पृथ्वी पर ही मिल गया ‘दूसरा मंगल’! भारत के इस राज्य में छिपा है लाल ग्रह के जीवन का रहस्य!

वैज्ञानिकों का अब तक का सबसे बड़ा खुलासा: तमिलनाडु और अटाकामा के बीहड़ों में मिले मंगल ग्रह जैसे दुर्लभ खनिज

नई दिल्ली / तिरुवनंतपुरम (पीआईबी) : क्या पृथ्वी पर ही मंगल ग्रह की दुनिया मौजूद है? भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसा चमत्कारिक और सनसनीखेज दावा किया है, जिसने पूरी दुनिया के विज्ञान जगत में तहलका मचा दिया है। भारतीय वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर ही कुछ ऐसे स्थानों की पहचान की है, जिनकी भूवैज्ञानिक, रासायनिक और भौतिक विशेषताएं बिल्कुल लाल ग्रह (मंगल) से मेल खाती हैं।तमिलनाडु के नेवेली तथा तिरुचिरापल्ली के बीहड़ों और चिली के अटाकामा रेगिस्तान में दो ऐसे अति-दुर्लभ खनिजों की खोज की गई है, जो मंगल ग्रह के रहस्यों और वहां अतीत में मौजूद जीवन के संकेतों से पर्दा उठा सकते हैं।

केवल उपग्रह और ऑर्बिटर डेटा से नहीं चलेगा काम!

ग्रहों की गहन खोज के इस आधुनिक दौर में केवल अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे सैटेलाइट या ऑर्बिटर के आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। मंगल ग्रह की वास्तविक संरचना को समझने के लिए उच्च परिशुद्धता वाले अत्याधुनिक विश्लेषणात्मक उपकरणों की बेहद आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

केरल विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग में स्थित डीएसटी-एफआईएसटी (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग – विज्ञान और प्रौद्योगिकी अवसंरचना में सुधार के लिए कोष) समर्थित प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने लेजर रमन स्पेक्ट्रोमीटर जैसे आधुनिकतम उपकरण की मदद से यह ऐतिहासिक सफलता हासिल की है।

तस्वीरों की ज़बानी: खनिजों का बनना और लैब का सच

बायें तस्‍वीर में – नेवेली के लिग्नाइट आधारस्तर में मार्कासाइट से मेलान्टेराइट के निर्माण की प्रक्रिया: यह चित्र तमिलनाडु के नेवेली में विभिन्न भूगर्भीय चरणों (स्टेज 1, स्टेज 2 और स्टेज 3) के दौरान ऑक्सीकरण और क्षरण से मेलान्टेराइट खनिज के बनने की जटिल प्रक्रिया को दर्शाता है, जो मंगल ग्रह की स्थितियों को समझने में बेहद मददगार है।
मध्‍य तस्‍वीर में –  अटाकामा रेगिस्तान और तिरुचिरापल्ली बीहड़ों में जिप्सम निर्माण का खाका: यह आरेख चिली के अति-शुष्क अटाकामा रेगिस्तान और तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली बीहड़ क्षेत्रों में वाष्पीकरण, भूजल गतिविधियों और मौसम परिवर्तन से जिप्सम खनिज बनने के विभिन्न वैज्ञानिक चरणों को प्रदर्शित करता है।
दायें तस्‍वीर में – केरल विश्वविद्यालय का उच्च तकनीक प्रयोगशाला केंद्र: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के एफआईएसटी (विज्ञान और प्रौद्योगिकी अवसंरचना में सुधार के लिए कोष) द्वारा समर्थित लेजर रमन स्पेक्ट्रोमीटर प्रयोगशाला, जहां शोधकर्ता मंगल ग्रह के अनुरूप खनिजों के स्पेक्ट्रल फिंगरप्रिंट की सूक्ष्मता से जांच कर रहे हैं।

दो रहस्यमयी खनिज: जिप्सम और मेलान्टेराइट

वैज्ञानिक जांच में दो प्रमुख खनिजों की पहचान हुई है जो जलयुक्त सल्फेट हैं और पानी तथा चट्टानों के बीच हुई रासायनिक क्रियाओं को उजागर करते हैं:

  1. मेलान्टेराइट (तमिलनाडु के नेवेली में प्राप्त): यह खनिज सल्फाइड के ऑक्सीकरण से बनता है। यह संकेत देता है कि अतीत में वहां अल्पकालिक नम, अम्लीय और ऑक्सीकरण की स्थितियां रही होंगी—ठीक वैसी ही जैसी मंगल ग्रह पर अनुमानित की जाती हैं।
  2. जिप्सम (तिरुचिरापल्ली बीहड़ और अटाकामा रेगिस्तान में प्राप्त): जिप्सम इस बात का पुख्ता सबूत है कि वहां कभी पानी बहता या मौजूद रहता था। जिप्सम अपने खनिज ढांचे (मैट्रिक्स) में प्राचीन जैविक संकेतों (जीवन के प्रमाणों) को सुरक्षित रखने की अद्भुत क्षमता रखता है।

मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश को मिलेगी नई दिशा

शोध दल अब इसी अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग कर खगोलजीवविज्ञान (एस्ट्रोबायोलॉजी) संबंधी अध्ययनों में जुट गया है। दुनिया भर के ऐसे दुर्लभ और कठिन स्थानों (चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों वाले स्थलों) की पहचान की जा रही है, जिससे पृथ्वी से परे जीवन के साक्ष्य खोजने वाले भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों (स्पेस मिशन) को सही दिशा दी जा सके।

इस महान उपलब्धि और ऐतिहासिक निष्कर्षों को ग्रह विज्ञान की विश्व-प्रसिद्ध शोध पत्रिका ‘जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: प्लैनेट्स’ में दो अलग-अलग शोध पत्रों के रूप में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है।

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