में EOU के पुलिस अधीक्षक पंकज कुमार ने बताया कि निविदा आमंत्रण और निष्पादन में मिल रही गड़बड़ी की शिकायतों को देखते हुए 5 सदस्यीय विशेष टीम का गठन किया गया है। यह टीम प्राप्त सूचनाओं का सत्यापन कर दोषियों पर सीधी कार्रवाई करेगी।

सरदार पटेल भवन में आयोजित प्रेस वार्ता में EOU के पुलिस अधीक्षक पंकज कुमार

यूट्यूब से प्रश्नपत्र लीक करने वाला जन्नत भैयागिरफ्तार

परीक्षा शाखा की उपलब्धियों का विवरण देते हुए एसपी ने बताया कि SCERT बिहार द्वारा आयोजित कक्षा 3 से 8 तक की परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक करने वाले मुख्य आरोपी सरफराज शाहिद उर्फ जन्नत भैया को गिरफ्तार कर लिया गया है। आरोपी ‘Point of Study’ नामक यूट्यूब चैनल चलाता था, जहाँ वह सदस्यों से UPI और QR कोड के माध्यम से पैसे लेकर परीक्षा से पहले हल किए गए प्रश्नपत्र उपलब्ध कराता था।

भ्रष्ट कार्यपालक अभियंता पर शिकंजा, मिली अकूत संपत्ति

आय से अधिक संपत्ति (DA) के मामले में NBPDCL के कार्यपालक अभियंता मनोज कुमार रजक के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। शुरुआती जांच में उनके पास आय से 62.66% अधिक संपत्ति पाई गई। छापेमारी के दौरान सात ठिकानों से जमीन के दस्तावेज, जेवरात और नकद बरामद हुए हैं। जांच में उनकी संपत्तियों के तार नेपाल से भी जुड़े होने के प्रमाण मिले हैं।

खनन सॉफ्टवेयर में सेंधमारी, सरकार को 350 करोड़ का चूना

EOU ने एक बड़े साइबर घोटाले का पर्दाफाश किया है। खनन विभाग में प्रतिनियुक्त NIC पदाधिकारियों की मिलीभगत से 17 जिलों के लाइसेंसधारियों ने सॉफ्टवेयर के ‘OTP ऑथेंटिकेशन’ को बाईपास कर अवैध खनन को अंजाम दिया। इससे राज्य सरकार को करीब 350 करोड़ रुपये के राजस्व की क्षति हुई है। इस संबंध में साइबर थाने में केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।

अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धियां:

  • PMLA के तहत कार्रवाई: EOU ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को दो मामले भेजे हैं, जिसमें लगभग 21 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त करने की अनुशंसा की गई है।
  • बैंक गबन: आवामी और वैशाली कोऑपरेटिव बैंक में 101 करोड़ रुपये के गबन मामले में संतोष कुमार (BSNL कर्मी) को गिरफ्तार किया गया है।
  • 12 साल बाद गिरफ्तारी: डाक विभाग और बैंक धोखाधड़ी के पुराने मामले में फरार सब-पोस्टमास्टर चंद्रशेखर सिंह को 12 साल बाद दबोचा गया।
  • GST चोरी: फर्जी ई-वे बिल के जरिए कोयला मंगाकर सरकार को 80 लाख का चूना लगाने वाले गिरोह के अंतिम आरोपी संतोष कुमार को सिवान से गिरफ्तार किया गया।

“EOU हर उस क्षेत्र पर नजर रख रही है जहाँ जनधन की लूट हो रही है। चाहे वह निविदाओं में सिंडिकेट हो या डिजिटल माध्यम से प्रश्नपत्रों का अवैध कारोबार, किसी को बख्शा नहीं जाएगा।” — पंकज कुमार, एसपी, EOU

नगरनौसा की प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी 12 हजार रुपये रिश्वत लेते गिरफ्तार

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छठ घाट निर्माण के भुगतान के बदले मांग रही थी कमीशन, पटना निगरानी टीम की कार्रवाई

नालंदा/पटना। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए बिहार निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की टीम ने शुक्रवार को बड़ी कार्रवाई की है। टीम ने नालंदा जिले के नगरनौसा प्रखंड की प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी  श्रीमती अनुष्का को उनके कार्यालय कक्ष से 12,000 रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया है।

कानून के शिकंजे में: नगरनौसा (नालंदा) की प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी (बी पी आर ओ ) श्रीमती अनुष्का (लाल घेरे में ) को 12,000 रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार करने के बाद ले जाती पटना निगरानी ब्यूरो की टीम।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार, नगरनौसा थाना क्षेत्र के खपुरा निवासी अजय कुमार ने निगरानी ब्यूरो में शिकायत दर्ज कराई थी। अजय कुमार ने बताया कि छठ घाट निर्माण के लिए जो सामग्रियां आपूर्ति की गई थीं, उनकी राशि के भुगतान के एवज में बीपीआरओ श्रीमती अनुष्का द्वारा रिश्वत की मांग की जा रही थी।

जाल बिछाकर हुई गिरफ्तारी

शिकायत मिलने के बाद निगरानी ब्यूरो ने मामले का सत्यापन कराया, जिसमें रिश्वत मांगे जाने की पुष्टि हुई। इसके बाद पुलिस उपाधीक्षक (डी एस पी ) पवन कुमार-II के नेतृत्व में एक विशेष धावादल (ट्रैप टीम) का गठन किया गया। शुक्रवार को जैसे ही श्रीमती अनुष्का ने अपने कार्यालय में परिवादी से 12 हजार रुपये लिए, पहले से मुस्तैद निगरानी की टीम ने उन्हें दबोच लिया।

निगरानी विभाग के आंकड़े

निगरानी ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 में भ्रष्टाचार के खिलाफ यह 34वीं प्राथमिकी है। इस वर्ष अब तक:

  • कुल ट्रैप केस: 29
  • गिरफ्तार अभियुक्त: 23
  • कुल बरामद रिश्वत राशि: 8,84,000 रुपये

आगे की कार्रवाई: गिरफ्तारी के बाद आरोपी अधिकारी को पूछताछ के लिए पटना लाया गया है। ब्यूरो ने बताया कि पूछताछ के बाद उन्हें पटना स्थित माननीय विशेष निगरानी न्यायालय में पेश किया जाएगा। मामले में आगे की जांच जारी है।

महाप्रबंधक छत्रसाल सिंह ने किया सिमरिया और लौकहा बाजार स्टेशन का निरीक्षण, कोसी ब्रिज की संरक्षा परखी

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हाजीपुर/बेगूसराय। पूर्व मध्य रेल के महाप्रबंधक (जी एम ) श्री छत्रसाल सिंह ने शुक्रवार को रेल नेटवर्क की मजबूती और यात्री सुविधाओं को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सघन निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने दिनकर ग्राम सिमरिया एवं लौकहा बाजार स्टेशनों पर उपलब्ध यात्री सुविधाओं, सुरक्षा और संरक्षा (सेफ्टी ) से जुड़े विविध पहलुओं का गहन जायजा लिया।

: कोसी ब्रिज पर विंडो ट्रेलिंग के जरिए रेल ट्रैक की संरक्षा परखते महाप्रबंधक।

कोसी ब्रिज का विंडो ट्रेलिंग निरीक्षण निरीक्षण की शुरुआत में महाप्रबंधक ने कोसी ब्रिज का ‘विंडो ट्रेलिंग’ निरीक्षण किया। चलती ट्रेन के पिछले हिस्से से ट्रैक, सिग्नलिंग और पुल की तकनीकी स्थिति को परखने की इस प्रक्रिया के जरिए उन्होंने रेल परिचालन की सुरक्षा सुनिश्चित की।

दिनकर ग्राम सिमरिया स्टेशन परिसर में अधिकारियों के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करते जीएम छत्रसाल सिंह।

स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं का जायजा महाप्रबंधक सबसे पहले दिनकर ग्राम सिमरिया स्टेशन पहुँचे, जहाँ उन्होंने बुकिंग कार्यालय और प्लेटफार्म क्षेत्र का निरीक्षण किया। उनके साथ सोनपुर मंडल के मंडल रेल प्रबंधक (डी आर एम )  अमित सरन एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित थे। इसके बाद उन्होंने लौकहा बाजार स्टेशन का दौरा किया, जहाँ उन्होंने स्टेशन के भविष्य के विकास कार्यों से संबंधित ब्लूप्रिंट और नक्शों का अवलोकन किया।

लौकहा बाजार स्टेशन पर नक्शे के जरिए विकास योजनाओं का जायजा लेते जीएम एवं अन्य रेल अधिकारी।

अधिकारियों को दिए कड़े निर्देश निरीक्षण के दौरान महाप्रबंधक ने स्पष्ट किया कि रेल यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा रेलवे की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि स्टेशनों पर साफ-सफाई, पेयजल और सुरक्षा मानकों में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने रेल संरक्षा से जुड़े तकनीकी सुधारों को समय सीमा के भीतर पूरा करने पर जोर दिया।


“सकरा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब: अयोध्या की साध्वी ने जब कहा- ‘पापी उतना पाप नहीं कर सकता, जितना राम नाम मिटा सकता है’!”

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सकरा (मुजफ्फरपुर): मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड स्थित बसंतपुर झिटकाही की पावन धरती पर गुरुवार को भक्ति का ऐसा सैलाब उमड़ा कि आस्था के सारे बांध टूट गए। अशोक विहार होटल के पीछे बने विशाल खेल मैदान में चैत्र नवरात्र के महापर्व पर जब कलश स्थापना के साथ दस दिवसीय भव्य मेले और ‘श्रीराम कथा’ का शंखनाद हुआ, तो पूरा इलाका ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

संध्या आरती के बाद जब अयोध्या धाम की सुप्रसिद्ध कथावाचिका सुश्री साधना शास्त्री व्यासपीठ पर विराजमान हुईं, तो उन्होंने कलयुग के पापों से मुक्ति का ऐसा अचूक मंत्र दिया कि पंडाल में मौजूद हजारों भक्त निशब्द रह गए। शास्त्री जी ने हुंकार भरते हुए कहा— “इंसान उतना पाप कर ही नहीं सकता, जितना उसे जड़ से मिटाने की क्षमता अकेले भगवान के नाम में है।” भजनों की मधुर तान और शास्त्री जी के तार्किक प्रवचनों ने पहले ही दिन श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो साक्षात अयोध्या की दिव्यता सकरा की इस धरती पर उतर आई हो।

अयोध्या की साधना शास्त्री ने बिखेरी राम नाम की महिमा

संध्या आरती के पश्चात अयोध्या धाम से पधारीं प्रख्यात कथावाचिका सुश्री साधना शास्त्री के द्वारा ‘श्रीराम कथा’ का श्रीगणेश हुआ। कथा के प्रारंभ में स्थानीय महिलाओं ने पारंपरिक रूप से कथावाचिका का तिलक लगाकर और पुष्प वर्षा कर अभिनंदन किया। कार्यक्रम की शुरुआत सुमधुर भजनों से हुई। ‘हरि बोल, मुकुंद बोल, गोपाल बोल, गोविंद बोल’ और ‘तू मृत्युलोक में आया, तूने राम नाम नहीं गाया’ जैसे भजनों पर पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे।

कलयुग में केवल नाम ही आधार: साधना शास्त्री

भक्तों को संबोधित करते हुए साधना शास्त्री ने कलयुग में भगवद नाम की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “कलयुग में भगवान का नाम ही सबसे बड़ा सहारा है। जो गति सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में सेवा से प्राप्त होती थी, वही परम गति कलयुग में केवल राम नाम संकीर्तन से सुलभ है।” उन्होंने तुलसीदास जी की चौपाई कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रभु का नाम, धाम, रूप और लीला चारों एक ही तत्व हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई पापी व्यक्ति उतना पाप कर ही नहीं सकता, जितना पाप नष्ट करने की क्षमता भगवान के अकेले नाम में है।

कथा श्रवण का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व

कथा के प्रथम दिन की महत्ता बताते हुए शास्त्री जी ने कहा कि पहले दिन की कथा नींव के समान होती है। जब तक हम किसी के महत्व को जानेंगे नहीं, तब तक उससे प्रेम (प्रतीति) नहीं होगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे ‘कल आएंगे’ की सोच छोड़कर पहले दिन से ही जुड़ें।

उन्होंने भगवान के निवास स्थान की चर्चा करते हुए वाल्मीकि रामायण का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा:

“जिस प्रकार समुद्र कभी नदियों से नहीं भरता, वैसे ही जिसके कान कथा सुनने से कभी न भरें, भगवान सीता और लक्ष्मण सहित उसके हृदय में सदैव निवास करते हैं।”

जीवन में वाणीऔर समझदारीका संगम जरूरी

रामचरितमानस के बालकाण्ड की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि बाबा तुलसीदास ने सबसे पहले माता सरस्वती और भगवान गणेश की वंदना की है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में ‘वाणी’ (सरस्वती) और ‘विवेक’ (गणेश) दोनों का होना अनिवार्य है। केवल मीठी आवाज होना काफी नहीं है, बल्कि क्या और कैसे बोलना है, इसका ज्ञान (विवेक) ही मनुष्य को सफल बनाता है।

श्रद्धा और विश्वास: अटूट संबंध

कथावाचिका ने एक प्रेरक दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि भगवान के प्रति केवल ‘श्रद्धा’ रखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन पर ‘अटूट भरोसा’ भी होना चाहिए। उन्होंने लोहे की जंजीर और घास-फूस की रस्सी से कुएं में लटकने वाले दो व्यक्तियों की कथा सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रद्धा से अधिक भक्त के भरोसे के वश में होते हैं। उन्होंने कहा कि पार्वती जी श्रद्धा हैं और शिव जी विश्वास हैं; जैसे पति के बिना पत्नी अधूरी है, वैसे ही श्रद्धा के बिना विश्वास और विश्वास के बिना श्रद्धा का कोई मूल्य नहीं है।

गुरु वंदना से हुआ माहौल भावुक

कथा के अंतिम चरण में गुरु की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि गुरु साक्षात परमेश्वर का रूप हैं जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने-अपने गुरुओं का स्मरण करने का आह्वान किया। अंत में ‘गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना’ भजन के साथ प्रथम दिन की कथा का विश्राम हुआ, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया।

भक्ति और शांति के संकल्प के साथ प्रथम दिन का विश्राम

कथा के प्रथम दिन का समापन आरती और सामूहिक वंदना के साथ हुआ, जहाँ श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे आने वाले नौ दिनों तक संयम और श्रद्धा के साथ प्रभु की भक्ति में लीन रहेंगे। अयोध्या से पधारीं सुश्री साधना शास्त्री की ओजस्वी वाणी ने न केवल सकरा के बसंतपुर झिटकाही को भक्तिमय कर दिया, बल्कि समाज में ‘विवेक और विश्वास’ की स्थापना का संदेश भी दिया।

अशोक विहार खेल मैदान में आयोजित यह दस दिवसीय महापर्व अब आने वाले दिनों में और भी भव्य रूप लेगा, जिसमें भगवान राम के जन्म से लेकर रावण वध तक की लीलाओं का सजीव वर्णन किया जाएगा। आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि 28 मार्च, शनिवार को विजयदशमी के पावन अवसर पर भव्य शोभायात्रा और देवी विसर्जन के साथ इस विशाल अनुष्ठान का विधिवत समापन होगा। तब तक, यहाँ का वातावरण ‘जय श्रीराम’ और ‘माँ दुर्गे’ के जयकारों से गूंजता रहेगा, जो क्षेत्र के लोगों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है।

“रील पर सनातनी, रीयल में पश्चिमी दासता? आज ‘Happy New Year’ नहीं, ‘नव संवत्सर’ के उद्घोष का दिन है!”

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केक काटने वाली मॉर्डनसंस्कृति बनाम कलश स्थापना की सनातन परंपरा के आत्म-चिंतन का समय

रिर्पोट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’

31 दिसंबर की आधी रात को कड़ाके की ठंड में, जब प्रकृति सुप्त अवस्था में हो और भारतीय जनमानस रजाई में दुबका हो, तब केक काटकर शोर-शराबे और आतिशबाजी के बीच नया सालमनाना वास्तव में हास्यास्पद और तार्किक रूप से औचित्यहीन है। यह पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने की वह अंधी दौड़ है, जहाँ हम यह भी नहीं सोचते कि जिस कैलेंडर को हम अपना रहे हैं, वह न तो ऋतु परिवर्तन से जुड़ा है, न ही खगोलीय रूप से सटीक है। विडंबना देखिए, अपनी उन हजारों साल पुरानी वैज्ञानिक परंपराओं को, जो वसंत के आगमन और नई फसलों के साथ जीवन के उत्सव का संदेश देती हैं, उन्हें दरकिनार कर हम एक प्रशासनिक तारीख पर झूमने को मॉर्डनमान बैठे हैं। यह हमारी मानसिक दासता का प्रतीक है, जहाँ हम अपनी गौरवशाली जड़ों को छोड़कर एक बेगाना जश्न मनाने में ही अपनी शान समझ रहे हैं।


कालचक्र की संधि और हमारी सांस्कृतिक पहचान

समय एक निरंतर बहती धारा है, लेकिन इस धारा को मापने के पैमाने संस्कृतियों के चरित्र को दर्शाते हैं। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक के मध्य में खड़े हैं, भारत एक वैचारिक संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक ओर ‘ग्लोबलाइजेशन’ की चकाचौंध है, जहाँ 31 दिसंबर की आधी रात को आतिशबाजी और नशे के शोर में डूबा समाज खुद को ‘आधुनिक’ घोषित करता है, वहीं दूसरी ओर भारत की वह प्राचीन, वैज्ञानिक और गौरवशाली कालगणना है जो आज 19 मार्च 2026 को विक्रम संवत 2083′ के रूप में अपना शंखनाद करने जा रही है।

यह खबर केवल एक तारीख के बदलने की सूचना नहीं है, बल्कि यह करोड़ों सनातनियों के लिए आत्म-चिंतन का एक विस्तृत दस्तावेज़ है। क्या हम केवल नारों में सनातनी हैं, या हम उस समय चक्र को भी समझते हैं जिसे हमारे पूर्वजों ने ब्रह्मांड की धड़कन से जोड़कर बनाया था?


भारत का नया साल 19 मार्च , 14 अप्रैल या 01 जनवरी

भारत के ‘नए साल’ को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति रहती है, लेकिन इसके पीछे के वैज्ञानिक और सांस्कृतिक आधार को समझना आवश्यक है। 1 जनवरी को मनाया जाने वाला नववर्ष पूरी तरह से पश्चिमी ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ पर आधारित है, जो मात्र एक वैश्विक तारीख है।

इसके विपरीत, 19 मार्च 2026 को आने वाला ‘विक्रम संवत 2083’ सनातन संस्कृति का वास्तविक नव वर्ष है। यह सूर्य की स्थिति, चंद्रमा की कलाओं और वसंत ऋतु के आगमन के वैज्ञानिक मिलन पर आधारित है, जिसे ‘सृष्टि का जन्मदिन’ भी माना जाता है। वहीं, यदि हम भारत सरकार के आधिकारिक ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ की बात करें, तो वह ‘शक संवत’ पर आधारित है, जिसका नया साल सौर गणना के अनुसार प्रतिवर्ष 22 मार्च (लीप वर्ष में 21 मार्च) को निश्चित होता है, जबकि इस वर्ष 2026 में यह 14 अप्रैल को नियत है । अतः, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से नया साल 19 मार्च को है, जबकि प्रशासनिक और आधिकारिक दृष्टिकोण से यह 22 मार्च को आता है। 22 मार्च को ‘शक संवत 1948’ का प्रारंभ होता है, जिसे भारत सरकार ने 1957 में आधिकारिक मान्यता दी थी।

भारतीय विविधता में 1 जनवरी का उत्सव जहाँ एक वैश्विक तारीख है, वहीं मार्च में आने वाले संवत हमारे गौरवशाली इतिहास, प्रकृति और वैज्ञानिक चेतना के प्रतीक हैं।


मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ शिक्षाविद् और धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्तहिन्‍दी विभागाघ्‍यक्ष डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह ने भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिकता और ऐतिहासिकता पर गहरा प्रकाश डाला है। उन्होंने काल-गणना के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट करते हुए इसे भारतीय दर्शन का आधार बताया।

भारतीय नववर्ष पर डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह का वक्तव्य:

कलि और विक्रम संवत की प्राचीनता पर:

“जब हम सनातनी मान्यताओं की बात करते हैं, तो ‘कलि संवत’ (श्री कृष्ण संवत) को नजरअंदाज करना असंभव है। वर्तमान में हम इसके 5127वें वर्ष में हैं, जो भारतीय कालगणना की प्राचीनता का उद्घोष करता है। वहीं, विक्रम संवत की ऐतिहासिकता पर विद्वानों के मतभेद रहे हैं, लेकिन अधिकतर विद्वान इसे सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा 380 ईस्वी में शकों पर विजय के उपलक्ष्य में ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि और ईसा पूर्व 57 वर्ष की गणना से जोड़कर देखते हैं।”

शकाब्द की वैज्ञानिकता और राष्ट्रीय पहचान पर:

“तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शकाब्द को भारत का ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ घोषित किया था, क्योंकि यह पूर्णतः सौर और चंद्र गणनाओं पर आधारित वैज्ञानिक पद्धति है। सम्राट कनिष्क के समय में ही बौद्ध धर्म का संस्कृत में विस्तार हुआ था। इस वर्ष शकाब्द की गणना 14 अप्रैल से प्रभावी होगी, जो खगोलीय दृष्टि से अत्यंत सटीक है।”

वैदिक ऋषियों का गुणवत्तापूर्ण जीवनका संकल्प:

“प्राचीन काल में नववर्ष की शुरुआत शरद ऋतु से होती थी। वेदों में ऋषियों ने ‘पश्येम शरद: शतम’ के माध्यम से केवल लंबी आयु की नहीं, बल्कि ‘गुणवत्तापूर्ण जीवन’ की कामना की है। यह मंत्र बौद्धिक क्षमता (बुद्धेम), शारीरिक पुष्टि (पूषेम) और निरंतर प्रगति (रोहेम) के संतुलन की बात करता है। इसका संदेश है कि मनुष्य सौ वर्षों तक किसी पर बोझ बने बिना समाज में अपना योगदान देता रहे।”

चैत्र का प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक महत्व:

“कालांतर में हमने शरद के स्थान पर ‘चैत्र’ को नववर्ष के लिए चुना, क्योंकि यह जड़ता से चेतनता की ओर बढ़ने का संदेश देता है। चैत्र में प्रकृति में नए पल्लव आने लगते हैं और मनुष्य शिशिर की शीतलता त्यागकर वसंत की ऊर्जा में प्रवेश करता है। भले ही वैश्विक स्तर पर हम 1 जनवरी को नववर्ष मनाते हों, लेकिन भारत की वास्तविक पहचान इन्हीं प्राचीन संवतों और वैदिक मंत्रों में निहित है।”


शक संवत बनाम विक्रम संवत : शक संवत के अनुसार, जिसे भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर भी कहा जाता है, नया साल प्रतिवर्ष 22 मार्च को आता है। लीप वर्ष (Leap Year) होने पर यह 21 मार्च को शुरू होता है। जब कि इस वर्ष मिथिला पंचांग के अनुसार 14 अप्रैल को शक संवत प्रारम्‍भ होगा ।  

ध्यान देने योग्य बात: अक्सर लोग विक्रम संवत और शक संवत के नए साल को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। जहाँ विक्रम संवत (धार्मिक पंचांग) के अनुसार नया साल ‘चैत्र शुक्ल प्रतिपदा’ (चंद्र तिथि) को बदलता है (जो 2026 में 19 मार्च को है), वहीं शक संवत (राष्ट्रीय कैलेंडर) की तिथि सौर गणना पर आधारित होने के कारण लगभग हर साल 22 मार्च को ही स्थिर रहती है।

“इस वर्ष शकाब्द की गणना 14 अप्रैल से प्रभावी होगी, जो खगोलीय दृष्टि से अत्यंत सटीक है।”- डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह (धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्त हिन्‍दी विभागाघ्‍यक्ष )


2026 का शंखनाद: 19 मार्च को उगेगा विक्रम संवत 2083′ का सूर्य

जब दुनिया एक जनवरी को कड़ाके की ठंड और सुप्त प्रकृति के बीच नया साल मनाकर थक चुकी होती है, तब भारतीय उपमहाद्वीप में चैत्र की शुक्ल प्रतिपदा एक नई ऊर्जा लेकर आती है। 19 मार्च 2026 की सुबह जब सूर्य की पहली किरण धरती को छुएगी, वह केवल एक कैलेंडर का पन्ना नहीं बदलेगी, बल्कि वह उस ‘संवत्सर’ की शुरुआत करेगी जो मानव सभ्यता के सबसे शुद्ध और वैज्ञानिक पंचांगों में से एक है।

भारतीय परंपरा में इसे ‘नव संवत्सर’ कहा जाता है। संवत्सर का अर्थ है—वह कालखंड जिसमें सभी ऋतुएं पूर्णता के साथ निवास करती हैं। 19 मार्च का दिन केवल धार्मिक अनुष्ठान का दिन नहीं है, बल्कि यह उस गौरव की पुनर्वापसी है, जिसे मैकाले की शिक्षा पद्धति और पाश्चात्य दासता ने हमारी स्मृतियों से धुंधला करने का प्रयास किया था।

प्रकृति का श्रृंगार: जब ब्रह्मांड उत्सव मनाता है

विज्ञान कहता है कि ऊर्जा का क्षय नहीं होता, वह रूपांतरित होती है। जनवरी की पहली तारीख को उत्तर भारत और हिमालयी क्षेत्रों में प्रकृति बर्फ की चादर ओढ़े सो रही होती है। पेड़ों पर पत्ते नहीं होते, पक्षी मौन होते हैं और जनजीवन ठिठुरा हुआ होता है। ऐसे में ‘नया साल’ मनाना तर्कहीन प्रतीत होता है।

इसके विपरीत, मार्च का मध्य (चैत्र मास) वह समय है जब प्रकृति स्वयं दुल्हन की तरह सजती है:

  • ऋतुराज वसंत का आगमन: न अधिक ठंड, न अधिक गर्मी। वातावरण में एक मादक सुगंध होती है।
  • नव-पल्लव: पेड़ों पर पुरानी पत्तियों के स्थान पर कोमल लाल-हरी कोंपलें आती हैं।
  • आम की मंजरी: हवा में आम के बौर की खुशबू घुल जाती है, जो प्रजनन और नए जीवन का प्रतीक है।
  • सुनहरी फसल: खेतों में गेहूं की बालियां सोने की तरह चमकने लगती हैं। किसान अपनी मेहनत का फल कटाई के लिए तैयार देखता है।

जब प्रकृति स्वयं ‘न्यू बिगिनिंग’ का संकेत दे रही हो, तब भारतीय मनीषा का नया साल मनाना ही सबसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।


चैत्र नवरात्रि और नव संवत्सर का अटूट संबंध: सृष्टि का जन्मदिन

विक्रम संवत का प्रारंभ चैत्र नवरात्रि के पहले दिन से होता है। यह संयोग अद्भुत और रहस्यों से भरा है। हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर ‘ब्रह्म पुराण’ के अनुसार, इसी प्रतिपदा तिथि को भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया था और समय की गणना शुरू की थी। इसीलिए इसे सृष्टि का जन्मदिन कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

समय और शक्ति का संतुलन

19 मार्च 2026 को जब हम नव संवत्सर का स्वागत करेंगे, उसी दिन ‘कलश स्थापना’ या ‘घटस्थापना’ होगी। यह संदेश देता है कि समय (काल) और शक्ति (दुर्गा) एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना शक्ति के समय का पहिया नहीं घूम सकता और बिना समय के शक्ति की अभिव्यक्ति संभव नहीं है। नौ दिनों का यह अनुष्ठान हमें शारीरिक शुद्धि (उपवास), मानसिक शुद्धि (मंत्र) और आध्यात्मिक शुद्धि (ध्यान) की ओर ले जाता है। क्या केक काटने और शोर मचाने वाली संस्कृति में ऐसा कोई भी दर्शन मौजूद है?


विक्रम संवत का गौरवशाली इतिहास: शौर्य और स्वाभिमान की गाथा

विक्रम संवत का इतिहास केवल अंकों की गणना नहीं, बल्कि भारत की तलवार की धार और उसके स्वाभिमान की कहानी है।

विदेशी दासता से मुक्ति का पर्व

आज से लगभग 2082 वर्ष पूर्व (57 ईसा पूर्व), भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था और विदेशी आक्रांता ‘शक’ भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे थे। वे क्रूर थे और भारतीय संस्कृति को नष्ट कर रहे थे। उस अंधकारमय युग में मालवा (उज्जैन) की भूमि से एक महानायक का उदय हुआ—सम्राट विक्रमादित्य

उन्होंने बिखरी हुई भारतीय शक्तियों को एकजुट किया और शकों के विरुद्ध महायुद्ध छेड़ा। उन्होंने न केवल शकों को पराजित किया, बल्कि उन्हें भारत की सीमाओं से बहुत दूर खदेड़ दिया। इस ऐतिहासिक विजय की स्मृति में, भारत को विदेशी दासता से मुक्त कराने के उपलक्ष्य में, उन्होंने ‘विक्रम संवत’ का प्रवर्तन किया।

प्रजावत्सल राजा की उदारता

इतिहासकारों के अनुसार, विक्रमादित्य ने नया संवत शुरू करने से पहले अपनी पूरी प्रजा को ‘ऋणमुक्त’ कर दिया था। प्रजा को पूरी तरह से ऋणमुक्त करके एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पेश की। यह एक ऐसे राजा की कहानी है जिसने अपने विजय उत्सव को जनता के आर्थिक बोझ को कम करके मनाया। इसीलिए विक्रम संवत हमारे लिए स्वाभिमान, स्वतंत्रता और जनकल्याण का प्रतीक है।

एक ‘चक्रवर्ती’ सम्राट के रूप में विक्रमादित्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बिखरते हुए भारत को एक राजनीतिक और सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया। इतिहास में उन्हें ‘शकारि’ (शकों का शत्रु) कहा गया, लेकिन वास्तव में वे भारतीय संस्कृति के उस सुरक्षा कवच के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने विदेशी विचारधाराओं और आक्रमणों के सामने भारतीय मूल्यों की रक्षा की। आज भी विक्रमादित्य का नाम लेते ही एक ऐसे गौरवशाली भारत का चित्र उभरता है जहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का सुंदर समन्वय था। उनका व्यक्तित्व यह सिद्ध करता है कि एक महान शासक वही है जो शस्त्र और शास्त्र, दोनों में निपुण हो।


विज्ञान का सर्वोच्च शिखर: विक्रम संवत की खगोलीय शुद्धता

पाश्चात्य ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ जिसे हम आज उपयोग करते हैं, वह खगोलीय रूप से त्रुटिपूर्ण है। उसमें समय को संतुलित करने के लिए हर चार साल में ‘लीप ईयर’ का सहारा लेना पड़ता है। इसके बावजूद, वह कैलेंडर चंद्रमा की गति और ऋतुओं के बदलाव के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता।

लुनी-सोलर (चंद्र-सौर) पद्धति

विक्रम संवत एक लुनी-सोलर पंचांग है। हमारे ऋषियों ने नक्षत्रों की गति, सूर्य के उत्तरायण-दक्षिणायन और चंद्रमा की 16 कलाओं का ऐसा सटीक गणित बिठाया कि:

  1. इसमें तिथियों का क्षय और वृद्धि खगोलीय गणना पर आधारित होती है।
  2. ग्रहण की भविष्यवाणी हजारों साल पहले की जा सकती है और वह एक सेकंड की भी देरी नहीं करती।
  3. यह पंचांग सीधे तौर पर कृषि और मानव शरीर के विज्ञान (Ayurveda) से जुड़ा है।

आधुनिक विज्ञान और बिग बैंग

दिलचस्प बात यह है कि भारतीय ‘सृष्टि संवत’ (जो विक्रम संवत का ही आधार है) के अनुसार सृष्टि की आयु लगभग 1.97 अरब वर्ष बताई गई है। आधुनिक विज्ञान के ‘बिग बैंग’ और पृथ्वी की आयु की नवीनतम गणनाएं भी इसी के इर्द-गिर्द घूमती हैं। हमारे पूर्वजों ने बिना दूरबीन के वह जान लिया था, जिसे नासा आज खोजने का प्रयास कर रहा है।


सांस्कृतिक एकता का सूत्र: कश्मीर से कन्याकुमारी तक

अक्सर लोग कहते हैं कि भारत में हर जगह अलग-अलग त्योहार हैं। लेकिन विक्रम संवत वह धागा है जिसने पूरे भारत को मोतियों की तरह पिरो रखा है। भले ही भाषा और उत्सव के नाम बदल जाएं, लेकिन 19 मार्च 2026 को पूरा भारत एक ही दिन अपना नया साल मना रहा होगा:

  • महाराष्ट्र (गुड़ी पड़वा): घर के बाहर ‘गुड़ी’ (विजय पताका) फहराई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
  • कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना (उगादि): ‘युग-आदि’ यानी नए युग की शुरुआत। यहाँ नीम और गुड़ का प्रसाद (बेवु-बेला) दिया जाता है, जो जीवन के सुख-दुख के संतुलन को दर्शाता है।
  • कश्मीर (नवेह): कश्मीरी पंडितों के लिए यह सबसे पवित्र दिन है, जहाँ वे चावल के कटोरे में फल और फूल रखकर नववर्ष का दर्शन करते हैं।
  • सिंधी समाज (चेटीचंड): भगवान झूलेलाल के अवतरण दिवस और नववर्ष के रूप में भारी उत्साह।
  • पंजाब और उत्तर भारत: नवरात्रों के रूप में नौ दिनों तक शक्ति की साधना।

यह विविधता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है, जिसका केंद्र बिंदु विक्रम संवत ही है।


भारत के संविधान में विक्रम संवत की भूमिका: एक संवैधानिक सत्य

आज की पीढ़ी पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव में यह मान बैठी है कि विक्रम संवत केवल ‘पंडितों का पंचांग’ है। लेकिन यह एक ऐतिहासिक और कानूनी सत्य है कि भारत का संविधान, जो इस राष्ट्र की सर्वोच्च नियमावली है, वह भी विक्रम संवत को मान्यता देता है।

26 नवंबर 1949 को जब डॉ. अंबेडकर और अन्य महापुरुषों ने संविधान सभा में संविधान को अंगीकृत किया, तो उसकी मूल प्रस्तावना (Preamble) में लिखा गया:

“…In our Constituent Assembly this twenty-sixth day of November, 1949, do hereby Adopt, Enact and Give to ourselves this Constitution.”

लेकिन इसके हिंदी संस्करण में स्पष्ट उल्लेख है:

मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी ” को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।” यह दर्शाता है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने आधुनिक भारत की नींव रखते समय अपनी प्राचीन विरासत और काल गणना को सर्वोच्च सम्मान दिया था।

राष्ट्रीय पहचान: यद्यपि भारत सरकार ने 1957 में ‘शक संवत’ को राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में अपनाया, लेकिन विक्रम संवत आज भी भारतीय जनमानस के सामाजिक और धार्मिक जीवन का आधार बना हुआ है। राजपत्रों (Gazettes) और महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों में हिंदी तिथियों का उल्लेख इसी परंपरा का सम्मान है।

सांस्कृतिक संप्रभुता: संविधान की मूल प्रति पर बनी चित्रकारियां और उसमें निहित तिथियां यह प्रमाणित करती हैं कि भारत एक ‘संवैधानिक लोकतंत्र’ होने के साथ-साथ एक ‘प्राचीन सभ्यता’ भी है। विक्रम संवत का उल्लेख यह सुनिश्चित करता है कि आधुनिक भारत अपनी जड़ों से कटा हुआ नहीं है। यह दर्शाता है कि भारत के नीति-निर्धारक जानते थे कि एक देश तभी स्वतंत्र होता है जब वह अपनी कालगणना पर गर्व करता है। यदि हमारा संविधान इसे सम्मान देता है, तो हम अपनी आधुनिकता के नशे में इसे क्यों भूल रहे हैं?

शक संवत भारत का प्राचीन ऐतिहासिक कैलेंडर है, जिसकी शुरुआत कुषाण वंश के राजा कनिष्क ने 78 ईस्वी में की थी, जो उनकी राज्यारोहण तिथि मानी जाती है। यह कैलेंडर पूरी तरह से वैज्ञानिक और खगोलीय गणनाओं पर आधारित है, जिसमें सूर्य की स्थिति और नक्षत्रों का सटीक आकलन किया जाता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद, अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचान देने और एक वैज्ञानिक पंचांग को स्थापित करने के उद्देश्य से, भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 को शक संवत को आधिकारिक रूप से देश का राष्ट्रीय कैलेंडर घोषित किया। आज यह भारत सरकार के गजट, आकाशवाणी और दूरदर्शन के समाचारों में ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ प्रयुक्त होता है, जो हमारे गौरवशाली इतिहास और आधुनिकीकरण के बीच एक सेतु का कार्य करता है।

शक संवत और विक्रम संवत दोनों ही भारत की प्राचीन और वैज्ञानिक कालगणना प्रणालियाँ हैं, लेकिन इनके उद्भव, इतिहास और गणना के आधार में महत्वपूर्ण अंतर हैं।

मुख्य अंतर नीचे दी गई तालिका के माध्यम से समझे जा सकते हैं:

अंतर का आधारविक्रम संवत (Vikram Samvat)शक संवत (Shaka Samvat)
प्रवर्तक (शुरुआत)सम्राट विक्रमादित्य (उज्जैन)राजा कनिष्क (कुषाण वंश)
शुरुआत का वर्ष57 ईसा पूर्व (BCE)78 ईस्वी (CE)
ऐतिहासिक कारणशकों (विदेशी आक्रांताओं) पर विजय और प्रजा को ऋणमुक्त करने की स्मृति में।राजा कनिष्क के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में।
वर्तमान स्थितिमुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठानों, त्योहारों और व्यक्तिगत पंचांगों में उपयोग।भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर (22 मार्च 1957 से आधिकारिक मान्यता)।
गणना पद्धतिमुख्य रूप से ‘लुनी-सोलर’ (चंद्र-सौर) आधारित।सूर्य आधारित (Solar-based) पंचांग, जिसमें महीनों की निश्चित अवधि होती है।
वर्ष का अंतरविक्रम संवत, ग्रेगोरियन कैलेंडर से 57 वर्ष आगे है।शक संवत, ग्रेगोरियन कैलेंडर से 78 वर्ष पीछे है।

विक्रम संवत भारतीय शौर्य और विदेशी आक्रांताओं पर विजय का प्रतीक है, वहीं शक संवत भारतीय खगोलीय शुद्धता और सरकारी प्रशासनिक कालगणना का प्रतीक है।


भारत की बहुआयामी नववर्ष परंपराएँ: एक गुलदस्ता

भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर पंथ का सम्मान है। जहाँ सनातनी समाज 19 मार्च को नववर्ष मनाएगा, वहीं देश के अन्य समुदाय भी अपनी गौरवशाली परंपराओं को संजोए हुए हैं:

  • जैन धर्म: दीपावली के अगले दिन ‘वीर निर्वाण संवत’ के साथ नया साल शुरू होता है।
  • सिख धर्म: ‘नानकशाही कैलेंडर’ के अनुसार चेत महीने (मार्च) में होले-मोहल्ले के साथ नए साल का उल्लास होता है।
  • बौद्ध धर्म: वैशाख पूर्णिमा के समय बुद्ध संवत के अनुसार गणना होती है।
  • इस्लाम: हिजरी संवत के अनुसार मुहर्रम की पहली तारीख को नया साल माना जाता है।

समस्या इन परंपराओं से नहीं है। समस्या उस बाजारवादी नववर्ष से है, जिसमें कोई दर्शन नहीं है, केवल उपभोग और प्रदर्शन है।


युवाओं से अपील: जागने का समय

यहाँ एक कड़वा सवाल पूछना आवश्यक है। हम अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर जयकारे लगाते हैं, हम अपनी ‘रील’ और ‘प्रोफाइल’ पर सनातनी होने का गर्व करते हैं, लेकिन जब 31 दिसंबर आता है, तो हम क्लबों और होटलों की भीड़ में शामिल होकर पश्चिमी धुनों पर क्यों नाचते हैं?

यह मानसिक दासता नहीं तो क्या है?

एक जनवरी को:

  1. न कोई नक्षत्र बदलता है।
  2. न कोई ऋतु बदलती है।
  3. न कोई फसल घर आती है।
  4. न ही कोई ऐतिहासिक विजय जुड़ी है।

यह केवल ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था की देन है। जबकि 19 मार्च को प्रकृति स्वयं हमारे साथ उत्सव मनाएगी। आज के युवा को कूलदिखने की होड़ में अपनी जड़ों को नहीं काटना चाहिए।

युवा शक्ति का कर्तब्‍य

आधुनिकता का अर्थ पाश्चात्य संस्कृति की नकल करना नहीं है। आधुनिकता का अर्थ है—अपने ज्ञान को विज्ञान की कसौटी पर परखना। विक्रम संवत विज्ञान की उस कसौटी पर 100% खरा उतरता है।19 मार्च 2026 को जब नव संवत्सर 2083′ का उदय हो, तो: अपने मित्रों को ‘Happy New Year’ के बजाय नव संवत्सर की शुभकामनाएं कहें।अपने घर के मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों का वंदनवार लगाएं।घर के आंगन में रंगोली बनाएं और छतों पर केसरिया ध्वज फहराएं।नीम की पत्तियां और मिश्री का प्रसाद लें (जो स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है)।


इतिहास और भूगोल का संबंध

कहा जाता है कि जो समाज अपना इतिहास भूल जाता है, भूगोल उसे मिटा देता है।” हमारी कालगणना हमारी पहचान है। सम्राट विक्रमादित्य का शौर्य, आर्यभट्ट और वराहमिहिर का विज्ञान, और हमारे ऋषियों का अध्यात्म—सब इस ‘विक्रम संवत’ में समाहित है।

यह कालगणना (विक्रम संवत) को अपनाना सांस्कृतिक दासता से मुक्ति और आत्म-सम्मान की पुनर्स्थापना के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह केवल एक कैलेंडर का मामला नहीं, बल्कि हमारी पहचान, गौरवशाली इतिहास और पूर्वजों के वैज्ञानिक ज्ञान से जुड़ने का माध्यम है। जब हम अपनी परंपराओं को छोड़कर पाश्चात्य कैलेंडर का अंधानुकरण करते हैं, तो धीरे-धीरे हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं। विक्रम संवत हमें सम्राट विक्रमादित्य के शौर्य की याद दिलाता है और प्रकृति के चक्र के साथ तालमेल बिठाकर जीने की वैज्ञानिक पद्धति सिखाता है। अपनी संस्कृति के संवाहक बनकर ही हम आने वाली पीढ़ियों को उनकी असली विरासत सौंप सकते हैं।

आज 19 मार्च 2026 से प्रारम्‍भ होने वाला नया साल केवल एक कैलेंडर का बदलाव नहीं, बल्कि हमारे गौरव की पुनर्स्थापना का अवसर है। आइए, 31 दिसंबर की अंधी दौड़ से बाहर निकलें और 19 मार्च के सनातन सूर्य का स्वागत करें।

“वसंत की खुशबू,आम की मंजरी,प्रकृति का नव-श्रृंगार है।मनाओ उत्सव उस कालगणना का,जो सृष्टि का आधार है।”

न नक्षत्र बदले, न बदली ऋतु, न प्रकृति का कोई विधान हुआ, तुम झूम रहे उस तारीख पर, जिसका न खगोलीय ज्ञान हुआ। उठो सनातनी! चैत्र की उस पावन बेला को पहचानो, जहाँ कण-कण का श्रृंगार हुआ, और नव-संवत्सर का गान हुआ।”

दिखावे की उस चमक-धमक में, अपनी जड़ें न काट देना, केक की मीठी परतों में, अपनी विरासत न बांट देना। कलश धरा हो देहरी पर, और मंत्रों का उद्घोष रहे, आधुनिक बनो पर भीतर, गौरवशाली सनातनी होश रहे।”

आम की महकती मंजरियाँ, और खेतों में स्वर्ण-सी बाली है, यह 19 मार्च की भोर विक्रम‘, गौरव की नई लाली है। ब्रह्मांड की धड़कन से जुड़ी, ऋषियों की यह कालगणना, सृष्टि का हर परमाणु कहता—’शुभ हो नव-संवत्सर मनाना‘!”

“गंडक और गंगा की पावन माटी से, फिर एक हुंकार उठे, बिहार के हर घर-आंगन में, संवत्सर का सत्कार उठे। छोड़ो पाश्चात्य की गुलामी, अपनी पहचान पर नाज करो, विक्रम संवत दो हजार तिरासी (2083) का, आज भव्य आगाज करो।”

(नव संवत्सर 2083 की हार्दिक शुभकामनाएं!)

मुशहरी CHC का सिविल सर्जन ने किया औचक निरीक्षण, स्वास्थ्य सुविधाओं का लिया जायजा

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मुशहरी (मुजफ्फरपुर): स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत जानने और मरीजों को मिल रही सुविधाओं का मूल्यांकन करने के उद्देश्य से आज मुशहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) का औचक निरीक्षण किया गया। यह निरीक्षण सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार एवं जिला कार्यक्रम प्रबंधक (DPM) रेहान अशरफ द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

AES वार्ड की तैयारियों पर विशेष नजर

गर्मियों के मौसम और AES (चमकी बुखार) की संवेदनशीलता को देखते हुए अधिकारियों ने विशेष रूप से AES वार्ड का गहन मुआयना किया। उन्होंने वार्ड में उपलब्ध दवाइयों, बेडों की संख्या और आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए तैनात किए गए चिकित्सा कर्मियों की उपस्थिति की जांच की। सिविल सर्जन ने निर्देश दिया कि इस बीमारी को लेकर किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का मूल्यांकन

निरीक्षण के दौरान टीम ने मुख्य रूप से इन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया:

  • लेबर रूम: प्रसव पूर्व और प्रसव पश्चात दी जाने वाली सुविधाओं और स्वच्छता की जांच की गई।
  • ओपीडी (OPD) सेवाएं: डॉक्टरों की उपस्थिति और मरीजों के पंजीकरण से लेकर इलाज तक की प्रक्रिया का जायजा लिया गया।
  • संसाधनों की उपलब्धता: अस्पताल में आवश्यक जीवन रक्षक दवाओं और उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार ने अस्पताल प्रबंधन को निर्देश देते हुए कहा कि मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करना विभाग की प्राथमिकता है। उन्होंने ड्यूटी से गायब रहने वाले कर्मियों पर सख्त रुख अपनाने और परिसर में सफाई व्यवस्था दुरुस्त रखने की बात कही।

मुजफ्फरपुर: जिले में रसोई गैस का पर्याप्त स्टॉक, घबराने की जरूरत नहीं; कालाबाजारी रोकने के लिए प्रशासन सख्त

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मुजफ्फरपुर | 18 मार्च, 2026 जिले में घरेलू और व्यावसायिक गैस की आपूर्ति को लेकर जिला प्रशासन ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। बुधवार को जिला सूचना एवं जन-संपर्क पदाधिकारी और जिला आपूर्ति पदाधिकारी ने संयुक्त रूप से प्रेस वार्ता कर बताया कि जिले में गैस का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और उपभोक्ताओं को पैनिक होने की आवश्यकता नहीं है।

गैस स्टॉक की वर्तमान स्थिति

प्रशासन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जिले की 91 गैस एजेंसियों के पास घरेलू गैस का मजबूत बैकअप है:

  • कुल भरा हुआ स्टॉक: 29,693 सिलेंडर वर्तमान में उपलब्ध हैं।
  • ट्रांजिट में स्टॉक: 15,912 सिलेंडर रास्ते में हैं जो जल्द ही पहुंच जाएंगे।
  • दैनिक खपत: जिले में औसत दैनिक बिक्री 20,355 सिलेंडर है।
  • कंपनियां: IOCL के पास सबसे अधिक 19,471, HPCL के पास 3,885 और BPCL के पास 6,337 भरे हुए सिलेंडर स्टॉक में हैं।

बुकिंग के लिए नए नियम लागू

गैस वितरण व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए प्रशासन ने बुकिंग के अंतराल में बदलाव किया है:

  1. शहरी क्षेत्र: उपभोक्ता पिछली डिलीवरी के 25 दिनों बाद ही नए सिलेंडर की बुकिंग कर सकेंगे।
  2. ग्रामीण क्षेत्र: ग्रामीण इलाकों के लिए यह सीमा 45 दिन निर्धारित की गई है।
  3. वार्षिक कोटा: एक वर्ष में अधिकतम 12 गैस सिलेंडर ही प्रदान किए जाएंगे।

होम डिलीवरी और ऑनलाइन सुविधा

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि गैस बुकिंग के 2 से 3 दिनों के भीतर सिलेंडर की होम डिलीवरी सुनिश्चित की जाएगी। उपभोक्ताओं को गैस एजेंसियों पर भीड़ लगाने की जरूरत नहीं है। ऑनलाइन बुकिंग के लिए निम्नलिखित नंबर जारी किए गए हैं:

  • इण्‍डेन (IOCL): WhatsApp (7588888824), Missed Call (8454955555)
  • एच पी  (HPCL): WhatsApp (9222201122), Missed Call (9493602222)
  • भारत गैस  (BPCL): WhatsApp (1800224344), Missed Call (7710955555)

कालाबाजारी पर रोक और सुरक्षा व्यवस्था

विधि व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुजफ्फरपुर (पूर्वी एवं पश्चिमी) के अनुमंडल पदाधिकारियों द्वारा दंडाधिकारियों और पुलिस बल की नियुक्ति की गई है। विशेष रूप से मुशहरी प्रखंड के शेरपुर स्थित IOCL बॉटलिंग प्लांट पर तीन शिफ्टों में मजिस्ट्रेट तैनात रहेंगे ताकि आपूर्ति निर्बाध रूप से चलती रहे।

हेल्पलाइन नंबर: गैस आपूर्ति से संबंधित किसी भी शिकायत या समस्या के समाधान के लिए जिला नियंत्रण कक्ष का नंबर 0621-2212007 जारी किया गया है, जो 24×7 कार्यरत है।

अस्पतालों, स्कूलों और जीविका दीदी की रसोई जैसी आवश्यक सेवाओं को व्यावसायिक गैस की आपूर्ति में प्राथमिकता दी जा रही है। प्रशासन ने चेतावनी दी है कि गैस की जमाखोरी या कालाबाजारी करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।