Saturday, March 7, 2026
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रघुनाथपुर दोनमा: जहाँ मिट्टी के बुत बोलते हैं!

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एस. एस. कुमार पंकज

इतिहास अक्सर अपने पीछे निशान छोड़ जाता है—कभी पत्थरों की इबारत में, तो कभी मिट्टी के मूक अवशेषों में। लेकिन जब इतिहास पर आस्था की परतें चढ़ जाएं और साक्ष्यों के बीच जनश्रुतियों का द्वंद्व शुरू हो जाए, तो सच की तलाश बेहद रोमांचक हो जाती है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर, सकरा प्रखंड का एक छोटा सा गांव ‘रघुनाथपुर दोनमा’ आज एक ऐसे ही ऐतिहासिक और पुरातात्विक रहस्य का केंद्र बना हुआ है।

कदाने नदी के शांत तट पर स्थित एक विशाल मिट्टी का टीला (डीह), जो करीब तीन मीटर ऊँचा है, आज न केवल इतिहासकारों के लिए शोध का विषय है, बल्कि दो समुदायों की आस्था और एक अनसुलझे विवाद की गवाह भी है।

रघुनाथपुर दोनमा’ डीह का एक दृश्‍य

पुरातात्विक साक्ष्य: ईसा पूर्व 700 साल की पदचाप

रघुनाथपुर दोनमा का यह टीला कोई साधारण टीला नहीं है। काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तक कैटलॉग ऑफ आर्किलॉजिकल साइट्स इन बिहार‘ (खंड 2, पृष्ठ 238, क्रम संख्या 13) में इसे विधिवत दर्ज किया गया है। इस पुस्‍तक में इसे ‘रघुनाथपुर दोनमा उर्फ रघुबरपुर उर्फ मोहम्मदपुर’ के नाम से उल्लेखित किया गया है।

इतिहास की शब्दावली में इस स्थल का काल निर्धारण एनबीपी डब्लू (NBPW – Northern Black Polished Ware) काल के रूप में किया गया है। इतिहास के अध्‍यापक  डॉ. शांतनु सौरभ बताते हैं कि NBPW का अर्थ है ‘उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृदभांड’। यह काल भारतीय उपमहाद्वीप में ईसा पूर्व 700 से 200 ईसा पूर्व के बीच का माना जाता है।यानी जब मगध का उत्कर्ष हो रहा था, तब यहाँ के लोग उन्नत कोटि के चमकदार काले बर्तनों का उपयोग कर रहे थे। आज भी खेतों की जुताई में निकलने वाले घड़े के टुकड़े और प्राचीन चौकोर ईंटें इस समृद्ध काल की गवाही देते हैं।

यहाँ की मिट्टी आज भी ‘बोलती’ है। डीह के चप्पे-चप्पे पर काले और लाल मृदभांड (बर्तनों) के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। यहाँ मिलने वाले बर्तनों की चिकनाई और चमक आज भी वैसी ही है, जो उस दौर के उच्च स्तरीय हस्तशिल्प और अग्नि-प्रबंधन  को दर्शाती है।


आस्था का संगम और अदृश्य दीवारें

वर्तमान में इस पुरातात्विक स्थल की सूरत ऐतिहासिक कम और धार्मिक ज्यादा नजर आती है। टीले के सबसे ऊँचे शिखर पर बाबा अजगैबीनाथ पीर की मजार है। स्थानीय किंवदंती है कि वे फारस (ईरान) से आए एक सूफी संत थे, जो साधना के लिए यहीं रुक गए।

हैरत की बात यह है कि इसी मजार के ठीक बगल में एक रामनामी झंडा लहरा रहा है और मिट्टी का एक पिंड (ब्रह्म स्थान/देव स्थान) स्थापित है। मजार और हिंदू देव-स्थान के बीच कोई भौतिक दीवार नहीं है। मजार के सेवादार बताते हैं कि “यहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों पीढ़ियों से आते हैं। हिंदू दूध और चादर चढ़ाते हैं, तो मुसलमान फातिहा पढ़ते हैं।” मजार और देव स्थान की सीमा को लेकर दोनों समुदायों के अपने-अपने दावे हैं। जहाँ एक पक्ष इसे प्राचीन काल से कब्रिस्तान बताता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेष मानता है।

लेकिन यह शांति केवल सतह पर दिखती है। इस स्थल की मिल्कियत और प्रकृति को लेकर एक गहरी कानूनी जंग मुजफ्फरपुर सिविल कोर्ट में जारी है। साल 2002 से यहाँ वाद संख्या 144/2002 (मो. एकरामुल हक एवं अन्य बनाम बिहार सरकार एवं अन्य) विचाराधीन है। पिछले 24 वर्षों से चल रहे इस मुकदमे ने इस स्थल के पुरातात्विक विकास को एक तरह से फ्रीज कर दिया है। ग्रामीण बताते हैं कि साल 2002 में ही मजार के पास स्थित देव-स्थान को लेकर हुए विवाद के बाद मामला कोर्ट पहुँचा था। आज यह वाद संख्या ही वह चाबी है, जिससे इस प्राचीन डीह के भविष्य का फैसला होना है।


अलशान मियांऔर विध्वंस की दास्तां

खोजी पड़ताल के दौरान स्थानीय बुजुर्गों और ग्रामीणों के बयानों में एक नाम बार-बार उभरता है—शासक अलशान मियां। ग्रामीण धर्मचन्द राय, विश्वजीत सिंह और सुरेन्द्र राय का दावा है कि उनके पूर्वजों (दादा-परदादा) ने बताया था कि यहाँ एक भव्य मंदिर हुआ करता था।

वे बताते हैं कि करीब 12वीं शताब्दी के आसपास (प्रारंभिक मध्यकाल), उत्तर बिहार में इस्लाम के प्रवेश के समय यहाँ एक भीषण संघर्ष हुआ। कहा जाता है कि अलशान मियां के आक्रमण के दौरान मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। ग्रामीण मानते हैं कि उस युद्ध में जो लोग मारे गए, उन्हें इसी टीले पर दफना दिया गया, जिससे यह एक कब्रिस्तान में बदल गया। स्थानीय लोग आज भी उस दौर को ‘वर्ग संघर्ष’ के परिणाम के रूप में देखते हैं।

रघुनाथपुर दोनमा’ डीह से प्राप्‍त मृदभांड का एक दृश्‍य

बाजी घाट का काला पत्थर‘: मंदिर का आखिरी सबूत?

ग्रामीणों के इन दावों को एक ठोस आधार मिलता है पास के ही गौरी शंकर मंदिर से। बाजी घाट पुल के पास, कदाने नदी के दक्षिण तट पर स्थित इस मंदिर में काले पत्थर (Black Basalt) से बनी एक खंडित प्रतिमा का हिस्सा रखा हुआ है। यह वास्तव में एक मानव आकृति का बायां पैर है।

मान्यता है कि यह पैर उसी प्राचीन मंदिर की मूर्ति का हिस्सा है जिसे रघुनाथपुर दोनमा के डीह पर तोड़ा गया था। पीढ़ियों से लोग इस ‘पाषाण चरण’ की पूजा कर रहे हैं। इतिहासकारों के अनुसार, जिस काले पत्थर का उपयोग यहाँ दिखा है, वह पाल कालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) मूर्तिकला की विशेषता है। इसके अलावा, गौरी शंकर मंदिर का शिवलिंग भी अद्वितीय है, जिसमें लिंग के साथ शक्ति (सती) की आकृति उकेरी गई है, जो इस क्षेत्र में तंत्र और शैव मत के प्रभाव को दर्शाती है।

गौरी शंकर मंदिर बाजी में रखा हुआ चरण चिन्‍ह अंकित पाषाण टुकड़ा

भौगोलिक बनावट और प्राचीन इंजीनियरिंग

यह स्थल प्राचीन इंजीनियरिंग का भी एक नमूना है। करीब 1,57,500 वर्ग मीटर में फैला यह मुख्य डीह चारों तरफ से उपजाऊ खेतों से घिरा है। यहाँ काम करने वाले किसान पवन कुमार महतो बताते हैं कि खेतों की जुताई करते समय अक्सर जमीन के अंदर पक्की दीवारें टकराती हैं। प्राचीन समय में यहाँ जल आपूर्ति के लिए कदाने नदी के अलावा, उत्तर और पश्चिम दिशा में क्षारण (प्राकृतिक जल मार्ग) बना था, जो सुरक्षा और सिंचाई दोनों के काम आता था।

स्थानीय निवासी धर्मचन्द राय और दिवंगत मुकेश सिंह ने इस स्थल की ऐतिहासिकता को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया। उन्होंने यहाँ से मिलने वाले अवशेषों को व्यक्तिगत स्तर पर संग्रह कर सहेजने का सराहनीय कार्य किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों को पहचान सकें।


सरकारी उपेक्षा और मंडराता खतरा

रघुनाथपुर दोनमा की सबसे बड़ी त्रासदी इसकी उपेक्षा है। ‘कैटलॉग ऑफ आर्किलॉजिकल साइट्स’ में दर्ज होने के बावजूद, यहाँ पुरातत्व विभाग का कोई बोर्ड या सुरक्षा घेरा नहीं है।

  • नाम का भ्रम: कैटलॉग में इसे ‘रघुबरपुर उर्फ मोहम्मदपुर’ कहा गया है, जबकि ग्रामीण बताते हैं कि रघुबरपुर यहाँ से 5 किमी दूर ढोली स्टेशन के पास एक अलग स्थल है। यह दस्तावेजी त्रुटि सुधार की बाट जोह रही है।
  • अवैध गतिविधि: प्रशासन की अनुमति के बिना टीले की खुदाई करना या मिट्टी हटाना इसकी ऐतिहासिक परतों (Stratigraphy) को हमेशा के लिए नष्ट कर सकता है।

इतिहासकार चेतावनी देते हैं कि यदि यहाँ वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन (Excavation) किया जाए, तो यह स्थल एक बड़ा पर्यटन और शोध केंद्र बन सकता है।

स्‍थानीय ग्रामीण जिन्‍होने अपने विचार साझा किये

रघुनाथपुर दोनमा का डीह केवल मिट्टी का ढेर नहीं, बल्कि बिहार के उस गौरवशाली अतीत का हिस्सा है जिसने मौर्य काल से लेकर पाल काल और फिर सूफी संतों के आगमन तक के समय को देखा है। यहाँ की मजार, यहाँ का ब्रह्म स्थान और यहाँ के मृदभांड—ये सब मिलकर एक ऐसी कहानी बुनते हैं जो आस्था, विवाद और विज्ञान के बीच झूल रही है।

बड़ा सवाल: क्या सकरा के इतिहास को बचा पाएगा प्रशासन?

पुरातत्व विभाग की सूची में नाम होने के बावजूद, रघुनाथपुर दोनमा डीह पर न तो पूरी  बाउंड्री है और न ही अवैध खुदाई पर रोक। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यहाँ वैज्ञानिक उत्खनन (Excavation) हो, तो उत्तर बिहार के इतिहास की कई नई परतें खुल सकती हैं।

क्या प्रशासन इस अनमोल विरासत को ‘आस्था और विवाद’ की भेंट चढ़ने से बचाएगा, या मिट्टी के ये बुत हमेशा के लिए खामोश हो जाएंगे? अब गेंद प्रशासन और पुरातत्व विभाग के पाले में है। क्या हम इस 2700 साल पुराने पन्ने को इतिहास की किताब से फटने देंगे, या इसे सहेजकर दुनिया को दिखाएंगे? रघुनाथपुर के ‘बोलते बुत’ आज यही सवाल पूछ रहे हैं।


विशेष कवरेज के लिए देखें यह वीडियो: इस खबर से संबंधित विशेषज्ञों की राय, ग्रामीणों के दावे और पुरातात्विक साक्ष्यों को विस्तार से देखें

मुजफ्फरपुर के सकरा में मौजूद है दुनिया का दुर्लभ ‘गौरी-शंकर’ शिवलिंग; यहाँ पत्थर में उभरते हैं सती के स्वर्ण नेत्र

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रिपोर्ट : एस. एस. कुमार ‘पंकज’

मुजफ्फरपुर (बिहार) बिहार की पावन भूमि सदैव से ही आध्यात्मिकता, रहस्य और ऐतिहासिक गौरव का संगम रही है। वैशाली के लोकतंत्र से लेकर गया की ज्ञान-भूमि तक, इस प्रदेश का हर जिला अपने आंचल में इतिहास की अनमोल कड़ियाँ समेटे हुए है। इसी कड़ी में उत्तर बिहार का मुजफ्फरपुर जिला, जो अपनी मीठी लीची और बाबा गरीबनाथ की कृपा के लिए विश्वविख्यात है, अब एक ऐसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रहस्य के कारण चर्चा में है, जो न केवल धर्मशास्त्रियों बल्कि पुरातत्वविदों को भी अचंभित कर रहा है।

‘गौरी शंकर मंदिर’ बाजी घाट स्थित दुर्लभ शिवलिंग की तस्‍वीर

मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड के अंतर्गत बाजी घाट स्थित गौरी शंकर मंदिर आज एक वैश्विक पहेली बन चुका है। यहाँ एक ऐसा दुर्लभ शिवलिंग स्थापित है, जिसे दुनिया का एकमात्र दूसरा ऐसा शिवलिंग माना जाता है, जहाँ लिंग रूप में भगवान शिव के साथ माता सती (शक्ति) की मुखाकृति साक्षात विराजमान है। इस शिवलिंग की सबसे बड़ी खूबी इसकी वह कलाकारी है, जिसमें पत्थर के भीतर से माता सती के स्वर्ण जड़ित नेत्र भक्तों को निहारते प्रतीत होते हैं।


कदाने नदी का तट और अलौकिक अवस्थिति

सकरा प्रखंड के सबहा-बरियारपुर मार्ग पर चलते हुए जब आप कदाने नदी के समीप पहुँचते हैं, तो बाजी घाट पुल के ठीक बगल में एक प्राचीन मंदिर है। नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह गौरी शंकर मंदिर सदियों से स्थानीय जनजीवन की आस्था का केंद्र रहा है। लेकिन हालिया शोध और ऐतिहासिक तथ्यों के उजागर होने के बाद इसकी महत्ता कई गुना बढ़ गई है।

इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर और यहाँ का शिवलिंग भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। नदी का तट होने के कारण यह प्राचीन काल में व्यापार और संस्कृति का एक मुख्य मार्ग रहा होगा, जिसकी पुष्टि यहाँ बिखरे अवशेष करते हैं।


स्थापत्य कला का शिखर: पालकालीन शिवलिंग और स्वर्ण नेत्रों का रहस्य

बाजी घाट स्थित ‘गौरी शंकर मंदिर’ में शिवलिंग पर जलाभिषेक की तस्‍वीर

इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ का शिवलिंग है। विशेषज्ञों और पुरातत्वविदों के प्रारंभिक अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि यह शिवलिंग पालकालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) है। पाल साम्राज्य अपनी उत्कृष्ट पत्थर नक्काशी और धातु कला के लिए जाना जाता था।

कसौटी पत्थर की अजेय चमक: यह शिवलिंग काले कसौटी पत्थर से निर्मित है। आश्चर्य की बात यह है कि हजारों साल बीत जाने के बाद भी इसकी चमक वैसी ही बरकरार है, जैसी निर्माण के समय रही होगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि पत्थर की आभा ऐसी है मानो इस पर अभी-अभी पॉलिश की गई हो।

सती के स्वर्ण नेत्र: इस शिवलिंग के अग्रभाग पर माता सती की मुखाकृति अत्यंत बारीकी से उकेरी गई है। सबसे विस्मयकारी तथ्य यह है कि माता के नेत्रों को स्वर्ण परत (Gold Layer) से मढ़ा गया है। जब मंदिर के गर्भगृह में घी का दीपक जलता है, तो स्वर्ण नेत्रों से परावर्तित होने वाली रोशनी एक अलौकिक ऊर्जा का संचार करती है। यह शिल्प कला का वह दुर्लभ नमूना है जहाँ पाषाण और स्वर्ण का ऐसा अद्भुत संगम दिखता है।


लाा घेरे में खंडित प्रतिमा की तस्‍वीर जिसमें पैर का अंकण दिखाया गया है

मुगलकाल का वह रूई व्यापारीऔर चमत्कारिक पुनर्निर्माण

मंदिर का इतिहास जितना प्राचीन है, इसका पुनरुद्धार उतना ही रोमांचक है। मंदिर से जुड़े स्थानीय ग्रामीण सह आचार्य पंडित राम कुमार झा बताते हैं कि मंदिर का वर्तमान गर्भगृह लगभग साढ़े चार सौ साल पुराना है। इसका सीधा संबंध मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल से जुड़ता है।

कथा कुछ इस प्रकार है कि अकबर के समय में दिल्ली का एक खत्री व्यवसायी, जो रूई का बड़ा व्यापार करता था, बाजी घाट के रास्ते अपने माल के साथ गुजर रहा था। उस समय यह प्राचीन शिवलिंग एक खंडहर अवस्था में खुले आकाश के नीचे उपेक्षित पड़ा था।

थकान मिटाने के लिए जब वह व्यापारी बाजी घाट पर रुका और महादेव की वह दुर्दशा देखी, तो उसके मन में गहरी संवेदना जागी। उसने अनायास ही एक संकल्प लिया— हे महादेव, यदि इस बार मेरे रूई के व्यापार में अप्रत्याशित लाभ हुआ, तो मैं यहाँ आपका एक भव्य मंदिर बनवाऊँगा।”

ईश्वरीय कृपा ऐसी हुई कि अगले ही दिन उस व्यापारी का सारा माल आश्चर्यजनक रूप से ऊंचे दामों पर बिक गया। उसे इतना मुनाफा हुआ कि उसने अपनी प्रतिज्ञा को मान देते हुए, मात्र एक दिन के मुनाफे से इस मंदिर के गर्भगृह का भव्य पुनर्निर्माण करवाया। यह कथा आज भी सकरा की लोक-संस्कृति का अभिन्न अंग है।


इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना: खजूरिया ईंटें और भूकंप की गवाही

मंदिर की बनावट आज के आधुनिक इंजीनियरों के लिए भी शोध का विषय है। वर्तमान सरपंच डॉ. कामेश्वर झा बताते हैं कि मंदिर के गर्भगृह की दीवारें खजूरिया ईंटों (प्राचीन छोटी ईंटें) से निर्मित हैं।

  • दीवारों की मजबूती: मंदिर की दीवारों की मोटाई लगभग तीन फीट है।
  • ईंटों का माप: यहाँ प्रयुक्त ईंटों की लंबाई साढ़े अठारह सेंटीमीटर, चौड़ाई ग्यारह सेंटीमीटर और मोटाई चार सेंटीमीटर है।
  • भूकंप का परीक्षण: वर्ष 1934 में जब बिहार में महाविनाशकारी भूकंप आया था, जिसमें बड़े-बड़े शहर जमींदोज हो गए थे, उस समय भी इस मंदिर का मुख्य ढांचा और शिवलिंग अडिग रहा। हालांकि उत्तरी अहाते का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन मुख्य मंदिर को खरोंच तक नहीं आई।

100 साल पुराने कैडस्ट्रल सर्वे मैप में भी इसे बाजी बंजरिया गांव के एकमात्र मंदिर के रूप में दर्शाया गया है, जो इसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता को पुख्ता करता है।


अहाते में खंडित प्रतिमा: एक अनसुलझा राज

गौरी शंकर मंदिर के अहाते में काले पत्थर की एक खंडित प्रतिमा का हिस्सा रखा हुआ है, जो अपने आप में कई सवालों को जन्म देता है।

अहाते में खंडित प्रतिमा की तस्‍वीर जिसमें पैर का अंकण दिखाया गया है
  • प्रतिमा का केवल बायां पैर दिखाई पड़ता है, जिसमें बहुत ही सुंदर पायल अंकित है।
  • प्रतिमा के आकार को देखकर विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि यह मूल रूप से लगभग 5 फीट की विशाल प्रतिमा रही होगी।

स्थानीय निवासी अमरनाथ साह के अनुसार, यह प्रतिमा कैसे खंडित हुई, इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। लेकिन एक प्रबल मान्यता यह है कि यह प्रतिमा समीप के ही पुरातात्विक स्थल रघुनाथपुर दोनमा के किसी ध्वस्त मंदिर का हिस्सा है। रघुनाथपुर दोनमा को पहले ही नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर‘ (NBPW) संस्कृति के रूप में चिन्हित किया जा चुका है। यदि इस प्रतिमा के शेष हिस्सों की तलाश की जाए, तो इस क्षेत्र के प्राचीन वैभव का एक नया अध्याय खुल सकता है।


खेतों में बिखरा इतिहास: मृदभांड और शोध की आवश्यकता

मंदिर के आसपास के खेतों में आज भी इतिहास बिखरा पड़ा है। पूरब की ओर के खेतों में काले एवं लाल मृदभांड (Pottery) के टुकड़े अक्सर खुदाई या जुताई के दौरान मिलते रहते हैं। ये मृदभांड इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि यहाँ जमीन के नीचे कोई प्राचीन नगरी या सभ्यता दबी हुई है।

रघुनाथपुर दोनमा का पुरातात्विक स्थल यहाँ से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है। नदी के दोनों तटों पर फैली यह पुरातात्विक बेल्ट वैज्ञानिक उत्खनन की मांग कर रही है। यदि भारत सरकार और पुरातत्व विभाग यहाँ गहन शोध करे, तो यह स्थल वैशाली और नालंदा की तरह ही महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।


सकरा का यह गौरी शंकर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बिहार के इतिहास का वह खोया हुआ पन्ना है जिसे अभी तक पूरी तरह पढ़ा नहीं गया है। पालकालीन कला, अकबरकालीन निर्माण, और प्राचीन मृदभांडों का यह संगम दुर्लभ है। यहाँ का हर पत्थर, स्वर्ण जड़ित नेत्रों वाली माता सती की वह मुस्कान और कदाने नदी की लहरें—सब मिलकर एक ऐसी गाथा कहते हैं जो सदियों पुरानी है।

आज आवश्यकता है कि इस स्थान को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए और यहाँ की ऐतिहासिकता का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हो। यह मंदिर न केवल मुजफ्फरपुर का गौरव है, बल्कि यह संपूर्ण देश की सांस्कृतिक धरोहर है।

मुजफ्फरपुर के बाजी घाट पर स्थित यह गौरी-शंकरधाम पुकार रहा हैइतिहासकारों को, भक्तों को और उन शोधकर्ताओं को जो मिट्टी के नीचे दबे सच को बाहर लाने का साहस रखते हैं। यहाँ पत्थर बोलते हैं, और स्वर्ण नेत्र साक्षात देवत्व का आभास कराते हैं।

मुजफ्फरपुर सामूहिक हत्याकांड: FIR आवेदन से खुला सनसनीखेज सच, अपहरणकर्ताओं ने फोन पर दी थी ‘पूरे परिवार को खत्म करने’ की धमकी

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मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के अहियापुर थाना क्षेत्र में मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ बुढ़ी गंडक नदी किनारे एक महिला और उसके तीन मासूम बच्चों के शव दुपट्टे से बंधे हुए बरामद हुए हैं। इस मामले में मृतका के पति द्वारा पुलिस को दिए गए FIR आवेदन ने अपहरणकर्ताओं की खौफनाक साजिश और पुलिस की कथित सुस्ती पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

अहियापुर थाने को दिए गये प्राथमिकी की कॉपी दिखाते हंए मृतका के पति कृष्ण मोहन कुमार

नदी किनारे बंधे मिले चार शव

स्थानीय चंदवारा घाट पुल के नीचे नदी किनारे स्थानीय लोगों ने जब चार शव देखे, तो पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। मृतकों की पहचान 22 वर्षीय ममता कुमारी, उनके 6 वर्षीय पुत्र आदित्य, 4 वर्षीय पुत्र अंकुश और 2 वर्षीय पुत्री कृति के रूप में हुई है। चारों की नृशंस हत्या कर शवों को नदी में फेंक दिया गया था।

FIR आवेदन में खौफनाक कॉल का खुलासा

मृतका के पति कृष्ण मोहन कुमार द्वारा अहियापुर थाने में दिए गए आवेदन (कांड संख्या 79/26) के अनुसार:

  • लापता होने की सूचना: 10 जनवरी 2026 को सुबह 11:00 बजे ममता बच्चों के साथ मार्केटिंग के लिए निकली थी और वापस नहीं लौटी।
  • धमकी भरा कॉल: 12 जनवरी की सुबह करीब 3:00 बजे मोबाइल नंबरों 9905528XXX और 8969725XXX से कृष्ण मोहन को कॉल आया।
  • अपहरण की कबूली: फोन करने वालों ने स्वीकार किया कि उन्होंने ममता और बच्चों का अपहरण कर लिया है।
  • परिवार को खत्म करने की धमकी: अपराधियों ने साफ तौर पर कहा कि “अगर पुलिस को बताया तो तुम्हारे पूरे परिवार को जान से मारकर फेंक देंगे।”
चंदवारा घाट पुल के नीचे नदी किनारे मिले चार शवों की तस्‍वीर

पुलिस की भूमिका पर गंभीर आरोप

परिजनों का आरोप है कि 10 जनवरी को गुमशुदगी और 12 जनवरी को अपहरण व धमकी की लिखित जानकारी देने के बावजूद पुलिस ने समय रहते कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। परिजनों का मानना है कि यदि पुलिस उन मोबाइल नंबरों को तत्काल ट्रेस करती, तो आज ये चार जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।

पुलिस की लापरवाही पर भड़के लोग

परिजनों का आरोप है कि 10 जनवरी को गुमशुदगी और 12 जनवरी को धमकी भरे कॉल की जानकारी देने के बावजूद पुलिस ने समय पर ठोस कार्रवाई नहीं की। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पुलिस ने मोबाइल लोकेशन के आधार पर त्वरित कार्रवाई की होती, तो इन चार जिंदगियों को बचाया जा सकता था।

जांच और कार्रवाई

मुजफ्फरपुर के एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए एफएसएल (FSL) और सर्विलांस की टीमें जांच में जुटी हैं। केस के अनुसंधानकर्ता एसआई मिथुन कुमार को बनाया गया है। पुलिस का दावा है कि आरोपियों की पहचान की जा रही है और जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

ताजपुर: पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ भाकपा माले का हल्लाबोल, 24 जनवरी को बनेगी विशाल मानव श्रृंखला

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समस्तीपुर। ताजपुर के भेरोखरा निवासी मनीष पोद्दार और उनके परिवार पर हुई पुलिसिया बर्बरता का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। मनीष पोद्दार को ‘थर्ड डिग्री टॉर्चर’ देने और उनके परिजनों की पिटाई के आरोपी थानाध्यक्ष एवं आईओ (अनुसंधान अधिकारी) के निलंबन को भाकपा माले ने नाकाफी बताया है। माले ने अब दोषियों की बर्खास्तगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।

स्मार पत्र के साथ भाकपा माले के ताजपुर प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह

दोषियों को सस्पेंड नहीं, बर्खास्त करे सरकार: माले

भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने पुलिस अधीक्षक अरविंद कुमार सिंह द्वारा की गई निलंबन की कार्रवाई को ‘आधा-अधूरा’ कदम बताया है। उन्होंने कहा कि पुलिसिया जुल्म जिस स्तर का था, उसमें महज निलंबन न्याय नहीं है।

माले नेता ने आरोप लगाया कि भेरोखरा निवासी संजय पोद्दार के पुत्र मनीष पोद्दार के साथ अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी गईं। पुलिस ने न केवल मनीष के निजी अंगों में पेट्रोल डाला और बर्बरता की, बल्कि उसकी पत्नी को भी चार दिनों तक अवैध रूप से हाजत में बंद रखा। इस दौरान मनीष के पिता और पत्नी के साथ भी मारपीट की गई।

DM और SDM को सौंपा स्मार पत्र

बृहस्पतिवार को भाकपा माले के प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी रौशन कुशवाहा और अनुमंडलाधिकारी दीलीप कुमार से मुलाकात कर एक स्मार पत्र सौंपा। इसमें पुलिसिया दमन के साथ-साथ प्रखंड में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया है।

माले की प्रमुख मांगें:

  • दोषी पुलिस अधिकारियों और थानाध्यक्ष को तत्काल सेवा से बर्खास्त किया जाए।
  • सोशल मीडिया पर वायरल हुए ‘घूस लेते अंचल कर्मचारी’ के वीडियो की उच्च स्तरीय जांच हो।
  • सभी भूमिहीनों को वास भूमि और सरकारी जमीन पर बसे लोगों को बंदोबस्ती का पर्चा दिया जाए।
  • आवास योजना में जारी खुलेआम घूसखोरी पर तत्काल रोक लगे।
  • वंचित गांव-टोलों में संपर्क पथ (सड़क) का निर्माण सुनिश्चित हो।

24 जनवरी को न्याय आंदोलनका आह्वान

प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने घोषणा की कि इन मांगों के समर्थन में और पुलिसिया गुंडागर्दी के खिलाफ 24 जनवरी को ताजपुर के राजधानी चौक पर सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक विशाल मानव श्रृंखला बनाई जाएगी। उन्होंने ताजपुर की जनता से अपील की है कि वे इस ‘न्याय आंदोलन’ में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें ताकि शासन-प्रशासन को जगाया जा सके।

गया जी जैसा ही वैभव, पर गुमनाम है झारखंड का यह ‘विष्णुपद मंदिर’; शिव-विष्णु के मिलन की है अद्भुत गाथा

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देवघर (झारखंड) | विशेष रिपोर्ट : एस. एस. कुमार ‘पंकज’

भारत की सनातन परंपरा में भगवान विष्णु के पद चिह्नों का स्थान अत्यंत पावन माना गया है। जब भी विष्णुपद की चर्चा होती है, तो विश्व पटल पर बिहार के गया जी का नाम सबसे पहले आता है। गया जी के विष्णुपद मंदिर को ‘मोक्षदायी’ माना जाता है, जहाँ पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान और तर्पण किया जाता है। किंतु, बहुत कम लोग जानते हैं कि गया जी की ही तरह वैभवशाली और महिमामंडन से युक्त एक और विष्णुपद मंदिर झारखंड के देवघर जिले में स्थित है। इसे हरला जोरी विष्णुपद मंदिर कहा जाता है। जहाँ गया जी मोक्ष प्रदान करते हैं, वहीं हरला जोरी को ‘कामनादायी’ (मनोकामना पूर्ण करने वाला) माना जाता है।

देवघर स्थित हरला जोरी विष्णुपद मंदिर

आज यह मंदिर अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। शास्त्रों में उल्लेखित होने के बावजूद यह स्थान आज उपेक्षा और प्रशासनिक अनदेखी का शिकार है।


तीन विष्णुपद मंदिरों का रहस्य और तीसरे का लोप

धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दुनिया में तीन प्रमुख विष्णुपद मंदिरों की चर्चा मिलती है।

  1. प्रथम: बिहार का गया जी शहर, जहाँ विष्णुपद मंदिर की ख्याति वैश्विक है।
  2. द्वितीय: झारखंड के देवघर जिला स्थित हरला जोरी विष्णुपद मंदिर, जिसकी पौराणिक महत्ता अद्वितीय है।
  3. तृतीय: माना जाता है कि तीसरा विष्णुपद मंदिर बिहार के मधुबनी जिले में बलिराजगढ़ के आसपास था। यह स्थान राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा से गहराई से जुड़ा है। हालांकि, समय के थपेड़ों और संरक्षण के अभाव में इस तीसरे मंदिर का भौतिक अस्तित्व अब लगभग समाप्त हो चुका है।

यद्यपि वर्तमान में कंबोडिया के अंकोरवाट और महाराष्ट्र के पंढरपुर को भी विष्णु के पद चिह्नों वाले मंदिर के रूप में प्रचारित किया जाता है, परंतु शास्त्रों और ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल में हरला जोरी का स्थान सर्वोपरि आता है।


पौराणिक गाथा: रावण, महादेव और विष्णु की लीला

हरला जोरी विष्णुपद मंदिर का इतिहास सीधे तौर पर रामायण काल और भगवान शिव की अमर कथा से जुड़ा है। इसकी चर्चा शिव पुराण और पद्म पुराण के साथ-साथ लोक कथाओं में प्रमुखता से मिलती है।

कथा प्रसंग: लंकाधिपति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे वरदान मांगा कि वे शिवलिंग के रूप में उसके साथ लंका चलें। महादेव तैयार हुए, लेकिन एक शर्त रखी—रास्ते में यह लिंग जहाँ भी भूमि को स्पर्श करेगा, वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण शिवलिंग लेकर कैलाश से लंका की ओर चला।

यात्रा के दौरान जब वह ‘हरतकी वन’ (वर्तमान हरला जोरी) पहुँचा, तो उसे तीव्र लघुशंका का बोध हुआ। इसी समय भगवान विष्णु ने देवताओं के कल्याण के लिए एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और रावण के सामने प्रकट हुए। रावण ने उस ब्राह्मण (छद्म वेशी विष्णु) को शिवलिंग पकड़ा दिया और स्वयं निवृत्त होने चला गया। भगवान विष्णु ने उसी स्थान पर पृथ्वी पर कदम रखे और शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। यही वह स्थान है जहाँ हरि (विष्णु) और हर (महादेव) का मिलन हुआ। आगे चलकर इसी शिवलिंग को देवघर के हृद्या पीठ (बैद्यनाथ धाम) में स्थापित किया गया।


शब्दों का रहस्य: क्या है हरिलाजोरीका अर्थ?

‘हरिलाजोरी’ शब्द का विग्रह इसके आध्यात्मिक महत्व को स्पष्ट करता है। यह शब्द हरि + ईला + जोरी के संगम से बना है:

  • हरि: भगवान विष्णु
  • ईला: पृथ्वी (धरती)
  • जोरी: मिलन (युग्म)

अर्थात, वह स्थान जहाँ भगवान विष्णु का पृथ्वी से मिलन हुआ, वह ‘हरिला जोड़ी’ कहलाया। प्राचीन शास्त्रों में इसे हरतकी वन भी कहा गया है, क्योंकि यहाँ औषधीय गुणों वाले ‘हर्रे’ के वृक्षों की अत्यधिक बहुलता थी। हरि के द्वारा रावण से शिवलिंग प्राप्त करने की इस मायावी लीला के कारण इस क्षेत्र को हरिकेली और हरिद्रा पीठ के नाम से भी अभिहित किया गया है। गुप्त काल में यह क्षेत्र क्रिमला प्रदेश के अंतर्गत आता था।


पद्म पुराण में वर्णित महिमा

पद्म पुराण के पातालखण्ड में इस स्थान की भौगोलिकता और प्राचीनता का जीवंत वर्णन मिलता है। संस्कृत के श्लोक इसकी महत्ता की पुष्टि करते हैं:

इदं तु कामद लिंगम् सर्वलिंगम् फलप्रदम् हार्द्राख्‍यपीठ मध्‍ये तु रावणेश्‍वर मुक्‍तमम् बैद्यनाथ जगन्‍नाथं सर्वकामार्थ सिद्धये पूर्वसागर गामिन्‍यां गंगायां दक्षिणतटे हरीतकीवने दिव्‍ये: दु:संचारे भयावहे

भावार्थ: यह कामना लिंग सभी लिंगों में श्रेष्ठ और फलदायी है। हरिद्रा पीठ (देवघर क्षेत्र) के मध्य रावणेश्वर (बैद्यनाथ) विराजमान हैं। गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित दिव्य हरतकी वन में, जहाँ संचरण करना अत्यंत कठिन और डरावना था, वहाँ आज भी चंडी और महेश्वर (बैद्यनाथ) मौजूद हैं, जो चिन्तामणि रत्न की तरह भक्तों की समस्त इच्छाएं पूर्ण करते हैं।


तस्‍वीर में देवघर स्थित हरला जोरी विष्णुपद मंदिर में पद चिह्न

वर्तमान संकट: घिसते पद चिह्न और संरक्षण का अभाव

हरला जोरी भारत का वह दुर्लभ मंदिर है जहाँ शिला पर उत्कीर्ण भगवान विष्णु के चरण चिह्नों की पूजा की जाती है। परंतु, आज यह विरासत खतरे में है।

  • भौतिक क्षरण: सदियों से लाखों श्रद्धालुओं द्वारा पूजा और स्पर्श किए जाने के कारण शिला पर अंकित पद चिह्न काफी घिस चुके हैं। यदि इनका वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया, तो ये ऐतिहासिक निशान सदा के लिए मिट सकते हैं।
  • भू-विवाद की छाया: सबसे दुखद और चिंताजनक विषय मंदिर परिसर की जमीन का विवाद है। स्थानीय विद्वान पंडित काशीनाथ झा और अन्य जानकारों का आरोप है कि बंदोबस्ती के दौरान मंदिर की पैतृक जमीन को गलत तरीके से कुछ निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिया गया है।
  • साजिश का अंदेशा: सनातन की इस पावन देव भूमि को किसी गहरी साजिश के तहत हथियाने का प्रयास किया जा रहा है। स्वामित्व निजी और अक्षम हाथों में होने के कारण मंदिर का विकास पूरी तरह से बाधित है।

सरकार से न्याय की गुहार

तस्‍वीर में देवघर स्थित विष्णुपद मंदिर के आगे हरला जोरी शिव मंदिर का मुख्‍य द्वार

हरला जोरी के चारों ओर आज भी बड़े-बड़े झाड़ीनुमा वृक्ष मौजूद हैं, जो प्राचीन ‘हरतकी वन’ की उपस्थिति का एहसास कराते हैं। हालांकि आम लोगों को यहाँ दर्शन और पूजन में कोई कठिनाई नहीं होती, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का शून्य होना पर्यटकों और श्रद्धालुओं को खलता है।

स्थानीय निवासियों और धार्मिक संगठनों की मांग है कि झारखंड सरकार को इस मामले में तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। मंदिर परिसर की जमाबंदी की जांच होनी चाहिए और इस ‘कामनादायी’ तीर्थ को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराकर इसे एक भव्य धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए।


गया जी के बाद भारत का यह दूसरा विष्णुपद मंदिर हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक अनमोल मोती है। ‘हरि-हर’ के मिलन का साक्षी यह हरला जोरी मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि हमारे इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी है। इसकी रक्षा करना और इसे पुनर्जीवित करना न केवल प्रशासन का, बल्कि हर सनातन धर्मवलंबी का कर्तव्य है।

एम डी डी एम कॉलेज में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ पर सेमिनार: वक्ताओं ने कहा— राष्ट्र निर्माण के लिए युवाओं में एकाग्रता और धैर्य जरूरी

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मुजफ्फरपुर। महंत दर्शन दास महिला महाविद्यालय (MDDM) के दर्शनशास्त्र विभाग के तत्वावधान में मंगलवार को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के उपलक्ष्य में एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर शिक्षाविदों ने स्वामी विवेकानंद के आदर्शों पर चर्चा करते हुए राष्ट्र की प्रगति में युवाओं की भागीदारी को रेखांकित किया।

मंच पर मुख्य अतिथि  डॉ. निखिल रंजन प्रकाश के साथ महाविद्याल की प्रावार्या एवं अन्‍य

युवा ही प्रगति के आधार: प्रो. अलका जायसवाल

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. अलका जायसवाल ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति उसके युवाओं की ऊर्जा और सोच पर निर्भर करती है। उन्होंने युवाओं से देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

लक्ष्य प्राप्ति के लिए सक्रियता अनिवार्य

मुख्य अतिथि प्रो. निखिल रंजन प्रकाश ने अपने संबोधन में कहा, “आज के युवाओं को राष्ट्र और राष्ट्रीयता की अवधारणा को गहराई से समझने की आवश्यकता है। एक सशक्त राष्ट्र तभी निर्मित होगा जब युवा सक्रिय, एकाग्रचित्त और निरंतर प्रयत्नशील रहेंगे।”

वहीं, डॉ. राकेश रंजन ने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि सफलता का मूल मंत्र एकाग्रता है। उन्होंने कहा कि मार्ग कोई भी हो, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, अडिग रहना चाहिए। उन्होंने सर्वधर्म समभाव पर जोर देते हुए सभी धर्मों को सम्माननीय बताया।

स्वामी विवेकानंद के संदेशों पर चर्चा

कार्यक्रम की शुरुआत में दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्षा प्रो. किरण झा ने अतिथियों का स्वागत शॉल और स्मृति चिन्ह भेंट कर किया। विषय प्रवेश कराते हुए उन्होंने स्वामी विवेकानंद द्वारा युवाओं को दिए गए कालजयी संदेशों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

सेमिनार के उपरान्‍त ग्रुप तस्‍वीर में शिक्षक एवं शिक्षिकाओं के साथ उपस्‍थिति दर्ज कराती छात्रए

गरिमामय उपस्थिति

मंच का सफल संचालन डॉ. नेहा रानी ने किया। उन्होंने युवाओं को जीवन में धैर्य और परिश्रम के महत्व को समझाया। कार्यक्रम के समापन पर डॉ. सुरबाला वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

इस सेमिनार में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक एवं शिक्षिकाओं की सक्रिय सहभागिता रही, जिनमें मुख्य रूप से प्रो. सरोज, डॉ. आशा, डॉ. श्वेता यादव, डॉ. मैरी मरांडी, डॉ. सदफ, डॉ. शगुफ्ता नाज़, डॉ. प्रियम फ्रांसिस, डॉ. मधुसूदन, डॉ. सजीव और डॉ. रामदुलार सहित अन्य गणमान्य उपस्थित थे।

ताजपुर: भाकपा माले ने फूंका आंदोलन का बिगुल, सदस्यता अभियान में जुटे युवा

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समस्तीपुर (ताजपुर): 13 जनवरी, 2026 भाकपा माले को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से मंगलवार को प्रखंड के शाहपुर बघौनी में सदस्यता अभियान चलाया गया। इस अभियान के तहत पार्टी की नीतियों और संघर्षों से प्रभावित होकर 7 स्थानीय युवाओं ने माले की सदस्यता ग्रहण की।

पार्टी में शामिल होने वाले युवाओं में मुख्य रूप से मो० आले, बस्साम तौहीदी, राशिद हुसैन, मो० मोखलिस, शाहबाज तौहीदी, मीनाजुलहक और शाद तौहीदी शामिल हैं।

भ्रष्टाचार और दमन के खिलाफ होगा संघर्ष

शाहपुर बघौनी में माले की सदस्यता ग्रहण के दौरान शपथ लेते युवा

सदस्यता अभियान के उपरांत आयोजित बैठक को संबोधित करते हुए भाकपा माले प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि माले केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि आंदोलन की कोख से जन्मी पार्टी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शोषण, दमन, उत्पीड़न और लूट-भ्रष्टाचार के खिलाफ न्याय दिलाना ही पार्टी का मुख्य संकल्प है।

सचिव ने आगामी प्रखंड एवं जिला सम्मेलन की तैयारियों का जिक्र करते हुए कहा कि पार्टी को व्यापक जनाधार देने के लिए युवाओं को जोड़ा जा रहा है।

आवास योजना में घूसखोरी और प्रशासनिक लापरवाही पर निशाना

बैठक के दौरान प्रखंड सचिव ने स्थानीय प्रशासन और नगर परिषद में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार किया। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु रहे:

  • आवास योजना में धांधली: नगर परिषद और प्रखंड क्षेत्र में आवास योजना के नाम पर (स्थल निरीक्षण और फोटो खिंचवाने हेतु) बड़े पैमाने पर अवैध वसूली हो रही है।
  • दोषियों पर कार्रवाई की मांग: थर्ड डिग्री टॉर्चर के शिकार मनीष पोद्दार को न्याय दिलाने और घूसखोरी के आरोपी अंचल कर्मचारी रॉबिन ज्योति पर सख्त कार्रवाई की मांग की गई।
  • पारदर्शिता की मांग: आवास योजनाओं में बिचौलियों को खत्म कर शिविर के माध्यम से लाभुकों को सीधे राशि हस्तांतरित करने की मांग उठाई गई।

24 जनवरी को मुख्यमंत्री के समक्ष प्रदर्शन की तैयारी

भाकपा माले ने ऐलान किया कि इन ज्वलंत समस्याओं को लेकर आगामी 24 जनवरी को मुख्यमंत्री के कर्पूरीग्राम आगमन के दौरान जोरदार प्रदर्शन किया जाएगा। पार्टी ने ताजपुर वासियों से इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की है।

इस अवसर पर प्रखंड कमेटी सदस्य आसिफ होदा, मो० एजाज और नौशाद तौहीदी सहित कई अन्य कार्यकर्ता उपस्थित थे।

सेवा की मिसाल: विजन वैली हॉल में स्वास्थ्य शिविर और ग्रामीण चिकित्‍सको का सम्मेलन, मुफ्त जांच के साथ मरीजों को बांटी गई दवाएं

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सकरा (मुजफ्फरपुर)। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले ग्रामीण चिकित्सकों की दक्षता बढ़ाने और समाज के अंतिम व्यक्ति तक बेहतर इलाज पहुँचाने के उद्देश्य से मुजफ्फरपुर के सकरा में एक विशाल आयोजन संपन्न हुआ। सकरा वाजिद पंचायत के ‘विजन वैली हॉल’ में आयोजित इस ‘प्रखंड स्तरीय ग्रामीण चिकित्सक सम्मेलन’ ने न केवल चिकित्सा जगत की चुनौतियों पर विमर्श किया, बल्कि सेवा की एक अनूठी मिसाल भी पेश की।

‘प्रखंड स्तरीय ग्रामीण चिकित्सक सम्मेलन में शिरकत करते ग्रामीण चिकित्सक

कार्यक्रम का आगाज़ रॉयल हॉस्पिटल मल्टी स्पेशलिटी एंड ट्रामा सेंटर,कच्‍ची पक्‍की, मुजफ्फरपुर द्वारा आयोजित वृहद चिकित्सा जांच शिविर से हुआ। इस शिविर की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अस्पताल की एम्बुलेंस ने गांव-गांव जाकर उन निःशक्त, वृद्ध और लाचार मरीजों को उनके घर से हॉल तक पहुँचाया, जो चलने-फिरने में असमर्थ थे।

शिविर में करीब 300 से अधिक मरीजों का पंजीकरण हुआ। रॉयल हॉस्पिटल के वरीय चिकित्सक डॉ. विवेक कुमार के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम ने मरीजों का बीपी, ब्लड शुगर, थायराइड जैसी गंभीर बीमारियों की आधुनिक मशीनों से जांच की। जांच के उपरांत सभी मरीजों को संस्थान की ओर से निःशुल्क दवाएं भी वितरित की गईं, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिली।

रॉयल हॉस्पिटल मल्टी स्पेशलिटी एंड ट्रामा सेंटर के नर्सिंग स्‍टाफ के द्वारा जांच की तस्‍वीर

विशेषज्ञों का मंत्र: सीखने की कोई सीमा नहीं, सजगता ही समाधान

दोपहर के सत्र में ‘ग्रामीण चिकित्सक एसोसिएशन’ के बैनर तले सम्मेलन की शुरुआत हुई। इस सत्र की मेजबानी संयुक्त रूप से सकरा एक्यूप्रेशर सेंटर एवं रॉयल हॉस्पिटल ने की। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. विवेक कुमार ने ग्रामीण चिकित्सकों को आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों और आपातकालीन स्थिति में मरीज को दिए जाने वाले ‘फर्स्ट रिस्पांस’ के बारे में जानकारी दी।

सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए एसोसिएशन के प्रखंड अध्यक्ष डॉ. राजेश कुमार ने एक अत्यंत प्रेरणादायी संबोधन दिया। उन्होंने कहा, “एक चिकित्सक के लिए सीखने की कोई उम्र या सीमा नहीं होती। चिकित्सा क्षेत्र में हर दिन नए शोध हो रहे हैं, ऐसे में हमें खुद को अपडेट रखना होगा।” उन्होंने विशेष जोर देते हुए कहा कि ग्रामीण चिकित्सकों को पूरी सावधानी और सजगता के साथ मरीज के लक्षणों (Symptoms) का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि सही पहचान ही सही इलाज की पहली सीढ़ी है।

रॉयल हॉस्पिटल मल्टी स्पेशलिटी एंड ट्रामा सेंटर के द्वारा दवा वितरण की तस्‍वीर

टीम वर्क और सामूहिक सहभागिता

इस पूरे आयोजन को सफल बनाने में रॉयल हॉस्पिटल के डॉ. राजेश किरण और आशीष कुमार की अहम भूमिका रही। डॉ. राजेश किरण ने सत्र का कुशल संचालन करते हुए चिकित्सकों के सवालों का समाधान किया। अस्पताल की नर्सिंग और पैरामेडिकल टीम ने अपनी तत्परता से यह सुनिश्चित किया कि किसी भी मरीज को जांच के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।

प्रखंड स्तरीय ग्रामीण चिकित्सक सम्मेलन’ को संबोधित करते वक्‍ता

उपस्थित गणमान्य

इस अवसर पर क्षेत्र के दिग्गज ग्रामीण चिकित्सकों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनमें मुख्य रूप से नीरज कुमार, चंद्र किशोर, नितेश कुमार, रंजन कुमार, रत्नेश कुमार, मुनचुन कुमार, हृतिक कुमार, सिकंदर पंडित, शिव कुमार, सुमित पासवान, पप्पू चौधरी, रूबी कुमारी, सुमन प्रसाद, अमरनाथ कुमार सहित दर्जनों चिकित्सक शामिल थे।

सकरा में आयोजित यह सम्मेलन केवल एक कार्यक्रम मात्र नहीं था, बल्कि यह ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ और विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। रॉयल हॉस्पिटल और सकरा एक्यूप्रेशर सेंटर की इस पहल की पूरे क्षेत्र में सराहना की जा रही है।

बिहार के युवा बनेंगे ‘आपदा रक्षक’: पटना में मुजफ्फरपुर के 105 स्वयंसेवकों का सात दिवसीय विशेष प्रशिक्षण शुरू

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बिहार के युवा बनेंगे आपदा रक्षक‘: पटना में मुजफ्फरपुर के 105 स्वयंसेवकों का सात दिवसीय विशेष प्रशिक्षण शुरू

पटना | मुख्य संवाददाता  बिहार में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने और आपदा के समय जान-माल की रक्षा के लिए ‘युवा शक्ति’ को तैयार किया जा रहा है। राजधानी पटना के ईगल व्यू प्रशिक्षण केंद्र में बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (BSDMA) और माय भारत के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय आवासीय युवा आपदा मित्र प्रशिक्षण कार्यक्रम का विधिवत आयोजन किया जा रहा है। इस विशेष शिविर में मुजफ्फरपुर जिले के 105 चयनित युवा स्वयंसेवक हिस्सा ले रहे हैं।

‘युवा आपदा मित्र’ प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करतें SDRF के प्रशिक्षक रूपेश कुमार

SDRF की टीम दे रही है कमांडोस्तर की ट्रेनिंग : राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) के अनुभवी प्रशिक्षकों द्वारा इन युवाओं को आपदा प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर व्यवहारिक और सैद्धांतिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सात दिनों तक चलने वाली इस प्रशिक्षण शृंखला में स्वयंसेवकों को विशेष रूप से बिहार की भौगोलिक चुनौतियों, जैसेबाढ़, भूकंप, वज्रपात (ठनका), लू और शीतलहर जैसी स्थितियों से निपटने के लिए तैयार किया जा रहा है।

SDRF के प्रशिक्षक हवलदार के.एन. सिंह, सचिंद्र दुबे, रूपेश कुमार और पूजा कुमारी ने बताया कि प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य युवाओं को आपदा के समय ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ के रूप में सक्षम बनाना है, ताकि प्रशासन के पहुंचने से पहले स्थानीय स्तर पर राहत कार्य शुरू किया जा सके।

‘युवा आपदा मित्र’ प्रशिक्षण कार्यक्रम में उत्‍साह से लवरेज प्रतिभागी

CPR और मॉकड्रिल: जीवन बचाने का व्यावहारिक अभ्यास प्रशिक्षण के दौरान युवाओं को CPR (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन)का विशेष अभ्यास कराया गया। इसमें सिखाया जा रहा है कि यदि किसी व्यक्ति की सांसें रुक जाएं या दिल की धड़कन बंद हो जाए, तो त्वरित चिकित्सा सहायता कैसे प्रदान की जाए। इसके अलावा, स्वयंसेवकों ने सफलतापूर्वकभूकंप और अग्नि सुरक्षा (Fire Fighting) पर आधारित मॉकड्रिल में भाग लिया, जहाँ उन्होंने आग बुझाने और मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की तकनीकों का प्रदर्शन किया।

नेतृत्व और समन्वय: इस पूरे कार्यक्रम के सफल संचालन में मुजफ्फरपुर के मास्टर ट्रेनर सुधांशु कुमार अहम भूमिका निभा रहे हैं। वहीं, कार्यक्रम समन्वयक अंकित कुमार द्वारा स्वयंसेवकों की आवश्यकताओं और प्रशिक्षण के उच्च मानकों को सुनिश्चित किया जा रहा है।

105 सदस्यों की इस टीम का नेतृत्व चंदन कुमार कर रहे हैं। प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले मुख्य स्वयंसेवकों में कृष्णा कुमार, प्रिंस कुमार, सरजीत कुमार, राहुल कुमार, आशीष रंजन के साथ-साथ सांविका, शुभम रानी, अंशु और अनुप्रिया शामिल हैं।

युवा आपदा मित्र’ प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागी

प्रशासन की बढ़ेगी ताकत :  जानकारों का मानना है कि इन युवा आपदा मित्रोंके तैयार होने से जिला प्रशासन को जमीनी स्तर पर बड़ी सहायता मिलेगी। ये स्वयंसेवक न केवल आपदा के समय बचाव कार्य करेंगे, बल्कि आम जनता के बीच आपदा-पूर्व तैयारियों के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य भी करेंगे।

पिलखी गजपति में कांग्रेस की ‘मनरेगा चौपाल’: प्रियंका गांधी का जन्मदिन मनाया और मजदूरों को सिखाए उनके अधिकार

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मुजफ्फरपुर (मुरौल): प्रखंड के पिलखी गजपति में आज कांग्रेस पार्टी द्वारा मनरेगा चौपाल कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के माध्यम से न केवल ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूक किया गया, बल्कि पार्टी की एकजुटता भी प्रदर्शित की गई।

‘मनरेगा चौपाल’ कार्यक्रम को सम्‍बोधित करते प्रखंड अध्यक्ष अलख निरंजन शर्मा

मनरेगा अधिकारों पर दी गई विस्तृत जानकारी

चौपाल में उपस्थित ग्रामीणों को मनरेगा योजना के तहत उनके कानूनी अधिकारों से अवगत कराया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर जोर दिया:

  • रोजगार की गारंटी: काम मांगने के 15 दिनों के भीतर रोजगार पाने का अधिकार।
  • मजदूरी भुगतान: मजदूरी के समय पर भुगतान और उसमें देरी होने पर मुआवजे की जानकारी।
  • दस्तावेज: जॉब कार्ड बनवाने और उसे अपडेट रखने की प्रक्रिया।

प्रियंका गांधी का जन्मदिन: सेवा और संकल्प का दिन

इस अवसर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव प्रियंका गांधी का जन्मदिन कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने मिलकर बेहद उत्साह के साथ मनाया। प्रियंका गांधी की लंबी आयु और स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए केक काटा गया। उपस्थित कार्यकर्ताओं ने उनके नेतृत्व में पार्टी को मजबूत करने का संकल्प लिया।

पिलखी गजपति में केक काटकर प्रियंका गांधी का जन्मदिन मनाते कांग्रेसी कार्यकर्ता

मजदूर हितों के लिए संघर्ष का संकल्प

कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने एकजुट होकर यह प्रण लिया कि वे गरीब और मजदूर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए सड़क से सदन तक संघर्ष जारी रखेंगे। सभी ने एक स्वर में मनरेगा को धरातल पर और अधिक प्रभावी बनाने की बात कही।

प्रमुख उपस्थिति

कार्यक्रम का कुशल संचालन स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया। इस अवसर पर मुख्य रूप से उपस्थित रहे:

  • अलख निरंजन शर्मा (प्रखंड अध्यक्ष, मुरौल)
  • रीमा भारती (सरपंच), अंजनी मिश्रा, हरि यादव
  • डॉक्टर मनीष यादव, डीके सर, इंद्र मोहन झा, राजीव कुमार
  • सुमत कुमार झा, मनीष कुमार मिश्रा, रागिनी कुमारी, गीता देवी, विना देवी, सलीमा खाटून, मोहम्मद फखरुद्दीन, मो. साबिर एवं अन्य गणमान्य सदस्य।

कार्यक्रम के अंत में सभी आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद ज्ञापन के साथ सभा का समापन हुआ।