Saturday, March 7, 2026
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सरस्वती पूजा पर भक्तिमय हुआ माहौल, विभिन्न शिक्षण संस्थानों में उमड़ा जनसैलाब

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सकरा/मुजफ्फरपुर: विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती का पावन पर्व शुक्रवार को सकरा प्रखंड के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। क्या स्कूल और क्या कोचिंग संस्थान, हर तरफ सुबह से ही ‘जय माँ शारदे’ के जयघोष और भक्ति गीतों की गूँज सुनाई देती रही। पीले वस्त्रों में सजे छात्र-छात्राओं और शिक्षकों की उपस्थिति ने पूरे वातावरण को उत्सवपूर्ण बना दिया।

संत जोसेफ स्कूल में कार्यक्रम को संबोधित करते चेयरमैन एवं स्कूल के छात्र

संत जोसेफ पब्लिक स्कूल: वैदिक मंत्रोच्चार और सांस्कृतिक छटा

सबहा स्थित संत जोसेफ प्रे/पब्लिक स्कूल के परिसर में भव्य पूजनोत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय के चेयरमैन प्रवीण कुमार, सचिव अरविन्द कुमार, निदेशक सह कोषाध्यक्ष लालबाबू प्रसाद एवं प्राचार्य दीपक कुमार मिश्र ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।

संत जोसेफ स्कूल में कार्यक्रम के दौरान गायन प्रस्‍तुत करती छात्रा एवं  पूजा में तल्‍लीन छात्रगण

पुरोहितों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच कक्षा दसवीं के छात्र अमन, गौरव, आयुष, अंश एवं वेदप्रकाश ने यजमान की भूमिका निभाकर पूजा संपन्न कराई। इस अवसर पर छात्राओं ने अपनी कला का प्रदर्शन भी किया। समीक्षा, रागिनी, सुप्रिया, माही और आयुषी सहित दर्जनों छात्राओं ने ‘वर दे वीणा वादिनी’ गीत पर मंत्रमुग्ध कर देने वाली सांस्कृतिक प्रस्तुति दी, जिसे अभिभावकों ने खूब सराहा।

ए.पी.जे. पब्लिक स्कूल  में  संध्‍या आरती  करते  छात्र एवं शिक्षक

ए.पी.जे. पब्लिक स्कूल: ज्ञान की चर्चा और महाप्रसाद का आयोजन

बाज़ी रोड, सुजावलपुर स्थित ए.पी.जे. पब्लिक स्कूल में भी माँ शारदे का भव्य स्वागत हुआ। संस्थान के निदेशक नीतेश कुमार एवं प्राचार्य संतोष कुमार झा ने छात्र-छात्राओं को बसंत पंचमी के आध्यात्मिक और शैक्षणिक महत्व के बारे में विस्तार से बताया। पूजा के उपरांत यहाँ बड़े स्तर पर ‘भोज’ (महाप्रसाद) का आयोजन किया गया, जिसमें छात्रों के साथ-साथ स्थानीय लोगों ने भी श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।

वेव वर्ल्ड पब्लिक स्कूल प्रगति मोड़ में  संध्‍या आरती  की तस्‍वीर  

विभिन्न संस्थानों में दिखी भक्ति की लहर

पूजनोत्सव की धूम प्रखंड के अन्य संस्थानों में भी बराबर देखने को मिली:

  • वेव वर्ल्ड पब्लिक स्कूल (मझौलिया): प्रगति मोड़ स्थित इस विद्यालय में बच्चों ने आकर्षक प्रतिमा स्थापित कर सामूहिक रूप से माँ की आराधना की।
  • एक्सपर्ट कॉम्पिटेटिव क्लास: सुजावलपुर रोड स्थित इस कोचिंग संस्थान में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों ने अपनी सफलता की कामना के साथ माँ का आशीर्वाद लिया।

इन सभी आयोजनों में क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों, शिक्षकों और अभिभावकों की भारी उपस्थिति रही। देर शाम तक विसर्जन और आरती के भजनों से पूरा सकरा क्षेत्र भक्तिमय बना रहा।

एक्सपर्ट कॉम्पिटेटिव क्लास सुजावलपुर में पूजा के दौरान उपस्थित छात्रा एवं शिक्षक

सी.एम. नीतीश के आगमन से पहले समस्तीपुर में पोस्टर वॉर; माले के 15 सवालों ने बढ़ाई राजनीतिक तपिश

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समस्तीपुर | 23 जनवरी, 2026 भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती के अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कर्पूरीग्राम आगमन ने जिले का सियासी पारा चढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री के स्वागत की तैयारियों के बीच भाकपा माले ने ‘पोस्टर वॉर’ के जरिए सरकार की घेराबंदी शुरू कर दी है। माले की ताजपुर इकाई ने मुख्यमंत्री के सामने 15 सुलगते सवाल दागते हुए जवाब मांगा है कि आखिर समस्तीपुर की दशकों पुरानी मांगें कब पूरी होंगी?

शिलान्यास और बंद मिलों पर घेरा

भाकपा माले के प्रखंड सचिव सह जिला स्थाई समिति सदस्य सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने स्वयं जिस ‘भोला टॉकीज रेल गुमटी ओवरब्रिज’ का शिलान्यास किया था, उसका निर्माण अब तक अधर में क्यों है? उन्होंने अंग्रेजी शासन के समय से बंद पड़ी समस्तीपुर चीनी मिल और ठाकुर पेपर मिल को पुनर्जीवित करने की मांग को लेकर सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं।

ताजपुर और रोसड़ा का वजूद: विधानसभा और जिला की मांग

खबर में सबसे प्रमुख मुद्दा ताजपुर के वजूद का है। माले का आरोप है कि जननायक की कर्मभूमि ताजपुर को एक साजिश के तहत विधानसभा के दर्जे से वंचित किया गया। पार्टी ने मांग की है कि:

  • ताजपुर को पुनः विधानसभा और अनुमंडल का दर्जा दिया जाए।
  • रोसड़ा को अविलंब जिला घोषित किया जाए।
  • कर्पूरीग्राम-ताजपुर-महुआ-भगवानपुर नई रेल लाइन परियोजना को धरातल पर उतारा जाए।

किसानों और युवाओं के लिए 15 सूत्रीय मांग पत्र

माले ने केवल बुनियादी ढांचे ही नहीं, बल्कि आम जनजीवन से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता दी है:

  1. कृषि: सब्जी हब ताजपुर में आधारित उद्योग, मुफ्त बिजली और खाद-बीज की उपलब्धता।
  2. भ्रष्टाचार: थाना, अंचल और ब्लॉक कार्यालयों में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम।
  3. स्वास्थ्य व शिक्षा: सभी परिवारों को मुफ्त इलाज और स्नातक तक मुफ्त शिक्षा की पहल।
  4. रोजगार: मनरेगा के स्वरूप से छेड़छाड़ पर रोक और बेरोजगार युवाओं को पेंशन।

24 जनवरी को मानव श्रृंखला से होगा शक्ति प्रदर्शन

इन मांगों के समर्थन में और सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए भाकपा माले ने 24 जनवरी को ताजपुर में एक विशाल मानव श्रृंखला का आह्वान किया है। इसके लिए प्रखंड भर में पोस्टर जारी कर आम लोगों से अपनी आवाज बुलंद करने की अपील की गई है।

“जननायक की विरासत केवल उत्सव मनाने में नहीं, बल्कि उनके अधूरे सपनों को पूरा करने में है। समस्तीपुर की जनता अब कोरे आश्वासनों से थक चुकी है।” — सुरेंद्र प्रसाद सिंह, भाकपा माले नेता


शिक्षा के नए क्षितिज का आगाज़: सरस्वती पूजा पर संंत जोसेफ्स स्कूल की नई शाखा ‘सरमस्तपुर’ का भव्य शंखनाद

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सकरा, मुजफ्फरपुर। बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा का दिन भारतीय संस्कृति में ज्ञान के आरंभ का प्रतीक माना जाता है। इसी पावन उपलक्ष्य पर मुजफ्फरपुर के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान संंत जोसेफ्स प्रेप./पब्लिक स्कूल, सबहा ने अपनी गौरवशाली यात्रा में एक नया मील का पत्थर स्थापित किया है। विद्यालय प्रबंधन ने क्षेत्र के शैक्षिक विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के उद्देश्य से अपनी नई विस्तारित शाखा संंत जोसेफ्स प्रेप./पब्लिक स्कूल, सरमस्तपुर के आगाज की विधिवत घोषणा की है। इस अवसर पर आयोजित एक गरिमामय समारोह में विद्यालय के भविष्य की रूपरेखा साझा की गई और नए परिसर की सुविधाओं से लैस ‘हैंड बिल’ का विमोचन किया गया।

संंत जोसेफ्स प्रेप./पब्लिक स्कूल, सबहा में विस्‍तारित शाखा सरमस्‍तपुर का हैंड बिल जारी करते चेयरमैन (दायें से)एवं फ्रेम में हैंड बिल  

हैंड बिल का विमोचन: परंपरा और आधुनिकता का संगम

समारोह के मुख्य आकर्षण के रूप में संस्था के चेयरमैन प्रवीण कुमार, सचिव डा.अरविंद कुमार, कोषाध्यक्ष सह निदेशक लालबाबू प्रसाद एवं प्राचार्य दीपक मिश्र ने संयुक्त रूप से नई शाखा का हैंड बिल जारी किया। इस दौरान चेयरमैन प्रवीण कुमार ने सूचना संप्रेषण के पारंपरिक माध्यमों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, “आज हम सूचना के जिस युग में जी रहे हैं, वहां विज्ञापनों की भरमार है। लेकिन हैंड बिल का महत्व आज भी उतना ही अक्षुण्ण है जितना पहले था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की आजादी के समय, विशेषकर गरम दल के क्रांतिकारियों ने अपनी गुप्त क्रांतियों और संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए हैंड बिल का ही सहारा लिया था।” उन्होंने पोस्टर संस्कृति की आलोचना करते हुए कहा कि दीवारों को गंदा करना विकास नहीं है। हैंड बिल न केवल पर्यावरण और स्वच्छता के अनुकूल है, बल्कि यह किसी भी विषय वस्तु की सम्‍यक (संपूर्ण) जानकारी पहुँचाने का सबसे शालीन माध्यम है।

संंत जोसेफ्स प्रेप./पब्लिक स्कूल सरमस्‍तपुर में  उत्‍साह से लबरेज  शिक्षक एवं ट्रस्‍टीगण 

समारोह को संबोधित करते हुए संस्था के कोषाध्यक्ष सह निदेशक लालबाबू प्रसाद ने एक बड़ी और लोक-कल्याणकारी घोषणा की। उन्होंने कहा कि संंत जोसेफ्स प्रेप./पब्लिक स्कूल (सबहा एवं सरमस्तपुर शाखा) केवल व्यावसायिक शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है।

उन्होंने विस्तार से बताते हुए कहा:

  • निःशुल्क शिक्षा: दोनों शाखाओं में निर्धन और मेधावी बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है।
  • पिछड़े परिवारों को सहयोग: आर्थिक रूप से कमजोर और पिछड़े परिवारों के प्रतिभावान बच्चों को विद्यालय की ओर से विशेष सहायता दी जाएगी ताकि गरीबी उनके सपनों के आड़े न आए।
  • कोचिंग की सुविधा: श्री प्रसाद ने घोषणा की कि इन बच्चों को नियमित स्कूली शिक्षा के साथ-साथ विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं (जैसे नवोदय, सैनिक स्कूल आदि) की तैयारी के लिए निःशुल्क कोचिंग सुविधा भी मुहैया कराई जाएगी।

सरमस्तपुर शाखा: आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और CBSE मानक

प्राचार्य दीपक मिश्र ने नई विस्तारित शाखा की भौगोलिक और तकनीकी विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संंत जोसेफ्स प्रेप./पब्लिक स्कूल, सरमस्तपुर, राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-28) से सटे सरमस्तपुर यज्ञशाला के अत्यंत निकट स्थित है।

विद्यालय की संरचनात्मक विशेषताएं:

  1. विशाल परिसर: विद्यालय वर्तमान में दो एकड़ के विस्तृत भूखंड पर निर्माणाधीन है, जिसमें बच्चों के खेलने के लिए बड़े मैदान और प्राकृतिक वातावरण का विशेष ध्यान रखा गया है।
  2. CBSE मानक: विद्यालय का निर्माण पूरी तरह से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के नवीनतम मानकों के अनुसार किया जा रहा है। कक्षा-कक्षों की बनावट से लेकर सुरक्षा उपकरणों तक, हर पहलू पर बारीकी से काम हो रहा है।
  3. पंजीकरण प्रारंभ: नए सत्र के लिए नामांकन हेतु रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, जिससे स्थानीय अभिभावकों में भारी उत्साह देखा जा रहा है।

सचिव का विजन: डिग्री नहीं, व्यक्तित्व निर्माण है उद्देश्य

संस्था के सचिव डा. अरविंद कुमार ने अपने संबोधन में शिक्षा के बदलते स्वरूप पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में केवल किताबी ज्ञान, ऊंचे अंक और डिग्रियों की होड़ ने बच्चों के बचपन को सीमित कर दिया है।

उन्होंने भावुक होते हुए कहा, सकरा की इस पावन धरती पर हमने जो संकल्प लिया था, वह आज एक वटवृक्ष का रूप ले चुका है। हम केवल साक्षर नहीं, बल्कि सुशिक्षित नागरिक बनाना चाहते हैं। हमारा उद्देश्य एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जहाँ बच्चों की तर्कशक्ति बढ़े और उनके दिल में नैतिक मूल्यों व संस्कारों का बीजारोपण हो।”

सामाजिक सरोकार: निर्धन एवं मेधावी बच्चों को मिलेगी निःशुल्क शिक्षा

संंत जोसेफ्स की विशिष्ट शिक्षण पद्धति: क्यों है यह अलग?

कार्यकंम को संबोधित करते हुए अरविंद कुमार ने विद्यालय की उन प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित किया, और कहा कि हमारे विद्यालय के शिक्षकों का मानना है कि विज्ञान रटने का नहीं, अनुभव करने का विषय है। यहाँ की साइंस लैब आधुनिक शोध केंद्रों की तर्ज पर बनाई गई है, जहाँ छात्र भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के सिद्धांतों को खुद प्रयोग करके सिद्ध करते हैं।

  • डिजिटल क्रांति और कंप्यूटर लैब: हर छात्र को अपना व्यक्तिगत सिस्टम प्रदान किया जाता है ताकि वे कोडिंग और सूचना तकनीक में माहिर बन सकें।
  • लर्निंग बाय डूइंग: ‘प्ले-वे’ पद्धति के माध्यम से बच्चों को खेल-खेल में सिखाया जाता है, जिससे शिक्षा का बोझ उन पर हावी न हो।
  • चार भाषा फॉर्मूला: वैश्विक नागरिक तैयार करने के लिए यहाँ हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत और उर्दू का भी गहरा ज्ञान दिया जाता है।
  • लिखावट और अनुशासन: डिजिटल युग में भी सुंदर हस्तलेखन (Handwriting) को व्यक्ति के चरित्र का दर्पण मानते हुए विशेष सुधार कक्षाएं आयोजित की जाती हैं।
  • प्रतियोगी परीक्षाओं का केंद्र: विद्यालय में केवल स्कूली शिक्षा ही नहीं, बल्कि सैनिक स्कूल, सिमुलतला, नवोदय विद्यालय, ओलंपियाड और NTSE जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं के लिए विशेषज्ञ कोचिंग और मार्गदर्शन की सुविधा दी गई है।

खेल और पारदर्शी मूल्यांकन

संस्था ने स्पष्ट किया कि यहाँ मूल्यांकन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है। शिक्षकों द्वारा उत्तर-पुस्तिकाओं का समय पर मूल्यांकन किया जाता है और बच्चों को उनकी कमियों के बारे में रचनात्मक फीडबैक दिया जाता है। इसके अलावा, पेशेवर कोच बच्चों की खेल प्रतिभा को निखारने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, क्योंकि खेल जीवन में हारकर फिर से खड़ा होना सिखाते हैं।

गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति

इस भव्य शुभारंभ के अवसर पर ट्रस्टी रूपम कुमारी, भारती देवी और राममणी कुमारी के अलावा रंजीत कुमार, नवीन कुमार, श्याम कुमार सिंह, महेश्वर महतो, पंकज कुमार सिंह, इंजीनियर अजय कुमार, रत्ना ठाकुर, संगीता कुमारी और गीता कुमारी जैसे शिक्षाविद् उपस्थित थे। संगीत शिक्षक मुकेश कुमार के नेतृत्व में सांस्कृतिक छटा ने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए।

स्थानीय अभिभावकों और विद्वत जनों ने संंत जोसेफ्स की इस नई पहल का स्वागत किया है और इसे सकरा क्षेत्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है।

सर्दियों में दांतों की सेहत: समस्याएं, समाधान और विशेषज्ञ परामर्श – डॉ. मुकुल प्रकाश

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जैसे ही उत्तर बिहार और विशेषकर मुजफ्फरपुर में ठंड का प्रकोप बढ़ता है, अस्पतालों और क्लिनिकों में दांतों के मरीजों की संख्या में अचानक वृद्धि होने लगती है। डॉ. मुकुल प्रकाश बताते हैं कि जिस तरह हम सर्दियों में अपनी त्वचा को फटने से बचाने के लिए मॉइस्चराइजर लगाते हैं, ठीक उसी तरह दांतों को भी विशेष सुरक्षा की जरूरत होती है।

1. ठंड में दांतों में आने वाली मुख्य समस्याएं

सर्दियों का मौसम दांतों के लिए कई चुनौतियां लेकर आता है:

  • डेंटिन हाइपरसेंसिटिविटी: ठंडी हवा जब दांतों से टकराती है, तो इनेमल के नीचे की परत ‘डेंटिन’ उत्तेजित हो जाती है, जिससे तेज बिजली जैसा झटका महसूस होता है।
  • मसूड़ों में सूजन (Gingivitis): कम पानी पीने के कारण मुंह में लार (Saliva) कम बनती है, जिससे बैक्टीरिया पनपते हैं और मसूड़ों में सूजन आ जाती है।
  • दांतों में दरारें: बहुत गर्म चाय या कॉफी पीने के तुरंत बाद ठंडा पानी पीने से दांतों के इनेमल में ‘थर्मल शॉक’ के कारण सूक्ष्म दरारें आ सकती हैं।
  • जबड़े का दर्द: अत्यधिक ठंड के कारण लोग अनजाने में दांत किटकिटाते हैं या जबड़े भींचते हैं, जिससे ‘टेम्पोरोमैंडिबुलर जॉइंट’ (TMJ) में दर्द होने लगता है।

2. सेंसिटिविटी (झनझनाहट) को कैसे कम करें?

डॉ. मुकुल प्रकाश के अनुसार, सेंसिटिविटी का इलाज घर और क्लिनिक दोनों स्तरों पर संभव है:

  • सही टूथपेस्ट: पोटेशियम नाइट्रेट युक्त ‘डी-सेंसिटाइजिंग’ पेस्ट का उपयोग करें। यह नसों तक पहुँचने वाले संकेतों को ब्लॉक करता है।
  • ब्रशिंग का दबाव: कभी भी जोर से ब्रश न घिसें। इससे इनेमल घिस जाता है और झनझनाहट बढ़ जाती है।
  • अम्लीय खाद्य पदार्थों से बचें: सर्दियों में लोग अचार या सिट्रस फ्रूट्स ज्यादा खाते हैं, जो दांतों की ऊपरी परत को नरम कर देते हैं। इनका सेवन सीमित करें।
  • फ्लोराइड ट्रीटमेंट: यदि समस्या गंभीर है, तो डॉक्टर से मिलकर फ्लोराइड वार्निश लगवाना चाहिए।

3. ब्रश के इस्तेमाल का सही विज्ञान

ब्रश करना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक कला है। डॉ. मुकुल प्रकाश इसके लिए निम्नलिखित सुझाव देते हैं:

  • ब्रश की गुणवत्ता: हमेशा ‘अल्ट्रा सॉफ्ट’ या ‘सॉफ्ट’ ब्रिसल्स वाले ब्रश का चुनाव करें। हार्ड ब्रश मसूड़ों को पीछे धकेल देते हैं (Gum Recession)।
  • ब्रश करने का समय: सुबह सोकर उठने के बाद और रात को सोने से ठीक पहले। रात का ब्रश सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि सोते समय मुंह में बैक्टीरिया सबसे अधिक सक्रिय होते हैं।
  • बदलने का नियम: हर 2.5 से 3 महीने में ब्रश बदल दें। यदि आप बीमार पड़े हैं (जैसे फ्लू या सर्दी-खांसी), तो ठीक होने के बाद तुरंत ब्रश बदलें क्योंकि उसमें कीटाणु रह सकते हैं।

4. दांतों को इन्फेक्शन से बचाने के तरीके

मुंह का इन्फेक्शन पूरे शरीर की सेहत को प्रभावित कर सकता है। इससे बचने के लिए:

  • जीभ की सफाई: टंग क्लीनर का उपयोग करें क्योंकि जीभ पर जमी सफेद परत इन्फेक्शन का घर होती है।
  • फ्लॉसिंग: दो दांतों के बीच फंसा खाना ब्रश से नहीं निकलता। इसके लिए डेंटल फ्लॉस (धागा) का प्रयोग करें।
  • नमक-पानी के गरारे: गुनगुने पानी में सेंधा नमक डालकर कुल्ला करना सर्दियों में रामबाण है। यह मसूड़ों के बैक्टीरिया को खत्म करता है।

5. बच्चों के दांत: समस्याएं और सुरक्षा (Pediatric Care)

बच्चों के दूध के दांत बहुत नाजुक होते हैं।

  • समस्या: सर्दियों में बच्चे गरम दूध में चीनी या चोकलेट ज्यादा लेते हैं। रात को दूध पीकर बिना कुल्ला किए सो जाने से ‘नर्सिंग बॉटल कैविटी’ हो जाती है।
  • बचाव: * बच्चों को हर बार मीठा खाने के बाद सादे पानी से कुल्ला करने की आदत डालें।
    • 6 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए फ्लोराइड-मुक्त टूथपेस्ट का उपयोग करें।
    • उन्हें उंगली से मसूड़ों की मालिश करना सिखाएं।

6. बुजुर्गों और वयस्कों की देखभाल (Geriatric Care)

उम्र बढ़ने के साथ दांतों की जड़ें कमजोर होने लगती हैं।

  • समस्या: वयस्कों में अक्सर दांतों के बीच गैप बढ़ जाता है और बुजुर्गों में लार कम बनने (Dry Mouth) की समस्या होती है, जिससे इन्फेक्शन जल्दी फैलता है।
  • बचाव: * वयस्क: तंबाकू और सिगरेट से पूरी तरह दूरी बनाएं क्योंकि यह सर्दियों में रक्त संचार को कम कर देता है, जिससे मसूड़ों की बीमारी बढ़ती है।
    • बुजुर्ग: यदि नकली दांत (Dentures) पहनते हैं, तो उन्हें रात में निकालकर साफ पानी में रखें। फाइबर युक्त भोजन लें ताकि दांतों की प्राकृतिक सफाई होती रहे।

7. दांतों को दुरुस्त रखने के विशेष टिप्स: डॉ. मुकुल प्रकाश की सलाह

  • हाइड्रेशन: प्यास न लगने पर भी पानी पिएं। पानी की कमी से मुंह सूखता है और सांसों में बदबू आने लगती है।
  • विटामिन-D: धूप का आनंद लें। विटामिन-D कैल्शियम के अवशोषण के लिए जरूरी है, जो दांतों की मजबूती बढ़ाता है।
  • संतुलित आहार: अपनी डाइट में पनीर, दूध, हरी सब्जियां और तिल शामिल करें। तिल कैल्शियम का बहुत अच्छा स्रोत है।
  • नियमित जांच: दर्द होने का इंतजार न करें। हर 6 महीने में प्रकाश डेंटल क्लिनिक जैसे विशेषज्ञ केंद्र पर जाकर प्रोफेशनल क्लीनिंग (Scaling) कराएं।

सावधानी ही समाधान है

डॉ. मुकुल प्रकाश का मानना है कि यदि हम अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव करें, तो दांतों की 90% समस्याओं से बचा जा सकता है। ठंड के मौसम में लापरवाही न बरतें, क्योंकि दांतों का दर्द न केवल शारीरिक कष्ट देता है बल्कि आपके मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है।

विशेष नोट: यदि आपको दांतों में लगातार दर्द, मसूड़ों से खून आना या अत्यधिक झनझनाहट महसूस हो रही है, तो तुरंत प्रकाश डेंटल क्लिनिक, जूरन छपरा, मुजफ्फरपुर में डॉ. मुकुल प्रकाश से परामर्श लें।


परामर्श एवं अपॉइंटमेंट (Appointment Details)

यदि आप दांतों की किसी भी समस्या से जूझ रहे हैं या सर्दियों में अपने ओरल हेल्थ का रूटीन चेकअप कराना चाहते हैं, तो आप प्रकाश डेंटल क्लिनिक में संपर्क कर सकते हैं।

  • विशेषज्ञ: डॉ. मुकुल प्रकाश (B.D.S., दन्त रोग विशेषज्ञ)
  • स्थान: प्रकाश डेंटल क्लिनिक, रोड नंबर एक एवं दो के बीच पहली गली, जूरन छपरा, मुजफ्फरपुर, बिहार।
  • संपर्क नंबर: [+91-8294139994]
  • मिलने का समय: * सोमवार से शनिवार: सुबह 10:00 बजे से दोपहर 02:00 बजे तक
    •                        रविवार : सुबह 10:00 बजे से संध्‍या 04:00 बजे तक

डॉ. मुकुल प्रकाश का संदेश: “एक स्वस्थ मुस्कान ही आपके व्यक्तित्व का आईना है। दांतों की समस्याओं को नज़रअंदाज़ न करें, समय पर सही सलाह और उपचार ही आपको लंबे समय तक स्वस्थ रख सकता है।”

मुजफ्फरपुर के प्रतिष्ठित प्रकाश डेंटल क्लिनिक (जूरन छपरा) के वरिष्ठ दंत चिकित्सक डॉ. मुकुल प्रकाश के अनुभवों और चिकित्सकीय परामर्श पर आधारित यह विस्तृत लेख सर्दियों में आपके मौखिक स्वास्थ्य (Oral Health) के सहायता के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है।

किसान रजिस्ट्री में खाता नंबर की अनिवार्यता किसानों को सरकारी लाभ से वंचित करने की साजिश: किसान महासभा

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ताजपुर/समस्तीपुर | अखिल भारतीय किसान महासभा की प्रखंड कमेटी की एक विस्तारित बैठक मोतीपुर (वार्ड 26) में आयोजित की गई। बैठक में वक्ताओं ने सरकार द्वारा आनन-फानन में लागू की जा रही फार्मर रजिस्ट्री योजना पर तीखा प्रहार किया और इसे किसानों के हक पर डाका डालने की साजिश करार दिया।

रजिस्ट्री से बाहर होंगे किसान, सब्सिडी पर मंडराया संकट

बैठक को संबोधित करते हुए महासभा के जिला सचिव ललन कुमार ने कहा कि फार्मर रजिस्ट्री में खाता नंबर की अनिवार्यता किसानों को ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ से वंचित करने की एक गहरी साजिश है। उन्होंने चेतावनी दी कि अब डीजल अनुदान, खाद-बीज सब्सिडी, फसल क्षति मुआवजा और कृषि यंत्रीकरण जैसे तमाम लाभ इसी रजिस्ट्री के आधार पर मिलेंगे। यदि पोर्टल में खामियां रहीं, तो किसान इन सभी सरकारी योजनाओं से पूरी तरह कट जाएंगे।

ऑनलाइन पोर्टल की खामियों पर उठाए सवाल

अध्यक्षता कर रहे प्रखंड अध्यक्ष ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने तकनीकी पहलुओं पर सरकार को घेरते हुए कहा:

  • शून्य खाता-खेसरा: अधिकांश ऑनलाइन जमाबंदी पर खाता-खेसरा शून्य अंकित है।
  • पुराने नाम: जमीन अब भी दादा-परदादा के नाम पर दर्ज है, जिसे सुधारने में प्रशासन विफल रहा है।
  • सुधार की मांग: सरकार पहले ‘राजस्व महाभियान’ के आवेदनों का निष्पादन करे और पोर्टल पर एक से अधिक जमाबंदी दर्ज करने की सुविधा दे।
  • नए प्रावधान: उन्होंने मांग की कि किसान रजिस्ट्री में वंशावली और LPC को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।

बटाईदार किसानों की अनदेखी

भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि वर्तमान में बटाईदारी खेती का प्रचलन बढ़ा है, लेकिन इस योजना में बटाईदारों के लिए कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने इसे केंद्र की मोदी सरकार की किसान विरोधी नीति बताते हुए संघर्ष तेज करने का आह्वान किया।

आंदोलन की रूपरेखा: विधानसभा तक गूंजेगी आवाज

बैठक में किसानों ने अपनी मांगों को लेकर चरणबद्ध आंदोलन का निर्णय लिया है:

  1. 9 फरवरी 2026: मांगों के समर्थन में प्रखंड मुख्यालय का घेराव।
  2. 23 फरवरी 2026: राज्य सरकार को जगाने के लिए विधानसभा का घेराव।
  3. संगठन विस्तार: सदस्यता अभियान में तेजी लाने और पंचायत/प्रखंड सम्मेलनों के आयोजन का निर्णय।

उपस्थिति: बैठक का संचालन ललन दास ने किया। इस दौरान मुंशीलाल राय, संजीव राय, राजदेव प्रसाद सिंह, कैलाश सिंह, मोती लाल सिंह, शंकर महतो, मकसुदन सिंह, अनील सिंह, संजय कुमार सिंह, रंजीत कुमार सिंह समेत दर्जनों किसान नेता और कार्यकर्ता मौजूद थे।


प्रमुख सुर्खियां :

  • साजिश: किसान रजिस्ट्री में खाता नंबर की अनिवार्यता किसानों को लाभ से रोकने का जरिया – ललन कुमार।
  • चेतावनी: 9 फरवरी को अपनी मांगों के लिए प्रखंड मुख्यालय घेरेंगे किसान – ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह।
  • मांग: फार्मर रजिस्ट्री में वंशावली और LPC को भी मिले जगह – ललन दास।

विधायक जी, सकरा की ये सड़क छलनी हो गई है : अब रो रही है, कब सुध लेने आइयेगा?

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एस.एस.कुमार पंकज’  

सकरा (मुजफ्फरपुर): राजनीति की बिसात पर जब चुनाव की गोटियां बिछाई जाती हैं, तो विकास के वादे शहद की तरह टपकते हैं। जनता को सुनहरे ख्वाब दिखाए जाते हैं और रातों-रात सड़कों का जाल बिछाने का दावा किया जाता है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही जब इन वादों की परतें उधड़ती हैं, तो अंदर से भ्रष्टाचार का वो घिनौना चेहरा निकलता है जो जनता के खून-पसीने की कमाई को लील चुका होता है। सकरा विधानसभा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण सड़क आज इसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।

चुनावी हड़बड़ीमें गड़बड़ीका खेल: बेईमानों की नजर लगी

NH-28 को ढोली रेलवे स्टेशन से जोड़ने वाली यह सड़क, जो सुजावलपुर से नीमतल्ला रोड तक जाती है, आज एक ‘धोखे’ का पर्याय बन चुकी है। विधानसभा चुनाव के समय इस सड़क को आनन-फानन में बनाया गया था। उस वक्त सकरा नगर पंचायत के वार्ड संख्या छह के लोगों को लगा था कि अब उनके दिन बहुरेंगे। यह सड़क इस वार्ड के पूर्वी भाग की जीवनरेखा है, लेकिन आज यही रेखा उनके पैरों में छाले डाल रही है।

आलम यह है कि मात्र छह महीने के भीतर ही यह सड़क ‘छलनी’ हो गई है। जिस पी.सी.सी. सड़क को सालों-साल चलना चाहिए था, वह छह महीने में ही भ्रष्टाचार की गवाही देने लगी है। निर्माण के पहले दिन से ही स्थानीय लोगों ने इसके घटिया मैटेरियल पर सवाल उठाए थे। लोगों ने विरोध किया था कि सीमेंट, बालू और गिट्टी का जो मिश्रण इस्तेमाल हो रहा है, उसमें ईमानदारी कम और बेईमानी ज्यादा है। आज वही शंका सच साबित हो रही है।

मॉर्निंग वॉक” नहीं, ये “जख्मों का सफर” है

इस सड़क की दुर्दशा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जगह-जगह से गिट्टियां उखड़कर बाहर आ गई हैं। पैदल चलना किसी सजा से कम नहीं है। इस सड़क की दुर्दशा का मंजर रूह कंपा देने वाला है। जगह-जगह से गिट्टियां उखड़कर ऐसे बाहर आ गई हैं जैसे किसी ने जान-बूझकर राहगीरों के लिए कांटे बिछा दिए हों। खाली पैर चलना तो दूर, चप्पल पहनकर चलने वालों का भी संतुलन बिगड़ रहा है।

स्थानीय बुजुर्ग और डायबिटीज के मरीज, जिन्हें डॉक्टरों ने खाली पैर टहलने की सलाह दी है, उनके लिए यह सड़क अब एक दुःस्वप्न बन गई है। सड़क पर बिखरी नुकीली गिट्टियां पैरों को लहूलुहान कर रही हैं। लोग बताते हैं कि अब उन्होंने इस सड़क पर मॉर्निंग वॉक करना ही छोड़ दिया है। क्या विकास की परिभाषा यही है कि जनता को अपने घर के सामने टहलने के लिए भी तरसना पड़े?


भ्रष्टाचार का काला गणित: विभाग और संवेदक की “जुगलबंदी”

यह सड़क मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क उन्नयन योजना के अंतर्गत बनाई गई है (योजना संख्या: L061-T02 (VR38))। सरकारी दस्तावेजों में इसके संवेदक अजय कुमार (कन्हौली विशुनदत्त, मुजफ्फरपुर) हैं। निर्माण की जिम्मेदारी ग्रामीण कार्य विभाग, कार्यप्रमंडल मुजफ्फरपुर पूर्वी-1 के कार्यपालक अभियंता की थी।

आज सकरा की जनता इन ‘साहबों’ से तीखे सवाल पूछ रही है:

  1. साहब, क्या आप धृतराष्ट्रबन गए थे? जब संवेदक खुलेआम मिट्टी और रेत का खेल खेल रहा था, तब आपकी तकनीकी जांच की टीम कहाँ सो रही थी?
  2. लूट की छूट क्यों? पूरे जिले में शायद ही ऐसी कोई सड़क हो जो बनने के साथ ही उजड़ने लगे। क्या अभियंता महोदय को इस खुली लूट की भनक तक नहीं लगी?
  3. भुगतान का आधार क्या था? जब सड़क की गुणवत्ता शून्य थी, तो संवेदक की फाइलों पर हस्ताक्षर कैसे हुए? यह जनता के टैक्स के पैसे की डकैती है।

भ्रष्टाचार का गणित: कौन है जिम्मेदार?

कागजों पर इस सड़क का संवेदक अजय कुमार (कन्हौली विशुनदत्त, मुजफ्फरपुर) है और इसके अनुरक्षण (Maintenance) की तारीख जून 2026 तक है। इसकी कार्यकारी एजेंसी कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग, कार्यप्रमंडल मुजफ्फरपुर पूर्वी-1 है।

यह साफ तौर पर अभियंता और संवेदक के बीच के अपवित्र गठबंधन का नतीजा है, जिसने जनता के पैसों को अपनी जेबों में भर लिया और सड़क के नाम पर सिर्फ धूल और पत्थर छोड़ दिए।

आर.सी. कॉलेज सकरा के मुख्‍य द्वार के सामने सड़क पर उखड़ चुकी गिट्टी का विहंगम दृश्‍य

महत्वपूर्ण संस्थानों का गला घोंटती बदहाली

यह सिर्फ एक सड़क नहीं है, बल्कि सकरा की अर्थव्यवस्था और शिक्षा की धड़कन है। इस मार्ग से हर दिन हजारों रेल यात्री ढोली स्टेशन जाते हैं। इसके अलावा आर.सी. कॉलेज, सुजावलपुर मार्केट, सब्जी मंडी, मछली मंडी और दर्जनों शिक्षण संस्थान इसी रास्ते पर निर्भर हैं। छात्रों को स्कूल जाने में परेशानी होती है, किसानों को अपनी सब्जी मंडी ले जाने में हिचकोले खाने पड़ते हैं और बीमारों को अस्पताल ले जाना एक चुनौती बन गया है।

आर.सी. कॉलेज सकरा के मुख्‍य द्वार के सामने सड़क पर उखड़ चुकी गिट्टी का दृश्‍य

सत्ता के गलियारों में ‘सफेद चश्मा’ के साथ नेताओं की खामोशी और ठेकेदारों की मनमानी ने सकरा के विकास को ‘आईसीयू’ में पहुंचा दिया है।”

सबसे दुखद पहलू तो यह है कि सत्ताधारी दल के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता इसी सड़क से प्रतिदिन गुजरते हैं। क्या उनकी आंखों पर सत्ता के अहंकार का ऐसा चश्मा चढ़ा है कि उन्हें उखड़ी हुई गिट्टियां और गड्ढे दिखाई नहीं देते? अगर ये नेता सजग होते और सरकार की योजनाओं को ईमानदारी से धरातल पर उतारने के लिए तत्पर होते, तो आज न सकरा की जनता को यह कष्ट भोगना पड़ता और न ही विधायक जी को ऐसे अवसर का सामना करना पड़ता।


विधायक जी, अब सिर्फ ब्लैकलिस्टसे काम नहीं चलेगा, अब नजीरपेश करने का वक्त है!

सकरा की जनता अब खोखले आश्वासनों से ऊब चुकी है। विधायक जी, आपको आना होगा और अपनी आंखों से इस लूट के स्मारक को देखना होगा। इस भ्रष्ट संवेदक पर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने।

विधायक जी, अब वक्त है कि आप ‘माननीय’ होने का धर्म निभाएं। सिर्फ किसी फर्म को ‘ब्लैकलिस्ट’ कर देने से कुछ नहीं होगा। ये भ्रष्ट संवेदक इतने शातिर हैं कि कल अपने परिवार के किसी सदस्य या नई फर्म के नाम पर दोबारा टेंडर ले लेंगे और फिर से सरकार की आंखों में धूल झोंकेंगे।

जनता की स्पष्ट मांगें:

  • FIR और गिरफ्तारी: संवेदक अजय कुमार और संबंधित लापरवाह अभियंताओं पर सरकारी धन के गबन का आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
  • संपत्ति की कुर्की: सड़क की मरम्मत का एक-एक पैसा इस भ्रष्ट संवेदक की निजी संपत्ति को बेचकर वसूला जाए।
  • गारंटी और अनुरक्षण: चूंकि अनुरक्षण की तारीख जून 2026 तक है, अतः इसे तुरंत बिना किसी अतिरिक्त सरकारी खर्च के नए सिरे से बनवाया जाए।

विधायक जी, सकरा के वार्ड नंबर छह की इस सड़क की चीखें शायद आपके दफ्तर तक न पहुंचती हों, लेकिन जनता के दिलों में पल रहा आक्रोश आप तक जरूर पहुंचेगा। जनता की याददाश्त बहुत तेज होती है। अगर आज आपने इस भ्रष्टाचार के गठजोड़ को नहीं तोड़ा, तो कल यही ‘छलनी सड़क’ आपके राजनीतिक भविष्य का रास्ता भी रोक सकती है।

आइये और देखिये इस सड़क के आंसू… और साबित कीजिये कि आप भ्रष्टाचारियों के साथ नहीं, सकरा की जनता के साथ खड़े हैं।

अनजाने में ‘यक्षिणी’ को देवी मान पूज रहे लोग, खतरे में मौर्यकालीन धरोहर :सकरा की जमीन में दफन है पुरानी सभ्यता

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विशेष रिपोर्ट: मुजफ्फरपुर (सकरा) बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का सकरा प्रखंड इन दिनों पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है। यहाँ की मिट्टी महज धूल नहीं, बल्कि 2500 साल पुराने गौरवशाली इतिहास के साक्ष्य उगल रही है। सकरा के तीन प्रमुख गांवों—गनियारी, पटसामा और कुतुबपुर—में बिखरे अवशेष चीख-चीखकर यह बता रहे हैं कि यहाँ कभी मौर्यकालीन और प्रारंभिक गुप्तकालीन सभ्यता की एक भव्य बस्ती हुआ करती थी। लेकिन विडंबना यह है कि जिसे दुनिया के सामने एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पेश किया जाना चाहिए था, वह आज उपेक्षा और अनभिज्ञता के कारण विनाश की कगार पर है।

आस्था के घेरे में दबा इतिहास: ‘यक्षिणी’ बनीं कुलदेवी

सकरा के गनियारी मध्य विद्यालय परिसर में इतिहास और आस्था का एक अनोखा संगम देखने को मिलता है। विद्यालय निर्माण के समय जमीन की खुदाई के दौरान काले पत्थर की एक प्राचीन प्रतिमा मिली थी। पुरातत्व की समझ न होने के कारण स्थानीय ग्रामीणों ने इसे ईश्वरीय चमत्कार माना और श्रद्धावश एक पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित कर दिया। आज लोग इसे ‘देवी’ मानकर पूज रहे हैं।

गनियारी मध्य विद्यालय परिसर में नीचे स्थापित’यक्षिणी’ की मूर्ति

जब आरसी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. शांतनु सौरभ ने इस मूर्ति का सूक्ष्म अध्ययन किया, तो एक नया खुलासा हुआ। उन्होंने बताया कि ग्रामीणों द्वारा पूजी जा रही यह प्रतिमा वास्तव में यक्षिणी’ की है। प्राचीन भारतीय इतिहास में यक्ष-यक्षिणी को वैभव और प्रकृति का रक्षक माना जाता था। डॉ. सौरभ के अनुसार, ऐसी प्रतिमाओं का मिलना इस क्षेत्र में मौर्यकालीन धार्मिक प्रभाव की पुष्टि करता है। आस्था के कारण यह प्रतिमा बची तो हुई है, लेकिन खुले में रहने के कारण प्राकृतिक क्षरण का शिकार हो रही है।

पटसामा की ‘हल्की ईंटें’ और उन्नत तकनीक

कदाने नदी के किनारे स्थित पटसामा डीह (श्यामपुर डीह) प्राचीन स्थापत्य कला का जीवंत प्रमाण है। यहाँ खेतों की जुताई के दौरान ऐसी ईंटें निकलती हैं जो आकार में तो विशाल हैं, लेकिन वजन में आज की ईंटों से आधी हैं। इन ईंटों का रहस्य इनकी निर्माण तकनीक में छिपा है। मौर्यकाल में मिट्टी के साथ धान की भूसी, खरपतवार और विशेष प्रकार के अवशेष मिलाकर इन्हें पकाया जाता था, ताकि इमारतें भूकंपरोधी और हल्की बन सकें।

पटसामा डीह (श्यामपुर डीह) से प्राप्‍त ईंटों को दिखाते स्‍थानीय निवासी

डेढ़ लाख वर्ग मीटर में फैले इस टीले के नीचे किसी विशाल राजप्रासाद या बौद्ध विहार के होने की संभावना प्रबल है। ग्रामीणों को अक्सर यहाँ से पत्थर की माला के मनके, प्राचीन सिलौटा और मिट्टी के पात्र (नाद) मिलते रहते हैं, जो एक समृद्ध व्यापारिक और घरेलू जीवन की ओर इशारा करते हैं।

कुतुबपुर डीह: 200 ईसा पूर्व की विकसित बस्ती

कुतुबपुर का ऐतिहासिक टीला लगभग दो लाख वर्ग मीटर के क्षेत्र को कवर करता है। यहाँ की भौगोलिक बनावट सामान्य भूमि से करीब तीन मीटर ऊंची है, जो किसी दबी हुई सभ्यता का स्पष्ट संकेत है। इस स्थल पर बिखरे हुए लाल और काले पॉलिश वाले मृदभांड (बर्तन) पुरातत्वविदों को 150 से 200 ईसा पूर्व के कालखंड में ले जाते हैं। यहाँ कभी दर्जनों प्राचीन कुएं हुआ करते थे, जो इस बात का प्रमाण थे कि यह एक सुनियोजित और सघन बस्ती थी। आज इनमें से अधिकांश कुएं और संरचनाएं मिट्टी के नीचे दम तोड़ चुकी हैं।

कुतुबपुर डीह के उपर बना काली मंदिर का गहवर

विरासत पर संकट: अनजाने में हम मिटा रहे हैं अपना वजूद

सकरा की इस विरासत पर अब दोतरफा खतरा मंडरा रहा है। एक तरफ प्रशासनिक उदासीनता है, तो दूसरी तरफ अनजाने में स्थानीय लोगों द्वारा किया जा रहा नुकसान:

  • खेती के लिए समतलीकरण: ऊंचे टीलों (डीह) को काटकर समतल खेत बनाए जा रहे हैं, जिससे जमीन के नीचे दबे साक्ष्य नष्ट हो रहे हैं।
  • अतिक्रमण का जाल: कुतुबपुर डीह के पास गैर-मजरूआ जमीन की बंदोबस्ती और निजी निर्माण ने भविष्य में वैज्ञानिक खुदाई के रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं।
  • पहचान का संकट: गनियारी डीह पर स्कूल और मंदिरों के अनियोजित निर्माण ने प्राचीन टीले के अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया है।

विशेषज्ञों की अपील: ‘एएसआई’ के हस्तक्षेप की जरूरत

डॉ. शांतनु सौरभ और अन्य शोधकर्ताओं ने सरकार से गुहार लगाई है कि यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) या बिहार राज्य पुरातत्व विभाग जल्द हस्तक्षेप नहीं करता है, तो मुजफ्फरपुर का यह गौरवशाली अध्याय हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों से मिट जाएगा। उन्होंने स्थानीय जनता से भी अपील की है कि वे इन अवशेषों को पत्थर का टुकड़ा न समझें, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ हिस्सा मानकर इनकी रक्षा करें।


सकरा की जमीन के नीचे दफन यह सभ्यता न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव का विषय हो सकती है। जरूरत है एक इच्छाशक्ति की, ताकि ‘यक्षिणी’ की उस मूर्ति और ‘पटसामा की ईंटों’ को वह सम्मान मिल सके जिसकी वे हकदार हैं। यदि ऐसा हुआ, तो मुजफ्फरपुर का यह क्षेत्र वैशाली की तरह ही अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के केंद्र के रूप में उभर सकता है।


समस्तीपुर के विकास के लिए आर-पार की जंग: 24 जनवरी को मुख्यमंत्री का घेराव करेंगे रेल विकास व जिला मंच के कार्यकर्ता

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समस्तीपुर | 19 जनवरी 2026 समस्तीपुर जिले की दशकों पुरानी रेल और नागरिक सुविधाओं की मांगों को लेकर अब जन-आंदोलन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। सोमवार को स्थानीय डीआरएम चौक पर रेल विकास-विस्तार मंच एवं जिला विकास मंच की एक संयुक्त आपातकालीन बैठक संपन्न हुई। शंकर प्रसाद साह की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में जिले के विकास के प्रति प्रशासनिक उदासीनता पर गहरा रोष व्यक्त किया गया।

मुख्यमंत्री के कर्पूरीग्राम दौरे पर टिकी निगाहें

बैठक में आगामी 24 जनवरी को मुख्यमंत्री के कर्पूरीग्राम आगमन को एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है। मंच के नेताओं ने निर्णय लिया है कि उस दिन जिले की ज्वलंत समस्याओं और नई रेल परियोजनाओं की मांगों को लेकर मुख्यमंत्री को एक स्मार-पत्र सौंपा जाएगा। केवल इतना ही नहीं, जिले के सर्वांगीण विकास की इन मांगों की गूँज लोकसभा और विधानसभा के आगामी बजट सत्र में भी सुनाई दे, इसके लिए जिले के सभी सांसदों और विधायकों को भी ज्ञापन सौंपकर उन पर दबाव बनाया जाएगा।

हवाई अड्डा और रेल नेटवर्क विस्तार मुख्य एजेंडा

मंच ने स्पष्ट किया है कि समस्तीपुर के औद्योगिक और सामाजिक विकास के लिए दूधपूरा में हवाई अड्डा की मंजूरी अब अनिवार्य हो गई है। इसके अलावा, रेल कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए निम्नलिखित नई रेल लाइनों को बजट में शामिल करने की मांग की गई है:

  • कर्पूरीग्राम-ताजपुर-भगवानपुर रेल लाइन
  • केबलस्थान-कर्पूरीग्राम रेल लाइन
  • दलसिंहसराय-पटोरी रेल लाइन
  • मुक्तापुर-कुशेश्वरस्थान रेल लाइन

जाम की समस्या: मुक्तापुर और अटेरन गुमटी पर ओवरब्रिज की मांग

शहर में बढ़ते ट्रैफिक और रेल गुमटियों पर लगने वाले घंटों के जाम को देखते हुए, मंच ने मुक्तापुर रेल गुमटी और अटेरन चौक रेल गुमटी पर ओवरब्रिज (ROB) निर्माण कार्य तत्काल शुरू करने की पुरजोर वकालत की है। नेताओं का कहना है कि ओवरब्रिज न होने से आम जनता और एम्बुलेंस सेवाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

धरोहर” के अस्तित्व पर खतरा: रेल कारखाना की उपेक्षा

बैठक को संबोधित करते हुए मंच के संयोजक शत्रुघ्न राय पंजी ने समस्तीपुर रेल कारखाना की बदहाली पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा, एक लंबी लड़ाई के बाद कारखाना में POH (पीओएच) डब्बा निर्माण कार्य तो शुरू हुआ, लेकिन यह केवल कागजों तक सीमित लग रहा है। न तो सरकार ने इसके लिए भूमि अधिग्रहण किया और न ही बड़ी मशीनें मंगाई गईं। ब्रिटिश काल का यह गौरवशाली कारखाना हमारी धरोहर है और इसके विकास में कोई भी प्रशासनिक कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”

ये रहे बैठक में उपस्थित

इस महत्वपूर्ण बैठक में क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। अपने विचार व्यक्त करने वालों में सुरेंद्र प्रसाद सिंह, जीबछ पासवान, उपेंद्र राय, अशोक कुमार, राजेंद्र राय, विश्वनाथ सिंह हजारी और सुशील कुमार प्रमुख थे। सभी ने एक स्वर में कहा कि यदि इस बार मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।

बिना सुधार फार्मर रजिस्ट्री शुरू करना किसानों के लिए घातक: किसान महासभा

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ताजपुर/समस्तीपुर | सरकार द्वारा जल्दबाजी में शुरू की गई ‘फार्मर रजिस्ट्री’ योजना को लेकर किसानों में भारी आक्रोश और चिंता व्याप्त है। अखिल भारतीय किसान महासभा ने इसे किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का सौदा बताया है।

योजना का मुख्य संकट

कृषि विभाग के अनुसार, भविष्य में सरकार की सभी महत्वपूर्ण योजनाएं जैसे:

  • किसान सम्मान निधि की राशि
  • डीजल और खाद-बीज पर अनुदान
  • फसल क्षति मुआवजा एवं यांत्रिकीकरण सब्सिडी

ये सभी लाभ केवल उसी जमीन (रकवा) के आधार पर मिलेंगे जो फार्मर रजिस्ट्री पोर्टल पर दर्ज होगा।

तकनीकी खामियां और जमीनी हकीकत

अखिल भारतीय किसान महासभा के प्रखंड अध्यक्ष ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने मौजूदा व्यवस्था की गंभीर त्रुटियों को उजागर करते हुए कहा कि:

त्रुटिपूर्ण ऑनलाइन रिकॉर्ड: अधिकांश किसानों की ऑनलाइन जमाबंदी पर ‘खाता-खेसरा’ शून्य अंकित है।

पुराने रिकॉर्ड: कई किसानों की जमाबंदी आज भी उनके पिता या दादा के नाम पर है, जिसे अपडेट नहीं किया गया है।

पोर्टल की सीमा: वर्तमान पोर्टल पर एक से अधिक जमाबंदी दर्ज करने की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव है, जबकि बिहार के अधिकांश किसानों के पास एक से अधिक जमाबंदी है।

माले की चेतावनी

भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने रविवार को प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि यदि सरकार ने पहले राजस्व महाभियान के तहत आए आवेदनों का ऑनलाइन सुधार नहीं किया, तो यह योजना पूरी तरह फ्लॉप साबित होगी। उन्होंने मांग की है कि पोर्टल में सुधार कर एक से अधिक जमाबंदी दर्ज करने की सुविधा दी जाए, अन्यथा किसानों को भारी सरकारी लाभ से वंचित होना पड़ेगा।


मुख्य मांग: सरकार सबसे पहले राजस्व अभिलेखों में सुधार करे और उसके बाद ही फार्मर रजिस्ट्री को अनिवार्य बनाए, ताकि वास्तविक किसानों को उनका हक मिल सके।

ग्राउंड रिपोर्ट: क्या मिट्टी में मिल जाएगा साढ़े तीन हजार साल का इतिहास?

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सकरा के कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर ‘डीह’ की बदहाली पर विशेष पड़ताल

मुजफ्फरपुर, बिहार। ब्यूरो रिपोर्ट:

बिहार की मिट्टी के बारे में कहा जाता है कि यहाँ आप जहाँ भी फावड़ा चलाएंगे, वहां से इतिहास की कोई न कोई कहानी जरूर निकलेगी। लेकिन मुजफ्फरपुर जिले का सकरा प्रखंड इन दिनों किसी गौरवशाली गाथा के लिए नहीं, बल्कि अपनी बेबसी और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण चर्चा में है। यहाँ की जमीन अपने भीतर एक ऐसी सभ्यता को दबाए बैठी है, जो आज से लगभग 3500 साल पुरानी है। प्रखंड के तीन प्रमुख पुरातात्विक स्थल— कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर — आज संरक्षण के अभाव में अपने अस्तित्व की अंतिम सांसे ले रहे हैं।

इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए ये स्थल उत्तरी काली पॉलिशदार मृदभांड संस्कृति‘ (NBPW Phase) के अनमोल खजाने हैं। यह वह कालखंड था जब भारत में वैदिक सभ्यता का सूर्यास्त और शहरी लौह युगीन संस्कृति का उदय हो रहा था। आज इन तीनों स्थलों पर बिखरे हुए काली और लाल पॉलिश के मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े उस दौर के उन्नत शिल्प कौशल की चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है।


समान कालखंड, साझा बर्बादी

इन तीनों स्थलों—कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर—में जो सबसे बड़ी समानता है, वह है इनका समकालीन होना। लगभग 700 ईसा पूर्व के आसपास, जब गंगा के मैदानी इलाकों में महाजनपदों (जैसे वज्जी और मगध) का उदय हो रहा था, तब ये क्षेत्र मानव बस्तियों और प्रशासनिक गतिविधियों से गुलजार थे।

विडंबना यह है कि जहाँ साढ़े तीन हजार साल की प्राकृतिक चुनौतियों, युद्धों और मौसम के थपेड़ों ने इन स्थलों को नहीं मिटाया, वहीं आधुनिक काल की प्रशासनिक उपेक्षा और स्थानीय लोगों की जागरूकता में कमी इन्हें समूल नष्ट कर रही है। स्थानीय ग्रामीण इन्हें महज डीह यानी पुरानी ऊँची जगह भर समझते हैं। उनके लिए यहाँ से निकलने वाली प्राचीन ईंटें और खपड़े सिर्फ निर्माण सामग्री या कचरा हैं। यही कारण है कि इन ऐतिहासिक धरोहरों पर संरक्षण की कोई मुकम्मल दीवार नहीं, बल्कि बदहाली की चादर लिपटी नजर आती है।


1. रामपुर भसौन: कदाने नदी के आगोश में समाती सभ्यता

रामपुर भसौन, जो बाजी बुजुर्ग पंचायत के अंतर्गत आता है, आज प्रकृति और समय की दोहरी मार झेल रहा है। शहीद द्वार से होकर गुजरने वाला ऊबड़-खाबड़ रास्ता सीधे उस इतिहास की ओर ले जाता है, जिसे काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान ने अपनी मुहर लगाकर प्रमाणित किया है।

पुरातत्व की गवाही और विशाल अवशेष

यहाँ की मिट्टी खोदते ही इतिहास बाहर आने लगता है। यहाँ से प्राप्त ईंटों का विशाल आकार (15 इंच लंबी, 9.5 इंच चौड़ी और 2.5 इंच मोटी) यह स्पष्ट संकेत देता है कि यहाँ मौर्यकालीन या उससे भी प्राचीन काल का कोई भव्य निर्माण रहा होगा। खेतों में जुताई के दौरान अक्सर बड़ी हांडियों और दीवारों के अवशेष मिलते रहते हैं।

प्रकृति का प्रहार और नदी का कटाव

इस टीले की सबसे बड़ी दुश्मन फिलहाल कदाने नदी बनी हुई है। नदी की लहरें धीरे-धीरे इस ऐतिहासिक टीले को काटकर अपने भीतर निगल रही हैं। नदी के पानी में आधी डूबी पुरानी दीवारें और तट पर बिखरे लाल-काले मृदभांड किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का दिल चीर देने के लिए काफी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान श्मशान घाट के पास कभी किसी प्राचीन महल या प्रशासनिक केंद्र की मुख्य इमारत रही होगी।

आस्था बनाम अस्तित्व

टीले के मुख्य भाग पर स्थित राम-जानकी मंदिर और मठ सदियों पुरानी परंपरा का केंद्र है। मंदिर के पुजारी शुकदेव दास के अनुसार, यहाँ पूजा-पाठ सैकड़ों वर्षों से होता आ रहा है, लेकिन टीले की वैज्ञानिक प्राचीनता को लेकर कभी कोई आधिकारिक प्रयास नहीं हुआ। आज 1.40 लाख वर्ग मीटर का यह क्षेत्र निजी खेती की चपेट में है, जहाँ प्राचीन कौड़ियां और ऐतिहासिक महत्व के खपड़े ट्रैक्टरों के टायरों के नीचे रौंदे जा रहे हैं।


2. कुलेसरा: ऊँचाई से ढलान की ओर बढ़ता पुरातात्विक स्तूप

रामपुर मणि पंचायत में स्थित कुलेसरा डीह को सकरा का सबसे बड़ा और ऊँचा पुरातात्विक टीला होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन यह ‘गौरव’ अब केवल कागजों और यादों तक सीमित रह गया है।

विशालता और निरंतर क्षरण

लगभग 8 लाख वर्ग मीटर में फैला यह टीला कभी साढ़े तीन मीटर की ऊँचाई पर गर्व से खड़ा था। बीते तीन दशकों में विकास की अंधी दौड़ ने इसकी सूरत बदल दी। सड़क निर्माण के लिए यहाँ से अवैध रूप से मिट्टी काटी गई और अंधाधुंध खेती ने इस टीले की मूल संरचना को बिगाड़ दिया है। अब इसकी ऊँचाई घटकर मात्र डेढ़ से दो मीटर रह गई है।

सात कुओंका रहस्य और हॉल का जाल

स्थानीय लोककथाओं और किंवदंतियों में यहाँ सात कुओं का जिक्र मिलता है। ग्रामीण बताते हैं कि हाल ही में सड़क निर्माण के दौरान एक प्राचीन कुएं का मुख दिखाई दिया था, जिसे बिना किसी जांच के फिर से मिट्टी से दबा दिया गया। यहाँ दबी हुई मिट्टी की दीवारें और समतल सतह किसी विशाल ‘हॉल’ या सामुदायिक भवन की ओर इशारा करती हैं।

नदी का विस्थापन और व्यापारिक केंद्र

कुलेसरा के पूरब और दक्षिण में कदाने नदी के पुराने बहाव के स्पष्ट निशान आज भी मौजूद हैं। पुरातत्वविदों का अनुमान है कि यह स्थल कभी एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह या जलमार्ग के किनारे स्थित कोई महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र रहा होगा। नदी के एक किलोमीटर दूर खिसक जाने से यहाँ की भौगोलिक स्थिति तो बदल गई, लेकिन जमीन के नीचे दबे साक्ष्य आज भी किसी बड़े खुलासे का इंतजार कर रहे हैं।


3. रघुवरपुर: रोटावेटर की मार और विकास की बलि

प्रखंड मुख्यालय से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित रघुवरपुर की स्थिति सबसे अधिक शोचनीय और हृदयविदारक है। एनएच-28 से सटा होने के बावजूद यह स्थल आज अपनी पहचान खो चुका है।

मिटा दिया गया अस्तित्व

80 के दशक तक के रिकॉर्ड बताते हैं कि यह टीला भी लगभग 3 मीटर ऊँचा था। लेकिन रेल मार्ग के विस्तार, भारी जल निकासी और आधुनिक निर्माण कार्यों के कारण यहाँ मिट्टी का इतना कटाव हुआ कि टीला पूरी तरह समतल हो गया है। जो जगह कभी इतिहास का शिखर थी, वह आज केवल एक निर्जन खेत बनकर रह गई है।

मशीनीकरण का कहर

यहाँ 1.40 लाख वर्ग मीटर भूमि पर अब गहन खेती होती है। रोटावेटर और हैरो जैसे आधुनिक कृषि यंत्रों ने मिट्टी के नीचे दबे उन प्राचीन मृदभांडों (Pottery) को चकनाचूर कर दिया है, जो 3500 सालों से सुरक्षित थे। किसान अनजाने में अपने ही पूर्वजों की विरासत को धूल में मिला रहे हैं।


विशेषज्ञ राय: क्यों महत्वपूर्ण हैं ये स्थल?

पुरातत्वविदों के अनुसार, NBPW (North Black Polished Ware) संस्कृति भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम काल है जब ‘द्वितीय नगरीकरण’ शुरू हुआ था। इसी दौर में सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ, लोहे का कृषि में बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ और बुद्ध-महावीर जैसे महापुरुषों का आगमन हुआ। सकरा के ये स्थल उसी कालखंड के ‘अर्बन सेंटर’ रहे होंगे। यदि यहाँ वैज्ञानिक उत्खनन होता है, तो वैशाली और पाटलिपुत्र के बीच के सांस्कृतिक संबंधों की एक नई कड़ी मिल सकती है।


निष्कर्ष: क्या हम अपनी जड़ों को खो रहे हैं?

सकरा के ये तीनों पुरातात्विक स्थल केवल मुजफ्फरपुर या बिहार के नहीं, बल्कि पूरे भारत की साझा विरासत हैं। वक्त की मांग है कि प्रशासन और समाज नींद से जागे।

तत्काल आवश्यक कदम:

  1. संरक्षण: पुरातत्व विभाग इन स्थलों को तुरंत ‘संरक्षित क्षेत्र’ घोषित करे और इनकी घेराबंदी (Fencing) कराए।
  2. वैज्ञानिक उत्खनन: इन स्थलों पर तत्काल ‘Excavation’ शुरू किया जाए ताकि मौर्य, बुद्ध और गुप्त काल के अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठ सके।
  3. जन-जागरूकता: स्थानीय स्कूलों और पंचायतों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जाए ताकि ग्रामीण इन ‘डीह’ को केवल मिट्टी का ढेर न समझकर अपनी ‘धरोहर’ समझें।
  4. संग्रहालय: इन स्थलों से प्राप्त अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय स्तर पर एक छोटा संग्रहालय बनाया जाए।

अगर आज प्रशासनिक स्तर पर सार्थक पहल नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली इतिहास को केवल कहानियों में सुनेंगी। धरातल पर दिखाने के लिए हमारे पास केवल धूल और पछतावा बचेगा। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को यह बताने के लायक बचेंगे कि जहाँ वे आज खड़े हैं, वहाँ साढ़े तीन हजार साल पहले एक महान सभ्यता सांस लेती थी?