नर्सिंग होम के फर्जीवाड़े और झोलाछाप डॉक्टरों की भीड़, कैसे जाने किसी डॉक्टर या अस्पताल की असलियत ।

[विशेष रिपोर्ट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’ ]

सकरा, मुजफ्फरपुर, बिहार के मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत सकरा प्रखंड इन दिनों ‘स्वास्थ्य सेवा’ के नाम पर मौत की मंडी बन चुका है। यहाँ की गलियों में कुकुरमुत्ते की तरह उगे अवैध नर्सिंग होम आम आदमी की लाचारी और गरीबी का फायदा उठाकर अपना साम्राज्य खड़ा कर चुके हैं। कहने को तो ये जीवन बचाने के केंद्र हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यहाँ ‘यमराज’ के नुमाइंदे सफेद कोट पहनकर लोगों की जिंदगी से खूनी जुआ खेल रहे हैं।

बोर्ड पर ‘ एम.बी.बी.एस ‘और  केबिन में ‘मुन्नाभाई ‘

सकरा के मुख्य सड़कों से लेकर भीतरी इलाकों तक नजर दौड़ाएं, तो आपको हर दो कदम पर एक आलीशान बोर्ड दिखेगा। इन बोर्डों पर शहर के सबसे बड़े एम.बी.बी.एस (MBBS), एम.एस (MS) और एम.डी (MD) डॉक्टरों के नाम लिखे होते हैं। उनके बैठने का समय भी तय होता है। लेकिन यह महज एक छलावा है। जांच में यह कड़वी सच्चाई सामने आई है कि बोर्ड पर लिखे ये बड़े नाम सिर्फ ‘किराए’ के होते हैं।

अस्पताल के केबिन के अंदर जब मरीज पहुंचता है, तो उसका सामना उन ‘मुन्नाभाइयों’ से होता है जिनके पास डॉक्टरी की कोई वैध डिग्री नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि ये कथित डॉक्टर जटिल से जटिल ऑपरेशन करने के लिए यूट्यूब (YouTube) वीडियो का सहारा ले रहे हैं। पेट का ऑपरेशन हो या सिजेरियन डिलीवरी, ये फर्जी डॉक्टर मोबाइल स्क्रीन पर वीडियो चलाकर कैंची और चाकू चलाते हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि चिकित्‍सा जगत का विभत्‍स रूप है । हद तो तब हो जाती है जब पुर्जा पर दवा लिखते हैं और इसके लिए गुगल का सहारा लेने लगते हैं ।


असली डॉक्टर खाली हाथ, ‘नकली’ मालामाल: डिग्री की गरिमा पर भारी पड़ता दलालों का ‘रैकेट’

सकरा नगर पंचायत और इसके इर्द-गिर्द के इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा इतना बदसूरत हो चुका है कि यहाँ योग्यता नहीं, बल्कि ‘दलाली’ तय करती है कि मरीज कहाँ जाएगा। जो चिकित्सक तीन से पांच साल तक हाड़-तोड़ मेहनत कर MBBS, MS और MD जैसी कठिन डिग्रियां हासिल करते हैं, वे आज मरीजों का इंतज़ार करने को मजबूर हैं। वहीं दूसरी ओर, सिर्फ बाहरी ताम-झाम और दिखावे वाले फर्जी नर्सिंग होम का पूरा एक सिंडिकेट है, जो दलालों के दम पर असली चिकित्सकों का हक मार रहा है। एक योग्य डॉक्टर अपनी पूरी ऊर्जा और समय मरीज को सही इलाज देने और अपनी योग्यता सिद्ध करने में खपा देता है, जबकि झोलाछाप डॉक्टरों का रैकेट ‘मरीज सेटिंग’ में अपनी सारी ताकत लगाता है। विडंबना देखिए कि योग्य चिकित्सकों के बड़े-बड़े संगठन भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठे हैं। जब तक विशेषज्ञ डॉक्टर और उनके संगठन इस फर्जीवाड़े के खिलाफ मुखर नहीं होंगे, तब तक योग्यता और अनुभव की हार होती रहेगी और चकाचौंध वाले ‘फर्जी नर्सिंग होम’ मासूम जिंदगियों को निगलते रहेंगे।


डिग्री ‘बेनामी’ यूनिवर्सिटी की, पर पुर्जे पर शान से सजता है ‘MBBS’

सकरा के इन अवैध नर्सिंग होम में फर्जीवाड़े की पराकाष्ठा तो देखिए, यहाँ इलाज कर रहे कथित डॉक्टरों के पास डिग्रियां ऐसी ‘बेनामी’ यूनिवर्सिटियों की हैं जिनका न तो कोई वजूद है और न ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) से कोई मान्यता। ग्रामीण इलाकों के भोले-भाले मरीजों को ठगने के लिए ये झोलाछाप अपने लेटरपैड और पुर्जों पर बड़े ही रसूख के साथ ‘MBBS’ लिखते हैं। पुर्जे पर छपे इन चार अक्षरों के पीछे का सच यह है कि इन्हें शरीर के अंगों की सही बनावट तक का ज्ञान नहीं है, लेकिन शान ऐसी कि मानो एम्स (AIIMS) से पढ़कर आए हों। बिना किसी वैध पंजीकरण के एमबीबीएस लिखना न केवल एक कानूनी अपराध है, बल्कि उन मरीजों के साथ विश्वासघात भी है जो इन अक्षरों को देखकर अपनी जिंदगी इन ‘नीम-हकीमों’ के हवाले कर देते हैं।


ग्रामीण चिकित्सक भी बने ‘स्वयंभू’ डॉक्टर: सादे झोले से स्टेथोस्कोप तक का सफर

कभी गांवों में प्राथमिक उपचार और मरहम-पट्टी तक सीमित रहने वाले ‘ग्रामीण चिकित्सक’ (आरएमपी) अब सकरा में खुद को विशेषज्ञ डॉक्टर घोषित कर चुके हैं। अनुभव के नाम पर इनके पास सिर्फ कुछ वर्षों की दवाइयों की जानकारी है, लेकिन रसूख ऐसा कि ये भी अब धड़ल्ले से अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगा रहे हैं और पुर्जों पर बेझिझक MBBS अंकित कर रहे हैं। ग्रामीण चिकित्सा के नाम पर ट्रेनिंग लेने वाले ये लोग अब जटिल बीमारियों का न केवल परामर्श दे रहे हैं, बल्कि बिना किसी हिचकिचाहट के एंटीबायोटिक दवाओं का ओवरडोज और जानलेवा इंजेक्शन तक ठोक रहे हैं। प्रशासन की ढील का ही नतीजा है कि एक साधारण ग्रामीण चिकित्सक आज खुद को सर्जन समझकर मरीजों के जीवन के साथ ‘एक्सपेरिमेंट’ कर रहा है।


नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाने के कानूनी मानक एवं नियम

भारत और विशेषकर बिहार में ‘डॉक्टर’ शब्द का इस्तेमाल करने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान हैं, जिनका उल्लंघन करना एक दंडनीय अपराध है। भारत में National Medical Commission (NMC) और Supreme Court के दिशा-निर्देशों के अनुसार, केवल वही व्यक्ति अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ (Dr.) लिख सकते हैं जिन्होंने मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से MBBS, BDS (डेंटल), या आयुष (BAMS-आयुर्वेद, BHMS-होम्योपैथी, BUMS-यूनानी) की डिग्री प्राप्त की हो और जिनका पंजीकरण संबंधित स्टेट मेडिकल काउंसिल या नेशनल रजिस्टर में हो।

अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाने का कानूनी अधिकार किसे नहीं

बिहार में ‘बिहार क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के तहत यह स्पष्ट है कि यदि किसी व्यक्ति के पास उपरोक्‍त इन वैध डिग्रियों में से कोई एक नहीं है, तो वह चिकित्सा कार्य नहीं कर सकता और न ही डॉक्टर की पदवी का उपयोग कर सकता है। विशेष रूप से, फार्मासिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, ऑप्टोमेट्रिस्ट या पैरामेडिकल स्टाफ (जैसे लैब टेक्नीशियन) को अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाने का कानूनी अधिकार नहीं है, वे केवल अपनी विशिष्ट पदवी (जैसे PT या Pharma) का उपयोग कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, पीएचडी (Ph.D) धारक अपने शैक्षणिक क्षेत्र में ‘डॉक्टर’ लगा सकते हैं, लेकिन वे किसी भी स्थिति में मरीजों का इलाज या दवाओं का पर्चा (Prescription) नहीं लिख सकते। यदि कोई झोलाछाप या बिना वैध डिग्री वाला व्यक्ति डॉक्टर शब्द का प्रयोग करता है, तो वह ‘धोखाधड़ी’ और ‘मेडिकल इम्पर्सनेशन’ (छद्म भेष) के तहत जेल जाने का पात्र है


दलालों का जाल और जनता की अज्ञानता: मौत की राह दिखाते ‘अपने’ ही रक्षक

सकरा की इस खौफनाक हकीकत का सबसे दुखद पहलू मरीजों की अज्ञानता और उन पर हावी ‘दलाल संस्कृति’ है। ग्रामीण इलाकों में आज भी जब कोई बीमार पड़ता है, तो वह अस्पताल जाने के बजाय सबसे पहले अपने पास के उसी ग्रामीण चिकित्सक की शरण में जाता है, जिसे वह अपना मसीहा समझता है। ये झोलाछाप डॉक्टर अपनी कमाई के लालच में मरीज के घर पर ही ‘एक्सपेरिमेंटल’ इलाज शुरू कर देते हैं। जब गलत दवाइयों और नीम-हकीमी से बात बिगड़ने लगती है और मरीज मौत के मुहाने पर खड़ा होता है, तब ये कथित डॉक्टर उसे डराकर और इससे भी बेहतर ईलाज के नाम पर सीधे अपने कमीशन वाले नर्सिंग होम में ‘मूव’ कर देते हैं।


सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ और बेहतर

विडंबना देखिए कि आज सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ और बेहतर हुई है, जहाँ मुफ्त दवाइयों से लेकर विशेषज्ञ डॉक्टरों की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन, इन दलालों और झोलाछापों ने सरकारी तंत्र के खिलाफ ऐसा भ्रम फैला रखा है कि गरीब जनता अपनी गाढ़ी कमाई और जान, इन अवैध ‘कत्लगाहों’ में लुटाने को मजबूर है। लोगों को यह समझना होगा कि घर पर इलाज करने वाला हर व्यक्ति डॉक्टर नहीं होता, और समय रहते सरकारी अस्पताल न पहुंचना अपनी मौत के वारंट पर खुद दस्तखत करने जैसा है।


सरकारी डॉक्टरों की ‘मौन’ सहमति

सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि कुछ नर्सिंग होम के बोर्ड पर सरकारी डॉक्टरों के नाम बाकायदा अंकित हैं। नियम कहते हैं कि सरकारी सेवा में रहते हुए प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए कड़े मानक हैं, लेकिन यहाँ तो सरकारी डॉक्टर इन अवैध केंद्रों के ‘ब्रांड एंबेसडर’ बने हुए हैं। क्या स्वास्थ्य विभाग को यह नहीं दिखता कि उनके कर्मचारी इन अवैध दुकानों को संरक्षण दे रहे हैं? यह साठगांठ इतनी गहरी है कि समय-समय पर होने वाली ‘छापेमारी’ की सूचना इन केंद्रों तक पहले ही पहुंच जाती है।


इलाज करते करते  खोला  नर्स और पैरामेडिकल के जाली सर्टिफिकेट देने वाला संस्‍थान

हैरानी की बात यह है कि इन फर्जी डॉक्टरों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि ये अब केवल गलत इलाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दो-चार कमरों की दुकानों से ‘नर्सिंग और पैरामेडिकल कॉलेज’ चलाने का दावा कर रहे हैं। सुजावलपुर से स्टेशन रोड जाने वाली  मुख्य सड़क पर खुलेआम ऐसे दो संस्थान और सबहा रोड में ब्लॉक गेट से महज दो सौ मीटर दक्षिण स्थित ये केंद्र, बाहरी संस्थानों से ‘अफिलिएशन’ का झांसा देकर भोले-भाले युवकों का भविष्य बर्बाद कर रहा  हैं। हद तो तब हो गई जब सकरा में एक मॉल के सामने दवा बेचते-बेचते एक कथित डॉक्टर,  झारखंड के एक नर्सिंग कॉलेज के नाम पर फर्जी डिग्री बेचकर लाखों का वारा-न्यारा कर दिया।

सकरा में खुलेआम बिक रहे हैं नर्स और पैरामेडिकल के जाली सर्टिफिकेट

सूत्रों की माने तो, झारखंड का यह तथाकथित कॉलेज, और दवा दुकान से संचालित होने वाले ये कॉलेज एक सुव्यवस्थित ‘रैकेट’ की तरह काम कर रहा है, जिसका मिलते जुलते नाम वाला वेबसाइट  है, जो समय समय पर खुलता है । इस खेल का असली मास्टरमाइंड पटना में अपना सेंटर जमाए बैठा है,हर जगह अपना आदमी सेटिंग करके रखे हुए है, जहाँ से वो लोगों में विश्‍वास जमाने कि लिए, सिर्फ नाम का परीक्षा संचालित कर शातिराना ढंग से डिग्रियां बांट रहा  हैं। फर्जी परीक्षा संचालित कर डिग्री देने का ट्रिक लोगों में विश्‍वास बढ़ाने में कामयाब है, डिग्री लेने वालों को भी लगता है कि हमने परीक्षा देकर डिग्री लिया है,किताब खोलकर लिखने और बैक सेशन की डिग्री की व्‍यवस्‍था विशेष खर्च  पर स्‍पेशल केटोगरी में की जाती है, बैक सेशन की डिग्री डील फाइनल होते ही परीक्षा की खनापूर्ति करके तीन चार महीने में  मुहैया करा दी जाती है, शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर चल रही यह ‘सर्टिफिकेट की मंडी’ न केवल युवाओं को गुमराह कर रही है, बल्कि भविष्य में ऐसे अयोग्य लोगों को तैयार कर रही है जो फिर से समाज की जान के दुश्मन बनेंगे। प्रशासन की चुप्पी यह सवाल खड़ा करती है कि मुख्य सड़क पर सजे इन ‘डिग्री के शोरूम’ पर आखिर कार्रवाई कब होगी?


दुकान की तरह सजे नर्सिंग होम के बोर्ड, ‘किराए’ के फर्जी डॉक्टर नर्सिंग होम की बने हैं शान

यहां के  गली-मोहल्लों में कुकुरमुत्ते की तरह उगे इन अवैध नर्सिंग होम की कार्यप्रणाली बेहद शातिराना है। इनके बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में MBBS, MS, MD जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों के बोर्ड लगे होते हैं। बोर्ड पर उनके बैठने का समय भी  लिखा है, लेकिन हकीकत यह है कि वे डॉक्टर वहां कभी आते ही नहीं।

  • किराए के नाम: कई बड़े सरकारी और निजी डॉक्टरों के नाम यहां  ‘किराए’ पर इस्तेमाल हो रहे हैं। बदले में नर्सिंग होम  के द्वारा इन डॉक्टरों को नाम इस्‍तेमाल करने के एवज में नियत राशि प्रत्‍येक महीना उपलब्‍ध करा दिया जाता है, मरीज की स्थिति चिंताजनक होने पर अलग से स्‍पेशल फीस देकर  ‘किराए’ के ऐसे डॉक्‍टर से सेवा लिया जाता है ।
  • यूट्यूब से ‘सर्जरी’: बिना किसी मेडिकल प्रशिक्षण के, झोलाछाप डॉक्टर इंटरनेट पर वीडियो देखकर या फिर ‘किराए’  के डाक्‍टरों  के गाइड लाइन में जटिल ऑपरेशन कर रहे हैं।
  • बेनामी डिग्रियां: इन केंद्रों पर बैठे लोगों के पास ऐसी यूनिवर्सिटीज की डिग्रियां हैं जिनका अस्तित्व ही नहीं है,  या फिर इनके डिग्री को  ‘National Medical Commission’ (NMC) या ‘Bihar Council of Medical Registration’ (BCMR) मान्‍यता ही नहीं देता है।

सड़कों पर विज्ञापन और गलियों में दलाल: कमीशन के खेल में ‘नीलाम’ होती जिंदगी

इन फर्जी डॉक्टरों और अवैध नर्सिंग होम के बीच अब मरीजों को ‘लूटने’ की होड़ (कंपटीशन) मची है। आलम यह है कि पेड़ों, बिजली के खंभों और दीवारों पर इनके ‘सस्ते इलाज’ के रेट लिस्ट चिपके दिख जाते हैं, जो किसी अस्पताल के कम और किसी सेल के विज्ञापन ज्यादा लगते हैं। इस काले धंधे को चलाने के लिए बाकायदा दलालों का एक अंडरग्राउंड सिंडिकेट काम कर रहा है। थ्री-व्हीलर और फोर-व्हीलर चालक इनके ‘गुप्त एजेंट’ हैं, जो स्टेशन या बस स्टैंड से उतरते ही भोले-भाले मरीजों को फुसलाकर इन ‘मौत के अड्डों’ तक पहुँचाते हैं। हद तो तब है जब गाँवों में अवैध दवा बेचने वाले और कुछ ग्रामीण चिकित्सक भी चंद रुपयों के कमीशन के लालच में मरीजों का सौदा कर रहे हैं। मरीज की बीमारी से ज्यादा इन दलालों की नजर उनकी जेब पर होती है। सेटिंग ऐसी कि एम्बुलेंस से लेकर ऑटो तक, हर चक्का सीधे उन्हीं नर्सिंग होम के गेट पर जाकर रुकता है जहाँ कमीशन का रेट पहले से तय होता है।


सकरा किडनी कांड — एक जख्म जो अभी भरा नहीं

मुजफ्फरपुर के सकरा का नाम सुनते ही रूह कांप जाती है। 2022 में बाजी राउत की रहने वाली सुनीता देवी गर्भाशय के इलाज के लिए ‘शुभकांत क्लीनिक’ गई थीं। वहां के कथित डॉक्टर पवन कुमार ने ऑपरेशन के बहाने सुनीता की दोनों किडनियां निकाल लीं। दो साल तक न्याय की गुहार और डायलिसिस के दर्दनाक सफर के बाद 21 अक्टूबर 2024 को सुनीता की मौत हो गई।

आज भी स्थिति जस की तस है। प्रशासन ने कुछ दिन शोर मचाया, क्लिनिक सील किए, लेकिन मामला ठंडा पड़ते ही वही खेल फिर शुरू हो गया। आज भी सकरा और आसपास के इलाकों में मानक विहीन नर्सिंग होम बिना ‘फायर एनओसी’, बिना ‘प्रदूषण बोर्ड सर्टिफिकेट’ और बिना पर्याप्त बेड के धड़ल्ले से चल रहे हैं। क्या प्रशासन एक और ‘सुनीता’ की मौत का इंतजार कर रहा है?


शोषण का व्यवस्थित चक्रव्यूह

इन अस्पतालों का निशाना बनते हैं गांवों के सीधे-साधे और अनपढ़ गरीब लोग। यहाँ का अर्थशास्त्र पूरी तरह से ‘नकद’ पर आधारित है।

  • अवैध उगाही: छोटी सी बीमारी के लिए भी हजारों रुपये की फीस वसूली जाती है।
  • बिना रसीद का धंधा: इलाज के नाम पर मोटी रकम तो ली जाती है, लेकिन मरीज के परिजनों को फीस की रसीद नहीं दी जाती।
  • साक्ष्य मिटाना: रसीद न देने के पीछे का मुख्य उद्देश्य यह है कि यदि ऑपरेशन के दौरान मरीज की मौत हो जाए, तो पीड़ित पक्ष के पास कोर्ट में पेश करने के लिए कोई कानूनी सबूत न रहे।

नर्सिंग होम के फर्जीवाड़े और झोलाछाप डॉक्टरों के आतंक के बीच, एक जागरूक नागरिक के तौर पर यह जानना बेहद जरूरी है कि किसी डॉक्टर या अस्पताल की असलियत कैसे जांची जाए। बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं की पारदर्शिता के लिए सरकार ने कई ऑनलाइन पोर्टल बना रखे हैं। आप किसी भी संस्थान या डॉक्टर की वैधता की जांच कैसे कर सकते हैं और शिकायत कहाँ दर्ज कर सकते हैं,


नर्सिंग होम/अस्पताल का निबंधन (Registration) कैसे जांचें?

बिहार में किसी भी अस्पताल या क्लिनिक को Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act के तहत निबंधित होना अनिवार्य है।

  • पोर्टल: State Health Society, Bihar या बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग की आधिकारिक वेबसाइट।
  • जांच का तरीका: प्रत्येक निबंधित नर्सिंग होम को अपने रिसेप्शन पर ‘Clinical Establishment Act Certificate’ और ‘Pollution Control Board’ का अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) टांगना अनिवार्य है।
  • ऑनलाइन: आप बिहार सरकार के ‘Clinical Establishment Registry’ पोर्टल पर जाकर जिलेवार निबंधित अस्पतालों की सूची देख सकते हैं। यदि अस्पताल का नाम सूची में नहीं है, तो वह अवैध है।

कैसे पहचानें कि आपका डॉक्टर ‘असली’ है या ‘मुन्नाभाई’? डॉक्टरों की डिग्री की जांच कैसे करें?

यदि कोई डॉक्टर MBBS, MD या MS होने का दावा करता है, तो उसे ‘National Medical Commission’ (NMC) या ‘Bihar Council of Medical Registration’ (BCMR) के साथ रजिस्टर्ड होना चाहिए।

  • ऑनलाइन पोर्टल: NMC Search Doctor
  • प्रक्रिया: 1. वेबसाइट पर ‘Indian Medical Register’ सेक्शन में जाएं। 2. डॉक्टर का नाम या उनका ‘Registration Number’ डालें। 3. यदि डॉक्टर असली है, तो उसकी फोटो, डिग्री और यूनिवर्सिटी का नाम सामने आ जाएगा। 4. चेतावनी: यदि डॉक्टर अपना रजिस्ट्रेशन नंबर बताने से कतराए या पुर्जे पर रजिस्ट्रेशन नंबर न लिखा हो, तो समझ लें कि मामला संदिग्ध है।

दवा दुकान (Pharmacy) का निबंधन कैसे जांचें?

दवा दुकान चलाने के लिए ‘Drug License’ (DL) होना अनिवार्य है, जिसे एक रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट ही चला सकता है।

  • जांच का तरीका: दुकान के बोर्ड पर या काउंटर के पीछे Drug License Number अनिवार्य रूप से लिखा होना चाहिए।
  • ऑनलाइन जांच: आप बिहार सरकार के ‘Drug Control Administration’ की वेबसाइट पर जाकर लाइसेंस नंबर डालकर दुकानदार की वैधता देख सकते हैं।
  • महत्वपूर्ण: बिना पक्की रसीद (GST Bill) के दवा न खरीदें। फर्जी दुकानदार रसीद देने से कतराते हैं।

पैथोलॉजी लैब और डायग्नोस्टिक सेंटरों की वैधता को लेकर भी सकरा समेत कई इलाकों में भारी भ्रम की स्थिति है।

जांच केंद्रों की योग्यता और वैधानिकता: क्या लैब संचालकडॉक्टर बन सकते हैं?

नर्सिंग होम के साथ-साथ गली-कूचों में खुले पैथोलॉजी और डायग्नोस्टिक सेंटरों (रक्त, पेशाब, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे) की स्थिति भी चिंताजनक है। नियमानुसार, एक पैथोलॉजी लैब चलाने के लिए संचालक के पास DMLT या BMLT की डिग्री होनी चाहिए, लेकिन रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने का अधिकार केवल एक रजिस्टर्ड पैथोलॉजिस्ट (MD Pathology) के पास ही होता है। इसी तरह, अल्ट्रासाउंड केंद्र के लिए रेडियोलॉजिस्ट का होना अनिवार्य है। इन केंद्रों के निबंधन की जांच आप जिला स्वास्थ्य समिति या क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के पोर्टल से कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच केंद्र चलाने वाला कोई भी व्यक्ति (चाहे वह कितना भी अनुभवी क्यों न हो) मरीज को दवाइयां नहीं लिख सकता और न ही अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगा सकता है। यदि कोई लैब संचालक मरीज का इलाज कर रहा है या दवा लिख रहा है, तो वह सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन कर रहा है। जनता को यह समझना होगा कि लैब का काम केवल रिपोर्ट देना है, न कि इलाज करना। रिपोर्ट पर हमेशा देखें कि किसी योग्य डॉक्टर के डिजिटल या असली हस्ताक्षर हैं या नहीं, क्योंकि बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट केवल कागज का एक टुकड़ा है।


शिकायत कहाँ करें?

यदि आपको पता चले कि कोई डॉक्टर फर्जी है या अस्पताल अवैध तरीके से चल रहा है, तो आप नीचे दिए गए स्थानों पर लिखित या ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं:

  1. सिविल सर्जन कार्यालय : जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (Civil Surgeon) को लिखित शिकायत दें। सकरा के मामले में मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन को पत्र लिखें।
  2. बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम (PGRO): आप प्रखंड या जिला स्तर पर लोक शिकायत पदाधिकारी के पास अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। इसकी ऑनलाइन वेबसाइट है: lokshikayat.bihar.gov.in
  3. मुख्यमंत्री जनता दरबार/Portal: बिहार सरकार के ‘Samadhan’ पोर्टल के माध्यम से सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को शिकायत भेजें।
  4. राज्य स्वास्थ्य समिति (State Health Society): आप इनके हेल्पलाइन नंबर 104 (Health Helpline) पर फोन करके भी जानकारी दे सकते हैं।
  5. पुलिस प्रशासन: यदि किसी फर्जी डॉक्टर के कारण जान-माल का नुकसान हुआ है, तो तुरंत संबंधित थाने में धोखाधड़ी और हत्या का प्रयास के धारा के तहत FIR दर्ज कराएं।

जनता की सावधानी और जानकारी ही बचाव का सबसे बड़ा तरीका – 

  • डॉक्टर के पुर्जे पर Registration Number जरूर देखें।
  • किसी भी सर्जरी से पहले अस्पताल का निबंधन प्रमाण पत्र मांगने का हक मरीज को है।
  • ग्रामीण चिकित्सकों (RMP) से सिर्फ प्राथमिक उपचार लें, जटिल बीमारी के लिए हमेशा जिला अस्पताल या मान्यता प्राप्त अस्पताल जाएं।
  • पक्की रसीद: इलाज या दवा का पैसा देने के बाद रसीद जरूर लें। यह आपके पास सबसे बड़ा कानूनी सबूत है।

याद रखें: ग्रामीण चिकित्सक (झोलाछाप) केवल प्राथमिक उपचार के लिए हैं। पेट चीरने वाला ऑपरेशन या सिजेरियन डिलीवरी के लिए हमेशा सरकारी अस्पताल या निबंधित स्पेशियलिटी अस्पताल ही जाएं। आपकी थोड़ी सी अज्ञानता जानलेवा साबित हो सकती है।

निजी अस्पतालों में भी लागू हो अनिवार्य ‘डॉक्टर ड्यूटी रोस्टर’ प्रणाली

जनता की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता लाने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार निजी नर्सिंग होम के लिए कड़े नियम निर्धारित करे। जिस प्रकार सरकारी अस्पतालों में वार्ड और ओपीडी के बाहर एक स्पष्ट ‘रोस्टर चार्ट’ लगा होता है, जिसमें ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक का नाम, उनकी विशेषज्ञता और समय अंकित होता है, ठीक उसी तर्ज पर सभी निजी नर्सिंग होम और क्लीनिकों के मुख्य द्वार पर ‘अनिवार्य चिकित्सक रोस्टर चार्ट’ प्रदर्शित करना कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस चार्ट में केवल उन्हीं डॉक्टरों के नाम हों जो उस समय वास्तव में वहां मौजूद रहकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इससे न केवल बड़े डॉक्टरों के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी और ‘यूट्यूब डॉक्टरों’ के फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी, बल्कि प्रशासन के लिए भी आकस्मिक जांच के दौरान यह पता लगाना आसान होगा कि बोर्ड पर अंकित डॉक्टर वास्तव में मरीज का इलाज कर रहा है या उसकी आड़ में कोई अयोग्य व्यक्ति जान से खिलवाड़ कर रहा है। सरकार को चाहिए कि बिना इस पारदर्शी रोस्टर के संचालित होने वाले नर्सिंग होम पर तत्काल तालाबंदी और भारी जुर्माने का प्रावधान करे।

प्रशासन की ‘खामोशी’ पर चुभते हैं ये सवाल

सकरा की जनता प्रशासन से इन सवालों के जवाब मांगता है:

कमीशन का खेल: क्या स्वास्थ्य विभाग के निचले अधिकारियों और इन अवैध नर्सिंग होम संचालकों के बीच कोई ‘महीना’ (रिश्वत) तय है? यदि नहीं, तो बिना रजिस्ट्रेशन के ये अस्पताल सालों से कैसे चल रहे हैं?

कागजी छापेमारी: जब भी छापेमारी होती है, तो क्लिनिक संचालक पहले ही फरार क्यों हो जाते हैं? विभाग के अंदर वह ‘विभीषण’ कौन है जो इन यमराज के नुमाइंदों को सूचना लीक करता है?

सरकारी डॉक्टरों का दोहरा चरित्र: जो सरकारी डॉक्टर इन प्राइवेट बोर्डों पर अपना नाम चमका रहे हैं, क्या उनके लाइसेंस रद्द करने की हिम्मत जिला प्रशासन जुटा पाएगा?

किडनी कांड से क्या सीखा?: उस कांड के बाद कितने क्लिनिकों का ‘डेथ ऑडिट’ हुआ? क्या प्रशासन सिर्फ किसी नई लाश के गिरने का इंतज़ार कर रहा है ताकि फिर से दो दिन की कागजी खानापूर्ति की जा सके?


यह रिपोर्ट महज कागज के काले अक्षर नहीं हैं, बल्कि सकरा की उस सिसकती स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना है जो चंद रुपयों के लिए किसी की कोख उजाड़ रही है तो किसी का सुहाग छीन रही है। अब फैसला प्रशासन को करना है—वे जनता के रक्षक बनेंगे या इन ‘मुन्नाभाइयों’ के संरक्षक?

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