देश की पांच प्राचीन भाषाओं के दिन फिरे! शिक्षा मंत्रालय ने पाँच नए उत्कृष्टता केंद्रों पर लगाई मुहर, अब पाँचों भाषाओं के लिए खुले रिसर्च के सबसे बड़े द्वार!

अनुसंधान, संरक्षण और प्रसार के लिए देश के पाँच राज्यों में बनेंगे सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, प्राचीन विरासत को मिलेगा नया जीवन!

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली: भारत की समृद्ध भाषाई और साहित्यिक विरासत को एक नया जीवन और वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में उच्च शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम उठाया है । केंद्र सरकार ने देश की पाँच प्राचीन और गौरवशाली शास्त्रीय भाषाओं—शास्त्रीय असमिया, शास्त्रीय बांग्ला, शास्त्रीय मराठी, शास्त्रीय पाली और शास्त्रीय प्राकृत—के उन्नत अध्ययन, अनुसंधान और संरक्षण के लिए पाँच नए उत्कृष्टता केंद्रों (सेंटर ऑफ एक्सीलेंस) की स्थापना को आधिकारिक मंजूरी दे दी है । इस बड़े फैसले से देश के शैक्षणिक और साहित्यिक जगत में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है, और प्राचीन भाषाओं के शोध के लिए अब संभावनाओं के सबसे बड़े द्वार खुल गए हैं ।

क्या है इस ऐतिहासिक फैसले का उद्देश्य?

शिक्षा मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इन उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत की अमूल्य भाषाई और साहित्यिक विरासत के अनुसंधान, संरक्षण, डिजिटलीकरण तथा इसके व्यापक प्रसार को पुरजोर तरीके से बढ़ावा देना है । यह पहल इन शास्त्रीय भाषाओं से जुड़े गहन ज्ञान को सहेजने और उसे आधुनिक पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए एक मजबूत संस्थागत सहायता प्रदान करेगी ।

देश के इन पाँच प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों को मिली बड़ी जिम्मेदारी

सरकार ने इन पाँचों उत्कृष्टता केंद्रों को स्थापित करने के लिए देश के चुनिंदा और प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों का चयन किया है, जिनका विवरण इस प्रकार है:

  1. शास्त्रीय असमिया: असम के प्रतिष्ठित तेजपुर विश्वविद्यालय में इस केंद्र की स्थापना की जाएगी, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र की साहित्यिक परंपराओं को और मजबूत करेगा ।
  2. शास्त्रीय बांग्ला: पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक विश्वभारती विश्वविद्यालय को इस केंद्र की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिससे बांग्ला साहित्य और प्राचीन बांग्ला भाषा के शोध को नया आयाम मिलेगा ।
  3. शास्त्रीय मराठी: महाराष्ट्र के पुणे स्थित प्रसिद्ध डेक्कन कॉलेज स्नातकोत्तर एवं अनुसंधान संस्थान (मानद विश्वविद्यालय) में शास्त्रीय मराठी के अध्ययन के लिए उत्कृष्टता केंद्र बनेगा ।
  4. शास्त्रीय पाली: बौद्ध साहित्य और प्राचीन दर्शन से जुड़ी शास्त्रीय पाली भाषा के अध्ययन हेतु ओडिशा के केंद्रीय ओडिशा विश्वविद्यालय का चयन किया गया है ।
  5. शास्त्रीय प्राकृत: जैन आगमों और प्राकृत साहित्य के संरक्षण के लिए गुजरात के केंद्रीय गुजरात विश्वविद्यालय में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित होगा ।

चार प्रमुख स्तंभों पर टिका होगा इन केंद्रों का फोकस

ये सभी उत्कृष्टता केंद्र चार व्यापक और महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पूरी तरह केंद्रित होकर काम करेंगे:

  • अकादमिक अनुसंधान और छात्रवृत्ति को मजबूती: ये केंद्र संबंधित शास्त्रीय भाषाओं में उन्नत शोध, विद्वतापूर्ण कार्यों और उच्च स्तरीय अकादमिक जुड़ाव के लिए एक समर्पित मंच प्रदान करेंगे ।
  • संरक्षण और डिजिटलीकरण: आज के डिजिटल युग में प्राचीन पाण्डुलिपियों और ग्रंथों को बचाए रखने के लिए ये केंद्र भाषाई और साहित्यिक संसाधनों के प्रलेखन, संरक्षण और अत्याधुनिक डिजिटलीकरण का काम संभालेंगे, जिससे भारत की समृद्ध पाठ्य विरासत सदियों तक सुरक्षित रह सकेगी ।
  • शास्त्रीय भाषा विरासत का व्यापक प्रसार: इन केंद्रों के माध्यम से संबंधित शास्त्रीय भाषाओं से जुड़ी भाषाई, साहित्यिक और प्राचीन ज्ञान परंपराओं को आम जनमानस और शोधार्थियों तक आसान पहुँच के साथ प्रसारित किया जाएगा ।
  • क्षेत्रीय शैक्षणिक इको-सिस्टम का सुदृढ़ीकरण: असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, ओडिशा और गुजरात—इन पाँच अलग-अलग राज्यों में इन केंद्रों के फैलने से क्षेत्रीय स्तर पर उच्च शिक्षा, अनुसंधान और छात्रवृत्ति का एक अभूतपूर्व इको-सिस्टम तैयार होगा ।

भविष्य की राह और सांस्कृतिक पुनरुत्थान

शिक्षाविदों और जानकारों का मानना है कि यह कदम केवल भाषाओं के पुनरुद्धार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक जड़ों को और अधिक मजबूत करने का एक दूरदर्शी प्रयास है । उच्च शिक्षा संस्थानों को अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बनाते हुए सरकार का यह कदम देश की प्राचीन थाती को सहेजने में मील का पत्थर साबित होगा ।

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