Wednesday, July 29, 2026

कुरीतियों पर प्रहार: समस्तीपुर में ‘बाल विवाह मुक्ति रथ’ ने पकड़ी रफ़्तार, रोसड़ा और विभूतिपुर में गूंजा जागरूकता का स्वर

समस्तीपुर | 04 फरवरी, 2026

समस्तीपुर जिले को बाल विवाह के कलंक से मुक्त करने के लिए ‘चाइल्ड मैरिज फ्री इंडिया’ (CMFI) अभियान के तहत बाल विवाह मुक्ति रथ का सघन अभियान पूरे उफान पर है। जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र, समस्तीपुर और ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस देशव्यापी ‘एक्सेस टू जस्टिस’ कार्यक्रम ने ग्रामीण इलाकों में जागरूकता का नया संचार किया है।

प्रशासनिक अधिकारियों ने दिखाई हरी झंडी

बुधवार को अभियान के तहत रोसड़ा प्रखंड कार्यालय परिसर में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यहाँ प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) राकेश कुमार ने बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने कहा कि बाल विवाह जैसी कुरीति को जड़ से मिटाने के लिए प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं का यह साझा प्रयास सराहनीय है।

इसके बाद यह रथ विभिन्न पंचायतों और धार्मिक स्थलों पर संदेश प्रसारित करते हुए विभूतिपुर प्रखंड मुख्यालय पहुंचा। वहाँ बीडीओ सुनील कुमार ने रथ का स्वागत किया और इसे आगे के क्षेत्रों के लिए रवाना किया। यह रथ अब जिले के सुदूर गांवों और मोहल्लों में घूम-घूम कर लोगों को इस सामाजिक बुराई के गंभीर परिणामों के प्रति सचेत कर रहा है।

बाल विवाह: केवल अपराध नहीं, भविष्य के साथ अन्याय

इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता सरिता कुमारी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए भावुक अपील की। उन्होंने कहा, बाल विवाह केवल एक कानूनी जुर्म नहीं है, बल्कि यह मासूम बच्चों के सुनहरे भविष्य के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अन्याय है। यह लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार को छीन लेता है।” उन्होंने इस अभियान में जनभागीदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताया।

वहीँ, जिला कार्यक्रम समन्वयक काजल राज ने एक गंभीर पहलू की ओर इशारा करते हुए बताया कि बाल विवाह केवल शादी तक सीमित नहीं है। इस अपराध के पीछे नाबालिग बच्चियों की खरीद-फरोख्त, बाल मजदूरी और बाल तस्करी (ट्रैफिकिंग) जैसे काले कारोबार भी जुड़े होते हैं। उन्होंने जोर दिया कि जब समाज, सामाजिक संगठन और स्थानीय निकाय एक सुर में बोलेंगे, तभी इस बुराई का अंत होगा।

हस्ताक्षर अभियान और शपथ ग्रहण

कार्यक्रम के दौरान एक संकल्प सभा का आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित ग्रामीणों और अधिकारियों ने सामूहिक शपथ ली। लोगों ने संकल्प लिया कि वे:

  • लड़की की शादी 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले नहीं करेंगे।
  • समाज में कहीं भी बाल विवाह की सूचना मिलते ही तुरंत प्रशासन या बचपन बचाओ आंदोलन को सूचित करेंगे।

कार्यक्रम प्रबंधक डॉ. दीप्ति कुमारी ने अभियान की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए ‘त्रिकोणीय संगम’ (सरकार, प्रशासन और समाज) का साथ आना अनिवार्य है। इसके बाद बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने हस्ताक्षर अभियान का हिस्सा बनकर अपनी प्रतिबद्धता जताई।

8 मार्च तक चलेगा विशेष अभियान

जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के वित्त प्रबंधक पप्पू यादव ने जानकारी दी कि यह विशेष जागरूकता रथ 24 जनवरी 2026 से 08 मार्च 2026 (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) तक जिले के सभी प्रखंडों और मोहल्लों का भ्रमण करेगा। कार्यक्रम समन्वयक रवि कुमार मिश्रा ने बताया कि नारों और बाल विवाह निषेध अधिनियम की जानकारी के माध्यम से लोगों को कानूनी परिणामों से भी अवगत कराया जा रहा है।

कार्यक्रम में इनकी रही सक्रिय उपस्थिति: इस अभियान को सफल बनाने में मयंक कुमार सिन्हा, राजीव कुमार साह, रीता कुमारी, बलराम चौरसिया, विभा कुमारी, ललिता कुमारी, सोनाली भगत और रौशन कुमार सहित दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपना सक्रिय योगदान दिया।

गंडक नहर परियोजना: वर्तमान सर्किल रेट पर मुआवजे की मांग को लेकर किसानों ने फूंका बिगुल, 9 फरवरी को ताजपुर प्रखंड मुख्यालय का होगा घेराव

ताजपुर (समस्तीपुर) | 4 फरवरी 2026

तिरहुत-गंडक नहर परियोजना के पुनर्जीवित होने के साथ ही समस्तीपुर जिले के ताजपुर और आसपास के क्षेत्रों में मुआवजे को लेकर संघर्ष तेज हो गया है। दशकों से लंबित इस परियोजना में अपनी जमीन गंवाने वाले किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। बुधवार को अखिल भारतीय किसान महासभा और भाकपा माले की एक संयुक्त जांच टीम ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर किसानों की समस्याओं को सुना और सरकार के खिलाफ आंदोलन का एलान किया।

ताजपुर प्रखंड मुख्यालय पर जमीन के मुआवजा के लिए पहॅुची महिला

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान संकट

गंडक नहर परियोजना, जो तिरहुत मुख्य नहर से निकलकर पूसा, ताजपुर और सरायरंजन की ओर जाती है, इसकी शुरुआत वर्ष 1962-65 के आसपास हुई थी। उस समय भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन कई कारणों से यह परियोजना ‘मृतप्राय’ हो गई थी। ऑडियो क्लिप के अनुसार, उस दौर में कुछ किसानों को तो मुआवजा मिला, लेकिन एक बड़ी संख्या ऐसे किसानों की थी जिनका मुआवजा सरकारी जटिलताओं के कारण ट्रेजरी (खजाना) में ही फंसा रह गया।

अब दशकों बाद जब सरकार ने इस परियोजना पर दोबारा काम शुरू किया है, तो मुआवजे का पुराना जिन्न फिर बाहर आ गया है। जहाँ मुआवजा मिल चुका था, वहाँ काम लगभग पूरा है, लेकिन जहाँ भुगतान लंबित था, वहाँ किसान काम रोककर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

जांच टीम का दौरा और किसानों की व्यथा

बुधवार को किसान महासभा के ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह, राजदेव प्रसाद सिंह, संजीव राय और भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंहप्रभात रंजन गुप्ता ने मोतीपुर, चकहैदर, फतेहपुर और योगियामठ जैसे निर्माण स्थलों का दौरा किया।

बातचीत के दौरान यह तथ्य सामने आया कि संबंधित अधिकारी वर्तमान समय में भी किसानों को उनके पूर्वजों के नाम पर ट्रेजरी में जमा पुरानी राशि ही देना चाहते हैं। किसानों का कहना है कि आज के समय में उस मामूली राशि का कोई मूल्य नहीं है। प्रशासन और किसानों के बीच इसी बात को लेकर गहरा गतिरोध बना हुआ है।

प्रमुख मांगें और आंदोलन की रणनीति

भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि किसान किसी भी कीमत पर पुराना मुआवजा स्वीकार नहीं करेंगे। किसान संघर्ष मोर्चा और माले की संयुक्त टीम ने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:

  • चार गुना मुआवजा: अधिग्रहित जमीन और मकान का वर्तमान सर्किल रेट के आधार पर चार गुना मुआवजा दिया जाए।
  • भूमि बंदोबस्ती: जो किसान इस परियोजना के कारण पूरी तरह भूमिहीन हो रहे हैं, उन्हें सरकार द्वारा अन्यत्र भूमि बंदोबस्ती कर जमीन दी जाए।
  • काम पर रोक: जब तक उचित मुआवजे का ठोस आश्वासन और भुगतान नहीं होता, तब तक नहर निर्माण का कार्य बाधित रहेगा।

9 फरवरी को महा-घेराव का आह्वान

किसान महासभा के प्रखंड अध्यक्ष ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने घोषणा की कि इन मांगों को लेकर 9 फरवरी 2026 को ताजपुर प्रखंड मुख्यालय का ऐतिहासिक घेराव और धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। उन्होंने क्षेत्र के समस्त किसानों, गृहस्वामियों और भूस्वामियों से अपील की है कि वे अपनी हक की लड़ाई के लिए बड़ी संख्या में जुटकर इस आंदोलन को सफल बनाएं।

इस विवाद ने प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अब देखना यह होगा कि सरकार विकास और किसानों के हितों के बीच का रास्ता कैसे निकालती है।

सिलौत- आथर बिन्‍दा रेल मार्ग पुर्नजीवित किए जाने पर मुजफ्फरपुर-दरभंगा नई रेल लाइन की लागत होगी आधी

एस.एस.कुमार ‘पंकज’  

मुजफ्फरपुर/दरभंगा: उत्तर बिहार की हृदयस्थली कहे जाने वाले दो प्रमुख जिलों—मुजफ्फरपुर और दरभंगा—के बीच सीधी रेल सेवा का सपना अब साकार होने के करीब है। वर्ष 2025 में इस परियोजना का फाइनल लोकेशन सर्वे (FLS) पूरा होना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस सर्वे के साथ ही एक ऐसा ऐतिहासिक और तकनीकी तथ्य उभरकर सामने आया है जो रेल मंत्रालय के बजट को 50 से 60 प्रतिशत तक कम कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेलवे प्रशासन मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर रेलखंड पर स्थित सिलौत स्टेशन से आजादी के पूर्व चलने वाली सिलौत-आथर-बिन्दा रेल लाइन को पुनर्जीवित करता है और उसके आगे पुरानी दरभंगा रोड की खाली जमीन का उपयोग करता है, तो यह परियोजना न केवल किफायती होगी बल्कि मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच सीधी रेल सेवा की सबसे बड़ी समस्या ‘भूमि अधिग्रहण’ का स्थायी समाधान भी हो जाएगा ।


परियोजना की सफलता की कुंजी: सिलौत-आथर-बिन्दा मार्ग का पुनरुद्धार

इस पूरी परियोजना की सफलता की कुंजी सिलौत से निकलने वाली पुरानी रेल लाइन में छिपी है। ऐतिहासिक और राजस्व रिकॉर्ड (मुजफ्फरपुर गजेटियर) इसकी पुष्टि करते हैं कि रेलवे के पास यहाँ पहले से ही एक मजबूत आधार मौजूद है।

  • 14 किलोमीटर का तैयार गलियारा: सिलौत स्टेशन से बोचहां ब्लॉक के आथर-बिन्दा गांव तक लगभग 14 किलोमीटर रेल भूमि आज भी रेलवे के नाम पर चर्चा में  है।
  • शून्य अधिग्रहण लागत: मुजफ्फरपुर से सिलौत (12 किमी) तक ट्रैक चालू है। यदि सिलौत से आथर तक की 14 किमी पुरानी जमीन को जोड़ दिया जाए, तो कुल 26 किमी का मार्ग लगभग बिना किसी अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण के तैयार हो जाएगा।
  • विवाद रहित निर्माण: नई जमीन खरीदने पर जहाँ कोर्ट-कचहरी और मुआवजे के विवादों में साल बीत जाते हैं, वहीं अपनी ही जमीन पर रेलवे तत्काल कार्य शुरू कर सकता है।

पुरानी दरभंगा रोड: लागत घटाने का ब्रह्मास्त्र

आथर से आगे की राह और भी आसान हो सकती है यदि रेलवे ‘पुरानी दरभंगा रोड’ की जमीन के विकल्प पर विचार करे। यह इस परियोजना के लिए सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सुझाव है।

  • सरकारी जमीन का सदुपयोग: आथर एवं आथर से आगे बखरी होते हुए पुरानी दरभंगा रोड की जमीन कई किलोमीटर तक बेकार पड़ी है। यह जमीन वर्तमान में एक साधारण सड़क के रूप में उपयोग हो रही है या उपेक्षित है।
  • मैठी टोल प्लाजा तक कनेक्टिविटी: यह सड़क मार्ग आथर से होते हुए सीधे मैठी टोल प्लाजा के पास तक जाता है। यदि इस अलाइनमेंट पर रेल ट्रैक बिछाया जाता है, तो निजी भूमि के अधिग्रहण की आवश्यकता न्यूनतम हो जाएगी।
  • 50% तक रह जाएगी लागत: विशेषज्ञों का अनुमान है कि केवल सिलौत-आथर बिन्दा  मार्ग के उपयोग से, भूमि मुआवजे पर होने वाला खर्च इतना कम हो जाएगा कि परियोजना की कुल लागत अपनी मूल अनुमानित राशि की महज 50 से 60 प्रतिशत रह जाएगी।

यह विकल्प मुजफ्फरपुर-दरभंगा नई लाइन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच सीधी रेल लाइन का निर्माण एक “इंजीनियरिंग चुनौती” से अधिक “भूमि अधिग्रहण चुनौती” है। यह विकल्प तीन कारणों से महत्वपूर्ण है:

  1. आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability): रेलवे के पास सीमित बजट होता है। लागत आधी होने से इस प्रोजेक्ट को रेलवे बोर्ड से तत्काल मंजूरी और फंड मिलना आसान हो जाएगा।
  2. समय की बचत: बिहार में नई जमीन अधिग्रहित करने में औसतन 5 से 10 साल लग जाते हैं। सरकारी और पुरानी रेलवे जमीन मिलने से यह प्रोजेक्ट 3 साल के भीतर धरातल पर उतर सकता है।
  3. विस्थापन का अभाव: नई लाइन बिछाने के लिए घनी आबादी वाले गांवों को उजाड़ना पड़ता है। पुरानी रोड और रेल मार्ग का उपयोग करने से लोगों के घर और उपजाऊ खेत कम-से-कम प्रभावित होंगे।

आथर : मुजफ्फरपुर में औद्योगिक क्रांति की जननी थी यह जमीन

इस मार्ग का इतिहास भारत के औद्योगिक उदय से जुड़ा है। 1836 में बोचहां के विशुनपुर जगदीशपुर (आथर) में अंग्रेज उद्योगपति आर्थर और बटलर ने एक विशाल इकाई लगाई थी।

  • तिरहुत रेल का हिस्सा: 1904-1905 इस्‍वी में सिलौत-आथर मार्ग के विस्तार की चर्चा मिलती है। उस समय उत्तर पश्चिम बंगाल रेलवे ने यहाँ नील और चीनी की ढुलाई के लिए पटरियाँ बिछाई थीं।
  • भारत वैगन की नींव: आज का ‘भारत वैगन’ (मुजफ्फरपुर) असल में आथर की ही फैक्ट्री का विस्तार है जिसे 1877 में शिफ्ट किया गया था। इस मार्ग को पुनर्जीवित करना उस गौरवशाली इतिहास को सम्मान देना होगा।

प्रस्तावित स्टेशनों का ढांचा और विकास की उम्मीद

नई प्रस्तावित लाइन (लगभग 60 से 67 किमी) पर पड़ने वाले स्टेशनों का महत्व इस मार्ग के पुनरुद्धार एवं बदलाव से कई गुना बढ़ जाएगा:

स्टेशन का नामजिलामहत्व और वर्तमान स्थिति
मुजफ्फरपुर जंक्शनमुजफ्फरपुरउत्तर बिहार का सबसे बड़ा जंक्शन
सिलौतमुजफ्फरपुरजंक्शन पॉइंट जहाँ से आथर लाइन अलग होगी
आथर/बखरीमुजफ्फरपुरऐतिहासिक औद्योगिक केंद्र, पुरानी रोड का मिलन स्थल, आगे अन्‍य विकल्‍प    
विद्यारोज/घोसरम्मामुजफ्फरपुरकृषि उपज का बड़ा केंद्र
माधोपुर पंडौलसीमावर्तीमुजफ्फरपुर-दरभंगा का व्यापारिक बॉर्डर
डिलाही/पंडासरायदरभंगालहेरियासराय कोर्ट और स्वास्थ्य केंद्र से जुड़ाव

टापूबन चुके गांवों को नई संजीवनी

आथर और बखरी जैसे गांव जो वर्तमान में बूढ़ी गंडक और खराब सड़क तंत्र के कारण विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं, उनके लिए यह रेल मार्ग एक वरदान होगा। पुरानी दरभंगा रोड की जमीन का उपयोग करने से बखरी और मैठी के आसपास एक नया लॉजिस्टिक हब विकसित हो सकता है।

  • लघु उद्योगों की वापसी: पुरानी रेल जमीन के किनारे फिर से लघु उद्योगों  की स्थापना हो सकती है।
  • सस्ता माल परिवहन: व्यापारियों के लिए मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच माल भेजना 40% तक सस्ता हो जाएगा।

राजनीतिक इतिहास और वर्तमान उम्मीदें

इस रेल मार्ग के लिए संघर्ष दशकों पुराना है।

  • 2008 का वादा: तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने सिंहवाड़ा में इसकी आधारशिला रखी थी, लेकिन पर्याप्त बजट और सटीक सर्वे के अभाव में वह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।
  • 2023-25 का एक्शन मोड: वर्ष 2023 के बजट में पहली बार इसके लिए 20 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। अब FLS का पूरा होना यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार इस बार इसे धरातल पर उतारने के लिए गंभीर है।

सरकार के पास ऐतिहासिक अवसर : सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग  और पुरानी दरभंगा रोड के हिस्‍से में छिपा है कॉस्ट-कटिंगका फॉर्मूला

मुजफ्फरपुर-दरभंगा नई रेल लाइन महज एक रेल पटरी नहीं, बल्कि उत्तर बिहार के खोए हुए औद्योगिक गौरव की वापसी है। यह स्पष्ट है कि सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग को पुनर्जीवित करना न केवल ऐतिहासिक न्याय होगा, बल्कि यह इस प्रोजेक्ट को इकोनॉमिकली वायबल (आर्थिक रूप से व्यावहारिक) बनाने का एकमात्र तार्किक रास्ता है ।  आथर से बखरी एवं मैठी तक  पुरानी  दरभंगा रोड  की अनुपयोगी जमीन को इसमें शामिल करने का विकल्‍प, इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने का एक महत्‍वपूर्ण बिन्‍दु बन सकता है ।

रेल मंत्रालय सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग  की अपनी 14 किलोमीटर पुरानी जमीन को ढूंढ निकालता है, तो बजट में अरबों की बचत होगी और निर्माण कार्य में लगने वाला समय भी काफी कम हो जाएगा। आने वाले समय में  रेल मंत्रालय अपनी 14 किलोमीटर पुरानी जमीन और राज्य सरकार की अनुपयोगी सड़क की भूमि को चिन्हित कर ले, तो बजट में अरबों की बचत होगी। अब गेंद केंद्र और राज्य सरकार के पाले में है—क्या वे महंगे अधिग्रहण की ओर जाएंगे या अपनी ही पुरानी विरासत का हाथ थामकर लागत को आधा करेंगे?

बीड़ी श्रमिक परिवारों की महिलाएं सीख रहीं आत्मनिर्भरता का गुर, सिलाई प्रशिक्षण केंद्र का सचिव ने किया मुआयना

सरायरंजन, समस्तीपुर (03 फरवरी, 2026):

समस्तीपुर जिले के सरायरंजन प्रखंड अंतर्गत खालिसपुर गांव की अल्पसंख्यक बस्ती में आज एक नई उम्मीद की किरण देखी गई। यहाँ बीड़ी निर्माण कार्य में लगे श्रमिक परिवारों की महिलाओं को वैकल्पिक रोजगार से जोड़ने के लिए संचालित सिलाई प्रशिक्षण केंद्र का जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के सचिव, सुरेंद्र कुमार ने औचक निरीक्षण किया।

सिलाई प्रशिक्षण प्राप्‍त कर रही महिलायें

इस दौरान उन्होंने प्रशिक्षण ले रही महिलाओं और किशोरियों से बातचीत की और उनके द्वारा बनाए जा रहे कपड़ों की बारीकियों को समझा। इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य उन परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है जो पीढ़ियों से बीड़ी बनाने के जोखिम भरे कार्य में लगे हैं।

अखबार के जरिए सीखी जा रही है कटिंग की बारीकियां

निरीक्षण के दौरान यह दिलचस्प नजारा देखने को मिला कि सीखने वाली महिलाएं सीधे कपड़े पर कैंची चलाने के बजाय पहले समाचार पत्रों (अखबारों) का उपयोग कर रही हैं। प्रशिक्षिका ने बताया कि अखबार पर कटिंग का अभ्यास करने से कपड़े की बर्बादी नहीं होती और महिलाएं निडर होकर सही माप और आकार काटना सीख पाती हैं। चित्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि महिलाएं जमीन पर बैठकर पूरी एकाग्रता के साथ अखबारों को कपड़ों के पैटर्न के रूप में काट रही हैं।

सिलाई प्रशिक्षण प्राप्‍त कर रही महिलायें

ट्रेनिंग में सिखाई जा रही हैं तकनीकी बारीकियां

प्रशिक्षण के दौरान महिला ट्रेनर ने महिलाओं को सिलाई की गहरी तकनीकी जानकारी साझा की। प्रशिक्षण में ‘कली’ और ‘नेफा’ जोड़ने की प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया जा रहा है:

  • सटीक माप: प्रशिक्षिका ने बताया कि कमर की पट्टी काटने के बाद कली को साढ़े पांच इंच (5.5″) पर काटा जा रहा है।
  • नेफा जोड़ने का सही तरीका: ट्रेनर ने समझाया कि नेफा हमेशा उल्टी पट्टी (उल्टा हिस्सा) की तरफ से जोड़ा जाता है, ताकि उसे पलटने पर वह बिल्कुल सीधा और फिनिशिंग के साथ नजर आए। यदि इसे सीधे में जोड़ा जाए तो वह उल्टा हो जाएगा।
  • कुर्ती निर्माण की प्रक्रिया: सिलाई को अंतिम रूप देने के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पहले बाजू (आस्तीन) बनाई जाती है, फिर घेरा लगाया जाता है और अंत में गोलाई के साथ मोड़कर कुर्ती तैयार की जाती है।

वैकल्पिक रोजगार से बदलेगी तस्वीर

निरीक्षण के बाद जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के सचिव सुरेंद्र कुमार ने कहा, “बीड़ी श्रमिक परिवारों की महिलाओं के पास कौशल की कमी नहीं है, बस उन्हें सही दिशा देने की जरूरत है। सिलाई प्रशिक्षण से ये महिलाएं न केवल अपने परिवार के कपड़े खुद सिल सकेंगी, बल्कि बाजार से जुड़कर अपनी आय का एक नया और सम्मानजनक जरिया भी बना सकेंगी।”

मौके पर मौजूद प्रशिक्षुओं में भारी उत्साह देखा गया। उनका मानना है कि बीड़ी बनाने के काम में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम अधिक हैं, ऐसे में सिलाई एक सुरक्षित और बेहतर विकल्प है।

समस्तीपुर में बाल विवाह के विरुद्ध महाभियान: मोरवा और ताजपुर से ‘मुक्ति रथ’ रवाना, कुरीतियों को मिटाने की ली शपथ

समस्तीपुर | 03 फरवरी, 2026

बिहार को सामाजिक कुरीतियों से मुक्त करने की दिशा में समस्तीपुर जिला एक बार फिर मिसाल पेश कर रहा है। ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ के संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए जिले के मोरवा और ताजपुर प्रखंडों में जन-जागरूकता का शंखनाद किया गया। जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र, समस्तीपुर द्वारा ‘एक्सेस टू जस्टिस’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ के सहयोग से आयोजित इस अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक नई चेतना जगा दी है।

बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखा रवाना करते ताजपुर प्रखंड के  बीडीओ रवि भूषण

प्रखंड विकास पदाधिकारियों ने दिखाई हरी झंडी

मंगलवार को मोरवा और ताजपुर प्रखंड मुख्यालयों में उत्साह का माहौल रहा। मोरवा प्रखंड कार्यालय परिसर में प्रखंड विकास पदाधिकारी (बी‍डीओ) अरुण कुमार निराला ने बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बाल विवाह न केवल एक कानूनी अपराध है, बल्कि यह बच्चों के सुनहरे भविष्य और उनके स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ है।

वहीं, ताजपुर प्रखंड में बीडीओ रवि भूषण ने रथ को रवाना करते हुए प्रशासनिक प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाल विवाह निषेध अधिनियम का सफल कार्यान्वयन तभी संभव है जब इसमें जनता की सक्रिय भागीदारी हो। उन्होंने ‘जन-जागरण’ को इस कुरीति पर विजय पाने का सबसे प्रभावी हथियार बताया।

मोरवा प्रखंड विकास पदाधिकारी अरुण कुमार निराला बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखाते

24 जनवरी से 8 मार्च तक चलेगा जागरूकता का रथ

जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के कार्यकर्ता पप्पू यादव ने अभियान की रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि यह रथ केवल एक वाहन नहीं, बल्कि बदलाव का दूत है। यह यात्रा 24 जनवरी से शुरू हुई है और 8 मार्च (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) तक जिले के सुदूर गांवों, मोहल्लों और धार्मिक स्थलों तक पहुँचेगी। इसका मुख्य उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक बाल विवाह के दुष्प्रभावों की जानकारी पहुँचाना है।

शपथ और हस्ताक्षर अभियान: समाज ने थामी जिम्मेदारी

कार्यक्रम के दौरान एक मार्मिक दृश्य तब देखने को मिला जब उपस्थित जनसमूह ने एक साथ स्वर मिलाकर शपथ ली। लोगों ने संकल्प लिया कि:

“हम समाज में लड़की की 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष से पहले शादी नहीं होने देंगे। यदि हमें कहीं भी बाल विवाह की सूचना मिलती है, तो हम तत्काल इसकी जानकारी प्रशासन को देंगे।”

शपथ ग्रहण के बाद डॉ. दीप्ति कुमारी ने बाल विवाह रोकथाम की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कम उम्र में विवाह से लड़कियां शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य से वंचित रह जाती हैं। इसके बाद उपस्थित नागरिकों ने हस्ताक्षर कर इस अभियान के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का आह्वान

सामाजिक कार्यकर्ता सरिता कुमारी ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे समस्तीपुर के लिए गौरव की बात बताया। उन्होंने कहा कि जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र द्वारा संचालित यह रथ गांव-गांव जाकर लोगों की सोच बदलने का कार्य कर रहा है। वक्ताओं ने सामूहिक रूप से बाल अधिकारों की रक्षा और सुरक्षित बचपन के लिए एकजुट होने पर जोर दिया।

इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति

इस अभियान को सफल बनाने में पिंकेश कुमार, कार्यक्रम प्रबंधक डॉ. दीप्ति कुमारी, मयंक कुमार सिन्हा, राजीव कुमार साह, दिनेश प्रसाद चौरसिया, वीभा कुमारी, माजदा खारुन, रवि कुमार मिश्रा, सुरेंद्र प्रसाद सिंह और विनोद कुमार गुप्ता सहित दर्जनों कार्यकर्ताओं और गणमान्य नागरिकों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नारों और संकल्पों के गूंजते स्वर के साथ रवाना हुआ यह रथ अब जिले की हर पंचायत में बाल विवाह के खिलाफ प्रतिरोध की नई मशाल जलाएगा।

पुरखों के संघर्ष और शिक्षा की मशाल: डॉ. राजेश ने कला के माध्यम से जगाई सामाजिक चेतना

मुजफ्फरपुर/समस्तीपुर। संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज की 649वीं जयंती के शुभ अवसर पर उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों में वैचारिक पुनर्जागरण की एक नई लहर देखने को मिली। इस अवसर पर प्रखर वक्ता और समाजसेवी डॉ. राजेश कुमार ने मुजफ्फरपुर के सकरा और तुर्की प्रखंड सहित समस्तीपुर जिले के नाजीरगंज और हाजीपुर के विभिन्न क्षेत्रों में सघन दौरा किया। उन्होंने न केवल गुरु रविदास जी को नमन किया, बल्कि कला, झांकी और गीतों के माध्यम से समाज को उनके गौरवशाली किंतु संघर्षपूर्ण इतिहास से रूबरू कराया।

गले में हांडी डालकर झांकी प्रस्तुत करते डॉ. राजेश कुमार

इतिहास का जीवंत चित्रण: “क्यों बांधा गया कमर में झाड़ू?”

आयोजन के दौरान डॉ. राजेश ने एक विशेष झांकी प्रस्तुत की, जो वहां मौजूद जनसमूह के लिए आकर्षण और आत्मचिंतन का केंद्र बनी रही। उन्होंने अत्यंत भावुक और तार्किक ढंग से उन कुरीतियों की व्याख्या की, जो सदियों पहले उनके पूर्वजों पर थोपी गई थीं:

  • गले में हांडी (कटिया): उन्होंने बताया कि एक समय था जब तथाकथित अछूत माने जाने वाले लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर थूकने तक की अनुमति नहीं थी, उन्हें गले में बर्तन (कटिया) लटकाना पड़ता था।
  • कमर में झाड़ू: मार्ग पर चलते समय पैरों के निशान मिटाने के लिए कमर में झाड़ू बांधनी पड़ती थी, ताकि धरती “अपवित्र” न हो।
  • पैरों में घुंघरू: डॉ. राजेश ने समझाया कि पैरों में घुंघरू इसलिए बांधे गए थे ताकि उनकी आहट सुनकर “उच्च वर्ग” के लोग अपना रास्ता बदल लें और उनकी छाया से बच सकें।

इस कला प्रदर्शन का उद्देश्य समाज को यह अहसास दिलाना था कि आज वे जिस आजादी और सम्मान की सांस ले रहे हैं, उसके पीछे उनके पूर्वजों का कितना बड़ा बलिदान और अपमान रहा है।

शिक्षा: विकास की एकमात्र कुंजी

डॉ. राजेश कुमार  ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रसिद्ध मूलमंत्र— शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो”—पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कार्यक्रम  को संबोधित करते हुए कहा कि गुलामी की बेड़ियों को काटने का एकमात्र हथियार “शिक्षा” है।

उन्होंने डॉ. अंबेडकर के शब्दों को दोहराते हुए कहा, शिक्षा उस शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा, वह दहाड़ेगा”। उन्होंने समाज के हर वर्ग, विशेषकर वंचित समाज से अपील की कि वे अपने बच्चों की शिक्षा के साथ किसी भी कीमत पर समझौता न करें।

कार्यक्रम को संबोधित करते डॉ. राजेश कुमार

नारा: “आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे”

कार्यक्रम के अंत में उन्होंने बच्चों और अभिभावकों में जोश भरते हुए प्रेरक नारे लगवाए। उन्होंने कहा, नोन-रोटी खाएंगे, फिर भी स्कूल जाएंगे” और आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे”। डॉ. राजेश का स्पष्ट संदेश था कि यदि समाज को देश और दुनिया के मुख्यधारा में शामिल होना है, तो उसे अपनी आने वाली पीढ़ी को उच्च शिक्षा से लैस करना ही होगा।

सांस्कृतिक और वैचारिक समागम

तस्वीरों में देखा जा सकता है कि मंच पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे ढोलक और तबले के साथ स्थानीय कलाकारों ने भक्ति और वैचारिक गीतों की प्रस्तुति दी। डॉ. राजेश खुद एक हाथ में लाठी और गले में प्रतीकात्मक ‘कटिया’ लेकर मंच पर खड़े होकर समाज को जागृत करते नजर आए।

यह कार्यक्रम केवल एक जयंती समारोह न रहकर, एक वैचारिक पाठशाला बन गया, जिसने लोगों को अपने अतीत पर गर्व करने और भविष्य को शिक्षा के माध्यम से उज्ज्वल बनाने की प्रेरणा दी।

विशेष विश्लेषण: बाल बजट 2026-27 में 16,164 करोड़ की बढ़ोतरी, लेकिन विशेषज्ञों ने ‘सीमित’ निवेश पर जताई चिंता

जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र और क्राईने बजट का किया त्वरित विश्लेषण; जीडीपी में बाल बजट की हिस्सेदारी अभी भी 0.34 प्रतिशत पर सिमटी

समस्तीपुर/पटना | 02 फरवरी, 2026 केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए आम बजट 2026-27 पर बच्चों के अधिकारों के लिए समर्पित संस्थाओं ने अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया दी है। समस्तीपुर में बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए पिछले 30 वर्षों से सक्रिय संस्था जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र और राष्ट्रीय संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने बजट को एक ‘सकारात्मक संकेत’ तो बताया है, लेकिन साथ ही निवेश की गति पर सवाल भी उठाए हैं।

आंकड़ों की जुबानी: बढ़ोतरी तो हुई पर क्या है पर्याप्त?

संस्था द्वारा किए गए बजट विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2026-27 के लिए बच्चों से संबंधित कुल आवंटन 1,32,296.85 करोड़ रुपये रहा है। यदि इसकी तुलना पिछले वित्त वर्ष (2025-26) के 1,16,132.5 करोड़ रुपये से की जाए, तो इसमें 16,164.35 करोड़ रुपये की सीधी वृद्धि देखी गई है।

जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के सचिव सुरेंद्र कुमार ने बजट पर चर्चा करते हुए कहा, “आंकड़ों में बढ़ोतरी स्पष्ट है, लेकिन यह विकास के बड़े बदलाव के बजाय क्रमिक प्रगति (Incremental Progress) का संकेत देती है। कुल केंद्रीय बजट में बच्चों की हिस्सेदारी अब भी मात्र 2.47 प्रतिशत है, जबकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बच्चे हैं। भारत सरकार की स्पष्ट दृष्टि सराहनीय है, लेकिन प्राथमिकताएं अभी भी सीमित दायरे में हैं।”

स्वास्थ्य और पोषण: जल जीवनकी वापसी और पोषण 2.0 का सहारा

इस बजट में बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण को लेकर कुछ ठोस कदम उठाए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जल जीवन मिशन को फिर से बाल बजट का हिस्सा बनाया गया है, जिसके लिए 6,736.36 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छ पेयजल सीधे तौर पर बच्चों की मृत्यु दर को कम करने और उनके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होगा।

वहीं, सरकार की प्रमुख योजना सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0′ के बजट में 5.19 प्रतिशत की वृद्धि कर इसे 19,635 करोड़ रुपये कर दिया गया है। पीएम पोषण शक्ति निर्माण योजना (मिड-डे मील) को भी 2 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 12,749.99 करोड़ रुपये मिले हैं। इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों में कुपोषण की समस्या को जड़ से मिटाना है।

शिक्षा और नवाचार: आदिवासी क्षेत्रों पर विशेष ध्यान

शिक्षा के क्षेत्र में इस बार मिश्रित रुझान देखने को मिला है। समग्र शिक्षा अभियान को 42,100 करोड़ रुपये का आवंटन मिला है, जो पिछले वर्ष से 2.06 प्रतिशत अधिक है। सबसे बड़ी राहत आदिवासी बच्चों के लिए आई है, जहां एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के बजट में 20 प्रतिशत से अधिक की भारी बढ़ोतरी कर इसे 7,200 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

नवाचार के क्षेत्र में अटल टिंकरिंग लैब्स के लिए 3,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो सरकारी स्कूलों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। साथ ही, ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम को बाल बजट में शामिल करना ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (NEP) के लक्ष्यों के अनुरूप है।

हाशिए पर खड़े समुदायों की अनदेखी?

क्राई की सीईओ पूजा मारवाहा ने अपनी प्रतिक्रिया में संतुलित निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “स्वास्थ्य और शिक्षा में बढ़ोतरी स्वागत योग्य है, लेकिन समावेशी विकास के लिए बच्चों को और अधिक स्पष्ट प्राथमिकता देनी होगी।”

बजट विश्लेषण में यह चिंता भी जताई गई है कि अनुसूचित जाति (SC) के बच्चों के लिए प्री और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्तियों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इसी तरह ओबीसी, ईबीसी और दिव्यांग बच्चों की छात्रवृत्तियों में भी नाममात्र का इजाफा हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक समानता पर केंद्रित योजनाओं को पर्याप्त संसाधन नहीं मिलेंगे, तब तक हाशिए पर रहने वाले बच्चों का मुख्यधारा में आना कठिन होगा।

दीर्घकालिक सोच की जरूरत : कुल मिलाकर, बाल बजट 2026-27 यह दर्शाता है कि सरकार बच्चों के प्रति संवेदनशील तो है, लेकिन निवेश के मामले में अभी भी “सुरक्षित” रास्ता अपना रही है। यदि भारत को अपनी ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (Demographic Dividend) का लाभ उठाना है, तो आने वाले वर्षों में बाल बजट को जीडीपी के 1 प्रतिशत तक ले जाने और वित्तीय योजनाओं के केंद्र में बच्चों को मजबूती से रखने की आवश्यकता होगी।

बाल बजट 2026-27: मुख्य आंकड़ों का तुलनात्मक विवरण

नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष बच्चों के कल्याण के लिए आवंटित बजट में किस तरह का बदलाव आया है:

योजना/क्षेत्रबजट 2025-26 (अनुमान)बजट 2026-27 (अनुमान)वृद्धि (प्रतिशत/राशि)
कुल बाल बजट (Total Child Budget)₹1,16,132.50 करोड़₹1,32,296.85 करोड़₹16,164.35 करोड़ (↑)
बजट में कुल हिस्सेदारी2.29%2.47%0.18% की वृद्धि
सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0₹18,666 करोड़₹19,635 करोड़5.19% की वृद्धि
समग्र शिक्षा अभियान₹41,250 करोड़₹42,100 करोड़2.06% की वृद्धि
एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय₹6,000 करोड़₹7,200 करोड़20% की वृद्धि
पीएम पोषण (मिड-डे मील)₹12,500 करोड़₹12,749.99 करोड़2% की वृद्धि
अटल टिंकरिंग लैब्स₹3,200 करोड़नया बड़ा आवंटन
मिशन वात्सल्य₹1,500 करोड़₹1,550 करोड़3.33% की वृद्धि

विशेषज्ञों की राय: विकास की सुस्त रफ्तार

जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के अनुसार, बजट के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर कुछ महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर सामने आते हैं:

  1. जीडीपी में मामूली बढ़त: बच्चों के लिए जीडीपी का आवंटन पिछले साल के 0.33% से बढ़कर इस साल 0.34% हुआ है। यह 0.01% की बढ़ोतरी दर्शाती है कि बच्चों पर निवेश अभी भी राष्ट्रीय प्राथमिकता की सूची में बहुत नीचे है।
  2. सुरक्षित पेयजल पर ध्यान: ‘जल जीवन मिशन’ के लिए ₹6,736.36 करोड़ का प्रावधान यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि बच्चों को पानी से होने वाली बीमारियों से बचाया जा सके।
  3. समानता का अभाव: विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि जहाँ एकलव्य विद्यालयों के लिए बजट बढ़ा है, वहीं अनुसूचित जाति और दिव्यांग बच्चों की छात्रवृत्ति योजनाओं में कोई खास हलचल नहीं हुई है।

अंतिम संदेश: सरकार ने कदम तो आगे बढ़ाए हैं, लेकिन बच्चों की वास्तविक जरूरतों को देखते हुए ये कदम अभी भी ‘छोटे’ हैं। टिकाऊ भविष्य के लिए ‘बाल बजट’ में बड़े और साहसी निवेश की आवश्यकता है।

सकरा: मदरसतुल इस्लामिया में वार्षिक उत्सव का आयोजन, मेधावी छात्रों पर हुई इनामों की बारिश

सकरा, मुजफ्फरपुर: शिक्षा केवल किताबी ज्ञान का नाम नहीं है, बल्कि यह व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का माध्यम है। इसी उद्देश्य को सार्थक करते हुए , सकरा फरीदपुर स्थित मदरसतुल इस्लामिया के प्रांगण में एक भव्य वार्षिक कार्यक्रम और पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर न केवल मदरसे के शैक्षणिक परिणामों की घोषणा की गई, बल्कि छात्रों ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।

सालाना इम्तिहान के परिणामों की घोषणा

कार्यक्रम की शुरुआत मदरसे के वार्षिक शैक्षणिक प्रतिवेदन के साथ हुई। बताया गया कि हाल ही में मदरसतुल इस्लामिया और क्षेत्र के एक अन्य मकतब के बच्चों का सालाना इम्तिहान लिया गया था। इस परीक्षा में बच्चों ने कड़ी मेहनत की थी, जिसका सुखद परिणाम कल सबके सामने आया। परीक्षा में अव्वल आने वाले छात्रों के नामों की घोषणा होते ही पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

सांस्कृतिक और शैक्षणिक प्रदर्शन

पुरस्कार वितरण से पूर्व एक रंगारंग शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें छात्रों ने अपनी कला और ज्ञान का मुजाहिरा पेश किया:

  • धार्मिक प्रस्तुति: छात्रों ने अत्यंत सुरीले अंदाज में नात-ए-पाक पढ़ी और कुरान व हदीस की रोशनी में जीवन के मूल्यों को साझा किया।
  • भाषाई कौशल: जहाँ एक ओर छात्रों ने उर्दू में प्रभावशाली तकरीरें (भाषण) दीं, वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी भाषा में ‘स्पीच’ देकर यह साबित कर दिया कि वे आधुनिक शिक्षा की दौड़ में भी पीछे नहीं हैं।

सम्मानित हुए भविष्य के सितारे

समारोह का मुख्य आकर्षण पुरस्कार वितरण रहा। कक्षा में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले मेधावी छात्रों को मंच पर बुलाकर इनामात और विशिष्ट मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया। इसके अलावा, सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करने वाले बच्चों को भी पुरस्कृत किया गया।

अतिथियों का संदेश

मंच पर क्षेत्र के कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। सकरा मदरसा के उस्ताद जनाब कमर आलम साहब और मौलाना वसीम साहब ने बच्चों की हौसला अफजाई की। मदरसा कमेटी के सदर (अध्यक्ष) जसीम अहमद, सेक्रेटरी अनवर साहब, खजांची इम्तियाज साहब और सदस्य शमशाद साहब ने सफल आयोजन के लिए प्रबंधन की सराहना की।

विशिष्ट अतिथियों में बलिराम हाई स्कूल के सेवानिवृत्त क्लर्क जनाब मुस्तकीम साहब और जनाब नसीम अहमद साहब ने शिरकत की। उन्होंने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि आज के युग में शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है और बच्चों को दीनी तालीम के साथ-साथ दुनियावी शिक्षा में भी महारत हासिल करनी चाहिए ताकि वे समाज के जिम्मेदार नागरिक बन सकें।

समापन

कार्यक्रम के अंत में मदरसे के शिक्षकों और कमेटी के सदस्यों ने सभी अभिभावकों का आभार व्यक्त किया। आयोजन का समापन सामूहिक दुआ के साथ हुआ, जिसमें देश में शांति, प्रगति और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई। यह कार्यक्रम क्षेत्र में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

“वोटिंग के लिए बढ़ सकता है समय, तो परीक्षा के लिए क्यों नहीं? समस्तीपुर में जाम और मौसम की मार झेल रहे छात्रों को गेट से लौटाना अन्याय: सुरेंद्र प्रसाद सिंह”

नियमों की बेड़ियाँ या भविष्य से खिलवाड़? चंद मिनटों की देरी पर परीक्षार्थियों के सपने चकनाचूर, आइसा ने की दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग

समस्तीपुर: बिहार में चल रही बोर्ड परीक्षाओं के दौरान समस्तीपुर सहित विभिन्न जिलों से शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनहीनता की विचलित करने वाली खबरें सामने आ रही हैं। ताजा घटनाक्रम में, मात्र 2 से 5 मिनट की देरी से परीक्षा केंद्र पहुँचने वाले छात्र-छात्राओं को प्रवेश से वंचित कर दिया गया, जिसके बाद परीक्षा केंद्रों के बाहर अफरा-तफरी और चीख-पुकार का माहौल देखा गया।

समस्तीपुर में पैदल पथ ब्रिज पर जाम की तस्‍वीर

इस गंभीर मुद्दे पर छात्र संगठन आइसा (AISA) के जिला प्रभारी एवं भाकपा माले जिला स्थाई समिति सदस्य सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने इसे परीक्षार्थियों के भविष्य के साथ क्रूर खिलवाड़ करार दिया है।


मानवता और व्यवहारिकता को ताक पर रख रहा प्रशासन

सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि समस्तीपुर जिले में जाम की समस्या विकराल है। भोला टॉकीज, मुक्तापुर, अटेनरा चौक जैसे रेलवे गुमती और समस्तीपुर ओवरब्रिज पर अक्सर जाम की स्थिति बनी रहती है। इसके साथ ही अचानक खराब हुए मौसम ने परीक्षार्थियों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। सिंह ने तर्क दिया कि यदि 5 बजे समाप्त होने वाली वोटिंग को विशेष परिस्थितियों में रात 7-8 बजे तक कराया जा सकता है, तो परीक्षार्थियों के लिए नियमों में थोड़ी लचीलापन क्यों नहीं दिखाई जा सकती?

सिंह ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा:

“नियम-कानून अपनी जगह हैं, लेकिन मानवता और व्यवहारिकता भी कोई चीज होती है। जब पुलिस और न्यायालय भी जरूरत पड़ने पर नियमों को शिथिल करते हैं, तो शिक्षा विभाग बच्चों के प्रति इतना कठोर कैसे हो सकता है?”


सड़कों पर सिसकियां: ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के नारे पर सवाल

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और तस्वीरों में देखा जा सकता है कि छात्राएं परीक्षा केंद्र के गेट पर तैनात मजिस्ट्रेट और सुरक्षाकर्मियों के पैर पकड़कर गिड़गिड़ा रही हैं, लेकिन उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई। कई परीक्षार्थी रोते-बिलखते केंद्र से वापस लौटे। आइसा नेता ने कहा कि सरकार एक ओर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देती है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन की इस तानाशाही से बच्चों के वर्षों के परिश्रम पर पल भर में पानी फेर दिया गया। यह स्थिति परीक्षार्थियों के लिए मानसिक रूप से घातक और मरणासन्न कर देने वाली है।

मजबूरी में गेट फांदकर प्रवेश करती छात्रा

आइसा की प्रमुख मांगें:

छात्र संगठन ने इस मामले में राज्य सरकार और जिला प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग करते हुए निम्नलिखित बिंदु रखे हैं:

  • दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: उन मजिस्ट्रेटों और सेंटर सुपरिटेंडेंटों की जांच की जाए जिन्होंने अड़ियल रुख अपनाते हुए बच्चों को प्रवेश से रोका।
  • पुनर्परीक्षा का आयोजन: जिन छात्रों की परीक्षा मात्र चंद मिनटों की देरी के कारण छूट गई है, उनके भविष्य को देखते हुए विशेष पुनर्परीक्षा आयोजित की जाए।
  • नियमों में ढील: भविष्य में जाम या खराब मौसम जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए केंद्र पर पहुँचने के समय को थोड़ा लचीला बनाया जाए।

साथ ही, सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने अभिभावकों और छात्रों से भी अपील की है कि वे प्रशासन की संवेदनहीनता को देखते हुए समय से काफी पहले केंद्रों पर पहुँचने का प्रयास करें ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।

शोषितों की आवाज थे ‘बिहार के लेनिन’ बाबू जगदेव प्रसाद, केशोपुर में जयंती पर उमड़ा जनसैलाब

सकरा (मुजफ्फरपुर)। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड अंतर्गत केशोपुर स्थित मिथिला आनंद जागरण धाम के पावन प्रांगण में अमर शहीद बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा की जयंती समारोह का अत्यंत गरिमामय और भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर सामाजिक चेतना, समानता और शोषित-वंचित समाज के अधिकारों के लिए उनके द्वारा किए गए संघर्षों को याद किया गया। समारोह में उपस्थित प्रबुद्ध जनों और भारी संख्या में आए ग्रामीणों ने उन्हें ‘बिहार के लेनिन’ की उपाधि से विभूषित करते हुए उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्‍प दोहराया।

वैचारिक क्रांति के जनक को भावभीनी श्रद्धांजलि

समारोह का विधिवत शुभारंभ बाबू जगदेव प्रसाद के चित्र पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इस दौरान पूरा परिसर “बाबू जगदेव प्रसाद अमर रहें” के गगनभेदी नारों से गुंजायमान रहा। वक्ताओं ने उनके जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जगदेव बाबू महज एक नेता नहीं, बल्कि एक युगपुरुष और वैचारिक क्रांति के जनक थे। उन्होंने उस दौर में दबे-कुचले वर्गों को सत्ता और सम्मान में हिस्सेदारी दिलाने की बात की, जब पिछड़ों और वंचितों की आवाज को दबाया जाता था। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।

‘सौ में नब्बे शोषित हैं’ के नारे की गूँज

विद्वान वक्ताओं ने वैचारिक विमर्श के दौरान जोर दिया कि जगदेव बाबू किसी जाति विशेष के नेता नहीं थे। वे हर उस व्यक्ति की आवाज थे जो व्यवस्था द्वारा शोषित था। उनके द्वारा दिया गया ऐतिहासिक नारा— सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है” —आज भी सामाजिक न्याय की लड़ाई का सबसे बड़ा घोषणापत्र बना हुआ है। वक्ताओं ने कहा कि उनके द्वारा जगाई गई सामाजिक न्याय की अलख आज भी करोड़ों लोगों का मार्ग प्रशस्त कर रही है और वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में उनके विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।

सत्ता और संसाधनों में भागीदारी पर प्रमुख संबोधन

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ग्राम केशोपुर के मुखिया सह मुखिया संघ के अध्यक्ष दिनेश पुष्पम ने कहा कि बाबू जगदेव प्रसाद का बलिदान हमें समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकार पहुँचाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने पंचायत स्तर पर भी उनके सिद्धांतों को लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सकरा जदयू प्रखंड अध्यक्ष साधु शरण कुशवाहा ने अपने संबोधन में कहा कि बाबू जगदेव जी ने सत्ता और संसाधनों में पिछड़ों और दलितों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक समाज में संसाधनों का समान वितरण नहीं होगा, तब तक जगदेव बाबू का सपना अधूरा रहेगा। वहीं, ऑल इंडिया कांग्रेस सोशल ऑर्गनाइजेशन के जिला प्रभारी अनिल मल्लिक ने युवा पीढ़ी से संवाद करते हुए कहा कि आज के युवाओं को सोशल मीडिया के दौर में जगदेव बाबू के साहित्य और उनके संघर्षों को गहराई से पढ़ना चाहिए ताकि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग हो सकें।

महिलाओं की भागीदारी और गणमान्य अतिथियों की गरिमा

समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में जिला परिषद सदस्य अनिल कुशवाहा और शशि गुप्ता ने भी अपने विचार साझा किए। ऑल इंडिया कांग्रेस सोशल ऑर्गनाइजेशन की महिला जिला अध्यक्ष ममता जायसवाल ने महिलाओं के दृष्टिकोण से जगदेव बाबू के विचारों की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि शोषित समाज का विकास तब तक संभव नहीं है जब तक महिलाओं की सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित न हो। कार्यक्रम का सफल संचालन संतोष कुशवाहा द्वारा किया गया, जिन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से दर्शकों में उत्साह भरे रखा।

समरसता और संकल्प के साथ समापन

आयोजन के अंत में एक विशेष प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें समाज से जातिगत भेदभाव मिटाने और एक समतामूलक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम का समापन सामूहिक राष्ट्रगान और शहीद जगदेव बाबू के सम्मान में नारों के साथ हुआ। इस अवसर पर स्थानीय प्रबुद्ध जनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सैकड़ों की संख्या में ग्रामीणों ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम को सफल बनाया। यह आयोजन न केवल एक जयंती समारोह था, बल्कि सामाजिक न्याय की विरासत को आगे बढ़ाने का एक जीवंत संकल्प पत्र भी साबित हुआ।