बाजार में आया अनोखा बैंगनी आलू, पोषण सुरक्षा और छिपी भूख से निपटने में मददगार

नई दिल्ली: देश में कैलोरी की कमी न होने के बावजूद आवश्यक विटामिन और खनिजों की कमी यानी ‘हिडन हंगर’ (छिपी भूख) एक विकराल समस्या बनी हुई है। इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीपीआरआई) के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी सफलता हासिल की है। संस्थान ने बैंगनी रंग के गूदे वाला एक विशेष बायोफोर्टिफाइड आलू विकसित किया है, जिसका नाम कुफरी जामुनिया रखा गया है। वर्ष 2024 में आधिकारिक तौर पर जारी यह किस्म न केवल देखने में अनोखी है, बल्कि स्वास्थ्य और स्वाद का जबरदस्त संगम भी है।

सांकेतिक (प्रतीकात्‍मक) तस्‍वीर

सामान्य आलू से कई गुना अधिक सेहतमंद

वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार कुफरी जामुनिया में सामान्य आलू की तुलना में पोषण का स्तर बेहद ऊंचा है[cite: 4]। इसमें एस्कॉर्बिक एसिड (विटामिन सी), एंथोसायनिन और कैरोटीनॉयड भरपूर मात्रा में मौजूद हैं।

  • विटामिन सी: सामान्य आलू में 23.15 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम की तुलना में कुफरी जामुनिया में यह 42.75 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम पाया जाता है।
  • जिंक: सामान्य आलू में केवल 0.28 मिलीग्राम होता है, जबकि कुफरी जामुनिया में 2.28 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम (और गूदे में 22.77 पीपीएम) जिंक मौजूद है।
  • आयरन: सामान्य आलू में 0.57 मिलीग्राम की तुलना में इस बैंगनी आलू में 3.22 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम (और गूदे में 32.23 पीपीएम) आयरन उपलब्ध है।

किस्म की खासियत और बंपर पैदावार

यह किस्म मध्यम अवधि में पककर तैयार होती है। इसके कंद आयताकार, गहरे बैंगनी छिलके और बैंगनी गूदे वाले होते हैं। प्रत्येक पौधे से 10 से 12 मध्यम से बड़े आकार के आलू मिलते हैं। सामान्य कृषि पद्धतियों के तहत यह 32 से 35 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार देती है, जबकि 90 दिनों के परीक्षण में इसकी उपज 49 टन प्रति हेक्टेयर तक दर्ज की गई है। इसकी सुप्तावस्था 6 से 8 सप्ताह की होती है, जिससे यह जल्दी अंकुरित नहीं होता और लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।

पाक कला में नया मोड़

कुफरी जामुनिया का उपयोग पारंपरिक सब्जियों, पराठा, पूरी और रायता बनाने के साथ-साथ हलवा, उपमा, डोसा और इडली के बैटर में भी किया जा सकता है। इसके अलावा इसे प्रोसेस करके सूप, कुकीज, आटा, सूजी और दलिया जैसी चीजें तैयार की जा सकती हैं।

इन राज्यों में खेती के लिए उपयुक्त

उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों के लिए अनुशंसित यह किस्म बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और उत्तराखंड के मैदानी इलाकों की मिट्टी व जलवायु के अनुकूल पाई गई है।

इससे पहले संस्थान ने 2018 में बैंगनी छिलके वाली कुफरी नीलकंठ और 2021 में गहरे लाल रंग वाली कुफरी माणिक किस्म भी विकसित की थी।

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