Wednesday, July 29, 2026

मुजफ्फरपुर: “स्वस्थ युवा – समृद्ध राष्ट्र” के संकल्प के साथ संपन्न हुई दो दिवसीय जिला स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता

मुजफ्फरपुर। युवाओं में खेल भावना को जागृत करने और ग्रामीण प्रतिभाओं को एक सशक्त मंच प्रदान करने के उद्देश्य से मेरा युवा भारत‘ (युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार) द्वारा आयोजित दो दिवसीय जिला स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता का भव्य समापन रविवार को हुआ। मुजफ्फरपुर के झपहां स्थित तिरहुत शारीरिक शिक्षण महाविद्यालय के परिसर में आयोजित इस प्रतियोगिता का विषय स्वस्थ युवा समृद्ध राष्ट्र रखा गया था।

31 जनवरी से 1 फरवरी 2026 तक चले इस आयोजन ने जिले के विभिन्न प्रखंडों से आए खिलाड़ियों के भीतर नए उत्साह का संचार किया। समापन समारोह के अवसर पर विजेताओं को सम्मानित किया गया और खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के संकल्प को दोहराया गया।

क्लस्टर विजेताओं के बीच दिखा कड़ा मुकाबला

इस जिला स्तरीय प्रतियोगिता में सीधे प्रवेश नहीं था, बल्कि जिले के विभिन्न क्लस्टरों— मोतीपुर, सकरा, कुढ़नी, कटरा एवं मीनापुर में आयोजित प्रारंभिक खेल स्पर्धाओं में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों और टीमों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। आयोजन के दौरान फुटबॉल (पुरुष), कबड्डी (महिला), एथलेटिक्स 4×100 मीटर रिले (पुरुष एवं महिला) तथा बैडमिंटन (पुरुष एवं महिला) जैसी प्रमुख स्पर्धाएं आकर्षण का केंद्र रहीं।

प्रतियोगिता के पहले दिन फुटबॉल के प्रारंभिक दौर के मैच खेले गए, जबकि दूसरे दिन यानी 1 फरवरी को फाइनल मुकाबलों की धूम रही। कड़ाके की ठंड के बावजूद खिलाड़ियों के जोश में कोई कमी नहीं दिखी।

माननीय अतिथियों ने बढ़ाया उत्साह

समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बिहार सरकार की पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री श्रीमती रमा निषाद उपस्थित रहीं। उनके साथ मीनापुर विधानसभा क्षेत्र के माननीय विधायक अजय कुमार और तिरहुत शारीरिक शिक्षण महाविद्यालय के प्राचार्य  शक्तिवान सिंह ने गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई।

समारोह को संबोधित करते हुए मंत्री श्रीमती रमा निषाद ने कहा, खेल केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह युवाओं को अनुशासन, आत्मविश्वास और नेतृत्व की भावना सिखाता है। स्वस्थ युवा समृद्ध राष्ट्रकेवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर जिला स्तर पर अपनी पहचान बनाना एक बड़ी उपलब्धि है।” उन्होंने ‘मेरा युवा भारत’ के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि जमीनी स्तर पर युवाओं को जोड़ने का यह अभियान भविष्य में राष्ट्र निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा।

वहीं, विधायक अजय कुमार ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाओं को तराशने का काम करते हैं। उन्होंने युवाओं से नशामुक्त समाज बनाने और नियमित खेल अभ्यास को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।

खेल किट का वितरण और युवाओं का सम्मान

कार्यक्रम के दौरान खेल संस्कृति को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए सक्रिय युवा मंडलों को स्पोर्ट्स किट प्रदान की गई। इनमें मीनापुर युवा मंडल, स्वामी विवेकानंद युवती मंडल (मुशहरी), गोरैया युवा मंडल (कुढ़नी), चंद्रशेखर आजाद युवा मंडल (कुढ़नी), स्वामी विवेकानंद युवा मंडल (मुरौल) और स्वामी विवेकानंद युवा मंडल (मीनापुर) शामिल रहे। अतिथियों ने उम्मीद जताई कि इन सामग्रियों के माध्यम से गांवों में खेल सुविधाओं का विस्तार होगा।

प्रतियोगिता के परिणाम: किसने मारी बाजी?

विभिन्न स्पर्धाओं के परिणाम काफी रोमांचक रहे, जहाँ अंतिम क्षणों तक जीत-हार का संघर्ष देखने को मिला:

  • कबड्डी (महिला): हनुमान नगर, कटरा की टीम ने शानदार खेल दिखाते हुए विजेता का खिताब अपने नाम किया। प्रोजेक्ट राम जानकी गर्ल्स टीम, मीनापुर उपविजेता रही।
  • फुटबॉल (पुरुष): एक रोमांचक फाइनल मुकाबले में बाबू एफसी, सकरा ने मीनापुर वॉरियर्स को हराकर ट्रॉफी पर कब्जा किया।
  • बैडमिंटन: पुरुष वर्ग में चंदन कुमार विजेता और अविनाश कुमार उपविजेता रहे। महिला वर्ग में कटरा की नंदिनी कुमारी ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि मीनापुर की सनोवर खातून उपविजेता रहीं।
  • एथलेटिक्स (4×100 मीटर रिले – पुरुष): कुढ़नी की टीम (गौरव, हर्षित, साकिब और तहसीन) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। आई रिले टीम द्वितीय और मीनापुर की टीम तृतीय स्थान पर रही।
  • एथलेटिक्स (4×100 मीटर रिले – महिला): मीनापुर की टीम (रंजु, सिखा, अंचला और प्रीति) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, जबकि मोतीपुर की टीम दूसरे स्थान पर रही।

सफलता के पीछे की टीम

इस सफल आयोजन के पीछे मेरा युवा भारत, पटना के सहायक प्रशासनिक अधिकारी  चंदेश्वर पाण्डेय और रंजन कुमार (टीसीपीई झपहां) का विशेष मार्गदर्शन रहा। खेल के ऑफिशियल्स और जिले के विभिन्न प्रखंडों से आए ‘मेरा युवा भारत’ के स्वयंसेवकों ने अपनी कड़ी मेहनत से कार्यक्रम को सुचारू रूप से संचालित किया। सभी विजेताओं और उपविजेताओं को विधायक अजय कुमार द्वारा मेडल, ट्रॉफी और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

बलिराम भगत महाविद्यालय में गूँजी विदाई की सुरीली और भावुक स्वरलहरियाँ

समस्तीपुर, 31 जनवरी 2026: शिक्षा की नगरी समस्तीपुर स्थित बलिराम भगत महाविद्यालय के सभागांर में आज एक ऐतिहासिक विदाई समारोह संपन्न हुआ। अवसर था संस्थान के दो अति-महत्वपूर्ण स्तंभों, विनोद कुमार दास (प्रधान लिपिक) और राम प्रकाश प्रसाद (आशुलिपिक/स्टेनो) के सेवा निवृत्ति का। 30 वर्षों की लंबी और निष्कलंक सेवा के बाद, आज महाविद्यालय परिवार ने उन्हें पूरे मान-सम्मान के साथ विदाई दी।

विदाई समारोह को संबोधित करती हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. स्नेहलता कुमारी

भव्य मंच और गरिमामय आयोजन

कार्यक्रम के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए बैनर पर विदाई सह सम्मान समारोह” अंकित था, जो आयोजन की महत्ता को दर्शा रहा था। मंच पर प्रधानाचार्य डॉ. जगदीश प्रसाद वैश्यन्त्री के साथ सेवानिवृत्त होने वाले दोनों कर्मी फूलों की बड़ी मालाओं और पारंपरिक टोपी से सुसज्जित होकर बैठे थे।

समारोह की प्रमुख झलकियाँ:

  • कुशल संचालन: हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. स्नेहलता कुमारी ने पोडियम से अपनी ओजस्वी वाणी में कार्यक्रम का संचालन किया, जिससे पूरा माहौल भावुक और गरिमापूर्ण बना रहा।
  • अनुभवी दिग्गजों का साथ: मंच पर पूर्व प्रभारी प्रधानाचार्य डॉ. रमेश झा एवं डॉ. रामनारायण राय की उपस्थिति ने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए। उन्होंने अपने संबोधन में विनोद बाबू (प्रधान लिपिक) और राम प्रकाश जी (स्टेनो) के प्रशासनिक कौशल की जमकर सराहना की।
  • सम्मान का प्रतीक: महाविद्यालय की ओर से सचिव आशुतोष चंद्रमौलि और प्रो. विकास कुमार पटेल ने दोनों कर्मियों को अंग वस्त्र भेंट किए। प्रधानाचार्य ने उन्हें माला पहनाकर उनके स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना की।

सहकर्मियों की शुभकामनाएँ

इस अवसर पर प्रो. अनिल कुमार गुप्ता, प्रो. राजेश कुमार रंजन, और डॉ. स्वीटी कुमारी सहित अन्य प्राध्यापकों ने अपने उद्गार व्यक्त किए। सभी ने एक स्वर में कहा कि प्रधान लिपिक और स्टेनो के रूप में इन दोनों ने महाविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था को जो मजबूती दी है, उसे हमेशा याद रखा जाएगा।

विदाई की बेला

समारोह के अंतिम चरण में गोपाल प्रसाद भगत (बड़ा बाबू) ने उपस्थित सभी शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में कल्याण सिंह, अभिषेक आनंद, और सुदामा देवी सहित महाविद्यालय के समस्त कर्मचारी उपस्थित थे। समस्तीपुर के इस प्रतिष्ठित महाविद्यालय के इतिहास में यह दिन इन दोनों समर्पित कर्मियों की कर्तव्यनिष्ठा के लिए सदैव अंकित रहेगा।

बलिराम भगत महाविद्यालय में गूँजे संत रविदास के विचार: ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ के संदेश के साथ मनाई गई जयंती

समस्तीपुर। स्थानीय बलिराम भगत महाविद्यालय के हिंदी स्नात्तकोत्तर विभाग के तत्वावधान में आज संत शिरोमणि रविदास जी महाराज की जयंती की पूर्व संध्या पर एक भव्य श्रद्धांज़लि सभा एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में महाविद्यालय के शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने सामाजिक समरसता के अग्रदूत संत रविदास को याद करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

पुष्पांजलि से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रभारी प्रधानाचार्य डॉ. जगदीश प्रसाद वैश्यन्त्री ने की। समारोह का विधिवत शुभारंभ संत रविदास जी महाराज के तैल चित्र पर पुष्पमाला अर्पित कर किया गया। इस दौरान उपस्थित प्राध्यापकों और छात्रों ने बारी-बारी से श्रद्धासुमन अर्पित किए, जिससे पूरा परिसर भक्तिमय और वैचारिक ऊर्जा से भर उठा।

आज भी प्रासंगिक हैं रविदास के विचार: डॉ. वैश्यन्त्री

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रभारी प्रधानाचार्य डॉ. जगदीश प्रसाद वैश्यन्त्री ने संत रविदास के दर्शन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके विचार किसी एक कालखंड के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए हैं। उन्होंने प्रसिद्ध कहावत मन चंगा तो कठौती में गंगा” का संदर्भ देते हुए कहा कि संत रविदास ने कर्म की शुद्धता और मन की पवित्रता को ही सबसे बड़ा धर्म माना था। डॉ. वैश्यन्त्री ने जोर देकर कहा कि आज के दौर में जब समाज विभिन्न विसंगतियों से जूझ रहा है, तब रविदास जी के समतावादी विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।

विद्वान वक्ताओं ने साझा किए विचार

हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. स्नेह लता कुमारी एवं डॉ. संजय प्रसाद के कुशल निर्देशन में आयोजित इस कार्यक्रम में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के विद्वानों ने शिरकत की। मौके पर उपस्थित प्रो. राजेश कुमार रंजन, डॉ. हरिनारायण, डॉ. अनिल गुप्ता, डॉ. स्वीटी, डॉ. विंध्याचल साह, प्रो. शकील अहमद, प्रो. विकास पटेल, डॉ. उल्लास टी, डॉ. रेखा, डॉ. सीरिन, डॉ. ज्योति और डॉ. आर. के. मौर्या ने संत रविदास के जीवन संघर्ष और उनकी साखियों पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि रविदास जी ने समाज में व्याप्त ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर एक ‘बेगमपुरा’ (दुःख रहित समाज) की कल्पना की थी।

छात्रों ने प्रस्तुत किए समतामूलक समाज पर विचार

कार्यक्रम की खास विशेषता हिंदी विभाग के छात्र-छात्राओं की सक्रिय भागीदारी रही। ‘समता मूलक समाज के निर्माण में संत रविदास का योगदान’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में ज्योति, अनु, आयुष्मान, सौम्या, रितेश, अभिषेक, रोहित और काजल आदि विद्यार्थियों ने अपने ओजपूर्ण विचार व्यक्त किए। छात्रों ने आधुनिक समाज में जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए रविदास जी की शिक्षाओं को अपनाने पर बल दिया।

इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति

इस अवसर पर केवल शैक्षणिक जगत ही नहीं, बल्कि शिक्षकेतर कर्मचारियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम में आशुतोष, राजा, संजय, राहुल और संजीव देशबंधु सहित अन्य कर्मचारियों ने व्यवस्था संचालन में सहयोग किया और श्रद्धांज़लि अर्पित की।

अंत में, हिंदी विभाग द्वारा सभी उपस्थित अतिथियों और छात्रों का आभार व्यक्त किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान और संत रविदास के जयघोष के साथ हुआ, जिसने उपस्थित जनसमूह में सामाजिक एकता का नया संचार किया।

किसान रजिस्ट्री के नाम पर 90% किसानों की छंटनी की साजिश, आंदोलन की सुगबुगाहट: ताजपुर में गरजा किसान महासभा

ताजपुर/समस्तीपुर | 1 फरवरी 2026

बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर प्रखंड अंतर्गत मोतीपुर में किसानों का आक्रोश फूट पड़ा है। किसान रजिस्ट्री की पेचीदगियों, वंशावली की अनिवार्यता, खाद की किल्लत और सरकार की कथित ‘किसान विरोधी’ नीतियों के खिलाफ अखिल भारतीय किसान महासभा ने शंखनाद कर दिया है। रविवार को मोतीपुर वार्ड संख्या 26 में आयोजित जुलूस और सभा ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिन सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।


पंजीकरण नहीं, यह तो किसानों को बेदखल करने का डिजिटल जालहै

सभा को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता और अखिल भारतीय किसान महासभा के जिला सचिव ललन कुमार ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वर्तमान में किसान रजिस्ट्रेशन के नाम पर जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है, वह वास्तव में किसानों को सरकारी लाभों से वंचित करने की एक गहरी साजिश है।

ललन कुमार ने  दावा करते हुए कहा कि, “आज किसान पंजीकरण के नाम पर जो धांधली हो रही है, उसमें 90 प्रतिशत किसान छंटनी की कगार पर हैं“। उन्होंने विस्तार से बताया कि जो किसान पीढ़ियों से अपनी भूमि जोत रहे हैं और जिनके पास पुस्तैनी जमीन है, उन्हें भी तकनीकी आधार पर रजिस्ट्रेशन से बाहर किया जा रहा है। यदि यह पंजीकरण सफल नहीं होता है, तो किसानों को भविष्य में न तो उचित दर पर खाद मिलेगी, न ही बीज और न ही प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का लाभ। उन्होंने इसे केंद्र और राज्य सरकार की मिलीजुली साजिश करार दिया।


खाद की कीमतों पर चोरी और सीनाजोरीका आरोप

महासभा के प्रखंड अध्यक्ष ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में आर्थिक आंकड़ों के जरिए सरकार को घेरा। उन्होंने बताया कि सरकार किसानों की आंखों में धूल झोंक रही है। उन्होंने कहा, “पहले 45 किलो यूरिया की बोरी 266.50 रुपये में मिलती थी, लेकिन अब मोदी सरकार ने चालाकी से वजन घटाकर इसे 40 किलो कर दिया है और कीमत 254 रुपये तय की है”। यह सीधे तौर पर किसानों की जेब पर डाका डालने जैसा है।

इसके साथ ही, वक्ताओं ने क्षेत्र में खाद की भारी कालाबाजारी पर भी चिंता व्यक्त की और इसे तत्काल बंद करने की मांग की,


तकनीकी खामियां और जमाबंदी का पेच

भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने प्रशासन के समक्ष व्यावहारिक सुझाव और मांग रखते हुए कहा कि किसान रजिस्ट्री की प्रक्रिया शुरू करने से पहले सरकार को अपने बुनियादी रिकॉर्ड दुरुस्त करने चाहिए। उन्होंने मांग की कि राजस्व महाअभियान के तहत सबसे पहले जमाबंदी पंजी में सुधार किया जाए और प्रत्येक भूखंड का खाता-खेसरा स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए। जब तक राजस्व रिकॉर्ड अपडेट नहीं होंगे, तब तक वास्तविक किसानों का पंजीकरण होना असंभव है और वे बिचौलियों के हत्थे चढ़ते रहेंगे।


आंदोलन की प्रमुख मांगें एक नजर में:

प्रदर्शन के दौरान किसानों ने एक स्वर में निम्नलिखित मांगों को बुलंद किया:

  • वंशावली का समावेश: किसान रजिस्ट्री में वंशावली को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए ताकि पुश्तैनी किसानों को दिक्कत न हो।
  • MSP की गारंटी: सभी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी दर्जा देकर लागू किया जाए।
  • कर्ज मुक्ति: किसानों का केसीसी (KCC) लोन पूर्णतः माफ किया जाए।
  • संस्थानों की बहाली: मनरेगा को कृषि कार्य से जोड़ते हुए पुनर्बहाल किया जाए और बंद पड़ी बाजार समितियों को फिर से चालू किया जाए।
  • अधिग्रहण पर रोक: कृषि योग्य भूमि का गैर-जरूरी अधिग्रहण तत्काल बंद हो।

अगला पड़ाव: प्रखंड से विधानसभा तक घेराव

मोतीपुर की गलियों से निकले इस जुलूस ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी दे दी है। सभा के अंत में आंदोलन की आगामी रूपरेखा की घोषणा की गई:

  1. 9 फरवरी 2026: मांगों के समर्थन में ताजपुर प्रखंड मुख्यालय का ऐतिहासिक घेराव किया जाएगा।
  2. 23 फरवरी 2026: आंदोलन का रुख राजधानी की ओर होगा, जहाँ किसान अपनी मांगों को लेकर बिहार विधानसभा का घेराव करेंगे।

सभा में राजदेव प्रसाद सिंह, शंकर सिंह, ललन दास, अनील सिंह, रवींद्र प्रसाद सिंह, मोती लाल सिंह, दिनेश प्रसाद सिंह, संजीव राय, मुंशीलाल राय और धर्मेंद्र राय सहित सैकड़ों किसानों ने हिस्सा लिया और संकल्प लिया कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, संघर्ष जारी रहेगा।

UGC गाइडलाइंस पर रोक के खिलाफ समस्तीपुर में छात्र-युवाओं का महासंग्राम; ‘रोहित एक्ट’ लागू करने की उठी मांग

समस्तीपुर। उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता सुनिश्चित करने और भेदभाव को मिटाने के उद्देश्य से प्रस्तावित UGC गाइडलाइंस 2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद पूरे देश में विरोध की लहर दौड़ पड़ी है। इसी कड़ी में आइसा (AISA) और आरवाईए (RYA) के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर शनिवार को समस्तीपुर की सड़कों पर छात्र-युवाओं ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। भारी संख्या में जुटे प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार और न्यायपालिका के इस रुख को सामाजिक न्याय पर हमला करार दिया。

पटेल मैदान से शुरू हुआ आक्रोश मार्च

दोपहर करीब 12:30 बजे समस्तीपुर के ऐतिहासिक पटेल मैदान गोलंबर पर छात्र और युवा कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ा。 हाथों में लाल झंडे और विरोध की तख्तियां लिए यह ‘अखिल भारतीय प्रतिवाद मार्च’ शहर के मुख्य मार्गों से होता हुआ अनुमंडल कार्यालय तक पहुँचा। कार्यकर्ताओं ने जननायक कर्पूरी ठाकुर की प्रतिमा के समक्ष अपनी मांगों को बुलंद किया और केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की。

संस्थानों में बढ़ता भेदभाव और सरकार की मंशा

प्रदर्शन के दौरान मुख्य बैनर पर डॉ. बी.आर. अंबेडकर और शहीद छात्र रोहित वेमुला के चित्र अंकित थे。 बैनर पर लिखे संदेश— “अत्याचार अधिकार नहीं है! समानता की मांग करना प्रतिशोध नहीं है!”—ने स्पष्ट कर दिया कि छात्र अब परिसरों में बढ़ते जातीय और मानसिक उत्पीड़न को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं。 उनकी मांग है कि रोहित एक्ट की तर्ज पर ही यूजीसी की गाइडलाइंस को सख्ती से लागू किया जाए ताकि किसी और छात्र को भेदभाव के कारण अपनी जान न गंवानी पड़े。

“चोर दरवाजे से अधिकार छीन रही है भाजपा” : गौतम

सभा को संबोधित करते हुए आइसा जिला कमेटी के नेता गौतम ने बेहद गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि “यूजीसी एक्ट 1956 के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने (Promotion of Equity) के लिए जो बिल लाया गया था, वह वंचित वर्गों के छात्रों के लिए सुरक्षा कवच था。 इसमें एक ‘असमानता समिति’ (Inequality Committee) के गठन का प्रावधान था, जो जाति, धर्म या लिंग के आधार पर होने वाले किसी भी भेदभाव की निष्पक्ष जांच करती और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करती”。

गौतम ने आगे कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा नीत एनडीए सरकार ने इस महत्वपूर्ण कानून पर संसद में खुली बहस करने के बजाय, चोर दरवाजे से याचिकाएं दायर करवाकर इस पर रोक लगवा दी है। सरकार का ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा केवल एक चुनावी ढकोसला है। असल में यह सरकार धार्मिक उन्माद फैलाकर केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहती है और युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल रही है”

आर-पार की लड़ाई का एलान

प्रतिवाद मार्च के समापन पर वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यह केवल एक शुरुआत है। यदि यूजीसी की उन गाइडलाइंस को बहाल नहीं किया गया जो दलित, पिछड़ो और अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करती हैं, तो यह आंदोलन केवल समस्तीपुर तक सीमित नहीं रहेगा。 आइसा, आरवाईए, भाकपा माले और तमाम बहुजन संगठन एकजुट होकर दिल्ली की सत्ता को चुनौती देंगे。

प्रदर्शन में छात्र नेताओं ने साफ़ कहा कि परिसरों का “भगवाकरण” और शिक्षा का “निजीकरण” करके सरकार गरीबों के बच्चों को उच्च शिक्षा से बाहर करना चाहती है। मार्च में बड़ी संख्या में छात्र प्रतिनिधि, स्थानीय युवा और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल रहे, जिन्होंने एक सुर में सामाजिक समानता के कानून को लागू करने की मांग की。

एमडीडीएम कॉलेज में पोस्टर प्रतियोगिता: छात्राओं ने सूक्ष्मजीवों की अद्भुत दुनिया को कैनवास पर उतारा

मुजफ्फरपुर | निज प्रतिनिधि एमडीडीएम कॉलेज के इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी विभाग (व्यावसायिक पाठ्यक्रम) में शनिवार को ‘सूक्ष्मजीवों का दैनिक जीवन में महत्व’ विषय पर एक भव्य पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन कॉलेज की प्राचार्या डॉ. अलका जायसवाल ने किया।

तकनीक और विज्ञान का संगम

प्रतियोगिता के दौरान छात्राओं ने अपनी रचनात्मकता के जरिए यह दिखाया कि कैसे सूक्ष्मजीव हमारे जीवन को बेहतर बना रहे हैं। छात्राओं ने पर्सनलाइज्ड मेडिसिन, बायोसेंसर, बायोफ्यूल, डीएनए वैक्सीन, जीन थेरेपी और जीएमओ (GMO) जैसे जटिल विषयों को पोस्टरों के माध्यम से बेहद सरलता से समझाया। उन्होंने इन क्षेत्रों में हो रही नई खोजों और सूक्ष्मजीवों के अपरिहार्य योगदान पर भी प्रकाश डाला।

विजेता प्रतिभागी

प्रतियोगिता में छात्राओं के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली। परिणामों का विवरण इस प्रकार है:

  • प्रथम स्थान: सिमरन, तनवीशा और रक्षंदा।
  • द्वितीय स्थान: करिश्मा और प्रेरणा।
  • तृतीय स्थान: माहविस, वजह और अलका।

इन्होंने बढ़ाया छात्राओं का उत्साह

प्राचार्या डॉ. अलका जायसवाल ने छात्राओं के नवाचार की प्रशंसा करते हुए उनका मार्गदर्शन किया। इससे पूर्व, वनस्पति विभागाध्यक्ष सह पाठ्यक्रम समन्वयिका डॉ. श्वेता यादव ने स्वागत भाषण दिया। कार्यक्रम का सफल संचालन विभागीय शिक्षक रौशन कुमार और आशीष कुमार के नेतृत्व में संपन्न हुआ।

इस अवसर पर डॉ. स्मिता, डॉ. अर्चना गुप्ता, डॉ. माला, डॉ. सरिता पॉल, डॉ. नवनीता कुमारी, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. राघवेन्द्र और मीडिया प्रभारी डॉ. राकेश रंजन सहित कई शिक्षक उपस्थित रहे। प्रतियोगिता में जानवी, हबीबा, शुभी, गीतांजलि, तबिंदा, सोहना, आयुषी, पुष्पा, शिल्पा, अमृता, काजल, सलोनी, जोया, सौम्या, फरहत, निकिता और अंकिता जैसी छात्राओं ने भी सराहनीय प्रदर्शन किया।

अध्यापन ही सबसे बड़ा धर्म: एमडीडीएम कॉलेज में डॉ. किरण झा और डॉ. मनीष प्रभा की गरिमामय विदाई

मुजफ्फरपुर। 31 जनवरी 2026 को स्थानीय एमडीडीएम कॉलेज के प्राध्यापक प्रकोष्ठ में एक विशेष विदाई सभा का आयोजन किया गया। शिक्षक संघ के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का माहौल तब भावुक हो गया जब दशकों तक महाविद्यालय को अपनी सेवाएं देने वाली दो दिग्गज शिक्षिकाओं ने अपने अनुभव साझा किए।

संघर्ष और स्नेह का संगम: डॉ. किरण झा

समारोह की अध्यक्षता कर रही अंग्रेजी विभागाध्यक्ष एवं शिक्षक संघ की अध्यक्षा डॉ. विनीता झा ने अपने संबोधन में डॉ. किरण झा के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. किरण झा का जीवन केवल अध्यापन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनका जीवन संघर्षों से जूझने और उनसे विजय प्राप्त करने की एक जीवंत गाथा है। उनकी अध्यापकीय कला और दूसरों के प्रति उनके परोपकारी स्वभाव से युवा शिक्षकों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। डॉ. झा ने अपने पूरे सेवाकाल में केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि सबको स्नेह और ममता बांटी है।

इसी क्रम में राजनीति शास्त्र की विभागाध्यक्ष और शिक्षक संघ की सचिव डॉ. कुमारी सरोज ने डॉ. किरण झा को एक ‘आदर्श शिक्षिका’ की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि छात्राओं के बीच उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण उनका मृदुल व्यवहार और हर किसी को अपना आशीर्वाद प्रदान करने की उनकी सहज प्रवृत्ति है।

सरलता और साहस की प्रतिमूर्ति: डॉ. मनीष प्रभा

गणित जैसे कठिन विषय को छात्राओं के लिए सुगम बनाने वाली डॉ. मनीष प्रभा के योगदान को भी इस अवसर पर सराहा गया। डॉ. विनीता झा ने कहा कि डॉ. मनीष प्रभा की हिम्मत और उनके भीतर का अपनापन किसी को भी सहज ही मुग्ध कर देता है। डॉ. कुमारी सरोज ने उन्हें एक ‘संघर्षशील शिक्षिका’ बताया, जिनकी सरलता ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। गणित विभाग की उनकी सहयोगी डॉ. माला अपने वरिष्ठ के अवकाश ग्रहण करने पर भावुक हो उठीं। उन्होंने डॉ. मनीष प्रभा को अपना अभिभावक बताते हुए उनके सुखद और मंगलमय भविष्य की कामना की।

प्राचार्या और सहयोगियों के अनुभव

महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. अलका जायसवाल ने दोनों शिक्षिकाओं के साथ बिताए गए लंबे समय को याद किया। उन्होंने कहा, “प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्यों के दौरान मुझे इन दोनों का जो सहयोग और अपनापन मिला, उससे मैं अभिभूत हूँ। डॉ. किरण और डॉ. मनीष प्रभा ने न केवल अपने विभागों को बल्कि पूरे महाविद्यालय परिवार को एक सूत्र में पिरोकर रखा।”

शिक्षक संघ की कोषाध्यक्ष और महाविद्यालय की परीक्षा नियंत्रक डॉ. निशिकांति ने भी अपने संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा कि इन दोनों वरिष्ठ सहयोगियों ने समय-समय पर न केवल मार्गदर्शन दिया, बल्कि एक अभिभावक की तरह प्रेम भी किया। उनके सहयोग को शब्दों में बयां करना कठिन है और जीवन के किसी भी मोड़ पर उन्हें भुलाया नहीं जा सकता।

शिष्याओं को भेंट की ‘ज्ञान की पूंजी’

कार्यक्रम का सबसे हृदयस्पर्शी क्षण वह था जब दर्शनशास्त्र की सहायक प्राध्यापक डॉ. सुरबाला और डॉ. नेहा रानी ने डॉ. किरण झा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने डॉ. झा को अपना गुरु और अभिभावक माना। इस मौके पर डॉ. किरण झा ने एक प्रेरक मिसाल पेश करते हुए अपनी निजी संग्रह की महत्वपूर्ण पुस्तकें डॉ. सुरबाला और डॉ. नेहा रानी को भेंट स्वरूप प्रदान कीं। उन्होंने संदेश दिया कि पुस्तकें अलमारी में रखने के लिए नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी के मस्तिष्क को प्रकाशित करने के लिए होती हैं।

अंतिम संदेश: “ईमानदारी ही अध्यापन का आधार”

अपने विदाई भाषण में डॉ. किरण झा ने कहा, “अध्यापन कोई पेशा नहीं, बल्कि सबसे बड़ा धर्म है। यदि आप अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हैं, तो समाज और छात्र आपको कभी नहीं भूलते।” उन्होंने अपने सेवाकाल के कई अविस्मरणीय पलों को साझा किया, जिसे सुनकर उपस्थित लोगों की आँखें नम हो गईं।

सम्मान और विदाई

कार्यक्रम के अंत में शिक्षक संघ द्वारा दोनों विदा होने वाली शिक्षिकाओं को शॉल, स्मृति चिह्न और बुके देकर सम्मानित किया गया। समारोह में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, प्राध्यापिकाएं एवं बड़ी संख्या में शिक्षकेतर कर्मचारी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में दोनों के स्वस्थ और सुदीर्घ जीवन की कामना की।

वैदिक ऋचाओं से यूजीसी तक: क्या हम सामाजिक न्याय की मूल भावना को भूल गए हैं?

विशेष विश्लेषण |

वर्तमान भारतीय समाज में जब शिक्षा, योग्यता और सामाजिक न्याय को लेकर तीखी बहसें सुनाई देती हैं—विशेषकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े हालिया विमर्शों और आरक्षण की नीतियों में—तब यह अनिवार्य हो जाता है कि हम केवल वर्तमान के तात्कालिक और सतही प्रश्नों में उलझकर न रह जाएँ। आज योग्यता (Merit) बनाम सामाजिक प्रतिनिधित्व के संघर्ष में एक ऐसा शोर पैदा हो गया है, जिसमें इतिहास के वे मूल तथ्य दब गए हैं जहाँ से हमारी सामाजिक यात्रा शुरू हुई थी।

यह लेख किसी वैचारिक पक्ष में फैसला सुनाने के बजाय एक गंभीर आग्रह करता है कि हम उस ऐतिहासिक मार्ग को “जैसा है, वैसा ही” समझें, ताकि आज की चर्चा सही दिशा में आगे बढ़ सके।

विराट पुरुष का रूपक: विभाजन नहीं, संतुलन का प्रतीक

भारतीय समाज की संरचना को लेकर होने वाली चर्चाओं का केंद्र अक्सर ऋग्वेद के १०वें मंडल का ‘पुरुषसूक्त’ होता है। ऋग्वेद (10.90.12) में कहा गया है:

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्, बाहू राजन्यः कृतः, ऊरू तदस्य यद्वैश्यः, पद्भ्यां शूद्रो अजायत।

अर्थात्, विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से राजन्य (क्षत्रिय), जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। सदियों से इस सूक्त की व्याख्या ऊँच-नीच के पायदान के रूप में की गई, जिसने समाज को श्रेणियों में बाँटा। लेकिन यदि हम इसके मूल अर्थ की गहराई में जाएँ, तो यह विभाजन का नहीं, बल्कि ‘संतुलन’ का प्रतीक था।

वैदिक काल का यह रूपक समाज को एक जीवित शरीर की तरह देखता था। जिस तरह शरीर के जीवित रहने के लिए मुख (ज्ञान-प्रसार), भुजा (रक्षा), जंघा (आर्थिक मजबूती) और पैर (श्रम और आधार) की समान महत्ता है, उसी तरह समाज के हर वर्ग की अपनी विशिष्ट भूमिका थी। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह वर्णन प्रतीकात्मक और कार्यात्मक था, न कि जैविक या जन्मगत। इस सूक्त में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि व्यक्ति जन्म से ही किसी श्रेणी में जकड़ा हुआ है। यह समाज की एक कार्यात्मक व्यवस्था थी, जहाँ हर अंग का सम्मान बराबर था क्योंकि एक भी अंग के बिना ‘विराट पुरुष’ यानी समाज पूर्ण नहीं हो सकता था।


एक घर, अनेक कर्म: जब हुनर से तय होती थी कुल की पहचान

वैदिक समाज के वास्तविक जीवन को समझने के लिए ऋग्वेद (9.112.3) का एक अत्यंत सहज और क्रांतिकारी संदर्भ मिलता है। यहाँ एक व्यक्ति कहता है:

मैं खेती करता हूँ। मेरी बहन गीत गाती है, मेरी माँ आटा पीसती है और मेरे पिता कोई अन्य कार्य करते हैं।”

यह मंत्र उस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है कि वैदिक काल में जाति एक बंद और जड़ व्यवस्था थी। यह दैनिक जीवन का चित्र स्पष्ट करता है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवार के सदस्य अलग-अलग व्यवसायों में संलग्न थे। यहाँ सामाजिक पहचान ‘कुल’ या ‘जन्म’ से नहीं, बल्कि ‘हुनर’ और ‘कर्म’ से तय होती थी।

इस काल में योग्यता का पैमाना लचीला था। व्यक्ति सीख सकता था, अपनी क्षमता बढ़ा सकता था और अपनी सामाजिक भूमिका बदल सकता था। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ योग्यता (Merit) जन्म का मोहताज नहीं थी। यदि आज हम यूजीसी और उच्च शिक्षा में योग्यता की बात करते हैं, तो हमें याद करना होगा कि हमारे पूर्वजों ने योग्यता को किसी एक कुल की बपौती नहीं माना था।

इतिहास की फिसलन: कैसे लचीला समाज जड़ता की बेड़ियों में जकड़ा गया

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि शुरुआती समाज इतना गतिशील था, तो वह आज के जातिगत ढाँचे में कैसे बदला? यह एक ‘ऐतिहासिक फिसलन’ थी जो कई चरणों में पूरी हुई।

  1. स्मृति और धर्मसूत्रों का काल: उपनिषदों के बाद जैसे-जैसे समाज जटिल हुआ, कार्य-विभाजन को संहिताबद्ध करने की कोशिशें शुरू हुईं। यहाँ से ‘जन्म’ का महत्त्व बढ़ने लगा और व्यवसायों को वंशानुगत बनाने के नियम कड़े किए गए।
  2. सत्ता और नियंत्रण: मध्यकाल तक आते-आते यह विभाजन केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं रहा, बल्कि सत्ता और सामाजिक नियंत्रण का औज़ार बन गया। जातियों को ऊँच-नीच की सीढ़ियों में बाँट दिया गया ताकि संसाधनों पर एकाधिकार बना रहे।
  3. औपनिवेशिक प्रभाव: ब्रिटिश काल में जनगणना और प्रशासनिक वर्गीकरण ने इन भेदों को कानूनी जामा पहना दिया, जिससे समाज के वे खुले दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए जो वैदिक काल में खुले थे।

यही वह दौर था जब ‘विराट पुरुष’ का गतिशील शरीर जंजीरों से जकड़े हुए एक जड़ ढांचे में बदल गया, जहाँ पैरों को आधार नहीं बल्कि हीन समझा जाने लगा।

वर्तमान की चुनौती: चर्चा की सही शुरुआत और ऐतिहासिक सत्य का स्वीकार

आज जब हम सामाजिक न्याय, आरक्षण और योग्यता के मानकों पर बहस करते हैं, तो अक्सर हम इस इतिहास को भूल जाते हैं। वर्तमान की चुनौती यह नहीं है कि हम केवल आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में खड़े हों, बल्कि चुनौती यह है कि हम उस ‘लचीलेपन’ को पुनः प्राप्त करें जो हमारी जड़ों में था।

यूजीसी या शिक्षा नीति की बहसों में लगे बुद्धिजीवियों और नीति-निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस ऐतिहासिक यात्रा को समझें। सामाजिक न्याय केवल एक संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह उस प्राचीन व्यवस्था को पुनः प्राप्त करने का प्रयास है जहाँ व्यक्ति की उन्नति में उसका जन्म बाधा न बने।

यह लेख इसी बड़ी चर्चा की एक शुरुआती प्रवेशिका है। आज हमें यह स्वीकार करना होगा कि जिस व्यवस्था को हम ‘परंपरा’ कहकर बचाते या कोसते हैं, वह मूलतः वैसी नहीं थी। हमने रास्ते में कहीं न कहीं अपनी मूल दिशा खो दी है। जब तक हम यह नहीं समझते कि हम कहाँ से चले थे—जहाँ एक ही घर में किसान और विद्वान साथ रहते थे—तब तक हम एक समावेशी भविष्य का निर्माण नहीं कर पाएंगे।

, सामाजिक न्याय की बहस का अंत किसी को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि ‘विराट पुरुष’ के हर अंग को उसकी खोई हुई गरिमा वापस दिलाने में है। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

समस्तीपुर: मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान आइसा का जोरदार प्रदर्शन, सड़क पर लेटे कार्यकर्ता

समस्तीपुर। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘समृद्धि यात्रा’ के समस्तीपुर आगमन पर आइसा (AISA) कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगों को लेकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। जनहितैषी मांगों से संबंधित मांगपत्र मुख्यमंत्री को सौंपने के संकल्प के साथ कार्यकर्ताओं ने जितवारपुर से एक विशाल जुलूस निकाला।

अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन करते पर आइसा कार्यकर्ता

पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक

जैसे ही जुलूस आगे बढ़ा, पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए नारेबाजी कर रहे कार्यकर्ताओं को रास्ते में ही रोक दिया। पुलिस द्वारा रोके जाने से आइसा कार्यकर्ता आक्रोशित हो गए। विरोध स्वरूप कई कार्यकर्ता चांदनी चौक स्थित बैरिकेडिंग के पास ही सड़क पर लेट गए और सरकार विरोधी नारेबाजी करने लगे। इस दौरान काफी देर तक अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।

अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद शांत हुआ मामला

स्थिति को बिगड़ता देख जिले के वरीय अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने आक्रोशित छात्रों को समझाने-बुझाने का काफी प्रयास किया। अंततः, प्रशासन ने कार्यकर्ताओं से मांगपत्र प्राप्त किया और यह आश्वासन दिया कि इसे मुख्यमंत्री तक पहुंचा दिया जाएगा। इसके बाद ही छात्र वहां से हटने को तैयार हुए, हालांकि पुलिस ने उन्हें सभा स्थल पर जाने की अनुमति नहीं दी।

संवैधानिक अधिकार छीन नहीं सकती सरकार”

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे छात्र नेताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री को अपनी समस्याओं से अवगत कराना और मांगपत्र सौंपना उनका संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा:

“बिहार के मुख्यमंत्री को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें सौंपना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है। प्रशासन बल प्रयोग कर इस अधिकार को छीन नहीं सकता।”

इस प्रदर्शन के कारण कुछ देर के लिए यातायात बाधित रहा, लेकिन मांगपत्र सौंपे जाने के बाद स्थिति सामान्य हो गई।

आधी रात को पुलिस की घेराबंदी से सहमा माले नेता का परिवार; DM से जांच और कार्रवाई की मांग

ताजपुर/समस्तीपुर | 29 जनवरी 2025

मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ के मद्देनजर पुलिस की सक्रियता अब विवादों में घिर गई है। ताजपुर में भाकपा माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह के घर पर बुधवार की आधी रात हुई पुलिसिया कार्रवाई ने सुरक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सीसीटीवी से ली  गई तस्‍वीर में पूछ ताछ करती पुलिस

सोते हुए परिवार के बीच पहुंची पुलिस

माले नेता सुरेंद्र सिंह ने बताया कि बुधवार रात करीब 1:30 बजे बड़ी संख्या में पुलिस बल ने उनके घर को चारों तरफ से घेर लिया। मुख्य द्वार पर देर तक चली पूछताछ और पुलिस की मौजूदगी से घर में मौजूद उनकी पत्नी व ऐपवा नेत्री बंदना सिंह, उनके बेटे-बेटी और आसपास के मोहल्लेवासी दहशत में आ गए। सुरेंद्र सिंह का आरोप है कि उन्हें मुख्यमंत्री की यात्रा के दौरान जुलूस निकालने से रोकने के नाम पर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया है।

जनता की आवाज दबाने की कोशिश”

घटना पर कड़ा ऐतराज जताते हुए माले नेता ने कहा कि अपराधियों को पकड़ने के बजाय पुलिस उन लोगों को निशाना बना रही है जो जनता के सवाल उठाते हैं। उन्होंने कहा, “मैं संविधान के दायरे में रहकर जन-समस्याओं और मानवाधिकारों के लिए लड़ता हूँ। आधी रात को सपरिवार इस तरह का घेराव न केवल अलोकतांत्रिक है बल्कि एक सामाजिक और मानसिक आघात भी है।”

कार्रवाई न होने पर आंदोलन की दी चेतावनी

इस घटना को लेकर कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों में काफी रोष है। सुरेंद्र सिंह ने समस्तीपुर के जिला पदाधिकारी (DM) से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर सख्त कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में जिला प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला और पुलिसिया दमन नहीं रुका, तो वे इसके खिलाफ जोरदार आंदोलन शुरू करेंगे।