Sunday, June 7, 2026

अध्यापन ही सबसे बड़ा धर्म: एमडीडीएम कॉलेज में डॉ. किरण झा और डॉ. मनीष प्रभा की गरिमामय विदाई

मुजफ्फरपुर। 31 जनवरी 2026 को स्थानीय एमडीडीएम कॉलेज के प्राध्यापक प्रकोष्ठ में एक विशेष विदाई सभा का आयोजन किया गया। शिक्षक संघ के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का माहौल तब भावुक हो गया जब दशकों तक महाविद्यालय को अपनी सेवाएं देने वाली दो दिग्गज शिक्षिकाओं ने अपने अनुभव साझा किए।

संघर्ष और स्नेह का संगम: डॉ. किरण झा

समारोह की अध्यक्षता कर रही अंग्रेजी विभागाध्यक्ष एवं शिक्षक संघ की अध्यक्षा डॉ. विनीता झा ने अपने संबोधन में डॉ. किरण झा के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. किरण झा का जीवन केवल अध्यापन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनका जीवन संघर्षों से जूझने और उनसे विजय प्राप्त करने की एक जीवंत गाथा है। उनकी अध्यापकीय कला और दूसरों के प्रति उनके परोपकारी स्वभाव से युवा शिक्षकों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। डॉ. झा ने अपने पूरे सेवाकाल में केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि सबको स्नेह और ममता बांटी है।

इसी क्रम में राजनीति शास्त्र की विभागाध्यक्ष और शिक्षक संघ की सचिव डॉ. कुमारी सरोज ने डॉ. किरण झा को एक ‘आदर्श शिक्षिका’ की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि छात्राओं के बीच उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण उनका मृदुल व्यवहार और हर किसी को अपना आशीर्वाद प्रदान करने की उनकी सहज प्रवृत्ति है।

सरलता और साहस की प्रतिमूर्ति: डॉ. मनीष प्रभा

गणित जैसे कठिन विषय को छात्राओं के लिए सुगम बनाने वाली डॉ. मनीष प्रभा के योगदान को भी इस अवसर पर सराहा गया। डॉ. विनीता झा ने कहा कि डॉ. मनीष प्रभा की हिम्मत और उनके भीतर का अपनापन किसी को भी सहज ही मुग्ध कर देता है। डॉ. कुमारी सरोज ने उन्हें एक ‘संघर्षशील शिक्षिका’ बताया, जिनकी सरलता ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। गणित विभाग की उनकी सहयोगी डॉ. माला अपने वरिष्ठ के अवकाश ग्रहण करने पर भावुक हो उठीं। उन्होंने डॉ. मनीष प्रभा को अपना अभिभावक बताते हुए उनके सुखद और मंगलमय भविष्य की कामना की।

प्राचार्या और सहयोगियों के अनुभव

महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. अलका जायसवाल ने दोनों शिक्षिकाओं के साथ बिताए गए लंबे समय को याद किया। उन्होंने कहा, “प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्यों के दौरान मुझे इन दोनों का जो सहयोग और अपनापन मिला, उससे मैं अभिभूत हूँ। डॉ. किरण और डॉ. मनीष प्रभा ने न केवल अपने विभागों को बल्कि पूरे महाविद्यालय परिवार को एक सूत्र में पिरोकर रखा।”

शिक्षक संघ की कोषाध्यक्ष और महाविद्यालय की परीक्षा नियंत्रक डॉ. निशिकांति ने भी अपने संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा कि इन दोनों वरिष्ठ सहयोगियों ने समय-समय पर न केवल मार्गदर्शन दिया, बल्कि एक अभिभावक की तरह प्रेम भी किया। उनके सहयोग को शब्दों में बयां करना कठिन है और जीवन के किसी भी मोड़ पर उन्हें भुलाया नहीं जा सकता।

शिष्याओं को भेंट की ‘ज्ञान की पूंजी’

कार्यक्रम का सबसे हृदयस्पर्शी क्षण वह था जब दर्शनशास्त्र की सहायक प्राध्यापक डॉ. सुरबाला और डॉ. नेहा रानी ने डॉ. किरण झा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने डॉ. झा को अपना गुरु और अभिभावक माना। इस मौके पर डॉ. किरण झा ने एक प्रेरक मिसाल पेश करते हुए अपनी निजी संग्रह की महत्वपूर्ण पुस्तकें डॉ. सुरबाला और डॉ. नेहा रानी को भेंट स्वरूप प्रदान कीं। उन्होंने संदेश दिया कि पुस्तकें अलमारी में रखने के लिए नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी के मस्तिष्क को प्रकाशित करने के लिए होती हैं।

अंतिम संदेश: “ईमानदारी ही अध्यापन का आधार”

अपने विदाई भाषण में डॉ. किरण झा ने कहा, “अध्यापन कोई पेशा नहीं, बल्कि सबसे बड़ा धर्म है। यदि आप अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हैं, तो समाज और छात्र आपको कभी नहीं भूलते।” उन्होंने अपने सेवाकाल के कई अविस्मरणीय पलों को साझा किया, जिसे सुनकर उपस्थित लोगों की आँखें नम हो गईं।

सम्मान और विदाई

कार्यक्रम के अंत में शिक्षक संघ द्वारा दोनों विदा होने वाली शिक्षिकाओं को शॉल, स्मृति चिह्न और बुके देकर सम्मानित किया गया। समारोह में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, प्राध्यापिकाएं एवं बड़ी संख्या में शिक्षकेतर कर्मचारी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में दोनों के स्वस्थ और सुदीर्घ जीवन की कामना की।

वैदिक ऋचाओं से यूजीसी तक: क्या हम सामाजिक न्याय की मूल भावना को भूल गए हैं?

विशेष विश्लेषण |

वर्तमान भारतीय समाज में जब शिक्षा, योग्यता और सामाजिक न्याय को लेकर तीखी बहसें सुनाई देती हैं—विशेषकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े हालिया विमर्शों और आरक्षण की नीतियों में—तब यह अनिवार्य हो जाता है कि हम केवल वर्तमान के तात्कालिक और सतही प्रश्नों में उलझकर न रह जाएँ। आज योग्यता (Merit) बनाम सामाजिक प्रतिनिधित्व के संघर्ष में एक ऐसा शोर पैदा हो गया है, जिसमें इतिहास के वे मूल तथ्य दब गए हैं जहाँ से हमारी सामाजिक यात्रा शुरू हुई थी।

यह लेख किसी वैचारिक पक्ष में फैसला सुनाने के बजाय एक गंभीर आग्रह करता है कि हम उस ऐतिहासिक मार्ग को “जैसा है, वैसा ही” समझें, ताकि आज की चर्चा सही दिशा में आगे बढ़ सके।

विराट पुरुष का रूपक: विभाजन नहीं, संतुलन का प्रतीक

भारतीय समाज की संरचना को लेकर होने वाली चर्चाओं का केंद्र अक्सर ऋग्वेद के १०वें मंडल का ‘पुरुषसूक्त’ होता है। ऋग्वेद (10.90.12) में कहा गया है:

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्, बाहू राजन्यः कृतः, ऊरू तदस्य यद्वैश्यः, पद्भ्यां शूद्रो अजायत।

अर्थात्, विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से राजन्य (क्षत्रिय), जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। सदियों से इस सूक्त की व्याख्या ऊँच-नीच के पायदान के रूप में की गई, जिसने समाज को श्रेणियों में बाँटा। लेकिन यदि हम इसके मूल अर्थ की गहराई में जाएँ, तो यह विभाजन का नहीं, बल्कि ‘संतुलन’ का प्रतीक था।

वैदिक काल का यह रूपक समाज को एक जीवित शरीर की तरह देखता था। जिस तरह शरीर के जीवित रहने के लिए मुख (ज्ञान-प्रसार), भुजा (रक्षा), जंघा (आर्थिक मजबूती) और पैर (श्रम और आधार) की समान महत्ता है, उसी तरह समाज के हर वर्ग की अपनी विशिष्ट भूमिका थी। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह वर्णन प्रतीकात्मक और कार्यात्मक था, न कि जैविक या जन्मगत। इस सूक्त में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि व्यक्ति जन्म से ही किसी श्रेणी में जकड़ा हुआ है। यह समाज की एक कार्यात्मक व्यवस्था थी, जहाँ हर अंग का सम्मान बराबर था क्योंकि एक भी अंग के बिना ‘विराट पुरुष’ यानी समाज पूर्ण नहीं हो सकता था।


एक घर, अनेक कर्म: जब हुनर से तय होती थी कुल की पहचान

वैदिक समाज के वास्तविक जीवन को समझने के लिए ऋग्वेद (9.112.3) का एक अत्यंत सहज और क्रांतिकारी संदर्भ मिलता है। यहाँ एक व्यक्ति कहता है:

मैं खेती करता हूँ। मेरी बहन गीत गाती है, मेरी माँ आटा पीसती है और मेरे पिता कोई अन्य कार्य करते हैं।”

यह मंत्र उस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है कि वैदिक काल में जाति एक बंद और जड़ व्यवस्था थी। यह दैनिक जीवन का चित्र स्पष्ट करता है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवार के सदस्य अलग-अलग व्यवसायों में संलग्न थे। यहाँ सामाजिक पहचान ‘कुल’ या ‘जन्म’ से नहीं, बल्कि ‘हुनर’ और ‘कर्म’ से तय होती थी।

इस काल में योग्यता का पैमाना लचीला था। व्यक्ति सीख सकता था, अपनी क्षमता बढ़ा सकता था और अपनी सामाजिक भूमिका बदल सकता था। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ योग्यता (Merit) जन्म का मोहताज नहीं थी। यदि आज हम यूजीसी और उच्च शिक्षा में योग्यता की बात करते हैं, तो हमें याद करना होगा कि हमारे पूर्वजों ने योग्यता को किसी एक कुल की बपौती नहीं माना था।

इतिहास की फिसलन: कैसे लचीला समाज जड़ता की बेड़ियों में जकड़ा गया

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि शुरुआती समाज इतना गतिशील था, तो वह आज के जातिगत ढाँचे में कैसे बदला? यह एक ‘ऐतिहासिक फिसलन’ थी जो कई चरणों में पूरी हुई।

  1. स्मृति और धर्मसूत्रों का काल: उपनिषदों के बाद जैसे-जैसे समाज जटिल हुआ, कार्य-विभाजन को संहिताबद्ध करने की कोशिशें शुरू हुईं। यहाँ से ‘जन्म’ का महत्त्व बढ़ने लगा और व्यवसायों को वंशानुगत बनाने के नियम कड़े किए गए।
  2. सत्ता और नियंत्रण: मध्यकाल तक आते-आते यह विभाजन केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं रहा, बल्कि सत्ता और सामाजिक नियंत्रण का औज़ार बन गया। जातियों को ऊँच-नीच की सीढ़ियों में बाँट दिया गया ताकि संसाधनों पर एकाधिकार बना रहे।
  3. औपनिवेशिक प्रभाव: ब्रिटिश काल में जनगणना और प्रशासनिक वर्गीकरण ने इन भेदों को कानूनी जामा पहना दिया, जिससे समाज के वे खुले दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए जो वैदिक काल में खुले थे।

यही वह दौर था जब ‘विराट पुरुष’ का गतिशील शरीर जंजीरों से जकड़े हुए एक जड़ ढांचे में बदल गया, जहाँ पैरों को आधार नहीं बल्कि हीन समझा जाने लगा।

वर्तमान की चुनौती: चर्चा की सही शुरुआत और ऐतिहासिक सत्य का स्वीकार

आज जब हम सामाजिक न्याय, आरक्षण और योग्यता के मानकों पर बहस करते हैं, तो अक्सर हम इस इतिहास को भूल जाते हैं। वर्तमान की चुनौती यह नहीं है कि हम केवल आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में खड़े हों, बल्कि चुनौती यह है कि हम उस ‘लचीलेपन’ को पुनः प्राप्त करें जो हमारी जड़ों में था।

यूजीसी या शिक्षा नीति की बहसों में लगे बुद्धिजीवियों और नीति-निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस ऐतिहासिक यात्रा को समझें। सामाजिक न्याय केवल एक संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह उस प्राचीन व्यवस्था को पुनः प्राप्त करने का प्रयास है जहाँ व्यक्ति की उन्नति में उसका जन्म बाधा न बने।

यह लेख इसी बड़ी चर्चा की एक शुरुआती प्रवेशिका है। आज हमें यह स्वीकार करना होगा कि जिस व्यवस्था को हम ‘परंपरा’ कहकर बचाते या कोसते हैं, वह मूलतः वैसी नहीं थी। हमने रास्ते में कहीं न कहीं अपनी मूल दिशा खो दी है। जब तक हम यह नहीं समझते कि हम कहाँ से चले थे—जहाँ एक ही घर में किसान और विद्वान साथ रहते थे—तब तक हम एक समावेशी भविष्य का निर्माण नहीं कर पाएंगे।

, सामाजिक न्याय की बहस का अंत किसी को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि ‘विराट पुरुष’ के हर अंग को उसकी खोई हुई गरिमा वापस दिलाने में है। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

समस्तीपुर: मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान आइसा का जोरदार प्रदर्शन, सड़क पर लेटे कार्यकर्ता

समस्तीपुर। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘समृद्धि यात्रा’ के समस्तीपुर आगमन पर आइसा (AISA) कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगों को लेकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। जनहितैषी मांगों से संबंधित मांगपत्र मुख्यमंत्री को सौंपने के संकल्प के साथ कार्यकर्ताओं ने जितवारपुर से एक विशाल जुलूस निकाला।

अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन करते पर आइसा कार्यकर्ता

पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक

जैसे ही जुलूस आगे बढ़ा, पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए नारेबाजी कर रहे कार्यकर्ताओं को रास्ते में ही रोक दिया। पुलिस द्वारा रोके जाने से आइसा कार्यकर्ता आक्रोशित हो गए। विरोध स्वरूप कई कार्यकर्ता चांदनी चौक स्थित बैरिकेडिंग के पास ही सड़क पर लेट गए और सरकार विरोधी नारेबाजी करने लगे। इस दौरान काफी देर तक अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।

अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद शांत हुआ मामला

स्थिति को बिगड़ता देख जिले के वरीय अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने आक्रोशित छात्रों को समझाने-बुझाने का काफी प्रयास किया। अंततः, प्रशासन ने कार्यकर्ताओं से मांगपत्र प्राप्त किया और यह आश्वासन दिया कि इसे मुख्यमंत्री तक पहुंचा दिया जाएगा। इसके बाद ही छात्र वहां से हटने को तैयार हुए, हालांकि पुलिस ने उन्हें सभा स्थल पर जाने की अनुमति नहीं दी।

संवैधानिक अधिकार छीन नहीं सकती सरकार”

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे छात्र नेताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री को अपनी समस्याओं से अवगत कराना और मांगपत्र सौंपना उनका संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा:

“बिहार के मुख्यमंत्री को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें सौंपना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है। प्रशासन बल प्रयोग कर इस अधिकार को छीन नहीं सकता।”

इस प्रदर्शन के कारण कुछ देर के लिए यातायात बाधित रहा, लेकिन मांगपत्र सौंपे जाने के बाद स्थिति सामान्य हो गई।

आधी रात को पुलिस की घेराबंदी से सहमा माले नेता का परिवार; DM से जांच और कार्रवाई की मांग

ताजपुर/समस्तीपुर | 29 जनवरी 2025

मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ के मद्देनजर पुलिस की सक्रियता अब विवादों में घिर गई है। ताजपुर में भाकपा माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह के घर पर बुधवार की आधी रात हुई पुलिसिया कार्रवाई ने सुरक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सीसीटीवी से ली  गई तस्‍वीर में पूछ ताछ करती पुलिस

सोते हुए परिवार के बीच पहुंची पुलिस

माले नेता सुरेंद्र सिंह ने बताया कि बुधवार रात करीब 1:30 बजे बड़ी संख्या में पुलिस बल ने उनके घर को चारों तरफ से घेर लिया। मुख्य द्वार पर देर तक चली पूछताछ और पुलिस की मौजूदगी से घर में मौजूद उनकी पत्नी व ऐपवा नेत्री बंदना सिंह, उनके बेटे-बेटी और आसपास के मोहल्लेवासी दहशत में आ गए। सुरेंद्र सिंह का आरोप है कि उन्हें मुख्यमंत्री की यात्रा के दौरान जुलूस निकालने से रोकने के नाम पर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया है।

जनता की आवाज दबाने की कोशिश”

घटना पर कड़ा ऐतराज जताते हुए माले नेता ने कहा कि अपराधियों को पकड़ने के बजाय पुलिस उन लोगों को निशाना बना रही है जो जनता के सवाल उठाते हैं। उन्होंने कहा, “मैं संविधान के दायरे में रहकर जन-समस्याओं और मानवाधिकारों के लिए लड़ता हूँ। आधी रात को सपरिवार इस तरह का घेराव न केवल अलोकतांत्रिक है बल्कि एक सामाजिक और मानसिक आघात भी है।”

कार्रवाई न होने पर आंदोलन की दी चेतावनी

इस घटना को लेकर कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों में काफी रोष है। सुरेंद्र सिंह ने समस्तीपुर के जिला पदाधिकारी (DM) से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर सख्त कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में जिला प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला और पुलिसिया दमन नहीं रुका, तो वे इसके खिलाफ जोरदार आंदोलन शुरू करेंगे।

स्मार्ट मीटर का ‘करंट’: दो बल्ब जलाने वाले मैकेनिक को थमाया 77 हजार का बिल, विभाग की लापरवाही से उपभोक्ता बेहाल

ताजपुर (समस्तीपुर) | 27 जनवरी 2026 संवाददाता

बिहार में स्मार्ट मीटर को लेकर उठ रहे सवालों के बीच ताजपुर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक गरीब मोटरसाइकिल मिस्त्री के पैरों तले उस वक्त जमीन खिसक गई, जब मात्र दो बल्ब जलाने वाली उसकी दुकान का बिजली बिल अचानक हजारों में पहुँच गया। हद तो तब हो गई जब बिजली कटने के बाद भी मीटर का बिल किसी रॉकेट की रफ्तार से हर दिन हजारों रुपये बढ़ता रहा। फिलहाल विभाग की इस तकनीकी ‘जादूगरी’ ने उपभोक्ता को अंधेरे और मानसिक तनाव में धकेल दिया है।

मो० हसनैन का बिजली बिल

रिचार्ज के बाद भी नहीं लौटी रोशनी, खुला राज

मामला ताजपुर नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या 17, रामदयाल चौक का है। यहाँ मो० हसनैन अपनी मोटरसाइकिल मरम्मत की छोटी सी दुकान चलाते हैं। दुकान में स्मार्ट मीटर (उपभोक्ता संख्या 113406441496) लगा हुआ है। हसनैन के मुताबिक, वह नियमित रूप से मीटर रिचार्ज करते थे और शाम के वक्त सिर्फ दो बल्ब जलाते थे।

बीती 22 जनवरी को अचानक उनकी दुकान की बिजली कट गई। उन्हें लगा कि बैलेंस खत्म हो गया होगा। उन्होंने तुरंत 100 रुपये का रिचार्ज किया, लेकिन बिजली नहीं आई। दोबारा 100 रुपये डाले, फिर भी अंधेरा कायम रहा। जब उन्होंने अपना बैलेंस चेक किया, तो उनके होश उड़ गए। मीटर पर बकाया राशि 38,500 रुपये दिख रही थी।

रॉकेट की रफ्तार से बढ़ता बिल: एक अनोखा अजूबा

हसनैन के लिए परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, बिल किसी शेयर बाजार के ग्राफ की तरह ऊपर चढ़ता गया। विभाग की संवेदनहीनता और तकनीक की खामी का आलम देखिए:

  • 23 जनवरी: बिल बढ़कर 46,365 रुपये हो गया।
  • 24 जनवरी: आंकड़ा 54,134 रुपये तक जा पहुँचा।
  • 25 जनवरी: बिल 58,000 रुपये के पार हुआ।
  • 26 जनवरी: बिल ने छलांग लगाई और 77,441 रुपये पर जा टिका।

हैरानी की बात यह है कि 22 जनवरी से दुकान की बिजली आपूर्ति पूरी तरह बंद है। जब बिजली की खपत शून्य है, तो बिल हर दिन 5 से 8 हजार रुपये कैसे बढ़ रहा है? यह सवाल पूरे ताजपुर में चर्चा का विषय बना हुआ है।

अधिकारियों की चिरनिंद्राऔर उपभोक्ता की बेबसी

पीड़ित मो० हसनैन ने बताया कि उन्होंने इस गड़बड़ी को लेकर स्थानीय मिस्त्री से लेकर कनीय अभियंता (JE) तक का दरवाजा खटखटाया, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ हासिल नहीं हुआ। जहाँ एक ओर सरकार और विभाग स्मार्ट मीटर को पारदर्शी और सटीक बताते नहीं थकते, वहीं हसनैन जैसे छोटे दुकानदार इस ‘स्मार्ट’ सिस्टम के शिकार हो रहे हैं।

“मेरा कोई बकाया नहीं था, मैं वक्त पर रिचार्ज करता था। अब जब दुकान की बिजली ही कटी हुई है, तो बिल किस बात का बढ़ रहा है? क्या विभाग गरीब की जेब काटने के लिए यह मीटर लाया है?”— मो० हसनैन, पीड़ित उपभोक्ता

सिस्टम पर उठते गंभीर सवाल

यह घटना विद्युत विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या विभाग के सॉफ्टवेयर में कोई बड़ा ‘बग’ है? या फिर जानबूझकर उपभोक्ताओं पर इस तरह का आर्थिक बोझ डाला जा रहा है? ताजपुर की जनता अब इस मामले में उग्र हो रही है। लोगों का कहना है कि अगर जल्द ही हसनैन का बिल सुधार कर बिजली बहाल नहीं की गई, तो वे आंदोलन को मजबूर होंगे।

फिलहाल, मो० हसनैन की दुकान में अंधेरा है और उनका रोजगार प्रभावित हो रहा है, लेकिन बिजली विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं।

भाकपा माले ने संभाला मोर्चा, आंदोलन की दी चेतावनी : उपभोक्ता की इस गंभीर समस्या की जानकारी मिलते ही भाकपा माले के नेताओं ने मामले में हस्तक्षेप किया है। शिकायत मिलने पर भाकपा माले नेता प्रभात रंजन गुप्ता एवं ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह के नेतृत्व में पीड़ित उपभोक्ता मो० हसनैन से मुलाकात की। नेताओं ने मौके पर पहुँचकर मीटर की स्थिति देखी और उपभोक्ता की परेशानियों को जाना।

माले नेताओं ने बिजली विभाग के इस रवैये पर कड़ा रोष व्यक्त किया है। प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने विभाग को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि विभाग अविलंब इस खराब मीटर को बदले, बिल में सुधार करे और तुरंत विद्युत आपूर्ति बहाल करे। यदि जल्द ही समाधान नहीं निकाला गया, तो भाकपा माले उपभोक्ता के सहयोग से बिजली विभाग के खिलाफ उग्र आंदोलन चलाने को मजबूर होगी।”

बाल विवाह मुक्त भारत: समस्तीपुर में जागरूकता की नई अलख, एसडीओ ने हरी झंडी दिखाकर ‘मुक्ति रथ’ को किया रवाना

समस्तीपुर | निज प्रतिनिधि समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध जंग छेड़ते हुए समस्तीपुर के बलिराम भगत महाविद्यालय (बी.आर.बी. कॉलेज) के सभागार में सोमवार को ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ कार्यशाला का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) दिलीप कुमार ने महाविद्यालय परिसर से, जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से ‘बाल विवाह मुक्ति रथ’ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

हरी झंडी दिखाकर ‘मुक्ति रथ’ को रवाना करते अनुमंडल पदाधिकारी

शिक्षा ही कुरीतियों का एकमात्र समाधान: एसडीओ

कार्यशाला को संबोधित करते हुए अनुमंडल पदाधिकारी श्री दिलीप कुमार ने समाज के हर वर्ग, विशेषकर युवाओं और अभिभावकों को कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि बाल विवाह न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह एक बच्चे के भविष्य, स्वास्थ्य और उसके मौलिक अधिकारों का हनन भी है। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “बाल विवाह से मुक्ति का सर्वोत्तम द्वार विद्यालय है।”

एसडीओ ने अपने संबोधन में तर्क दिया कि जब तक समाज का हर बच्चा स्कूल की दहलीज के भीतर होगा, तब तक उसे इस कुप्रथा की बेड़ियों से सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि कानून अपनी जगह है, लेकिन इस अभिशाप को जड़ से मिटाने के लिए एक व्यापक सामाजिक बदलाव की जरूरत है। प्रशासन केवल सहयोग कर सकता है, लेकिन परिवर्तन की असली मशाल आम जनता को उठानी होगी।

हस्ताक्षर अभियान से दिया एकजुटता का संदेश

कार्यक्रम के दौरान एक विशेष हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की गई। श्री दिलीप कुमार ने बाल विवाह मुक्ति रथ के समर्थन में अपने हस्ताक्षर कर इस मुहिम को प्रशासनिक और व्यक्तिगत समर्थन दिया। उन्होंने उपस्थित छात्र-छात्राओं से अपील की कि वे अपने आस-पड़ोस में होने वाले ऐसे किसी भी आयोजन का विरोध करें और इसकी सूचना तुरंत प्रशासन को दें।

सामाजिक संगठनों की भागीदारी और सम्मान

इस कार्यशाला में जिले भर के विभिन्न सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के आयोजक और जवाहर ज्योति बाल विकास केन्द्र के सचिव सुरेन्द्र कुमार ने एसडीओ दिलीप कुमार के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संस्था पिछले लंबे समय से बच्चों के अधिकारों के लिए कार्य कर रही है और प्रशासन का यह सहयोग इस मुहिम को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

अनुमंडल पदाधिकारी को मोमेंटो (स्मृति चिन्ह) भेंट कर सम्मानित करते जवाहर ज्योति बाल विकास केन्द्र सचिव सुरेन्द्र कुमार

कार्यक्रम के अंत में सचिव सुरेन्द्र कुमार ने अनुमंडल पदाधिकारी को मोमेंटो (स्मृति चिन्ह) भेंट कर सम्मानित किया। साथ ही, क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले अन्य समाजसेवियों को भी प्रोत्साहित किया गया।

क्या है ‘बाल विवाह मुक्ति रथ’ का उद्देश्य?

यह रथ समस्तीपुर जिले के विभिन्न प्रखंडों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण करेगा। ध्वनि विस्तारक यंत्रों (लाउडस्पीकर) और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से यह रथ लोगों को निम्नलिखित विषयों पर जागरूक करेगा:

  • बाल विवाह के कानूनी दुष्परिणाम (POCSO और बाल विवाह निषेध अधिनियम)।
  • कम उम्र में विवाह से लड़कियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाला बुरा प्रभाव।
  • शिक्षा के महत्व और सरकार द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्तियों की जानकारी।
हस्ताक्षर अभियान के द्वारा एकजुटता का संदेश देते उपस्थित लोग

इस अवसर पर कॉलेज के प्राचार्य, शिक्षकगण, स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि और सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में संकल्प लिया कि वे समस्तीपुर को बाल विवाह मुक्त जिला बनाने में अपना पूर्ण योगदान देंगे।

भ्रष्टाचार और विकास कार्यों में शिथिलता के खिलाफ ताजपुर में नगर परिषद पार्षदों का आमरण अनशन शुरू

ताजपुर (समस्तीपुर) | 27 जनवरी 2026 ताजपुर नगर परिषद में विकास कार्यों की अनदेखी और प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ मंगलवार को पांच वार्ड पार्षदों ने मोर्चा खोलते हुए अनिश्चितकालीन आमरण अनशन शुरू कर दिया है। पार्षदों का आरोप है कि नगर प्रशासन नियमों को ताक पर रखकर काम कर रहा है, जबकि आम जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है।

अनशन पर बैठे पार्षद मुकेश कुमार मेहता, रवि कुमार, जावेद अकरम, अजहर मिकरानी और दुर्गा प्रसाद साह

प्रमुख आरोप: विश्राम कक्ष पर लाखों खर्च, गरीबों का भुगतान ठप

अनशन पर बैठे पार्षद मुकेश कुमार मेहता, रवि कुमार, जावेद अकरम, अजहर मिकरानी और दुर्गा प्रसाद साह ने कार्यपालक पदाधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्षदों का कहना है कि:

  • पिछले 6 महीनों से क्षेत्र में एक भी नई विकास योजना शुरू नहीं की गई है।
  • आवास योजना के लाभुकों का भुगतान जानबूझकर रोका गया है।
  • आवास लाभुकों से जबरन 1,000 रुपये के स्टाम्प पर एफिडेविट (शपथ पत्र) मांगा जा रहा है, जो नियम विरुद्ध है।
  • जनता के पैसों का दुरुपयोग करते हुए नियमों को ताक पर रखकर 25 लाख रुपये की लागत से कार्यपालक पदाधिकारी का ‘विश्राम कक्ष’ बनाया जा रहा है।

राजनीतिक समर्थन और जनसभा

अनशन स्थल पर वार्ड पार्षद राजीव सूर्यवंशी की अध्यक्षता और अहमद रज़ा उर्फ मिन्टू बाबू के संचालन में एक सभा आयोजित की गई। इस दौरान अशोक कुमार, संतोष कुमार, दिनेश कुमार साह समेत दर्जनों पार्षदों और स्थानीय नेताओं ने संबोधित किया।

अनशन कार्यक्रम को स्रबोधित करते भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह

भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने अपनी टीम के साथ अनशन स्थल पर पहुंचकर आंदोलन को अपना सक्रिय समर्थन दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही मांगें पूरी नहीं हुईं, तो भाकपा माले वार्ड पार्षदों के साथ मिलकर उग्र आंदोलन करेगी।

अधिकारी की अनुपस्थिति पर नाराजगी

आंदोलनकारियों ने इस बात पर गहरा रोष व्यक्त किया कि जब इतना बड़ा प्रदर्शन चल रहा है, तब कार्यपालक पदाधिकारी जुल्फेकार अली प्यामी कार्यालय से नदारद रहे। मौके पर मजिस्ट्रेट और भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है, लेकिन प्रशासन के किसी वरिष्ठ अधिकारी के वार्ता के लिए न आने से पार्षदों में आक्रोश है।

“जब तक आवास योजना के लाभुकों का भुगतान नहीं होता और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगती, हमारा अनशन जारी रहेगा।”अनशनकारी पार्षद

शिक्षा और राष्ट्रभक्ति का संगम: वेव वर्ल्ड स्कूल में गणतंत्र दिवस पर शिक्षकों ने पेश की मिसाल, मानव श्रृंखला बनाकर जगाई अलख

मुजफ्फरपुर, सकरा। उत्तर बिहार के प्रमुख जिलों में शुमार मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड अंतर्गत प्रगति मोड़ स्थित वेव वर्ल्ड स्कूल (मझौलिया) में 77वें गणतंत्र दिवस का उत्सव केवल एक औपचारिक समारोह नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और शैक्षणिक क्रांति के संकल्प का गवाह बना। 26 जनवरी 2026 की सुबह जब पूरा देश तिरंगे के सम्मान में नतमस्तक था, तब वेव वर्ल्ड स्कूल के प्रांगण में देशभक्ति का एक अनूठा जज्बा देखने को मिला। यहाँ शिक्षकों ने अपनी पेशेवर प्रतिबद्धता को राष्ट्र सेवा से जोड़ते हुए न सिर्फ तिरंगा फहराया, बल्कि समाज को शिक्षित करने के लिए एक विशेष जागरूकता अभियान का बिगुल भी फूँका।

वेव वर्ल्ड स्कूल (मझौलिया) में 77वें गणतंत्र दिवस समारोह का दृश्‍य

गणतंत्र की गरिमा और शिक्षकों का संकल्प

समारोह की शुरुआत सुबह विद्यालय के निदेशक राजीव गुप्ता और प्राचार्या दिव्या कुमारी द्वारा संयुक्त रूप से ध्वजारोहण के साथ हुई। राष्ट्रगान की गूँज और ‘भारत माता की जय’ के नारों के बीच पूरा परिसर तिरंगामय हो गया। इस अवसर पर विद्यालय के शिक्षकों ने अपनी एकजुटता दिखाते हुए एक अनुकरणीय पहल की।

आठ शिक्षकों ने एक साथ मिलकर मानव श्रृंखला (Human Chain) बनाई। यह श्रृंखला इस बात का प्रतीक थी कि समाज के निर्माण में शिक्षक एक सुदृढ़ कड़ी की तरह कार्य करते हैं। इस दौरान शिक्षकों ने सत्र 2026-2027 के लिए नामांकन जागरूकता संबंधी पोस्टर भी जारी किया। पोस्टर पर वेलकम वेव वर्ल्ड स्कूल: एडमिशन सेशन ओपन” के माध्यम से अभिभावकों को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि बेहतर भविष्य के लिए बच्चों का सही उम्र में सही स्कूल से जुड़ना अनिवार्य है। शिक्षकों का मानना था कि एक शिक्षित बच्चा ही सशक्त गणतंत्र की नींव रख सकता है।

एकजुटता का संदेश: सकरा के वेव वर्ल्ड स्कूल में गणतंत्र दिवस पर मानव श्रृंखला बनाकर शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते स्कूल के शिक्षक और शिक्षिकाएं। साथ ही नए सत्र के नामांकन हेतु जारी किया गया जागरूकता पोस्टर (उपर एवं नीचे के दृश्‍यों में।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में झलकी भारत की विविधता

गणतंत्र दिवस के इस गौरवशाली अवसर पर विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने एक से बढ़कर एक रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ देकर अतिथियों को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ निहारिका द्वारा प्रस्तुत श्री गणेश वंदना से हुआ, जिसने पूरे माहौल को आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया।

इसके बाद मंच पर सुरों और ताल का ऐसा संगम हुआ कि हर कोई तालियाँ बजाने पर मजबूर हो गया:

  • बेटियों का सम्मान: सरस्वती और संजना ने भारत की बेटी गीत पर अपनी प्रस्तुति देकर समाज में नारी शक्ति के महत्व को रेखांकित किया।
  • बचपन और उमंग: श्रेया मेहता और सान्वी ने दिल है छोटा सा गाने पर नृत्य कर बचपन की मासूमियत बिखेरी।
  • देशभक्ति का जोश: राष्ट्रभक्ति के गीतों की कड़ी में राजनन्दनी और पिहुरानी ने तिरंगा ऊँचा रहेगा गाकर सबका सीना फख्र से चौड़ा कर दिया। वहीं, सोनम ने संदेशे आते हैं के माध्यम से सीमाओं पर तैनात जवानों की याद दिला दी।
  • सामाजिक चेतना: समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार करते हुए अनु ने जीना है तो पापा शराब मत पीना जैसे संवेदनशील गीत के जरिए शराबबंदी और नशामुक्त समाज का संदेश दिया।
  • संस्कृति और लोक: राधा कुमारी ने जिस देश में गंगा बहती है और रियांसी कुमारी ने लंदन देखा पेरिस देखा के जरिए भारतीय संस्कृति की महानता को दर्शाया।
  • महापुरुषों को नमन: सोनम ने हम भीम राव के बच्चे गीत के जरिए संविधान निर्माता को श्रद्धांजलि अर्पित की।
  • सिमा, श्रृष्टी, स्वाती, अनु, और अनामिका की टीम ने लल्ला लल्ला लोरी पर मनमोहक प्रस्तुति दी, जबकि निशात, कृतिक, शिवाशु और अंशु ने भी अपनी कला का प्रदर्शन कर खूब वाहवाही लूटी।
कला के रंग, देश के संग: तिरंगे की आन-बान और शान में अपनी प्रस्तुति देते नन्हे कलाकार।

निदेशक का संबोधन: “इतिहास से सीखें युवा पीढ़ी”

समारोह को संबोधित करते हुए विद्यालय के निदेशक राजीव गुप्ता ने बच्चों को स्वतंत्रता संग्राम के अनसुने पन्नों से रूबरू कराया। उन्होंने वीर क्रांतिकारियों और अमर शहीदों की कहानियाँ सुनाते हुए कहा कि आज हम जिस आजाद हवा में सांस ले रहे हैं, उसके पीछे लाखों कुर्बानियाँ हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि अनुशासन और शिक्षा ही वह अस्त्र हैं, जिनसे हम अपने देश को विश्व गुरु बना सकते हैं।

प्राचार्या दिव्या कुमारी ने अपने संबोधन में शिक्षकों के समर्पण की सराहना की और कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए बच्चों और अभिभावकों का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि वेव वर्ल्ड स्कूल केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास और नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा देने के लिए कृतसंकल्पित है।

मंच संचालन और व्यवस्था

पूरे कार्यक्रम का सफल और ऊर्जावान मंच संचालन आदित्य कुमार और सन्नी कुमार ने किया। उनकी शायरी और उत्साहवर्धक टिप्पणियों ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। इस अवसर पर शिक्षिका अदिबा सुल्ताना, रौशन खतून, अर्चना कुमारी, प्रियंका कुमारी और नेहा कुमारी ने कार्यक्रम के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाई।

समारोह के अंत में सभी बच्चों के बीच मिठाई का वितरण किया गया। गणतंत्र दिवस का यह उत्सव सकरा क्षेत्र में चर्चा का विषय बना रहा, विशेषकर शिक्षकों द्वारा बनाई गई मानव श्रृंखला ने शिक्षा के प्रति एक नई चेतना जागृत करने का कार्य किया है।

जीवन उत्सव है, तो विछोह महोत्सव: संत जोसेफ पब्लिक स्कूल में गणतंत्र दिवस और विदाई समारोह का भव्य आयोजन

मुजफ्फरपुर। 26 जनवरी 2026 देशभक्ति का जज्बा, तिरंगे की आन, और भविष्य की सुनहरी यादों का संगम—मुजफ्फरपुर स्थित संत जोसेफ पब्लिक स्कूल के प्रांगण में आज कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। अवसर था 77वें गणतंत्र दिवस के गौरवशाली उत्सव का, जिसे विद्यालय परिवार ने पूरी श्रद्धा, निष्ठा और हर्षोल्लास के साथ मनाया। इस राष्ट्रीय पर्व के साथ-साथ विद्यालय ने अपने बोर्ड परीक्षार्थियों के लिए एक भावुक विदाई समारोह का भी आयोजन किया, जिसने इस दिन को ऐतिहासिक बना दिया।

संत जोसेफ पब्लिक स्कूल के गणतंत्र दिवस समारोह में कार्यक्रम प्रस्‍तुत करती छात्रा  

शान से लहराया तिरंगा

समारोह का विधिवत शुभारंभ प्रातः काल विद्यालय के सचिव डॉ. अरविन्द कुमार द्वारा ध्वजारोहण के साथ हुआ। जैसे ही तिरंगा आसमान की ऊंचाइयों को छूने लगा, पूरा परिसर ‘जन-गण-मन’ के स्वरों से गुंजायमान हो उठा। इस गौरवशाली क्षण के साक्षी बने विद्यालय के अध्यक्ष प्रवीण कुमार, निदेशक लालबाबू प्रसाद, प्राचार्य दीपक मिश्र, समस्त शिक्षकगण और तिरंगे के सम्मान में कतारबद्ध खड़े विद्यार्थी एवं अभिभावकगण ।

संत जोसेफ पब्लिक स्कूल के गणतंत्र दिवस समारोह में कार्यक्रम प्रस्‍तुत करती छात्रा  

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में दिखी प्रतिभा की झलक

गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह के दूसरे चरण में छात्र-छात्राओं ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। संगीत, नृत्य और ओजस्वी भाषणों ने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए।

  • सुरों का संगम: संगीत प्रतियोगिता में कक्षा-8 की जोया ने अपनी मधुर आवाज से प्रथम स्थान प्राप्त किया, जबकि नन्ही कनक (कक्षा-1) ने द्वितीय स्थान हासिल कर सबका दिल जीत लिया।
  • नृत्य की छटा: रिकॉर्डिंग डांस में वर्षा (कक्षा-8) ने अपनी ऊर्जावान प्रस्तुति से प्रथम स्थान पाया।
  • वाणी का ओज: अंग्रेजी भाषण में नमीत (10B) और हिंदी भाषण में नन्ही आरुषि (1B) ने अपनी वाकपटुता का लोहा मनवाया। वहीं उर्दू में जोया और संस्कृत में आदित्य ने प्रथम स्थान प्राप्त कर यह दिखाया कि संस्थान सभी भाषाओं और संस्कारों का सम्मान करता है।

भावुक विदाई: “जीवन उत्सव है, तो विछोह महोत्सव”

कार्यक्रम का सबसे मर्मस्पर्शी हिस्सा वह रहा जब सत्र 2025-26 के बोर्ड (अपीयरिंग) छात्र-छात्राओं को विदाई दी गई। इस अवसर पर अध्यक्ष प्रवीण कुमार का संबोधन किसी दर्शन से कम नहीं था। उन्होंने छात्रों की आँखों में नमी देखते हुए बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा— जीवन उत्सव है, तो विछोह महोत्सव है।”

उन्होंने समझाया कि जुदाई को दुख के रूप में नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। उन्होंने कहा, “दुख को हंसकर जीना ही मनुष्य की सबसे बड़ी जीत है। आज आप यहाँ से विदा नहीं हो रहे, बल्कि समाज के बड़े फलक पर अपनी पहचान बनाने के लिए प्रस्थान कर रहे हैं।”

17 वर्षों का गौरवशाली इतिहास और संकल्प

अध्यक्ष प्रवीण कुमार ने संस्थान के 17 वर्षों (2008 से अब तक) के सफर को याद करते हुए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उन्होंने कहा कि “हमारा सिद्धांत अटल है—संस्थान की फीस सबसे कम होगी और व्यवस्थाएं सबसे बेहतर होंगी।” उन्होंने अभिभावकों को भरोसा दिलाया कि उनके सुझाव ही विद्यालय की योजनाओं की नींव बनते हैं।

छात्र-छात्राओं को विदाई कार्यक्रम में भेंट प्रदान करते  निदेशक लालबाबू प्रसाद एवं  सचिव डॉ. अरविन्द कुमार(बायें से )

सफलता की वैश्विक गाथा: मुजफ्फरपुर से बर्लिन तक

संस्थान की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए अध्यक्ष ने बताया कि आज संत जोसेफ के पढ़ाए बच्चे न केवल भारत, बल्कि दुनिया के नक्शे पर चमक रहे हैं।

  • वैश्विक उपलब्धि: विद्यालय का एक छात्र तुलसी (मोहनपुर) आज जर्मनी के बर्लिन में कंप्यूटर इंजीनियर है, तो वहीं एक छात्र USA में अमेजन जैसी बड़ी कंपनी में कार्यरत है।
  • सरकारी सेवा: सुमन (सकरा हाई स्कूल) जैसे सैकड़ों छात्र आज सरकारी शिक्षक के रूप में समाज सेवा कर रहे हैं।
  • शून्य विफलता दर: संस्थान का यह रिकॉर्ड रहा है कि आज तक यहाँ का एक भी छात्र असफल नहीं हुआ है। सभी छात्रों ने प्रथम श्रेणी से परीक्षा उत्तीर्ण की है। 10 CGPA और 95% अंक लाना यहाँ की परंपरा बन चुकी है।

चुनौतियों को बनाया अवसर

अध्यक्ष ने 2009 के उस दौर को याद किया जब लोगों ने चुनौती दी थी कि हिंदी माध्यम के बच्चे सीबीएसई बोर्ड कैसे पास करेंगे। उन्होंने गर्व से बताया कि टीम ‘संत जोसेफ’ के कठिन परिश्रम से उन बच्चों ने न केवल परीक्षा पास की, बल्कि 60% से अधिक अंक लाए। उन्हीं में से एक छात्र इंजीनियर अजय कुमार आज इसी विद्यालय में विज्ञान और गणित के शिक्षक के रूप में नई पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं।

चार स्तंभ: शिक्षा, संस्कार और विकास

प्रवीण कुमार ने विद्यालय के चार मुख्य संकल्पों को दोहराया:

  1. सर्व सुलभ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा: जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए भी संभव हो।
  2. सर्वांगीण विकास: पढ़ाई के साथ-साथ खेल और कला में निपुणता।
  3. शैक्षणिक उत्कृष्टता: गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं।
  4. नैतिक मूल्य: ‘विद्यार्थी’ वही है जो शिक्षा और संस्कार से लबरेज हो।
गणतंत्र दिवस समारोह में  शामिल संत जोसेफ पब्लिक स्कूल के छात्रगण

समर्पण की जीवंत मिसाल

अपने व्यक्तिगत जीवन पर चर्चा करते हुए 58 वर्षीय प्रवीण कुमार ने कहा कि जब वे अपने छात्रों की सफलता की कहानियां सुनते हैं, तो उनकी शुगर, प्रेशर और शरीर का दर्द गायब हो जाता है। उनकी बुलंद आवाज और अटूट संकल्प इस बात का प्रमाण था कि वे आने वाले कई दशकों तक बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए तैयार हैं।

समारोह का समापन सामूहिक राष्ट्रगान के साथ हुआ। विदाई के भावुक क्षणों के बीच छात्रों ने संकल्प लिया कि वे जहाँ भी जाएंगे, संत जोसेफ पब्लिक स्कूल के संस्कारों की महक फैलाएंगे।

ताने छोड़िए, अब ‘पिंक बस’ संभालेंगी महादलित बेटियां: गणतंत्र दिवस पर रचेंगी इतिहास

कभी समाज ने सुनाई थी लानतें, अब सलाम करेगा बिहार; महादलित समुदाय की 6 बेटियां बनीं राज्य की पहली महिला बस ड्राइवर।

पटना | 25 जनवरी, 2026 बिहार के सामाजिक इतिहास में 26 जनवरी 2026 की तारीख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने जा रही है। पटना का गांधी मैदान इस दिन न केवल गणतंत्र का उत्सव मनाएगा, बल्कि उस ‘इतिहास’ का गवाह भी बनेगा जिसे समाज के सबसे निचले पायदान से आने वाली छह जांबाज बेटियों ने अपने संघर्ष से गढ़ा है। आरती, रागिनी, अनीता, सावित्री, गायत्री और बेबी—मुसहर समुदाय की ये छह युवतियां बिहार की पहली महिला बस ड्राइवर के रूप में पिंक बस की कमान संभालकर परेड में अपना हुनर दिखाएंगी।

तस्‍वीर में एक साथ खड़ी 6 बेटियां , जो राज्य की पहली महिला बस ड्राइवर बन चुकी है

रूढ़ियों का गियर बदला, तानों को पीछे छोड़ा

इन लड़कियों का बस की स्टियरिंग तक पहुंचने का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। अत्यंत निर्धन परिवारों से आने वाली इन बेटियों को सबसे पहले अपने ही समाज और आसपास के लोगों के तीखे कटाक्षों का सामना करना पड़ा।

पटना के पुनपुन की रहने वाली अनीता के लिए राहें तब और कठिन हो गईं जब उनके ससुराल तक ताने पहुंचने लगे। अनीता बताती हैं, लोग कहते थे कि बहू को इधर-उधर भेज देते हो, पता नहीं क्या करेगी। पुरुष मजाक उड़ाते थे कि हम बस नहीं संभाल पाते, यह लड़की 50 सवारी कैसे ढोएगी?” कुछ ऐसा ही दर्द रागिनी का भी था, जिन्हें शादी की उम्र और ‘भाग जाने’ जैसे ओछे तानों से डराया गया। बेबी को उनकी कम हाइट के लिए कमतर आंका गया, लेकिन आज उन्हीं के हाथ एक्सीलेटर पर हैं और हौसला आसमान पर।

जब सरकार को हार माननी पड़ी, तब इन बेटियों ने संभाली कमान

दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल जब ‘पिंक बस’ सेवा शुरू हुई, तो सरकार का संकल्प था कि इसमें सारा स्टाफ महिलाएं होंगी। कंडक्टर तो मिल गईं, लेकिन पूरे बिहार में बस चलाने के लिए एक भी महिला ड्राइवर नहीं मिली। मजबूरन पुरुष ड्राइवरों को रखा गया।

इस खाली जगह को भरने का बीड़ा उठाया पद्मश्री सुधा वर्गीज की संस्था ‘नारी गुंजन’ ने। उन्होंने महिला विकास निगम के साथ मिलकर इन लड़कियों को औरंगाबाद के IDTR संस्थान में प्रशिक्षण दिलाया। आज ये लड़कियां न केवल बस चला रही हैं, बल्कि परिवहन विभाग के लिए एक मिसाल बन गई हैं।

भविष्य की सारथी‘: सम्मान और रोजगार

परिवहन विभाग अब इन बेटियों के आत्मविश्वास को देखकर गदगद है। विभाग की नोडल अधिकारी ममता कुमारी की देखरेख में ये लड़कियां नियमित अभ्यास कर रही हैं।

  • वेतन और सुरक्षा: ट्रेनिंग पूरी होने के बाद इन्हें 21 हजार रुपये प्रतिमाह का वेतन मिलेगा।
  • विस्तार: परिवहन मंत्री श्रवण कुमार के अनुसार, बिहार को फिलहाल 250 महिला ड्राइवरों की जरूरत है और सरकार अब इच्छुक महिलाओं को निशुल्क प्रशिक्षण देगी।
तस्‍वीर में बस की स्टियरिंग संभालती गायत्री

क्यों यह एक इतिहास है?

यह केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि एक ‘क्रांति’ है। मुसहर समुदाय, जिसे ‘महादलित’ श्रेणी में सबसे पिछड़ा माना जाता रहा है, वहां की बेटियों का बस चलाना लैंगिक और जातीय बेड़ियों को तोड़ने जैसा है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि अवसर मिले, तो ‘आधी आबादी’ का यह हिस्सा न केवल अपना घर, बल्कि पूरे राज्य की परिवहन व्यवस्था का चक्का घुमा सकता है।

जब 26 जनवरी को ये बेटियां गांधी मैदान की धूल उड़ाते हुए पिंक बस लेकर निकलेंगी, तो वह केवल एक परेड नहीं होगी, बल्कि उन तमाम रूढ़ियों की विदाई होगी जिन्होंने सदियों से इन लड़कियों को पीछे रोक रखा था।