संघ लोक सेवा आयोग के सौ वर्ष: योग्यता, निष्पक्षता और समावेशिता की अनूठी मिसाल!

नई दिल्‍ली : संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने अपनी संस्थागत यात्रा के ऐतिहासिक एक सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर देश की सबसे प्रतिष्ठित चयन संस्था का सफर महज़ एक नौकरी देने वाली एजेंसी का नहीं, बल्कि भारत के प्रशासनिक ढांचे को आकार देने और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का एक जीवंत इतिहास रहा है। एक अक्टूबर 1926 को स्थापित इस संस्थान ने ब्रिटिश राज के एक औपनिवेशिक सलाहकार बोर्ड से लेकर आज के स्वतंत्र और निष्पक्ष संवैधानिक निकाय तक की लंबी दूरी तय की है।

औपनिवेशिक काल और कठिन संघर्ष की दास्तान

सरकारी नौकरियों में नियुक्तियां ‘सिफारिश’ के बजाय ‘योग्यता’ के आधार पर होनी चाहिए, इस सिद्धांत की औपचारिक शुरुआत अठारह सौ पचपन में हुई थी। लंदन में इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) की परीक्षा शुरू की गई, जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी की मनमानी नामांकन व्यवस्था को समाप्त कर खुली प्रतियोगिता की नींव रखी। परंतु, शुरुआती दौर में यह व्यवस्था पूरी तरह से भारतीयों के लिए लगभग असंभव थी क्योंकि परीक्षा केवल लंदन में, अंग्रेजी भाषा में और ग्रीक तथा लैटिन जैसे विषयों पर आधारित होती थी।

इन तमाम बाधाओं को पार करते हुए अठारह सौ बासठ में रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता से इंग्लैंड की यात्रा की और अठारह सौ तिरेसठ में यह कठिन परीक्षा पास कर इतिहास रच दिया। वे पहले ऐसे भारतीय बने जो ‘हेवन-बॉर्न सर्विस’ (स्वर्ग से आई सेवा) कहे जाने वाले इस प्रशासनिक पद पर पहुंचे। उनके बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिहारी लाल गुप्ता और रमेश चंद्र दत्त जैसे मनीषियों ने इसी कठिन मार्ग का अनुसरण किया। लगातार राष्ट्रवादी दबावों और आंदोलनों के बाद उन्नीस सौ बाईस में लंदन के साथ-साथ देश के इलाहाबाद शहर में भी आईसीएस की परीक्षा आयोजित की जानी शुरू हुई।

मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों और भारत सरकार अधिनियम, उन्नीस सौ उन्नीस के प्रावधानों के अंतर्गत अंततः एक अक्टूबर उन्नीस सौ छब्बीस को लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई। यूनाइटेड किंगडम की होम सिविल सर्विस के सदस्य सर रॉस बार्कर इसके पहले चेयरमैन नियुक्त किए गए और दिल्ली का ऐतिहासिक मेटकाफ हाउस इसका पहला कार्यालय बना। सीमित शक्तियों के बावजूद भारत की धरती पर एक स्थायी भर्ती संस्था की स्थापना हो चुकी थी।

संविधान की सुदृढ़ नींव और संवैधानिक प्रावधान

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात बाईस अगस्त उन्नीस सौ उरचास को संविधान सभा में प्रारूप समिति के चेयरमैन डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से संबंधित महत्वपूर्ण मसौदे पेश किए, जो बाद में संविधान के भाग चौदह (अनुच्छेद तीन सौ पंद्रह से तीन सौ तेईस) के रूप में स्थापित हुए। छब्बीस नवंबर उन्नीस सौ उनचास को अपने विदाई भाषण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस बात पर विशेष बल दिया था कि सरकारी नियुक्तियों में पक्षपात, भाई-भतीजावाद और धांधली को रोकने के लिए लोक सेवा आयोगों की स्वायत्तता और स्वतंत्रता सर्वोपरि है।

संविधान के अनुच्छेद तीन सौ पंद्रह के अंतर्गत संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया, वहीं अनुच्छेद तीन सौ सोलह के तहत अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार देश के राष्ट्रपति को सौंपा गया। आयोग के सदस्यों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए यह नियम बनाया गया कि किसी भी सदस्य को केवल राष्ट्रपति के आदेश से और उच्चतम न्यायालय की विधिवत जांच के बाद ही हटाया जा सकता है।

स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक क्रांति और नए मील के पत्थर

छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास को गणतंत्र की स्थापना के साथ ही फेडरल पीएससी का नाम बदलकर संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) कर दिया गया और आर. एन. बनर्जी इसके नए चेयरमैन बने। देश की बढ़ती प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली का अभूतपूर्व विस्तार किया। उन्नीस सौ उनहत्तर में सिविल सेवा परीक्षा के निबंध और सामान्य अध्ययन के प्रश्नपत्रों में संविधान की आठवीं अनुसूची की भारतीय भाषाओं को माध्यम के रूप में शामिल किया गया।

समय के साथ बदलाव की बयार बही और प्रशासनिक सुधार समितियों की सिफारिशों को लागू किया गया। उन्नीस सौ नवासी में उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑप्टिकल मार्क रिकग्निशन (ओएमआर) तकनीक की शुरुआत की गई। इसके बाद दो हजार ग्यारह में सिविल सेवा अभिरुचि परीक्षा (सीसैट) का प्रावधान लाया गया। दो हजार तेरह में मुख्य परीक्षा के ढांचे में व्यापक बदलाव किए गए, जिसके तहत नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि से जुड़े विषयों को जोड़ा गया।

समावेशिता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए दो हजार इक्कीस में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और नौसेना अकादमी की परीक्षा में महिलाओं को शामिल करने का मार्ग प्रशस्त किया गया। इसके अलावा, रेलवे की विभिन्न ग्रुप ए सेवाओं को मिलाकर भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा का गठन किया गया।

आंकड़े गवाह हैं: बदलाव और बढ़ती भागीदारी

आयोग के कार्यक्षेत्र और लोकप्रियता में पिछले दशकों में बेजोड़ वृद्धि हुई है। उन्नीस सौ पचास और इक्यावन में जहां कुल आवेदन मात्र बयालीस हजार सात सौ सत्ताईस थे, वहीं दो हजार बाईस और तेईस में यह आंकड़ा बढ़कर इकतालीस लाख दस हजार चवालीस के ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया।

  • परीक्षा केंद्रों की संख्या उन्नीस सौ पचास के आठ केंद्रों से बढ़कर दो हजार छब्बीस में तिरासी तक पहुंच चुकी है।
  • सिविल सेवा परीक्षा में अनुशंसित महिला उम्मीदवारों की संख्या उन्नीस सौ बावन की मात्र तीन से बढ़कर दो हजार पच्चीस में दो सौ نन्यानवे हो गई है।
  • अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के उम्मीदवारों की सफलता दर में भी कई गुना का इजाफा दर्ज किया गया है।
  • दिव्यांग (पीडब्ल्यूबीडी) उम्मीदवारों के लिए अवसरों को सुगम बनाते हुए दो हजार पच्चीस में बयालीस उम्मीदवारों की अनुशंसा की गई।

तकनीकी आधुनिकीकरण और सुरक्षा के कड़े इंतजाम

आज का यूपीएससी पूरी तरह से डिजिटल, पारदर्शी और तकनीक-युक्त बन चुका है। राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस डिवीजन के सहयोग से आयोग ने परीक्षाओं में फर्जीवाड़े को रोकने के लिए एआई-आधारित फेशियल ऑथेंटिकेशन (चेहरे की लाइव पहचान) प्रणाली को सफलतापूर्वक लागू किया है। सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के दौरान लाखों उम्मीदवारों के दस्तावेजों और पहचान का डिजिटल सत्यापन कुछ ही सेकंड में सुनिश्चित किया जाता है।

इसके अतिरिक्त, परीक्षा संपन्न होने के तुरंत बाद प्रोविजनल आंसर की (अनंतिम उत्तर कुंजी) जारी की जाती है और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से उम्मीदवारों से आपत्तियां व सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं। दूर-दराज के छात्रों और युवाओं की सहायता के लिए तीस चैनलों वाला आईपी-आधारित अत्याधुनिक कॉल सेंटर स्थापित किया गया है, जिसके माध्यम से पचास हजार से अधिक कॉलों का समाधान किया जा चुका है।

स्मरणीय प्रसंग और ऐतिहासिक किस्से-कहानियां

  • स्टील फ्रेम का उद्बोधन: इक्कीस अप्रैल उन्नीस सौ सैंतालीस को सरदार वल्लभभाई पटेल ने ऐतिहासिक मेटकाफ हाउस में सिविल सेवा के पहले बैच को संबोधित करते हुए इसे देश का ‘स्टील फ्रेम’ करार दिया था। तब से प्रतिवर्ष इस तारीख को ‘सिविल सेवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
  • अखबारों में छपे आवेदन पत्र: उन्नीस सौ नवासी में जब धीमी डाक सेवा के कारण दूर-दराज के इलाकों तक फॉर्म समय पर नहीं पहुंच पाते थे, तब आयोग ने सीधे समाचार पत्रों में आवेदन पत्र छपवाने की अनूठी पहल की थी।
  • किरण बेदी की ऐतिहासिक सफलता: वर्ष उन्नीस सौ बहत्तर में किरण बेदी भारतीय पुलिस सेवा के लिए चुनी जाने वाली देश की पहली महिला बनीं, जब अस्सी रिक्तियों में वे अकेली महिला अधिकारी थीं।
  • प्रतिभा सेतु पहल: जो मेधावी उम्मीदवार अंतिम चयन सूची से मामूली अंतर से चूक जाते हैं, उनके लिए नौ जून दो हजार पच्चीस को नए रूप में ‘प्रतिभा सेतु’ योजना की शुरुआत की गई, जो उन्हें विभिन्न मंत्रालयों, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी संगठनों के सत्यापित नियोक्ताओं से जोड़ती है।

वर्तमान स्वरूप और भविष्य की दृष्टि

वर्तमान में इस प्रतिष्ठित आयोग के चेयरमैन डॉ. अजय कुमार हैं, जो पंद्रह मई दो हजार पच्चीस से इस पद को सुशोभित कर रहे हैं। उनके साथ इस संस्था में लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला, सुमन शर्मा, विद्युत बिहारी स्वैन, दिनेश दासा, शील वर्धन सिंह, संजय वर्मा, सुजाता चतुर्वेदी और अनुराधा प्रसाद जैसे प्रबुद्ध सदस्य शामिल हैं। इन आठ सदस्यों में से तीन महिलाओं का होना इस बात का प्रमाण है कि यह संस्था लैंगिक समानता और समावेशिता के मोर्चे पर कितनी दूर तक आ चुकी है।

आयोग के चेयरमैन डॉ. अजय कुमार का यह कथन इस पूरी यात्रा का सार है कि, “कोई संस्था जो सौ सालों से कायम है, वह इसलिए नहीं कि वह बदलाव का विरोध करती है, बल्कि इसलिए कि वह जानती है कि क्या कभी नहीं बदलना चाहिए।”

एक सदी का यह सफर इस बात का प्रतीक है कि योग्यता और निष्पक्षता के बूते किस प्रकार एक राष्ट्र के लोकतंत्र और शासन तंत्र को सशक्त बनाया जा सकता है। आज यूपीएससी महज़ एक परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था नहीं, बल्कि भारत की प्रशासनिक रीढ़ की हड्डी और हर महत्वाकांक्षी युवा के सपनों को पंख देने वाला एक राष्ट्रीय मंच बन चुका है।

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