पटना, 04 अगस्त 2026: बिहार की हज़ारों साल पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने और उसे पर्यटन के नए केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए राज्य सरकार एक विशाल अभियान शुरू करने जा रही है । मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने राज्य के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों—बोधगया, सुल्तानगंज, मंदार और विश्व प्रसिद्ध केसरिया स्तूप के संरक्षण, वैज्ञानिक सर्वेक्षण, उत्खनन और समग्र विकास के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने का कड़ा निर्देश दिया है। सरकार का मुख्य उद्देश्य इन ऐतिहासिक धरोहरों के ऐतिहासिक महत्व को नए सिरे से स्थापित करते हुए इन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बनाना है।
मुख्यमंत्री से देश के वरिष्ठ पुरातत्वविदों एवं विशेषज्ञों के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात कर कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर परिसर तथा आसपास के विशाल क्षेत्रों के विस्तृत सर्वेक्षण की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट सौंपी । प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि मंदिर परिसर में फैले हज़ारों प्राचीन भग्नावशेषों का वैज्ञानिक पद्धति से पुनरुत्स्थापन, संरक्षण और प्रलेखन (डॉक्यूमेंटेशन) किया जा सकता है, जिससे यह संपूर्ण क्षेत्र भारतीय पुरातात्विक धरोहर के एक बेहद महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विश्व पटल पर उभरेगा।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिया कि मां मुंडेश्वरी मंदिर के भग्नावशेषों के संरक्षण और पुनरुत्स्थापन के लिए विशेषज्ञों की सिफारिशों के अनुसार चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार की जाए । इसके साथ ही पूरे क्षेत्र की पर्यटन क्षमता का समग्र विकास किया जाए ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को एक समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अनुभव मिल सके।

बैठक में मौजूद दिग्गज विशेषज्ञ और अधिकारी:
मुख्यमंत्री से मिलने वाले उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल प्रमुख हस्तियाँ:
- पद्मश्री डॉक्टर के के मोहम्मद (विश्व प्रसिद्ध पुरातत्वविद एवं राम जन्मभूमि उत्खनन दल के सदस्य)
- प्रोफेसर डॉक्टर रजत सान्याल (कोलकाता इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर)
- प्रोफेसर अनिल कुमार (मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, बिहार विरासत विकास समिति तथा शांतिनिकेतन के यूनेस्को विश्व धरोहर परियोजना से जुड़े विशेषज्ञ)
- डॉक्टर हरिओम शर्मा (अधीक्षण पुरातत्वविद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण – एएसआई पटना)
- मिहिर कुमार सिंह (विकास आयुक्त)
- प्रणव कुमार (सचिव, कला संस्कृति एवं भवन निर्माण विभाग)

बनेगा नया हेरिटेज एवं इको-टूरिज्म सर्किट:
बैठक में कैमूर क्षेत्र के तिलहाड़ कुंड, करकटगढ़ तथा अन्य प्राकृतिक एवं प्रागैतिहासिक महत्व के स्थलों को एकीकृत रूप से विकसित करने की योजना पर भी विस्तार से चर्चा हुई। ये सभी दर्शनीय स्थल बनारस-कोलकाता एक्सप्रेसवे से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं, जिससे भविष्य में यहाँ पर्यटकों की पहुँच और भी आसान हो जाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक सौंदर्य, प्रागैतिहासिक महत्व और पुरातात्विक संभावनाओं से समृद्ध यह क्षेत्र बिहार के नए हेरिटेज एवं इको-टूरिज्म सर्किट के रूप में उभरेगा । इन स्थलों के वैज्ञानिक संरक्षण और व्यवस्थित विकास के बाद इन्हें भविष्य में यूनेस्को की विश्व धरोहर की सम्भावित सूची में शामिल कराने के लिए भी पुरजोर प्रयास किए जाएंगे।

बिना खुदाई ज़मीन के नीचे के रहस्य खोलेगी लिडार और जीपीआर तकनीक:
मुख्यमंत्री ने बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर और उसके आसपास के क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीक लिडार (लाइट डिटैक्शन एंड रेंजिंग – LiDAR) तथा जीपीआर (ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार – GPR) से वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने के निर्देश दिए हैं। इन अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से बिना ज़मीन की खुदाई किए ही ज़मीन के भीतर मौजूद सम्भावित पुरातात्विक संरचनाओं और अवशेषों की सटीक वैज्ञानिक पहचान की जा सकेगी। इससे भविष्य में किए जाने वाले उत्खनन कार्य बेहद सटीक और प्रभावी होंगे।
सुल्तानगंज, मंदार और केसरिया स्तूप का होगा महा-उत्खनन:
बैठक में सुल्तानगंज और मंदार क्षेत्र के ऐतिहासिक व पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण, समेकन और समग्र विकास पर विशेष बल दिया गया। इसके साथ ही विश्व के सबसे बड़े बौद्ध स्तूपों में शामिल केसरिया स्तूप के शेष बचे हिस्सों का भी पूर्ण वैज्ञानिक उत्खनन कराने का बड़ा निर्देश दिया गया है। अब तक इस विशाल स्तूप का केवल आंशिक उत्खनन ही हुआ है, जबकि इसके एक बड़े हिस्से में अभी भी बेहद महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष छिपे होने की प्रबल संभावना है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में केसरिया स्तूप के उत्खनन और संरक्षण कार्य में पद्मश्री डॉक्टर के के मोहम्मद की मुख्य भूमिका रही है।

मुख्यमंत्री ने ज़ोर देकर कहा कि बिहार की धरती के नीचे आज भी अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरें सुरक्षित छिपी हैं। इनकी वैज्ञानिक पहचान, उत्खनन और संरक्षण से राज्य के इतिहास के अनेक नए स्वर्णिम अध्याय सामने आएंगे। इससे न केवल सांस्कृतिक पर्यटन को नई रफ़्तार मिलेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोज़गार के ढेरों अवसर पैदा होंगे और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी भारी मजबूती मिलेगी।
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